Thursday, 13 February 2020

दिल्ली की जीत


दिल्ली: सबका साथ सबका विकास की जीत!

0देश की 137 करोड़ आबादी के सामने दिल्ली2 करोड़ की आबादी के साथ बहुत छोटा राज्य है। वह पूर्ण राज्य भी नहीं है। लेकिन राजधानी होने की वजह से वह पूरी दुनिया में चर्चा में था। साथ ही एक दशक से कम की आम आदमी पार्टी की भारी भरकम भाजपा से सीधी टक्कर की वजह से सबकी निगाहें उसके चुनाव नतीजों पर लगी थीं। राष्ट्रवाद हिंदुत्व और बहुसंख्यकवाद की बजाये दिल्ली की जनता ने जनहित के काम पर जीत दिलाकर पूरे भारत को विकास का एक नया मॉडल दिया है। 

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

 दिल्ली की कुल 70 सीटों में से 62 सीटें जीतकर आप ने जीत की हैट्रिक लगा दी है। इस जीत का श्रेय दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सबका साथ सबका विकास और सुलझी हुयी समझ व लगन को देना होगा। हालांकि सबका साथ सबका विकास और सबका विश्वास का नारा भाजपा का रहा है। लेकिन अपने काम नीति और नीयत से आप ने इस नारे को अमल में उतारकर भाजपा के सामने एक नई चुनौती की बड़ी लकीर खींच दी है।

सबने देखा कि केंद्र और एक दर्जन से अधिक राज्यों में राज कर रही भाजपा ने अपने 70केंदीय मंत्री 200 सांसद और 11 मुख्यमंत्री दिल्ली चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर चुनाव मैदान में हर कीमत पर जीत को उतारे थे। इतना ही नहीं अपनी परंपरा से हटकर वहां सीएम का कोई चेहरा सामने ना रखकर भाजपा ने पीएम मोदी के नाम पर केजरीवाल के खिलाफ चुनाव लड़ा। साथ ही गृहमंत्री अमित शाह ने सब काम छोड़कर दिल्ली चुनाव की कमान संभाल रखी थी। भाजपा अध्यक्ष जे पी नड्डा और दिल्ली प्रभारी मनोज तिवारी ने भी ज़मीन आसमान एक कर दिया।

भाजपा ने चुनाव जीतने के लिये सीएए के खिलाफ शाहीन बाग में चल रहे शांतिपूर्ण धरने को बड़ा मुद्दा बनाने के साथ ही जामिया और एएमयू पर निशाने साधकर चुनाव का धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण करने की नाकाम कोशिश भी की। उसके एक केंद्रीय मंत्रीसांसद व विधायक ने खुलकर एक वर्ग विशेष के खिलाफ ज़हर उगला। यहां तक कि उसने कश्मीर में धारा 370 हटाने राम मंदिर का निर्माण कराने और तीन तलाक पर पाबंदी लगाने जैसे राष्ट्रीय व भावनात्मक मुद्दे उठाकर चुनाव को हिंदू मुस्लिम का रंग देना चाहा। लेकिन केजरीवाल उनके जाल में नहीं फंसे।

आप ने सस्ती बिजली पानी शानदार सरकारी स्कूल और अपने विश्व विख्यात मुहल्ला क्लीनिक व अन्य सरकारी सेवाआंे का एजेंडा ही जनता के सामने रखा। आपके पक्ष में उसकी सरकार का करप्शन पर कड़ा रूख भी काम आया । केजरीवाल ने अपने राजनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर की सलाह पर अमल करते हुए कंेद्र सरकार पीएम मोदी दिल्ली के उपराज्यपाल और भाजपा पर सीध्ेा हमलों से परहेज़ करते हुए सारा फोकस अपने जनहित के विकास कार्यों पर ही किया। हालांकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिये वे पहले काफी संघर्ष करते रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंन इसे बड़ा मुद्दा नहीं बनाया।

दिल्ली में उनके अधिकार क्षेत्र में पुलिस भूमि और अन्य प्रशासनिक सेवायें भी नहीं आती हैं। इसके लिये वे सुप्रीम कोर्ट में भी गुहार लगा चुके हैं। लेकिन वहां से भी उनको कोई विशेष राहत नहीं मिली है। आम आदमी पार्टी को घेरने के लिये भाजपा के पास कोई बड़ा आरोप या घोेटाला भी नहीं था। उसको मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदू विरोध के मुद्दे पर घसीटने के लिये भाजपा नेताओं ने शाहीन बाग़ को निशाना बनाया। लेकिन केजरीवाल ने बड़ी होशियारी से यह कहकर अपना पीछा छुड़ा लिया कि पुलिस होम मिनिस्टर अमित शाह के अधीन है।

वे जब चाहें शाहीन बाग खाली करा सकते हैं। यहां तक कि एक सोची समझी रण्नीति के तहत तमाम उकसाने बावजूद केजरीवाल शाहीन बाग सीएए के खिलाफ समर्थन देने तक नहीं गये। उनका कहना था कि उनकी पार्टी लोकसभा में सीएए के खिलाफ वोट कर चुकी है। अगर कोई लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध दर्ज करने को शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहा है तो वे उसमेें दखल नहीं देंगें। पत्रकारों के सवालों में फंसकर आप के शिक्षा मंत्री मनीष सिसौदिया ने शाहीन बाग के आंदोलन के पक्ष में नैतिक समर्थन का एक बयान दे दिया तो वे चुनाव कांटे की टक्कर में हारते हारते बचे।

केजरीवाल ने खुद को आतंकी तक बताये जाने पर संयम का परिचय देते हुए मोदी की तरह भावनात्मक कार्ड खेला। उन्होंने जनता से मासूम सवाल किया कि क्या उनकी भलाई के लिये काम करने वाला उनका बेटा और भाई केजरीवाल आतंकी हैइसका उनको चुनाव में सहानुभूति के रूप में लाभ भी मिला। इस सबका ही नतीजा था कि उनको एकतरफा मुस्लिम वोट का भी समर्थन मिला और वे चुनाव जीत गये।

सोचने की बात यह है कि जो कांग्रेस पिछले चुनाव में 9.7 प्रतिशत वोट लेकर भी अपना खाता नहीं खोल सकी थी। वह और अधिक घटकर 4.26 प्रतिशत पर खिसक गयी। उधर भाजपा का वोट 32.2 प्रतिशत से बढ़कर38.51 प्रतिशत अवश्य हो गया लेकिन उसकी सीट 3 से 8 ही हो सकीं हैं। आप ने हालांकि अपना वोट 54.3 प्रतिशत से थोड़ा सा गंवाकर53.58 तक सुरक्षित रखा है। लेकिन उसने अपनी 5 सीट भाजपा के हाथों गंवा दी हैं। अन्य दल का वोट प्रतिशत पहले की तरह 3.7प्रतिशत की तरह लगभग 3.65 प्रतिशत स्थिर बना रहा है।

पांच सीट और 6 प्रतिशत वोट बढ़ने से भाजपा खुद को दिलासा दे सकती है कि उसने आप और कांग्रेस के मुकाबले कुछ तो बढ़कर हासिल किया है। लेकिन उसने इसके लिये जिन तौर तरीकों का इस्तेमाल किया वे आगे देश स्वीकार करता नज़र नहीं आ रहा है। न तो भाजपा को सबका साथ मिला और ना ही उसने अपनी सरकार वाले राज्यों में विकास का कोई ऐसा मॉडल पेश किया जिससे सबका विश्वास उस पर कायम हो पाता। हिंदुत्व राष्ट्रवादी भावनाओं और मोदी ब्रांड की अपनी सीमायें हैं। यह दिल्ली के चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया है। साथ ही कांग्रेस का जहां भी गैर भाजपा विकल्प उपलब्ध होगा वहां कांग्रेस की अब वापसी नहीं होगी। यह भी इन चुनावों ने साफ संकेत दे दिये हैं। क्या भाजपा और कांग्रेस इन चुनाव नतीजों से कोई सबक लेंगेअब यही असली सवाल है।                        

0 उसके होंठों की तरफ़ ना देख वो क्या कहता है,

  उसके क़दमों की तरफ़ देख वो किधर जाता है ।।         

Sunday, 2 February 2020

शाहीन बाग़

शाहीन बाग़ः संवाद से ही निकलेगा विवाद का हल!

0केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि सरकार शाहीन बाग़ के आंदोलनकारियों से बात करने को तैयार है। साथ ही उन्होंने यह शर्त भी लगाई है कि आंदोनकारियों को बातचीत के लिये बिना शर्त उनके पास आना होगा। शाहीन बाग़ खाली हो भी जाये तो सत्यग्रह दूसरी जगह शुरू हो जायेगा। उधर शाहीन बाग़ की तर्ज पर पूरे देश में जगह जगह सीएए और एनपीआर के खिलाफ पहले ही सत्यग्रह बढ़ते जा रहे हैं। शाहीन बाग़ को दिल्ली में बड़ा चुनावी मुद्दा भी बनाया जा रहा है। साथ ही वहां कई बार गोलीबारी करके उनको हटाने भगाने को डराया भी जा रहा है। 

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

 ‘‘ईवीएम का बटन इतने ज़ोर से दबाओ कि करंट शाहीन बाग़ को लगे’’

‘‘8 फ़रवरी को दिल्ली की सड़कों पर भारत पाकिस्तान का मुक़ाबला होगा’’

‘‘शाहीन बाग़ के लोग आपके घरों में घुसेंगे,और आपकी मां बहनों से बलात्कार करेंगे’’

‘‘देश के ग़द्दारों कोगोली मारो सालों को’’

   ये वो बयान हैं। जो दिल्ली में विधानसभा चुनाव जीतने के लिये भाजपा के बड़े बड़े मंत्री से लेकर सांसद और विधायक आयेदिन बेशर्मी से जारी कर रहे हैं। लेकिन उनकी मजबूरी को समझा जा सकता है कि उनके पास विकास उपलब्धि और सकारात्मक कुछ भी नहीं है। सवाल यह है कि शाहीन बाग़ में अगर कुछ लोग शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक तरीके से सीएए और एनपीआर के खिलाफ डेढ़ महीने से सत्यग्रह कर रहे हैं तो इसमें क्या बुराई हैक्या सरकार से असहमत होना देश से असहमत होना है?

   क्या भाजपा अपने चुनावी घोषणा पत्र में अगर कोई संविधान विरोधी बात शामिल कर लेती है तो उसे सत्ता में आने पर उसको लागू करने का असीमित अधिकार मिल जाता है?भाजपा को लोकसभा में 303 सीट मिली थीं। उसको देश की 134 करोड़ आबादी में से मात्र22 करोड़ वोट मिले थे। अगर मान लें उसको संसद की सभी सीटें भी मिल जाती तो क्या वह कोई भी कानून बनाने को स्वतंत्र हो जाती है?जवाब है नहीं। वजह हमारा देश एक लोकतांत्रिक गणतंत्रवादी धर्मनिर्पेक्ष देश है। कोई भी दल सरकार और राष्ट्रपति तक संविधान की सीमा से बाहर जाकर कोई कानून नहीं बना सकते।

    संविधान में संशोधन हुए हैं। आगे भी हो सकते हैं। लेकिन उसके बुनियादी ढांचे में कोई परिवर्तन कोई भी सरकार कितने भी प्रचंड बहुमत से जीतकर आने पर भी नहीं कर सकती। मोदी सरकार ने पिछले दिनों सिटीज़न एक्ट में जो संशोधन किया है। वह हमारे संविधान के सेकुलर ढांचे और समानता की मूल भावना के खिलाफ माना जा रहा है। यही वजह है कि ना केवल विपक्ष बल्कि भाजपा के सहयोगी दल भी इस मामले में भाजपा सरकार का खुलकर साथ नहीं दे पा रहे हैं। यहां तक कि असम में तो भाजपा का पुराना सहयोगी दल असम गण परिषद उससे इसी मुद्दे पर अलग हो चुका है।

    पूरे उत्तर पूर्व में मोदी सरकार के इस धर्म आधारित पक्षपातपूर्ण कानून का ज़बरदस्त विरोध हो रहा है। महाराष्ट्र में कल तक उसके साथ रही शिवसेना अपनी अलग सरकार बनाने के बाद एनआरसी लागू करने से साफ मना कर चुकी है। शिरोमणि अकाली दल भी इस मुद्दे पर भाजपा का साथ नहीं दे रहा है। यहां तक कि बिहार में नितीश कुमार और राम विलास पासवान तक मोदी सरकार को एनआरसी नहीं लाने और एनपीआर के विवादित कॉलम हटाने को दो टूक कह चुके हैं। इतना ही नहीं केरल राजस्थान मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और बंगाल सहित कई प्रदेश सीएए के खिलाफ प्रस्ताव पास कर सुप्रीम कोर्ट में इसे निरस्त कराने के लिये गये हैं।

    जनता और अनेक राजनीतिक व सामाजिक संस्थाओं ने भी इस कानून के खिलाफ जनहित याचिकायें कोर्ट में दायर की हैं। यह समय बतायेगा कि सबसे बड़ी अदालत इस मामले में केंद्र सरकार का पक्ष सुनने के बाद क्या फैसला देती हैसोचने की बात यह है कि मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से मंदिर मस्जिद का फैसला आने से पहले देश के विभिन्न वर्गों से बातचीत कर शांति बनाये रखने को काफी दिन पहले से बात शुरू कर दी थी। लेकिन सीएए एनपीआर और एनआरसी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर औपचारिक बैठक तक नहीं की।

    इसके विपरीत गृहमंत्री संसद में कम से कम7 बार कह चुके थे कि पहले सीएबी आयेगा। इसके बाद एनआरसी आयेगा। उनका यह भी दावा था कि सीएबी से सब गैर मुसलमानों को नागरिकता दे दी जायेगी लेकिन उसके बाद जब एनआरसी होगा तो जो खुद को भारतीय नागरिक साबित नहीं कर पायेंगे। उनको देश से चुन चुनकर निकाला जायेगा। जब तक उनको देश से निकाला नहीं जा सकेगा तब तक उनको डिटंेशन कैंप में रखा जायेगा। यही बात मोदी सरकार ने संसद में अपने इरादे ज़ाहिर करने को राष्ट्रपति से अपने अभिभाषण में भी पिछले साल कहलवाई थी।

    ज़ाहिर बात है कि सरकार के इन इरादों होम मिनिस्टर की बार बार दी गयी धमकियों और संघ परिवार भाजपा और मोदी सरकार के मुस्लिम विरोध व दुश्मनी के पुराने ट्रेक रिकॉर्ड को देखते हुए मुसलमान अपनी नागरिकता छिनने के ख़तरे को सामने देख बुरी तरह से डर गया। वह सड़कों पर उतरा तो उदार और सेकुलर हिंदू यूनिवर्सिटी के छात्र और बुध््िदजीवी उसके साथ कंध्ेा से कंधा मिलाकर खड़े हो गये। उधर नॉर्थ ईस्ट मोदी सरकार के सीएए के खिलाफ मैदान में उतर आया। इससे मोदी सरकार के हाथ पांव फूल गये।

    लेकिन उसने अपने अहंकार हिंदू मुस्लिम एजेंडे और तानाशाही के कारण विरोध करने वालों को देशद्रोही पाकिस्तान समर्थक और हिंदू विरोधी साबित करने की नाकाम कोशिशें की। जबकि शाहीन बाग सहित कहीं भी किसी मुसलमान या सेकुलर हिंदू ने यह नहीं मांग की कि पड़ौस के देशों से आने वाले उत्पीड़ित हिंदुओं को नागरिकता ना दी जाये। उनका तो मात्र इतना कहना था कि बिना धार्मिक आधार के सभी अल्पसंख्यकों को भारतीय शरण दी जाये। लेकिन मोदी सरकार ने बड़ी चालाकी से पड़ौस के ही श्रीलंका म्यांमार और चीन को छोड़ दिया।

    साथ ही अगर वह धर्म का नाम ना लेकर केवल पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात कहती तो इतना हंगामा ना होता। लेकिन उसको तो अपना हिंदू वोटबैंक और हिंदू राष्ट्र का एजेंडा हर हाल में आगे बढ़ाना है। वह जेएनयू के कन्हैया और दिल्ली के सीएम केजरीवाल सहित मुसलमानों को टुकड़े टुकड़े गैंग का टैग बार बार लगाती है। लेकिन आज पूरी दुनिया को पता चल गया है कि दरअसल संघ परिवार खुद ही ऐसे काम कर रहा है।

     जिससे देश का भाईचारा आपसी प्यार मुहब्बत एकता और संविधान ख़तरे में है। मोदी सरकार को यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाये उतना अच्छा है कि वह सरकारी शक्ति या संघ परिवार की सोच के लोगों द्वारा शाहीन बाग़ जामिया मिलिया या जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्रों पर हमले होने से सीएए एनपीआर या ठंडे बस्ते से फिर कभी एनआरसी का भूत निकाल कर जबरदस्ती बिना सबका शक व शिकायतें दूर किये बिना लागू नहीं कर सकती है।                        

0 काट डाले सारे शजर खुद अपने ही हाथों से,

  अजीब शख़्स है फिर साया तलाश करता है।।

Friday, 17 January 2020

सकारात्मक सोच

सकारात्मक सोच में छिपा है कामयाबी का राज़!

0आपने एक छोटी कहानी ज़रूर सुनी होगी। एक गिलास पानी से आधा भरा है। उस पर दो लोगों के अलग अलग विचार हैं। एक का कहना है कि गिलास में पानी आधा ही क्यों भरा है?जबकि दूसरे का कहना है कि ये बहुत अच्छी बात है कि गिलास ख़ाली नहीं है। इसमें कम से कम आधा पानी तो है। यानी गिलास वही है। उसमें पानी भी उतना ही है। लेकिन दो बंदों की उसे लेकर सोच एक दूसरे से विपरीत है। जिसकी सोच सकारात्मक हैवही जीवन में सफल होता है।

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

“stay away from negative people, they have problem for every solution. Be with positive people they have solution for every problem.’’ 

   मतलब यह है कि नकारात्मक सोच वाले लोेगों से दूर रहो क्योंकि वे हर समाधान के लिये एक समस्या तैयार रखते हैंसकारात्मक सोच वाले लोगों के साथ रहो क्योंकि वे हर मसले का हल अपने पास रखते हैं। इसी लिये कहा जाता है कि कुछ लोग मुसीबत में भी आगे बढ़ने के अवसर ढूंढ लेते हैं। जबकि कुछ लोग अवसर को भी मुसीबत समझकर उससे दूर भागते हैं।

     एक गुरू के दो शिष्य थे। उनमें से एक सकारात्मक सोच वाला था। जो सदा दूसरों की भलाई की सोचता रहता था। हालात चाहे जितने भी ख़राब हों वह अच्छाई का कोई ना कोई रास्ता तलाश ही लेता था। वह कभी भी निराश नहीं होता था। सदा हंसता मुस्कुराता और खुश रहता था। जबकि दूसरा नकारात्मक सोच का था। नकारात्मक सोच की वजह से उसका अकसर दूसरों से विवाद भी होता था। इससे वह क्रोध भी अधिक करने लगा था। उसमें ईष्या भी कूट कूट कर भरी थी। एक दिन गुरू ने अपने उन दोनों शिष्यों को बुलाया और उनकी परीक्षा लेने के लिये जंगल ले गये।

    वहां उन्होंने आम का एक पेड़ देखा। जिस पर ढेर सारे आम लटक रहे थे। उनमें खट्टे और मीठे छोटे और बड़े पके और कच्चे सभी तरह के आम लगे हुए थे। गुरू ने अपने दोनों चेलों से कहा कि इस पेड़ को बहुत गौर से देखो। कुछ देर बाद गुरू ने अपने चेलों से पूछा कि तुम्हें इस वृक्ष पर क्या दिखाई दे रहा है। जिस शिष्य की सोच सकारात्मक थी। उसने कहा कि गुरू जी यह पेड़ बहुत ही महान और विनम्र है। लोग इस पेड़ पर पत्थर बरसाते हैं। बदले में ये पेड़ उनको मीठे पके और रसीले आम देता है। उन लोगों से बदला नहीं लेता।

     उनको चोट खाकर भी फल देने से मना नहीं करता। चेला यहीं नहीं रूका। उसने कहा कि इंसान को भी इस पेड़ की तरह ही होना चाहिये। वह चाहे कितनी भी परेशानी और मुसीबत में हो। उसको चाहिये वह विनम्र संयमी और शालीन बना रहे। दूसरों के काम आये और त्याग की भावना रखे। गुरू ने जब नकारात्मक सोच वाले चेले से पूछा तो वह बड़ा आवेश में था। उसका कहना था कि यह पेड़ बहुत ध्ूार्त है। इसको जब तक पत्थर ना मारो यह फल देता ही नहीं। साथ ही उस चेले का यह भी कहना था कि अगर आपको जीवन में किसी चीज़ की ज़रूरत हो और वह किसी आदमी के पास दिखाई दे जाये तो उससे छीन लेनी चाहिये।

     नकारात्मक सोच वाले चेले का यह भी कहना था कि इस दुनिया में कोई काम सीध्ेा तरीके से होता ही नहीं। आदमी को अपना काम निकालने लिये शक्ति चालाकी और झूठ का सहारा लेना ही पड़ता है। यही वजह थी कि वह सदा तनाव में रहता था। दोनों की बात सुनकर गुरू ने सकारात्मक सोच वाले चेले को गले से लगा लिया। गुरू जी ने कहा कि यह मेरा सच्चा शिष्य है। इसने वह पाठ सीख लिया है।

    जिससे यह जीवन में सफलता के नये आयाम स्थापित करेगा। जानकारों का कहना है कि सकारात्मक सोच वाला आदमी ना केवल जीवन में नकारात्मक सोच वालों के मुकाबले अधिक सफल होता है बल्कि सकारात्मक सोच अच्छी नींद उत्तम स्वास्थ्य और ब्लड पै्रशर को संतुलित करने के काम भी आती है। सकारात्मक सोच वाले तनाव से बचे रहते हैं। ऐसे लोग अपने साथ ही दूसरों की भी बेहतर देखभाल सुरक्षा और उनसे बेहतर रिश्ते निभाने में कामयाब रहते हैं। पोज़िटिव थिंकिंग से इंसान में आत्म विश्वास पैदा होता है। चिकित्सकों का कहना है कि अच्छा सोचने वाले बुरा सोचने वालों की बनिस्बत अधिक दर्द सहने की क्षमता हासिल कर लेते हैं।

     इससे व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ती है। ऐसी सोच वाला आदमी जीवन में भ्रमित नहीं रहता। हाल ही में हुआ एक सर्वे यह भी बताता है कि सकारात्मक विचार वाला इंसान अव्वल तो बीमार कम पड़ता है। साथ ही यह भी देखने मंे आया है कि अगर वह किसी रोग या चोट का शिकार हो भी जाये तो वह नकारात्मक सोच वाले के मुकाबल जल्दी स्वस्थ हो जाता है। इसका प्रमाण चिंगारी संपादक भाई सूर्यमणि रघुवंशी भी है। जिनका पिछले दिनों एक्सीडेंट हो गया था। लेकिन अपनी सकारात्मक सोच से ना केवल उन्होंने आरोपियों को माफ कर दिया। बल्कि जल्दी स्वस्थ भी हो गये।                     

0 ग़मों की आंच पर आंसू उबालकर देखो,

  बनेंगे रंग किसी पर भी डालकर देखो।

  तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी,

  किसी के पांस से कांटा निकालकर देखा।।

Monday, 13 January 2020

आज के फ़रिश्ते

न तो पूछा नाम न ही धर्म जाना,


भरते रहे फीसखिलाते रहे खाना!


0आज के भौतिकतावादी दौर में जब एक दर्जन केले बांटते हुए भी दो दर्जन लोग मीडिया को बुलाकर पहले फोटो खिंचवाने और अख़बार व चैनल में अपनी पब्लिसिटी का इंतज़ाम करना नहीं भूलते। ऐसे में कोई अकेला इंसान रोज़ 60से 70 लोगों को अपने निजी खर्च पर खाना खिला रहा हो या एक दो नहीं दर्जनों गरीब स्कूली बच्चो की फीस चुपचाप भर रहा हो तो आप उनको फ़रिश्ता नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे?वह भी तब जबकि वे ना तो अपना नाम बताना चाहते हैं और ना ही जिनकी मदद कर रहे हैं उनका नाम या मज़हब पूछते हैं।

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

  नजीबाबाद। क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि 30 मार्च 2001 से स्थानीय मुहल्ला वाहिदनगर सम्राट टाकीज़ वाली गली मंे कमल सेठी नाम के एक आम आदमी ने गरीब और बेसहारा लोगों को निशुल्क खाना खिलाना शुरू किया तो रोज़ उनके यहां 60 से 70 लोग खाना खाने आने लगे। खास बात यह थी कि सेठी जी ने कभी उन मजबूर और परेशान हाल लोगों से उनका नाम पता या मज़हब जानने की कोशिश नहीं की। हालांकि सेठी जी का काफी समय पहले निधन हो चुका है। लेकिन उनके परिवार ने उनका शुरू किया भंडारा आज तक भी जारी रखा हुआ है।

   सेठी जी ने जीते जी कभी अपने इस नेक काम का चर्चा किसी से नहीं किया। उनका मानना था कि जिस दिन इस भंडारे का प्रचार प्रसार किया जाने लगा। उस दिन इस नेक काम का मकसद खो जायेगा। कई बार पत्रकार उनके पास भंडारे का फोटो लेने और कवरेज करने गये। लेकिन उनका कहना था कि किसी गरीब का फोटो खाना खाते हुए छापकर उसका अपमान नहीं करना चाहते कि वह इतना असहाय है कि खुद खाना खाने लायक आमदनी भी नहीं कर सकता। उनका यह भी कहना था कि उनको इस काम के बदले में ना तो नाम चाहिये और ना ही किसी तरह का कोई सांसारिक लाभ।

    यह नेक काम वह अपने संतोष और मानवता की सेवा के लिये करते रहे हैं। आप अनुमान लगायें कि अब तक सेठी जी और उनका परिवार इस पर कितना खर्च कर चुके होंगे। उनका परिवार बताता है कि लोग अपने वारिसों के नाम ज़मीन जायदाद कर जाते हैं। लेकिन सेठी जी अपने परिवार से हमेशा यही कहा करते थे कि उनके बाद भी यह भंडारा जारी रहना चाहिये। और वास्तव में भंडारा जारी है।

                         -2-

    नजीबाबाद। मुहल्ला बांसमंडी निकट मछली बाज़ार के हाजी तसलीम आढ़ती का नाम भी उन छिपे हुए संत लोगों में आता है। जिन्होंने अपने धर्म की इस नसीहत का हमेशा पालन किया कि अगर किसी ज़रूरतमंद की मदद की जाये तो ऐसे की जाये कि दायां हाथ सहायता करे तो बायें हाथ को भी ना पता चले। हाजी जी कई इंटर कॉलेजों की प्रबंध कमैटी से कई दशकों तक जुड़े रहे। उनका कॉलेजों के प्राचार्य और शिक्षकों से हमेशा कहना था कि जो भी बच्चे वास्तव में इतने गरीब हों कि अपनी फीस तक खुद ना भर सकें और उनका नाम कटने की नौबत आये। ऐसे बच्चो की पूरी फीस हर माह उनसे चुपचाप ले ली जाये।

    कमाल की बात यह थी कि इसके लिये वे कभी उन बच्चो या उनके परिवार के लोगों को अपने यहां फीस मांगने या जताने को नहीं बुलाते थे कि उनकी मदद कौन कर रहा है?हालत यह थी कि कई बार दो चार नहीं दर्जनों बच्चो की फीस वे अपनी जेब से भरते थे। हालांकि वे प्रबंधतंत्र में कई बार बड़े बड़े पदों पर रहे और अगर चाहते तो अपने पद की शक्ति का प्रयोग करके उन गरीब बच्चो की फीस वहीं से माफ करा सकते थे। लेकिन उनका कहना था कि उनका स्कूल सरकारी ग्रांट से नहीं इन बच्चो की फीस से ही चलता है।

     अगर वे इस तरह से गरीब बच्चो की फीस माफ करने लगेंगे तो फिर प्रबंधतंत्र के बाकी लोग भी अपने अपने कोटे से फीस माफ़ करने को कहेंगे। ऐसे में मैनेजमैंट कमैटी के अन्य पदाधिकारियों का भी फीस माफ करने का उतना ही अधिकर होगा। जितना कि उनका है। उनका मानना था कि इससे स्कूल की आय इतनी कम रह जायेगी कि स्कूल के टीचर का वेतन और अन्य खर्च चलाने कठिन हो जायेंगे। हालांकि हाजी जी अब दुनिया में नहीं हैं। लेकिन अच्छी बात यह है कि उनका परिवार आज भी अपनी सामर्थ और हैसियत के हिसाब से गरीब बच्चो की फीस भर रहा है।                    

0 ये दुनिया नफ़रतों की आखि़री स्टेज पर है,

 इलाज इसका मुहब्बत के सिवा कुछ भी नहीं ।।         

असहमति और सरकार

असहमति से कैसे निबटे सरकार?


0सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट मौलिक अधिकार है। इसको सरकार बार बार या लंबे समय तक बंद नहीं कर सकती। उधर कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी आंदोलन को रोकने के लिये सरकार धारा 144 का सहारा नहीं ले सकती। अदालत का मानना है कि असहमति दर्ज कराना प्रदर्शन करना और सड़कों पर विरोध दर्ज करना लोकतंत्र में लोगोें की अभिव्यक्ति की आज़ादी का अहम हिस्सा है। सवाल यह है कि ऐसे में सरकार असहमति व हिंसा से कैसे निबटे?

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

  5 अगस्त से जम्मू कश्मीर में इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगी हुयी है। सरकार का कहना है कि वहां से धारा 370 हटाने के बाद सुरक्षा की दृष्टि से ऐसा किया गया है। सरकार का यह भी कहना है कि अगर इंटरनेट चालू किया जायेगा तो इससे शरारती तत्वों को अफवाहंे फैलाना का मौका मिल जायेगा। जिससे वहां शांति और सुरक्षा को ख़तरा खड़ा हो जायेगा। सरकार का यह तर्क नया नहीं है। इससे पहले देश में सिटीज़नशिप एक्ट में संशोधन के बाद एनआरसी की चर्चा के भय से बड़े पैमाने पर हुए आंदोलन से निबटने के लिये भी सरकार ने विभिन्न राज्यों में इंटरनेट पर कुछ दिन के लिये पाबंदी और लोगों को सड़कों पर विरोध मंे उतरने से रोकने के लिये धारा 144 का सहारा लिया था।

    दुनिया के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो भारत सबसे अधिक 357 बार इंटरनेट बंद करने वाले देशों में तीसरे स्थान पर है। नुकसान के हिसाब से देखें तो भारत को अब तक 9000करोड़ से अधिक का नुकसान हाल ही में इंटरनेट बंद करने से हुआ है। कुल नुकसान अब तक 1.3 बिलियन डालर का हुआ है। हालांकि सरकार के इस तर्क को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता कि वह लोगों की सुरक्षा और कानून व्यवस्था बनाये रखने के लिये ही इंटरनेट बार बार मजबूरी मंे ही बंद करती है।

   लेकिन यहां सरकार की नीयत पर सवाल उठता है कि वह चंद खुराफाती लोगों को इंटरनेट का गलत इस्तेमाल करने से रोकने के लिये करोड़ों लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मीडिया कारोबार मनोरंजन ईमेल बैंकिंग ऑनलाइन भुगतान खरीदारी एटीएम फंड ट्रांस्फर स्कूल कॉलेजों में ऑनलाइन आवेदन मोबाइल रिचार्ज ई टिकट आधार कार्ड पेंशन मोबाइल वॉलेट मेडिकल कोरियर ट्रेकिंग जीएसटी  इनकम टैक्स रिटर्न गूगल सर्च एप्वाइंटमेंट और ढेर सारी अन्य जन उपयोग की अनिवार्य और जीवन रक्षक ऑनलाइन सेवाओं को बार बार और लंबे समय तक कैसे रोक सकती है?

    दरअसल सरकार का विश्वास स्वयं लोकतंत्र और संविधान में संदेह के घेरे में आ रहा है। यह ठीक है कि कोई भी सरकार जब एक बार बहुमत से चुनकर सत्ता संभालती है तो उसको कानून लागू करने और नये कानून बनाने का अधिकार होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उसको ऐसा करने का असीमित अधिकार होता हैक्या वह कभी भी कैसा भी कानून बना सकती हैक्या वह जनविरोधी और संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाकर भी कानून बना सकती हैतो जवाब है नहीं। कभी नहीं। जब जब सरकारें जनविरोधी या संविधान विरोधी तानाशाही कदम उठाती हैं।

     जनता और विपक्ष उनका विरोध करता है। कोर्ट उन कानूनों की समीक्षा करता है। अब सवाल यह उठता है कि पहले सरकार संविधान विरोधी अल्पसंख्यक विरोधी और एक वर्ग विशेष के खिलाफ पक्षपातपूर्ण कानून बनाती है। उसके बाद जब उस कानून के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरते हैं तो उनको धारा 144लगाकर प्रदर्शन करने से रोका जाता है। इंटरनेट अनिश्चित समय के लिये बंद कर दिया जाता है। सावधानी के नाम पर तमाम प्रतिष्ठित और संघर्षशील नेताओं व बुध्दिजीवियों को उनके घर में नज़रबंद कर दिया जाता है।

    इसके बाद भी लोग सड़कों पर उतरते हैं तो विपक्ष का आरोप है कि उन पर पुलिस ज़रूरत से अधिक बल प्रयोग करती है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों पर सरकार के इशारे पर पुलिस लाठीचार्ज आंसू गैस के प्रतिबंधित गोले और सीध्ेा आंदोलनकारियों के सीने पर गोली चलाती है। इसके बाद भी आंदोलन जारी रहने पर सरकार असहमति दर्ज कराने वालों पर अत्याचार जारी रखते हुए गंभीर धाराओं में मुकदमे उनसे सरकारी सम्पत्ति को हुए नुकसान का हर्जाना वसूलने की कार्यवाही और भविष्य में कोई आंदोलन करने से डराने के लिये फर्जी आरोपों में फंसाने कसूरवारों के साथ ही बड़ी संख्या में बेकसूरों को भी घरों से उठाने और उनके ठिकानों पर दबिश देकर तोड़फोड़ करने का सिलसिला सरकार के मुखिया से संकेत पाकर बर्बर दमन चक्र चलाती रहती है।

    शुरू में जब सरकार और पुलिस के खिलाफ पीड़ित उल्टा अपने ही खिलाफ कानूनी कार्यवाही किये जाने के खिलाफ कोर्ट गये तो कई बार बड़ी अदालतों ने उनको निचली अदालत में जाने को कहा और निचली अदालत ने सुनवाई के लिये लंबी तारीख लगाकर अप्रत्यक्ष रूप से तत्काल राहत देने से मना कर दिया। कई बार सबसे बड़ी कोर्ट ने यह कहकर कोई एक्शन लेने से मना कर दिया कि पहले हिंसा रोकिये तब सुनवाई करेंगे। यह अदालत का ऐसा जवाब था। जैसे न्याय मांगने गये पीड़ित ही हिंसा कर रहे हों। जबकि सरकार और पुलिस की हिंसा दमन और बर्बरता के खिलाफ वे लोग कोर्ट गये थे।

     जिनका आंदोलन या प्रदर्शन से कोई वास्ता तक नहीं था। दोषियों के खिलाफ भी निष्पक्ष जांच के बाद ही कानूनी कार्यवाही संविधान के दायरे में रहकर सरकार को करनी चाहिये। देर से ही सही सबसे बड़ी अदालत और कई उच्च न्यायालयों ने सरकार को उसकी संवैधानिक सीमा और जनता के असहमति विरोध व मौलिक अधिकारों की रक्षा करने का आदेश देकर एक बार फिर यह बता दिया है कि सरकार चाहे कितने ही प्रचंड बहुमत से चुनकर क्यों ना आई हो उसको मनमानी संविधान के खिलाफ और जनता के हिंसक दमन का अधिकार नहीं दिया जा सकता है। लेकिन आंदोलन करने वाले भी हिंसा होने पर अपनी ज़िम्मेदारी से बच नहीं सकते। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि सरकार को जनता के मौलिक अधिकार और कानून व्यवस्था में संतुलन बनाकर ही चलना चाहिये।                      

0 ये नफ़सियाती मरीज़ों का शहर है यारो,

   कोई सवाल उठाओगे तो मारे जाओगे ।।

Saturday, 11 January 2020

एन पी आर बनाम एन आर सी....

एन.पी.आर. का एन.आर.सी. से कोई रिश्ता नहीं?

0पीएम मोदी ने कह दिया कि एनआरसी पर सरकार ने अब तक कोई विचार नहीं किया है। गृहमंत्राी कह रहे हैं कि एनपीआर का एनआरसी से कोई रिश्ता नहीं है। फिर भी बंगाल और केरल सहित देश के कई राज्य राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर बनाने को तैयार नहीं हैं। उधर विपक्षी दल और जनता का एक बड़ा हिस्सा एनपीआर की बोतल में एनआरसी का जिन्न देखकर फिर से हंगामा कर रहा है। आखि़र सच क्या है

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

  एनपीआर का मतलब है नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर जबकि एनआरसी का मतलब होता है नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़न। एनपीआर में किसी से कोई कागज़ नहीं मांगा जायेगा। यह बात सरकार ने कही है। जबकि एनआरसी में हर किसी को खुद को भारतीय साबित करने के लिये ना केवल कागज़ देने होंगे बल्कि वे प्रमाण भी 1 जुलाई 1987 से पहले के होने ज़रूरी होंगे। सरकार का कहना है कि एनपीआर के लिये नागरिक जो भी जानकारी देंगे वही सच मानकर फॉर्म में स्वीकार कर ली जायेगी। इसके आधार पर किसी की नागरिकता को कोई ख़तरा नहीं है।

   इसमें जो लोग देश के किसी भी हिस्से में 6माह से रह रहे हैं और उनका इरादा वहां अगले6 माह और रहना है। उनका आंकड़ा एकत्र किया जायेगा। यहां तक कि इसमें विदेशी नागरिकों का भी आंकड़ा एकत्र किया जायेगा। लेकिन सरकार के अनुसार इसके आधार पर उनको भी कोई समस्या नहीं आने जा रही है। सवाल यह है कि फिर भी एनपीआर पर इतना भय शोर और हंगामा क्यों हो रहा हैदरअसल एनपीआर का आदेश सरकार ने नागरिकता कानून 1955 के 2003 के संशोधन के बाद जोड़े गये नियम 3(4 के तहत जारी किया है।

    इस नियम में साफ लिखा है कि सभी सूचनायें एकत्र कर एनआरसी बनेगा। अब सवाल यह है कि 2010 में भी इसी नियम के अनुसार मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार ने यही एनपीआर किया था। तब विवाद क्यांे नहीं हुआइसका जवाब यह है कि मोदी सरकार राष्ट्रपति के अभिभाषण और गृहमंत्रालय की रिपोर्ट में एनपीआर के आधार पर एनआरसी की अपनी मंशा ज़ाहिर कर चुकी है। इसके अलावा होम मिनिस्टर अमित शाह अनेक बार एनआरसी पूरे देश में सीएए लाने के बाद करने का ऐलान डंके की चोट पर करते रहे हैं।

    सीएए में मोदी सरकार ने मुसलमानों के अलावा लगभग सभी धर्मों के लोगों को एनआरसी में नाम ना आने पर शरणार्थी मानकर नागरिकता बिना किसी दस्तावेज़ प्रमाण और गवाह के केवल भारत में 6 साल रहने मात्र पर देने का प्रावधान पहले ही किया हुआ है। उधर मोदी सरकार के कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद ने कहा है कि एनपीआर की जानकारी का इस्तेमाल एनआरसी में हो भी सकता है और नहीं भी। मोदी सरकार एनपीआर की एक बात और छिपा रही है। कांग्रेस सरकार ने 2010 में जब एनपीआर किया था। उसमें केवल 15 कॉलम थे।

   मोदी सरकार ने बड़ी चालाकी से इनमें से तीन कॉलम पिता का नाम माता का नाम और पति/पत्नी का नाम का एक ही कॉलम कर दिया है। साथ ही उसने इसमें नये 8 कॉलम और जोड़ दिये हैं। जिनसे एनआरसी के भूत से भयभीत लोगों के कान एक बार फिर से खड़े हो गये हैं। इन नये 8 कॉलम में आधार नंबरमोबाइल नंबरपासपोर्ट नंबरवोटर नंबरपरमानेंट एकाउंट नंबरड्राइविंग लाइसेंस नंबर और माता पिता की जन्मतिथि व जन्मस्थान और अंतिम सूचना माता पिता का अंतिम निवास का पता मांगा गया है। इन नई जानकारियों को मांगने से सरकार के एनआरसी के इरादे का जिन्न एक बार फिर से बोतल से बाहर आता नज़र आ रहा है। 

     सरकार का दावा है कि वह किसी से बायोमीट्रिक जानकारी नहीं मांग रही है। जबकि आधार नंबर मांगने से उसकी मंशा खुद ही पूरी हो जा रही है। मोबालइल नंबर से सरकार किसी भी नागरिक की लोकेशन और उसकी कॉल डिटेल खंगाल सकती है। पासपोर्ट से उसका विदेश कनेक्शन जाना जा सकता है। वोटर नंबर से उसको संदेह होने पर असम की तरह डी यानी डाउटफुल वोटर की श्रेणी में रखा जा सकता है। पैन से उसकी आय और डीएल से वाहन को ट्रैक किया जा सकता है। इसमें सरकार यह भी सफाई दे सकती है कि ये सब जानकारी तो उसके पास पहले से ही मौजूद है।

    लेकिन सवाल यह है कि अगर उसके पास उपलब्ध है तो वह मांग ही क्यों रही हैसाथ ही किसी नागरिक के माता पिता या पति पत्नी का नाम पूछना तो जनसंख्या रजिस्टर के लिये समझ में आता है। लेकिन उसके माता पिता की जन्मतिथि जन्मस्थान और पूर्व में रिहाइश पूछना क्या यह साबित नहीं करता कि इस जानकारी के सत्यापन के बाद सरकार एनआरसी का पिछले दरवाजे़ से आंकड़ा जुटा कर जिनपर संदेह होगा। उनका नाम एनपीआर में दर्ज नहीं करेगी। गलत जानकारी पर नागरिकोें पर जुर्माने का भी प्रावधान किया गया है।

     जिनका नाम जनसंख्या रजिस्टर में नहीं दर्ज होगा। उनकी सघन जांच की जायेगी। उनको नोटिस जारी होंगे। उनसे विस्तार से फिर से जानकारी मांगी जायेगी। दरअसल जनगणना में माता पिता की ऐसी जानकारी कभी नहीं मांगी जाती। जनगणना जनगणना कानून 1948 के तहत की जाती है। उधर माता पिता की इतने विस्तार से मांगी गयी जानकारी का प्रावधान एनआरसी के लिये नागरिकता कानून में 1987और 2003 में किये गये संशोधन से है। इस संशोधन के बाद 1987 से पहले भारत में पैदा हर आदमी स्वतः भारतीय नागरिक माना जाता है।

    लेकिन एक जुलाई 1987 से 3 दिसंबर2003 तक भारत में पैदा होने वाले आदमी के माता पिता मंे से एक का भारतीय होना ज़रूरी है। साथ ही 2003 से अब तक पैदा होने वाले किसी भी नागरिक के भारतीय होने के लिये उसके माता पिता में से एक के भारतीय और दूसरे के विदेशी होने पर अवैध घुसपैठिया ना होना ज़रूरी बना दिया गया है। डर और सरकार की नीयत पर शक की वजह यह भी है कि नियम 6-ए और 6-सी के अनुसार कोई भी व्यक्ति आपकी दी गयी जानकारी पर उंगली उठा सकता है। इस पर जनसंख्या रजिस्ट्रार आपका नाम एनपीआर में तब तक दर्ज नहीं करेगा।

     जब तक कि वह आप से पर्याप्त दस्तावेज़ लेकर जांच पूरी कर आपकी नागरिकता सम्बंधी शर्तों से संतुष्ट नहीं हो जाता है। असम में ढाई लाख लोग सारे कागज़ात पेश करके भी इसी आपसी रंजिश ब्लैकमेल और दुश्मनी निकाले जाने के कारण तथा संबंधित अधिकारियों व कर्मचारियों की सेवा शुल्क की मांग पूरी करने में असहाय होने से एनआरसी से आज तक बाहर हैं। सरकार अगर वास्तव में जो कह रही है। वही करना चाहती है तो वह एनआरसी भविष्य में भी ना करने और एनपीआर से नये कॉलम हटाने का ऐलान करे जिससे लोगों का डर दूर हो वे सरकार पर भरोसा करने को तैयार हो जायें।                  

0अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छिपायें कैसे,

 तेरी मर्जी के मुताबिक नज़र आये कैसे ।। 

Monday, 30 December 2019

झारखंड की हार

झारखंड की हारमोदी का जादू बरक़रार?

0हाल ही में हुए झारखंड चुनाव में भाजपा की हार से कुछ लोगों को लग रहा है कि मोदी का जादू लोगों से सर से धीरे धीरे ही सही उतरने लगा है। इससे पहले महाराष्ट्र और हरियाणा चुनाव में भाजपा की सीटें कम हुयी थीं। साथ ही देश में सीएए और एनआरसी को लेकर  को लेकर जो व्यापक विरोध हुआ। उससे जहां मोदी सरकार बैकफुट पर आ गयी वहीं उसकी विदेशों मंे भी किरकिरी हुयी है।

       

  भाजपा ने झारखंड महाराष्ट्र और हरियाणा में पिछले चुनाव जीतने के बाद एक बड़ा और नया प्रयोग किया था। उसने इन तीनों राज्यों मेें जिन जातियों की सबसे अधिक आबादी थी। उनका मुख्यमंत्री ना बनाकर दूसरी जातियों का सीएम बनाया था। उसको लगता था कि इन राज्यों में अब तक आदिवासी मराठा और जाट यानी जिन जातियों का चीफ़ मिनिस्टर बनता आया है। उनकी जनसंख्या लगभग 30 प्रतिशत के आसपास रही है। यानी इनके अलावा जो 70प्रतिशत जातियां हर बार नेतृत्व से वंचित रह जाती हैं। अगर उनको इन राज्यों का नेतृत्व सौंपा जायेगा तो वे भाजपा के पक्ष में अगली बार और अधिक मतदान करेंगी।

साथ ही भाजपा को लगता था कि इन राज्यों की जो सबसे बड़ी जातियां हैं। उनके मतों का एक बड़ा हिस्सा भी उसके खाते मंे हिंदुत्व की वजह से आना तय है। लेकिन एक नहीं दो नहीं तीनों राज्यों में भाजपा का यह दांव उल्टा पड़ गया। महाराष्ट्र में जहां शिवसेना ने उससे नेतृत्व ढाई ढाई साल करने की मांग रखी और उसके स्वीकार ना करने पर कांग्रेस जैसी अपनी चिर विरोधी पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाकर उसको झटका दिया। वहीं झारखंड में कांग्रेस ने वहां की क्षेत्रीय पार्टी जेएमएम के साथ जूनियर पार्टनर तक बनकर अपने पुराने घटक आजसू से अहंकार में अलग होने वाली भाजपा को सरकार से बाहर करने का सफल दांव चल दिया।

ऐसे ही हरियाणा में भाजपा को चुनाव के बाद अपने बल पर बहुमत ना मिलने पर एक नये और क्षेत्रीय छोटे दल से मजबूरन झुककर उसकी शर्तों पर समझौता कर गठबंधन सरकार बनानी पड़ी। इससे पहले पिछले साल हुए तीन महत्वपूर्ण राज्य मध्य प्रदेश राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भाजपा को कांग्रेस के हाथों हार का सामना करना पड़ा था। इतना ही नहीं कर्नाटक में अपने बल पर बहुमत ना मिलने से भाजपा को काफी समय तक विपक्ष में बैठना पड़ा। लेकिन बाद में उसने जोड़तोड़ कर वहां जैसे तैसे अपनी सरकार बनाई। कहने का मतलब यह है कि 2017 के बाद से भाजपा ने लगातार कई राज्यों में हार का मुंह देखा है।

इससे यह मिथक टूटने लगा है कि भाजपा एक बार किसी राज्य में चुनाव जीत गयी तो वह वहां कई दशक तक लगातार राज करेगी। इसके साथ ही यह मानना जल्दबाज़ी होगी कि एक के बाद एक राज्य मंे चुनाव हारने से जो भाजपा दो साल पहले देश के 71 प्रतिशत हिस्से पर राज कर रही थी। वह चूंकि अब मात्र 35प्रतिशत भूभाग पर सत्ता चला रही है। इसलिये उसके एक मात्र लोकप्रिय नेता और प्रधानमंत्री मोदी का जादू लोगों के सर से उतरने लगा है?सच तो यह है कि जिस तरह से 6 माह पहले केंद्र के चुनाव में भाजपा ने पहले से अधिक लोकसभा सीट और मत हासिल कर मोदी के नेतृत्व में रिकॉर्ड जीत हासिल की थी।

उससे यह साबित होता है कि मोदी की लोकप्रियता ना केवल बरक़रार है बल्कि वह पहले से और अधिक बढ़ी ही है। अब सवाल यह उठता है कि फिर पिछले दिनों मोदी सरकार को एनआरसी और सीएए को लेकर बैकफुट पर आकर देश और दुनिया को सफाई क्यों देनी पड़ीसच तो यही है कि यह मोदी सरकार का परंपरागत स्टाइल नहीं है। उसका मिज़ाज तो यही रहा है कि उसने जो बात एक बार कह दी वह उसपर डटी रहती है।

लेकिन एनआरसी को लेकर उसके होममिनिस्टर ने बार बार संसद और संसद के बाहर जो बढ़चढ़कर डरावने और बड़बोले दावे किये थे। देश और दुनिया में उस पर भारत सरकार और भाजपा की बदनामी होने पर पीएम को सामने आकर उनका खंडन करना पड़ा। यह अलग बात है कि मोदी ने ना तो सीएए वापस लेने का ऐलान किया और ना ही भविष्य में एनआरसी ना करने का वचन दिया। लेकिन इतना ज़रूर हुआ कि देश में मोदी सरकार के खिलाफ सेकुलर हिंदुओं मुसलमानों और उत्तरपूर्व के आदिवासियों ने जो जोरदार आंदोलन किया उससे मोदी सरकार पहली बार सकते में आकर अपने क़दम पीछे खींचने पर मजबूर हो गयी।

मोदी सरकार को जो काम पहले करना चाहिये था। वह उसने हालात बेकाबू होते देख एनआरसी और डिटेंशन कैम्पों पर सफाई देकर बाद में किया। उसने पहली बार भारतीय मुसलमानों को यह भरोसा भी दिलाया कि उनके पास ज़रूरी कागज़ात ना होने पर उनको ना तो देश से निकाला जायेगा ना ही किसी डिटेंशन कैम्प में भेजा जायेगा। इससे देश का माहौल तो फिलहाल शांत हो गया। लेकिन पूरी दुनिया और खासतौर पर मुस्लिम मुल्कों में भाजपा और मोदी सरकार की छवि ख़राब हुयी है। मोदी सरकार पर अमेरिका से लेकर यूरूप और यूनाइटेड नेशन तक का दबाव इस बात के लिये बढ़ा है कि वह धर्म के आधार पर नागरिकता देने या छीनने का इरादा छोड़ दे।

  कहने का मतलब यह है कि एक के बाद एक राज्यों के चुनाव हारने और एनआरसी के मसले पर मोदी सरकार के पीछे हटने को मजबूर होने से यह साफ हो गया है कि उसकी हिंदू वोटबैंक की राजनीति आगे और अधिक चलने वाली नहीं है। मोदी सरकार को आज नहीं तो कल आर्थिक मंदी बेरोज़गारी करप्शन बलात्कार बढ़ते अपराध कालाधन कानून व्यवस्था और शिक्षा और चिकित्सा के सवालों का जवाब जनता को प्राथमिकता के आधार पर देना ही होगानहीं तो जैसे वह एक के बाद एक राज्य चुनाव के बाद गंवा रही है। वह दिन भी आ सकता है जबकि बिना किसी ठोस और मज़बूत विकल्प के भाजपा केंद्र की सत्ता से भी हाथ धो बैठे। जनता के सब्र का पैमाना अब धीरे धीरे छलकने लगा है। बहुत लंबे समय तक असली जनहित के मुद्दों से जनता को भटकाकर कोई भी सरकार भावात्मक मुद्दों के बल पर सत्ता में नहीं बनी रह सकती है। यह दीवार पर लिखी इबारत मोदी सरकार देख रही होगी।                

0उल्फ़त बदल गयी कभी नीयत बदल गयी,

 खुदगर्ज़ जब हुए तो फिर सीरत बदल गयी।

 अपना क़सूर दूसरों के सर पर डालकर,

 कुछ लोग सोचते हैं हक़ीक़त बदल गयी ।।