Sunday, 31 October 2021
कांग्रेस की समझ
Friday, 15 October 2021
मज़हबी गैंगवार
मानवता के दुश्मनों, मज़हबी गैंगवार बंद करो !
0कश्मीर में पिछले सप्ताह 7 लोगों की हत्या हुयी है। जिनमें 4 अल्पसंख्यक और 3 मुसलमान हैं। इनमें एक कश्मीरी पंडित एक सिख और 2 कश्मीर से बाहर के दलित भी शामिल हैं। पिछले एक साल में कश्मीर में कुल 28 लोगांे की हत्या हुयी है। इनमें भी 7 गै़र मुस्लिम शामिल हैं। इधर पूरे देश में कई मुसलमानों की धर्म के नाम पर माॅब लिंचिंग की ख़बरें भी अब न्यू नाॅर्मल बन चुकी हैं। उनके साथ पुलिस और खासतौर पर भाजपा सरकारों पर क़दम क़दम पर पक्षपात और अन्याय करने का आरोप लगता रहा है। अगर पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान अफ़गानिस्तान और बंग्लादेश में देखें तो वहां भी धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार पक्षपात और हमलों के मामले सामने आते रहते हैं।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
किसी भी देश राज्य या क्षेत्र विशेष में किसी की हत्या होना अपराध और चिंता की बात है। लेकिन किसी पर उसके धर्म की वजह से हमला बलात्कार उसको बेघर करना बिल्कुल अलग बात है। कश्मीर में आतंकियों ने 2019 में 36 और 2020 में 33 लोगों की जान उनको पुलिस और सरकार का मुखबिर बताकर ली थी। हिंदू अख़बार के अनुसार स्कूल में जब टीचर सुपिंदर कौर और उनके सहायक दीपक चंद की हत्या हुयी उस दिन अपने बाकी अल्पसंख्यक सहयोगियों को मुस्लिम स्टाफ उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाने गया। ऐसे ही कश्मीरी पंडित माखन बिंद्रू के घर स्थानीय मुसलमान बड़ी संख्या में अफ़सोस जताने और हत्या की निंदा करने को गये। साथ ही पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़ती ने भी उनके घर जाकर हत्या की निंदा करते हुए यह शैतानों का काम बताया। जम्मू के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी दिलबाग़ सिंह ने बयान दिया कि घाटी के सभी वर्गों ने इस हत्या की एक आवाज़ में निंदा की है। हत्याओं को आप संख्या के हिसाब से नहीं धर्म के हिसाब से इसलिये देख सकते हैं क्योंकि इससे कश्मीरी पंडितों में 1990 के दौर की डरावनी यादें ताज़ा हो गयी हैं। उनमें फिर से खौफ़ की लहर दौड़ने लगी है। ठीक ऐसा ही डर और गुस्सा शेष भारत में जब किसी मुसलमान या दलित की हत्या उत्पीड़न या अत्याचार करके उल्टा उसी के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कराया जाता है, पैदा होता है। लेकिन उसपर अब कोई शोर नहीं होता। संघ परिवार ने नागरिकता और अपराध के दो दो पैमाने बना दिये हैं। भाजपा का दावा रहा है कि न्याय सबको, तुष्टिकरण किसी का नहीं। लेकिन व्यवहारिकता में वह इससे कोसों दूर है। मिसाल के तौर पर पूरे देश में तो छोड़ ही दें। कश्मीर में बीजेपी नेता और पंचायत सदस्य राकेश पंडिता की हत्या हुयी तो राज्यपाल शासन में भाजपा सरकार ने उसको 45 लाख मुआवज़ा दिया। लेकिन जब बीजेपी के ही एक मुस्लिम पंचायत सदस्य की हत्या हुयी तो उसको 5 लाख मुआवज़ा दिया गया। शुक्र है कि उसको कम से कम मुआवज़ा दिया तो गया। वर्ना भाजपा शासित राज्यों में जब भी कोई मुस्लिम इस तरह से मारा जाता है ना तो कोई भाजपा नेता कश्मीर के मुस्लिम नेताओं की तरह उसके घर जाने की ज़हमत करता है ना ही उसको न्याय और मुआवज़ा दिलाने की कोई ख़बर अब तक सामने आई है। इस तरह से जो भाजपा यह दावा करती थी कि नोटबंदी और धारा 370 हटाने से कश्मीर में आतंकवाद की कमर टूट जायेगी। वह खुद ही समाज को बांटने और हर मामले को हिंदू मुस्लिम की नज़र से देखने का काम कर रही है। पक्षपात और अलग अलग पैमानों की हालत यह है कि कश्मीर में जिस दलित वीरेंद्र पासवान की हत्या हुयी थी। सरकार ने उसका शव परिवार के लाख मिन्नतें करने के बावजूद बिहार के भागलपुर ना भेजकर कश्मीर में ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया। यूपी के लखीमपुर में एक मंत्री के बेटे पर अपनी जीप से चार आंदोलनकारी किसानोें को कुचलने का आरोप लगा। बड़ी मुश्किल से मुकदमा कायम हुआ। अभी तक मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया गया। पीएम मोदी ने आज तक इस घटना की निंदा तक नहीं की। मंत्री पुत्र को सीधे पकड़ने की बजाये पुलिस उसके घर पर समन चिपकाती रही। आज जब मंत्री पुत्र पकड़ा भी गया है तो उसको वीआईपी ट्रीटमेंट देने का आरोप किसान लगा रहे हैं। उधर कश्मीर में अल्पसंख्यक की इन हत्याओं के मामले में पूछताछ के लिये अब तक सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। कश्मीर के हालात बता रहे हैं कि वहां आतंकी एक बार फिर से मज़बूत होने का प्रयास कर रहे हैं। आतंकियों ने हाल ही में एक बड़े हमले में पुंछ में कई जवानों को शहीद कर दिया है। सवाल यह है कि जब पहले ऐसा होता था तो गोदी मीडिया वहां की सरकार से सवाल पूछता था। अब वही मीडिया मोदी सरकार से सवाल तलब क्यों नहीं कर रहा कि आप पाकिस्तान आतंकियों और उनके धनश्रोत बंद करने का दावा करते थे तो अब कहां से वे फिर उभर आये? कश्मीर की हर घटना के लिये वहां के बहुसंख्यकों और पाकिस्तान को कोसने से मसला हल नहीं होगा। हालांकि यह सच है कि कश्मीर में अगर आतंकी किसी मुसलमान को मारते हैं तो उसका परिवार या धर्म के लोग कश्मीर छोड़कर भागने की कभी नहीं सोचेंगे। लेकिन कश्मीरी पंडित सिख या दलित के साथ ऐसा होगा तो वे जान बचाकर पलायन को मजबूर हो सकते हैं। ऐसा ही माॅब लिंचिंग से देश के विभिन्न राज्यों में मुसलमानों के साथ डर पैदा होता है। इतना ही नहीं सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वाले मुसलमानों और सेकुलर हिंदुओं के साथ जिस तरह से विभिन्न भाजपा और विशेष तौर पर योगी की सरकार और दिल्ली पुलिस पेश आई वह अपने में डरावना और चिंताजनक है। हमारा कहना है कि कश्मीर हो या शेष भारत संविधान कानून कोर्ट पुलिस और सरकारों को सबके साथ एक जैसा ही व्यवहार करना चाहिये। अगर वे यह समझकर ऐसा नहीं करेंगी कि वे इतनी शक्तिशाली और सक्षम हैं कि उनका पक्षपात अन्याय या अत्याचार करने पर भी कभी कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता तो यह उनकी खुशफहमी है। इतिहास गवाह है कि ऐसे अंग्रेजी़ राज तानाशाह हिटलर सामंतशाही रजवाड़े ज़मींदार तुग़लकशाही एक ना एक दिन खुद अपने कर्मों से ही खत्म हो जाते हैं। बहरहाल मानवता के दुश्मन चाहे जो हों चाहे जहां हो और जितने ताक़तवर हों मज़हब के नाम पर गैंगवार जितनी जल्दी बंद कर दें देश और दुनिया का उतना ही जल्दी भला होगा।
मज़हब को लौटा ले उसकी जगह दे दे ,
इंसान सलीक़े के तहज़ीब करीने की ।।
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Sunday, 3 October 2021
प्रतीकों की राजनीति
प्रतीकों की राजनीति लोकप्रिय हो सकती है, लोकहितैषी नहीं ?
0 कांग्रेस ने पंजाब मंे पहली बार एक दलित सिख को मुख्यमंत्राी बनाकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। उधर गुजरात में भाजपा ने मुख्यमंत्राी के साथ पूरा मंत्रिमंडल बदलकर राजनीति में एक नया प्रयोग किया है। आज़ादी के बाद कई दशकों तक जिस तरह से कांग्रेस ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ताश के पत्तों की तरह फेंटा है। आज ठीक उसी तरह से भाजपा शासित राज्यों में संघ परिवार कर रहा है। सवाल यह है कि धर्म जाति क्षेत्र घृणा दुष्प्रचार झूठ भावनाओं और प्रतीकों की राजनीति से जनता का भला होता है या नेताओं का?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
केंद्र मंे सरकार न होने से कांग्रेस को पहली बार यह अहसास हो रहा है कि जिन राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन करना है। उनके हटाये जाने वाले मुख्यमंत्री को कहां एडजस्ट करे? पहले वह उनका दर्जा बढ़ाकर केंद्र में मंत्री किसी आयोग का मुखिया या गवर्नर बनाकर उनकी नाराज़गी या विद्रोह को काबू कर लेती थी। दरअसल सत्ता की अपनी अलग ही पाॅवर होती है। ऐसे में कांग्रेस हो या भाजपा उसका हाईकमान भी बहुत ताक़तवर होता है। आज यह शक्ति संघ प्रमुख और पीएम मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के हाथों में आ गयी है। अगर वे किसी को ना चाहते हुए भी सीएम पद से हटाकर दूसरे को सीएम बना देते हैं तो भूतपूर्व सीएम की यह मजाल नहीं कि वह उनका या पार्टी का राजनीतिक नुकसान कर सके। ऐसा कर्नाटक और उत्तराखंड में भी किया जा चुका है। उत्तराखंड में तो चार माह में ही दो सीएम बदल दिये गये। इस मामले में यूपी के सीएम योगी इसका अपवाद लगते हैं। इसकी वजह उनका कट्टर हिंदूवादी कोर वोट और उनकी पीठ पर संघ का हाथ माना जाता हैै। कांग्रेस ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को केवल उन नौसीखिया नवजोत सिंह सिंधू की वजह से हटा दिया जो खुद कोई गंभीर नेता नहीं है। ऐसा ही फैसला उसने एमपी में सिंधिया को सीएम बनाकर किया होता तो वहां आज भी उसकी सरकार चल रही होती। इतना ही नहीं राजस्थान में सचिन पायलट के साथ वहां के सीएम और कांग्रेस हाईकमान जिस तरह का व्यवहार कर रहा है। आज नहीं तो कल वहां भी बगावत होगी और हो सकता है कि बिना कार्यकाल पूरा किये वहां भी कांग्रेस सत्ता से हाथ धो बैठे। कांग्रेस को दो दो लोकसभा चुनाव हारकर भी यह बात समझ नहीं आ रही कि उसको पार्टी में भी लोकतंत्र बहाल करना चाहिये। पुरानी गल्तियों से सीखना चाहिये। उसको पंजाब में एक दलित सीएम बनाकर लग रहा है कि अगला चुनाव वह केवल इसी मास्टर स्ट्राॅक से जीत सकती है। जबकि इससे ऐसा लगता है। मानो कोई दलित सीएम ही दलितों का भला कर सकता है। यह प्रयोग मायावती यूपी में सीएम बनकर कर चुकी हैं। लेकिन उनके सत्ता में रहते दलितों का कोई खास भला नहीं हुआ। ऐसे ही भाजपा ने जिस तरह से गुजरात में अपना सीएम और पूरा मंत्रिमंडल बदलकर यह संदेश देना चाहा है कि राज्य में जो कुछ हुआ उसके लिये भाजपा या संघ नहीं मुख्यमंत्री और सारे मंत्री जि़म्मेदार थे। जिनको बदल दिया गया है। यही काम जब केरल में कम्युुनिस्टों ने किया था तो सब दलों ने उनकी जमकर निंदा की थी। जबकि उन्होंने सीएम नहीं बदला था। साथ ही यह काम उन्होंने चुनाव बाद किया था। दरअसल भाजपा हो या कांग्रेस वह यह मानकर चलते हैं कि इस तरह की प्रतीकात्मक राजनीति से उनका वोट बैंक उनके साथ बना रहेगा। गुजरात में लगभग दो दशक से भाजपा सरकार लगातार चल रही है। पिछली बार 2017 में भाजपा वहां 99 सीट जीतकर बहुत किनारे पर ही सरकार बना पाई थी। इस बार वह चुनाव मेें एन्टी इंकम्बैसी से बचने को चुनाव से आधा साल पहले मुख्यमंत्री और सारा मंत्रिमंडल बदलकर यह दिखाना चाहती है कि जो काम नाराज़ जनता किसी दूसरी पार्टी को जिताकर करेगी। वह उसने चुनाव से पहले खुद ही कर दिया है। लिहाज़ा इस बार भी उसी को वोट देना। ऐसे ही पंजाब में कांग्रेस चुनाव से आधा साल पहले वहां की आबादी के 32 प्रतिशत दलितों को यह कहना चाहती है कि वह उनकी बड़ी हितैषी है। लिहाज़ा आने वाले चुनाव में कांग्रेस को ही वोट देना। ऐसे ही भाजपा आज जिस तरह से हिंदू वोटबैंक की राजनीति कर रही है। वैसी ही कांग्रेस और सपा बसपा राजद और टीएमसी जैसी सेकुलर पार्टियां मुसलमानों को रिझाकर अपना वोटबैंक बनाकर लंबे समय तक करती रही हैं। सेकुलर दल रोज़ा अफ़तार, टोपी लगाकर हर ईद पर ईदगाह जाकर कब्रिस्तानों की दीवार बनवाकर उर्दू अनुवादक नियुक्त कर चंद मस्जिद के इमामों को वेतन देकर मदरसों को थोड़ी सी ग्रांट देकर मुस्लिम पर्सनल लाॅ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और बाबरी मस्जिद बचाने की दिल को छूने वाली बातें करके उनको लंबे समय तक अपना वोटबैंक बनाकर प्रतीकात्मक राजनीति करते रहे हैं। मोदी खुद को हिंदू राष्ट्रवादी और पिछड़े समाज में पैदा होने वाला बातते हैं। जबकि उनकी सूटबूट की सरकार जिस तरह से पूंजीपतियों कारपोरेट और निजीकरण की किसान मज़दूर गरीब विरोधी आर्थिक नीतियां तेज़ी से अपना रही है। उससे ना केवल पिछड़ों बल्कि शेष हिंदू समाज का भी कारोबार नौकरियों और आर्थिक नुकसान अधिक हो रहा है। इसकी वजह यह है कि उनकी भागीदारी इस क्षेत्र में पहले से ही अल्पसंख्यकों की आबादी से अधिक रही है। भाजपा आज गैर यादव और गैर जाटव पिछड़े और दलित समाज के एक वर्ग को भी अपने साथ जोड़े रखने के लिये केंद्र और यूपी सहित अन्य भाजपा शासित राज्यों में चुनाव करीब आने पर उनके समाज से मंत्री बनाकर यह जतानी चाहती है कि वह सभी हिंदू जातियों को उनका समान प्रतिनिधित्व दे रही है। इसके साथ ही भाजपा सरकारें हर मुद्दे को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाकर खुलकर साम्प्रदायिक राजनीति भी ठीक उसी तरह से हिंदू भावनाओं के तुष्टिकरण के लिये कर रही है। जिस तरह से कभी कांग्रेस या अन्य क्षेत्रीय धर्मनिर्पेक्ष दल मुसलमानों को खुश करने के लिये करते थे। हालांकि सच्चर कमैटी की रिपोर्ट बता रही है कि इससे मुसलमानों का रोज़गार शिक्षा और स्वास्थ्य या सरकारी योजनाओं में उनकी आबादी से अधिक हिस्सा ना मिलने से अतिरिक्त लाभ नहीं हुआ। लेकिन आज मीडिया इतना झूठ बोल रहा है कि देश में ऐसा माहौल बन गया है। जिससे ऐसा लगता है कि हिंदुओं की तमाम समस्याओं के लिये केवल मुसलमान कसूरवार है। उधर कांवड़ वालों पर फूलों की वर्षा दिवाली पर लाखोें दिये जलाकर और दशहरा पर विदेशी कलाकारों को बुलाकर रामलीला कराकर भाजपा सराकर हिंदुओं को प्रतीकात्मक रूप से ऐसा आभास करा रही है। मानो रोज़गार शिक्षा इलाज अर्थव्यवस्था कालाधन भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था जनता के लिये कोई मायने ही ना रखती हो। कई कई हज़ार करोड़ की बड़ी बड़ी मूर्तियां लगाकर सरकारें ऐसा जता रही हैं। जैसे जनता की सबसे बड़ी ज़रूरत यही हो। आज़ादी के बाद कई दशक तक कांग्रेस ने भी दलितों और मुसलमानों के साथ यही प्रतीकात्मक खेल खेला है। लेकिन शासन प्रशासन में जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी देना नीतिगत रूप से तो सही लगता है। लेकिन किसी भी सरकार को चाहे उसका मुखिया किसी भी जाति या धर्म का हो ऐसे काम करने चाहिये। जिनसे सबका भला हो। जनता को आज सोचना चाहिये कि इस तरह से धर्म जाति नफरत और झूठ के नाम पर हर बार वोट देकर वो जीवन के असली मुद्दों से भटककर किसका भला कर रही है, अपना या नेताओं का जो नारों दावों और बड़े बड़े बयानों से आगे बढ़कर सबका विकास और सबका विश्वास हासिल नहीं कर पा रहे हैं।
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Saturday, 25 September 2021
तालिबान नहीं सुधरेंगे
तालिबान नहीं सुधरेंगे ? यह शक सही साबित होता जा रहा है!
0 बाॅलीवुड के दो बड़े मुस्लिम कलाकार नसीरूद्दीन शाह और जावेद अख़्तर ने अफ़गानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने पर बयान जारी कर कुछ बातें कही थीं। इनमें भारत के मुसलमानों से ताालिबान का और हिंदुओं से किसी भी तरह के देसी कट्टरपंथियों का समर्थन ना करने की अपील भी की गयी थी। ज़ाहिर बात है कि दोनों वर्गों के उदार लोगों को जहां ये अपील ठीक लगी वहीं कट्टर और साम्प्रदायिक लोगों ने बिना समय गवाये दोनों सेकुलर और मानवतावादी कलाकारों को निशाने पर ले लिया। लेकिन एक माह भी नहीं बीता तालिबान ने हमारे लेख में जतायी गयी आशंकाओं को सच साबित करना शुरू कर दिया है।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
दुनिया की जानी मानी पीयू रिसर्च ने हाल ही में पाकिस्तान सहित इंडोनेशिया और कई मुस्लिम मुल्कों में एक सर्वे किया है। पाकिस्तान में जहां 84 प्रतिशत वहीं दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में 74 फीसदी लोग शरीयत राज के पक्ष में हैं। मजे़दार बात यह है कि इसके बावजूद पाक में 9 तो इंडोनेशिया में मात्र 4 परसेंट लोग ही तालिबान राज के पक्ष में हैं। हमारा दावा है कि अगर विश्व की दूसरी बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश भारत के मुसलमानों को भी इस सर्वे में शामिल किया जाता तो उनकी तादाद पाक और इंडोनेशिया से भी काफी कम तालिबान के सपोर्ट और शरीयत राज के पक्ष में आयेगी। उधर तालिबान ने सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत होते ही अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। यह आशंका हमने अपने पहले लिखे लेख में ही जता दी थी। दरअसल जिस एक बात के लिये नसीरूद्दीन शाह को भारत में मुट्ठीभर कट्टरपंथी मुसलमान कोस रहे हैं। वह कोई माने या ना माने या उनके शब्दों के चयन पर बेशक एतराज़ करे लेकिन सच यही है कि भारत का मुसलमान दुनिया के दूसरे मुस्लिमों से बिल्कुल अलग यानी उदार सेकुलर और प्रगतिशील है। हालांकि शाह ने अगर इस 54 सेकंड के वीडियो में दुनिया के अलग अलग हिस्सों में इस्लाम अलग अलग ना बताकर मुसलमान अलग अलग बताया होते तो कट्टरपंथियोें को इतना हंगामा करने का मौका नहीं मिलता। जबकि कट्टरपंथियों के पूरी दुनिया में इस्लाम एक जैसा होने की दावे की कलई भी इस हक़ीक़त से खुल जाती है कि उसकी व्याख्या यानी इंटरप्रिटेशन और अनुवाद सब देशों फिरकों और फिक़हों में अलग अलग अपनाया और माना जाता रहा है। मिसाल के तौर पर सउूदी और अफगानी इस्लाम की परिभाषा तक अलग अलग है। खुद भारत में शिया सुन्नी और देवबंदी बरेलवी मरकज़ के लोग इस्लाम की कई बातों पर एकमत नहीं हैं। वैसे अगर निष्पक्ष होकर देखा जाये तो इसमें कोई अनोखी या एतराज़ के लायक बात भी नहीं बल्कि ये उदारता विविधता और लोकतंत्र की पहचान है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है। जब एक वर्ग दूसरे को मुसलमान ना मानकर ना केवल काफिर का तमगा देता है बल्कि उसको ज़बरदस्ती अपने सैक्ट के हिसाब से चलाना चाहता है। एक दूसरे की बात से सहमत ना होने या अपने तौर तरीकों से चलने पर कुछ अलग अलग सोच के फिरके एक दूसरे पर हिंसक हमले करने से भी नहीं चूकते। हिंदुओं में यह बात सराहनीय है कि ना तो वे किसी खास सोच के हिंदू को हिंदू धर्म से बाहर करने का फ़तवा देते हैं और ना ही 33 करोड़ देवी देवताओं में से किसी की पूजा करने या ना करने से किसी पर हमला या उसको बुरा समझकर बहिष्कार करते हैं। लेकिन जावेद अख़्तर ने कुछ समय से हिंदुओं में बढ़ रही कट्टरता पर उंगली उठाकर एक संगठन को तालिबानी सोच से प्रेरित बताकर तूफान खड़ा कर दिया था। बाद में उन्होने शिवसेना के मुख्य पत्र दोपहर का सामना में एक लंबा लेख लिखकर अपनी मंशा साफ की है। लेकिन जावेद अख़्तर का आगाह करना गलत नहीं माना जा सकता। अजीब बात यह भी है कि जो 84 प्रतिशत पाकिस्तानी शरीयत राज चाहते हैं। जब वहां चुनाव होता है तो उनमें से मात्र 7 प्रतिशत ही इस्लामी राज लाने का दावा करने वाली पार्टियों को वोट देते हैं। आप विश्वास कीजिये अगर तालिबान भी कभी बर्बरता बुज़दिली और गुंडागर्दी छोड़कर अफगानिस्तान में निष्पक्ष और ईमानदार चुनाव कराने की हिम्मत दिखायेगा तो वहां की लगभग सभी औरतें अल्पसंख्यक और पुरूषों का एक हिस्सा मिलकर उनको सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकता है। जो लोग यह समझते हैं कि भारत सहित पूरी दुनिया के मुसलमान तालिबान को पसंद करते हैं। वे मूर्खो के स्वर्ग में रहते हैं। उनको अफ़गानिस्तान के खासम खास पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान को देखना चाहिये जो तालिबान को तो सपोर्ट करता है। लेकिन अपने यहां वैसा ही तालिबानी राज कायम होने से डरता है। यही वजह है कि वह बार बार तालिबान से अपील कर रहा है कि तहरीके तालिबान-पाकिस्तान के अफ़गानिस्तान में बंद आतंकवादियों को अपनी जेलों से रिहा ना करे। पाक के शातिर और मक्कार शासकों की कितनी दोगली अपील है कि खुद तो तालिबान जैसे बर्बर आतंकियों को अपने देश में ना केवल शरण दी बल्कि पैसा और हथियार देकर ट्रेनिंग भी दी। लेकिन अपने यहां उन जैसे तालिबानी सोच के तहरीक ए तालिबान को पनपने नहीं देना चाहते। इसके साथ ही आप यह भी देख सकते हैं कि पाकिस्तान में महिलाओं और अल्पसंख्यकों का उतना बुरा हाल नहीं है। जितना जुल्म और पक्षपात अफ़गानिस्तान में पहले देखा गया और अब भी देखे जाने लगा है। इतना ही नहीं पाक में जैसा भी आधा अध्ूारा लोकतंत्र मीडिया अदालत और दूसरी पश्चिमी सभ्यता की प्रतीक चीजे़ं मौजूद हैं। अफ़गानिस्तानी तालिबान उनको किसी कीमत पर इजाज़त नहीं देगा। इसका नतीजा यह होगा कि या तो अफ़गानिस्तान में धीरे धीरे तालिबान का राज कमज़ोर पड़ता जायेगा या फिर पाकिस्तान में भी तालिबानी सोच के लोग पार्टी और संगठन उसके ना चाहते हुए मज़बूत होते जायेंगे। उसके बाद पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाकर यह अहसास होगा कि उसने जो बबूल का पेड़ अफ़गानिस्तान या कश्मीर में भारत के लिये बोया है। उसके कांटों से वह खुद भी लंबे समय तक बचा नहीं रह सकता। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। दशकों के भारी खून खराबे के बाद पाक ना केवल अपनी भूल सुधार करने को मजबूर होगा बल्कि उसको अपने देश के साथ साथ पड़ौस में उगाया गया कैक्टस का पौधा भी उखाड़ना होगा। हमारा मानना है कि अगर दुनिया सोच समझकर अपने स्वार्थों पर थोड़ा सा अंकुश लगाकर तालिबान और पाकिस्तान को घेरें और उनको विश्व स्तर पर आतंकवाद उग्रवाद और कट्टरवाद से दूर रहकर सेकुलर समानता और सही मायने में लोकतंत्र पर चलकर सबको बराबर अधिकार देने को मजबूर करें तो आज नहीं तो कल इनका दिमाग़ हर हाल में ठिकाने आ सकता है।
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Monday, 13 September 2021
N M P
एनएमपी यानी नेशनल मोनिटाइजे़शन पाइपलाइन किसके हित में ?
0 हमारे देश का प्रावेट सैक्टर सड़क और रेलवे लाइन जैसे बुनियादी क्षेत्र में निवेश करने से पहले से ही बचता रहा है। इसकी वजह यह है कि वह जानता है कि भारत के दूरदराज़ के इलाक़ों में भारी भरकम पैसा लगाने से खर्चा बहुत अधिक आयेगा । लेकिन गांव और क़स्बों के लोग उसको मनमाफि़क मुनाफा नहीं दे पायेंगे। यही वजह है कि आपको गांव देहात में कायदे के प्रावेट स्कूल बड़े अस्पताल ना के बराबर ही देखने को मिलेंगे। इसके बावजूद मोदी सरकार ने दो टूक कह दिया है कि सरकार का काम बिज़नैस करना नहीं है। सवाल यह है कि ऐसे में घाटा उठाकर भी जनकल्याण का काम कौन करेगा?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
पूंजीवाद और समाजवाद का बुनियादी अंतर यही रहा है कि जहां समाजवादी सरकारें नुक़सान उठाकर भी जनता को बुनियादी ज़रूरतें लागत से कम दाम पर उपलब्ध कराती हैं। वहीं पूंजीवादी व्यवस्था में केवल और केवल मुनाफे का एकसूत्री लक्ष्य सामने रखकर काम किया जाता है। हालांकि यह भी सच है कि समाजवादी सरकारें भ्रष्ट अफ़सरशाही के बल पर जनकल्याण का उतना काम नहीं कर पातीं जितना उनको करना चाहिये या वे करना चाहती हैं। उधर प्राइवेट सैक्टर कम खर्च कम वेतन और कम लागत पर सुविधायें सेवायें और प्रोडक्ट उपलब्ध् कराकर जनता का खून चूसना शुरू कर देता है। जिससे वह अधिक से अधिक लाभ मानवता समाज और नैतिकता व नियम कानून को ताक पर रखकर कमा सके। पहले सरकारें लोकलाज के डर से पूंजीपतियों को ऐसी खुली लूट की छूट देते हुए डरती थीं। उनको विपक्ष मीडिया कोर्ट और चुनाव में हार जाने का डर बना रहता था। लेकिन जब से देश में मोदी सरकार आई है। यह डर सरकार के दिमाग से ख़त्म हो गया है। कहने को देश में लोकतंत्र है। लेकिन लेविल प्लेइंग फील्ड नहीं है। मोदी सरकार को चुनाव हारने का डर नहीं है। उसने 2016 में असफल नोटबंदी फिर आधी अध्ूारी तैयारी के साथ जीएसटी और उसके बाद 2020 में बिना एक्सपर्ट्स कैबिनेट और विपक्ष से मश्वरे के 68 दिन की देशबंदी करके अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया। इसके अलावा भी उसकी एक के बाद एक गलत आर्थिक नीतियों पक्षपाती फैसलों विभाजनकारी कानून बहुसंख्यकवादी नीतियों रिज़र्व बैंक के गवर्नरों का गलत चयन गलत आर्थिक सलाहकारों का चयन बैंकों का एनपीए बढ़ाते जाना कालाधन देश में पैदा होने से ना रोक पाना और विदेश से लाने में असमर्थता करप्शन रोकने में नाकामी से हमारी जीडीपी लगातार गिरती जा रही है। आज हालत यह है कि सरकार के पास अपने खर्च चलाने को पूरा पैसा नहीं है। ऐसे में मोदी सरकार ने एनएमपी यानी नेशनल मोनिटाइजे़शन पाइपलाइन योजना लांच की है। इसके ज़रिये वह आज़ादी के बाद सरकार द्वारा बनाई गयी अरबों खरबों की लागत वाली नवरत्न सरकारी कंपनियों तक को निजी क्षेत्र को औने पौने में लीज़ पर देकर 6 लाख करोड़ से अधिक का राजस्व जुटाना चाहती है। इसमें रेलवे नेशनल हाईवे बंदरगाह बिजली एयरपोर्ट दूरसंचार और शिपिंग सहित कई स्टेडियम को प्राइवेट क्षेत्र को सौंपना चाहती थी। पहले मोदी सरकार एयर इंडिया को बेचना चाहती थी। लेकिन उसे आज तक उसका एक भी खरीदार नहीं मिला। इसको बेचने की वजह इंडियन एयरलाइंस का लगातार बढ़ता घाटा बताया जाता था। इसकी एक बड़ी वजह यह भी रही कि प्राइवेट सैक्टर बखूबी जानता है कि देश की अर्थव्यवस्था इतनी खराब होती जा रही है कि भारत की जनता विशेष रूप से मीडियम क्लास की जेब में इतना अधिक या अतिरिक्त धन नहीं आ रहा है कि वह अपनी कार या सरकारी रेल की बजाये हवाई जहाज़ से यात्रा करने की सोचे। कोरोना ने सबसे अधिक कमर इसी वर्ग की तोड़ी है। सवाल यह भी है कि नेहरू और कांग्रेस को बात बात पर दोषी ठहराने वाली मोदी सरकार खुद क्यों नहीं एयर इंडिया को लाभ में ला सकी? यही समस्या रेलवे के निजीकरण में भी आने वाली है। अगर प्राइवेट सैक्टर रेलवे के रूट लीज़ पर लेगा तो वह उसमें पहले के मुकाबले सुविधायें बढ़ायेगा। जब ऐसा होगा तो उसकी लागत और मुनाफा बढ़ने से रेल का किराया भी काफी बढ़ेगा। लेकिन पहले रोज़गार जाने वेतन कम होने पीएफ समय से पहले निकालकर खर्च करने सोना गृवी रखकर कर्ज लेने से परेशान जनता का बड़ा हिस्सा इस बढ़े किराये को नहीं दे पायेगा। यही ख़तरा निजी क्षेत्र को इस क्षेत्र मेें आने से रोक सकता है। एनएमपी में सरकार ने दावा किया है कि वह सार्वजनिक क्षेत्र के इन नवरत्नों को जड़ से बेच नहीं रही है। बल्कि वह इन क्षेत्रों को 4 से 5 साल के पट्टे पर प्रावेट सैक्टर को संचालन के लिये देगी। जबकि प्राइवेट क्षेत्र की नज़र इन सरकारी कंपनियों की बेशकीमती ज़मीन पर लगी है। देखने में सरकार का यह क़दम बड़ा अच्छा नज़र आता है। लेकिन कड़वा सच यह है कि 2020-21 में भी सरकार ने सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचकर 2.1 लाख करोड़ कमाई का सुनहरा सपना जनता को दिखाया था। लेकिन वह केवल 30 हज़ार से कुछ अधिक ही वसूल कर सकी है। इसके बाद 2022 के बजट में सरकार ने 1.75 लाख करोड़ की सरकारी भागीदारी बेचने का मन बनाया। लेकिन वह भी पूरा होने के आसार दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहे हैं। सवाल यह है कि सरकार ऐसा करने में बार नाकाम क्यों हो रही है? इसकी वजह है निजी क्षेत्र को जनकल्याण और सरकार के लाभ से कोई लेना देना नहीं है। उसे तो केवल अपना मुनाफा चाहिये। सरकार ने चूंकि बुनियादी ढांचा पहले ही तैयार कर दिया है। प्राइवेट सैक्टर को इस क्षेत्र का संचालन और कम से कम खर्च कर रखरखाव करना है। ऐसा करने से जो मोटी कमाई होगी। उसमें से एक हिस्सा सरकार को देना है। पहले सरकार पर सरकारी सम्पत्तियोें को बेचने के ढेर सारे आरोप लगते रहे हैं। लिहाज़ा अब मोदी सरकार ने बहुत सोच समझकर यह बीच का रास्ता निकाला है। जिसमंे सम्पत्ति का स्वामित्व तो कहने को सरकार का ही बना रहेगा लेकिन एक तरह से उन सम्पत्तियों पर काबिज़ होने वाली निजी क्षेत्र की गिनी चुनी कंपनियों की आगे चलकर मोनोपोली हो जायेगी। जिस तरह से टेलिकाॅम सैक्टर में अंबानी के जियो की होती जा रही है। एक दिन आयेगा आप देखेंगे धीरे धीरे अन्य सभी प्राइवेट दूरसंचार कंपनियां घाटा सहन ना कर पाने की वजह से जियो के सामने घुटने टेक देंगी। सरकारी कंपनी बीएसएनएल का खुद सरकार ने पहले ही भट्टा बैठा दिया है। ऐसे में जियो भविष्य में जनता से अपनी सेवाओें की मनमानी कीमत वसूल करेगी। चंद गिने चुने अमीर कारपोरेट घरानों को छोड़ दें तो क्या उद्योगपति क्या व्यापारी क्या प्रोफेशनल क्लास और क्या मीडियम और लोवर क्लास सबके सामने आज रोज़गार नौकरी कारोबार और पर्याप्त आय की समस्या आ खड़ी हुयी है। ऐसे में लोग बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी की व्यवस्था कर पा रहे हैं। सवाल यही है कि जब लोगों की जेब में पैसा ही नहीं है। ऐसे में सरकार अगर प्राइवेट सैक्टर से 6 लाख करोड़ कमाने की सोच रही है तो प्राइवेट सैक्टर भी अपनी आमदनी से तो सरकार को पैसा देगा नहीं। वह जनता की जेब से ही यह 6 लाख करोड़ और अपना इससे कई गुना मुनाफा वसूलना चाहेगा जिसका सारा बोझ आखि़रकार जनता पर ही पड़ना है तो सरकार किसके हित में काम कर रही है?
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Saturday, 4 September 2021
दलित राजनीति का भविष्य
‘माया’ की बसपा को खा जायेगी ‘रावण’ की असपा ?
0 दलित समाज की राजनीति में डा. अंबेडकर जगजीवन राम बूटा सिंह कांशीराम रामविलास पासवान उदितराज और मायावती के बाद यूपी में जो एक नाम तेज़ी से उभरकर सामने आ रहा है वो युवा नेता चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण का है। हालांकि हाल ही में गठित उनकी आज़ाद समाज पार्टी आगामी चुनाव में लंबे समय तक कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर पायेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या रावण की पार्टी धीरे धीरे ही सही माया की बसपा द्वारा खाली की जा रही सियासी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने का सपना देख रही है और क्यों व कैसे?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
0 आंच अगर कश्ती पर आये हाथ क़लम करवा देना,
लाओ मुझे पतवारे दे दो मेरी जि़म्मेदारी है ।।
सियासत में थोड़ा भी दिलचस्पी रखने वाले बता सकते हैं कि बसपा प्रमुख मायावती ना केवल एक के बाद एक चुनाव हारकर अपनी सियासी ज़मीन तेज़ी से खोती जा रही हैं बल्कि उसी भाजपा के सामने लगभग हथियार डाल चुकी हैं। जो उनके दलित वोटबैंक में सेंध लगा रही है। आज अगर कोई दल व नेता भाजपा से दो दो हाथ कर उसको बार बार हराने में कामयाब रहा है। वो केजरीवाल और ममता बनर्जी माने जा सकते हैं। दोनों ही ना केवल जनहित के एक से बढ़कर एक काम कर रहे हैं बल्कि ईमानदार छवि भी बना चुके हैं। बसपा को यूपी में सरकार बनाने के एक नहीं कई बार मौके मिले। एक बार उसको पूर्ण बहुमत भी मिला। मायावती की सरकार का शायद ही कोई ऐसा बड़ा काम या चर्चित योजना हो। जिसकी जनता में आजतक प्रशंसा होती हो। पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर माया का भ्रष्ट नौकरशाही पर जो चाबुक चला था। उसकी उनके राजनीतिक विरोधियों ने भी खुलकर सराहना की थी। लेकिन उसके बाद जब भी बसपा सत्ता में आई उसकी यह खूबी भी गायब हो गयी। दरअसल मायावती ने अपने कार्यकाल में ऐसे ऐसे विवादित कार्य किये। जिससे उन पर घोटालोें के आरोप लगने लगे। पहले कांग्रेस और अब भाजपा की केंद्र सरकार ने उनके कारानामों की जांच के नाम पर उनको जेल भेजने का डर दिखाकर इतना डरा दिया कि वे अपने घर में एक तरह से खुद ही हाउस अरेस्ट होकर चुप बैठी हुयी हैं। वे अगर ज़बान खोलती भी हैं तो भाजपा से अधिक सपा और कांग्रेस के खिलाफ ज़हर उगलती हैं। एक बार वे यहां तक कह चुकी हैं कि अगर कांग्रेस सपा को सबक सिखाने के लिये भाजपा को भी सपोर्ट करना या अपने दलित वोटों से कराना पड़ा तो वे करेंगी। यानी उन पर जो शक या आरोप था। वो उनके बयान से खुद ही सच साबित हो गया। सच यह है कि कांशीराम ने जिस बसपा को अपने खून पसीने से सींचकर यहां तक पहंुचाया था। उसकी लगाम बिना संघर्ष बिना दूरदृष्टि और बिना किसी उसूल की अवसरवादी नेता मायावती के पास विरासत में आ जाने से उन्होंने अपनी असीमित महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिये तहस नहस कर दिया। उनपर विधानसभा लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक के टिकट बेचने के गंभीर आरोप लगे। यूपी में एक बार अपने बल पर बसपा के सरकार बनाने से सीएम बनी मायावती पीएम बनने का सपना देखनी लगी। नतीजा यह हुआ कि वे पीएम तो बनी नहीं उसके बाद फिर कभी सीएम भी नहीं बनी। उन्होंने भ्रष्टाचार के मुकदमों से जेल जाने को बचने को जिस सतीश मिश्रा को अपना वकील चुना। उनको ही बसपा में महत्वपूर्ण पद का इनाम देकर बसपा को बहुजन समाज से सर्वजन समाज के नाम पर उन बृहम्णों को जोड़ने का आत्मघाती जि़म्मा सौंप दिया। जिनकी नीतियों के विरोध में बसपा का गठन किया गया था। मायावती ने दलितों के अलावा मुसलमानों और अति पिछड़ों के साथ भी ऐसा सौतेला सलूक किया कि एक एक कर उनके नेता दूसरी पार्टियों में या तो खुद बसपा को छोड़कर चले गये या फिर मायावती ने उनके जनाधार से डरकर उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। मायावती पर यह भी आरोप है कि वे दलितों में भी केवल जाटवों की सियासत पर अधिक जोर देती रही हैं। इसका लाभ भाजपा ने जाटव यादव और मुसलमान बनाम शेष हिंदू जातियों को गोलबंद कर उठाया है। दलित नेता उदित राज कहते हैं कि कांशीराम ने ऐसे लोगों को बसपा से जोड़ा जो अपनी जातियों को पार्टी से जोड़ रहे थे। लेकिन जब माया से उनको सम्मान नहीं मिला या उल्टा अपमान होने लगा तो वे बसपा से अलग होकर अपनी जाति के वोटों के बल पर दूसरी पार्टियों में जाकर एमएलए एमपी बन गये। इससे इनका व्यक्तिगत लाभ तो हुआ लेकिन वृहद दलित या अति पिछड़ी जातियोें का नुकसान हुआ। इससे शिक्षा स्वास्थ्य रोज़गार और शासन प्रशासन में इन वंचित वर्गों की हिस्सेदारी का मुद्दा ख़त्म हो गया। मोदी के हिंदुत्व में राष्ट्रवाद रोजी रोटी आज़ादी और डेमोक्रेटिक राइट्स नहीं हैं, फिर भी कुछ दलित नेताओं के भाजपा के साथ जाकर स्वार्थ पूरे हो रहे हैं। दलित विचारक चंद्रभान कहते हैं कि बसपा के कई चुनाव हारने के बावजूद उसके वोट प्रतिशत से ऐसा लगता है कि अभी भी वही दलितों की पहली पसंद है। इसके साथ ही जो थोड़ा सा दलित युवा वर्ग और मीडियम क्लास भाजपा के साथ जुड़ा था। वह रोज़गार ना मिलने और पक्षपात बढ़ने से भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर की तरफ आकृषित हो रहा है। आने वाले वर्षों में चंद्रशेखर की पार्टी असपा बसपा को रिप्लेस कर लेगी। दलितों के हालात पर पैनी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडि़या का मानना है कि फिलहाल भले ही लग रहा हो कि दलित सियासत कमज़ोर हो रही है, लेकिन भविष्य दलित और पिछड़ों का ही है। इतिहास गवाह है कि पहले भी दलित दल बनते बिगड़ते रहे हैं। लेकिन दलित राजनीति को लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता। इसमें शक नहीं कि दलित वोटों पर कब्ज़े को लेकर क्षत्रपोें को पाॅवर देकर भाजपा ने बसपा का खेल कुछ समय के लिये खराब ज़रूर किया है। युवा दलित साहित्यकार अमित कुमार दो टूक कहते हैं कि पिछले एक दशक में बसपा के जनाधार में कमी के चार प्रमुख कारण मूल विचारधारा को छोड़ना, माया का स्पष्टवादिता को छोड़ना, कैडर वाले नेताओं को निकालना या उनका खुद निकलना और दलित पिछड़े के मुद्दों पर माया का चुप्पी साधना नज़र आते हैं।
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Friday, 27 August 2021
तालिबान का विरोध
बर्बर तालिबान का विरोध होना ही चाहिये लेकिन करे कौन ?
0 आतंकवाद उग्रवाद नक्सलवाद साम्प्रदायिक हिंसा छुआछूत रंगभेद धार्मिक तुष्टिकरण माॅब लिंचिंग मज़हबी सियासत जबरन धर्म परिवर्तन महिला उत्पीड़न इंटरफे़थ मैरिज का विरोध खाप पंचायती गैर कानूनी फै़सले जातिवादी पक्षपात अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाना लोकतंत्र पर तानाशाही और धर्मनिर्पेक्षता पर बहुसंख्यकवाद को प्राथमिकता देना एक ही वायरस से पैदा होने वाली छोटी बड़ी अनेक बीमारियों के नाम हैं? इस वायरस का नाम है अमानवीयता।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
0 मज़हब को लौटा ले उसकी जगह दे दे,
इंसान सलीके़ के तहज़ीब क़रीने की ।।
अफ़गानिस्तान में तालिबान एक बार फिर सत्ता में लौट आये हैं। तालिबान बर्बर कट्टरपंथी दकियानूसी साम्प्रदायिक, महिला अल्पसंख्क समानता मानवता विरोधी, हिंसक अमानवीय अतीतजीवी अंधविश्वासी और ज़ालिम थे, हैं और रहेंगे। उनका फिलहाल यह झांसा देना कि वे बदल गये हैं। महज़ एक रण्नीति का सियासी हिस्सा है। जब वे पहले की तरह पूरी तरह सत्ता पर काबिज़ हो जायेंगे। वे वही जंगली हरकतें दोहरायेंगे जो उन्होंने 1996 से 2001 तक पूरी दुनिया की परवाह ना करते हुए अंजाम दी थी। दरअसल तालिबान जिस मज़हबी हकूमत की दुहाई देते हैं। उसमें बुनियादी बदलाव की तनिक भी गुंजाइश ही नहीं है। तालिबान बदलाव के तमाम दावों के साथ बार बार यह ज़रूर दोहरा रहा है कि वे इस्लाम के हिसाब से ही सरकार चलायेंगे। कहने को तो पूरी दुनिया मंे मुसलमानों के 57 मुल्क हैं। उनमें भी कई देशों में शरीया कानून लागू हैं। लेकिन तालिबान का इस्लाम शरीया और उसकी मज़हबी व्याख्या पूरी दुनिया से अलग ही है। बहरहाल हम यहां इस बहस में नहीं जाना चाहते कि असली और सही इस्लाम और शरीया कौन सी है? क्योंकि इस मुद्दे पर खुद इस्लामी विद्वान एकराय नहीं हैं। हमारा तो दो टूक मानना है कि धर्म पर्सनल चीज़ है। उसको पब्लिक यानी सरकार में नहीं लाना चाहिये। ये दो पैमाने भी नहीं चलेंगे कि कहीं आप बहुसंख्यक हैं तो अपना धर्म सरकार का धर्म बना देते हैं और अगर कहीं आप अल्पसंख्यक हैं तो वहां सेकुलर राज की मांग करते हैं। सच तो यह है कि आज सभी धर्म और उनकी मान्यतायें उनकी शिक्षायें निर्देश आदेश सज़ायें टैक्स सिस्टम और हज़ारों साल पहले जीवन जीने के तौर तरीके़ इतने पुराने असमान और अव्यवहारिक हो चुके हैं कि कोई भी समाज कोई भी देश और कोई भी सम्प्रदाय आज वैज्ञानिक आधुनिक प्रगातिशील विवेकशील तर्कशील मानवीय नैतिक समानता का नज़रिया अपनाये बिना आगे बढ़ना तो दूर सम्मान और बराबरी के साथ जिं़दा भी नहीं रह सकता। तालिबानियों के काबुल पर क़ब्जे़ से चंद खुलकर तो अधिकांश मन ही मन खुश होने वाले नादान मूर्ख और अपनी ही कौम के दुश्मन मुसलमानों को कुछ गलतफ़हमियां दूर कर लेनी चाहिये। तालिबान ने रूस को अकेले नहीं हराया था। उसमें अमेरिका पाकिस्तान सऊदी अरब सहित पूरी दुनिया के कई मुस्लिम और अमेरिका के मित्र देशों सहित मदरसों के कट्टर आलिमों ने पैसे हथियार प्रशिक्षण और नास्तिकों से आर पार की जंग के नाम पर उनको मानव बम बनाने में अनेक तरह से तालिबान की मदद की थी। अमेरिका की यूनिवर्सिटियों में बाकायदा एक जेहादी कोर्स तैयार किया गया था। जिससे तालिबान को इस्लाम बचाने के लिये कम्युनिस्टों के सफ़ाये की ज़रूरत समझाई गयी थी। आज यही गल्ती अमेरिका को भारी पड़ रही है। उसके बाद अमेरिका को तालिबान राज से कोई शिकायत तब तक नहीं थी। जब तक अलकायदा ने वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमला नहीं कर दिया। अमेरिका ने तब भी अपने पैदा किये तालिबान पर सीधा हमला ना कर पहले अलकायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन को अपने हवाले करने को अपील की थी। लेकिन जब तालिबान सरकार ने उस पर कान नहीं दिये तो अमेरिका ने उस पर धावा बोला। अमेरिका के हमला करते ही तालिबान सत्ता छोड़ दुम दबाकर अफगानिस्तान की रहस्यमय पहेली बन चुकी पहाडि़यों में जा कर छिप गया। जिनसे अमेरिकी सैनिक परिचित नहीं थे। साथ ही अमेरिका का साथ देने का नाटक करने वाला पाकिस्तान भी पर्दे के पीछे तालिबान के बड़े नेताओं को अपने यहां छिपाने हथियार देने हमले की जानकारी लीक करने और शरण देने में लगा रहा। 2012 में अमेरिका ने ओसामा को पाकिस्तान के एबटाबाद में बिना उसकी परमीशन व सूचित किये मारकर अलकायदा को ख़त्म करने का अपना मिशन पूरा कर लिया। इसके बाद उसे तालिबान के फिर से अफ़गानिस्तान की सत्ता में आने या ना आने से कोई खास लेना देना नहीं था। उसने भारत जैसे अपने मित्र देशों के साथ मिलकर कई अरब डाॅलर खर्च कर अफगानिस्तान का विकास वहां लोकतंत्र की स्थापना सड़कें पुल बांध संसद भवन अस्पताल स्कूल महिला शिक्षा और अल्पसंयकों को बराबर अधिकार दिलाने को चुनाव कराकर सरकार बनवाई । लेकिन पहले करज़ई और फिर ग़नी सरकार उसके सुरक्षा बल उसकी पुलिस सरकारी अधिकारी कर्मचारी और जनता का एक वर्ग अमेरिका की बजाये तालिबान से ही सहानुभूति रखे रहा। आखि़र अमेरिका वहां कब तक रहता? कितना पैसा खर्च करता? कितने अमेरिकी सैनिक अपनी जान देते? एक ना एक दिन तो उसको वहां से बाहर निकलना ही था। ज़रूरत इस बात की थी कि खुद अफ़गान जनता और उसकी सरकार सुरक्षा बल तालिबान से लड़ते विरोध करते और उसको बदलने या सत्ता से दूर रहने पर मजबूर करते। लेकिन वे सब एक कट्टरपंथी विचारधारा और तालिबान के जान देने या लेने के जज़्बे के सामने नहीं टिक सके। अमेरिका यह भूल गया कि वह एक देश को बर्बर युग से निकालकर सीध्ेा यूरूप जैसा माॅर्डन सेकुलर और खुला देश नहीं बना सकता। कम लोगों को पता होगा कि अमेरिका ने फरवरी 2020 में क़तर के दोहा में तालिबान से शांति समझौता किया था। जिसके तहत अमेरिका ने अफ़गानिस्तान छोड़ा और बदले में तालिबान ने तब से अब तक अमेरिकी सैनिाकों पर कोई बड़ा हमला नहीं किया। हमारा गोदी मीडिया तालिबान को भी चंद कट्टर मुस्लिमों के बहाने हिंदू मुस्लिम मुद्दा बनाने पर तुला है। जबकि मंुबई के बड़े विख्यात राष्ट्रीय प्रगतिशील संगठन इंडियन मुस्लिम फ़ॅार सेक्युलर डेमोक्रेसी का वो शानदार और साहसी बयान उसको चर्चा करने के लायक नहीं लगा। जिसमें उसने दो टूक कहा है कि अब धर्म आधारित राज्य का समय ख़त्म हो चुका है और अफ़गानिस्तान में इस्लामी अमीरात बनाने की कोशिश ही मनुष्य विरोधी है। इस तरह की निष्पक्ष और उदार सोच वाले लोग ही सही मायने में भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का विरोध करने और यहां मुसलमानों व कमजोर व गरीब हिंदुओं के साथ होने वाले पक्षपात पर बोलने व तालिबानियों का खुला विरोध करने का अपने सेकुलर हिंदू भाइयों के साथ मिलकर आवाज़ उठाने का नैतिक अधिकार रखते हैं।
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।