Tuesday, 1 January 2019

3 राज्यों के चुनाव परिणाम

न भाजपा हारी न ही कांग्रेस जीती ?

0 5 राज्यों के चुनाव में जहां 3 राज्यों में कांग्रेस भाजपा की सीधी टक्कर थी। छत्तीसगढ़ को छोड़कर दो बड़े राज्यों मध्यप्रदेश व राजस्थान में किसी को भी बहुमत नहीं मिला है। साथ ही दोनों दल वोटों के हिसाब से एक दूसरे के साथ बराबरी करते नज़र आ रहे हैं। इसलिये इन चुनाव नतीजों को 2019 का सेमिफाइनल मानकर कोई साफ तस्वीर नहीं बनाई जा सकती है।   

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   पांच राज्यों के चुनाव से पहले कुछ लोगों को लगता था कि भाजपा का तीन राज्यों में पूरी तरह सफाया हो जायेगा। उधर कुछ लोगों का दावा था कि कांग्रेस अगर इस बार भी इनमें से कम से कम 3 राज्यों में सत्ता में वापसी नहीं करती है तो वह भारतीय राजनीति में सदा के लिये दफ़न हो सकती है। एक तरह से उनको लगता था कि पहली बार परिस्थितियां इतनी अनुकूल हैं कि कांग्रेस भाजपा को इस बार पटख़नी देकर 2019 के चुनाव में मोदी के सामने मज़बूत चुनौती पेश कर सकती है। लेकिन जब चुनाव नतीजे सामने आये तो लगा कि दोनों पक्ष ही पूरी तरह नहीं आधे आधे ही सही थे।

हालांकि तेलंगाना और मिज़ोरम में भाजपा मुख्य मुक़ाबले में नहीं थी। लेकिन मिज़ोरम में जहां कांग्रेस सत्ता में थी वहां उसको हार का सामना करना पड़ा। दूसरी तरफ तेलंगाना में कांग्रेस ने आंध््राा के सीएम की पार्टी तेलगू देशम से गठबंधन कर के टीआरएस के सामने मज़बूत चुनौती पेश की थी। लेकिन फिर भी वहां के लोकप्रिय सीएम के सी आर के सामने वह टिक नहीं पाई। जहां तक शेष बचे 3 राज्यों का सवाल है। उनमें भी ईमानदारी से देखा जाये तो कांग्रेस ने सत्ता में आने लायक कोई बड़ा संघर्ष नहीं किया। सच तो यह है कि धीरे धीरे भाजपा से लोगों का मोहभंग होने लगा है।

लेकिन बिना कोई ठोस काम या विकास की योजना के मजबूरी में कांग्रेस को कोई और बेहतर विकल्प उपलब्ध न होने से लोगों ने भारी मन से चुन  लिया है। यह बात बसपा प्रमुख मायावती ने भी कही है। सच तो यह है कि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में जिस तरह से गाय गोशाला रामगमनपथ और राहुल गांधी ने मंदिर मंदिर जाकर पूजा पाठ किया है। उससे कभी कभी ऐसा आभास होने लगता है। जैसे कांग्रेस भी छोटी भाजपा ही बनकर हिंदूवादी सोच का रास्ता अपना रही है। जो कांग्रेस खुद को सेकुलर बताने से नहीं थकती उसने एक बार भी मुसलमानों की असुरक्षा पर मुंह खोलने से परहेज़ किया।

उसने मोब लिंचिंग के शिकार मुसलमानों को कथित गो रक्षकों के खिलाफ सख़्त कार्यवाही कर भविष्य में न्याय दिलाने का कोई औपचारिक आश्वासन तक इस डर से नहीं दिया कि कहीं उससे हिंदू वोट ख़फ़ा न हो जाये। ऐसे में कांग्रेस से मुसलमानों या दलितों की अन्य बड़ी समस्याओं पर बात करने का तो कोई औचित्य ही समझ में नहीं आता। ऐसे ही उसने अपने सत्ता के दौरान पहले हुए बड़े बड़े घोटालों या करप्शन पर एक शब्द भी नहीं बोला है। उच्च जातियों के हितों को आगे कर उनको उनकी आबादी से कहीं अधिक टिकट देने से लेकर बड़े पदों पर आसीन करने के अपने परंपरागत अभियान से भी कांग्रेस ने कोई तौबा नहीं की है।

अलबत्ता मुस्लिम साम्प्रदायिकता कट्टरता और आरक्षण आदि के मुद्दे पर कांग्रेस सचेत हो गयी है। कांग्रेस को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिये कि वह 2019 में मोदी सरकार को आराम से कुर्सी से हटा सकती है। अगर सीटों के हिसाब से देखा जाये तो कांग्रेस को केवल 36 गढ़ में भाजपा के खिलाफ जबरदस्त जीत मिली है। वहां कांग्रेस को भाजपा के मुकाबले वोट भी 9प्रतिशत अधिक मिले हैं। इसकी वजह इस राज्य में आदिवासियों की अधिकता हो सकती है। सबको पता है कि भाजपा का झुकाव बड़े बड़े उद्योगपतियों की तरफ हैै। 36गढ़ में भाजपा की रमन सिंह सरकार ने जंगल और ज़मीन की अथाह दौलत को कौड़ियों के भाव कॉरपोरेट के हवाले कर दिया है।

     साथ ही माओवाद को कुचलने के नाम पर पहले सलवा जूडम और अब फर्जी एनकाउंटर थोक में कर भाजपा सरकार ने वहां के मूल निवासी आदिवासी और दलितों को बुरी तरह नाराज़ कर दिया है। साथ ही वहां बने तीसरे गठबंधन के क्षेत्रीय नेता जोगी ने अपने उल्टे बयानों से कांग्रेस की जीत का रास्ता आसान कर दिया। इसलिये वहां भी कांग्रेस की जीत को उसकी जीत कम भाजपा की अपनी नालायकी और जनविरोधी नीतियों से हार अधिक माना जा रहा हैै। जहां तक सबसे बड़े राज्य रहे मध्यप्रदेश का सवाल है। वहां भाजपा चुनाव हार कर भी कांग्रेस को स्पश्ट बहुमत हासिल करने से रोकने में सफल रही है।

भाजपा का वोट भी वहां कांग्रेस के 41.1प्रतिशत के मुकाबले 41.2 प्रतिशत रहा है। ऐसे ही एक और बड़े राज्य राजस्थान में भाजपा के38.8 प्रतिशत के मुकाबले कांग्रेस को 39.2प्रतिशत ही वोट मिल सके हैं। दोनों ही राज्यों में किसी को बहुमत नहीं मिला है। जिन सपा बसपा और स्थानीय छोटे दलों से कांग्रेस ने चुनाव से पहले बार बार अपील के बावजूद घमंड में सीटोें पर तालमेल नहीं किया था। चुनाव बाद सरकार बनाने के लिये उनसे ही समर्थन मांगकर जैसे तैसे सरकार तो बना ली है। लेकिन अब कांग्रेस को यह पता लग गया होगा कि वह भाजपा को अपने बलबूते पर लाख दावों के बावजूद नहीं हरा सकती।

अगर कांग्रेस अल्पसंख्यकों पिछड़ों और दलितों के वोट लेना चाहती है तो उसको इन वर्गों और इनके वास्तविक प्रतिनिधियों व क्षेत्रीय दलों के साथ हर हाल में गठबंधन करना ही होगा। साथ ही पूरी ईमानदारी से इनको हर क्षेत्र में प्रतिनिधित्व भी देना होगा। अगर कांग्रेस को वास्तव में भाजपा को सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाना है तो उसको सबका साथ लेने के लिये न केवल सबका विकास करना होगा बल्कि अपनी मनमानी करप्शन अहंकार मुट्ठीभर उच्च जातियों और मुसलमानों का धार्मिक तुष्टिकरण भी छोड़ना होगा। साथ ही कांग्रेस को किसानों से लेकर नौजवानों तक को रोज़गार देकर अपने साथ लाना होगा। आज के हालात में केंद्र में मोदी सरकार 2019 के चुनाव में भाजपा के बहुमत से न सही लेकिन एनडीए के गठबंधन केसीआर नवीन पटनायक और डीएमके या एडीएमके के सहयोग से फिर से सरकार बना सकती है।                    

0 रोज़ पत्थर की हिमायत में ग़ज़ल लिखते हैं,

  रोज़ शीशों से कोई काम निकल पड़ता है।।                    

पाकिस्तान सधरेगा?

पाक सेकुलर देश बनने को तैयार ?

0 करतारपुर कोरिडोर खोलने के बाद एक बार फिर पाकिस्तान ने दावा किया है कि वह भारत के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने को तैयार है। लेकिन हमारे सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने यह सवाल उठाकर पाक को खामोश कर दिया है कि क्या वह भारत की तरह सेकुलर देश बनने को तैयार हैयह अलग बात है कि मोदी राज में खुद भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की तैयारी जारी है। लेकिन यह भी सच है कि भारत की अधिकांष जनता इसके पक्ष में नहीं लगती।  

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   जनरल रावत की बात थोड़ा कड़वी है। लेकिन सच यही है कि एक कट्टर इस्लामिक और सेना का कठपुतली राष्ट्र होते हुए पाकिस्तान भारत के साथ मिलकर लंबी दूरी नहीं तय कर सकता। हालांकि ऐसे मुद्दो पर सेना का बोलना हमारे देश में अच्छा नहीं माना जाता। लेकिन जब दो देशों के रिश्ते बिगड़ते हैं और नौबत जंग की आ जाती है तो उसमें सेना का इस्तेमाल भी होता है। जब सेना का इस्तेमाल होगा तो सेना की ऐसे मामलों में अभिव्यक्ति भी स्वाभाविक ही है। हालांकि सेना प्रमुख ने अपनी तरफ से यह बयान नहीं दिया।

उनसे पत्रकारों ने पूछा था कि जब जर्मनी और फ्रांस कई जंग लड़ने के बाद भी अब एक साथ अमनचैन से रह सकते हैं तो भारत पाकिस्तान एक साथ मिलकर क्यों नहीं रह सकतेजनरल रावत का कहना ठीक ही है कि भारत के साथ मिलकर चलने के लिये पाकिस्तान को पहले अपने अंदर झांककर देखना होगा। पाकिस्तान एक कथित कट्टर इस्लामिक देश बन चुका है। पाकिस्तान कहता है कि इस्लामिक देश बनने के बाद उसको किसी और की ज़रूरत नहीं है। जबकि भारत सेकुलर देश होने की वजह से सबको साथ लेकर चलने को तैयार रहता है।

अगर पाकिस्तान भी भारत की तरह एक सेकुलर देश बनने को तैयार हो जाये तो कई मसले तत्काल हल हो सकते हैं। पाक के पीएम इमरान खान बार बार यह दावा कर रहे हैं कि अगर भारत एक कदम चलकर हमारी तरफ आयेगा तो हम दो कदम चलकर उसकी तरफ बढ़ेंगे। लेकिन जनरल रावत ने सही याद दिलाया कि भारत ने कई बार ऐसी पहल करके देखी है। लेकिन पाकिस्तान का आतंकी चेहरा हर बार और भी भयावह रूप में सामने आता रहा है। जनरल रावत का कहना ठीक है कि कम से कम पाकिस्तान एक बार तो भारत को यह विश्वास दिलाये कि वह भारत के खिलाफ भविष्य में आतंकवाद को बढ़ावा नहीं देगा।

उनका कहना है कि अगर पाक हमें विश्वास में लेना चाहता है तो उसको बयान देकर नहीं इस दिशा में ठोस कदम उठाकर अपनी बात को सच साबित करना होगा। भारत ने मजबूर होकर ही यह ज़िद पकड़ी है कि आतंक और बातचीत दोनों एक साथ नहीं चल सकते। इमरान खान कह रहे हैं कि अगर एक बार हम कारोबार शुरू करते हैं और रिश्ते मज़बूत बन जाते हैं तो यह दोनों देशों के लिये फायदे का सौदा होगा। साथ साथ पाक पीएम यह भी दोहराते हैं कि हमारे राजनेतासेना और सभी संगठन एक साथ हैं। यही वो असली पंेच है।

जिस पर जनरल रावत ने पाकिस्तान की दुखती नस जानकर हाथ रखा है। कहते हैं कि पाकिस्तान तीन ए यानी अल्लाह आर्मी और अमेरिका से चलता रहा है। अब धीरे धीरे अमेरिका का असर वहां कम हो रहा है तो आर्मी का असर बढ़ता जा रहा है। दुनिया के तमाम देशों के पास एक सेना होती है। लेकिन अकेली पाकिस्तान की ऐसी सेना है जिसके पास एक देश है। वहां चुनी हुयी सरकारें अव्वल तो बहुत कम रही हैं। लेकिन जिनको सेना ने नहीं चाहा वे अपना कार्यकाल भी पूरा नहीं कर सकीं हैं।

आज दुनिया में जब पाकिस्तानी सेना पर यह दबाव कुछ अधिक ही बढ़ने लगा है कि वह चुनी हुई सरकारों को ताकत के बल पर इस तरह बार बार अपदस्थ करके सत्ता नहीं हथिया सकती तो उसने नवाज़ शरीफ के काबू न देने पर इमरान खान जैसे पीएम पद के भूखे एक नौसीखिये को सरकार का मुखिया बना दिया है। इमरान के पास पाकिस्तान के विकास से लेकर भारत और दुनिया के दूसरे मुल्कों के साथ अच्छे रिश्ते कायम करने का कोई सुनियोजित एजेंडा तक नहीं है। दरअसल इसकी ज़रूरत भी उनको नहीं थी क्योंकि सेना उनको अपने हिसाब से चलायेगी।

कश्मीर मुद्दे को ही अगर देखें तो पाकिस्तान का उसपर दावा केवल वहां के निवासियों का मुसलमान होना माना जाता है। जबकि कश्मीर का एक हिस्सा लद्दाख़ जहां बौध्द लोगों का बहुमत है और जम्मू जहां हिंदुओं का बहुमत है,वहां अलगाव की कोई समस्या ही नहीं है। आज पाकिस्तान पूरी दुनिया में इस्लामी आतंकवाद को बढ़ावा देने से ही अलग थलग पड़ चुका है। साथ ही उसकी आर्थिक हालत भी बेहद खस्ता है। वह विश्वबैंक के दरवाजे़ पर भीख का कटोरा लिये खड़ा है। लेकिन उससे अमेरिका की नाराज़गी उसको वहां से भी कोई खास मदद लेने में बाधा बनी हुयी है।

अमेरिका उसकी सीधी आर्थिक सहायता से पहले ही हाथ खींच चुका है। पाकिस्तान उसके पीएम इमरान और उसकी सेना माने या न माने लेकिन सच यही है कि वह धर्म के नाम पर बना और आज भी कट्टर मज़हबी सियासत कर रहा है। वह अंदर से आज पूरी तरह खोखला हो चुका है। जहां तक भारत का सवाल है। वह आज भी संविधान लोकतंत्र और देश के अधिकांश अमनपसंद हिंदुओं की वजह से सेकुलर देश बना हुआ है।

हालांकि पिछले साढ़े चार साल में आरएसएस और भाजपा ने भारत को बिना संविधान को बदले व्यावहारिक रूप से हिंदू राष्ट्र बनाने और मुसलमानों सहित दलितों व अन्य अल्पसंख्यकों को दूसरे दर्जे का नागरिक बनाने का असफल प्रयास किया है। लेकिन आप विश्वास रखिये देश की अधिकांश जनता आज नहीं तो कल संघ को ही सेकुलर बनने या इतिहास बनने पर मजबूर कर देगी।                       

0 उसी का शहर वही मुद्दई वही मंुसिफ़,

  हमें यक़ीं था हमारा क़सूर निकलेगा ।।

सबरीमाला

सबरीमाला पर कांग्रेस भाजपा एक!

0 कहते हैं इतिहास से सबक़ न सीखो जाये तो वह खुद को दोहराता है। सबरीमाला मंदिर पर भाजपा का स्टैंड वही है जो कांग्रेस का शाहबानो वाले केस पर हुआ करता था। हैरत की बात यह है कि शाहबानो पर भाजपा को कोसने वाली कांग्रेस सबरीमाला पर उसके साथ कंध्ेा से कंधा मिलाकर खड़ी है। यह वोटबैंक की राजनीति नहीं है तो क्या है?प्रगतिषील और स्त्री समानता की पक्षधर केरल की वामपंथी सरकार इस फैसले के खिलाफ दबाव के बावजूद कोर्ट में पुनर्विचार याचिका दाखिल न करने से विलेन बनती नज़र आ रही है।  

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   केरल के सबरीमाला मंदिर में हर आयु की महिलाओं को प्रवेश दिये जाने के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसला देने के बावजूद अभी तक 10से 50 साल तक की महिलाओं को वहां पर जाने से परंपरा और आस्था के नाम पर बलपूर्वक रोका जा रहा है। हालांकि केरल की वामपंथी सरकार इस फैसले को देर सवेर लागू करने की भरसक कोशिश में लगी है। लेकिन परंपरावादी समाज और कम्युनिस्टों की धुर विरोधी भाजपा के साथ ही कांग्रेस भी वोटबैंक की ओछी सियासत के चलते सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के इतने समय बाद भी एक प्रगतिशील कदम को लागू नहीं होने दे रहे हैं।

इस मामले में संघ परिवार का दोहरा पैमाना एक बार फिर देश के सामने आ गया है। एक ओर वह मुसलमानों में शाहबानो फैसले से लेकर तीन तलाक तक पर तत्काल बदलाव लागू करना चाहता है। दूसरी तरफ हिंदू वोटबैंक की घटिया सियासत के चलते संघ सबरीमाला पर खुलकर सबसे बड़ी अदालत के फैसले के खिलाफ खड़ा है। अफसोस की बात यह है कि आज़ादी के तत्काल बाद जिस तरह से उसने  हिंदू कोड बिल का विरोध किया था। वह आज सुप्रीम कोर्ट का न केवल विरोध कर रहा है। बल्कि उसके नेशनल प्रेसीडेंट तो बाकायदा कोर्ट को चेतावनी दे रहे हैं कि कोर्ट को फैसले करते समय किन बातों का ख़याल रखना चाहिये।

इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि खुद महिलाओं को महिलाओं के मंदिर प्रवेश के खिलाफ गुमराह करके उनसे ही जबरन ऐसा आंदोलन कराया जा रहा है कि वे हर आयु की महिलाओं को भगवान अयप्पा के दर्शन से रोकने पर तुली हैं। इतना ही नहीं भाजपा की केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी तो इस हद तक उतर आईं कि बोली पूजा के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि पवित्र मंदिर को अपवित्र करने का अधिकार दे दिया जाये। ईरानी का सवाल है कि क्या आप माहवारी के ख्ूान से सना नैपकिन लेकर किसी मित्र के घर जाते हैंअगर नहीं तो क्या भगवान के घर ऐसे जाना आपको ठीक लगता है?

ये वो ही स्मृति ईरानी हैं। जिनकी शैक्षिक योग्यता और डिग्रियों को लेकर पहले ही भारी विवाद रहा है। उनके दोनों सवाल उनकी नादानी और नासमझी को उजागर करते हैं। पहली बात तो उनको यह पता होना चाहिये कि आज महिलायें पीरियड्स के दौरान सब जगह जाती हैं। दूसरे उनको यह नहीं मालूम कि माहवारी का खून अपवित्र नहीं होता। ईरानी ने एक तरह से कुतर्क का सहारा लेकर एक गलत और स्त्री विरोधी परंपरा का बचाव किया है। उनको यह सामान्य सी बात भी नहीं पता कि महिलायें मंदिर जाते समय साफ सफाई और पवित्रता का स्वयं ही बहुत ख़याल रखती हैं।

स्त्री होने के कारण ईरानी को यह तो पता ही होगा कि माहवारी के दौरान महिलायें खुद कितना रिज़र्व हो जाती हैं। इसकी वजह यह है कि इस दौरान उनको चलने फिरने खड़े होने और अन्य कामों में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। इसकी एक वजह यह है कि घर से बाहर यात्रा पर जाने में भी महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर मूत्रालय उपलब्ध न होने से असहनीय पीड़ा होती है। उसको एकांत आड़ या माहवारी के दौरान पैड बदलने के लिये तमाम मुसीबतों का सामना करना पड़ता हैै। ऐसे में वह मंदिर जाने का फैसला कैसे कर सकती है?

परंपरा तो यह है कि घर में भी इस दौरान महिलायें ठाकुर जी को हाथ तक नहीं लगाती। सच तो यह है कि स्त्री का मंदिर जाना या माहवारी के दौरान मंदिर जाना कोई समस्या नहीं है। असली समस्या उन पुरातन पंथी और कट्टरपंथी तत्वों के सामने आ खड़ी हुयी है। जिनका यह मानना है कि स्त्री पुरूष किसी हाल में एक समान नहीं हैं। ईरानी को यह भी पता होना चाहिये कि स्त्री के शरीर से माहवारी के दौरान रिसने वाला यह खूद गंदा नहीं होता। साइंटिस्टों का कहना है कि यह रक्त पूरी तरह से पाक साफ होता है। इसका मकसद स्त्री को उर्वर बनाये रखना होता है।

दरअसल ईरानी की सोच उस दकियानूसी और असमानता की समझ पर आधारित है जिससे यह साबित किया जाता है कि औरत का जिस्म पाप का ढेर है। माहवारी वाली औरतों को कई घरों में एक कोने में समेट दिया जाता है। उनके दिमाग में यह बात ठूस ठूस कर भर दी जाती है कि उनकी परछाई भी पुरूषों पर किसी हाल में नहीं पड़नी चाहिये। इसकी वजह उनका पौरूष कमज़ोर हो जाना माना जाता है। यह कोरा अंधविश्वास नहीं तो और क्या हैइसी तरह मंबई की हाजी अली दरगाह पर महिलाओं के जाने पर लगी रोक जब सुप्रीम कोर्ट ने हटाई तो भाजपा व संघ परिवार ने बड़े जोरशोर से उसका स्वागत किया था।

उस फैसले के खिलाफ भाजपा की महाराष्ट्र सरकार ने कोई अपील भी कोर्ट मंे नहीं की। जबकि ऐसे ही केरल के सबरीमाला मंदिर के फैसले पर भाजपा संघ परिवार और यहां तक कि कांग्रेस भी दोहरी नीति अपना रही है। कट्टरपंथी किसी भी धर्म के मानने वाले हों उनको याद रखना चाहिये कि उनको सामयिक और तात्कालिक सफलता तो मिल सकती है। लेकिन आगे महिलायें उनसे बराबर अधिकार लेकर ही रहेंगी।                      

0 देखा जो तीर खाकर कमींगाह की तरफ़,

  अपने ही दोस्तों से मुलाक़ात हो गयी ।।                   

Friday, 26 October 2018

संघ की चिंता

संघ को मंदिर नहीं वोटबैंक की चिंता ?

0 विजयदशमी के अवसर पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने राम मंदिर बनाने के लिये मोदी सरकार से कानून बनाने की मांग की है। इससे पहले भागवत सुप्रीम कोर्ट का निर्णय कुछ भी होने पर हर हाल में मंदिर विवादित स्थान पर बनाने की बात भी कह चुके हैं। सवाल यह है कि संघ को ठीक चुनाव के समय ही मंदिर बनाने की याद क्यों आती है? इसका जवाब है कि उनको मंदिर नहीं कट्टर हिंदू वोटबैंक की चिंता सता रही है।
आरएसएस को एक बार फिर मंदिर बनाने की याद आ गयी है। इसके लिये संघ प्रमुख ने मोदी सरकार से कानून बनाने की मांग काफी सोच समझकर आम चुनाव करीब आते देख कर की है। संघ को लग रहा है कि 2014 की तरह मोदी का सबका साथ सबका विकास का नारा 2019 में चुनाव जीतने के लिये काम नहीं करेगा। संघ को यह भी पता है कि मोदी सरकार ने चुनाव जीतने के लिये जितने भी बड़े बड़े वादे किये थे। उनमें से अधिकांश न तो पूरे हुए हैं और न ही चुनाव में शेष बचे 5 माह में पूरे होने के दूर दूर तक कोई आसार हैं।
भाजपा के वरिष्ठ नेता और केंद्रीय मंत्री निति गडकरी तो सार्वजनिक रूप से यह मान भी चुके हैं कि अगर वे ऐसे बड़े बड़े असंभव वादे नहीं करते तो उनका सत्ता में आना लगभग असंभव ही था। लेकिन सवाल यह है कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ा करती क्या भाजपा को यह नहीं पता है? संघ शायद उन कट्टर हिंदुओं की अज्ञानता धार्मिक आस्था और साम्प्रदायिकता का सियासी लाभ उठाना चाहता है। जिनको यह नहीं पता कि कानून बनाकर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ नहीं किया जा सकता। हमारा संविधान इस बात की इजाज़त सरकार को नहीं देता कि वह बाबरी मस्जिद की विवादित जगह पर राम मंदिर बनाने को कानून बना सके।
सबको पता है कि इस तरह का कोई विधेयक संसद में आते ही विपक्ष भारी हंगामा खड़ा करेगा। इसके बाद लोकसभा से अगर भाजपा अपने बहुमत के बल पर राम मंदिर गैर संवैधानिक रूप से बनाने का विधेयक पास भी कर दे तो यह राज्यसभा में जाकर अटक जायेगा। हो सकता है कि संघ परिवार की यही चुनावी रण्नीति हो कि वह विपक्ष को राम मंदिर विरोधी ठहराकर अपना हिंदू वोट बैंक बचाने की एक और नाकाम कोशिश करे। दरअसल संघ जानता है कि वह ऐसा कोई संविधान विरोधी कानून मोदी सरकार से पास ही नहीं करा पायेगा।
वह यह भी जानता है कि जो राम मंदिर बाबरी मस्जिद विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। उस पर सरकार चाहकर भी कोई कानून नहीं बना सकती। संघ को यह भी पता है कि अगर ऐसा कोई कानून दोनों सदनों से अपवाद स्वरूप पास भी हो जाता है तो उसको तत्काल कोर्ट में चुनौती दी जायेगी। अगर सरकार इस मामले मेें कानून सदन से पास न होने की संभावना को भांपकर अध्यादेश का सहारा भी लेती है तो वह भी कोर्ट में नहीं टिक सकेगा। हमारा संविधान धर्मनिर्पेक्ष, जनतांत्रिक और सभी वर्गों के समान अधिकार की गारंटी देता है।
इसीलिये उसमें सभी नागरिकों को समानता गरिमा और बराबर धार्मिक आज़ादी के साथ सम्मानपूर्वक जीने का बराबर अधिकार भी दिया गया है। इसलिये ऐसा कानून कोर्ट में तुरंत निरस्त हो जायेगा। जिसमें एक वर्ग के धार्मिक स्थल को अवैध रूप से तोड़कर उसमें आस्था के नाम पर रामलला की मूर्ति स्वयं प्रकट होने का दावा कर जबरन राममंदिर बनाने की ज़िद की गयी होगी। कोर्ट जानता है कि संघ केवल हिंदू वोटबैंक बनाये रखने और इस बहाने सत्ता में लंबे समय तक बने रहने की सुचिंतित योजना पर लगातार काम कर रहा है। संघ परिवार यह भी जानता है कि वह चाहे आस्था और हिंदू संस्कृति व सभ्यता की जितनी दुहाई दे।
राम मंदिर बनाम बाबरी मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट कानून के आधार पर ही निर्णय देगा। यह बात सर्वोच्च न्यायालय इस विवाद की निरंतर सुनवाई चालू करने से पहले ही साफ कर चुका है। हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट इस मामले में कानून की सीमा से बाहर जाकर इस विशेष और संवेदनशील मामले को सर्वमान्य तरीके से सुलझाने के लिये विवादित भूमि के तीन हिस्से करने का फैसला दे चुका है। लेकिन उससे कोई भी पक्ष चूंकि संतुष्ट नहीं हो सका था।
इसलिये यह मामला सबसे बड़ी अदालत में सुनवाई के लिये गया है। इस दौरान संघ परिवार ने विवादित स्थान पर आधुनिक तकनीक से बहुत गहरे तक खुदाई के दौरान ऐसे अवशेष मिलने का दावा भी जोरशोर से किया था। जिससे यह साबित किया जा सके कि 400 साल पहले यहां मस्जिद बनने से पहले राम मंदिर ही था। संघ ने अपने इस दावे को पुख्ता करने के लिये कई विवादित इतिहासकारों की किताबों का भी सहारा लिया है। लेकिन उसकी कोई भी चाल सुप्रीम कोर्ट को अपना निर्णय मैरिट यानी विवादित ज़मीन के दस्तावेज़ों के अलावा और किसी आधार पर फैसला देने को अभी तक भी तैयार नहीं कर सकी है।
29 अक्तूबर से सुप्रीम कोर्ट इस मामले में लगातार यानी दैनिक आधार पर सुनवाई करने जा रहा है। ज़ाहिर है कि संघ को कोर्ट का फैसला आने से पहले ही यह डर सता रहा है कि अगर वह निर्णय मंदिर के पक्ष में नहीं आया और मोदी सरकार इसके लिये कानून बनाकर मंदिर बनाने की तैयारी करती नज़र नहीं आई तो वह विकास रोज़गार और कालाधन करप्शन रोकने में नाकाम होने के साथ अपने परंपरागत कट्टर हिंदू वोटबैंक को क्या जवाब देगा? जीएसटी और नोटबंदी जैसे बेतुके फैसलों से व्यापारी उससे पहले ही बुरी तरह ख़फ़ा हो चुका है।
किसान आत्महत्या से लेकर महंगी पढ़ाई व सबरी माला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का खुला विरोध और मंदिर के लिये संविधान की मूल भावाना का उल्लंघन कर संघ की इस सारी कवायद से एक बार फिर यह साबित हो रहा है कि उसको संविधान और कानून में भरोसा नहीं है। संघ की मंदिर की सियासत पर जॉन एलिया का एक शेर याद आ रहा है-
0 हम वो हैं जो खुदा को भूल गये,
तुम मेरी जान किस गुमान में हो ।