Thursday, 7 March 2024

देश में कितने गरीब

80 करोड़ लोग 5 किलो अनाज पर तो देश में कितने गरीब हैं ?
0 नीति आयोग ने पहले कहा था कि देश में 11.28 प्रतिशत गरीब हैं लेकिन बाद में उसने दावा किया कि इनकी संख्या 5 प्रतिशत से अधिक नहीं है। इस अनुमान का आधार नेशनल संैपल सर्वे द्वारा प्रकाशित 2022-23 के हाउसहोल्ड कंज़म्पशन एक्सपेंडीचर सर्वे को बताया जाता है। आयोग के अनुसार शहरों में प्रति माह 6459 रू आय का 39 प्रतिशत भोजन पर  और गांवों में 3773 रू. में से 46 प्रतिशत खाने पर खर्च करने वाले लोग गरीब नहीं हैं। सवाल यह है कि अगर नीति आयोग के आंकड़े सही है तो सरकार 81.35 करोड़ लोगों को गरीब मानकर निशुल्क अनाज क्यों दे रही है? क्या मनरेगा में रजिस्टर्ड 15.4 करोड़ लोग और उज्जवला योजना में गैस पाये जो लोग एक साल में केवल 3.7 सिलेंडर ही खरीद पा रहे हैं वे अमीर हैं?        
    *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
 देश में गरीबों की वास्तविक संख्या जानने से पहले यह देखा जाये कि हमारे माननीय सांसदों की आर्थिक हालत क्या है तो पता चलता है कि संसद पर एक तरह से पूंजीपतियों या उनके प्रतिनिधियों का अघोषित अधिपत्य स्थापित होने लगा है। एडीआर यानी एसोसियेशन आॅफ़ डेमोक्रेटिक रिफाॅम्र्स ने 2023 में एक सर्वे कर बताया था कि हमारे सांसदों की औसत सम्पत्ति 38.33 करोड़ रूपये है। लोकसभा और राज्यसभा के कुल सांसदों में से 7 प्रतिशत अरबपति हैं। उधर देश के किसानों की आय औसत भारतीय से भी कम है। विडंबना यह है कि 40 प्रतिशत एमपी पर क्रिमनल केस चल रहे हैं। इनमें से जिन 25 प्रतिशत सांसदों पर बेहद संगीन अपराधिक मामले चल रहे हैं वे और भी अधिक अमीर हैं। स्वच्छ छवि वाले एमपी की संपत्ति 30 करोड़ तो अपराधिक छवि वाले एमपी की संपत्ति 50 करोड़ से अधिक है। सरकार के आयुष्मान भारत के द्वारा निशुल्क इलाज के दावों के बावजूद एनएसएसओ की रिपोर्ट बताती है कि शहरी इलाकों में 5.91 और गांवों में 7.13 प्रतिशत खर्च दवाओं पर हो रहा है। ऐसे ही शहरी आबादी जहां ईंधन पर अपनी आय का 6.26 तो गावों की आबादी 6.66 प्रतिशत खर्च करती है। 2004 से 2012 के दौरान हमारी विकास दर आज़ादी के बाद की सबसे अधिक यानी 8 प्रतिशत थी जिसमें 14 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आ गये थे। 
पहले गरीबी से बाहर आने का पैमाना लोेगों की व्यक्तिगत खपत को माना जाता था लेकिन पिछले दस साल से यूएनडीपी ने इस पैमाने को बदल दिया है। भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के गरीबी मापने के 10 पैमानों में दो अपनी तरफ से जोड़ दिये हैं। इनमें एक तो स्टैंडर्ड आॅफ लिविंग में सुधार मानते हुए परिवार में बैंक एकाउंट और महिला की डिलीवरी अस्पताल या नर्सिंग होम में होना माना गया है। ज़ाहिर है कि पिछले कुछ सालों में पीएम जनधन योजना के तहत 40 करोड़ से अधिक लोगों के खाते बैंकों में खुले हैं। इसके साथ जागरूकता बढ़ने से 80 प्रतिशत महिलायें बच्चो को जन्म देने के समय चिकित्सा संस्थानों में भर्ती होने लगी हैं। नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रहमण्यम ने 17 जुलाई 2023 को बताया था कि 2019-21 तक देश की 14.96 प्रतिशत आबादी गरीब थी यानी पांच साल में 13.5 करोड़ लोग गरीबी से बाहर आ गये। हैरत की बात यह रही कि इसके 6 माह बाद ही नीति आयोग के एक चर्चा पत्र जारी कर दावा किया कि 2022-23 तक देश में गरीबों की तादाद घटकर 11.28 प्रतिशत ही रह गयी है। आयोग ने इस तरह पिछले 9 साल में 24.82 करोड़ लोगों के निर्धनता से मुक्त होने का दावा कर दिया। 
इसके बाद फरवरी 2024 में आयोग ने देश में 5 प्रतिशत आबादी ही बीपीएल रह जाने का अनोखा दावा कर एक तरह से एक माह में ही 8 करोड़ गरीब कम होने का चमत्कार वाला एलान कर दिया। गरीबी कम होने का सीधा आधार देश की जीडीपी बढ़ना भी माना जाता है। लेकिन अगर हम कोविड लाॅकडाउन नोटबंदी और जीएसटी का असर अर्थव्यवस्था पर देखें तो करोड़ों लोगों की असंगठित क्षेत्र में नौकरियां गयीं हैं। इसके बाद गांव के वे लोग या तो कृषि की ओर लौटे या फिर मनरेगा में काम करके अपने परिवार को जैसे तैसे जीवन यापन के लिये स्वरोज़गार की तरफ रूख़ किया। इस काम के लिये उन्होंने अपने परिवार के दूसरे सदस्यों को भी अपने साथ जोड़ा जिसका आंकड़ा सरकार ने इस्तेमाल करते हुए उसकी नौकरी और उसकी भारी भरकम सेलरी को भाव न देते हुए उसके पूरे परिवार की पहले से कम आय के बावजूद रोज़गार की बढ़ी हुयी संख्या के आंकड़े जारी कर दिये। यही वजह है कि घरेलू बचत दर तेजी से गिरी है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन इस तरह के परिवार के सदस्यों के काम को जिसमें उनको कोई वेतन नहीं मिलता रोज़गार नहीं मानती है। यह भी एक तथ्य है कि जीडीपी या अर्थव्यवस्था का साइज़ बढ़ने से ही प्रति व्यक्ति आय नहीं बढ़ती क्योंकि अडानी अंबानी और आम आदमी की कुल आय जोड़कर उसको देश की कुल आबादी से भाग देकर औसत आय निकाली जाती है। 
जिससे वास्तविक स्थिति और लोगों की असली आमदनी सामने नहीं आती है। सर्वे के आंकड़े यह भी बताते हैं कि लोगों की आय और खर्च लगभग उतना ही है जितने अनुपात में पहले था। महंगाई और बेरोज़गारी की बढ़ती दर को देखा जाये तो बढ़ी आय और घरों में होने वाले नये खर्च का समीकरण मेल नहीं खाता है। आर्थिक विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि चूंकि यह सर्वे 11 साल बाद आया है जिससे इसके आंकड़े काफी सीमा तक बढ़े हुए लगते हैं लेकिन उस अनुपात में नहीं बढ़े हैं जिस हिसाब से किसी बढ़ती हुयी प्रगतिशील और सकारात्मक समावेशी इकाॅनोमी में यह प्राकृतिक रूप से स्वयं ही बढ़ने चाहिये। 2017-18 में ऐसी ही हकीकत का आईना दिखाती सर्वे रिपोर्ट को सरकार ने मानने से मना कर दिया था। इसका मतलब यह माना जा सकता है कि सरकार गरीबी को नापने में भी वही खेल कर रही है जो वह अन्य क्षेत्रा में आंकड़ों की बाज़ीगरी अकसर करती रही है। दुष्यंत का शेर याद आ रहा है-
0 तेरा निज़ाम है सिल दे ज़बान शायर की,
  यह एहतियात ज़रूरी है इस बहर के लिये।।
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार ैके संपादक हैं।*

Saturday, 2 March 2024

पाक सेना के पास एक देश...

*सब देशों के पास एक सेना है पाक में सेना के पास एक देश है!* 
0 कहते हैं कि पाकिस्तान को तीन ए यानी अल्लाह अमेरिका और आर्मी चलाते हंै। कुछ समय पहले वहां के सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सेना का काम देश की रक्षा करना है वह धंधा क्यों करती है? आंकड़ेे बताते हैं कि पाक आर्मी की प्रोपर्टी भारत के अडानी अंबानी से भी अधिक है। सवाल यह है कि सेना को तो केवल वेतन मिलता है तो यह अकूत धन सम्पत्ति उद्योग ध्ंाध्ेा उसके पास कहां से आये? जवाब है कि पाक बनने के 77 साल में से लगभग 50 साल सेना का राज रहा है। उसके आज तक बने 29 प्रधानमंत्रियों में से सेना ने किसी का भी कार्यकाल पूरा नहीं होने दिया। उसकी कुल खेती लायक ज़मीन में से तीन चैथाई पर लगभग ढाई सौ सेना अफसरों पूर्व सामंतों और नवाबों जैसे बड़े लोगों का कब्ज़ा है।          
  -इक़बाल हिंदुस्तानी
1947 में जब पाक बना तो उसको अखंड भारत की सेना का 33 प्रतिशत जमा पंूजी का 400 करोड़ में से 75 करोड़ और लगभग एक हज़ार इंडस्ट्री में से 34 उद्योग दिया जाना तय हुआ था। योजना के अनुसार उसको बाकी सब चीज़ों के अलावा राजस्व में से 20 करोड़ देकर शेष 55 करोड़ किश्तों में दिया जाना था। लेकिन उसकी सेना ने धोखा देकर कबायली हमले के नाम पर जब कश्मीर में घुसपैठ कर दी तो भारत सरकार ने बाकी रकम देने से मना कर दिया। बाद में गांधी जी ने पीएम नेहरू को वादे के अनुसार पाक को बाकी रकम देने को मजबूर कर दिया। पाक ने उस रकम से हथियार खरीदे और भारत ने प्रोडक्शन पर फोकस करना शुरू किया। 1964 मंे पाक फौज ने पहला चैरिटेबिल ट्रस्ट बनाकर देश की रक्षा की अपनी बुनियादी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़कर जीवन रक्षक ज़रूरी घरेलू सामान बेचना शुरू कर दिया। भारत के साथ 1971 की जंग के बाद उसके भाव और भी बढ़ गये। पाक सेना ने देश की रक्षा के नाम पर देश का ख़ज़ाना जमकर हड़पा। सेना ने अपना कारोबार टैक्स मुक्त कर लिया। इसके बाद जब जब सत्ता में सेना रही उसने ऐसे कानून खुद बनाये या अपनी कठपुतली सरकारों से बनवाये जिससे वह जीवन के हर क्षेत्र में यानी गैस पेट्रोल डीज़ल ज़मीन मकान जे़वर तेल आटा नमक मंझन सीमेंट ईंट साबुन मीट सोलर अस्पताल मेडिसिन फल सब्जी खाद और घरेलू सामान बेचने से लेकर पाक का अंतरिक्ष का काम भी सेना ने खुद ठेके पर लेकर सब में अपनी मोनोपोली बना ली है। 
इन सब कामों में सेना 20 से 30 प्रतिशत का भारी मुनाफा वसूल रही है। रिटायर होने के बाद सेना के मेजर जनरल से लेकर एक मामूली सिपाही तक को पेंशन के अलावा इस खुली लूट में तय हिस्सा जीवनभर मिलता है। पाक के कुल बजट 9500 बिलियन डालर में अकेले सेना का हिस्सा 1500 बिलियन डालर का है। 2022-23 में सेना के 100 बडे़ अधिकारियों का बिजनेस नेटवर्क 3500 करोड़ डाॅलर का था। सेना का कुल कारोबार एक लाख करोड़ डालर से अधिक का है। हालत यह है कि पिछले पाक जनरल कमर जावेद बाजवा की पत्नी की सम्पत्ति 2016 में शून्य से 2022 में 220 करोड़ हो गयी। बाजवा परिवार का कुल कारोबार 1270 करोड़ का है। आज पाक सेना 50 से अधिक हाउसिंग प्रोजेक्ट लाखों एकड़ ज़मीन निशुल्क कब्ज़ाकर चला रही है। यही वजह है कि पाक सेना भारत से रिश्ते अच्छे नहीं होने देना चाहती। जब भी कोई पाक सरकार भारत से मेल मिलाप की बात शुरू करती है। पाक सेना कभी मुंबई हमला कभी कारगिल हमला तो कभी पठानकोट पर धावा बोलकर खेल बिगाड़ देती है। यहां तक कि वह भारत के करीब आने वाली पाक सरकारों का तख्ता पलट तक कर देती है। रेटिंग एजेंसी मूडीज़ का कहना है कि पाक की कर्ज़ चुकाने की क्षमता आज दुनिया के किसी भी आज़ाद और संप्रभु देश के मुकाबले सबसे कमज़ोर है। उसके कर्ज़ का ब्याज भुगतान ही कुल आने वाले राजस्व का आधा है। 
2017 का विदेशी कर्ज़ 66 से बढ़कर 100 बिलियन हो चुका है। डाॅलर की कीमत 267 रूपये हो चुकी है जिससे पाक का कर्ज़ बिना और लिये ही बढ़ता जा रहा है। साथ ही इससे महंगाई को भी पर लग गये हैं। जो 40 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। विदेशी मुद्रा भंडार मात्र 3.67 अरब डालर बचा है। आतंकवाद उग्रवाद चरमपंथ कट्टरपंथ करप्शन सेना का बार बार चुनी हुयी सरकार का तख़्ता पलट या कठपुतली सरकार आर्थिक गैर बराबरी विदेश में काम करने वाले पाकिस्तानियों पर अर्थव्यवस्था का टिका होना आज़ादी के दशकों बाद तक अपना संविधान ना बना पाना लोकतंत्र मज़बूत ना होना सेना पर बजट का बड़ा हिस्सा खर्च करना अमेरिका और खाड़ी के देशों से मिलने वाली बड़ी वित्तीय मदद का बड़ा हिस्सा तालिबान जैसे आतंकी संगठनों को पैदा कर पालना पोसना और भारत की तरह ज़मींदारी उन्मूलन ना कर देश में केवल बेहद गरीब और बेहद अमीर दो ही वर्ग आज तक बने रहना भी पाक की तबाही का कारण बना है। 
ऐशियन लाइट की रिपोर्ट बताती है कि पाक ने जेहाद के नाम पर अमेरिका से मोटी रकम हथियार और राजनीतिक मदद लेकर पहले 1979 में रूस को अफगानिस्तान से निकालने कश्मीर को आज़ाद कराने के दावे को लेकर और बाद में 2001 में ओसामा बिन लादेन के अमेरिका पर हवाई हमले के बाद अलकायदा को ख़त्म करने को लेकर लोहे को लोहे से काटने के लिये अपनी सरज़मीं पर दहशतगर्द पैदा करने का शातिर धंधा अमेरिकी से भारी रकम वसूल करके किया गया। अब जब ये अभियान खत्म हो चुका है तो पाक को अमेरिकी और अन्य मुल्कों की मदद मिलनी तो बंद हो ही गयी है। उसको 400 मिलियन डालर से मदद घटते घटते 55 मिलियन डालर रह गयी। साथ ही उसने जिस तालिबान के जिन्न को बोतल से निकाला था। वह आज अफगानिस्तान में अमेरिकी मिशन पूरा होने पर पाकिस्तान के जी का जंजाल बन गया है। ऐसा लगता है कि आज पाक को आर्मी ही चला रही है क्योंकि यह उसकी रोटी रोज़ी का सवाल बन चुका है। अल्लाह अमेरिका तो उसको उसके हाल पर छोड़ चुके हैं। लेकिन उसका नया दोस्त चीन उसको कर्ज के जाल में फंसाकर उसका क्या हश्र करने जा रहा है यह उसकी सरकार तो क्या उसकी लालची खुदगर्ज और जालिम सेना को भी एहसास नहीं है। अल्लामा इक़बाल का यह शेर आज पाक सेना पर फिट बैठता है-
0 वतन की फ़िक्र नादां मुसीबत आने वाली है,
   तेरी बरबादियों के मश्वरे हैं आसमानों में।।
 *नोट- लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ एडिटर और नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

Sunday, 11 February 2024

अजब गजब घोटाला...

*अजब गज़ब ठगी: ‘आॅल इंडिया प्रेगनेंट जाॅब’ से करोड़ों का घोटाला!* 

0 मशहूर ठग नटवरलाल ने एक बार कहा था कि जब तक इंसान में लालच है उसका ठगी का ध्ंाधा चलता रहेगा। बिहार के नवादा के एक ठग मुन्ना ने लाखांे लोगों को करोड़ों का चूना लगाकर ठगी का नायाब नमूना पेश कर नटवरलाल की यह बात एक बार फिर से सही साबित कर दी है। मुन्ना ने फेसबुक पर एक अजीब ही जाॅब निकाल दिया। उसने लिखा जो महिलायें शादी के बाद भी किसी वजह से मां नहीं बन सकीं   और अपने पति से अलग हो चुकी हैं। उनको गर्भवती करने के लिये कुछ युवाओं की आवश्यकता है। इन युवाओं को उन सुंदर महिलाओं से सैक्स करना होगा। जो युवा प्रेगनेंट करने मंे कामयाब रहेंगे उनको दस से 13 लाख और जो असफल रहेंगे उनको 5 लाख दिये जायेंगे। यह आॅफर देखते ही लोगों की लाइन लग गयी और वे लुट गये...।    
   -इक़बाल हिंदुस्तानी
बिहार के नवादा का एक कम पढ़ा लिखा सीधा सादा गरीब युवा मुन्ना राजस्थान के मेवाड़ काम की तलाश में गया था। उसने घरवालों को बताया उसकी नौकरी लग गयी है। वह पांच साल वहां रहा उसको नौकरी नहीं मिली लेकिन कुछ छोटा मोटा काम करने लगा। इस दौरान उसका वास्ता जामतारा के साइबर क्राइम गैंग से पड़ गया। जिससे उसने शाॅर्टकट से बहुत अधिक पैसा कमाने के गुर सीख लिये। इसके बाद वह अपने गांव नवादा वापस आ गया। यहां उसने साइबर क्राइम वालों से मिलकर बनाई योजना के अनुसार मछली पालन के लिये पुराना तालाब सही किया। उसके बाद तालाब के पास पड़े खंडरनुमा घर को ठीक कर दो मंज़िला बनाया। उस मकान के पास एक मचान बनाया। जिस पर दस बारह लोग आराम से बैठ सकते थे। इसका मकसद उसकी तरफ आने वाले लोगों पर दूर से ही चंबल के डाकुओं की तरह नज़र रखना था। साथ ही जो लगभग दो दर्जन लड़के इस नई ठगी की योजना के लिये उसने अपने साथ जोड़े थे।  
उनको इस उूंची मचान पर बैठाकर मोबाइल से लोगों को झांसे में लेकर ठगना था। जिससे मोबाइल टाॅवर से खुले में सिग्नल ठीक से आते रहें। इन सभी लड़कों को ठगी से होने वाली लाखों की कमाई से 30 प्रतिशत कमीशन दिया जाना तय किया गया था। दर्जनों मोबाइल सैंकड़ों फर्जी नाम के सिम तमाम चार्जर और प्रिंटर वगैरा मुन्ना ने खुद लगाये। गांव छोटा सा था। आबादी कम थी। अपराध ना के बराबर होते थे। लिहाज़ा पुलिस कभी उस गांव में आती नहीं थी। इसके बाद जब सब तैयारी हो गयी। मुन्ना ने फेसबुक पर खूबसूरत महिलाओं के फोटो के साथ एक एड पोस्ट किया। जिसमें एक आदमी को सेना की फर्जी वर्दी में दिखाया गया था। कुछ महिलाओं को जाॅब पाये लोगों के द्वारा गर्भवती होने का दावा करते हुए उनका फोटो भी अपलोड किया गया था। एड का शीर्षक था- आॅल इंडिया प्रेगनेंट जाॅब। एड के साथ संपर्क करने को मोबाइल नंबर भी दिया गया था। 
कंपनी को रजिस्टर्ड बताते हुए यह दावा भी किया गया था कि हम जो काम कर रहे हैं उसका मकसद समाजसेवा भी है। कुछ शर्तें भी थीं। जैसे उन लोगों को ही नौकरी दी जायेगी जिनके परिवार के लोग जैसे पत्नी माता पिता या भाई बहन इस जाॅब से सहमत होंगे। गर्भवती की जाने वाली महिला के होने वाले बच्चे पर उस युवा का कोई अधिकार नहीं होगा जिससे शारिरिक संबंध बनाकर वह प्रेगनेंट हुयी है। उन युवाओं से इस तरह का शपथ पत्र आधार कार्ड पहचान पत्र और दूसरे ज़रूरी सरकारी दस्तावेज़ लिये जायेंगे। ठगी का असली खेल इसके बाद शुरू होता था। नौकरी के लिये 799 रूपये फीस जमा रजिस्टेªशन आॅनलाइन साइबर कैपफे से बताये गये दूसरे कागजों के साथ जमा करनी होगी। इसके बाद कंपनी से आवेदनकर्ता को काॅल आती थी। उससे कहा जाता था कि आपके शहर में अगर थ्री स्टार हाॅटल है तो महिलाओं को उसी होटल में भेजेंगे। नहीं तो आपको मुंबई जाना होगा। जिसका आने जाने होटल खाना पीना सब खर्च कंपनी करेगी। 
लेकिन किसी भी महिला से सेक्स करने से पहले आपको सीमन यानी वीर्य टैस्ट के लिये 2500 रूपये की फीस जमा करनी होगी। अगर रिज़ल्ट पाॅजिटिव आया तो आपको आगे भेजा जायेगा। इंसान तो इंसान है। उसको सपने आने लगते हैं। नौकरी बढ़िया है। 799 और 2500 रूपये कोई बड़ी रकम नहीं है। खूबसूरत महिलाओं से सेक्स करने का हसीने मौका दिख रहा है। साथ ही कंपनी के खर्च पर मंुबई की सैर भी हो जायेगी। इसके साथ ही अगर बच्चे की चाह रखने वाली महिला गर्भवती हो गयी तो 10 से 13 लाख जैसी बड़ी रकम नहीं तो कम से कम 5 लाख न्यूनतम तो मिलने ही हैं। इससे शानदार और बेहतरीन नौकरी शायद ही दुनिया में किसी को मिली हो? इसके बाद आवेदक के मोबाइल में 472000 का बैंक में के्रडिट का फर्जी मैसेज भेजा जाता है। आवेदक को काॅल कर बताया जाता है कि आपके खाते में पांच लाख रूपये भेज दिये गये हैं। लेकिन बैंक यह रकम तब के्रडिट करेगा जब आप 28000 जीएसटी हमारे बताये गये सरकारी खाते में जमा करा देंगे। 
बंदा अब इतना उतावला हो चुका है कि वह कहीं से भी कैसे भी जुगाड़कर 28000 की रकम बताये गये खाते में साइबर कैफे से भेज देता है। इसके बाद न तो पांच लाख आते हैं और ना ही आॅल इंडिया प्रेगनेंट जाॅब कंपनी का फोन अटेंड होता है। यूपी बिहार राजस्थान हरियाणा झारखंड पंजाब बंगाल और उड़ीसा सहित कई प्रदेशों के लाखों लोगों से करोड़ों रूपये ठगकर यह कंपनी चुप्पी साध लेती है। जो ठगे गये वे बदनामी और शर्म से ना तो किसी को बताते हैं और ना ही पुलिस के पास शिकायत करने जाते हैं। नवादा का ही कोई आदमी साइबर क्राइम पुलिस के एक कांस्टेबिल को यह जानकारी देता है। वह कांस्टेबिल अपने बड़े अधिकारियों को यह घोटाला बताता है।  पुलिस उस गांव में छापा मारकर 8 लोगों को रंगे हाथ पकड़ लेती है। वहां से मोबाइल सिम चार्जर प्रिंटर और दर्जनों दस्तावेज़ भी बरामद करती है। लेकिन पुलिस के तमाम प्रयास के बावजूद केवल एक शिकायतकर्ता अपनी पहचान गोपनीय रखने की शर्त पर सामने आ सका है। 
कोई गवाह और ठोस सबूत ना मिलने की वजह से पुलिस की जांच अभी अधर मंे लटकी है लेकिन असली सवाल यह है कि क्या लोगों को यह मामूली सी बात भी समझ में नहीं आती कि ऐसे एड निकालकर महिलाओं को खुलेआम प्रेगनेंट करने का आॅफर देना और लाखों रूपये की रकम देना कानूनी समाजी और नैतिक रूप से किसी तरह भी संभव नहीं है? लेकिन लोग हैं कि लालच में आयेदिन किसी ना किसी नये स्कैम मंे लगातार ठगे जाने को तैयार बैठे रहते हैं।      

 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 1 February 2024

बजट 2024

आम बजट: पूंजीवाद मंे आर्थिक असमानता बढ़ना स्वाभाविक है ?
 _0 गोदी मीडिया मोदी सरकार और संघ परिवार लगातार यह प्रचार कर रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है। इस साल चुनाव होने की वजह से पूर्ण बजट पेश ना कर अंतरिम बजट पास किया जायेगा लेकिन यह भी उसी दिशा में एक और क़दम होगा जिसमें यह सरकार पिछले नौ सालों से चलती आ रही है। लाख जीडीपी जीएसटी और अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ने का दावा किया जाये लेकिन आंकड़े गवाह है कि देश की कुल आय का 57 प्रतिशत 10 प्रतिशत लोगों के पास है। उसमें भी 22 प्रतिशत आय अकेले 1 प्रतिशत के पास है। ऐसे ही केवल 7 करोड़ भारतीय ऐसे हैं जिनकी सालाना आमदनी 8 लाख के आसपास है। 81.5 करोड़ लोग सरकार द्वारा दिये जा रहे निशुल्क अनाज पर निर्भर हैं।_    
 *-इक़बाल हिंदुस्तानी*    
      अंतरिम बजट से लोकलुभावन योजनाओं की उम्मीद रखना वैसे तो मुनासिब नहीं था लेकिन परेशान जनता है कि मानो उसका दिल है कि मानता नहीं। नौकरीपेशा को आयकर में कोई छूट नहीं मिली लेकिन कॉरपोरेट को 22 की जगह टैक्स 21% ज़रूर कर दिया गया। ये विरोधाभास ही कहा जायेगा कि इससे रोज़गार बढ़ने की कोई आशा नहीं है। हालांकि कृषि क्षेत्र फसल बीमा योजना और किसान क्रेडिट कार्ड की सीमा को बढ़ाया गया लेकिन इससे शायद ही किसान खुश हो सके? डिजिटल इंडिया और महिला सशक्तिकरण के लिए कई एलान किए गए हैं लेकिन किसी वर्ग के लिए इस बजट में कुछ भी ठोस नज़र नहीं आता है। गोल्डमैन सैक्स की रिपोर्ट के अनुसार भारत में जिन 7 करोड़ लोगों की आमदनी सालाना 8 लाख के आसपास है। उनकी तादाद 2026 तक 10 करोड़ हो सकती है। लेकिन सवाल यह है कि देश की कुल जनसंख्या में से बाकी बचे 133 करोड़ लोगों की चर्चा चिंता और भलाई की बात क्यों नहीं की जा रही? दरअसल गोल्डमैन सैक्स उन मुट्ठीभर लोगों की चर्चा इसलिये करता है क्योंकि वे बेहद अमीर हैं। ये 7 करोड़ लोग ही आज भारत की समृध््िद उन्नति और प्रगति का प्रतीक बने हुए हैं। ये थोड़े से लोग खूब कमाते हैं, खूब जमकर खर्च करते हैं, यही थोक मंे निवेश भी करते हैं, यही वर्ग दिखवा और फालतू खर्च भी करता है, यही तबका गोल्डमैन सैक्स जैसे अमीरों के बैंक में ग्राहक बनकर जमा कर बचत भी करता है तो ज़ाहिर सी बात है कि बैंक की रिपोर्ट उनकी ही चर्चा करेगी। भारत में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय आय 1,70,000 लगभग 70 करोड़ भारतीयों की औसत आय 3,87,000 जबकि सम्पन्न वर्ग की आमदनी 8,40,000 है। आर्थिक असमानता की हालत यह है कि नीचे के 10 से 20 प्रतिशत लोगों की मासिक आमदनी जहां 12000 है वहीं सबसे नीचे जीवन जी रहे 10 प्रतिशत भारतीयों की आय मात्र 6000 तक मानी जाती है। बाकी के 20 से 50 प्रतिशत लोग नीचे के 10 से 20 प्रतिशत वाले कम आय वाले लोगों से मामूली ही बेहतर हालत मेें हैं।
संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों से हिसाब से 22 करोड़ तो नीति आयोग के अनुसार लगभग 16 करोड़ भारतीय गरीबी रेखा से नीचे जीवन गुज़ार रहे हैं। 7 करोड़ बेहद अमीर लोगों द्वारा सफलता का समारोह मनाये जाने पर किसी को एतराज़ नहीं होगा लेकिन सबसे गरीब 22 करोड़ भारतीयों की चिंता कौन करेगा? इस आंकड़े को मनरेगा के तहत रोज़गार की तलाश कर रहे 15 करोड़ लोगों के रजिस्ट्रेशन से भी समझा जा सकता है। जिनको सरकार ने साल में कम से कम 100 दिन का रोज़गार देने का वादा करने के बावजूद मात्र 50 दिन का औसत काम ही दिया है। जिनको रसोई गैस का निशुल्क कनेक्शन दिया गया था। वे साल में चार रिफिल भी नहीं भरवा पा रहे हैं। एक से दो एकड़ भूमि वाले किसान जो 10 करोड़ से अधिक थे, और पीएम किसान योजना में सम्मान निधि पा रहे थे, नवंबर 2023 घटकर 8 करोड़ के आसपास रह गये हैं।       हमारा देश सरकार के दावों के अनुसार 8 से 9 प्रतिशत की स्पीड से नहीं बढ़ रहा है लेकिन अगर हम 7 की जगह 6 प्रतिशत की जीडीपी औसत बढ़त भी बनाये रख सके तो तीन साल बाद 2027 तक जर्मनी और जापान को पीछे छोड़कर विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकते हैं। इसकी वजह यह होगी कि हमारी इकाॅनोमी तब तक 38 तो जापान और जर्मनी की 15 प्रतिशत ही बढे़गी। 
इन आंकड़ों से हम यह आसानी से समझ सकते हैं कि किसी देश की जीडीपी बढ़ने में उसकी सरकार जनसंख्या और दूसरे देशों की मंदी व कम स्पीड और प्रति व्यक्ति आय की क्या भूमिका होती है? हमारे देश में 35 करोड़ लोगों को पूरा पौष्टिक भोजन भी उपलब्ध नहीं है। 81.5 करोड़ नागरिकों को सरकार 5 किलो अनाज देकर जीवन जीने में सहायता करने को मजबूर है। देश की निचली 50 प्रतिशत आबादी की सालाना आमदनी 50 हज़ार रूपये होने के बावजूद वो कुल जीएसटी का 64 प्रतिशत चुका रही है। जबकि सबसे अमीर 10 प्रतिशत इसमें मात्र 3 प्रतिशत भागीदारी कर रहे हैं। जीएसटी हर साल हर माह पहले से अधिक बढ़ने का दावा भी सरकार अपनी उपलब्धि के तौर पर करती है। जबकि जानकार बताते हैं कि इसका बड़ा कारण तेज़ी से बढ़ती महंगाई और नित नये सामान मदों और सेवाओं पर लगाये जाने वाला कर भी है। महंगाई बढ़ाने में खुद सरकार का पेट्रोलियम पदार्थों रसोई गैस और चुनचुनकर उपभोक्ता पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाना या कर की दरें लगातार बढ़ाना भी हैै। जीडीपी प्रोडक्शन का पैमाना माना जाता है। लेकिन यह उपभोग का माप भी है। जब आप कन्ज्यूमर की एक विशाल गिनती लेकर उसे एक मामूली राशि से गुणा करेंगे तो एक बहुत बड़ी संख्या आती है। 
अगर क्रय मूल्य समता यानी पीपीपी के आधार पर देखा जाये तो हमारी यह 2100 अमेरिकी डाॅलर है। जबकि यूके की 49,200 और अमेरिका की 70,000 है। अगर देश के लोग गरीब हैं तो दुनिया में जीडीपी पांचवे तीसरे नंबर पर ही नहीं नंबर एक हो जाने पर भी क्या हासिल होगा? यह एक तरह से भोली सीधी जनता को गुमराह करने का एक राजनीतिक झांसा ही है। सच तो यह है कि मोदी सरकार की नोटबंदी देशबंदी और जीएसटी बिना विशेषज्ञों की सलाह लिये बिना सोचे समझे और जल्दबाज़ी में लागू करने से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहंुचा है जिससे यह वर्तमान में जहां खुद पहंुचने वाली थी उससे भी पीछे रह गयी है। इसके साथ ही यह भी तथ्य है कि जिस देश में शांति भाईचारा समानता निष्पक्षता धर्मनिर्पेक्षता न्याय नहीं होगा वहां शांति नहीं रह सकती और जब शांति नहीं होगी तो ना विदेशी निवेश आयेगा और ना ही स्थानीय स्वदेशी कारोबार से अर्थव्यवस्था बढे़गी। इसलिये ज़रूरी है कि हम सब भारतीय देशहित मंे आपस में मिलजुलकर प्यार अमनचैन और भाईचारे से रहें साथ ही सरकार अधिक अधिक लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराये जिससे हर नागरिक आत्मसम्मान के साथ बिना सरकारी सहायता जीवन जी सके।
 (नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ एडिटर हैं।)

Thursday, 18 January 2024

संविधान दिवस

संविधान दिवस मनाने से नहीं अमल करने से बचेगा लोकतंत्र!

 _0 कुछ लोगों को लगता है कि साल में एक दिन 26 जनवरी को हम अगर संविधान दिवस मनाते हैं तो इससे हमारे देश में लोकतंत्र सुरक्षित है। एक वर्ग है जिसको लगता है कि चुनाव जीतने या किसी पद पर आसीन होने पर अगर संविधान की शपथ ली है तो देश में गणतंत्र है। अनेक व्यक्तियांे का एक और समूह है जिसको यह खुशफहमी है कि पांच साल में एक बार अगर हम मतदान कर रहे हैं तो देश में जनतंत्र है। लेकिन सच यह है कि जीवंत लोकतंत्र के लिये समान अवसर वाला विपक्ष अभिव्यक्ति की आज़ादी के साथ मीडिया बिना सरकार के दबाव के काम करने वाली स्वतंत्र न्यायपालिका कानून के हिसाब से निष्पक्ष काम करने वाली पुलिस व प्रशासन अनिवार्य हैं। क्या ऐसा है?_    
 *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
देश स्वतंत्र होने के बाद से ही कांग्रेस लोकतांत्रिक तीरके से सरकार चलाने की बजाये हाईकमान कल्चर की ओर उन्मुख होने लगी थी। जब इंदिरा गांधी पीएम बनी तो यह मनमानी और तेज़ी से बढ़ी और राजीव गांधी के पीएम बनने के बाद तो इस परिपार्टी को पर लग गये। इसके बाद बीच बीच में जब जब जनता पार्टी जनता दल और संयुक्त मोर्चा की विपक्षी सरकारें बनी वे अति लोकतंत्र या कहंे अपने अंतरविरोध के चलते कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। इसके बाद एनडीए और यूपीए की गठबंधन सरकारों का दौर आया लेकिन इनमंे भी सबसे बड़े दल के हाईकमान और आरएसएस का गैर संवैधानिक दख़ल लगातार बना रहा। लेकिन 2014 के बाद जब भाजपा के बहुमत की मोदी सरकार बनी तो कहानी पूरी तरह से संघ और मादी के हाथों लिखी जाने लगी। कहने को आरएसएस स्वयं को सांस्कृतिक यानी गैर राजनीतिक संगठन होने का दावा करता है लेकिन सबको पता है कि आज भाजपा को संघ ही नियंत्रित करता है। 
संविधान कहता है कि हमारा देश संसदीय प्रणाली से चलेगा। संसद में जिसके पास आधे से अधिक सांसद होंगे वे अपना नेता चुनेंगे। इसके बाद राष्ट्रपति उसको पीएम की शपथ दिलायेंगे। लेकिन भाजपा ने चुनाव से पहले ही पीएम पद का दावेदार मोदी को घोषित कर दिया था। यानी उसने संसदीय चुनाव को व्यवहारिक रूप से एक तरह से राष्ट्रपति प्रणाली में बदल दिया। हद यह हो गयी कि पीएम मोदी राज्यों में होने वाले चुनावों में अपनी छवि पर वोट मांगने लगे। जबकि सबको पता होता है कि किसी भी स्टेट में भाजपा के जीतने पर भी मोदी सीएम नहीं बनेंगे। ऐसे ही हमारा संविधान धर्म जाति और क्षेत्र से उूपर उठकर सेकुलर राष्ट्र की बात करता है लेकिन व्यवहार में हम देख रहे हैं कि आज देश में क्या हो रहा है? किस तरह हो रहा है? कैसे केवल विपक्ष गरीब कमज़ोर दलित आदिवासी और अल्पसंख्यकों को टारगेट किया जा रहा है? किस बेशर्मी से मीडिया सरकार की गोद में बैठा है? कैसे कोर्ट चुनाव आयोग सतर्कता आयोग अनुसूचित जाति आयोग मानवधिकार आयोग महिला आयोग अल्पसंख्यक आयोग आयकर विभाग सीबीआई और ईडी जैसी संवैधानिक स्वायत्त संस्थायें सरकार के इशारे पर काम करती नज़र आती हैं? 
सरकार ने विपक्ष के लिये लेविल प्लेयिंग फील्ड ही खत्म कर दी है। वह विपक्ष को गांधी जी के तीन बंदरों में बदलना चाहती है जो देखना बोलना और सुनना बंद कर दे। उसे संसद में बोलने प्रश्न उठाने और सरकार को घेरने का पहले की तरह संवैधानिक अधिकार समान रूप से नहीं देने का आरोप विपक्ष लगातार लगा रहा है। यहां तक कि सरकार का कार्यकाल खत्म होेन जा रहा है लेकिन आज तक विपक्ष का राज्यसभा में डिप्टी चेयरमैन तक नहीं बना है। पक्षपात की हालत यह है कि संसद टीवी विपक्ष के सांसदों को बोलते हुए अकसर दिखाने से परहेज़ करता है। उसका रूख़ सत्ताधरी दल या संसद की इमारत की तरफ ही अधिकतर देखा जाता है। ऐसे ही सरकार ने बिना विपक्ष को विश्वास में लिये बिना सर्वदलीय बैठक बुलाये और बिना संसद में विशेष चर्चा के चार घंटे के नोटिस पर नोट बंदी फिर देशबंदी और आननफानन में जीएसटी लागू कर दिया। 
किसानों के खिलाफ बिना उनसे चर्चा किये तीन कड़े कानून पास कर दिये गये जबकि ज़बरदस्त विरोध के बाद उनको वापस लेना पड़ा। यही वजह थी कि पांच साल में जीएसटी में 129 संशोधन और 741 नई अधिसूचनायें जारी करनी पड़ीं। डाटा प्रोटैक्शन एक्ट मात्र 52 और 67 मिनट की औपचारिक चर्चा के बाद लोकसभा और राज्यसभा से पास कर दिया गया जबकि इन पर क्रमशः 9 और 7 सांसद ही चर्चा में हिस्सा ले पाये। इसी तरह तीन अपराधिक कानून जल्दबाजी में संसद में पास कर दिये गये। यह ऐसे समय किया गया जब संसद से 146 विपक्षी सांसद निलंबित थे। ये लगभग 34 करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसा लगा मानो सरकार इस मौके का इंतज़ार कर रही थी। इस मामले में वरिष्ठ कांग्रेस नेता चिदंबरम के नेतृत्व में बनी संसदीय समिति के किसी भी सुझाव या आपत्ति पर सरकार ने कान नहीं दिये।   
ऐसे ही ड्राइवरों के खिलाफ हिट एंड रन को लेकर बेहद खतरनाक कानून बना दिया गया जो उनकी बार बार बात सुने जाने की मांग को नकारने से आंदोलन के बाद सरकार को घुटने टेकने पड़े। संविधान से चलने वाले किसी लोकतांत्रिक देश में ऐसे मनमाने तानाशाह और एकतरफा कानून कैसे पास किये जा सकते हैं? प्रिजन स्टेटिक्स आॅफ इंडिया रिपोर्ट 2021 बताती है कि जेलों में बंद कुल लोगों में 77 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं। विपक्षी राज्यों सरकारों के विध्ेायक राज्यपाल पास नहीं करते हैं। केरल और पंजाब सरकारें इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ने को मजबूर हैं। विपक्षी सरकारें गिराकर भाजपा के समर्थन या उसकी अपनी बनी सरकारों के स्पीकर दलबदल कानून पर सालों तक कोई निर्णय ही नहीं देते हैं। 2014 से पहले किसी भी नये कानून पर जनता से पब्लिक डोमेन में आपत्ति विचार और सुझाव मांगे जाते थे। वह सिलसिला भी अब बंद सा हो गया है।  पहले 72 प्रतिशत विध्ेायक संसदीय समिति के पास विचार के लिये भेजे जाते थे। 
अब मात्र 16 प्रतिशत कानूनों के मामले में ही ऐसा होता है। उसमें भी अधिकांश में मोदी सरकार उन सुझावों को अनदेखा कर देती है क्योंकि ऐसी संसदीय समिति में विपक्ष भी शामिल होता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा निरस्त किये गये राजद्रोह कानून को खत्म कर बैकडोर से उससे भी खतरनाक देशद्रोह कानून लाया गया है। देश को पुलिस स्टेट बनाने के विपक्ष के आरोपों के बीच पुलिस को किसी को भी हिरासत में लेकर 15 दिन की बजाये 90 दिन तक कस्टडी में रखने का अधिकार दिया जा रहा है। लेख लंबा हो रहा है वर्ना यहां ऐसे अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनसे ऐसा लगता है कि सरकार संविधान को पवित्र ग्रंथ मानकर उसको सम्मान का  दिखावा अधिक कर रही है जबकि उस पर अमल नहीं हुआ तो हमारा लोकतंत्र कमज़ोर होता जायेगा।      

 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 11 January 2024

ईवीएम/वीवीपेट

इवीएम पर विपक्ष की आशंकायें दूर क्यों नहीं करता चुनाव आयोग? 
 _0 किसी भी देश में लोकतंत्र के लिये चुनाव होना अनिवार्य है। साथ ही चुनाव की निष्पक्षता और सबको समान अवसर उपलब्ध कराना भी चुनाव आयोग की ज़िम्मेदारी होती है। इतना ही नहीं चुनाव की निष्पक्षता पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाये रखना सरकार का संवैधानिक उत्तरदायित्व है। लेकिन जिस मनमाने ढंग से पिछले दिनों सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को चुनाव आयुक्त चुनने वाली कमैटी से बाहर कर उनकी जगह एक वरिष्ठ मंत्री मनोनीत करने का कानून बनाया जिसमें पीएम और विपक्ष का नेता दूसरे दो सदस्य होते हैं, उससे यह प्रक्रिया शक के दायरे में आ गयी है। इसके साथ ही विपक्ष जिस तरह से इवीएम पर बार बार उंगली उठा रहा है, वह भी हमारे संविधान लोकतंत्र और चुनाव आयोग की ईमानदारी के लिये चिंता का विषय है।_    
    *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
     चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार को पिछले दिनों इंडिया घटक के सबसे बड़े दल कांगे्रस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने एक पत्र लिखकर इवीएम और वीवीपेट पर चर्चा के लिये समय मांगा था। लेकिन चुनाव आयोग ने उनकी बात सुनकर चुनाव व्यवस्था में कोई आमूलचूल परिवर्तन तो दूर की बात है। उनको अपने विचार रखने का अवसर तक देना गवाराह नहीं किया। दरअसल इंडिया गठबंधन सभी इवीएम का सौ प्रतिशत वीवीपेट से मिलान की व्यवस्था चाहता है। वीवीपेट यानी वोटर वेरिफियेबिल पेपर आॅडिट ट्रायल वो सिस्टम है जिसमें मतदाता जब अपना वोट इलैक्ट्रानिक वोटिंग मशीन में बटन दबाकर डालता है तो पास में रखी एक अन्य मशीन वीवीपेट में यह दिखता है कि वोटर ने अपना वोट जिस प्रत्याशी को कास्ट किया वह उसी को गया। इवीएम को लेकर आज इंडिया विपक्ष या कांग्रेस ही नहीं एक समय था जब खुद भाजपा भी संदेह जताती थी। 
आईटी से जुड़े उसके वरिष्ठ नेता नरसिम्हा ने तो इवीएम के खिलाफ बाकायदा लंबा अभियान चलाते हुए एक किताब तक लिख दी थी। इवीएम में गड़बड़ी होती है या नहीं इस बारे में तब तक कोई दावे से नहीं कह सकता जब तक कि इस आरोप को सही साबित नहीं कर दिया जाता। हालांकि जानकार दावा करते हैं कि जिस मशीन या चिप को नेट से नहीं जोड़ा गया है उसको हैक नहीं किया जा सकता लेकिन तकनीकी विशेषज्ञ इस मुद्दे पर अलग अलग राय रखते हैं कि किसी भी इलैक्ट्राॅनिक डिवाइस को इस तरह से सेट किया जा सकता है कि उसमें पड़ेे वोट इधर से उधर कर दिये जायें। अमेरिका इंग्लैंड और कई यूरूपीय देशों सहित यही वजह है कि विदेशों में चुनाव वापस बैलेट पेपर से कराये जाने लगे हैं। हालांकि इससे यह साबित नहीं होता कि इवीएम में गड़बड़ी हो रही थी लेकिन इतना ज़रूर है कि उन देशों ने अपनी जनता और सभी दलों को विश्वास में लेने और चुनाव की विश्वसनीयता बहाल करने को यह कदम उठाया है। इंडिया गठबंधन भी चुनाव आयोग से यही चाहता था कि वह वोटों की गिनती इवीएम में पूरी होने के बाद सौ प्रतिशत वीवीपेट का मिलान उसकी पर्ची गिनकर इवीएम से कराये। लेकिन चुनाव आयोग ने इस बारे में केवल एक जवाबी पत्र लिखकर अपनी मंशा ज़ाहिर कर दी है। लेकिन इससे इवीएम पर शक और भी गहरा गया है। उधर दिल्ली में जंतर मंतर पर सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकीलों और समाजसेवियों ने एक इवीएम और वीवीपेट का प्रदर्शन करते हुए यह आरोप लगाया है कि इसमें गड़बड़ी संभव है। उन्होंने बाकायदा इवीएम में वोट डालकर यह दिखाया कि वोट किसी और को किया गया और वह किसी और चुनाव चिन्ह पर गया। उनका यह भी दावा है कि पहले वीवीपेट में दिये गये वोट की पर्ची 15 सेकंड तक दिखती थी लेकिन अब वह केवल 7 सेकंड ही दिखती है। उनका यह भी कहना है कि पहले वीवीपेट का शीशा सफेद पारदर्शी था जो अब बदलकर काला कर दिया गया है। पर्ची देखने के लिये वीवीपेट में लाइट जलती है। उनका दावा है कि ये सारे परिवर्तन चुनाव में धांधली करने का शक पैदा करते हैं। इनकी यह सब विवादित बातें भी चुनाव आयोग ने नकार दी है। लेकिन यह गड़बड़ी नहीं हो सकती या बदलाव क्यों किये गये इसका सार्वजनिक रूप से आयोग ने कोई स्पश्टीकरण देना ज़रूरी नहीं समझा। अगर इवीएम का इतिहास देखें तो यह बहुत पुराना नहीं है। 2010 में वीवीपेट का विचार पहली बार सामने आया। उस समय चुनाव आयोग ने सभी राजनीतिक दलों के साथ बैठक कर चुनाव को अधिक पारदर्शी बनाने को विचार विमर्श किया था। वीवीपेट को पहली बार नागालैंड की नोकसेन विधानसभा क्षेत्र के चुनाव में 2013 में प्रयोग किया गया। इसके बाद अन्य क्षेत्रों में इसे चरणबध्द तरीके से इस्तेमाल कर बढ़ाते हुए 2019 के आम चुनाव में सभी बूथों पर लगाया गया। इवीएम की विश्वसनीयता को लेकर बार बार उठने वाले विवाद पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में 2018 में अपना जवाब दाखिल करते हुए दावा किया कि उसने भारतीय सांखिकीय संस्थान से इसका गणितीय व्यवहारिक और सटीकता का आंतरिक आॅडिट कराया है जिसमें यह पूरी तरह सही साबित हुयी है। इसके बावजूद विभिन्न राजनीतिक दल आयोग से वीवीपेट का 10 से लेकर 100 प्रतिशत ईवीएम से मिलान की अपनी पुरानी मांग पर कायम रहे। फरवरी 2018 में चुनाव आयोग ने विपक्ष द्वारा भारी विरोध करने पर वोटों की गिनती के बाद एक विधानसभा क्षेत्र से पर्ची डालकर आये नंबर की बूथ वाली केवल एक वीवीपेट का मिलान उसके साथ लगी इवीएम से कराने की व्यवस्था शुरू की। विपक्षी नेता चन्द्रबाबू नायडू द्वारा सुप्रीम कोर्ट मंे इसके खिलाफ जनहित याचिका दायर करने के बाद सबसे बड़ी अदालत ने एक की जगह पांच बूथ की वीवीपेट का मिलान इवीएम के साथ ज़रूरी कर दिया। लेकिन विपक्ष इससे भी संतुष्ट नहीं हो सका। उधर चुनाव आयोग ने विपक्ष के बढ़ते दबाव को देखते हुए मार्च 2019 में इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टिट्यूट   से अपने स्तर पर मतदान के बाद 479 इवीएम का मिलान वीवीपेट से कराने पर पूरी तरह ठीक पाये जाने का दावा किया। लेकिन यह काम गोपनीय तरीके से केवल चुनाव आयोग की निगरानी में विपक्ष की गैर मौजूदगी में होने से विरोधी दल अपने विरोध पर अडिग रहे। इससे पहले एक बार चुनाव आयोग ने इवीएम पर शक करने वाले विपक्षी दलों को सार्वजनिक रूप से इवीएम को हैक करके दिखाने की चुनौती देते हुए इवीएम भी उनके सामने पेश की थी लेकिन उनको इवीएम छूने नहीं दी थी जिससे वे अपने आरोपों को सही साबित नहीं कर सके और आयोग की इस बैठक का बहिष्कार कर आये थे। चुनाव आयोग सारे वीवीपेट का मिलान सभी इवीएम से कराने की विपक्ष की मांग का तरह तरह के बहाने बनाकर जब जब टालमटोल करता है। तब तब इवीएम पर शक के बादल और गहरे मंडराने लगते हैं। अभी भी चुनाव आयोग विपक्ष की मांग का कोई तार्किक वाजिब या प्रमाणिक जवाब ना देकर यह दावा कर रहा है कि उसने अब तक रेंडमली 38156 वीवीपेट का मिलान इवीएम से खुद कराया है जिसमें गिनती समान और बिल्कुल ठीक पायी है। यही बात आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय में अपना पक्ष रखते हुए कही थी कि उसने भारतीय संखिकीय संस्थान से 4000 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों के चुनाव की 20600 वीवीपेट का मिलान आज तक कराया जिसमें से एक में भी गिनती का अंतर नहीं आया है। चुनाव आयोग अपने बचाव में एक बात और बार बार दोहराता है कि बैलेट पेपर से चुनाव या फिर शत प्रतिशत वीवीपेट का मिलान इवीएम से कराने पर बहुत अधिक समय और कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। लेकिन यहां वह यह भूल जाता है कि आज भी वोट डाले जाने के बाद कई राज्यों में वोटों की गिनती एक एक माह बाद होती है। जिससे चुनाव परिणाम आने में दो चार दिन अगर और अधिक लग जायें या और कर्मचारी लगाने पड़ जायें तो इससे कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ेगा बल्कि चुनाव की निष्पक्षता ईमानदारी और विश्वसनीयता बहाल होगी जो सबसे ज़रूरी है।     
*नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 5 January 2024

हिट एंड रन कानून

*हिट एंड रन कानून पर तक़रार, आखि़र क्यों झुकी सरकार ?* 
 _0 आमतौर पर यह माना जाता है कि मोदी सरकार एक बार कोई फैसला कर ले तो वह फिर झुकती नहीं। लेकिन पहले किसानों को लेकर बने तीन कानून वापस लेने और अब ड्राइवरों को लेकर बने नये हिट एंड रन कानून के विरोध के बाद हुयी देशव्यापी हड़ताल के सामने सरकार को एक बार फिर झुकना पड़ा है। हालांकि यह लोकतंत्र के लिये अच्छा ही हैै। लेकिन सवाल यह है कि जब दिसंबर के अंतिम सप्ताह में आॅल इंडिया मोटर ट्रांस्पोर्ट कांग्रेस ने सरकार से इस विवादित कानून के बारे में विरोध दर्ज करते हुए बातचीत की पेशकश की तो सरकार ने उसको कोई भाव नहीं दिया लेकिन जब मामला आंदोलन की शक्ल मंें सड़कों पर आया तो सरकार तभी क्यों झुकी?_      
   *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
     बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की खुश्बू तक नहीं आती,
    ये वो शाखें़ हैं जिनको अब शजर अच्छा नहीं लगता।
          ट्रक व टैंकर चालकों के तीन दिन के देशव्यापी विरोध प्रदर्शन ने हाहाकार मचा दिया और सरकार नये बने हिट एंड रन कानून को लागू ना करने पर फिलहाल राज़ी हो गयी। एक बार फिर यह साबित हो गया कि यह सरकार भी झुकती है लेकिन झुकाने वाले चाहिये। हालांकि हिट एंड रन यानी मारो और भाग जाओ कानून मंे सतही तौर पर देखने में कोई बुराई नज़र नहीं आती लेकिन ड्राइवरों के पक्ष को सुना जाये तो उनकी आशंका डर और आपत्ति में भी दम नज़र आता है। आमतौर पर यही देखा जाता है कि जब भी रोड पर कोई एक्सीडेंट होता है तो सबसे पहले ड्राइवर और वह भी बड़े वाहन के चालक को कसूरवार मानकर चला जाता है। यही वजह है कि वहां मौजूद भीड़ बिना सच असली वजह और गल्ती जाने मौके पर ही ड्राइवर को पीटना शुरू कर देती है। अगर दो चालकों का आमने सामने का हादसा हो तो बड़े वाहन के चालक को यह मानकर पीटा जाता है कि उसी की गल्ती रही होगी। हालत यह है कि पुलिस भी अपनी जांच को इसी धारणा से आगे बढ़ाती है कि पैदल यात्री घायल या मरा है तो वाहन वाले की गल्ती ही होगी। जबकि कई बार खुद पैदल चलने वाला या छोटे वाहन वाला भी भूल से बड़े वाहन के सामने गलत साइड से ओवरटेक करता हुआ सड़क खराब होने या तकनीकी कमी से आ जाता है। यह भी होता है कि टक्कर मारने वाले वाहन के अचानक ब्रेक फेल होना पहिया निकल जाना टायर फट जाना ब्रेक की जगह धोखे से एक्सीलेटर दब जाना चालक को नींद का झोंका आ जाना बेहोश हो जाना हार्टअटैक या ब्रेन स्ट्रोक हो जाना कोहरा आने से दिखाई ना देना सड़क में गड्ढा या स्पीड ब्रेकर और सामने बच्चा या जानवर आ जाते हैं। पहले हिट एंड रन मामले में भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए , 338 और 279 का इस्तेमाल होता रहा है। इसमें दो साल की सज़ा और जुर्माने का प्रावधान है। इसके साथ ही मोटर वाहन अधिनियम 1988 की धारा 161 व 134 ए बी भी हिट एंड रन केस में प्रयोग की जाती रही है। इसमें लापरवाही से वाहन चलाते हुए किसी को मार देने पर 25000 और घायल को 12500 रूपये हर्जाना देने का प्रावधान है। अब तक समस्या यह आ रही थी कि लापरवाही से एक्सीडेंट करने वाला चालक मौके से भाग जाता था। इससे घायल को उपचार ना मिलने से उसकी जान जाने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। साथ ही सुनसान जगह या रात का समय होने की वजह से अधिकांश हादसों में आरोपी चालक के खिलाफ गवाह और सबूत भी नहीं मिल पाते हैं। हालांकि जहां लोग एक्सीडेंट के प्रत्क्षदर्शी होते भी हैं वे घायलों को बचाने  चिकित्सा दिलाने या उनके परिवार को सूचित करने मंे तो सहायत करते हैं लेकिन घटना का गवाह बनना वे पसंद नहीं करते। अलबत्ता कभी कभी आसपास के लोग एक्सीडेंट करके भाग जाने वाले की गाड़ी का नंबर या दुर्घटना की सूचना पुलिस को दे देते हैं। लेकिन वे भी इस बात से डरे रहते हैं कि उनको मानवता संवेदनशीलता और सामाजिकता की कीमत कहीं लंबे कानूनी मामलों में फंसकर ना चुकानी पड़ जाये। हर सड़क या गली मुहल्ले में तो छोड़ दीजिये नेशनल हाईवे पर भी सब जगह कैमरे नहीं लगे होते जिससे एक्सीडेंट करने वाले चालक व उसके वाहन को हिट एंड रन के बाद आराम से तलाश किया जा सके। सूचना देने पर कई बार पुलिस और एंबुलैंस भी घंटो तक नहीं आती। इतनी अधिक देर होने का अनुचित लाभ आरोपी वाहन चालक उठाकर दूर निकल जाता है। नये कानून में एक और पंेच है कि हम केवल सड़क पर चलने वाले वाहन चालकों से यह आशा कर रहे हैं कि अगर उसके पास दो विकल्प हैं कि या तो वह मौके से भाग जाये जिससे उसको सज़ा ना मिले या फिर वह घायल को इलाज दिलाने के लिये अस्पताल ले जाये और खुद अपने खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने को पुलिस को एक्सीडेंट की ख़बर करे तो वह वही विकल्प चुनेगा जिसमें वह अधिक सुरक्षित महसूस करेगा। रहा ख़बर खुद देने पर उसको कम सज़ा देने का मामला तो यह अदालत के विवेक पर निर्भर करेगा। कानून में ऐसी कोई स्पश्ट गारंटी नहीं है जिससे उसको पुलिस को सूचना देने और घायल को इलाज दिलाने पर कम सज़ा हर हाल में मिलना तय हो। दूसरी बात जब चालक को भागने पर बच जाने का अधिक भरोसा हो तो वह किसी की जान बचाने को क्यों अपनी जान ख़तरे में डालेगा? आरोपी को यह भी पता होता है कि हादसे की ख़बर देने पर उसको सौ फीसदी सज़ा मिलना तय है। आरोपी चालको को छोड़कर अगर समाज के दूसरे लोगों की बात करें तो क्या ऐसे मामलों में वे पुलिस को ख़बर देते हैं जिनमें उनको पता होता है कि अगर मामला कानून के दायरे में आया तो उनको भी सज़ा हो सकती है? लोग प्रोपर्टी खरीदने के दौरान स्टांप कम लगाते हैं। इनकम टैक्स जीएसटी चुराते हैं। बिजली चोरी करते हैं। बिना टिकट सरकारी रेल बस सेवाओं में यात्रा करते हैं। हालांकि वे भी ऐसा करके कानून के खिलाफ ही काम कर रहे होते हैं। हमारे कहने का मतलब यह है कि जहां हम जुर्म करके भी कानून से बच सकते हैं। वहां वाहन चालकों का ही नहीं हम सबका यही रूख़ होता है। लेकिन एक्सीडेंट के मामलों में घायलों को मरने के लिये सड़क पर छोड़ देने से उनकी जान जाने का नुकसान इस अपराध को अधिक गंभीर बना देता है। इसका मतलब यह हमारी सामाजिक समस्या भी है। हमारा नैतिक पतन हो चुका है। हम धर्म का बहुत दिखावा करते हैं। लेकिन ऐसे में हम खुद भगवान से भी नहीं डरते। कहने का मतलब यह है कि कानून सख्त करने के साथ समाज में यह जागरूकता नैतिकता और मानवीयता भी लानी होगी जिससे कोई इंसान सज़ा भुगतने के डर से किसी दूसरे की जान को ख़तरे में डालना अपराध के साथ ही पाप अमानवीय अनैतिक और असामाजिक भी समझने लगे। साथ ही पुलिस को भी यह पाठ पढ़ाना होगा कि वह ऐसे मामलों में कानून के हिसाब से निष्पक्ष जांच करे और किसी बेकसूर को ना फंसाकर कसूरवार से फीलगुड कर मामले को दबाना या घुमाना उसको भी विभागीय कार्यवाही की सज़ा दिला सकता है।            
 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*