Wednesday, 8 December 2021

एम एस पी और किसान


 

एम एस पी: धनवानों के लिये है पैसा किसानों के लिये नहीं ?

0मोदी सरकार समझ रही थी कि तीन कृषि कानून वापस लेते ही किसान आंदोलन तत्काल ख़त्म हो जायेगा। उसको यह भी लग रहा था कि ऐसा करने से उससे नाराज़ किसान खासतौर पर पंजाब के सिख और पश्चिमी यूपी के जाट आने वाले पांच राज्यों के चुनाव में उसके साथ बिना किसी अगर मगर के थोक में खड़े हो जायेंगे। यह लेख लिखे जाने तक किसान आंदोलन न केवल चल रहा है बल्कि शहीद किसानों के परिवारों को मुआवज़ा व आंदोलन सम्बंधी मुकदमे वापस लेने की मांग सहित सरकार और किसानों के बीच एम एस पी को लेकर पंेच फंस गया है। सही मायने मंे यह एम एस पी नहीं मोदी सरकार के प्रति किसानों का अविश्वास का मामला अधिक है।

              

       एक साल से चल रहा किसान आंदोलन अपने आप में विश्व इतिहास पहले ही बन चुका है। मोदी के पहले कार्यकाल और इस बार के आध्ेा कार्यकाल में शायद ऐसा पहला मौका है। जब मोदी सरकार को जनता के किसी वर्ग के सामने झुकना पड़ा है। लेकिन ऐसे जन आंदोलन सफल होने के बाद यह भी होता रहा है कि जब सरकार दो क़दम पीछे हटती है तो आंदोलनकारी अपनी सफलता से साहस बढ़ने की वजह से उसको चार क़दम और पीछे धकेलने लगते हैं। सच तो यह है कि सरकार जिन तीन कृषि कानूनों को बनाकर किसानों की नज़र में विलेन बनी थी। उनको बिना शर्त वापस लेकर वहीं आ चुकी है। जहां से वह चली थी। लेकिन अब सही मौका  देखकर किसानों ने अपनी दूसरी अहम मांगों पर ज़ोर इसलिये देना शुरू किया है क्योंकि वे जानते हैं कि अब तवा गर्म है। अगर लंबा खिंचने या सरकार के आक्रामक रूख़ के कारण किसान आंदोलन भटक जाता या हिंसक होकर अराजकता का शिकार हो जाता तो सरकार उसको कभी का खत्म कर चुकी होती लेकिन अब चूंकि सरकार चुनाव की वजह से दबाव में आ गयी है तो किसान आगे से उसके ऐसा कानून बनाने का रास्ता बंद करने को एमएसपी की गारंटी मांग रहे हैं। ज़ाहिर है कि सरकार गारंटी का मतलब बखूबी समझती है। लेकिन अब वह ऐसी दुविधा में फंस गयी है कि न तो एमएसपी कानून बनाना चाहती है और न ही ऐसा करने से सीध्ेा मना कर सकती है। ऐसे में उसने कमैटी बनाने इस पर चर्चा करने और इस मुद्दे को टालने की लंबी कवायद की चाल चली है। सरकार चाहती है कि किसानों से टकराव हुए बिना किसी तरह फिलहाल आंदोलन ख़त्म हो जाये। जिससे आने वाले 5 राज्यों के चुनाव में उसको कम से कम नुकसान हो। उसने किसानों की पराली जलाना निरपराध होने की मांग भी समय रहते स्वीकार कर ली है। 689 किसानों के आंदोलन के दौरान शहीद होने को लेकर पहले तो केंद्र सरकार ने उसके पास कोई आंकड़ा उपलब्ध न होने का बहाना लेकर बचना चाहा लेकिन जब किसाना जि़द पर अड़ गये तो मोदी सरकार ने यह मामला राज्यों के अधिकार क्षेत्र में बताकर बीच का रास्ता निकाला। सीधी बात है कि भाजपा की राज्य सरकारें मोदी सरकार की सलाह किसी कीमत पर टाल नहीं सकती। उधर विपक्षी सरकारों ने पहले ही किसानों की शेष मांगों पर अमल करना शुरू कर दिया था। जिससे केंद्र सरकार पर किसानों का और अधिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक ही था। अब लगभग सभी राज्य सरकारें किसानों के खिलाफ आंदोलन के दौरान दर्ज केस भी वापस लेने को तैयार नज़र आ रही हैं। शहीद किसानों की वास्तविक संख्या का मामला सुलझने के बाद देर सवेर किसान परिवारों को मुआवज़ा मिलने का रास्ता भी खुल ही जायेगा। असली पेंच एम एस पी यानी फ़सलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइस पर फंसने का अंदेशा है। सरकार का दावा रहा है कि तत्काल यह इसलिये संभव नहीं है क्योंकि सरकार की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। सरकार का यह भी कहना है कि किसानों की मांग के अनुसार सभी फ़सलों पर एमएसपी की गारंटी देने से सरकार को हर साल 17 लाख करोड़ से अधिक का धन उपलब्ध कराना होगा। जबकि किसानों का कहना है कि सरकार इस मामले में दोहरा रूख़ अपना रही है। उनका आरोप है कि एक तरफ मोदी सरकार जहां अपने चहेते पूंजीपतियों कारपोरेट और चुनावी चंदा देने वाले अपने मित्रों को बैंक कर्ज ना चुकाने के बावजूद जनता के खून पसीने की कमाई से बड़ी मात्रा में राइट आॅफ यानी दिवालिया कानून के तहत एक तरह से माफ कर रही है। वहीं उन किसानों को मात्र 36,105 करोड़ रूपया एमएसपी में देने से मंुह चुरा रही है। जिनकी बदौलत देश का बजट जीडीपी और आधे से अधिक रोज़गार क्षेत्र चलता है। हाल ही में आॅल इंडिया बैंक एम्पलाइज़ एसोसियेशन ने 13 ऐसे बड़े डिफाल्टर कारोबारियोें की सूची जनहित में सार्वजनिक की है। जिसमें मोदी सरकार ने 4,46,800 करोड़ की देनदारी वाले इन काॅरपोरेट की कुल लोन की 64 प्रतिशत रकम बट्टा खाते में डालकर मात्र 1,61,820 करोड़ में मामला निबटा दिया है। हैरत और दुख  की बात यह है कि कुछ खासमखास उद्योगपतियों की तो इस लिस्ट में 95 फीसदी तक कर्ज़ राशि माफ कर दी गयी है। इतना ही नहीं जब से मोदी सरकार बनी है। उसने अपनी पसंद के ऐसे काॅरपोरेट घरानों की लगभग हर साल ही इतनी या इससे अधिक लोन की रकम माफ की है। विपक्ष का आरोप है कि इन धन्नासेठों से इसके बदले भाजपा ने मोटी रकम चुनावी चंदे के तौर पर ली है। हालांकि यह काम कांग्रेस सहित लगभग सभी दल जब जब सत्ता में रहे हैं। कम या अधिक छिपकर या खुलेआम करते ही रहे हैं। लेकिन भाजपा ने ऐसा लगता है। सभी सीमायें पार कर ली हैं। यह बात अब आईने की तरह साफ होती जा रही है कि भाजपा जनता को हिंदू मुस्लिम में उलझाकर ना केवल दोनोें वर्गों का लगातार रोज़गार शिक्षा चिकित्सा जीएसटी नोटबंदी लाॅकडाउन बंैकिंग चार्ज एटीएम चार्ज टैक्स टोल महंगाई भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी कालाधन रेल व बस किराया बढ़ाकर नुकसान करती जा रही है। वहीं अपने चहेते मुट्ठीभर पूंजीपतियों उद्योगपतियों धन्नासेठों व्यवसाइयों व्यापारियों और चहेते पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों का भरपूर जायज़ नाजायज़ भला व बचाव कर रही है। यही कारण है कि देश की कुल पंूजी और जीडीपी का लाभ चंद हाथों तक सीमित हो रहा है। इससे अमीर और अमीर व गरीब और गरीब होता जा रहा है। किसान आंदोलन की सफलता ने न केवल लोकतंत्र को मज़बूत किया है बल्कि जनता के सभी वर्गों को आंखे खोलकर धर्म जाति व भावनाओं की क्षणिक राजनीति के जाल में ना फंसकर जीवन के बुनियादी मुद्दों पर सोचने समझने और आने वाले समय में आर्थिक सामाजिक सुरक्षा प्रगति व विकास के असली मुद्दों पर चिंतन मनन करने का मौका भी दिया है।                           

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

 

        

  


Saturday, 27 November 2021

संविधान दिवस

सरकार बनाम विपक्ष: संविधान दिवस मनाते हैं मानते कहां है ?

0 26 नवंबर को सरकार ने औपचारिता पूरी करने के लिये संविधान दिवस मनाया। इस प्रोग्राम का लगभग सभी 15 विरोधी दलों ने बहिष्कार किया। उनका आरोप था कि सरकार संविधान पर अमल नहीं कर रही हैै। उधर पीएम मोदी ने जवाबी आरोप लगाया कि परिवारवादी दल संविधान के लिये ख़तरा हैं। सच तो यह है कि सरकार हो या विपक्ष संविधान की कसौटी पर कोई भी पूरी तरह से खरा नहीं उतर रहे हैं। यह ठीक है कि जब कांग्रेस और विपक्षी दल सत्ता में रहे तब भी संविधान पूरी तरह से लागू नहीं हुआ लेकिन अगर फेसलांे व कानूनों के हिसाब से देखें तो मोदी सरकार ने तो खुद संविधान विरोधी काम करने का रिकाॅर्ड तोड़ दिया है।

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       संविधान दिवस पर पीएम मोदी ने बिना विपक्षी दलों का नाम लिये कहा है कि जिन दलों में लोकतंत्र नहीं है वे राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर संविधान का एक पेज भी नहीं लिख सकते। मोदी ने इशारों में खासतौर पर कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि जो दल परिवारवाद पर चल रहे हैं। उनसे संविधान की भावना पर चलने की कैसे आशा की जा सकती है? इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे देश के लगभग सभी दलों में लोकतांत्रिक तरीके से चुनाव और अन्य महत्वपूर्ण निर्णय नहीं होते। लेकिन यह भी सच है कि संविधान और लोकतंत्र की अव्हेलना करने मंे भाजपा आज सबसे आगे निकल चुकी है। सवाल यह भी है कि राजनीतिक दल परिवारवाद और लोकतंत्र का विरोध करते हुए मनमाने ढंग से चलकर भी कैसे सत्ता में आ जाते हैं? उनको बहुमत से चुनकर सत्ता में लाने वाली जनता का संविधान उसके मूल्यों और लोकतंत्र में कितना विश्वास है? सबसे पहले बात कांग्रेस की करते हैं। देश आज़ाद होने के बाद नेहरू के पहला पीएम बनने से लेकर उनकी पुत्री इंदिरा गांधी के सत्ता और कांग्रेस की बागडोर संभालने तक सरकार और कांग्रेस में काफी हद तक लोकतंत्र था। इसका प्रमाण यह है कि नेहरू ने तत्कालीन जनसंघ वामपंथी और अपने धुर विरोधियों को भी देशहित में अपने मंत्रिमंडल से लेकर संवैधानिक संस्थाओं में जगह दी। इसके साथ ही कांग्रेस पार्टी के मुखिया बनने से लेकर पीएम बनने तक का मौका गांधी परिवार से बाहर के लोगों को भी उनकी योग्यता और नेतृत्व क्षमता की बदौलत कई बार मिला। लेकिन इंदिरा गांधी के कांग्रेस और सरकार की कमान संभालने के बाद वनमैन शो की संविधान विरोधी और अलोकतांत्रिक परंपरा मज़बूत होती गयी। उसका परिणाम देश को दो साल आपातकाल यानी तानाशाही के रूप में भुगता पड़ा। लेकिन इसका एक सुखद पहलू यह था कि पहली बार कांग्रेस की मनमानी के खिलाफ विपक्ष एक साथ खड़ा हुआ और जनता पार्टी की सरकार बनी। गांधी परिवार का वर्चस्व तोड़ने को 1989 में दूसरी बार विपक्षी सरकार जनमोर्चा के नेतृत्व में वीपी सिंह की बनी। उसके बाद पहले गैर भाजपा संयुक्त मोर्चा और फिर राजग की गठबंधन सरकार वाजपेयी के नेतृत्व में पहले एक साल को और फिर पूरे कार्यकाल को बनी जिसने पहली बार किसी विपक्षी सरकार के रूप में अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया क्योंकि यह बहुमत के लिये कांग्रेस पर आश्रित नहीं थी। लेकिन संघ परिवार और भाजपा विपक्ष में रहते जैसे बड़े बड़े दावे करते थे। ऐसा कुछ सरकार बनने और पूरे पांच साल चलने के बावजूद वे साबित नहीं कर सके। हालांकि 2004 से 2014 तक यूपीए की कांग्रेस के नेतृत्व में मनमोहन सरकार चली लेकिन बहुमत जुटाने के बावजूद सोनिया गांधी को पीएम नहीं बनने देना भाजपा का संविधान विरोधी काम माना गया। इतना ही नहीं जब से देश में मोदी सरकार बनी है। तब से संविधान को सबसे बड़ा ख़तरा माना जा रहा है। इसकी वजह यह है कि मोदी सरकार की कथनी करनी में ज़मीन आसमान का अंतर है। मोदी के पीएम रहते सरकार में कोई फैसला लोकतांत्रिक तरीके से नहीं लिया जा रहा है। यहां तक कि भाजपा सरकारों के सीएम भी बिना विधायकों की पसंद जाने रातो रता बदल दिये जाते हैं। यूपीए सरकार के दौरान जो भाजपा सोनिया गांधी पर मनमोहन सरकार के फैसलों में अलोकतांत्रिक दख़ल देने का आरोप लगाती थी। आज उसने लोकतंत्र और संविधान को मज़ाक बना दिया है। मोदी सरकार को एक तरह से अप्रत्यक्ष रूप से आरएसएस चला रहा है। मोदी सरकार एक भी फैसला बिना संघ की सहमति के नहीं ले सकती है। खुद मोदी नोटबंदी लोकडाउन और तीन कृषि कानून वापस लेने से पहले अपनी कैबिनेट की सहमति तक नहीं लेते। चर्चा तो यहां तक है कि मोदी सरकार का कोई भी मंत्री अपनी मर्जी से कोई भी सरकारी काम नहीं कर सकता। हर छोटे से छोटे फैसले के लिये उनको संघ और मोदी पर निर्भर रहना पड़ता है। मोदी सरकार ने सीबीआई आरबीआई ईडी इनकम टैक्स चुनाव आयोग सतर्कता आयोग सीएजी मानव अधिकार आयोग सूचना आयोग पिछड़ा वर्ग आयोग अल्पसंख्यक आयोग दलित आयोग दिल्ली पुलिस फिल्म सेंसर बोर्ड नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो प्रैस कौंसिल आॅफ इंडिया और केंद्रीय विश्वविद्यालयों से लेकर ऐसी लगभग सभी संवैधानिक संस्थाओं आयोगों और स्वतंत्र संगठनों की आज़ादी स्वायत्ता व शक्ति छीन ली है। जिनको संविधान ने लोकतंत्र की मज़बूती और रक्षा के लिये सरकार की पकड़ से काफी सीमा तक अलग रखा था। हालत यह है कि जिस धर्म साम्प्रदायिकता और नफरत की राजनीति को परवान चढ़ाकर आज भाजपा सत्ता में है। उसकी संविधान किसी कीमत पर इजाज़त नहीं देता। मोदी राज में मीडिया ही नहीं अदालतों तक को जजों की नियुक्ति और कुछ के रिटायर होने के बाद सरकारी पद देकर अपने हिसाब से चलाने के विपक्ष जो आरोप लगाता रहा है, उससे सबसे अधिक संविधान को ख़तरा है। अब तो निष्पक्ष और विख्यात विदेशी संस्थायें भी मोदी सरकार पर देश में संविधान लोकतंत्र धर्मनिर्पेक्षता मानवता अल्पसंख्यकों और समान नागरिक अधिकारों के लिये पक्षपाती बताकर बार बार उंगली उठा रही हैं। एनआरसी सीएए यूएपीए लवजेहाद एंटी रोमियो धर्मांतरण तीन तलाक गोहत्या और तीन विवादित कृषि कानून सहित अनेक ऐसे संविधान विरोधी कानून भाजपा सरकारें बना रही हैं या बिना कानून के एक वर्ग विशेष जाति विशेष महिलाओं बच्चो अल्पसंख्यकों या सभी वर्गों के गरीब कमजोर और असहाय लोगों को पुलिस प्रशासन के द्वारा सरकारों की शह पर सताये जाने पक्षपात किये जाने और टारगेट किये जाने के विपक्ष आरोप लगाता रहा है जो कि पूरी तरह संविधान लोकतंत्र और समानता के खिलाफ माने जाते हैं।                        

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।

Monday, 22 November 2021

कृषि कानून की वापसी


किसान कानूनों की वापसी लोकतंत्र की जीत ?

0 अब तक का रिकाॅर्ड तो यही बताता है कि पीएम मोदी एक बार कोई फ़ैसला कर लें तो उससे पीछे नहीं हटते। लेकिन 3 विवादित कृषि कानूनों की वापसी से यह धारणा टूटी है। हालांकि अभी गारंटी से यह नहीं कहा जा सकता कि ये काले कानून फिर से किसी और रूप और उचित समय पर वापस नहीं आयेेेंगे। जैसा कि भाजपा नेता और राजस्थान के गवर्नर कलराज मिश्र और भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कहा भी है कि फिलहाल के हालात में कानून वापस लिये गये हैं। अगर चुनाव में हार के डर से भी ऐसा हुआ है तो इसे बचे खुचेे लोकतंत्र की जीत माना जाना चाहिये।

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       3 किसान कानून जिस तरह शाॅर्टकट से जल्दीबाज़ी में संसद से पास हुए थे। तभी से यह आरोप लग रहे थे कि मोदी सरकार काॅरपोरेट के पक्ष में किसानों के हितों की बलि चढ़ा रही है। दुर्भाग्य से विपक्ष न तो राज्यसभा में सरकार के अल्पमत में होने के बाद भी और न ही सड़कों पर कोई बड़ा आंदोलन चलाकर सरकार को इन काले कानूनों की वापसी के लिये मजबूर कर सका। उधर सुप्रीम कोर्ट में जब इन विवादित कानूनों के खिलाफ जनहित याचिका दाखि़ल की गयीं तो सबसे बड़ी अदालत ने इन पर कुछ समय के लिये रोक तो लगा दी थी लेकिन इनकी वैधता पर विचार करने को जो हाईपाॅवर कमैटी बनाई उस पर किसानों ने भरोसा नहीं किया। उधर सरकार ने शुरू शुरू में तो इन कानूनोें के विरोध पर कान ही नहीं दिये। साथ ही किसानों को इनके विरोध में आंदोलन करने से रोकने को दिल्ली को सील कर दिया। उनके रास्ते में कीलें और दीवारें बना दी गयीं। सरकार ने दिखावे के लिये किसानों से बात भी की लेकिन वह कानून किसी हाल में वापस न लेने पर अड़ी रही जिससे कोई बीच का रास्ता नहीं निकल सका। पहले सरकार ने किसानोें के आंदोलन को चंद प्रोफेशनल व आंदोलनजीवी लोगों का व्यवसायिक स्वार्थ वाला मामूली आंदोलन बताया। उसके बाद विरोध करने वाले किसानों को अमीर मुट्ठीभर किसानों की संज्ञा दी गयी। इसके बाद ऐसे किसानों को विपक्ष का एजेंट बताकर पाॅलिटिकल एजेंडा चलाने का अभियान चलाया गया। इसके बाद इन कानूनों का विरोध करने वालों को विदेशी शक्तियोें के इशारे पर देशविरोधी क़रार देकर सोशल मीडिया पर टूलकिट बनाकर साजि़श रचने के मामले मंे किसानों को गुमराह करने का आरोप लगाकर दिशा रवि जैसी एक युवा समाज सेविका को जेल भेजा गया। इसके बाद इसी साल 26 जनवरी को जब किसान लालकिले पर प्रतीक रूप से अपना विरोध दर्ज कराने को जा रहे थे। तब भी उन पर बड़ा षड्यंत्र का हिस्सा होने का आरोप लगाकर कई गंभीर केस दर्ज किये गये। इतना ही नहीं 12 जनवरी को सरकार के अटाॅर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में इन कानूनों पर सुनवाई के दौरान यहां तक आरोप लगाया कि किसानों के विरोध प्रदर्शन की आड़ में दिल्ली की सीमा पर खालिस्तानियों ने अपनी पैठ बना ली है। जबकि इसकी वजह किसान आंदोलन में पंजाब के सिख किसानों की बड़ी भागीदारी होना था। इस दौरान जहां एक केंद्रीय मंत्री और हरियाणा के सीएम पर आंदोलनकारी किसानों को धमकाने और मंत्री पुत्र पर किसानों पर जानबूझकर जीप चढ़ाने का आरोप लगा। वहीं लगभग 700 किसानों के इस दौरान शहीद होने के बावजूद पीएम से लेकर भाजपा के किसी सीएम या बड़े नेता ने सहानुभूति का एक शब्द नहीं बोला। ऐसे में मृतक किसानों के परिवारों को मुआवज़ा देने का तो सवाल ही नहीं उठता। इतना कुछ होने के बावजूद पीएम ने इन काले कानूनों को वापस लेने के ऐलान के दौरान एक बार भी यह नहीं माना कि ये किसान विरोधी कानून लाना उनकी सरकार की भूल थी। उनका दावा था कि उनकी तपस्या में कुछ कमी रह गयी। उन्होंने यह भी स्वीकारा कि वे किसानों को इन कानूनों के उनके ही पक्ष में होने के लाभ नहीं समझा पाये। अब यह बात अलग है कि जब लाभ थे ही नहीं तो वे समझाते कैसेकृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का शुरू से ही दावा था कि विरोध करने वाले चंद किसान हैं। जबकि बड़ी संख्या में किसान इन कानूनों के पक्ष में हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब ऐसा था तो सरकार ने इन कानूनों को वापस लेकर अधिकांश किसानों का अहित क्यों कियालोकतंत्र तो बहुमत से चलता है। इसका जवाब यह माना जा सकता है कि अगले साल के शुरू मंे यूपी सहित पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को इन कानूनों के रहते अपनी हार का डर कुछ अधिक ही सता रहा था। पंजाब में कांग्रेस से अलग हुए पूर्व सीएम कैप्टन अमरेंद्र सिंह अब भाजपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं। इसके साथ भाजपा का पूर्व साहयोगी अकाली दल भी फिर से उसके साथ आने पर विचार कर सकता है। उधर कानून वापसी से हरियाणा में भाजपा के सहयोगी जाट नेता दुष्यंत चैटाला भाजपा सरकार में बने रहेंगे। यूपी में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर लगा है। यहां खराब कानून व्यवस्था से लेकर बेलगाम पुलिस रिश्वतखोर नौकरशाही जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार सिमटते सरकारी स्कूल बढ़ती महंगाई बेरोज़गारी और रूका हुआ विकास सीएम योगी के लिये किसानों का विरोध ताबूत में आखि़री कील की तरह साबित होने का ख़तरा लग रहा था। हालांकि योगी की अपनी कट्टर हिंदूवादी छवि के चलते भाजपा की जीत को पहले से  कुछ वोट और सीट घटने के बावजूद संघ पक्का मानकर चल रहा है। अब किसान कानून वापसी से यूपी में ही नहीं अन्य चार राज्यों में भी भाजपा को सियासी नुकसान कम होगा। इससे एक बात साफ हो गयी है कि भाजपा हिंदू मुस्लिम के मुद्दे पर भावनाओं की राजनीति करके एक दो बार तो सरकार बना सकती है। लेकिन आर्थिक भौतिक सामाजिक यानी जीवन के बुनियादी मुद्दों को दरकिनार करके लगातार न तो चुनाव जीत सकती है ना ही अपनी जि़द मनमानी और साम्प्रदायिक नीतियों से सत्ता में टिकी रह सकती है। चुनाव में हार के डर सेे ही सही विपक्ष के अपर्याप्त विरोध और बिके हुए गोदी मीडिया से ना सही लेकिन किसानों ने अपनी मेहनत लगन और कुरबानी से अपनी जायज़ बात मनवाकर लोकतंत्र को एक बार फिर से जि़दा कर दिया है। अब देखना यह है कि आगे देश के अन्य वर्ग भी मोदी और भाजपा सरकारों के जनविरोधी कामों का किसानोें की तरह जबरदस्त विरोध करते हैं कि नहीं और भाजपा सरकार उन की मांगों पर भी झुकती है या फिर से आगे मौका देखकर होमवर्क कर विरोध से निबटने की पूरी तैयारी कर घुमा फिराकर कृषि कानून एक बार फिर वापस लाती है?                   

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

 

         

  


Sunday, 7 November 2021

योगी बनाम केजरीवाल


मोदी का हिंदुत्व कार्ड छीन सकते हैं योगी या केजरीवाल?

0 स्व0 अटल बिहारी वाजपेयी लालकृष्ण आडवाणी नरेंद्र मोदी के बाद योगी या केजरीवालकट्टरपंथ साम्प्रदायिकता और जातिवाद जैसी चुनावी धरणाओं में आपने देखा होगा कि इनके नायक एक के बाद एक पहले वाले से और अधिक उग्र संकीर्ण व आक्रामक होते जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता का बड़ा वर्ग अपने मूल बुनियादी मुद्दों को छोड़कर आगे भी मोदी के और अधिक कट्टर विकल्प आदित्यनाथ योगी को यूपी के आगामी चुनाव में जिताकर भविष्य का पीएम बनाने का सपना देख रहा है या फिर नरम हिंदुत्व के साथ साथ सबके विकास का प्रतीक बने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के बाद पूरे देश में विस्तार का मौका मिल सकता है?

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

          पहले गुजरात जिस तरह से हिंदुत्व की प्रयोगशाला माना जाता था। उसी तरह से आज यूपी योगी के नेतृत्व में हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला बन गया है। वैसे तो योगी सीएम बनने से पहले कई बार सांसद रहे। लेकिन वे कभी किसी सरकार में मंत्री नहीं रहे। उनको बिना शासन का अनुभव कराये सीध्ेा यूपी जैसे बड़े प्रदेश का सीएम बनाने का फैसला आरएसएस ने बहुत सोच समझकर ही किया था। जिस तरह से गुजरात के सीएम रहते और केंद्र में पीएम बनकर भी मोदी संघ की कोई बात नहीं टालते। ठीक इसी तरह योगी भी संघ को किसी बात पर नाराज़ नहीं करते हैं। यही उनकी उनकी सबसे बड़ी ताकत है। पिछले दिनों उत्तराखंड कर्नाटक और गुजरात में भाजपा ने एक के बाद एक अपने पुराने और धुरंधर सीएम एक झटके में बदल डाले लेकिन योगी को हटाने की हिम्मत नहीं की। योगी की शक्ति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने भाजपा हाईकमान और मोदी शाह के चाहने के बावजूद एक ब्रहम्ण पूर्व नौकरशाह को अपने मंत्रिमंडल में लेने से साफ मना कर दिया लेकिन उनको किसी ने ऐसा करने या पद छोड़ने को मजबूर नहीं किया। दरअसल यह संघ की ही सपोर्ट थी जो योगी के पीछे चट्टान की तरह खड़ी रही है। अब सवाल यह है कि योगी का हिंदुत्व माॅडल यूपी में उनके ही नेतृत्व में फिर से जीत हासिल करेगाअमित शाह ने यहां तक कह दिया है कि अगर योगी यूपी में फिर से जीतकर सरकार बनाते हैं तो ही 2024 में मोदी भी पीएम बन पायेंगे। यह बात सच है कि योगी अपनी कट्टर हिंदूवादी सोच की वजह से यूपी में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। लेकिन विकास रोज़गार कानून व्यवस्था कोरोना संकट भ्रष्टाचार शिक्षा चिकित्सा यानी जीवन के बुनियादी क्षेत्रों में उनका रिकार्ड अच्छा नहीं है। विपक्ष ने उनकी छवि सबसे अधिक अल्पसंख्यक विरोधी बना दी है। उन पर नौकरशाही में अपनी जाति के लोगों को बढ़ावा देने का आरोप भी लगता रहा है। लेकिन सीट और वोट घटने के बावजूद उनकी यूपी में फिर से जीत के आसार अधिक नज़र आते हैं। दूसरी तरफ मोदी के हिंदुत्व के तौर तरीकों की नकल करते हुए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी का पूरे देश मेें विस्तार करने का सपना देख रहे हैं। हालांकि आज भी देश में भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है। लेकिन लोग मोदी या भाजपा से नाराज़ होने के बाद क्या 50 साल तक आज़माई हुयी कांग्रेस पार्टी को एक और मौका देंगे या केजरीवाल जैसे नरम हिंदुत्व के साथ दिल्ली विकास का माॅडल लेकर चल रही आम आदमी पार्टी जैसी जुमा जुमा आठ दिन की पार्टी को केवल और केवल उसके भाजपा एजेंडे की नक़ल करने से धीरे धीरे कुछ राज्यों में उसकी ओर आकृषित होने लगेंगेयह भी हो सकता है कि कम्युनिस्टों के साथ बंगाल बिहार और यूपी की क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस की बजाये आप जैसी पार्टियों से गठबंधन कर राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा मोर्चा खड़ा करें। आप टीएमसी के बाद अकेली पार्टी है जिसका विस्तार अब तक दिल्ली से बाहर पंजाब गुजरात गोवा और उत्तराखंड में होने जा रहा है। अगले साल पांच राज्यों के चुनाव के बाद वह देश की आठवीं राष्ट्रीय स्तर की मान्यता पाने वाली पार्टी बन सकती है। हालांकि केंद्र की सत्ता में पैर जमाने या अपने समर्थन से सरकार बनाने में आप को अभी कई दशक भी लग सकते हैं। लेकिन अरविंद केजरील जिस तरह से नरम हिंदुत्व का कार्ड खेल रहे हैं। उससे साफ नज़र आ रहा है कि भाजपा का विकल्प कांग्रेस वामपंथी या क्षेत्रीय दल आज इसलिये नहीं बन सकते क्योंकि इन सबकी छवि संघ परिवार ने हिंदू विरोधी देशविरोधी और मुसलमान समर्थक बना दी है। आप ने इस रण्नीति को समझा है। केजरीवाल ने राष्ट्रवाद हिंदू इतिहास और सेना का महिमामंडन शुरू कर दिया है। वो दिल्ली में सार्वजनिक रूप से हनुमान मंदिर जाते हैं। साथ ही सरकारी स्तर पर दिवाली की पूजा करते हैं। वे शाहीन बाग़ के आंदोलन और दिल्ली दंगों पर राजनीतिक गुण भाग के हिसाब से चुप्पी साध जाते हैं। वे जेएनयू के कन्हैया और उमर खालिद पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति दे देते हैं। वे दिल्ली के हिंदू तीर्थ यात्रियों को 2018 में ही रामायण एक्सप्रैस के द्वारा सीतामढ़ी नेपाल के जनकपुर वाराणसी प्रयाग चित्रकूट हम्पी नासिक और रामेश्वरम जैसे तीर्थ स्थलों पर सरकारी खर्च पर रवाना कर चुके हैं। इसके एक महीने बाद ही केजरीवाल ने अपनी सेकुलर छवि को थोड़ा बहुत बचाये रखने के लिये मुसलमानों और सिखों के लिये भी ऐसी ही तीर्थ यात्रा का ऐलान किया था। दिल्ली विधानसभा के चुनाव से पहले जब मोदी ने राम मंदिर के लिये ट्रस्ट की घोषणा की तो केजरीवाल ने सारे विपक्ष से बाजी लेते हुए बयान दिया कि अच्छे काम के लिये कोई सही समय नहीं होता है। हाल ही में केजरीवाल रामलला के दर्शन भी कर आये हैं। उन्होंने उत्तराखंड के चुनाव में देवस्थानम कानून जो कि हिंदू मंदिरों में सरकारी दख़ल की व्यवस्था करता हैको सत्ता में आने पर ख़त्म करने और इस देवभूमि को विश्व की सर्वश्रेष्ठ हिंदू आध्यात्मिक केेंद्र के रूप में विकसित करने का एलान किया है। यह एक तरह से भाजपा से उसका हिंदू कार्ड छीनने का प्रयास माना जा रहा है क्योंकि भाजपा वहां सत्ता में रहते हुए ये काम नहीं कर सकी है। गुजरात में भी केजरीवाल ने चुनाव प्रचार की शुरूआत करते हुए अहमदाबाद के एक मशहूर मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद लेने की पहल की थी। हाल ही में केजरीवाल ने भगत सिंह की जयंती पर स्कूली बच्चो को कोर्स में देशभक्ति पढ़ाने तिरंगा यात्रा का समापन अयोध्या में राम मंदिर में करने दिल्ली में 500 हाईमास्ट तिरंगे लगाने का फैसला भी किया है। अब देखना यह है कि जब राजनीति में भाजपा जैसा कट्टर हिंदूवादी विकल्प मौजूद है तो ऐसे में केजरीवाल के नरम हिंदूवादी विकल्प को केवल सस्ती बिजली निशुल्क पानी और बेहतर इलाज के नाम पर मतदाता कितना पसंद करते हैंया फिर वे योगी के मोदी से भी कट्टर हिंदुत्व नायक और कड़क शासक के साथ बिना किसी ठोस विकास के भी जाने का फैसला करते हैं?               

  


Sunday, 31 October 2021

कांग्रेस की समझ

कांग्रेस नहीं समझती देश का मिज़ाज, लंबा चलेगा भाजपा का राज?

0 इंडियन पाॅलिटिकल स्ट्रेटेजिस्ट और चुनावी विश्लेषक प्रशांत किशोर ने कहा है कि मोदी अगर आने वाले एक दो चुनाव के बाद पीएम नहीं भी बने तो भी भाजपा अगले कई दशक तक भारत की राजनीति के केंद्र में बनी रहेगी। उनका यह भी कहना है कि राहुल गांधी देश का मिज़ाज नहीं समझ पा रहे हैं। उधर बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी कुछ ऐसे ही आरोप कांग्रेस पर लगाते हुए अपनी पार्टी टीएमसी का राज्य से बाहर विस्तार शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि कांग्रेस की कमियों ग़ल्तियों और नालायकी से मोदी लगातार मज़बूत होते जा रहे हैं। लेकिन इधर यूपी में प्रियंका गांधी और हाल ही में राहुल गांधी ने बहुत कुछ नया व अच्छा भी किया है।

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

          2014 के चुनाव में भाजपा से करारी हार के बाद से कांग्रेस को ऐसा लग रहा था कि वह एक बार फिर 1977 1989 और 1996 में उसकी हार के बाद बनी जनता पार्टी जनता दल और संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल पूरा किये बिना गिरने के बाद एक बार फिर से सत्ता में मोदी सरकार की ग़ल्तियों के कारण आराम से वापसी कर लेगी। लेकिन वह यह भूल गयी कि 1998 में वाजपेयी की सरकार 13 महीने बाद ही गिर जाने के बाद वह सत्ता में नहीं लौट सकी थी। उल्टा वाजपेयी की एनडीए सरकार न केवल एक बार फिर से बनी बल्कि वह पूरे 5 साल चली भी थी। यह सच है कि मोदी सरकार के पास उलब्ध्यिों के नाम पर कम लेकिन चुनाव जीतने की रण्नीति के लिये ढेर सारे तौर तरीके मौजूद रहे हैं। यही वजह है कि 2019 में मोदी सरकार न केवल एक बार फिर से जीती बल्कि उसके वोट और सीटें भी पहले से बढ़ गयीं। प्रशांत किशोर और ममता बनर्जी अगर आज कांग्रेस को आईना दिखा रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे कांग्रेस के बजाये भाजपा या मोदी को सपोर्ट कर रहे हैं। सच तो यह है कि वे दीवार पर लिखी इबारत पढ़ने की हिम्मत दिखा रहे हैं। दरअसल आज की भाजपा ने जिस तरह से मोदी के नेतृत्व में दो दो बार केंद्र और कई बार कई राज्यों का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से ही जीतकर धीरे धीरे लोकतंत्र को ही ख़त्म करना शुरू कर दिया है। उस सोची समझी योजना का कोई जवाब यानी विकल्प कांग्रेस और अन्य विरोधी दल अब तक नहीं खोज पा रहे हैं। मिसाल के तौर पर भाजपा ने सभी सेकुलर दलों को हिंदू विरोधी देश विरोधी और मुस्लिम समर्थक साबित करने की एक सोची समझी कांगे्रसमुक्त भारत की मुहिम लंबे समय से शुरू कर रखी है। भाजपा हिंदू साम्प्रदायिकता कट्टरता अंधविश्वास और मुस्लिम विरोधी माॅब लिंचिंग लव जेहाद सीएए एनआरसी पक्षपात अन्याय को राष्ट्रवाद देशभक्ति हिंदूराष्ट्र का चोला पहनाकर बुनियादी मुद्दों रोज़गार शिक्षा स्वास्थ्य विकास सस्ता न्याय कानून व्यवस्था करप्शन कालाधन महंगाई और दूसरी बड़ी समस्याओं से एजेंडा बदलने मंे आज तक सफल है। उसने पूरे देश में अपने 30 से 40 प्रतिशत से अधिक के वोटबैंक में जहां तरह तरह लोगों में से कुछ को कांगे्रस के विकल्प अन्य सेकुलर व जातिवादी दलों क विरोध मुसलमानों के तथाकथित तुष्टिकरण को ख़त्म कर उनको दूसरे दर्जे का डरा हुआ मजबूर नागरिक बनाने तो कुछ को शौचालय उज्जवला जलनल सौभाग्य आयुष्मान किसान सम्मान पीएम आवास योजना पाकिस्तान विरोध राममंदिर कश्मीर से धारा 370 खत्म कर उसे केंद्र शासित राज्य बनाने तो कुछ को दिवाली पर सरकारी पूजापाठ दिये जलाना कांवड़ और कुंभ मेले दशहरे पर सरकारी रामलीला पाकिस्तान को घर में घुसकर मारने का दावा विदेशों में भारत का डंका बजने का झूठा प्रचार वोटबैंक तैयार किया है। ऐसे में 2024 में भी तमाम नुकसान उठाकर भी भाजपा को बार बार चुनाव जिताने वाला एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ आने को तैयार नहीं होगा। आज देश में मीडिया ही नहीं न्यायपालिका तक कई मामलों में सरकार के साथ खड़े नज़र आते हैं। काॅरपोरेट और धन्नासेठ इस हाथ दे उस हाथ ले की नीति पर चलते हुए मोदी सरकार से लगभग सारे सरकारी संसाधनों को लूटने तेज़ी से निजीकरण कराने में सफल हैं। देश मंे पहली बार कारपोरेट टैक्स इनकम टैक्स से कम जमा हुआ है। देश की आधी से अधिक संपत्ति एक प्रतिशत पूंजीपतियों के हाथ में सीमित हो चुकी है। भाजपा सरकार न केवल पुलिस व नौकरशाही बल्कि सीबीआई एनआईए एनसीबी ईडी और अन्य सरकारी एजंसियों मीडिया व राजनीतिक चंदे का इस्तेमाल विपक्ष अपने विरोधियों निष्पक्ष पत्रकारों लेखकों आंदोलनकारी किसानों दलितों अल्पसंख्यकों एनजीओ जनसंगठनों सेकुलर हिंदुओं अपवाद के तौर पर बचे रह गये अख़बारों चैनलों सोशल मीडिया प्लेटफाॅम्र्स के खिलाफ खुलकर कर रही है। कांग्रेस यह नहीं समझ पा रही है कि आज देश में लेविल प्लेयिंग फील्ड नहीं बचा है। कांग्रेस यह मानने को तैयार नहीं है कि उसने अपने कार्यकाल मंे जो कुछ किया उससे भी आज भाजपा को यहां तक पहुंचने की ज़मीन मिली है। कांग्रेस मुसलमानों का मज़हबी तुष्किरण शाहबानोें जैसे मामलों में कर रही थी। वह आज भी उसे भूल नहीं मानती। कांग्रेस ने बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर हिंदू साम्प्रदायिकता जिन्न बोतल से बाहर निकाला वह स्वीकार करने की हिम्मत नहीं दिखाती है। कांग्रेस ने ब्रहम्णों के नेतृत्व में मुसलमान और हरिजनों के बल पर देश में कई दशक तक राज कर न केवल इन दोनों वर्गों का कोई खास भला नहीं किया बल्कि कुल आबादी के 50 प्रतिशत से अधिक पिछड़ों किसानों नौजवानों और गरीबों के कल्याण के लिये नारे से आगे बढ़कर कोई ठोस योजना नया विज़न और दूरगामी प्रोग्राम नहीं बनाया जिससे आज उसको फिर से वापस सत्ता मेें लाने को समाज के किसी वर्ग में कोई हलचल ना होकर जुम्मा जुम्मा आठ दिन की आम आदमी पार्टी या क्षेत्रीय दलों के लिये भाजपा का विकल्प बनने के आसार नज़र आ रहे हैं। अब देखना यह है कि कांग्रेस हाल ही में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की तेज़ होती गतिविधियों के साथ ही भाजपा नहीं पूरे संघ परिवार के प्रोपेगंडे आरएसएस जैसे वैकल्पिक संगठन हिंदू कार्ड और काॅरपोरेट व मीडिया का क्या विकल्प तलाशती है।       

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।

Friday, 15 October 2021

मज़हबी गैंगवार

मानवता के दुश्मनोंमज़हबी गैंगवार बंद करो !

0कश्मीर में पिछले सप्ताह 7 लोगों की हत्या हुयी है। जिनमें 4 अल्पसंख्यक और 3 मुसलमान हैं। इनमें एक कश्मीरी पंडित एक सिख और 2 कश्मीर से बाहर के दलित भी शामिल हैं। पिछले एक साल में कश्मीर में कुल 28 लोगांे की हत्या हुयी है। इनमें भी 7 गै़र मुस्लिम शामिल हैं। इधर पूरे देश में कई मुसलमानों की धर्म के नाम पर माॅब लिंचिंग की ख़बरें भी अब न्यू नाॅर्मल बन चुकी हैं। उनके साथ पुलिस और खासतौर पर भाजपा सरकारों पर क़दम क़दम पर पक्षपात और अन्याय करने का आरोप लगता रहा है। अगर पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान अफ़गानिस्तान और बंग्लादेश में देखें तो वहां भी धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार पक्षपात और हमलों के मामले सामने आते रहते हैं।

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

     किसी भी देश राज्य या क्षेत्र विशेष में किसी की हत्या होना अपराध और चिंता की बात है। लेकिन किसी पर उसके धर्म की वजह से हमला बलात्कार उसको बेघर करना बिल्कुल अलग बात है। कश्मीर में आतंकियों ने 2019 में 36 और 2020 में 33 लोगों की जान उनको पुलिस और सरकार का मुखबिर बताकर ली थी। हिंदू अख़बार के अनुसार स्कूल में जब टीचर सुपिंदर कौर और उनके सहायक दीपक चंद की हत्या हुयी उस दिन अपने बाकी अल्पसंख्यक सहयोगियों को मुस्लिम स्टाफ उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाने गया। ऐसे ही कश्मीरी पंडित माखन बिंद्रू के घर स्थानीय मुसलमान बड़ी संख्या में अफ़सोस जताने और हत्या की निंदा करने को गये। साथ ही पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़ती ने भी उनके घर जाकर हत्या की निंदा करते हुए यह शैतानों का काम बताया। जम्मू के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी दिलबाग़ सिंह ने बयान दिया कि घाटी के सभी वर्गों ने इस हत्या की एक आवाज़ में निंदा की है। हत्याओं को आप संख्या के हिसाब से नहीं धर्म के हिसाब से इसलिये देख सकते हैं क्योंकि इससे कश्मीरी पंडितों में 1990 के दौर की डरावनी यादें ताज़ा हो गयी हैं। उनमें फिर से खौफ़ की लहर दौड़ने लगी है। ठीक ऐसा ही डर और गुस्सा शेष भारत में जब किसी मुसलमान या दलित की हत्या उत्पीड़न या अत्याचार करके उल्टा उसी के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कराया जाता हैपैदा होता है। लेकिन उसपर अब कोई शोर नहीं होता। संघ परिवार ने नागरिकता और अपराध के दो दो पैमाने बना दिये हैं। भाजपा का दावा रहा है कि न्याय सबकोतुष्टिकरण किसी का नहीं। लेकिन व्यवहारिकता में वह इससे कोसों दूर है। मिसाल के तौर पर पूरे देश में तो छोड़ ही दें। कश्मीर में बीजेपी नेता और पंचायत सदस्य राकेश पंडिता की हत्या हुयी तो राज्यपाल शासन में भाजपा सरकार ने उसको 45 लाख मुआवज़ा दिया। लेकिन जब बीजेपी के ही एक मुस्लिम पंचायत सदस्य की हत्या हुयी तो उसको 5 लाख मुआवज़ा दिया गया। शुक्र है कि उसको कम से कम मुआवज़ा दिया तो गया। वर्ना भाजपा शासित राज्यों में जब भी कोई मुस्लिम इस तरह से मारा जाता है ना तो कोई भाजपा नेता कश्मीर के मुस्लिम नेताओं की तरह उसके घर जाने की ज़हमत करता है ना ही उसको न्याय और मुआवज़ा दिलाने की कोई ख़बर अब तक सामने आई है। इस तरह से जो भाजपा यह दावा करती थी कि नोटबंदी और धारा 370 हटाने से कश्मीर में आतंकवाद की कमर टूट जायेगी। वह खुद ही   समाज को बांटने और हर मामले को हिंदू मुस्लिम की नज़र से देखने का काम कर रही है। पक्षपात और अलग अलग पैमानों की हालत यह है कि कश्मीर में जिस दलित वीरेंद्र पासवान की हत्या हुयी थी। सरकार ने उसका शव परिवार के लाख मिन्नतें करने के बावजूद बिहार के भागलपुर ना भेजकर कश्मीर में ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया। यूपी के लखीमपुर में एक मंत्री के बेटे पर अपनी जीप से चार आंदोलनकारी किसानोें को कुचलने का आरोप लगा। बड़ी मुश्किल से मुकदमा कायम हुआ। अभी तक मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया गया। पीएम मोदी ने आज तक इस घटना की निंदा तक नहीं की। मंत्री पुत्र को सीधे पकड़ने की बजाये पुलिस उसके घर पर समन चिपकाती रही। आज जब मंत्री पुत्र पकड़ा भी गया है तो उसको वीआईपी ट्रीटमेंट देने का आरोप किसान लगा रहे हैं। उधर कश्मीर में अल्पसंख्यक की इन हत्याओं के मामले में पूछताछ के लिये अब तक सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। कश्मीर के हालात बता रहे हैं कि वहां आतंकी एक बार फिर से मज़बूत होने का प्रयास कर रहे हैं। आतंकियों ने हाल ही में एक बड़े हमले में पुंछ में कई जवानों को शहीद कर दिया है। सवाल यह है कि जब पहले ऐसा होता था तो गोदी मीडिया वहां की सरकार से सवाल पूछता था। अब वही मीडिया मोदी सरकार से सवाल तलब क्यों नहीं कर रहा कि आप पाकिस्तान आतंकियों और उनके धनश्रोत बंद करने का दावा करते थे तो अब कहां से वे फिर उभर आयेकश्मीर की हर घटना के लिये वहां के बहुसंख्यकों और पाकिस्तान को कोसने से मसला हल नहीं होगा। हालांकि यह सच है कि कश्मीर में अगर आतंकी किसी मुसलमान को मारते हैं तो उसका परिवार या धर्म के लोग कश्मीर छोड़कर भागने की कभी नहीं सोचेंगे। लेकिन कश्मीरी पंडित सिख या दलित के साथ ऐसा होगा तो वे जान बचाकर पलायन को मजबूर हो सकते हैं। ऐसा ही माॅब लिंचिंग से देश के विभिन्न राज्यों में मुसलमानों के साथ डर पैदा होता है। इतना ही नहीं सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वाले मुसलमानों और सेकुलर हिंदुओं के साथ जिस तरह से विभिन्न भाजपा और विशेष तौर पर योगी की सरकार और दिल्ली पुलिस पेश आई वह अपने में डरावना और चिंताजनक है। हमारा कहना है कि कश्मीर हो या शेष भारत संविधान कानून कोर्ट पुलिस और सरकारों को सबके साथ एक जैसा ही व्यवहार करना चाहिये। अगर वे यह समझकर ऐसा नहीं करेंगी कि वे इतनी शक्तिशाली और सक्षम हैं कि उनका पक्षपात अन्याय या अत्याचार करने पर भी कभी कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता तो यह उनकी खुशफहमी है। इतिहास गवाह है कि ऐसे अंग्रेजी़ राज तानाशाह हिटलर सामंतशाही रजवाड़े ज़मींदार तुग़लकशाही एक ना एक दिन खुद अपने कर्मों से ही खत्म हो जाते हैं। बहरहाल मानवता के दुश्मन चाहे जो हों चाहे जहां हो और जितने ताक़तवर हों मज़हब के नाम पर गैंगवार जितनी जल्दी बंद कर दें देश और दुनिया का उतना ही जल्दी भला होगा।          

 मज़हब को लौटा ले उसकी जगह दे दे ,

  इंसान सलीक़े के तहज़ीब करीने की ।।

0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Sunday, 3 October 2021

प्रतीकों की राजनीति

प्रतीकों की राजनीति लोकप्रिय हो सकती हैलोकहितैषी नहीं ?

0 कांग्रेस ने पंजाब मंे पहली बार एक दलित सिख को मुख्यमंत्राी बनाकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। उधर गुजरात में भाजपा ने मुख्यमंत्राी के साथ पूरा मंत्रिमंडल बदलकर राजनीति में एक नया प्रयोग किया है। आज़ादी के बाद कई दशकों तक जिस तरह से कांग्रेस ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ताश के पत्तों की तरह फेंटा है। आज ठीक उसी तरह से भाजपा शासित राज्यों में संघ परिवार कर रहा है। सवाल यह है कि धर्म जाति क्षेत्र घृणा दुष्प्रचार झूठ भावनाओं और प्रतीकों की राजनीति से जनता का भला होता है या नेताओं का?

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

     केंद्र मंे सरकार न होने से कांग्रेस को पहली बार यह अहसास हो रहा है कि जिन राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन करना है। उनके हटाये जाने वाले मुख्यमंत्री को कहां एडजस्ट करेपहले वह उनका दर्जा बढ़ाकर केंद्र में मंत्री किसी आयोग का मुखिया या गवर्नर बनाकर उनकी नाराज़गी या विद्रोह को काबू कर लेती थी। दरअसल सत्ता की अपनी अलग ही पाॅवर होती है। ऐसे में कांग्रेस हो या भाजपा उसका हाईकमान भी बहुत ताक़तवर होता है। आज यह शक्ति संघ प्रमुख और पीएम मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के हाथों में आ गयी है। अगर वे किसी को ना चाहते हुए भी सीएम पद से हटाकर दूसरे को सीएम बना देते हैं तो भूतपूर्व सीएम की यह मजाल नहीं कि वह उनका या पार्टी का राजनीतिक नुकसान कर सके। ऐसा कर्नाटक और उत्तराखंड में भी किया जा चुका है। उत्तराखंड में तो चार माह में ही दो सीएम बदल दिये गये। इस मामले में यूपी के सीएम योगी इसका अपवाद लगते हैं। इसकी वजह उनका कट्टर हिंदूवादी कोर वोट और उनकी पीठ पर संघ का हाथ माना जाता हैै। कांग्रेस ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को केवल उन नौसीखिया नवजोत सिंह सिंधू की वजह से हटा दिया जो खुद कोई गंभीर नेता नहीं है। ऐसा ही फैसला उसने एमपी में सिंधिया को सीएम बनाकर किया होता तो वहां आज भी उसकी सरकार चल रही होती। इतना ही नहीं राजस्थान में सचिन पायलट के साथ वहां के सीएम और कांग्रेस हाईकमान जिस तरह का व्यवहार कर रहा है। आज नहीं तो कल वहां भी बगावत होगी और हो सकता है कि बिना कार्यकाल पूरा किये वहां भी कांग्रेस सत्ता से हाथ धो बैठे। कांग्रेस को दो दो लोकसभा चुनाव हारकर भी यह बात समझ नहीं आ रही कि उसको पार्टी में भी लोकतंत्र बहाल करना चाहिये। पुरानी गल्तियों से सीखना चाहिये। उसको पंजाब में एक दलित सीएम बनाकर लग रहा है कि अगला चुनाव वह केवल इसी मास्टर स्ट्राॅक से जीत सकती है। जबकि इससे ऐसा लगता है। मानो कोई दलित सीएम ही दलितों का भला कर सकता है। यह प्रयोग मायावती यूपी में सीएम बनकर कर चुकी हैं। लेकिन उनके सत्ता में रहते दलितों का कोई खास भला नहीं हुआ। ऐसे ही भाजपा ने जिस तरह से गुजरात में अपना सीएम और पूरा मंत्रिमंडल बदलकर यह संदेश देना चाहा है कि राज्य में जो कुछ हुआ उसके लिये भाजपा या संघ नहीं मुख्यमंत्री और सारे मंत्री जि़म्मेदार थे। जिनको बदल दिया गया है। यही काम जब केरल में कम्युुनिस्टों ने किया था तो सब दलों ने उनकी जमकर निंदा की थी। जबकि उन्होंने सीएम नहीं बदला था। साथ ही यह काम उन्होंने चुनाव बाद किया था। दरअसल भाजपा हो या कांग्रेस वह यह मानकर चलते हैं कि इस तरह की प्रतीकात्मक राजनीति से उनका वोट बैंक उनके साथ बना रहेगा। गुजरात में लगभग दो दशक से भाजपा सरकार लगातार चल रही है। पिछली बार 2017 में भाजपा वहां 99 सीट जीतकर बहुत किनारे पर ही सरकार बना पाई थी। इस बार वह चुनाव मेें एन्टी इंकम्बैसी से बचने को चुनाव से आधा साल पहले मुख्यमंत्री और सारा मंत्रिमंडल बदलकर यह दिखाना चाहती है कि जो काम नाराज़ जनता किसी दूसरी पार्टी को जिताकर करेगी। वह उसने चुनाव से पहले खुद ही कर दिया है। लिहाज़ा इस बार भी उसी को वोट देना। ऐसे ही पंजाब में कांग्रेस चुनाव से आधा साल पहले वहां की आबादी के 32 प्रतिशत दलितों को यह कहना चाहती है कि वह उनकी बड़ी हितैषी है। लिहाज़ा आने वाले चुनाव में कांग्रेस को ही वोट देना। ऐसे ही भाजपा आज जिस तरह से हिंदू वोटबैंक की राजनीति कर रही है। वैसी ही कांग्रेस और सपा बसपा राजद और टीएमसी जैसी सेकुलर पार्टियां मुसलमानों को रिझाकर अपना वोटबैंक बनाकर लंबे समय तक करती रही हैं। सेकुलर दल रोज़ा अफ़तारटोपी लगाकर हर ईद पर ईदगाह जाकर कब्रिस्तानों की दीवार बनवाकर उर्दू अनुवादक नियुक्त कर  चंद मस्जिद के इमामों को वेतन देकर मदरसों को थोड़ी सी ग्रांट देकर मुस्लिम पर्सनल लाॅ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और बाबरी मस्जिद बचाने की दिल को छूने वाली बातें करके उनको लंबे समय तक अपना वोटबैंक बनाकर प्रतीकात्मक राजनीति करते रहे हैं। मोदी खुद को हिंदू राष्ट्रवादी और पिछड़े समाज में पैदा होने वाला बातते हैं। जबकि उनकी सूटबूट की सरकार जिस तरह से पूंजीपतियों कारपोरेट और निजीकरण की किसान मज़दूर गरीब विरोधी आर्थिक नीतियां तेज़ी से अपना रही है। उससे ना केवल पिछड़ों बल्कि शेष हिंदू समाज का भी कारोबार नौकरियों और आर्थिक नुकसान अधिक हो रहा है। इसकी वजह यह है कि उनकी भागीदारी इस क्षेत्र में पहले से ही  अल्पसंख्यकों की आबादी से अधिक रही है। भाजपा आज गैर यादव और गैर जाटव पिछड़े और दलित समाज के एक वर्ग को भी अपने साथ जोड़े रखने के लिये केंद्र और यूपी सहित अन्य भाजपा शासित राज्यों में चुनाव करीब आने पर उनके समाज से मंत्री बनाकर यह जतानी चाहती है कि वह सभी हिंदू जातियों को उनका समान प्रतिनिधित्व दे रही है। इसके साथ ही भाजपा सरकारें हर मुद्दे को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाकर खुलकर साम्प्रदायिक राजनीति भी ठीक उसी तरह से हिंदू भावनाओं के तुष्टिकरण के लिये कर रही है। जिस तरह से कभी कांग्रेस या अन्य क्षेत्रीय धर्मनिर्पेक्ष दल मुसलमानों को खुश करने के लिये करते थे। हालांकि सच्चर कमैटी की रिपोर्ट बता रही है कि इससे मुसलमानों का रोज़गार शिक्षा और स्वास्थ्य या सरकारी योजनाओं में उनकी आबादी से अधिक हिस्सा ना मिलने से अतिरिक्त लाभ नहीं हुआ। लेकिन आज मीडिया इतना झूठ बोल रहा है कि देश में ऐसा माहौल बन गया है। जिससे ऐसा लगता है कि हिंदुओं की तमाम समस्याओं के लिये केवल मुसलमान कसूरवार है। उधर कांवड़ वालों पर फूलों की वर्षा दिवाली पर लाखोें दिये जलाकर और दशहरा पर विदेशी कलाकारों को बुलाकर रामलीला कराकर भाजपा सराकर हिंदुओं को प्रतीकात्मक रूप से ऐसा आभास करा रही है। मानो रोज़गार शिक्षा इलाज अर्थव्यवस्था कालाधन भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था जनता के लिये कोई मायने ही ना रखती हो। कई कई हज़ार करोड़ की बड़ी बड़ी मूर्तियां लगाकर सरकारें ऐसा जता रही हैं। जैसे जनता की सबसे बड़ी ज़रूरत यही हो। आज़ादी के बाद कई दशक तक कांग्रेस ने भी दलितों और मुसलमानों के साथ यही प्रतीकात्मक खेल खेला है। लेकिन शासन प्रशासन में जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी देना नीतिगत रूप से तो सही लगता है। लेकिन किसी भी सरकार को चाहे उसका मुखिया किसी भी जाति या धर्म का हो ऐसे काम करने चाहिये। जिनसे सबका भला हो। जनता को आज सोचना चाहिये कि इस तरह से धर्म जाति नफरत और झूठ के नाम पर हर बार वोट देकर वो जीवन के असली मुद्दों से भटककर किसका भला कर रही हैअपना या नेताओं का जो नारों दावों और बड़े बड़े बयानों से आगे बढ़कर सबका विकास और सबका विश्वास हासिल नहीं कर पा रहे हैं।            

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।