Sunday, 7 November 2021

योगी बनाम केजरीवाल


मोदी का हिंदुत्व कार्ड छीन सकते हैं योगी या केजरीवाल?

0 स्व0 अटल बिहारी वाजपेयी लालकृष्ण आडवाणी नरेंद्र मोदी के बाद योगी या केजरीवालकट्टरपंथ साम्प्रदायिकता और जातिवाद जैसी चुनावी धरणाओं में आपने देखा होगा कि इनके नायक एक के बाद एक पहले वाले से और अधिक उग्र संकीर्ण व आक्रामक होते जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता का बड़ा वर्ग अपने मूल बुनियादी मुद्दों को छोड़कर आगे भी मोदी के और अधिक कट्टर विकल्प आदित्यनाथ योगी को यूपी के आगामी चुनाव में जिताकर भविष्य का पीएम बनाने का सपना देख रहा है या फिर नरम हिंदुत्व के साथ साथ सबके विकास का प्रतीक बने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के बाद पूरे देश में विस्तार का मौका मिल सकता है?

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

          पहले गुजरात जिस तरह से हिंदुत्व की प्रयोगशाला माना जाता था। उसी तरह से आज यूपी योगी के नेतृत्व में हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला बन गया है। वैसे तो योगी सीएम बनने से पहले कई बार सांसद रहे। लेकिन वे कभी किसी सरकार में मंत्री नहीं रहे। उनको बिना शासन का अनुभव कराये सीध्ेा यूपी जैसे बड़े प्रदेश का सीएम बनाने का फैसला आरएसएस ने बहुत सोच समझकर ही किया था। जिस तरह से गुजरात के सीएम रहते और केंद्र में पीएम बनकर भी मोदी संघ की कोई बात नहीं टालते। ठीक इसी तरह योगी भी संघ को किसी बात पर नाराज़ नहीं करते हैं। यही उनकी उनकी सबसे बड़ी ताकत है। पिछले दिनों उत्तराखंड कर्नाटक और गुजरात में भाजपा ने एक के बाद एक अपने पुराने और धुरंधर सीएम एक झटके में बदल डाले लेकिन योगी को हटाने की हिम्मत नहीं की। योगी की शक्ति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने भाजपा हाईकमान और मोदी शाह के चाहने के बावजूद एक ब्रहम्ण पूर्व नौकरशाह को अपने मंत्रिमंडल में लेने से साफ मना कर दिया लेकिन उनको किसी ने ऐसा करने या पद छोड़ने को मजबूर नहीं किया। दरअसल यह संघ की ही सपोर्ट थी जो योगी के पीछे चट्टान की तरह खड़ी रही है। अब सवाल यह है कि योगी का हिंदुत्व माॅडल यूपी में उनके ही नेतृत्व में फिर से जीत हासिल करेगाअमित शाह ने यहां तक कह दिया है कि अगर योगी यूपी में फिर से जीतकर सरकार बनाते हैं तो ही 2024 में मोदी भी पीएम बन पायेंगे। यह बात सच है कि योगी अपनी कट्टर हिंदूवादी सोच की वजह से यूपी में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। लेकिन विकास रोज़गार कानून व्यवस्था कोरोना संकट भ्रष्टाचार शिक्षा चिकित्सा यानी जीवन के बुनियादी क्षेत्रों में उनका रिकार्ड अच्छा नहीं है। विपक्ष ने उनकी छवि सबसे अधिक अल्पसंख्यक विरोधी बना दी है। उन पर नौकरशाही में अपनी जाति के लोगों को बढ़ावा देने का आरोप भी लगता रहा है। लेकिन सीट और वोट घटने के बावजूद उनकी यूपी में फिर से जीत के आसार अधिक नज़र आते हैं। दूसरी तरफ मोदी के हिंदुत्व के तौर तरीकों की नकल करते हुए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी का पूरे देश मेें विस्तार करने का सपना देख रहे हैं। हालांकि आज भी देश में भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है। लेकिन लोग मोदी या भाजपा से नाराज़ होने के बाद क्या 50 साल तक आज़माई हुयी कांग्रेस पार्टी को एक और मौका देंगे या केजरीवाल जैसे नरम हिंदुत्व के साथ दिल्ली विकास का माॅडल लेकर चल रही आम आदमी पार्टी जैसी जुमा जुमा आठ दिन की पार्टी को केवल और केवल उसके भाजपा एजेंडे की नक़ल करने से धीरे धीरे कुछ राज्यों में उसकी ओर आकृषित होने लगेंगेयह भी हो सकता है कि कम्युनिस्टों के साथ बंगाल बिहार और यूपी की क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस की बजाये आप जैसी पार्टियों से गठबंधन कर राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा मोर्चा खड़ा करें। आप टीएमसी के बाद अकेली पार्टी है जिसका विस्तार अब तक दिल्ली से बाहर पंजाब गुजरात गोवा और उत्तराखंड में होने जा रहा है। अगले साल पांच राज्यों के चुनाव के बाद वह देश की आठवीं राष्ट्रीय स्तर की मान्यता पाने वाली पार्टी बन सकती है। हालांकि केंद्र की सत्ता में पैर जमाने या अपने समर्थन से सरकार बनाने में आप को अभी कई दशक भी लग सकते हैं। लेकिन अरविंद केजरील जिस तरह से नरम हिंदुत्व का कार्ड खेल रहे हैं। उससे साफ नज़र आ रहा है कि भाजपा का विकल्प कांग्रेस वामपंथी या क्षेत्रीय दल आज इसलिये नहीं बन सकते क्योंकि इन सबकी छवि संघ परिवार ने हिंदू विरोधी देशविरोधी और मुसलमान समर्थक बना दी है। आप ने इस रण्नीति को समझा है। केजरीवाल ने राष्ट्रवाद हिंदू इतिहास और सेना का महिमामंडन शुरू कर दिया है। वो दिल्ली में सार्वजनिक रूप से हनुमान मंदिर जाते हैं। साथ ही सरकारी स्तर पर दिवाली की पूजा करते हैं। वे शाहीन बाग़ के आंदोलन और दिल्ली दंगों पर राजनीतिक गुण भाग के हिसाब से चुप्पी साध जाते हैं। वे जेएनयू के कन्हैया और उमर खालिद पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति दे देते हैं। वे दिल्ली के हिंदू तीर्थ यात्रियों को 2018 में ही रामायण एक्सप्रैस के द्वारा सीतामढ़ी नेपाल के जनकपुर वाराणसी प्रयाग चित्रकूट हम्पी नासिक और रामेश्वरम जैसे तीर्थ स्थलों पर सरकारी खर्च पर रवाना कर चुके हैं। इसके एक महीने बाद ही केजरीवाल ने अपनी सेकुलर छवि को थोड़ा बहुत बचाये रखने के लिये मुसलमानों और सिखों के लिये भी ऐसी ही तीर्थ यात्रा का ऐलान किया था। दिल्ली विधानसभा के चुनाव से पहले जब मोदी ने राम मंदिर के लिये ट्रस्ट की घोषणा की तो केजरीवाल ने सारे विपक्ष से बाजी लेते हुए बयान दिया कि अच्छे काम के लिये कोई सही समय नहीं होता है। हाल ही में केजरीवाल रामलला के दर्शन भी कर आये हैं। उन्होंने उत्तराखंड के चुनाव में देवस्थानम कानून जो कि हिंदू मंदिरों में सरकारी दख़ल की व्यवस्था करता हैको सत्ता में आने पर ख़त्म करने और इस देवभूमि को विश्व की सर्वश्रेष्ठ हिंदू आध्यात्मिक केेंद्र के रूप में विकसित करने का एलान किया है। यह एक तरह से भाजपा से उसका हिंदू कार्ड छीनने का प्रयास माना जा रहा है क्योंकि भाजपा वहां सत्ता में रहते हुए ये काम नहीं कर सकी है। गुजरात में भी केजरीवाल ने चुनाव प्रचार की शुरूआत करते हुए अहमदाबाद के एक मशहूर मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद लेने की पहल की थी। हाल ही में केजरीवाल ने भगत सिंह की जयंती पर स्कूली बच्चो को कोर्स में देशभक्ति पढ़ाने तिरंगा यात्रा का समापन अयोध्या में राम मंदिर में करने दिल्ली में 500 हाईमास्ट तिरंगे लगाने का फैसला भी किया है। अब देखना यह है कि जब राजनीति में भाजपा जैसा कट्टर हिंदूवादी विकल्प मौजूद है तो ऐसे में केजरीवाल के नरम हिंदूवादी विकल्प को केवल सस्ती बिजली निशुल्क पानी और बेहतर इलाज के नाम पर मतदाता कितना पसंद करते हैंया फिर वे योगी के मोदी से भी कट्टर हिंदुत्व नायक और कड़क शासक के साथ बिना किसी ठोस विकास के भी जाने का फैसला करते हैं?               

  


Sunday, 31 October 2021

कांग्रेस की समझ

कांग्रेस नहीं समझती देश का मिज़ाज, लंबा चलेगा भाजपा का राज?

0 इंडियन पाॅलिटिकल स्ट्रेटेजिस्ट और चुनावी विश्लेषक प्रशांत किशोर ने कहा है कि मोदी अगर आने वाले एक दो चुनाव के बाद पीएम नहीं भी बने तो भी भाजपा अगले कई दशक तक भारत की राजनीति के केंद्र में बनी रहेगी। उनका यह भी कहना है कि राहुल गांधी देश का मिज़ाज नहीं समझ पा रहे हैं। उधर बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने भी कुछ ऐसे ही आरोप कांग्रेस पर लगाते हुए अपनी पार्टी टीएमसी का राज्य से बाहर विस्तार शुरू कर दिया है। उनका कहना है कि कांग्रेस की कमियों ग़ल्तियों और नालायकी से मोदी लगातार मज़बूत होते जा रहे हैं। लेकिन इधर यूपी में प्रियंका गांधी और हाल ही में राहुल गांधी ने बहुत कुछ नया व अच्छा भी किया है।

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

          2014 के चुनाव में भाजपा से करारी हार के बाद से कांग्रेस को ऐसा लग रहा था कि वह एक बार फिर 1977 1989 और 1996 में उसकी हार के बाद बनी जनता पार्टी जनता दल और संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल पूरा किये बिना गिरने के बाद एक बार फिर से सत्ता में मोदी सरकार की ग़ल्तियों के कारण आराम से वापसी कर लेगी। लेकिन वह यह भूल गयी कि 1998 में वाजपेयी की सरकार 13 महीने बाद ही गिर जाने के बाद वह सत्ता में नहीं लौट सकी थी। उल्टा वाजपेयी की एनडीए सरकार न केवल एक बार फिर से बनी बल्कि वह पूरे 5 साल चली भी थी। यह सच है कि मोदी सरकार के पास उलब्ध्यिों के नाम पर कम लेकिन चुनाव जीतने की रण्नीति के लिये ढेर सारे तौर तरीके मौजूद रहे हैं। यही वजह है कि 2019 में मोदी सरकार न केवल एक बार फिर से जीती बल्कि उसके वोट और सीटें भी पहले से बढ़ गयीं। प्रशांत किशोर और ममता बनर्जी अगर आज कांग्रेस को आईना दिखा रहे हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि वे कांग्रेस के बजाये भाजपा या मोदी को सपोर्ट कर रहे हैं। सच तो यह है कि वे दीवार पर लिखी इबारत पढ़ने की हिम्मत दिखा रहे हैं। दरअसल आज की भाजपा ने जिस तरह से मोदी के नेतृत्व में दो दो बार केंद्र और कई बार कई राज्यों का चुनाव लोकतांत्रिक तरीके से ही जीतकर धीरे धीरे लोकतंत्र को ही ख़त्म करना शुरू कर दिया है। उस सोची समझी योजना का कोई जवाब यानी विकल्प कांग्रेस और अन्य विरोधी दल अब तक नहीं खोज पा रहे हैं। मिसाल के तौर पर भाजपा ने सभी सेकुलर दलों को हिंदू विरोधी देश विरोधी और मुस्लिम समर्थक साबित करने की एक सोची समझी कांगे्रसमुक्त भारत की मुहिम लंबे समय से शुरू कर रखी है। भाजपा हिंदू साम्प्रदायिकता कट्टरता अंधविश्वास और मुस्लिम विरोधी माॅब लिंचिंग लव जेहाद सीएए एनआरसी पक्षपात अन्याय को राष्ट्रवाद देशभक्ति हिंदूराष्ट्र का चोला पहनाकर बुनियादी मुद्दों रोज़गार शिक्षा स्वास्थ्य विकास सस्ता न्याय कानून व्यवस्था करप्शन कालाधन महंगाई और दूसरी बड़ी समस्याओं से एजेंडा बदलने मंे आज तक सफल है। उसने पूरे देश में अपने 30 से 40 प्रतिशत से अधिक के वोटबैंक में जहां तरह तरह लोगों में से कुछ को कांगे्रस के विकल्प अन्य सेकुलर व जातिवादी दलों क विरोध मुसलमानों के तथाकथित तुष्टिकरण को ख़त्म कर उनको दूसरे दर्जे का डरा हुआ मजबूर नागरिक बनाने तो कुछ को शौचालय उज्जवला जलनल सौभाग्य आयुष्मान किसान सम्मान पीएम आवास योजना पाकिस्तान विरोध राममंदिर कश्मीर से धारा 370 खत्म कर उसे केंद्र शासित राज्य बनाने तो कुछ को दिवाली पर सरकारी पूजापाठ दिये जलाना कांवड़ और कुंभ मेले दशहरे पर सरकारी रामलीला पाकिस्तान को घर में घुसकर मारने का दावा विदेशों में भारत का डंका बजने का झूठा प्रचार वोटबैंक तैयार किया है। ऐसे में 2024 में भी तमाम नुकसान उठाकर भी भाजपा को बार बार चुनाव जिताने वाला एक बड़ा वर्ग कांग्रेस के साथ आने को तैयार नहीं होगा। आज देश में मीडिया ही नहीं न्यायपालिका तक कई मामलों में सरकार के साथ खड़े नज़र आते हैं। काॅरपोरेट और धन्नासेठ इस हाथ दे उस हाथ ले की नीति पर चलते हुए मोदी सरकार से लगभग सारे सरकारी संसाधनों को लूटने तेज़ी से निजीकरण कराने में सफल हैं। देश मंे पहली बार कारपोरेट टैक्स इनकम टैक्स से कम जमा हुआ है। देश की आधी से अधिक संपत्ति एक प्रतिशत पूंजीपतियों के हाथ में सीमित हो चुकी है। भाजपा सरकार न केवल पुलिस व नौकरशाही बल्कि सीबीआई एनआईए एनसीबी ईडी और अन्य सरकारी एजंसियों मीडिया व राजनीतिक चंदे का इस्तेमाल विपक्ष अपने विरोधियों निष्पक्ष पत्रकारों लेखकों आंदोलनकारी किसानों दलितों अल्पसंख्यकों एनजीओ जनसंगठनों सेकुलर हिंदुओं अपवाद के तौर पर बचे रह गये अख़बारों चैनलों सोशल मीडिया प्लेटफाॅम्र्स के खिलाफ खुलकर कर रही है। कांग्रेस यह नहीं समझ पा रही है कि आज देश में लेविल प्लेयिंग फील्ड नहीं बचा है। कांग्रेस यह मानने को तैयार नहीं है कि उसने अपने कार्यकाल मंे जो कुछ किया उससे भी आज भाजपा को यहां तक पहुंचने की ज़मीन मिली है। कांग्रेस मुसलमानों का मज़हबी तुष्किरण शाहबानोें जैसे मामलों में कर रही थी। वह आज भी उसे भूल नहीं मानती। कांग्रेस ने बाबरी मस्जिद का ताला खुलवाकर हिंदू साम्प्रदायिकता जिन्न बोतल से बाहर निकाला वह स्वीकार करने की हिम्मत नहीं दिखाती है। कांग्रेस ने ब्रहम्णों के नेतृत्व में मुसलमान और हरिजनों के बल पर देश में कई दशक तक राज कर न केवल इन दोनों वर्गों का कोई खास भला नहीं किया बल्कि कुल आबादी के 50 प्रतिशत से अधिक पिछड़ों किसानों नौजवानों और गरीबों के कल्याण के लिये नारे से आगे बढ़कर कोई ठोस योजना नया विज़न और दूरगामी प्रोग्राम नहीं बनाया जिससे आज उसको फिर से वापस सत्ता मेें लाने को समाज के किसी वर्ग में कोई हलचल ना होकर जुम्मा जुम्मा आठ दिन की आम आदमी पार्टी या क्षेत्रीय दलों के लिये भाजपा का विकल्प बनने के आसार नज़र आ रहे हैं। अब देखना यह है कि कांग्रेस हाल ही में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की तेज़ होती गतिविधियों के साथ ही भाजपा नहीं पूरे संघ परिवार के प्रोपेगंडे आरएसएस जैसे वैकल्पिक संगठन हिंदू कार्ड और काॅरपोरेट व मीडिया का क्या विकल्प तलाशती है।       

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।

Friday, 15 October 2021

मज़हबी गैंगवार

मानवता के दुश्मनोंमज़हबी गैंगवार बंद करो !

0कश्मीर में पिछले सप्ताह 7 लोगों की हत्या हुयी है। जिनमें 4 अल्पसंख्यक और 3 मुसलमान हैं। इनमें एक कश्मीरी पंडित एक सिख और 2 कश्मीर से बाहर के दलित भी शामिल हैं। पिछले एक साल में कश्मीर में कुल 28 लोगांे की हत्या हुयी है। इनमें भी 7 गै़र मुस्लिम शामिल हैं। इधर पूरे देश में कई मुसलमानों की धर्म के नाम पर माॅब लिंचिंग की ख़बरें भी अब न्यू नाॅर्मल बन चुकी हैं। उनके साथ पुलिस और खासतौर पर भाजपा सरकारों पर क़दम क़दम पर पक्षपात और अन्याय करने का आरोप लगता रहा है। अगर पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान अफ़गानिस्तान और बंग्लादेश में देखें तो वहां भी धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ अत्याचार पक्षपात और हमलों के मामले सामने आते रहते हैं।

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

     किसी भी देश राज्य या क्षेत्र विशेष में किसी की हत्या होना अपराध और चिंता की बात है। लेकिन किसी पर उसके धर्म की वजह से हमला बलात्कार उसको बेघर करना बिल्कुल अलग बात है। कश्मीर में आतंकियों ने 2019 में 36 और 2020 में 33 लोगों की जान उनको पुलिस और सरकार का मुखबिर बताकर ली थी। हिंदू अख़बार के अनुसार स्कूल में जब टीचर सुपिंदर कौर और उनके सहायक दीपक चंद की हत्या हुयी उस दिन अपने बाकी अल्पसंख्यक सहयोगियों को मुस्लिम स्टाफ उनके घर तक सुरक्षित पहुंचाने गया। ऐसे ही कश्मीरी पंडित माखन बिंद्रू के घर स्थानीय मुसलमान बड़ी संख्या में अफ़सोस जताने और हत्या की निंदा करने को गये। साथ ही पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़ती ने भी उनके घर जाकर हत्या की निंदा करते हुए यह शैतानों का काम बताया। जम्मू के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी दिलबाग़ सिंह ने बयान दिया कि घाटी के सभी वर्गों ने इस हत्या की एक आवाज़ में निंदा की है। हत्याओं को आप संख्या के हिसाब से नहीं धर्म के हिसाब से इसलिये देख सकते हैं क्योंकि इससे कश्मीरी पंडितों में 1990 के दौर की डरावनी यादें ताज़ा हो गयी हैं। उनमें फिर से खौफ़ की लहर दौड़ने लगी है। ठीक ऐसा ही डर और गुस्सा शेष भारत में जब किसी मुसलमान या दलित की हत्या उत्पीड़न या अत्याचार करके उल्टा उसी के खिलाफ़ मुकदमा दर्ज कराया जाता हैपैदा होता है। लेकिन उसपर अब कोई शोर नहीं होता। संघ परिवार ने नागरिकता और अपराध के दो दो पैमाने बना दिये हैं। भाजपा का दावा रहा है कि न्याय सबकोतुष्टिकरण किसी का नहीं। लेकिन व्यवहारिकता में वह इससे कोसों दूर है। मिसाल के तौर पर पूरे देश में तो छोड़ ही दें। कश्मीर में बीजेपी नेता और पंचायत सदस्य राकेश पंडिता की हत्या हुयी तो राज्यपाल शासन में भाजपा सरकार ने उसको 45 लाख मुआवज़ा दिया। लेकिन जब बीजेपी के ही एक मुस्लिम पंचायत सदस्य की हत्या हुयी तो उसको 5 लाख मुआवज़ा दिया गया। शुक्र है कि उसको कम से कम मुआवज़ा दिया तो गया। वर्ना भाजपा शासित राज्यों में जब भी कोई मुस्लिम इस तरह से मारा जाता है ना तो कोई भाजपा नेता कश्मीर के मुस्लिम नेताओं की तरह उसके घर जाने की ज़हमत करता है ना ही उसको न्याय और मुआवज़ा दिलाने की कोई ख़बर अब तक सामने आई है। इस तरह से जो भाजपा यह दावा करती थी कि नोटबंदी और धारा 370 हटाने से कश्मीर में आतंकवाद की कमर टूट जायेगी। वह खुद ही   समाज को बांटने और हर मामले को हिंदू मुस्लिम की नज़र से देखने का काम कर रही है। पक्षपात और अलग अलग पैमानों की हालत यह है कि कश्मीर में जिस दलित वीरेंद्र पासवान की हत्या हुयी थी। सरकार ने उसका शव परिवार के लाख मिन्नतें करने के बावजूद बिहार के भागलपुर ना भेजकर कश्मीर में ही उसका अंतिम संस्कार कर दिया। यूपी के लखीमपुर में एक मंत्री के बेटे पर अपनी जीप से चार आंदोलनकारी किसानोें को कुचलने का आरोप लगा। बड़ी मुश्किल से मुकदमा कायम हुआ। अभी तक मंत्री का इस्तीफा नहीं लिया गया। पीएम मोदी ने आज तक इस घटना की निंदा तक नहीं की। मंत्री पुत्र को सीधे पकड़ने की बजाये पुलिस उसके घर पर समन चिपकाती रही। आज जब मंत्री पुत्र पकड़ा भी गया है तो उसको वीआईपी ट्रीटमेंट देने का आरोप किसान लगा रहे हैं। उधर कश्मीर में अल्पसंख्यक की इन हत्याओं के मामले में पूछताछ के लिये अब तक सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया जा चुका है। कश्मीर के हालात बता रहे हैं कि वहां आतंकी एक बार फिर से मज़बूत होने का प्रयास कर रहे हैं। आतंकियों ने हाल ही में एक बड़े हमले में पुंछ में कई जवानों को शहीद कर दिया है। सवाल यह है कि जब पहले ऐसा होता था तो गोदी मीडिया वहां की सरकार से सवाल पूछता था। अब वही मीडिया मोदी सरकार से सवाल तलब क्यों नहीं कर रहा कि आप पाकिस्तान आतंकियों और उनके धनश्रोत बंद करने का दावा करते थे तो अब कहां से वे फिर उभर आयेकश्मीर की हर घटना के लिये वहां के बहुसंख्यकों और पाकिस्तान को कोसने से मसला हल नहीं होगा। हालांकि यह सच है कि कश्मीर में अगर आतंकी किसी मुसलमान को मारते हैं तो उसका परिवार या धर्म के लोग कश्मीर छोड़कर भागने की कभी नहीं सोचेंगे। लेकिन कश्मीरी पंडित सिख या दलित के साथ ऐसा होगा तो वे जान बचाकर पलायन को मजबूर हो सकते हैं। ऐसा ही माॅब लिंचिंग से देश के विभिन्न राज्यों में मुसलमानों के साथ डर पैदा होता है। इतना ही नहीं सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वाले मुसलमानों और सेकुलर हिंदुओं के साथ जिस तरह से विभिन्न भाजपा और विशेष तौर पर योगी की सरकार और दिल्ली पुलिस पेश आई वह अपने में डरावना और चिंताजनक है। हमारा कहना है कि कश्मीर हो या शेष भारत संविधान कानून कोर्ट पुलिस और सरकारों को सबके साथ एक जैसा ही व्यवहार करना चाहिये। अगर वे यह समझकर ऐसा नहीं करेंगी कि वे इतनी शक्तिशाली और सक्षम हैं कि उनका पक्षपात अन्याय या अत्याचार करने पर भी कभी कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता तो यह उनकी खुशफहमी है। इतिहास गवाह है कि ऐसे अंग्रेजी़ राज तानाशाह हिटलर सामंतशाही रजवाड़े ज़मींदार तुग़लकशाही एक ना एक दिन खुद अपने कर्मों से ही खत्म हो जाते हैं। बहरहाल मानवता के दुश्मन चाहे जो हों चाहे जहां हो और जितने ताक़तवर हों मज़हब के नाम पर गैंगवार जितनी जल्दी बंद कर दें देश और दुनिया का उतना ही जल्दी भला होगा।          

 मज़हब को लौटा ले उसकी जगह दे दे ,

  इंसान सलीक़े के तहज़ीब करीने की ।।

0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Sunday, 3 October 2021

प्रतीकों की राजनीति

प्रतीकों की राजनीति लोकप्रिय हो सकती हैलोकहितैषी नहीं ?

0 कांग्रेस ने पंजाब मंे पहली बार एक दलित सिख को मुख्यमंत्राी बनाकर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। उधर गुजरात में भाजपा ने मुख्यमंत्राी के साथ पूरा मंत्रिमंडल बदलकर राजनीति में एक नया प्रयोग किया है। आज़ादी के बाद कई दशकों तक जिस तरह से कांग्रेस ने राज्यों के मुख्यमंत्रियों को ताश के पत्तों की तरह फेंटा है। आज ठीक उसी तरह से भाजपा शासित राज्यों में संघ परिवार कर रहा है। सवाल यह है कि धर्म जाति क्षेत्र घृणा दुष्प्रचार झूठ भावनाओं और प्रतीकों की राजनीति से जनता का भला होता है या नेताओं का?

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

     केंद्र मंे सरकार न होने से कांग्रेस को पहली बार यह अहसास हो रहा है कि जिन राज्यों में नेतृत्व परिवर्तन करना है। उनके हटाये जाने वाले मुख्यमंत्री को कहां एडजस्ट करेपहले वह उनका दर्जा बढ़ाकर केंद्र में मंत्री किसी आयोग का मुखिया या गवर्नर बनाकर उनकी नाराज़गी या विद्रोह को काबू कर लेती थी। दरअसल सत्ता की अपनी अलग ही पाॅवर होती है। ऐसे में कांग्रेस हो या भाजपा उसका हाईकमान भी बहुत ताक़तवर होता है। आज यह शक्ति संघ प्रमुख और पीएम मोदी व गृहमंत्री अमित शाह के हाथों में आ गयी है। अगर वे किसी को ना चाहते हुए भी सीएम पद से हटाकर दूसरे को सीएम बना देते हैं तो भूतपूर्व सीएम की यह मजाल नहीं कि वह उनका या पार्टी का राजनीतिक नुकसान कर सके। ऐसा कर्नाटक और उत्तराखंड में भी किया जा चुका है। उत्तराखंड में तो चार माह में ही दो सीएम बदल दिये गये। इस मामले में यूपी के सीएम योगी इसका अपवाद लगते हैं। इसकी वजह उनका कट्टर हिंदूवादी कोर वोट और उनकी पीठ पर संघ का हाथ माना जाता हैै। कांग्रेस ने पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह को केवल उन नौसीखिया नवजोत सिंह सिंधू की वजह से हटा दिया जो खुद कोई गंभीर नेता नहीं है। ऐसा ही फैसला उसने एमपी में सिंधिया को सीएम बनाकर किया होता तो वहां आज भी उसकी सरकार चल रही होती। इतना ही नहीं राजस्थान में सचिन पायलट के साथ वहां के सीएम और कांग्रेस हाईकमान जिस तरह का व्यवहार कर रहा है। आज नहीं तो कल वहां भी बगावत होगी और हो सकता है कि बिना कार्यकाल पूरा किये वहां भी कांग्रेस सत्ता से हाथ धो बैठे। कांग्रेस को दो दो लोकसभा चुनाव हारकर भी यह बात समझ नहीं आ रही कि उसको पार्टी में भी लोकतंत्र बहाल करना चाहिये। पुरानी गल्तियों से सीखना चाहिये। उसको पंजाब में एक दलित सीएम बनाकर लग रहा है कि अगला चुनाव वह केवल इसी मास्टर स्ट्राॅक से जीत सकती है। जबकि इससे ऐसा लगता है। मानो कोई दलित सीएम ही दलितों का भला कर सकता है। यह प्रयोग मायावती यूपी में सीएम बनकर कर चुकी हैं। लेकिन उनके सत्ता में रहते दलितों का कोई खास भला नहीं हुआ। ऐसे ही भाजपा ने जिस तरह से गुजरात में अपना सीएम और पूरा मंत्रिमंडल बदलकर यह संदेश देना चाहा है कि राज्य में जो कुछ हुआ उसके लिये भाजपा या संघ नहीं मुख्यमंत्री और सारे मंत्री जि़म्मेदार थे। जिनको बदल दिया गया है। यही काम जब केरल में कम्युुनिस्टों ने किया था तो सब दलों ने उनकी जमकर निंदा की थी। जबकि उन्होंने सीएम नहीं बदला था। साथ ही यह काम उन्होंने चुनाव बाद किया था। दरअसल भाजपा हो या कांग्रेस वह यह मानकर चलते हैं कि इस तरह की प्रतीकात्मक राजनीति से उनका वोट बैंक उनके साथ बना रहेगा। गुजरात में लगभग दो दशक से भाजपा सरकार लगातार चल रही है। पिछली बार 2017 में भाजपा वहां 99 सीट जीतकर बहुत किनारे पर ही सरकार बना पाई थी। इस बार वह चुनाव मेें एन्टी इंकम्बैसी से बचने को चुनाव से आधा साल पहले मुख्यमंत्री और सारा मंत्रिमंडल बदलकर यह दिखाना चाहती है कि जो काम नाराज़ जनता किसी दूसरी पार्टी को जिताकर करेगी। वह उसने चुनाव से पहले खुद ही कर दिया है। लिहाज़ा इस बार भी उसी को वोट देना। ऐसे ही पंजाब में कांग्रेस चुनाव से आधा साल पहले वहां की आबादी के 32 प्रतिशत दलितों को यह कहना चाहती है कि वह उनकी बड़ी हितैषी है। लिहाज़ा आने वाले चुनाव में कांग्रेस को ही वोट देना। ऐसे ही भाजपा आज जिस तरह से हिंदू वोटबैंक की राजनीति कर रही है। वैसी ही कांग्रेस और सपा बसपा राजद और टीएमसी जैसी सेकुलर पार्टियां मुसलमानों को रिझाकर अपना वोटबैंक बनाकर लंबे समय तक करती रही हैं। सेकुलर दल रोज़ा अफ़तारटोपी लगाकर हर ईद पर ईदगाह जाकर कब्रिस्तानों की दीवार बनवाकर उर्दू अनुवादक नियुक्त कर  चंद मस्जिद के इमामों को वेतन देकर मदरसों को थोड़ी सी ग्रांट देकर मुस्लिम पर्सनल लाॅ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और बाबरी मस्जिद बचाने की दिल को छूने वाली बातें करके उनको लंबे समय तक अपना वोटबैंक बनाकर प्रतीकात्मक राजनीति करते रहे हैं। मोदी खुद को हिंदू राष्ट्रवादी और पिछड़े समाज में पैदा होने वाला बातते हैं। जबकि उनकी सूटबूट की सरकार जिस तरह से पूंजीपतियों कारपोरेट और निजीकरण की किसान मज़दूर गरीब विरोधी आर्थिक नीतियां तेज़ी से अपना रही है। उससे ना केवल पिछड़ों बल्कि शेष हिंदू समाज का भी कारोबार नौकरियों और आर्थिक नुकसान अधिक हो रहा है। इसकी वजह यह है कि उनकी भागीदारी इस क्षेत्र में पहले से ही  अल्पसंख्यकों की आबादी से अधिक रही है। भाजपा आज गैर यादव और गैर जाटव पिछड़े और दलित समाज के एक वर्ग को भी अपने साथ जोड़े रखने के लिये केंद्र और यूपी सहित अन्य भाजपा शासित राज्यों में चुनाव करीब आने पर उनके समाज से मंत्री बनाकर यह जतानी चाहती है कि वह सभी हिंदू जातियों को उनका समान प्रतिनिधित्व दे रही है। इसके साथ ही भाजपा सरकारें हर मुद्दे को हिंदू बनाम मुस्लिम बनाकर खुलकर साम्प्रदायिक राजनीति भी ठीक उसी तरह से हिंदू भावनाओं के तुष्टिकरण के लिये कर रही है। जिस तरह से कभी कांग्रेस या अन्य क्षेत्रीय धर्मनिर्पेक्ष दल मुसलमानों को खुश करने के लिये करते थे। हालांकि सच्चर कमैटी की रिपोर्ट बता रही है कि इससे मुसलमानों का रोज़गार शिक्षा और स्वास्थ्य या सरकारी योजनाओं में उनकी आबादी से अधिक हिस्सा ना मिलने से अतिरिक्त लाभ नहीं हुआ। लेकिन आज मीडिया इतना झूठ बोल रहा है कि देश में ऐसा माहौल बन गया है। जिससे ऐसा लगता है कि हिंदुओं की तमाम समस्याओं के लिये केवल मुसलमान कसूरवार है। उधर कांवड़ वालों पर फूलों की वर्षा दिवाली पर लाखोें दिये जलाकर और दशहरा पर विदेशी कलाकारों को बुलाकर रामलीला कराकर भाजपा सराकर हिंदुओं को प्रतीकात्मक रूप से ऐसा आभास करा रही है। मानो रोज़गार शिक्षा इलाज अर्थव्यवस्था कालाधन भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था जनता के लिये कोई मायने ही ना रखती हो। कई कई हज़ार करोड़ की बड़ी बड़ी मूर्तियां लगाकर सरकारें ऐसा जता रही हैं। जैसे जनता की सबसे बड़ी ज़रूरत यही हो। आज़ादी के बाद कई दशक तक कांग्रेस ने भी दलितों और मुसलमानों के साथ यही प्रतीकात्मक खेल खेला है। लेकिन शासन प्रशासन में जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी देना नीतिगत रूप से तो सही लगता है। लेकिन किसी भी सरकार को चाहे उसका मुखिया किसी भी जाति या धर्म का हो ऐसे काम करने चाहिये। जिनसे सबका भला हो। जनता को आज सोचना चाहिये कि इस तरह से धर्म जाति नफरत और झूठ के नाम पर हर बार वोट देकर वो जीवन के असली मुद्दों से भटककर किसका भला कर रही हैअपना या नेताओं का जो नारों दावों और बड़े बड़े बयानों से आगे बढ़कर सबका विकास और सबका विश्वास हासिल नहीं कर पा रहे हैं।            

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Saturday, 25 September 2021

तालिबान नहीं सुधरेंगे

तालिबान नहीं सुधरेंगे यह शक सही साबित होता जा रहा है!

0 बाॅलीवुड के दो बड़े मुस्लिम कलाकार नसीरूद्दीन शाह और जावेद अख़्तर ने अफ़गानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने पर बयान जारी कर कुछ बातें कही थीं। इनमें भारत के मुसलमानों से ताालिबान का और हिंदुओं से किसी भी तरह के देसी कट्टरपंथियों का समर्थन ना करने की अपील भी की गयी थी। ज़ाहिर बात है कि दोनों वर्गों के उदार लोगों को जहां ये अपील ठीक लगी वहीं कट्टर और साम्प्रदायिक लोगों ने बिना समय गवाये दोनों सेकुलर और मानवतावादी कलाकारों को निशाने पर ले लिया। लेकिन एक माह भी नहीं बीता तालिबान ने हमारे लेख में जतायी गयी आशंकाओं को सच साबित करना शुरू कर दिया है।

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

     दुनिया की जानी मानी पीयू रिसर्च ने हाल ही में पाकिस्तान सहित इंडोनेशिया और कई मुस्लिम मुल्कों में एक सर्वे किया है। पाकिस्तान में जहां 84 प्रतिशत वहीं दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया में 74 फीसदी लोग शरीयत राज के पक्ष में हैं। मजे़दार बात यह है कि इसके बावजूद पाक में 9 तो इंडोनेशिया में मात्र 4 परसेंट लोग ही तालिबान राज के पक्ष में हैं। हमारा दावा है कि अगर विश्व की दूसरी बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश भारत के मुसलमानों को भी इस सर्वे में शामिल किया जाता तो उनकी तादाद पाक और इंडोनेशिया से भी काफी कम तालिबान के सपोर्ट और शरीयत राज के पक्ष में आयेगी। उधर तालिबान ने सत्ता पर अपनी पकड़ मज़बूत होते ही अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। यह आशंका हमने अपने पहले लिखे लेख में ही जता दी थी। दरअसल जिस एक बात के लिये नसीरूद्दीन शाह को भारत में मुट्ठीभर कट्टरपंथी मुसलमान कोस रहे हैं। वह कोई माने या ना माने या उनके शब्दों के चयन पर बेशक एतराज़ करे लेकिन सच यही है कि भारत का मुसलमान दुनिया के दूसरे मुस्लिमों से बिल्कुल अलग यानी उदार सेकुलर और प्रगतिशील है। हालांकि शाह ने अगर इस 54 सेकंड के वीडियो में दुनिया के अलग अलग हिस्सों में इस्लाम अलग अलग ना बताकर मुसलमान अलग अलग बताया होते तो कट्टरपंथियोें को इतना हंगामा करने का मौका नहीं मिलता। जबकि कट्टरपंथियों के पूरी दुनिया में इस्लाम एक जैसा होने की दावे की कलई भी इस हक़ीक़त से खुल जाती है कि उसकी व्याख्या यानी इंटरप्रिटेशन और अनुवाद सब देशों फिरकों और फिक़हों में अलग अलग अपनाया और माना जाता रहा है। मिसाल के तौर पर सउूदी और अफगानी इस्लाम की परिभाषा तक अलग अलग है। खुद भारत में शिया सुन्नी और देवबंदी बरेलवी मरकज़ के लोग इस्लाम की कई बातों पर एकमत नहीं हैं। वैसे अगर निष्पक्ष होकर देखा जाये तो इसमें कोई अनोखी या एतराज़ के लायक बात भी नहीं बल्कि ये उदारता विविधता और लोकतंत्र की पहचान है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है। जब एक वर्ग दूसरे को मुसलमान ना मानकर ना केवल काफिर का तमगा देता है बल्कि उसको ज़बरदस्ती अपने सैक्ट के हिसाब से चलाना चाहता है। एक दूसरे की बात से सहमत ना होने या अपने तौर तरीकों से चलने पर कुछ अलग अलग सोच के फिरके एक दूसरे पर हिंसक हमले करने से भी नहीं चूकते। हिंदुओं में यह बात सराहनीय है कि ना तो वे किसी खास सोच के हिंदू को हिंदू धर्म से बाहर करने का फ़तवा देते हैं और ना ही 33 करोड़ देवी देवताओं में से किसी की पूजा करने या ना करने से किसी पर हमला या उसको बुरा समझकर बहिष्कार करते हैं। लेकिन जावेद अख़्तर ने कुछ समय से हिंदुओं में बढ़ रही कट्टरता पर उंगली उठाकर एक संगठन को तालिबानी सोच से प्रेरित बताकर तूफान खड़ा कर दिया था। बाद में उन्होने शिवसेना के मुख्य पत्र दोपहर का सामना में एक लंबा लेख लिखकर अपनी मंशा साफ की है। लेकिन जावेद अख़्तर का आगाह करना गलत नहीं माना जा सकता। अजीब बात यह भी है कि जो 84 प्रतिशत पाकिस्तानी शरीयत राज चाहते हैं। जब वहां चुनाव होता है तो उनमें से मात्र 7 प्रतिशत ही इस्लामी राज लाने का दावा करने वाली पार्टियों को वोट देते हैं। आप विश्वास कीजिये अगर तालिबान भी कभी बर्बरता बुज़दिली और गुंडागर्दी छोड़कर अफगानिस्तान में निष्पक्ष और ईमानदार चुनाव कराने की हिम्मत दिखायेगा तो वहां की लगभग सभी औरतें अल्पसंख्यक और पुरूषों का एक हिस्सा मिलकर उनको सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकता है। जो लोग यह समझते हैं कि भारत सहित पूरी दुनिया के मुसलमान तालिबान को पसंद करते हैं। वे मूर्खो के स्वर्ग में रहते हैं। उनको अफ़गानिस्तान के खासम खास पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान को देखना चाहिये जो तालिबान को तो सपोर्ट करता है। लेकिन अपने यहां वैसा ही तालिबानी राज कायम होने से डरता है। यही वजह है कि वह बार बार तालिबान से अपील कर रहा है कि तहरीके तालिबान-पाकिस्तान के अफ़गानिस्तान में बंद आतंकवादियों को अपनी जेलों से रिहा ना करे। पाक के शातिर और मक्कार शासकों की कितनी दोगली अपील है कि खुद तो तालिबान जैसे बर्बर आतंकियों को अपने देश में ना केवल शरण दी बल्कि पैसा और हथियार देकर ट्रेनिंग भी दी। लेकिन अपने यहां उन जैसे तालिबानी सोच के तहरीक ए तालिबान को पनपने नहीं देना चाहते। इसके साथ ही आप यह भी देख सकते हैं कि पाकिस्तान में महिलाओं और अल्पसंख्यकों का उतना बुरा हाल नहीं है। जितना जुल्म और पक्षपात अफ़गानिस्तान में पहले देखा गया और अब भी देखे जाने लगा है। इतना ही नहीं पाक में जैसा भी आधा अध्ूारा लोकतंत्र मीडिया अदालत और दूसरी पश्चिमी सभ्यता की प्रतीक चीजे़ं मौजूद हैं। अफ़गानिस्तानी तालिबान उनको किसी कीमत पर इजाज़त नहीं देगा। इसका नतीजा यह होगा कि या तो अफ़गानिस्तान में धीरे धीरे तालिबान का राज कमज़ोर पड़ता जायेगा या फिर पाकिस्तान में भी तालिबानी सोच के लोग पार्टी और संगठन उसके ना चाहते हुए मज़बूत होते जायेंगे। उसके बाद पाकिस्तान को भारी नुकसान उठाकर यह अहसास होगा कि उसने जो बबूल का पेड़ अफ़गानिस्तान या कश्मीर में भारत के लिये बोया है। उसके कांटों से वह खुद भी लंबे समय तक बचा नहीं रह सकता। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। दशकों के भारी खून खराबे के बाद पाक ना केवल अपनी भूल सुधार करने को मजबूर होगा बल्कि उसको अपने देश के साथ साथ पड़ौस में उगाया गया कैक्टस का पौधा भी उखाड़ना होगा। हमारा मानना है कि अगर दुनिया सोच समझकर अपने स्वार्थों पर थोड़ा सा अंकुश लगाकर तालिबान और पाकिस्तान को घेरें और उनको विश्व स्तर पर आतंकवाद उग्रवाद और कट्टरवाद से दूर रहकर सेकुलर समानता और सही मायने में लोकतंत्र पर चलकर सबको बराबर अधिकार देने को मजबूर करें तो आज नहीं तो कल इनका दिमाग़ हर हाल में ठिकाने आ सकता है।     

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Monday, 13 September 2021

N M P

एनएमपी यानी नेशनल मोनिटाइजे़शन पाइपलाइन किसके हित में ?

0 हमारे देश का प्रावेट सैक्टर सड़क और रेलवे लाइन जैसे बुनियादी क्षेत्र में निवेश करने से पहले से ही बचता रहा है। इसकी वजह यह है कि वह जानता है कि भारत के दूरदराज़ के इलाक़ों में भारी भरकम पैसा लगाने से खर्चा बहुत अधिक आयेगा । लेकिन गांव और क़स्बों के लोग उसको मनमाफि़क मुनाफा नहीं दे पायेंगे। यही वजह है कि आपको गांव देहात में कायदे के प्रावेट स्कूल बड़े अस्पताल ना के बराबर ही देखने को मिलेंगे। इसके बावजूद मोदी सरकार ने दो टूक कह दिया है कि सरकार का काम बिज़नैस करना नहीं है। सवाल यह है कि ऐसे में घाटा उठाकर भी जनकल्याण का काम कौन करेगा?

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

     पूंजीवाद और समाजवाद का बुनियादी अंतर यही रहा है कि जहां समाजवादी सरकारें नुक़सान उठाकर भी जनता को बुनियादी ज़रूरतें लागत से कम दाम पर उपलब्ध कराती हैं। वहीं पूंजीवादी व्यवस्था में केवल और केवल मुनाफे का एकसूत्री लक्ष्य सामने रखकर काम किया जाता है। हालांकि यह भी सच है कि समाजवादी सरकारें भ्रष्ट अफ़सरशाही के बल पर जनकल्याण का उतना काम नहीं कर पातीं जितना उनको करना चाहिये या वे करना चाहती हैं। उधर प्राइवेट सैक्टर कम खर्च कम वेतन और कम लागत पर सुविधायें सेवायें और प्रोडक्ट उपलब्ध् कराकर जनता का खून चूसना शुरू कर देता है। जिससे वह अधिक से अधिक लाभ मानवता समाज और नैतिकता व नियम कानून को ताक पर रखकर कमा सके। पहले सरकारें लोकलाज के डर से पूंजीपतियों को ऐसी खुली लूट की छूट देते हुए डरती थीं। उनको विपक्ष मीडिया कोर्ट और चुनाव में हार जाने का डर बना रहता था। लेकिन जब से देश में मोदी सरकार आई है। यह डर सरकार के दिमाग से ख़त्म हो गया है। कहने को देश में लोकतंत्र है। लेकिन लेविल प्लेइंग फील्ड नहीं है। मोदी सरकार को चुनाव हारने का डर नहीं है। उसने 2016 में असफल नोटबंदी फिर आधी अध्ूारी तैयारी के साथ जीएसटी और उसके बाद 2020 में बिना एक्सपर्ट्स कैबिनेट और विपक्ष से मश्वरे के 68 दिन की देशबंदी करके अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया। इसके अलावा भी उसकी एक के बाद एक गलत आर्थिक नीतियों पक्षपाती फैसलों विभाजनकारी कानून बहुसंख्यकवादी नीतियों रिज़र्व बैंक के गवर्नरों का गलत चयन गलत आर्थिक सलाहकारों का चयन बैंकों का एनपीए बढ़ाते जाना कालाधन देश में पैदा होने से ना रोक पाना और विदेश से लाने में असमर्थता करप्शन रोकने में नाकामी से हमारी जीडीपी लगातार गिरती जा रही है। आज हालत यह है कि सरकार के पास अपने खर्च चलाने को पूरा पैसा नहीं है। ऐसे में मोदी सरकार ने एनएमपी यानी नेशनल मोनिटाइजे़शन पाइपलाइन योजना लांच की है। इसके ज़रिये वह आज़ादी के बाद सरकार द्वारा बनाई गयी अरबों खरबों की लागत वाली नवरत्न सरकारी कंपनियों तक को निजी क्षेत्र को औने पौने में लीज़ पर देकर 6 लाख करोड़ से अधिक का राजस्व जुटाना चाहती है। इसमें रेलवे नेशनल हाईवे बंदरगाह बिजली एयरपोर्ट दूरसंचार और शिपिंग सहित कई स्टेडियम को प्राइवेट क्षेत्र को सौंपना चाहती थी। पहले मोदी सरकार एयर इंडिया को बेचना चाहती थी। लेकिन उसे आज तक उसका एक भी खरीदार नहीं मिला। इसको बेचने की वजह इंडियन एयरलाइंस का लगातार बढ़ता घाटा बताया जाता था। इसकी एक बड़ी वजह यह भी रही कि प्राइवेट सैक्टर बखूबी जानता है कि देश की अर्थव्यवस्था इतनी खराब होती जा रही है कि भारत की जनता विशेष रूप से मीडियम क्लास की जेब में इतना अधिक या अतिरिक्त धन नहीं आ रहा है कि वह अपनी कार या सरकारी रेल की बजाये हवाई जहाज़ से यात्रा करने की सोचे। कोरोना ने सबसे अधिक कमर इसी वर्ग की तोड़ी है। सवाल यह भी है कि नेहरू और कांग्रेस को बात बात पर दोषी ठहराने वाली मोदी सरकार खुद क्यों नहीं एयर इंडिया को लाभ में ला सकीयही समस्या रेलवे के निजीकरण में भी आने वाली है। अगर प्राइवेट सैक्टर रेलवे के रूट लीज़ पर लेगा तो वह उसमें पहले के मुकाबले सुविधायें बढ़ायेगा। जब ऐसा होगा तो उसकी लागत और मुनाफा बढ़ने से रेल का किराया भी काफी बढ़ेगा। लेकिन पहले रोज़गार जाने वेतन कम होने पीएफ समय से पहले निकालकर खर्च करने सोना गृवी रखकर कर्ज लेने से परेशान जनता का बड़ा हिस्सा इस बढ़े किराये को नहीं दे पायेगा। यही ख़तरा निजी क्षेत्र को इस क्षेत्र मेें आने से रोक सकता है। एनएमपी में सरकार ने दावा किया है कि वह सार्वजनिक क्षेत्र के इन नवरत्नों को जड़ से बेच नहीं रही है। बल्कि वह  इन क्षेत्रों को 4 से 5 साल के पट्टे पर प्रावेट सैक्टर को संचालन के लिये देगी। जबकि प्राइवेट क्षेत्र की नज़र इन सरकारी कंपनियों की बेशकीमती ज़मीन पर लगी है। देखने में सरकार का यह क़दम बड़ा अच्छा नज़र आता है। लेकिन कड़वा सच यह है कि 2020-21 में भी सरकार ने सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बेचकर 2.1 लाख करोड़ कमाई का सुनहरा सपना जनता को दिखाया था। लेकिन वह केवल 30 हज़ार से कुछ अधिक ही वसूल कर सकी है। इसके बाद 2022 के बजट में सरकार ने 1.75 लाख करोड़ की सरकारी भागीदारी बेचने का मन बनाया। लेकिन वह भी पूरा होने के आसार दूर दूर तक दिखाई नहीं दे रहे हैं। सवाल यह है कि सरकार ऐसा करने में बार नाकाम क्यों हो रही हैइसकी वजह है निजी क्षेत्र को जनकल्याण और सरकार के लाभ से कोई लेना देना नहीं है। उसे तो केवल अपना मुनाफा चाहिये। सरकार ने चूंकि बुनियादी ढांचा पहले ही तैयार कर दिया है। प्राइवेट सैक्टर को इस क्षेत्र का संचालन और कम से कम खर्च कर रखरखाव करना है। ऐसा करने से जो मोटी कमाई होगी। उसमें से एक हिस्सा सरकार को देना है। पहले सरकार पर सरकारी सम्पत्तियोें को बेचने के ढेर सारे आरोप लगते रहे हैं। लिहाज़ा अब मोदी सरकार ने बहुत सोच समझकर यह बीच का रास्ता निकाला है। जिसमंे सम्पत्ति का स्वामित्व तो कहने को सरकार का ही बना रहेगा लेकिन एक तरह से उन सम्पत्तियों पर काबिज़ होने वाली निजी क्षेत्र की गिनी चुनी कंपनियों की आगे चलकर मोनोपोली हो जायेगी। जिस तरह से टेलिकाॅम सैक्टर में अंबानी के जियो की होती जा रही है। एक दिन आयेगा आप देखेंगे धीरे धीरे अन्य सभी प्राइवेट दूरसंचार कंपनियां घाटा सहन ना कर पाने की वजह से जियो के सामने घुटने टेक देंगी। सरकारी कंपनी बीएसएनएल का खुद सरकार ने पहले ही भट्टा बैठा दिया है। ऐसे में जियो भविष्य में जनता से अपनी सेवाओें की मनमानी कीमत वसूल करेगी। चंद गिने चुने अमीर कारपोरेट घरानों को छोड़ दें तो क्या उद्योगपति क्या व्यापारी क्या प्रोफेशनल क्लास और क्या मीडियम और लोवर क्लास सबके सामने आज रोज़गार नौकरी कारोबार और पर्याप्त आय की समस्या आ खड़ी हुयी है। ऐसे में लोग बड़ी मुश्किल से दो जून की रोटी की व्यवस्था कर पा रहे हैं। सवाल यही है कि जब लोगों की जेब में पैसा ही नहीं है। ऐसे में सरकार अगर प्राइवेट सैक्टर से 6 लाख करोड़ कमाने की सोच रही है तो प्राइवेट सैक्टर भी अपनी आमदनी से तो सरकार को पैसा देगा नहीं। वह जनता की जेब से ही यह 6 लाख करोड़ और अपना इससे कई गुना मुनाफा वसूलना चाहेगा जिसका सारा बोझ आखि़रकार जनता पर ही पड़ना है तो सरकार किसके हित में काम कर रही है?   

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Saturday, 4 September 2021

दलित राजनीति का भविष्य

माया’ की बसपा को खा जायेगी रावण’ की असपा ?

0 दलित समाज की राजनीति में डा. अंबेडकर जगजीवन राम बूटा सिंह कांशीराम रामविलास पासवान उदितराज और मायावती के बाद यूपी में जो एक नाम तेज़ी से उभरकर सामने आ रहा है वो युवा नेता चंद्रशेखर आज़ाद उर्फ़ रावण का है। हालांकि हाल ही में गठित उनकी आज़ाद समाज पार्टी आगामी चुनाव में लंबे समय तक कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं कर पायेगी। लेकिन सवाल यह है कि क्या रावण की पार्टी धीरे धीरे ही सही माया की बसपा द्वारा खाली की जा रही सियासी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने का सपना देख रही है और क्यों व कैसे?

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

  0 आंच अगर कश्ती पर आये हाथ क़लम करवा देना,

      लाओ मुझे पतवारे दे दो मेरी जि़म्मेदारी है ।।

                       सियासत में थोड़ा भी दिलचस्पी रखने वाले बता सकते हैं कि बसपा प्रमुख मायावती ना केवल एक के बाद एक चुनाव हारकर अपनी सियासी ज़मीन तेज़ी से खोती जा रही हैं बल्कि उसी भाजपा के सामने लगभग हथियार डाल चुकी हैं। जो उनके दलित वोटबैंक में सेंध लगा रही है। आज अगर कोई दल व नेता भाजपा से दो दो हाथ कर उसको बार बार हराने में कामयाब रहा है। वो केजरीवाल और ममता बनर्जी माने जा सकते हैं। दोनों ही ना केवल जनहित के एक से बढ़कर एक काम कर रहे हैं बल्कि ईमानदार छवि भी बना चुके हैं। बसपा को यूपी में सरकार बनाने के एक नहीं कई बार मौके मिले। एक बार उसको पूर्ण बहुमत भी मिला। मायावती की सरकार का शायद ही कोई ऐसा बड़ा काम या चर्चित योजना हो। जिसकी जनता में आजतक प्रशंसा होती हो। पहली बार मुख्यमंत्री बनने पर माया का भ्रष्ट नौकरशाही पर जो चाबुक चला था। उसकी उनके राजनीतिक विरोधियों ने भी खुलकर सराहना की थी। लेकिन उसके बाद जब भी बसपा सत्ता में आई उसकी यह खूबी भी गायब हो गयी। दरअसल मायावती ने अपने कार्यकाल में ऐसे ऐसे विवादित कार्य किये। जिससे उन पर घोटालोें के आरोप लगने लगे। पहले कांग्रेस और अब भाजपा की केंद्र सरकार ने उनके कारानामों की जांच के नाम पर उनको जेल भेजने का डर दिखाकर इतना डरा दिया कि वे अपने घर में एक तरह से खुद ही हाउस अरेस्ट होकर चुप बैठी हुयी हैं। वे अगर ज़बान खोलती भी हैं तो भाजपा से अधिक सपा और कांग्रेस के खिलाफ ज़हर उगलती हैं। एक बार वे यहां तक कह चुकी हैं कि अगर कांग्रेस सपा को सबक सिखाने के लिये भाजपा को भी सपोर्ट करना या अपने दलित वोटों से कराना पड़ा तो वे करेंगी। यानी उन पर जो शक या आरोप था। वो उनके बयान से खुद ही सच साबित हो गया। सच यह है कि कांशीराम ने जिस बसपा को अपने खून पसीने से सींचकर यहां तक पहंुचाया था। उसकी लगाम बिना संघर्ष बिना दूरदृष्टि और बिना किसी उसूल की अवसरवादी नेता मायावती के पास विरासत में आ जाने से उन्होंने अपनी असीमित महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिये तहस नहस कर दिया। उनपर विधानसभा लोकसभा से लेकर राज्यसभा तक के टिकट बेचने के गंभीर आरोप लगे। यूपी में एक बार अपने बल पर बसपा के सरकार बनाने से सीएम बनी मायावती पीएम बनने का सपना देखनी लगी। नतीजा यह हुआ कि वे पीएम तो बनी नहीं उसके बाद फिर कभी सीएम भी नहीं बनी। उन्होंने भ्रष्टाचार के मुकदमों से जेल जाने को बचने को जिस सतीश मिश्रा को अपना वकील चुना। उनको ही बसपा में महत्वपूर्ण पद का इनाम देकर बसपा को बहुजन समाज से सर्वजन समाज के नाम पर उन बृहम्णों को जोड़ने का आत्मघाती जि़म्मा सौंप दिया। जिनकी नीतियों के विरोध में बसपा का गठन किया गया था। मायावती ने दलितों के अलावा मुसलमानों और अति पिछड़ों के साथ भी ऐसा सौतेला सलूक किया कि एक एक कर उनके नेता दूसरी पार्टियों में या तो खुद बसपा को छोड़कर चले गये या फिर मायावती ने उनके जनाधार से डरकर उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। मायावती पर यह भी आरोप है कि वे दलितों में भी केवल जाटवों की सियासत पर अधिक जोर देती रही हैं। इसका लाभ भाजपा ने जाटव यादव और मुसलमान बनाम शेष हिंदू जातियों को गोलबंद कर उठाया है। दलित नेता उदित राज कहते हैं कि कांशीराम ने ऐसे लोगों को बसपा से जोड़ा जो अपनी जातियों को पार्टी से जोड़ रहे थे। लेकिन जब माया से उनको सम्मान नहीं मिला या उल्टा अपमान होने लगा तो वे बसपा से अलग होकर अपनी जाति के वोटों के बल पर दूसरी पार्टियों में जाकर एमएलए एमपी बन गये। इससे इनका व्यक्तिगत लाभ तो हुआ लेकिन वृहद दलित या अति पिछड़ी जातियोें का नुकसान हुआ। इससे शिक्षा स्वास्थ्य रोज़गार और शासन प्रशासन में इन वंचित वर्गों की हिस्सेदारी का मुद्दा ख़त्म हो गया। मोदी के हिंदुत्व में राष्ट्रवाद रोजी रोटी आज़ादी और डेमोक्रेटिक राइट्स नहीं हैंफिर भी कुछ दलित नेताओं के भाजपा के साथ जाकर स्वार्थ पूरे हो रहे हैं। दलित विचारक चंद्रभान कहते हैं कि बसपा के कई चुनाव हारने के बावजूद उसके वोट प्रतिशत से ऐसा लगता है कि अभी भी वही दलितों की पहली पसंद है। इसके साथ ही जो थोड़ा सा दलित युवा वर्ग और मीडियम क्लास भाजपा के साथ जुड़ा था। वह रोज़गार ना मिलने और पक्षपात बढ़ने से भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर की तरफ आकृषित हो रहा है। आने वाले वर्षों में चंद्रशेखर की पार्टी असपा बसपा को रिप्लेस कर लेगी। दलितों के हालात पर पैनी नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमडि़या का मानना है कि फिलहाल भले ही लग रहा हो कि दलित सियासत कमज़ोर हो रही हैलेकिन भविष्य दलित और पिछड़ों का ही है। इतिहास गवाह है कि पहले भी दलित दल बनते बिगड़ते रहे हैं। लेकिन दलित राजनीति को लंबे समय तक नहीं रोका जा सकता। इसमें शक नहीं कि दलित वोटों पर कब्ज़े को लेकर क्षत्रपोें को पाॅवर देकर भाजपा ने बसपा का खेल कुछ समय के लिये खराब ज़रूर किया है। युवा दलित साहित्यकार अमित कुमार दो टूक कहते हैं कि पिछले एक दशक में बसपा के जनाधार में कमी के चार प्रमुख कारण मूल विचारधारा को छोड़नामाया का स्पष्टवादिता को छोड़नाकैडर वाले नेताओं को निकालना या उनका खुद निकलना और दलित पिछड़े के मुद्दों पर माया का चुप्पी साधना नज़र आते हैं।

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।