Tuesday, 10 April 2018

बीजेपी के विद्रोही

बीजेपी सरकार में इनकी कौन सुनेगा?

कुछ समय पहले भाजपा के सहयोगी दलों ने यह शिकायत दर्ज करानी शुरू की थी कि उनकी सरकार में कोई सुनवाई नहीं हो रही है। इसके बाद खुद भाजपा के दलित सांसदों और विधायकों ने ऐसे आरोप अपनी ही सरकार पर लगाये। अब तो हद हो गयी जब भाजपा के विधायक ही अधिकारियों पर काम न करने के आरोप लगा रहे हैं।

 

यूपी सरकार मंे कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओमप्रकाश राजभर काफी समय से योगी सरकार के खिलाफ विद्रोही तेवर अपनाये हुए हैं। विडंबना यह है कि वे खुद मंत्री पद छोड़ नहीं रहे और भाजपा उनको उनके पद से हटाने की हिम्मत नहीं दिखा पा रही है। वे बार बार योगी सरकार को चुनौती दे रहे हैं कि उनको उनके पद से बर्खास्त करके दिखायें। विपक्ष उनके सरकार से बाहर आने का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार कर रहा है। उनको भाजपा के मुखिया अमित शाह भी अपने पास बुलाकर समझा बुझा चुके हैं।

लेकिन उन पर कोई असर नज़र नहीं आ रहा है। अभी राजभर का मामला सुलझा भी नहीं था कि शोहरगढ़ के अपना दल विधायक अमर सिंह चौधरी बग़ावत पर उतर आये हैं। उनका दुखड़ा यह है कि वे अगर अपने ही क्षेत्र के दोषी पुलिस वालों केे खिलाफ सरकार से कार्यवाही नहीं करा सकते तो उनका विधायक बने रहने का क्या लाभ है? हालांकि उनकी बढ़ती नाराज़गी को शांत करने के लिये सरकार ने पुलिस के कुछ ज़िम्मेदार अधिकारियों को जनपद से बाहर स्थानांतरित कर दिया है। लेकिन विधायक आरोपी पुलिस वालों को सज़ा मिलने तक शांत बैठने को तैयार नज़र नहीं आ रहे हैं।

इतना ही नहीं खुद भाजपा के विधायक बलिया के ज़िला अधिकारी और बैरिया के एमएलए वहां के डीएम एसपी से नाराज़ हैं। लेकिन वे उनको सज़ा दिलाना तो दूर वहां से हटा भी नहीं पा रहे हैं। हालत यह है कि भदोही व बस्ती के विधायकों को अपनी छोटी छोटी मांगों को पूरा कराने के लिये धरना प्रदर्शन का सहारा लेना पड़ रहा है। सवाल यह है कि ऐसे मंे विपक्षी दलों के विधायकों और सांसदों की सरकारी कारिंदों की नज़र में क्या हालत होगी? यह बखूबी अंदाज़ लगाया जा सकता है। यूपी के एक दलित सांसद ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि उनको यूपी के सीएम ने मिलने जाने पर बजाये शिकायतों पर कार्यवाही करने के डांटकर भगा दिया है।

हालांकि यह आरोप सुनने मंे ही अजीब लगता है। लेकिन हमारे समाज की जिस तरह की जातीय संरचना है। उसमें कुछ भी हो सकता है। बिजनौर संसदीय सीट से दलित सांसद डा. यशवंत सिंह भी हवा का रूख़ देखकर सरकार पर दलितों के लिये कोई विशेष काम न करने का आरोप जड़ चुके हैं। सवाल यह है कि अचानक भाजपा सरकार पर इस तरह के आरोपों की बौछार क्यों होने लगी है? अगर एक दो मामले ही इस तरह के होते तो यह माना जा सकता था कि ये अपवाद हैं। भाजपा यह कहकर भी अपना बचाव कर सकती थी कि इन लोगों के कुछ निहित स्वार्थ हैं।

जो पूरे न होने पर ये अनर्गल आरोप लगा रहे हैं। लेकिन सहयोगी घटकों की तो बात ही क्या खुद जब भाजपा के विधायक और सांसद भी आरोप लगायें तो यह मानना ही पड़ेगा कि मामला गड़बड़ है। दरअसल कम लोगों को पता है कि अकेली भाजपा एक ऐसी राजनीतिक मुखौटा पार्टी है। जिसमें भाजपा से ज़्यादा उसके आका आरएसएस की चलती है। टिकट बंटवारे से लेकर पीएम सीएम और मंत्री बनवाने तक ही नहीं पुलिस प्रशासन का नियंत्रण भी अप्रत्यक्ष रूप से भाजपा सरकारों में संघ के हाथों में आ जाता है। इससे चुने हुए जनप्रतिनिधियों और मंत्रियों तक को अधिकारी भाव नहीं देते हैं।

लेकिन अब धीरे धीरे संघ का यह अलोकतांत्रिक हस्तक्षेप पार्टी में विद्रोह करा रहा है। वैसी भी जब से मोदी पीएम बने हैं। भाजपा सरकार वनमैन आर्मी की तरह ही काम कर रही है। इसके साथ ही आरएसएस में भी किसी मुद्दे पर बहस या चर्चा की कोई परंपरा नहीं रही है। इसलिये ये अंतर्विरोध तो सामने आने ही थे। अब देखना यह है कि इस तरह के विद्रोह समय के साथ दब जाते हैं या फिर कोई बड़ा गुल खिलाते हैं।

0 कुछ न कहने से भी छिन जाता है एजाज़ ए सुख़न,

ज्ु़ाल्म सहने से भी ज़ालिम की मदद होती है।।

Thursday, 5 April 2018

दलित एक्ट


किसी भी कानून का गलत इस्तेमाल नहीं होना चाहिये। किसी भी बेक़सूर इंसान को झूठी रपट पर जेल नहीं भेजा जाना चाहिये। दलित एक्ट में भी अग्रिम ज़मानत का प्रोविज़न होना चाहिये। ये तर्क सुनने में कितने मासूम मगर कितनी गै़र बराबरी लिये हुए हैं?

 

सुप्रीम कोर्ट ने दलित एक्ट को अपने एक आदेश से कमज़ोर कर दिया। मोदी सरकार इस पर देशभर में हंगामा मचने पर अब पुनर्विचार याचिका लेकर ऐसे दौड़ रही है। जैसे उसको कुछ पता ही न हो। सच तो यह है कि मोदी सरकार ने ऐसा खुद न करके संघ के इशारे पर सबसे बड़ी अदालत से ऐसा जानबूझकर होने दिया है। जहां तक सुप्रीम कोर्ट की निष्पक्षता और ईमानदारी का सवाल है। उस पर खुद ही उसके चार जज सवाल उठा चुके हैं। अभी हाल ही में सबसे वरिष्ठ जज जस्टिस चेलमेश्वर एक बार फिर यह आरोप दोहरा चुके हैं कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट में दोस्ती आम जनता को इंसाफ दिये जाने में आड़े आती है।

बात सही भी है कि जब 90 प्रतिशत से अधिक मामले खुद सरकार के खिलाफ कोर्ट मेें पहंुचते हों तो ऐसे में कोर्ट की सरकार से गलबहिया कैसे कानून को निष्पक्ष काम करने दे सकती है? सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ विपक्ष महाभियोग लाने की भी तैयारी कर रहा है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का दलित एक्ट को एक तरह से निष्प्रभावी कर देना और भी गंभीर सवाल उठाता है। जहां तक कानून के दुरूपयोग का सवाल है। दलित एक्ट ही नहीं दहेज़ कानून से लेकर अफस्पा और ड्रग एवं आर्म्स एक्ट का सबसे ज़्यादा गलत इस्तेमाल होता है।

इसके साथ ही अगर निष्पक्ष जांच हो जाये तो पता चलेगा कि खुद सरकार नेता बड़े अधिकारी माफ़िया और पंूजीपति हर कानून का गलत इस्तेमाल बड़े पैमाने पर करते हैं। मिसाल के तौर पर यूपी में खुलेआम कथित अपराधियों को पुलिस सरकार के निर्देश पर एलान करके फर्जी मुठभेड़ों में मार रही है। हम ये नहीं कर रहे कि जिनकी हत्या की जा रही है। वे ख़तरनाक और इनामी अपराधी नहीं हैं। हम यह कह रहे हैं कि जो काम कोर्ट का था। वो सरकार और पुलिस किस कानून के तहत के निडर होकर कर रही हैं? क्या इस कानून को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त करने की ज़रूरत महसूस नहीं की?

हम एक अख़बार के संपादक होने की वजह से ख़बरों के सिलसिले में कई दशक से पुलिस के संपर्क में रहे हैं। हम अकसर थाने में देखते हैं कि पुलिस किसी भी गरीब कमज़ोर और अंजान आदमी को पकड़कर उसके पास चाकू चरस या तमंचा लगाकर चालान कर देती है। ऐसा हमारे नगर या राज्य में ही नहीं होता बल्कि हमारे दूसरे पत्रकार साथी भी बताते हैं कि उनके नगरों के थानोें मंे भी ऐसे खेल आम तौर पर होते हैं। जब से कोर्ट ने दहेज़ एक्ट को कमजोर किया है। तब से पुलिस ने ऐसे मामलों में हर रपट दर्ज कर जांच के नाम पर आरोपियों से मोटी रकम वसूलनी शुरू कर दी है।

केवल उन मामलों में ही आरोपियों को जेल भेजा जाता है। जिनमें या तो आरोपी पुलिस की जेब गर्म नहीं कर पाते या फिर रपट दर्ज करने वाले पुलिस को मोटी रकम रिश्वत में दे देते हैं। या फिर जिन मामलों में पुलिस पर बड़ी सिफारिश आती है। दलित एक्ट का इस्तेमाल तो पुलिस पहले ही रपट दर्ज न करके करने से रोकती रही है। दलित एक्ट ही नहीं अधिकांश मामलों में पुलिस पीड़ितों से तहरीर लेकर आरोपियों से बड़ी वसूली कर लेती है। क्या यह कानून का गलत इस्तेमाल नहीं है? सबको पता है कि अगर दलित एक्ट में पुलिस सीधे रपट दर्ज न कर पहले रपट की सच्चाई जांचेगी तो वह जेब गर्म कर अकसर रपट दर्ज करेगी ही नहीं।

क्या कोर्ट यह कड़वी हकीकत जानकर भी पुलिस को दलित एक्ट पर यह पावर देगा? यूपीकोका यूपी में ऐसा ही कानून आ रहा है जिसका विरोधियों के खिलाफ जमकर दुरूपयोग होगा। जाहिर है कि इसको कोर्ट में चुनौती भी दी जायेगी। देखना रोचक होगा कि कोर्ट का इस कानून के गलत इस्तेमाल को रोकने पर क्या रूख होगा? सबसे बड़ी बात यह है कि हमारा पूरा सिस्टम जब तब ईमानदार नहीं बनेगा तब तक हर कानून का दुरूपयोग होगा।

0 तुम्हारे घर मंे दरवाज़ा है लेकिन,

तुम्हें ख़तरे का अंदाज़ा नहीं है,

हमें ख़तरे का अंदाज़ा है लेकिन

हमारे घर में दरवाज़ा नहीं है।।

भूत प्रेत

भूत प्रेत से डरते हैं हमारे नेता!
0नेताओं से आशा की जाती है कि वे जनता को अंधविश्वास और जादू टोने से निकालकर वैज्ञानिक और तार्किक सोच से प्रगतिशील रास्ता दिखायेंगे! लेकिन देखने में यह आ रहा है कि खुद नेता ही भूत प्रेत और बुरी आत्माओं से डरे हुए हैं। सवाल उठता है कि ऐेसे में जनता को सही रास्ता कौन दिखा सकता है?

         

   बिहार में राजद के नेता तेजप्रताप यादव ने सीएम नीतीश कुमार पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उनको परेशान करने के लिये उनके सरकारी आवास में भूत भेजे हैं। हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने न तो उनके आरोप का खंडन किया है और न ही खुद को दोषमुक्त साबित करने के लिये किसी ओझा या तांत्रिक को लालू यादव के पु़त्र के निवास में भूतों की जांच करने का कोई आदेश ही दिया है। लेकिन यह भी सच है कि समाज का एक वर्ग भूत प्रेत और बुरी आत्मा जैसी बिना सर पैर की बकवास बातों को आज भी पूरे मन से सच मानता है।

इससे तेजस्वी के समर्थक इस  आरोप पर नीतीश से नाराज़ तो हो ही सकते हैं। इससे राजद को राजनीतिक लाभ मिलेगा और जनता दल यू को सियासी नुकसान हो सकता है। यह अलग बात है कि तजस्वी समर्थक यह सोचकर चुप रहने में ही अपनी भलाई समझ रहे होंगे कि कहीं बोलने या विरोध करने पर मुख्यमंत्री उनके घर भी कोई भूत न भेज देंऐसा नहीं है कि केवल बिहार के नेता ही भूत प्रेत की राजनीति कर रहे हों। बल्कि यह जिन्न बोतल से निकलकर अब राजस्थान भी पहुंच चुका है। वहां नाथद्वारा के विधायक कल्याण चौहान की22 फरवरी को अचानक मौत हो गयी थी।

इसके बाद भाजपा के मुख्य सचेतक कालू लाल गूर्जर ने मीडिया से कहा कि विधानसभा में बुरी आत्माओं का साया है। नागौर से विधायक हबीबुर्रहमान अशरफी ने तो यहां तक जांच पड़ताल कर डाली कि ये जिन्न भूत ही हैं जो राजस्थान की विधानसभा में कभी भी एक साथ 200 विधायक नहीं होने देते। उनका दावा था कि किसी विधायक की मौत हो जाती है तो किसी को जेल हो जाती है। उनका यह दावा कुछ कुछ ऐसा ही है। जैसे कि किसी और राज्य में न तो किसी विधायक की मौत होती हो और न ही किसी को जेल भेजा गया हो।

देखा जाये तो इतने विधायकों में किसी की मौत होना या किसी का जेल जाना सामान्य सी बात है। अगर सर्वे किया जाये तो पता चलेगा कि हर राज्य में ऐसी घटनायें कभी न कभी घटती ही रहती हैं। यह अलग बात है कि इनका और राज्यों में इतनी बारीकी और इतनी गहराई से नोटिस न लिया गया हो। राजस्थान मंे हालत यह है कि वहां के संसदीय कार्यमंत्री राजेंद्र राठौर ने सदन में भूत प्रेत की संख्या जांचने को बाकायदा कमैटी बनाने की मांग तक कर डाली। राठौर भूत प्र्रेत से इतना डरे हुए थे कि उन्होेंने सदन की कार्यवाही हर हाल में रात 12बजे से पहले निबटाने की अपील तक की।

उनका मानना है कि रात 12 बजे के बाद सदन में भूत प्रेत आने लगते हैं। जिससे विधायकों के साथ कोई न कोई अनहोनी का ख़तरा बढ़ जाता है। यह नहीं पता लगा कि विधानसभा के स्पीकर ने उनके इस काल्पनिक और हवाई भय को स्वीकार कर ऐसा किया या नहींइसके बाद गोपालन मंत्री ओटाराम देवासी ने तांत्रिक से झाड़ फूंक कराने की मांग की तो गुर्जर ने तांत्रिक को सदन में बुलवाकर जांच करा डाली। तांत्रिक ने भी मौके का फायदा उठाते हुए डरे हुए नेताओं को और भयभीत करते हुए वहां की भूमि में वास्तु दोष बता दिया।

बाद में पता लगा कि मुख्यमंत्री आवास से लेकर मेयर हाउस तक मेें भूतों का साया है। पूर्व मेयर निर्मला वर्मा की अचानक मौत के बाद से14 साल बीत गये कोई मेयर सरकारी आवास में रहने को तैयार नहीं है। इतना ही नहीं नगर निगम कार्यालय की दिषा भी इसी टोटके की वजह से बदली गयी है। साथ ही मुख्य द्वार पर गणेष प्रतिमा स्थापित की गयी है जिससे बुरी आत्माओं का साया दूर भगाया जा सके। सवाल यह है कि अगर नेता ही सदन में ऐसी अंधविश्वास और बेतुकी बातें करेंगे तो जाहिल और नासमझ जनता को इन अलौकिक शक्तियों के तथाकथित प्रकोप से कौन बचायेगा?

हमेें तो लगता है आज के दौर के सबसे बड़े डरावने और विनाषक भूत तो खुद ऐसे अंध विष्वासी नेता ही हैं। पता नहीं इनका इलाज कौन करेगाइस तरह की बे सिर पैर की सनकी बातों और घटिया दावों से भूत प्रेत के इलाज के नाम पर तांत्रिक और कुछ मौलाना लोगों के डर को भुनाना शुरू कर देते हैं। यही नहीं भूत के नाम पर ऐसे ढोंगी लोग कुछ महिलाओं की आबरू से तक से खेलते हैं। लोग भूत प्रेत से नहीं बल्कि अपनी इस बेतुकी और अवैज्ञानिक सोच से परेषान हैं।       

उपचुनाव के नतीजे

यूपी के गोरखपुर व फूलपुर और बिहार के अररिया में लोकसभा उपचुनाव में भाजपा की हार और विपक्षी दलों की जीत देश की राजनीति को उलट पलट कर देने वाले माने जा रहे हैं! भाजपा और उसका वफ़ादार मीडिया का एक वर्ग लाख बहाने बनाये लेकिन सच यही है कि सपा बसपा का गठबंधन होने और भाजपा से जनता का मोहभंग होने से 2019 के चुनाव में मोदी की वापसी अब पहले जैसी आसान नहीं रह गयी है।

      

   हालांकि एक दो राज्यों के दो चार उपचुनाव के परिणामों से देश की राजनीति के बदलने का नतीजा निकालना जल्दबाज़ी ही मानी जायेगी। लेकिन यह भी सच है कि उपचुनाव देश की जनता के मूड का कुछ कुछ पता तो देते ही हैं। साथ ही यह बात भी गौर करने के लायक है कि अगर ये उपचुनाव यूपी और बिहार जैसे बड़े राज्यों में हों तो इनकी गूंज दूर तक सुनाई देगी ही। इसकी एक वजह यह भी है कि इन बड़े राज्यों से ही केंद्र में राज कर रही भाजपा ने 100 से अधिक सीटें जीती थीं। सवाल यह है कि एक साल में ही ऐसा क्या हो गया कि जो भाजपा यूपी विधानसभा में दो तिहाई सीटें जीतकर सरकार बनाने में कामयाब हुयी थी।

उसके मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री के चुनाव क्षेत्र में ही वह धराशायी हो जाती है। साथ ही बिहार मंे उसने लालू यादव को पुराने भ्रष्टाचार के मामलों में जेल भेजकर और महागठबंधन तोड़कर जनता दल यूनाइटेड को अपने साथ मिलाकर यह पहला उपचुनाव लड़ा था। जिस पर उसको मंुह की खानी पड़ी है। इसका मतलब भाजपा ही नहीं बिहार में जदयू का असर भी तेज़ी से कम हो रहा है। अगर ऐसा किसी विपक्षी सरकार में हुआ होता तो भाजपा उस सरकार का नैतिकता और जनादेश के नाम पर त्याग पत्र मांगने को अब तक ज़मीन आसमान एक कर रही होती।

बात केवल तीन संसदीय सीटों पर उपचुनाव में हार जीत की नहीं है। सवाल यह भी है कि जिन सीटों पर भाजपा को 50 प्रतिशत से अधिक वोट मिले थे। उनपर वह इतनी बुरी तरह हार कैसे गयीसवाल यह भी है कि जिन सीटों पर भाजपा के प्रत्याशी लाखों वोटों के अंतर से अपने विरोधियों को हराकर शानदार जीत के सेहरा बांधकर आये थे। वहां ऐसा क्या हो गया कि उनकी एक नहीं दोनों सीटों पर हार हो गयीकहने को भाजपा और मीडिया इन शर्मनाक हार पर एक स्वर में बोल रहे हैं। उनका कहना है कि इन सीटों पर मोदी और अमित शाह प्रचार करने नहीं आये।

तो इसका मतलब यह निकाला जाये कि जहां भी भाजपा जीतेगी वह केवल मोदी और शाह की वजह से ही जीतेगीभाजपा भी नेहरू परिवार की तरह व्यक्तिवादी दल हो गयीयह मान लें कि मोदी के बाद भाजपा का अस्तित्व भी वनमैन आर्मी की तरह ख़तरे मेें पड़ सकता हैवे कह रहे हैं कि चुनाव से एक सप्ताह पहले अचानक सपा बसपा ने आपसी तालमेल कर लिया। तो क्या सपा बसपा ने ऐसा कोई वादा भाजपा से किया था कि वे आपसी गठबंधन इन सीटों पर किसी हाल मेें भी नहीं करेंगे?बल्कि भाजपा के लिये बेहतर यह हुआ कि सपा की विधानसभा चुनाव की सहयोगी कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार इन दोनों सीटों पर अलग से उतार दिया।

      क्या भाजपा को पता नहीं था कि बसपा लंबे समय से उपचुनाव में अपने प्रत्याशी उतारती ही नहीं है। अगर बसपा अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह निर्देश न भी देती कि वे भाजपा को हराने के लिये सपा के पक्ष में मतदान करें तो क्या दलित और अति पिछड़े बसपा के समर्थक मतदाता सपा की बजाये उस भाजपा को वोट दे आते जिस पर दलित विरोधी होने का वे बार बार आरोप लगाते हैंगोदी मीडिया का एक वफ़ादार वर्ग यह भी सफाई दे रहा है कि भाजपा के बूथ प्रबंधन में उत्साह न होने से उसका वोटर मतदान करने के लिये घर से निकला ही नहीं।

  वे यह भी सफाई दे रहे हैं कि यूपी के सीएम योगी के खासमखास को भाजपा ने टिकट नहीं दिया इसलिये उन्होंने गोरखपुर सीट जीतने पर जोर नहीं दिया। मीडिया और भाजपा के कुछ नेताओं का यह भी कहना है कि फूलपुर सीट पर कैशव प्रसाद मौर्य अपने परिवार के किसी सदस्य को लड़ाना चाहते थे। लेकिन ऐसा न होने पर उन्होंने सीट जीतने को कुछ नहीं किया। ऐसा ही बिहार में नीतीश कुमार के जदयू के साथ भाजपा के गठबंधन के बावजूद राजद के हाथों अररिया सीट हार जाने पर बहाने लिये जा रहे हैं।

    जबकि सच यह है कि भाजपा से जनता का मोहभंग होने लगा है। भाजपा अगर इन उपचुनाव की चेतावनी को अनसुना करेगी तो उसके हाथ से 2019 का चुनाव भी निकल जायेगा। वास्तविकता यह है कि भाजपा की जुमलेबाज़ी बयानबाज़ी और कलाबाज़ी से जनता अब संतुष्ट होने को तैयार नहीं है। वह भाजपा से उसके वादों और दावों का हिसाब मांग रही है। भाजपा के पास 4 साल बाद भी अपनी कोई खास उपलब्धि नहीं है। अलबत्ता कांग्रेस और अन्य सेकुलर दलों से नाराज़ जनता का बड़ा वर्ग अब अगर वापस भाजपा विरोधियों को वोट फिर से नहीं भी देगा तो वह तटस्थ होकर घर बैठ रहा है। भाजपा को पता होना चाहिये कि जनता का मोहभंग होने से अगर दो से चार परसेंट उसके वोटबैंंक वाले मतदाता अगर घर से चुनाव वाले दिन नहीं निकले तो उसकी सीटें 50 से 100 तक कम हो जायेंगी।

0 जिन पत्थरों को हमने अता की थीं धड़कनें,

  जब बोलने लगे तो हम ही पर बरस पड़े।।

Wednesday, 14 March 2018

श्रीदेवी

श्रीदेवी: दिखावे के पीछे की असलियत!

फ़िल्म निर्माता और निर्देशक राम गोपाल वर्मा ने जानी मानी अभिनेत्री श्रीदेवी की आकस्मिक और दुखद मौत के बाद लिखा है कि श्रीदेवी बाहर से चाहे जितनी खुश नज़र आती हों लेकिन वह अंदर से बहुत परेशान और बेचैन रहती थीं। उनकी बात में दम लगता है।

फिल्म अभिनेत्री श्रीदेवी दुनिया से कम उम्र में ही चलीं गयीं। इसका हम सबको दुख है। साथ ही हम सब इस बात से भी दुखी हैं कि उनकी मौत अचानक पानी के टब में डूबने से एक हादसे में हुयी। अब इस चर्चा पर अंतिम रूप से विराम लग चुका है कि उनकी मौत आत्महत्या या हत्या भी हो सकती है। लेकिन यह चर्चा जारी है कि क्यों ऐसी लोकप्रिय सुंदर और नामी नायिकायें इतना परेशान और तकलीफ़ में जिं़दगी गुज़ारती हैं? मुंबई की एक जानी मानी डॉक्टर भी यह कह चुकी हैं कि फिल्मी दुनिया में आने वाली अभिनेत्रियों को छोटी आयु से ही यौन शोषण तक का शिकार होना पड़ता है।

अगर कोई अभिनेत्री अपने साथ होने वाली ऐसी बेजा हरकतों का शुरू में ही विरोध करने की हिम्मत दिखाती है तो उसको फिल्मी दुनिया के लगभग सभी निर्माता निर्देशक काम देना ही बंद कर देते हैं। अभिनेत्री हंसा वाडकर अपनी आत्मकथा में ऐसी ही व्यथा विस्तार से बयान कर चुकी हैं। अभिनेत्री रिचा चड्ढा ने तो काम और पेंशन मिलते रहने की शर्त पर बहुत कुछ धमाका करने वाला बोलने का प्रस्ताव रखा है। लेकिन साफ है कि उनको न तो कोई ऐसी गारंटी देगा और न ही वह अपना मंुह खोलेंगी। अगर फिल्मी दुनिया के इतिहास पर एक सरसरी नज़र भी डाली जाये तो आप पायेंगे कि श्रीदेवी का मामला पहला या आखि़री मामला नहीं है।

अपने समय की बेहद लोकप्रिय और खूबसूरत अभिनेत्री मीना कुमारी और मध्ुाबाला के बारे में भी ऐसी बहुत सी चर्चायें आज भी चलती रहती हैं कि उनकी जिं़दगी में सबकुछ नॉर्मल नहीं था। जानकार सूत्रों का दावा है कि श्रीदेवी खुद को जवान और सुंदर दिखाने के लिये कई बार कॉस्मेटिक सर्जरी करा चुकीं थीं। वे अपने हाथों चेहरे और गर्दन की झुर्रियां छिपाने के लिये और नई फिल्मों में काम मिलते रहने के लिये भी ऐसा कराने को मजबूर थीं। सच तो यह है कि श्रीदेवी ही नहींे फिल्मी दुनिया की उम्रदराज़ होती हर अभिनेत्री खुद को लाइमलाइट में रखने के लिये दवा और ड्रग्स तक का सहारा लेने लगती हैं।

इसका नतीजा यह होता है कि कुदरत के सिस्टम में दख़ल देने से वे दौलत और शोहरत की ख़ातिर अपनी पर्सनल जिं़दगी दांव पर लगा देती हैं। वे खुद को एक्टिव और अपने समय की चुनौती बनकर उभर रहीं नई अभिनेत्रियों को टक्कर देने के लिये न केवल जानलेवा डाइटिंग शुरू कर देती हैं बल्कि घंटों नहीं कई कई दिन तक ब्यूटी पॉर्लर में बिताती हैं। यह अफ़सोस और चिंता की बात है कि आर्थिक और सामाजिक रूप से अपने पैरों पर खड़े होने के बावजूद ये अभिनेत्रियां पुरूषवादी सोच और ग्लेमर का शिकार होकर पंूजीवाद उपभोक्तावाद और भोगवाद के हाथों अपना जीवन जीते जी तबाह कर रही हैं।

इतनी समझ योग्यता और नाम होने के बाद तो कम से इन अभिनेत्रियों को समाज की अपने बारे में परंपरागत सोच को चुनौती देते हुए सुंदर और सेक्सी दिखने की बजाये साहसी और अक़्लमंद होने पर ज़ोर देना चाहिये था। लेकिन आज भी काली और बड़े दांतों वाली लड़की की शादी मुश्किल हो जाती है। साथ ही बाज़ार वाद ने लड़कियों को सौंदर्य प्रसाधनों और गोरी होने वाली क्रीम में उलझाकर उनको नक़ली मानव और प्रोडक्ट बनाया है।

अहबाब के सुलूक़ से जब वास्ता पड़ा,

शीशा तो मैं नहीं था मगर टूटना पड़ा।