Sunday, 12 June 2022

सब धर्मों का सम्मान

*सब धर्मों का सम्मान तभी होगा जब कानून का सम्मान होगा!* 
0दो भाजपा प्रवक्ताओं ने इस्लाम के पैगं़बर हज़रत मुहम्मद के बारे में कुछ अपमानजनक बोला तो भाजपा ने उनमें से एक को पार्टी से बाहर कर दिया और दूसरे को 6 साल को सस्पैंड कर दिया। भाजपा ने यह भी सफाई दी कि वह सब धर्मों का बराबर सम्मान करती है। इसके बाद हज़ूर की शान में गुस्ताख़ी करने वाले इन दोनों नेताओं के खिलाफ़ पुलिस ने रिपोर्ट भी दर्ज कर ली। हो सकता है कि कुछ समय जांच के बाद पुलिस इनको गिरफ़तार भी कर ले। लेकिन यह विवाद इसके बाद भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश में कई जगह इस मामले में प्रदर्शन आगज़नी और हिंसा हुयी है। कुछ कट्टरपंथी आरोपियों को चैराहे पर फांसी देने की मांग कर रहे हैं। जबकि एक आतंकी संगठन ने दोनों को आत्मघाती बम से उड़ाने की धमकी दी है। जो कि ग़लत है।    
                  -इक़बाल हिंदुस्तानी
      आमतौर पर दुनिया के देश लोकतंत्र और राजशाही दो ही तरीकों से चलते हैं। बताया जाता है कि हमारे देश में लोकतंत्र है। जिसके लिये संविधान यानी नियम कानून बनाये गये हैं। यह भी माना जाता है कि देश के सभी नागरिक समान हैं। हालांकि व्यवहारिक रूप में ऐसा कम ही देखने को मिलता है। उनको अभिव्यक्ति की आज़ादी तो है लेकिन एक दूसरे की यह स्वतंत्रता वहां समाप्त हो जाती है। जहां से दूसरे की शुरू होती है। पैग़ंबर का मामला तो ताज़ा है। अगर आप इतिहास देखें तो सारे फ़साद वहीं से शुरू होते हैं। जहां हम कानून का सम्मान नहीं करते। मिसाल के तौर पर इस्लाम ही नहीं सभी धर्म आस्था यानी ईमान से चलते हैं। मतलब यह है कि आस्था का आप केवल सम्मान कर सकते हैं। उसको प्रमाणिक वैज्ञानिक तर्कसंगत उचित सही सच न्यायसंगत और सार्वभौमिक साबित नहीं कर सकते। इसलिये ऐसे कानून बनाये गये हैं कि कोई किसी के धर्म को उनके अवतार को पवित्र धार्मिक ग्रंथों को उनके ईश्वर देवी देवता मंदिर मस्जिद इमाम पुजारी और धर्म से जुड़ी मान्यताओं को बुरा नहीं कहेगा। यानी किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचायेगा। कोई अगर जानबूझकर ऐसा करेगा तो उसके खिलाफ कानून अपना काम करेगा। लेकिन यह भी देखने में आता है कि कुछ लोग अलग अलग कारणों से लगातार इस तरह के बयान काम और हरकतें करने से बाज़ नहीं आते। जिससे समाज के विभिन्न वर्गों में आपसी तनाव टकराव हिंसा और अशांति पैदा होती है। इससे ना केवल देश का आर्थिक सामाजिक और कानून व्यवस्था का नुकसान होता है बल्कि ये मामले कभी कभी विदेशों तक में देश को बदनाम और अपमानित करा देते हैं। जैसा कि पैगं़बर वाले वर्तमान मामले में इस बार हुआ है। अगर भाजपा प्रवक्ताओं के विवादित बयान देते ही भाजपा व उसकी सरकार तत्काल हरकत में आती और जो कार्यवाही अरब देशों के विरोध दर्ज करने के बाद हुयी है, वह अपने भारतीय नागरिकों के विरोध व नाराज़गी को दूर करने के लिये पहले ही हो जाती तो इससे आज के मुश्किल हालात से बचा जा सकता था। खैर फिर भी देर आयद दुरस्त आयद मानकर हमें यह संतोष करना होगा कि कार्यवाही की गयी है। वैसे ही अगर हम गहराई से देखें तो यह मामला जितना तूल पकड़ गया है। वह एक लक्ष्ण मात्र है। रोग यह है कि हम संविधान में सबको बराबर अधिकार दिये जाने के बावजूद व्यवहार में समान नहीं मान रहे हैं। सच यह भी है कि हम सब एक दूसरे को कानून से चलने को तो कहते हैं। मगर खुद उस पर अमल नहीं करते। इतना ही नहीं आरोपियों के खिलाफ रपट भी दर्ज हो गयी है। आगे सज़ा देने का काम कोर्ट का है। सवाल यह भी है कि जब आरोपियों को सत्ताधारी दल ने अनुशासन की कार्यवाही करके सज़ा दे दी तो भी लोग संतुष्ट क्यों नहीं हो पा रहे हैं? लेकिन कुछ कट्टरपंथी आरोपियों को अपने हिसाब से सज़ा देने की मांग कर रहे हैं। ऐसे ही मस्जिदंे नमाज़ पढ़ने के लिये होती हैं। लेकिन कई बार जुमे की नमाज़ के बाद नमाज़ी बड़ी तादाद में बिना पुलिस प्रशासन से अनुमति लिये वापसी में प्रदर्शन करना शुरू कर देते हैं। प्रदर्शन करो लेकिन अनुमति लेकर। सरकार और मुसलमानों दोनों को यह समझने की ज़रूरत है कि उनके बीच कुछ सालों से आपसी विश्वास कम क्यों हो रहा है? क्या मुसलमानों की इस शिकायत में कुछ दम नहीं है कि सरकार उनके साथ समानता का व्यवहार नहीं कर रही है? साथ ही मुसलमानों को यह समझना ही होगा कि उनको सरकार से अगर अपनी जायज़ बात मनवानी है तो कानून का रास्ता ही अपनाना होगा। अगर कुछ लोग आंदोलन के नाम पर कानून हाथ में लेंगे तो उनकी मांगे तो पूरी होंगी ही नहीं साथ ही सरकार उनसे बेहद सख़्ती से पेश आयेगी। जिससे उनका उल्टा और अधिक नुकसान ही होगा। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में बहुमत की जगह बहुसंख्यकवाद ने ले ली है। इसी वजह से पहले जो सेकुलर दल जाति और अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता की सियासत करते थे। आज उसके विकल्प के रूप में भाजपा हिंदू तुष्टिकरण करके बहुसंख्यकवाद की राजनीति कर रही है। यह अलग बात है कि आज भाजपा के ये दो प्रवक्ता अल्पसंख्यकोें के खिलाफ ज़हर उगलते हुए अचानक लक्ष्मण रेखा पार करके ना केवल भारतीय मुसलमानों बल्कि देश के सेकुलर भारतीयों व दुनिया के दो अरब मुसलमानों के दिल को दुखाकर उनकी नज़र में इस्लाम के दुश्मन बन चुके हैं। लेकिन सच यह है कि कई साल से देश में जिस तरह की राजनीति चल रही है। जिस तरह के बयान कानून और घटनायें चुनचुनकर हो रही हैं। जिस तरह से एक वर्ग विशेष को टारगेट किया जा रहा है। जिस तरह से धर्म के नाम पर एक वर्ग विशेष के नरसंहार का खुला आव्हान किया जाता रहा है। उससे एक ऐसा माहौल बना जिसमें ये दो प्रवक्ता एक दूसरे से आगे निकलकर अपने वरिष्ठ नेताओं पार्टी पदाधिकारियों और कुछ बडे़े सरकारी ओहदों पर बैठे अपने आक़ाओं को खुश करने के लिये कानून और धर्म की मर्यादा व सीमा भूलकर मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहचा बैठे। लेकिन अब खुद भाजपा ने अपने तीन दर्जन से अधिक फायर ब्रांड नेताओं की सूची बनाकर उनमें से दो दर्जन से अधिक को संभल कर बोलने की चेतावनी जारी कर यह भरोस दिलाया है कि देश संविधान से चलेगा और सबका सम्मान होगा।  
 *नोट-लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

Tuesday, 24 May 2022

देशद्रोह क्या है?

*देशद्रोह राजद्रोह दलद्रोह सरकार द्रोह या जनद्रोह सच क्या है?

0सेडिशन यानी देशद्रोह कानून भारतीय दंड संहिता 1860 में बनकर जब लागू हुयी तब बना था। लेकिन आईपीसी की धारा 124 ए सही मायने में राजद्रोह थी देशद्रोह नहीं। वजह यह है कि यह राजा जाॅर्ज पंचम के लिये बनाया गया था। उस समय भारत गुलाम था। अंग्रेज़ों ने बड़ी चालाकी से अपनी राजशाही के विरोध को देशद्रोह के नाम पर कुचलने को इसे आज़ादी की मांग करने वाले भारतीयों को दबाने के लिये बेशर्मी और बेदर्दी से इस्तेमाल किया। 1947 में देश आज़ाद होने के बाद इस जनविरोधी कानूनी की कोई ज़रूरत नहीं थी। लेकिन पहले कांग्रेस फिर जनता पार्टी और आज भाजपा ने इसे अपने विरोधियों से निबटने के लिये बनाये रखने में अपना राजनीतिक लाभ देखा। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसपर रोक लगा कर जनता के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला किया है।      
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
        सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून के अमल पर तत्काल प्रभाव से अंतिम निर्णय आने तक रोक लगा दी है। जिससे पहले दर्ज ऐसे सभी मामलों पर आगे कार्यवाही नहीं होगी और इन कानून के तहत नये मामले दर्ज नहीं होंगे। आज़ादी का अमृत उत्सव वर्ष मना रही मोदी सरकार इसे जैसा का तैसा बनाये रखने या इसमें संशोधन कर प्रयोग करने पर सुनवाई के दौरान कोई स्पश्ट पक्ष रखने से बचती रही। गृहमंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2014 से 2019 तक देशद्रोह के आरोप में कुल 326 मामले दर्ज किये गये। इनमें से मात्र 6 लोग दोषी साबित हो सके। हैरत की बात यह है कि सबसे अधिक असम में 54 मामले झारखंड में 40 हरियाणा में 31 बिहार केरल व कश्मीर में 25-25 केस दर्ज किये गये। कर्नाटक में 22 यूपी में 7 बंगाल में 8 और दिल्ली में 4 व महाराष्ट्र पंजाब व उत्तराखंड में एक एक मुकदमा देशद्रोह के आरोप में दर्ज किया गया। सबसे पहले यह समझने की ज़रूरत है कि देशद्रोह क्या है? क्या देशद्रोह व राजद्रोह एक ही चीज़ है? क्या किसी सरकार का विरोध करना या सत्ता में बैठे दल का विरोध करना देशद्रोह माना जा सकता है? क्या जनद्रोह देशद्रोह से भी बड़ा अपराध नहीं है? आपको याद होगा कांग्रेस ने कभी भी अपने राज में इस जनविरोध्ी कानून को बदलने या खत्म करने का इरादा या कोशिश नहीं की। वजह सत्ता में रहकर हर दल काफी हद तक बेलगाम होकर अपने विरोधियों को दबाकर डराकर या धमकाकर चुप रखना चाहता है। इसका प्रमाण यह भी है कि देशद्रोह कानून हटाना तो दूर कांग्रेस ने अपने कई दशक के एकछत्र राज में उल्टे मीसा रासुका यूएपीए टाडा और पोटा   जैसे कानून बनाये। इसमें कोई दो राय नहीं आतंकवाद नक्सलवाद माफिया गैंगेस्टर और समाज विरोधी अपराधी प्रवृत्ति के बदमाशों को सज़ा दिलाने को कुछ सख़्त कानूनों की ज़रूरत सभी सरकारों को होती है। लेकिन इन कानूनों की आड़ में अपने राजनीतिक विरोधियों पत्रकारों समाजसेवियों इंटलैक्चुअल एनजीओ और निष्पक्ष व मानव अधिकार संगठनों को निशाने पर लेकर फर्जी मामले दर्ज कर उनको ज़मानत ना देकर लंबे समय तक बिना अपराध साबित किये जेल में रखना संविधान विरोध्ी कानून विरोधी और लोकतंत्र विरोधी माना जाता है। यह बात सही है कि कुछ संगीन मामलों में अपराधियों को जेल में रखना ज़रूरी होता है। उनको ज़मानत इसलिये भी नहीं दी जाती जिससे वे बाहर आकर सबूतों से छेड़छाड़ गवाहों पर हमला या कोई नया अपराध ना कर बैठें। लेकिन हमारी सरकारों की ऐसी मंशा नहीं रहती। अकसर यह देखा जा रहा है कि सरकारें अपने दल के नेताओें व समर्थकों को तो बड़े से बड़ा अपराध करने पर भी बचाती हैं जबकि विरोधी दल के कार्यकर्ताओं व निष्पक्ष व सेकुलर लोगों को सत्ताधरी दल के जनविरोधी कामों का विरोध शांतिपूर्वक लोकतांत्रिक तरीके से करने पर भी फर्जी मुकदमों में फंसाकर उनकी ज़मानत का भी लंबे समय तक विरोध करती रहती हैं। इससे अभिव्यक्ति की आज़ादी से लेकर सच की लड़ाई लड़ने वाले पत्रकार स्पश्टवादी लेखक मानवधिकारवादी और समाज के वे सब लोग सरकार के निशाने पर रहते हैं जो उसके जनविरोधी फैसलों का खुलकर विरोध करते हैं। इसी लिये सबसे बड़ी अदालत ने देशद्रोह कानून पर रोक लगाई है। सबसे बड़ी अदालत में सुनवाई के दौरान पहले सरकार ने कहा कि देशद्रोह कानून सही है। सरकार उसको खत्म करने का विरोध करेगी। दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जब अपने घोषणापत्र में यह वादा किया कि वह अगर सत्ता में आई तो इस कानून को खत्म कर देगी तो मोदी ने कांग्रेस को इस पर जमकर कोसा था कि वह टुकड़े टुकड़े गैंग के पक्ष में ऐसा करना चाहती है। लेकिन जब मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख़ देखकर यह समझ लिया कि वह इस कानून को हर हाल में खत्म करके ही दम लेगा तो उसने यू टर्न लेते हुए इस पर पुनर्विचार को तैयार होने का दावा किया। इसका कारण यह बताया गया कि मोदी नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में हैं। सवाल यह है कि अचानक मोदी सरकार को ऐसा क्यों लगने लगा कि यह कानून हटना चाहिये? सच यह है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा व अन्य दलों की। वे विपक्ष में रहकर तो ऐसे कानूनों को जनविरोधी लोकतंत्र विरोधी और अभिव्यक्ति के खिलाफ बताते हैं। लेकिन जब खुद सत्ता में आ जाते हैं तो ना केवल ऐसे कानूनों की पैरवी करते हैं, जमकर अपने विरोधियों के खिलाफ इन कानूनों का गलत इस्तेमाल करते हैं बल्कि पहले से मौजूद ऐसे कानूनों को और अधिक सख़्त डरावना बनाकर मनमाना इस्तेमाल करके बिना अपराध साबित किये विपक्ष निष्पक्ष धर्मनिर्पेक्ष जनवादी संघर्षशील मानव अधिकार संगठन के प्रगतिशील कार्यकर्ताओं आरटीआई एक्टिविस्टों लेखकों पत्रकारों व साहित्यकारों को सरकार के गलत फैसलों का विरोध करने आंदोलन करने या किसी भी प्रकार से जनता को जागरूक करने पर इन कानूनों के तहत जेल भेजकर उनकी ज़मानत कई कई साल तक ना होने देकर अन्य सरकार विरोधियों को एक तरह से संदेश दिया जाता है कि वे भी इसी तरह से जेल भेजे जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसीलिये यह रोक लगाई है। यह तय होना ही चाहिये कि सरकार का विरोध सत्ताधारी दल का विरोध या किसी पद पर बैठे बड़े से बड़े व्यक्ति के संविधान विरोधी फैसलों का लोकतांत्रिक शांतिपूर्ण विरोध देशद्रोह नहीं होता है।

 *नोट-लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

Monday, 16 May 2022

घटेगी अब आबादी....

*अच्छे दिन: अब हमारी आबादी घटनी शुरू हो जायेगी?* 
0राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के पांचवे सर्वे के अनुसार देश की प्रजनन दर 2 पर आ गयी है। किसी देश के वर्तमान जनसंख्या स्तर को जैसा का तैसा बनाये रखने के लिये टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 होना चाहिये। हालांकि यह दर पांच राज्यों बिहार में 2.98 मेघालय में 2.91 यूपी में 2.35 झारखंड में 2.26 और मणिपुर में 2.17 अभी भी प्रतिस्थापन दर से कुछ अधिक बनी हुयी है। लेकिन संतोष की बात यह है कि देश के कुल 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में से मात्र पांच में ही यह स्थिति है। इसका मतलब यह है कि देश का टीएफआर 2 यानी रिप्लेसमेंट लेवल से भी नीचे पहुंच गया है। इस सर्वे से इस झूठ की पोल खुलती है कि देश में एक वर्ग विशेष की आबादी इतनी तेज़ी से बढ़ रही है कि वह बहुसंख्यक हो जायेगा?    
                  -इक़बाल हिंदुस्तानी
      नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत किया जाता है। एनएफएचएस-5 में 6 लाख 37000 परिवारों को शामिल किया गया है। इसमें देश के सभी 28 राज्यों एवं 8 केंद्र शासित प्रदेशों के 707 जि़लों को शामिल किया गया है। सर्वे से पता चलता है कि देश के 67 प्रतिशत परिवार गर्भनिरोधक साधन अपना रहे हैं। पहले यह संख्या 54 प्रतिशत थी। हालांकि अभी भी देश के 9 प्रतिशत परिवारों तक गर्भनिरोधक साधन नहीं पहुंच पाये हैं। इनमें 11.4 प्रतिशत परिवार बेहद गरीब तो 8.6 प्रतिशत उच्च श्रेणी के हैं। आधुनिक गर्भनिरोधकों के प्रयोग के लेकर भी यह असमानता सामने आती है। निम्न आय वर्ग में इनका इस्तेमाल करने वाले 50.7 प्रतिशत तो उच्च आय वर्ग में 58.7 प्रतिशत हैं। यही उपयोग का अंतर कामकाजी महिलाओं में जहां 66.3 प्रतिशत है तो बेरोज़गार महिलाओं में 53.4 प्रतिशत है। गर्भनिरोधक प्रयोग करने व अन्य साधन परिवार नियोजन के लिये अपनाने में धर्म से अधिक शिक्षा की भूमिका पहले भी सामने आती रही है। इस बार के एनएफएसएच सर्वे के अनुसार 64.7 प्रतिशत सिख 35.9 प्रतिशत हिंदू और 31.9 प्रतिशत मुस्लिम पुरूष गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल करना महिलाओं का काम बताते हैं। इस सर्वे में जो टीएफआर यानी प्रजनन दर 2.0 तक पहंुच गयी है वह 2018 के सर्वे में 2.2 थी। टीएफआर उस दर को कहते हैं जिसमें एक महिला अपने पूरे जीवन में जितने बच्चो को जन्म देती है। हालांकि इस सर्वे के विस्तार से आंकड़े अभी सामने नहीं आये हैं। लेकिन अगर जाति धर्म और क्षेत्र के हिसाब से देखा जाये तो पिछले सर्वे की तरह इस सर्वे में भी यही आभास मिलता है कि परिवार नियोजन अपनाने या आबादी बढ़ाने का रिश्ता सबसे अधिक शिक्षा और सम्पन्नता से है। यह विडंबना ही है कि आज देश में जिस तरह की आर्थिक नीतियां अपनाई जा रही हैं। उनसे चंद अमीर और अधिक अमीर बनते जा रहे हैं। वहीं गरीब और अधिक गरीब होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं देश में कोरोना अविवेकपूर्ण लाॅकडाउन नोटबंदी और जीएसटी से इतनी अधिक बेरोज़गारी बढ़ी है कि दो करोड़ से अधिक परिवार गरीबी रेखा से नीचे चले गये हैं। बड़ी संख्या में लोगों की आय घट गयी है। जिनकी आय नहीं भी घटी है। उनको दिन ब दिन बढ़ती महंगाई की वजह से उतनी ही आय में गुज़ारा करना मुश्किल हो रहा है। हालांकि परिवार नियोजन के सस्ते और सरकार के स्तर पर निशुल्क साधन भी उपलब्ध् कराये जाते हैं। लेकिन अगर गुणवत्ता और उपलब्ध्ता के आधार पर देखें तो परिवार नियोजन ही नहीं जीवन के हर मामले में सम्पन्न और विपन्न नागरिक के लिये अलग अलग स्तर है। इतना ही नहीं जो लोग एक वर्ग विशेष का आर्थिक बहिष्कार और सामूहिक नरसंहार का खुलेआम गैर कानूनी आव्हान आयेदिन करते रहते हैं। वे साथ साथ यह झूठ भी फैलाते रहते हैं कि इस वर्ग विशेष की आबादी इतनी तेज़ी से बढ़ रही है कि ये आने वाले कुछ दशक मंे बहुसंख्यक हो जायेंगे। इस मामले में कुछ राज्य सरकारें दो बच्चो का कानून पहले ही बना चुकी हैं। अगर हम राज्य अनुसार देखें तो देश में सबसे कम प्रजनन दर केरल और कश्मीर में है। कश्मीर मुस्लिम बहुल है। साथ ही केरल में हिंदू मुस्लिम और ईसाई लगभग समान संख्या में हैं। इसका मतलब साफ है कि आबादी बढ़ने या परिवार नियोजन का सीधा संबंध धर्म या जाति से नहीं बल्कि शिक्षा और सम्पन्नता से है। लेकिन सच यह है कि यह कटु सत्य उन चंद साम्प्रदायिक राजनीतिक और धर्मांध लोगों को फूटी आंख नहीं सुहाता जो अपने वोटबैंक को गुमराह कर डराकर और झूठ फैलाकर बार बार भावनात्मक मुद्दों पर चुनाव जीतकर सत्ता का सुख लूट रहे हैं। ऐसे ही आबादी की जब भी बात आती है। एक और झूठ बार बार बोला जाता है कि देश का एक वर्ग चार चार शादियां और 25 बच्चे पैदा कर रहा है। लेकिन आज तक किसी भी विश्वस्त सरकारी और अधिकृत सर्वे में इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो सकी है। आंकड़े बताते हैं कि सबसे अधिक बहुविवाह आदिवासी जैन और हिंदू पुरूष कर रहे हैं। ऐसे ही इस झूठ को एक और तथ्य से जांचा जा सकता है कि जब सभी वर्गों में ही 1000 पुरूषों की पीछे 954 महिलायें पैदा हो रही हैं तो किसी भी समाज वर्ग धर्म या क्षेत्र का भारतीय अगर एक से अधिक शादी करेगा तो शेष पुरूष उसी समाज की किस महिला से शादी कर पायेंगे? यहां तो एक पुरूष को एक महिला उपलब्ध होना ही संभव नहीं है तो एक से अधिक शादी करने पर अतिरिक्त महिलायें कहां से आयेंगी? क्या वर्ग विशेष का हर पुरूष एक महिला अपने समाज की और तीन दूसरे समाज से लाकर शादी कर रहा है? यदि ऐसा होता तो दूसरे समाज में हर चार में से तीन पुरूष ना सही कम से कम हर दूसरा पुरूष तो बिना शादी के रह जाता? लेकिन ऐसा करना भी एक तरफा तो संभव नहीं हो पाता। दूसरे तथाकथित लवजेहाद के खिलाफ कानून बनने से अब तो यह लगभग नामुमकिन सा ही हो गया है। यह भी सोचने की बात है कि अगर एक वर्ग ऐसा करेगा तो दूसरा वर्ग भी करेगा ही। ऐसे में आप सच और दुष्प्रचार में अंतर देख सकते हैं।
           *0लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ एडिटर और नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

Sunday, 24 April 2022

योगी की पहल

*मुख्यमंत्री योगी की यह सराहनीय पहल सबके हित में है!*

0यूपी के सीएम आदित्यनाथ योगी ने दोबारा राज्य का कार्यभार संभालने के बाद पुलिस प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ पहली मुलाक़ात में प्रदेश में एकता भाईचारा और अमनचैन बनाये रखने के लिये जो व्यापक दिशा निर्देश दिये हैं। उनकी सराहना करना इसलिये भी ज़रूरी है क्योंकि इस समय तमाम दूसरे राज्यों में जिस तरह से धार्मिक जुलूसों को लेकर विभिन्न वर्गों में हिंसा और दंगे हुए हैं। वैसा यूपी में ना हो इसके लिये जिस तैयारी इच्छाशक्ति और निष्पक्षता की आवश्यकता है। उसको योगी जी ने समय रहते समझकर जिस तरह के एहतियाती क़दम उठाये हैं। वे उनकी इस बात को भी सही साबित करते हैं कि यूपी में 800 से अधिक धार्मिक जुलूस निकले लेकिन कहीं से टकराव या दंगा तो दूर कहासुनी तक की ख़बर नहीं है।    

       *-इक़बाल हिंदुस्तानी*

      राजनीतिक रूप से हम सब किसी पार्टी का समर्थन या विरोध कर सकते हैं। यह हम सबकी संवैधानिक स्वतंत्रता का हिस्सा है। लेकिन सरकार सबकी होती है। अगर कोई सरकार गलत काम करती है तो उसकी आलोचना होती है। होनी भी चाहिये। लेकिन अगर कोई सरकार अच्छा काम करती है तो उसकी सराहना भी करनी चाहिये। अगर कोई विरोध के लिये विरोध और समर्थन के लिये समर्थन करता है तो वह निष्पक्ष ना होकर अंधभक्त कहलाता है। ऐसा करने वाला पत्रकार भी नहीं हो सकता वह पक्षकार कहलाता है। फिर वह चाहे किसी भी पार्टी किसी भी सोच या किसी भी बड़े से बड़े नेता का अंधभक्त ही क्यों ना हो? मिसाल के तौर पर यूपी में जब से योगी सीएम बने हैं। उन्होंने जो भी काम किये हैं। उनसे कुछ लोग सहमत हो सकते हैं। कुछ लोग असहमत भी हो सकते हैं। लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं। जिनसे असहमत होने या विरोध करने का कोई तर्कसंगत आधार नहीं है। मिसाल के तौर पर सीएम और सांसद बनने से पहले गोरखपुर मठ के मुखिया रहे योगी ने जिस तरह से यह अंधविश्वास तोड़ा कि जो सीएम नोएडा का दौरा कर लेता है। वह फिर से यूपी का चुनाव नहीं जीत पाता, वह एक सराहनीय उदाहरण है। इसके साथ ही उनकी छवि एक सख़्त प्रशासक की बनी है। यह अलग बात है कि यह छवि बनाने में कभी कभी उनके पुलिस प्रशासन ने ऐसी अतिरिक्त शक्ति और अवांछित उत्साह का परिचय दिया जिससे उनकी सरकार पर विपक्ष ने तरह तरह के आरोप भी लगाये। लेकिन यह पहले भी होता रहा है। हाल ही में इसी तरह की कई शिकायतें मिलने पर सीएम योगी ने पुलिस प्रशासन को दो टूक आदेश दिये थे कि माफिया या गैंगेस्टर कुख्यात अपराधियों के सिवा गरीब या व्यापारियों पर लगने वाले मामूली अपराध के आरोपों में बुल्डोज़र का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। इसी तरह उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में विभिन्न जुलूस और शोभायात्राओं में आयेदिन हो रहे विभिन्न वर्गों के टकराव को देखते हुए यूपी में ऐसे आयोजनों को लेकर व्यापक दिशा निर्देश जारी कर दिये। इनमें साफ साफ कहा गया है कि कोई भी नया जुलूस नहीं निकाला जायेगा। साथ ही हर जुलूस को निकालने के लिये प्रशासन से अनुमति लेनी अनिवार्य होगी। इतना ही नहीं आयोजकों को इस आश्य का शपथपत्र भी पुलिस को देना होगा कि वे कोई ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे साम्प्रदायिक सौहार्द या कानून का उल्लंघन हो। इस तरह के आयोजनों को लेकर और भी कई शर्तें और नियम कड़ाई से लागू करने की बात कही गयी है। साथ ही यह भी स्पश्ट कर दिया गया है कि पुलिस प्रशासन इस तरह के मामलों में पूरी तरह से निष्पक्ष और कानून के हिसाब से काम करेगा। किसी भी पक्ष को नियम कानून से छूट या मनमर्जी से कुछ भी असामाजिक या अपराधिक करने की स्वतंत्रता किसी भी हालत में नहीं दी जायेगी। इसके बावजूद अगर कोई कानून हाथ में लेगा तो उस पर सख़्त कार्यवाही की जायेगी। इतना ही नहीं योगी जी ने अपने दिशा निर्देशों में भविष्य में विवाद का कारण बनने वाले अन्य मामलों में भी बखूबी अग्रिम संज्ञान लिया है। उनका कहना है कि किसी भी धर्मस्थल पर लगे लाउड स्पीकर नियम अनुसार ही प्रयोग किये जा सकेंगे। नियम से मतलब यह है कि इसके लिये पुलिस प्रशासन से अनुमति लेनी होगी। साथ ही इनकी आवाज़ का एक निर्धारित डेसिबल होगा। सुप्रीम कोर्ट के पहले से ही दिये दिशा निर्देश के मुताबिक रात 10 बजे के बाद और सुबह 6 बजे से पहले किसी भी सूरत में लाउड स्पीकरों का इस्तेमाल किसी भी धार्मिक स्थल पर प्रतिबंधित रहेगा। नये आदेश में यह भी कहा गया है कि पुलिस प्रशासन यह सुनिश्चित करे कि किसी भी धार्मिक स्थल से पूजा पाठ या नमाज़ आदि की आवाज़ उस स्थल के अंदर तक ही सीमित रहे। हालांकि अभी केवल नोएडा में पुलिस ने कुछ धार्मिक स्थलों को इस बाबत अवगत कराया है। लेकिन आशा है कि ईद के बाद पूरे प्रदेश में इस आदेश पर अमल होने लगेगा। फिलहाल मथुरा की कृष्ण जन्मभूमि और उससे लगी ज्ञानवापी मस्जिद में वहां के आयोजकों ने खुद ही या तो लाउड स्पीकर उतार दिये हैं या फिर उनकी आवाज़ काफी कम कर दी गयी है। इतना ही नहीं सीएम योगी के गृहनगर और उनके मठ गोरखनाथ धाम में भी ऐसी ही मिसाल पेश की गयी है। यह अपने आप में सुखद और सराहनीय पहल है कि सरकार के आदेश को लागू करने के लिये पुलिस प्रशासन को कहीं भी सख़्ती या दंडात्मक कार्यवाही करने की ज़रूरत शायद नहीं होगी। जागरूक नागरिक और प्रगतिशील सिविल सोसायटी समय की ज़रूरत समझते हुए लगता है पूरे प्रदेश में ही कुछ समय में ऐसे लाउड स्पीकर या तो खुद ही उतार देेंगे या उनकी आवाज़ इतनी कम कर देंगे जिससे दूसरे वर्ग के लोगों को कोई कष्ट ना हो। सीएम योगी की यह पहल एक तरह से फ़साद की जड़ खत्म करने जैसा है। हम लोग आज 21 वीं सदी मेें जी रहे हैं। हम सबको यह समझना चाहिये कि आपसी प्रेम भाईचारे और शांति के बिना ना तो कोई समाज प्रगति कर सकता है और ना ही सदा लड़ता टकराता घृणा करता और पक्षपात व हिंसा के साथ आगे बढ़ सकता है। हम सबको सह अस्तित्व और पूरी दुनिया को परिवार मानने का अपना दावा कार्यान्वित करके विश्व के सामने एक उदाहरण रखना होगा। अन्यथा हम सब अपना आर्थिक नुकसान बढ़ाने को अभिषप्त होेंगे।                                          

 *0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।*

Saturday, 16 April 2022

बाबूजी

*स्व. श्री बाबूसिंह चैहान साहब की मिशनरी पत्रकारिता बेमिसाल!*
0दैनिक बिजनौर टाइम्स रोज़ाना ख़बर जदीद और चिंगारी दैनिक के संस्थापक प्रकाशक और प्रथम संपादक व वरिष्ठ जनवादी लेखक स्व. श्री बाबूसिंह चैहान साहब ने बिजनौर जि़ले एवं पश्चिमी यूपी के आसपास के क्षेत्रों को मात्र ये अख़बार ही नहीं दिये थे। बल्कि इन समाचार पत्रों के ज़रिये मिशनरी पत्रकारिता का एक पौधा भी लगाया था। जो आज बड़ा वृक्ष बनकर लहलहा रहा है। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि जिन उसूलों मक़सद और मंजि़ल के लिये बाबूजी ने कांटों भरा सफ़र तय किया। आज समाज सरकार और देश के मुख्यधारा के मीडिया ने उन जनहित के मुश्किल रास्तों को छोड़कर अवसरवाद पूंजीवाद और झूठ व नफ़रत का शाॅर्टकट से लाभ का रास्ता अपना लिया है।
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
   आज से 23 साल पहले यानी इस दुनिया को अलविदा कहने से पहले
चैहान साहब अकसर कहा करते थे कि आज दुनिया पंूजीवाद के रास्ते पर चल रही है। जिससे हमारा देश भारत भी अछूता नहीं रह सकता। वे यह भी कहा करते थे कि हम अपने अख़बारों को मिशनरी पत्रकारिता के तौर पर चला रहे हैं और आगे भी तमाम चुनौतियां और नुकसान उठाकर चलाते रहेंगे। लेकिन जो बड़े कारोबारी घराने अपने अख़बार पत्रिकायें या टीवी चैनल व्यवसायिक लाभ के लिये चला रहे हैं। वे कम से कम न्यूनतम सामाजिक नैतिक और निष्पक्षता के मापदंड तो अपनायें। उनका कहना था कि कारोबार करना बुरी बात नहीं है। ना ही कारोबार से लाभ कमाने की इच्छा रखना गलत है। लेकिन ख़बरें और लेख सच व तथ्यों पर ही आधारित होने चाहियें। बाबूजी का दो टूक कहना था कि आप अपने मुनाफे या सत्ता में बैठे आकाओं व अफसरों से बेजा लाभ लेने को झूठ नफरत और असामाजिक विषय वस्तु नहीं परोस सकते। उनका मशवरा था कि आप बेशक मीडिया को बिज़नेस के तौर अपनायें लेकिन उसको पूरी ईमानदारी सच्चाई और निष्पक्षता से करें। वे अकसर पत्रकारों के कार्यक्रमों जनसभाओं और गष्ठियों में कहा करते थे कि आज सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन पूंजीपतियों धनवानों और काॅरपोरेट ग्रुप्स को पत्रकारिता की एबीसीडी नहीं पता, वे बड़े बड़े पत्रकारों संवाददाताओं और लेखकों को वेतन पर रखकर यह बता रहे हैं कि वे ख़बर और लेख कैसे लिखें? किसके पक्ष और किसके खिलाफ लिखें? यहां तक कि उनको झूठ और नफरत परोसने में भी कोई बुराई नज़र नहीं आती अगर उनको इसका लाभ मिल रहा होता है। हालांकि यह वह दौर था जब चैहान साहब शुरूआती दौर में ही पहचान रहे थे कि हमारे देश में जब 1991 में एल पी जी यानी लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल नीतियां लागू कर पूंजीवाद के लिये सरकारें देश के दरवाजे़े ही नहीं बल्कि खिड़की और रोशनदान तक पूरी शिद्दत से खोलने में लगीं थीं। बाबूजी तभी उस ख़तरे को भांपकर आगाह कर रहे थे कि यह रास्ता विनाश का है। उनका कहना था कि अगर मीडिया पूंजी का गुलाम हो जायेगा। सरकार उस पर पूंजीपतियों पर नकेल डालकर अपना एजेंडा थोपने लगेगी तो फिर मिशनरी पत्रकारिता करना लोहे का चना चबाने जैसा हो जायेगा। जो सब नहीं कर पायेंगे। धीरे धीेरे लघु और मीडियम क्लास अखबार बंद होने लगेंगे। उनके लिये दोहरा संकट खड़ा हो जायेगा। एक तो वे बड़े मीडिया हाउस के पत्र पत्रिकाओं और रंगीन टीवी चैनलों के मुकाबले लंबे समय तक टिक नहीं पायेंगे। दूसरे सरकार की निर्भरता जब उनका प्रसार कम होते जाने से उनपर घटने लगेगी तो आगे चलकर बड़े बड़े काॅरपोरेट घरानों का मेन स्ट्रीम मीडिया पर कब्ज़ा हो जायेगा। जो देश के आम आदमी ही नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिये भी एक बड़ा ख़तरा बन सकता है। आज बाबूजी की वो आशंका सच होती नज़र आने लगी है। विपरीत हालात और आर्थिक तंगी के बावजूद मिशनरी पत्रकारिता का साहसिक रास्ता न छोड़ने वाले गिने चुने अख़बार और चैनलों में बि.टा. ग्रुप को सबसे आगे रखने में श्री चंद्रमणि रघुवंशी और श्री सूर्यमणि रघुवंशी आज भी ‘‘गुरूकुल रीत सदा चली आई प्राण जाई पर वचन न जाई’’ को निभा रहे हैं। जो वचन उन दोनों ने अपने पिताश्री को उनके जीते जी दिया था। जनहित की जो पत्रकारिता चैहान साहब अपने विषम समय में भी कर गये वो आज के पत्रकारों के लिये मशाल का काम कर रही है। बिजनौर टाइम्स और चिंगारी के ज़रिये उन्होंने जनपद बिजनौर को आवाज़ प्रदान की। उनके ललित निबंध ‘दर्पण झूठ बोलता है’, हों या उनकी चर्चित ख़बर ‘भूखा मानव क्या करेगा?’ उनके व्यक्तित्व का आईना रहे हैं।  हालांकि उनके जीते जी भी और आज भी बिजनौर टाइम्स ग्रुप पर लेखनी से समझौता करने के बार दबाव आये लेकिन इस ग्रुप ने कभी अपने उसूलों से समझौता नहीं किया। चैहान साहब की कलम ने हमेशा बेबाक लिखा और सच लिखा। उनकी इसी साफगोई और निडरता से ही उनको कई राष्ट्रीय और इंटरनेशनल पुरस्कार व सम्मान भी मिले। उनको एक बार नहीं अनेक बार विदेश भ्रमण पर सरकारी प्रतिनिधि मंडल मंे जाने का सम्मान भी हासिल हुआ। विदेश दौरों से लौटकर उन्होंने अपने यात्रा संस्मरण भी कई माह तक किश्तों में लिखे। जब जनपद वासियों की प्यास इन संस्मरणों से भी नहीं भरी तो उन्होंने जनता की अपील पर सीध्ेा संवाद कर नगर नगर और गांव गांव अपनी यात्रा का आंखो देखा हाल सीध्ेा बयान किया। सबसे बड़ी बात यह थी कि जहां उनके प्रतिनिधिमंडल में शामिल अन्य बड़े बड़े नामचीन पत्रकारों में अधिकांश विदेश जाकर घूमते फिरते और मौज मस्ती करते थे। वहीं चैहान साहब विदेशांे की लाइब्रेरी म्यूजि़यम और वहां के लोगों से संवाद करने में अपना अधिकांश समय बिताते थे। इसके साथ ही न केवल इन सब बातों पर समय लगाते थे बल्कि जब सब साथी रात में चैन की नींद सो जाते थे। बाबूजी रात रात भर जागकर दिन भर की बातों को कलमबंद करते थे। उन दिनों कम्पयूटर स्मार्टफोन और इंटरनेट का दौर तो था नहीं। इसलिये सारे दिन का हाल अपने हाथ से कलम से ही डायरी मेें नोट करना होता था। कमाल और हैरत की बात यह थी कि चैहान साहब हर समय रिपोर्टिंग और कलम काॅपी का इस्तेमाल नहीं करते थे। लेकिन फिर भी 24 घंटे की एक एक बात अपनी तेज़ याददाश्त के बल पर हू ब हू शब्दों में बयान कर देते थे। हमेें याद है मंदिर मस्जिद आंदोलन के दौरान जब 1990 के दशक में आज की तरह चंद अख़बारों मेें झूठी साम्प्रदायिक और भड़काउू रिपोर्टिंग की गई थी तो चैहान साहब चट्टान की तरह उनके रास्ते में विरोध जताने को खड़े हो गये थे। उन्होंने अपनी सोच के निष्पक्ष और निडर सेकुलर पत्रकारों के साथ मिलकर ऐसी घटिया फेक और पेड न्यूज की न केवल निंदा की बल्कि उनको घसीटकर पै्रस कौंसिल में ले जाने वालों का समर्थन किया। बाद में जांच होने पर दोषी पाये गये झूठे अख़बारों की प्रैस कौंसिल ने भी निंदा की और भविष्य में ऐसी भूल न दोहराने की चेतावनी दी। अंत में यही कहा जा सकता है कि चैहान साहब भले ही आज मौजूद नहीं हैं। लेकिन यह संतोष की बात है कि बिजनौर टाइम्स और चिंगारी के रूप में उनके विचारों की मशाल उनके सुपुत्र चांद और सूरज की तरह रोशन किये हुए हैं। अगर मिशनरी पत्रकारिता को जीवित रखना है और चैहान साहब को सच्ची श्रध््दांजलि अर्पित करनी है तो न केवल बिजनौर टाइम्स परिवार रघुवंशी बंधु इस ग्रुप से जुड़े पत्रकार बल्कि पूरे समाज को उन मूल्यों की रक्षा करनी होगी जिनके लिये पूरे जीवन बाबूजी निडरता और समर्पण से कड़ा संघर्ष करते रहे थे।
0 मैं यह नहीं कहता कि मेरा सर ना मिलेगा,
 लेकिन मेरी आंखों में तुझे डर ना मिलेगा।।        
  *(लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाॅम के ब्लाॅगर और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)*

विवादित सपा

*विवादों से घिरी सपा का भी भगवान ही मालिक है?*

0 यूपी के चुनाव मंे कांग्रेस और बसपा का सूपड़ा पूरी तरह साफ़ होने के बारे में तो काफी चर्चा हो रही है। लेकिन मुख्य विपक्षी दल बनी सपा का वोट 22 से 32 प्रतिशत और सीट 47 से 125 होने पर यह सच छिप गया है कि उसको भी यादव और मुसलमानों के अलावा लगभग सभी अन्य हिंदू जातियों ने नकार दिया है। इसकी बहुत सी वजह हो सकती हैं। लेकिन सपा के माथे पर अपने विगत कार्यकाल में लगे अनेक आरोप उसका पीछा नहीं छोड़ पा रहे हैं। इतना ही नहीं अखिलेश ने पिछले दिनों एमएलसी के चुनाव में जिस तरह 34 में से 21 प्रत्याशी यादव उतारे उससे एक बार फिर यह चर्चा तेज़ हुयी है कि सपा समाजवादी यानी सर्व समाज की तो क्या उन मुसलमानों को भी बराबर प्रतिनिधित्व नहीं देती जिन्होंने उसे एकतरपफा वोट दिये।  

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      सपा में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। एक बार फिर अखिलेश और शिवपाल में टकराव शुरू हो गया है। यह लगभग तय है कि शिवपाल आज नहीं तो कल भाजपा में जा सकते हैं। इसके साथ ही यह भी साफ नज़र आ रहा है कि शिवपाल अपने साथ सपा संगठन और यादव जाति का काफी बड़ा हिस्सा सपा से तोड़कर भाजपा में ले जायेंगे। आने वाले लोकसभा के चुनाव में आप देखेंगे कि यादव समाज का 2019 के लोकसभा चुनाव से भी बड़ा वर्ग भाजपा के साथ जायेगा। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी यादव वोट के चाचा भतीजे के गुटों में बंटवारा होने से भाजपा को दो तिहाई बहुमत जीतने में आसानी हो गयी थी। हालांकि किसी भी दल में इस तरह के मतभेद होना जीवंत लोकतंत्र की पहचान मानी जाती है। लेकिन यहां मतभेद नहीं मनभेद का मामला है। साथ ही अखिलेश और शिवपाल में यह टकराव किसी स्तर पर भी वैचारिक नहीं है। शिवपाल को लगता है कि जिस तरह से वे कई दशक से मुलायम सिंह के साथ मिलकर सत्ता और संगठन चला रहे थे। जब मुलायम सिंह ने राजनीति से सन्यास लिया तो उनका पहला हक़ विरासत पर बनता था। लेकिन मुलायम ने पुत्र मोह में यह ताज अखिलेश के सर पर रख दिया। मुलायम सिंह चूंकि बहुत घाघ और मंझे हुए नेता हैं। इसलिये उन्होंने शिवपाल की जगह अखिलेश को उत्तराधिकार सौंपते हुए यह नाटक किया जैसे वे तो शिवपाल के साथ हों और उनको ही सपा और सत्ता की कमान सौंपना चाहते हों। लेकिन अखिलेश ऐसा उनको करने नहीं दे रहे हों?जबकि सच यह है कि मुलायम सिंह ने सोची समझी रण्नीति के हिसाब से जिस दिन अखिलेश को सीएम बनाने का एलान किया था। उसी दिन सपा से भी शिवपाल का दख़ल अमल खत्म होना तय हो गया था। इतिहास गवाह है कि संगठन सत्ताधारी गुट के साथ ही जाता है। दूसरी तरफ शिवपाल की एक मजबूरी मायावती की तरह और भी है। उन्होंने मंत्री रहते जितने उल्टे सीध्ेा काम कर रखे हैं। अगर सपा इस बार सत्ता में आ जाती तो उनकी जान बची रहती या फिर वे भाजपा में चले जायेंगे तो उनको गांगा की तरह पाक साफ मान लिया जायेगा। फिलहाल हम इस मामले की और अधिक गहराई मंे नहीं जायेंगे। इस पर फिर कभी विस्तार से लिखेंगे। सवाल यह है कि सपा का भविष्य क्या है? यह तय है कि अगर बसपा की तरह सपा के सत्ता में आने की संभावना चुनाव दर चुनाव कम होती जायेगी तो उसका कोर वोट बैंक भी बसपा के दलित की तरह दूसरे विकल्प तलाशने शुरू कर देगा। जहां तक यादवों का सवाल है। उनको भाजपा में जाने में कोई विशेष परेशानी न तो पहले कभी थी न ही आगे होने वाली है। सपा का दूसरा सबसे मज़बूत और यादवों से भी बड़ा वोटबैंक मुसलमान इस बार उसको इतिहास का सबसे अधिक वोट देकर भी उसके सरकार ना बना पाने से काफी परेशान उदास और बेचैन नज़र आ रहा है। उधर बहनजी बार बार मुस्लिम समाज को जानबूझकर इस भूल का एहसास कराने के नाम पर गुमराह कर रही हैं कि उनको अगर भाजपा को हराना था तो सपा के साथ नहीं बल्कि बसपा के साथ आना चाहिये था। मायावती यह भी याद दिला रही है कि उनका दलित वोटबैंक यादवों से दो गुना है। उनका यह कहना भी किसी हद तक सही लगता है कि अगर मुसलमान पूरी तरह बसपा का साथ देते नज़र आते तो दलित वोट का जो हिस्सा भाजपा के साथ चला गया वह भी बसपा के साथ मज़बूती से बना रहता। उनकी इस बात में भी दम है कि संघ परिवार ने कानो कान यह प्रोपेगंडा करके कि वह चुनाव बाद मायावती को राष्ट्रपति बनायेगा, दलित समाज को बहकाकर उनका कुछ वोट धोखे से भाजपा को दिला दिया। लेकिन इन सब बातों के बावजूद मायावती कांग्रेस नेता राहुल गांधी के इस आरोप का अभी तक ठीक से जवाब नहीं दे पा रही हैं कि उनको भाजपा ने जांच के नाम पर जेल भेजने का डर दिखाकर इस चुनाव में चुपचाप घर बैठने को मजबूर किया था। दूसरी बात मायावती यह समझने को तैयार नहीं है कि मुसलमानों को छोड़ो उन पर आज उनका वफादार दलित वोट बैंक भी भरोसा ना कर भाजपा के साथ जा रहा है। हमें लगता है कि भाजपा की बी टीम मानी जाने वाली बसपा को मुसलमान औवेसी की एमआईएम की तरह आगे भी भाव नहीं देगा। जहां तक सपा का सवाल है। उससे भी मुसलमानों का मोहभंग होना शुरू हो सकता है क्योंकि केवल सीट व वोट बढ़ने या विपक्ष में रहने से ही अगर काम चल जाया करता तो दिल्ली और पंजाब मंे भाजपा विरोधी मतदाता कांग्रेस को छोड़कर आप का रूख़ ना करते। सपा की सत्ता में रहते जो छवि यादववादी जातिवाद मुस्लिम धार्मिक तुष्किरण परिवारवाद करप्शन घोटाले और कमज़ोर लाॅ एंड आॅर्डर को लेकर बनी है। वह आगे भी टूटती नज़र नहीं आ रही है। अखिलेश जिस तरह से 2017 का चुनाव हारने के बाद चुपचाप घर बैठकर ट्विटर पर कुछ चुनिदा मुद्दों पर ट्वीट कर डिजिटल पाॅलिटिक्स करते रहे हैं। उससे आगे भी सपा का भगवान ही मालिक है। अखिलेश ने अपने सबसे बड़े मुस्लिम वोट बैंक के लिये इतना भी नहीं किया कि वे सीएए के खिलाफ उनके आंदोलन का खुलकर समर्थन करते या धरने प्रदर्शन मंे उनके साथ सड़क पर उतरते। साथ ही सपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री सांसद आज़म खान को जिस तरह से भाजपा सरकार ने जानबूझकर निशाने पर लिया, अखिलेश उस पर भी प्रतीकात्मक विरोध करते रहे। मुसलमानों की एक के बाद एक हो रही माॅब लिंचिंग पर भी अखिलेश बहुत बच बचकर औपचारिक बयान देकर खानापूरी करते नज़र आये। महंगाई किसान व्यापारी बेरोज़गारी लगातार गिरती अर्थव्यवस्था लचर कानून व्यवस्था और दलित उत्पीड़न पर भी अखिलेश जिस तरह होंट सीकर बैठे रहे। उससे सपा का आगे भी भविष्य उज्जवल नज़र नहीं आ रहा है। हालांकि उन्होंने जिस सूझबूझ से आज़मगढ़ की सांसदी छोड़कर अब यूपी में नेता विपक्षी दल बनकर ज़रूरी मुद्दों पर ज़बान खोलनी शुरू की है। वह उम्मीद जगाता है।                                       

*0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।*

बाबा साहब

*विडंबनाः बाबा साहब को मानते हैं, बाबा साहब की नहीं मानते?*


014 अपै्रल को बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर की जयंती थी। पूरे देश में यह दिन बड़े ध्ूामधाम से मनाया गया। खासतौर पर सरकारों ने इस दिन बहुत आडंबर किये। इसके पीछे दलित समाज को खुश करने का नाटक अधिक था। लेकिन बाबा साहब ने भारत का जो संविधान बनाया था। उस पर कोई चलने को तैयार नहीं है। यह ठीक ऐसी ही बात है जैसे हिंदू समाज पूरे विश्व को एक परिवार बताता है। लेकिन जब वर्ण व्यवस्था और अल्पसंख्यकों का सवाल आता है तो इसका एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ खुलेआम खड़ा हो जाता है। ऐसे ही मुसलमान इस्लाम की बड़ी बड़ी बातें करते हैं। लेकिन जब अमल की बात आती है तो पैगं़बर का सब्र छोड़कर कई जगह रामनवमी के जुलूस में कुछ सिरफिरों के उकसाने पर चंद पत्थर उछालकर खुद मुसीबत मोल ले लेते हैं।     


                  -इक़बाल हिंदुस्तानी


      कहने को हमारे देश में लोकतंत्र है। चुनी हुयी सरकारें हैं। पुलिस है। कोर्ट हैं। जांच एजेंसियां हैं। मीडिया हैं। संविधान है। चुनाव आयोग सूचना आयोग मानव अधिकार आयोग अल्पसंख्यक आयोग सीबीआई और ईडी जैसी कथित स्वायत्त संस्थायें हैं। यानी कानून का राज बताया जाता है। लेकिन वास्तव में क्या सब नागरिकों के अधिकार समान हैं? व्यवहार में तो ऐसा बिल्कुल भी नज़र नहीं आता है। विडंबना यह है कि हमारे पीएम सीएम एमपी एमएलए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सभी संविधान की शपथ लेकर अपने पद ग्रहण करते हैं। लेकिन हम देख रहे हैं कि कई मामलों में आयेदिन इस शपथ के विपरीत वे आजकल पूरी निडरता और क्रूरता से काम करने में हिचक नहीं रहे हैं। विधानमंडलों में पक्षपातपूर्ण कानून बनाने से लेकर पुलिस के द्वारा अपने विरोधी लोगों को टारगेट करने में अब उनको ज़रा भी लज्जा नहीं आती है। क्या संविधान इसकी इजाज़त देता है? नहीं देता तो आप डा. अंबेडकर को काहे झूठमूठ की श्रध्दांजलि का नाटक करते हो? अब एक नया संविधान विरोधी चलन देखने में आ रहा है कि अगर किसी पर दंगा या किसी अपराध का आरोप लगता है तो उस पर अपराध साबित होने से पहले ही पुलिस प्रशासन सत्ता में बैठे अपने आकाओं का राजनीतिक एजेंडा लागू करने के लिये उसके घर या दुकान व अन्य प्रोपर्टी पर बुल्डोज़र चलवा देता है। क्या कानूनन बिना नोटिस दिये कोई सरकार ऐसा कर सकती है? नहीं कर सकती। यूपी में तो सीएम येागी ने यह कहकर इस तरह के मामलों पर कुछ हद तक रोक लगा दी है कि केवल कुख्यात अपराधियों पर ही बुल्डोज़र की कार्यवाही की जाये, गरीबों पर बिल्कुल नहीं। एमपी में हालत यह है कि तीन लोग जो पहले से एक मामले में जेल में थे। उनके खिलाफ भी मुकदमा लिखा गया। उनमें से एक का घर भी बुल्डोज़र से तोड़ दिया गया। सवाल यह भी है कि जिन पर भी दंगे या सरकारी सम्पत्ति को नुकसान पहंुचाने पथराव या अन्य कोई अपराध का आरोप लगा।उनके घर के दूसरे सदस्य कैसे अपराधी हो गये? घर में तो आरोपी के साथ साथ पूरा परिवार रहता है। क्या बुल्डोज़र चलाये गये सभी घरों की रजिस्ट्री यानी मालिक वही आरोपी था। जिनका बताकर मकान तोड़ा गया है? अगर ये घर गैर कानूनी ज़मीन या गैर कानूनी तरीके से बिना नक़्शा पास कराये बनाये गये थे तो पहले ही क्यों नहीं तोड़े गये थे? आज दंगा होने पर एक वर्ग विशेष को सबक सिखाने और एक वर्ग विशेष को तुष्टिकरण कर उनसे थोक में वोट लेकर अनैतिक तरीके से एक साल में होने वाले चुनाव मंे चुनाव जीतने को यह सब सोची समझी योजना के तहत करने का विपक्ष का आरोप सही नज़र नहीं आ रहा है? अपवाद के तौर पर कभी कहीं हो जाता तो इन हरकतों को नज़र अंदाज़ भी किया जा सकता था। लेकिन ऐसा एक दो बार नहीं एक दो राज्यों में नहीं कई राज्यों में एक पार्टी की सरकारें लगातार कर रही हैं तो क्या इसे कानून का राज कहा जा सकता है? क्या इसे संविधान का राज कहा जा सकता है? क्या ऐसा करने वाले बाबा साहब के समर्थक हो सकते हैं? अगर किसी को लगता है कि वे ऐसा करके सही कर रहे हैं तो उनको चाहिये कि वे लोकतंत्र का दिखावा भी बंद कर दें। चुनाव का नाटक का भी ना किया करें। संविधान की शपथ भी ना लिया करें। स्वायत्त संस्थाओं को भी भंग कर दें। तत्काल इमरजैंसी का ऐलान कर दें। पूरी तरह तानाशाह बन जायें। साम्राज्यवादी मनमानी अत्याचारी अन्यायपूर्ण और पक्षपातपूर्ण शासन व्यवस्था लागू करने का ऐलान कर ये सब करें। यही हाल आज कर्नाटक में है। कभी हिजाब कभी हलाल बनाम झटका और कभी मंदिर परिसरों में लगने वाले मेलों से एक वर्ग विशेष को बाहर किया जा रहा है। वहां भी एक साल के भीतर चुनाव होने हैं। अब यह बात ढकी छिपी नहीं रह गयी है कि एक संस्था और एक दल खुलेआम एक वर्ग विशेष का दानवीकरण करने पर तुला है। इस वर्ग के खिलाफ धर्म संसद के नाम पर आयेदिन ज़हर उगला जा रहा है। जुलूसों में लाउड स्पीकर लगाकर जबरन इस वर्ग के इलाकों में जाकर गंदी गंदी गालियां दी जा रही है। खुलेआम हथियार लहराये जा रहे हैं। सरकारें अव्वल तो इन मामलों का संज्ञान ही नहीं लेती। जब मामला कोर्ट में चला जाता है तो मजबूरन हल्की धाराओं मेें एफआईआर दर्ज की जाती हैं। इसके बाद सत्ता के इशारे पर जांच के नाम पर केस को कमज़ोर किया जाता है। नतीजा यह होता है कि कोर्ट से आरोपियों को जल्दी ही ज़मानत मिल जाती है। आरोपी फिर से अपने नफरत और झूठ फैलाने के मिशन में लग जाते हैं। दूसरी तरफ अल्पसंख्यक और संघ परिवार की विचार धारा का विरोध करने वाले बहुसंख्यक वर्ग के मामलोें मेें ज़रूरत से ज्यादा तेज़ी दिखाई जाती है। 

उनके मामलों में धारायें भी अधिक गंभीर लगाई जाती हैं। उनकी ज़मानतों का कोर्ट में लगातार विरोध किया जाता है। उधर कोर्ट जहां पहले छोटे छोटे मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर पिछली सरकारों से सख़्ती से जवाब तलब करते थे। आजकल देखने में आ रहा है कि या तो सरकार के खिलाफ आने वाले केस सुनवाई के लिये लिस्टेड ही नहीं होते या फिर उन पर कोर्ट राहत देने में पहले जैसे उदार नहीं रहे हैं। कोर्ट के मामलों में अधिक कुछ इसलिये भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उनके पास कोर्ट की मानहानि का केस चलाने की पाॅवर है। सुप्रीम कोर्ट के एक चीफ जस्टिस ने कहा था कि इंसाफ केवल होना ही नहीं चाहिये बल्कि होता हुआ नज़र भी आना चाहिये। इतना तो साफ है कि आज न्याय हो भी रहा हो तो वह नज़र नहीं आ रहा है। इतना ही नहीं सरकारों ने संविधान के खिलाफ काम करके भी विरोध के रास्ते बंद कर दिये हैं।                                        

*0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।*