Tuesday, 15 June 2021

सोशल मीडिया पर लगाम...


सोशल मीडिया पर लगाम लगा सकेगी सरकार?

0प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पर काफी हद तक अपना कंट्रोल बना लेने के बाद अब केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया पर नकेल कसनी शुरू कर दी है। हालांकि इसकी वजह सरकार ने कानून व्यवस्था देशहित और राष्ट्रविरोधी व फेक कंटेन्ट को डिजिटल प्लेटफाॅर्म से हटाने की ज़रूरत बताया है। लेकिन जानकार सूत्रों का दावा है कि सरकार अपने खिलाफ कहीं भी कुछ भी सामाग्री जनता तक नहीं पहुंचने देना चाहती। इसीलिये ये सब कवायद चल रही है।     

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   पहले फेसबुक फिर ट्विटर और बाद में व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म को सरकार के सामने घुटने टेकने को मजबूर होना पड़ा है। हालांकि शुरू में ये विश्व स्तरीय मीडिया कोर्ट की शरण में गया। लेकिन वहां से सरकार के आदेश के खिलाफ कोई स्टे आॅर्डर ना मिलने से ना चाहते हुए भी इनको केंद्र सरकार का आदेश तत्काल प्रभाव से मानते हुए भारत में इस मीडिया एप से जुड़े मामलों की शिकायत सुनने वाले उस पर फैसला करने वाले और उस निर्णय का अनुपालन निर्धारित समय अवधि में कराने वाले अधिकारी नियुक्त करने पड़े हैं। हालांकि यह सवाल अभी तक अपनी जगह मौजूद है कि जब व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया एप का दावा यह  है कि उनके ज़रिये होने वाली चैट एंड टू एंड एंक्रिप्ट है तो वे सरकार विरोधी संदेश पढ़ेंगे कैसेऔर अगर वे ये सब मैसेज पढ़ेंगे नहीं तो फिर आपत्तिजनक पोस्ट पकड़ेंगे कैसेयानी सरकार को रिपोर्ट कैसे करेंगेसाथ ही व्हाट्सएप पर रोज़ आने वाले अरबों मैसेज आॅडियो वीडियो को क्या चैक करनाउनमें से भारत सरकार द्वारा बताये गये संदेशों को एप से हटाना और उस पोस्ट को पहली बार भेजने वाले की सारी जानकारी कानूनी कार्यवाही के लिये सरकार को सौंपना और सरकार का इन सबके खिलाफ लगातार कार्यवाही करना व्यावहारिक और संभव होगा?क्या ऐसा करने से व्हाट्सएप की गोपनीयता लोकप्रियता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह जायेगीइस मामले में ट्विटर का मामला कुछ अलग है क्योंकि उसके मैसेज तो ओपन टू आॅल होते हैं। उनको कोई भी पढ़ सकता है। चैक कर सकता है। ज़ाहिर है कि जब उनको पढ़ा देखा और सुना जा सकता है तो उनपर पुलिस प्रशासन या शासन यहां तक कि शिकायत करने पर खुद ट्विटर भी एक्शन ले सकता है। और अभी भी ऐसे मामलों में कार्यवाही होती ही रही है। जहां तक फेसबुक का सवाल है तो उसने तो बहुत पहले ही भारत सरकार की शर्तें मानकर सरकार को पंसद ना आने वाली सामाग्री अपनी साइट से हटाने ब्लाॅक करने या उस एकाउंट की जानकारी देने का समझौता कर लिया था। उसने भारत मेें अपना एक प्रमुख अधिकारी भी नियुक्त कर दिया था। जो बहुत पहले ही ऐसी सभी जानाकरी पोस्ट और कमेंट हटाने रोकने और ब्लाॅक करने का काम अंजाक दे रहा है। जो सरकार को नापसंद होती है। इसके अलावा जो अन्य एप या ओटीटी प्लेटफाॅर्म हैं। उनकी तो सरकार से इस मुद्दे पर भिड़ने की हैसियत ही नहीं थी। सो उन्होंने बिना ना नुकुर के सरकार के सामने पहली बार में चेतावनी मिलते ही हथियार डाल दिये थे। सरकार ने जब देखा कि सोशल मीडिया के बड़े बड़े विशालकाय खिलाड़ी उसके सामने अपने व्यवसायिक हितों की खातिर एक ही धमकी में झुक चुके हैं तो उसने अन्य सभी डिजिटल न्यूज ओटीटी और सोशल मीडिया को नये आई टी नियमों का पालन 15 दिन के भीतर सुनिश्चित करने की डैडलाइन जारी कर दी। सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडे़कर ने इस आश्य का आदेश विगत दिनों जारी किया है। मजे़दार बात यह है कि सरकार ने ऐसा करने की वजह सोशल मीडिया पर फर्जी पोस्ट रोकना मुख्य बताया है। जबकि सबसे अधिक फर्जी पोस्ट कौन करता हैउनको किसका संरक्षण मिला हुआ है? 250सदस्य वाले 10 लाख व्हाट्सएप गु्रप किसने बना रखे हैंकौन किसके किसके खिलाफ पूरे देश में झूठ और नफरत फैला रहा हैकौन जनता के दिमाग पर सोशल मीडिया के द्वारा कब्ज़ा करके राजनीतिक लाभ उठा रहा है?कौन एक रूपया दो रूपया और पांच रूपया खर्च कर ट्विटर पर अपने फाॅलोवर खरीदता हैकौन रोज़ एक पोस्ट को पैसे देकर ट्रेंड कराता हैकौन रोज़ कोई ना कोई हैशटैग चलाकर अपने विरोधियों को बदनाम करता है?कौन फर्जी टूलकिट चलाता हैकौन कुछ दल कुछ नेताओं और कुछ धर्म विशेष के लोगों को देश की हर समस्या के लिये जि़म्मेदार ठहराकर उनके खिलाफ जंग का सा माहौल बनाता है?किसने अपनी छवि सोशल मीडिया पर फर्जी करोड़ों फाॅलोवर खरीदकर सबसे अधिक चमकाई हैऐसे और भी अनेक सवाल यहां उठाये जा सकते हैं। लेकिन देखने में यह आ रहा है कि अख़बार मैग्जीन और टीवी चैनलों को अपने हिसाब से चलने को मजबूर करने के बाद अब जो थोड़ा बहुत सच वास्तविकता और अन्याय शोषण व धोखा सोशल मीडिया की वजह से जनता की नज़र में आ रहा था। अब उस पर भी रोक लगाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। कहने को सोशल मीडिया को नोडल अफसर कंपलेंट अफसर और कंप्लाएंस अफसर रखकर शासन प्रशासन पुलिस द्वारा आपत्तिजनक बताये गये कंटेट और पोस्ट को24 से 36 घंटे में हर हाल में हटाना होगा। राष्ट्रहित राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था के नाम पर अब तक 7 साल में किस तरह की सोच के लोगों को सराकर ने निशाना बनाया है। सोशल मीडिया पर भी इसी बहाने किन लोगों को सरकार सबक सिखायेगी यह किसी से छिपा नहीं है। शायद यही वजह है कि आज हमारे देश के लोकतंत्र सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया को लेकर विदेशी मीडिया में ज़बरदस्त चर्चा हो रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सोशल मीडिया पर लगाम लगने के बाद क्या जनता का वो वर्ग जो सरकार की गलत नीतियों जनविरोधी कदमों और पंूजीपरस्त फैसलों का हर हाल में विरोध जारी रखना चाहता हैवो सोशल मीडिया का क्या विकल्प तलाश करता है?                                          

Thursday, 20 May 2021

दूसरी कोरोना लहर का पीक

अनुमानः कोरोना मई के अंत तक कम लेने लगेगा जान ?

0 आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस विशेषज्ञ मणींद्र अग्रवाल ने अपै्रल में कहा था कि कोरोना वायरस के स्वरूप में अगर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ तो मई के पहले सप्ताह से कोविड केस अपने चरम पर पहंुचकर घटने लगेंगे। वास्तव में 7 मई को दूसरी कोरोना लहर के सबसे अधिक4,14,280 पॉज़िटिव केस सामने आये थे। अब देश के जाने माने वायरोलॉजिस्ट डा. शाहिद जमील ने अनुमान लगाया है कि मई के अंत तक कोरोना से जाने वाली जान का आंकड़ा भी धीरे धीरे कम होने लगेगा।     

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   सवाल यह उठ रहा है कि जब कोरोना के केस अपने शिखर पर पहुंच कर 7 मई से नीचे आने लगे हैं। ऐसे में कोरोना से होने वाली मौत का आंकड़ा अभी भी 4500 से भी उूपर जाकर बढ़ता ही क्यों जा रहा हैदरअसल कम लोगों को पता है कि संक्रमण और मृत्यु के आंकड़े कैसे हम तक पहंुचते हैंहालांकि यह बात परेशान करने वाली ज़रूर है कि जब कोरोना की दैनिक जांच लगभग 18 लाख 50हज़ार के औसत पर बने रहने के बावजूद पॉज़िटिव पाये जाने वाले केस घटकर 19 मई को 2,67,246 तक पहुंच चुके हैं। फिर भी मौत का आंकड़ा उसी अनुपात में कम क्यों नहीं हो रहा है?

    इतना ही नहीं उल्टा इस आंकड़े के बढ़ते जाने से लोगों की चिंता बढ़ना भी स्वाभाविक माना जा सकता है। लेकिन इसके लिये हमें थोड़ा संयम सूझबूझ और आंकड़ों की प्रक्रिया को बारीकी से समझना होगा। वास्तविकता यह है कि संक्रमण के आंकड़े जहां प्रतिदिन हमारे सामने आ रहे हैं। वहीं मौत के आंकड़े सामने आने में कुछ दिन की देरी हो रही है। आमतौर पर संक्रमण और मौत के आंकड़े 12 से 14 दिन आगे पीछे चलते हैं। इसकी वजह यह है कि जब किसी आदमी को कोरोना होता है तो उसकी जांच से उसी दिन पता लग जाता है।

    यही वजह है कि कोरोना पॉज़िटिव होने का उसका आंकड़ा उसी दिन सरकार के रिकॉर्ड पर दर्ज होेकर सार्वजनिक हो जाता है। लेकिन जहां तक मौत का सवाल है तो कुल कोरोना पॉज़िटिव में से लगभग एक प्रतिशत के आसपास लोगों की मौत होती है। कोरोना वायरस किसी भी इंसान की बॉडी में जाकर पहले चार से पांच दिन चुपचाप छिप जाता है। इसके बाद वह शरीर में एक्टिव होता है। इसीलिये कहा जाता है कि कोरोना मरीज़ का पांचवा और छटा दिन बहुत जोखिम वाला होता है। इस दिन कोरोना का वायरस इंसान की छाती में प्रवेश कर जाये तो उसके फेफड़ों में संक्रमण करने लगता है।

   यहां कोरोना वायरस खून के थक्के जमाकर हमारे लंग्स को अपनी पूरी क्षमता से काम करने से रोकने लगता है। इससे कोरोना रोगी को सांस लेने में प्रॉब्लम आने लगती है। फिर उनको ऑक्सीजन आईसीयू और वेंटिलेटर उपलब्ध उनकी क्षमतानुसार होता है। इस दौरान एक से दो सप्ताह बाद मरीज़ के मरने की नौबत आती है। इससे पॉज़िटिव आने और जान से जाने में एक से दो सप्ताह का अंतर आ जाता है। अधिकांश रोगी तब तक यह मानने को भी तैयार नहीं होते कि उनको कोेरोना हुआ है।

    इसकी वजह यह है कि अव्वल तो90 प्रतिशत से ज़्यादा लोग इस मौसम में बुखार खांसी नज़ला छींके गले में खराश कमर दर्द घुटनों में दर्द पूरे जिस्म के जोड़ों में दर्द या कमज़ोरी को कोरोना मानते ही नहीं। दूसरे ना तो छोटे शहरों कस्बों और गांवों में बुखार या वायरल होने पर जांच कराने की सुविधा है और ना ही हमारे समाज में परंपरा है कि जान लें कि कहीं कोरोना तो नहीं है। इस दौरान अगर पता लग जाता तो परिवार के अन्य सदस्यों को कोरोना पॉज़िटिव होने से बचाया जा सकता था। लेकिन हमारे यहां तर्क व वैज्ञानिक सोच के अभाव में कोरोना कन्फर्म होने के बाद भी शिक्षित तक भावुक परिवार में कोरोना रोगी को आइसोलेट नहीं किया जाता।

   ऐसे में उन कोरोना पॉज़िटिव की तो बात ही क्या करें जिनको खुद पता नहीं होता कि वे कोरोना का शिकार हो चुके हैं। यानी वे असिप्टोमैटिक होते हैं जिनको कोरोना बीमारी का कोई लक्ष्ण प्रकट ही नहीं होता है। संक्रमण और मौत के आंकड़े एक से दो सप्ताह आगे पीछे चलने की वजह यह भी है कि कई राज्य कोरोना जांच के लिये लिये गये खून के नमूने या आंकड़े तो केंद्र सरकार को तत्काल यानी उसी दिन भेज देते हैं। लेकिन मौत के आंकड़े रोके रखते हैं। कुछ राज्य तो इतने लेट लतीफ है कि मौत के आंकड़े कई दिन बाद ही नहीं एक से दो सप्ताह बाद भी भेज रहे हैं।

    हिंदी दैनिक जनसत्ता के अनुसार मिसाल के तौर पर महाराष्ट्र के उदाहरण से आंकड़ों के इस खेल को समझते हैं। वहां 17 मई को 1019 मौत रिकॉर्ड पर लाई गयीं। गहराई से जांच पड़ताल करने पर पता लगा कि इनमें से 289मौत तो 15 से 17 मई के बीच हुयी हैं। जबकि 227 एक सप्ताह के दौरान की हैं। इतना ही नहीं 484 मौत तो एक सप्ताह से अधिक पुरानी थीं। ऐसे ही कर्नाटक का मामला जांच में सामने आया कि 476 मौत का आंकड़ा जो उसने हाल ही में जारी किया था। उनमें अप्रैल और मार्च में हुयी मौते भी शामिल थीं।

    ऐसे ही उत्तराखंड ने हाल ही में 223मौत का आंकड़ा जारी किया तो इतने छोटे राज्य के महाराष्ट्र कर्नाटक तमिलनाडु और यूपी के दैनिक 300मौत के आंकड़े के लगभग आसपास पहुंचने पर केंद्र की सरकार की चिंता बढ़ गयी। बाद में जांच में पता लगा कि इस भारी भरकम आंकड़े में 80 मौत पुरानी भी शामिल थीं। इस तरह से आप समझ सकते हैं कि मौत के अब भी सामने आ रहे बढ़े हुए आंकड़े उतने डरावने नहीं हैं। जितने यह देखने सुनने और पढ़ने में लगते हैं। एक बात और कुछ विशेषज्ञ वरिष्ठ चिकित्सक और समाज विज्ञानी दावा कर रहे हैं कि संक्रमण ही नहीं बल्कि मौत के आंकड़े भी सरकार अपराध बेरोज़गारी और जीडीपी के आंकड़ों की तरह बहुत कम करके बता रही है।

  अगर हम इस दावे में कुछ सच्चाई मान भी लें तो इसमें एक सकारात्क बात छिपी हुयी है। गैर सरकारी आंकड़े20 से 25 गुना अधिक बताये जा रहे हैं। इस हिसाब से कोरोना की दूसरी लहर और एक साल से अब तक चल रही पहली लहर में कम से हमारे देश की आधी आबादी कोरोना पॉज़िटिव हो चुकी हो चुकी होगी। अभी भी जानकार सूत्रों का कहना है कि यह लहर जून जुलाई तक ही पूरी तरह नीचे आयेगी। यानी तब तक हमारी आबादी का 15 से20 प्रतिशत हिस्सा और कोरोना से रू ब रू हो चुका होगा। हैल्थ मैग्जीन लांसेट के अनुसार किसी भी देश की सौ प्रतिशत आबादी को कोई महामारी नहीं होती है।

    खासतौर पर बच्चे नौजवानों का एक वर्ग घरों में रहने वाली कुछ महिलायें और विशेष मेहनतकश वर्ग अपनी ज़बरदस्त मज़बूत इम्युनिटी की वजह से इससे अछूता रहता है। तीसरी लहर आने तक देश की कम से कम एक चौथाई आबादी का वैक्सीनेशन हो चुका होगा। आधी से अधिक आबादी में कोरोना से लड़कर एंटी बॉडी यानी एक तरह से हर्ड इम्युनिटी पैदा हो चुकी होगी। इस तरह से आप आशावादी रहिये। अच्छा सोचिये। सकारात्मक सोच रखिये। कोरोना हारेगा। आप और हम सब इसी साल कोरोना से जंग जीतेंगे। फिर धीरे धीरे लॉकडाउन खुलेंगे। अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटेगी। हम सबकी ज़िंदगी में खुशियां एक बार फिर से दस्तक देंगी। विश्वास कीजिये यह सब ज्यादा दूर नहीं है। लेकिन मॉस्क फिज़िकल डिस्टेंसिंग और हैंडवाश याद रखिये।                                                

 

 

Monday, 10 May 2021

5 राज्यों के नतीजे

5 राज्यों के चुनाव: कांग्रेस साफ़

भाजपा माफ़,कम्युनिस्ट हाफ!़

0 2 मई को जब पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आये तो ये देश की राजनीति का टर्निंग प्वॉइंट बन गये। पुडुचेरी में सत्ता गंवाकर और असम व बंगाल में गठबंधन के बावजूद पूरी तरह साफ होने के कारण ये देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिये बहुत बड़ा धक्का हैं। भाजपा जिस तरह से केंद्र और अनके राज्यों में अब तक की सबसे विवादित सरकारें चला रही हैं। उस हिसाब से देखा जाये तो कोरोना की दूसरी लहर से महाविनाश के बाद भी परिणामों से ऐसा लगता है कि जनता ने उसको आमतौर पर माफ तो कर दिया लेकिन कुछ राज्यांे में सबक भी सिखाया है। उधर कम्युनिस्ट जहां केरल में परंपरा तोड़कर एक बार फिर से सत्ता में लौट आये हैं। वहीं वे 34 साल राज करके बंगाल में अब पूरी तरह से खत्म होते नज़र आ रहे हैं।       

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   अगर बात बंगाल से शुरू करें तो वहां बेशक ममता बनर्जी की टीएमसी ने भाजपा के हिंदुत्व के साथ पूरी केंद्र सरकार मीडिया संघ परिवार कॉरपोरेट सीबीआई ईडी इनकम टैक्स एनआईए चुनाव आयोग और पीएम मोदी व गृहमंत्री शाह को उनके साम दाम दंड भेद के बावजूद चुनाव जीतकर क्षेत्रीय अस्मिता जनहित की राजनीति बंगाली मानुष के जवाबी ध््राुवीकरण से यह दिखा दिया है कि भाजपा को कैसे मनमानी करने से रोका जा सकता है। लेकिन यह भी सच है कि जिस तरह से भाजपा ने वहां के मुख्य विपक्षी गठबंधन कम्युनिस्ट व कांग्रेस को पूरी तरह किनारे लगाकर अपनी सीट 3 से बढ़ाकर एक झटके में 77 कर ली हैं।

    आने वाले समय में वह विपक्ष में रहकर एक तरह से रोज़ चुनाव की तैयारी करेगी और हो सकता है कि अगली बार सत्ता में आकर ही दम ले। पीएम मोदी ने जिस तरह से ममता को दीदी ओ दीदी कहकर चिढ़ाया और बंगाल भाजपा मुखिया घोष ने अश्लीलता की हद पार करते हुए यहां तक कह दिया कि ममता चोट लगने का जो नाटक कर रही है उससे पता चलता है कि वह आधे कपड़े ही पहनती है। इसके साथ ही अमित शाह ने शुरू से ही 200 से अधिक सीट जीतने का दावा किया वह सब मिलकर बंगाल के मतदाताओं खासतौर पर महिलाओं को बहुत नागवार लगा।

    जिस तरह से केजरीवाल ने दिल्ली में भाजपा का सत्ता में आने का सपना अपने जनहित के कामों के साथ ही जवाबी अपनी हिंदू पहचान से तोड़ा था। वही काम अब ममता ने अपना गोत्र चंडी पाठ दुर्गा पूजा पंडालों के लिये सरकारी दान और कई मंदिरों में जाकर लड़ाई हिंदू बनाम मुस्लिम होने से रोक दी। इतना ही नहीं सूती साड़ी हवाई चप्पल सादा मकान अपने खर्च पर सरकारी डाक बंगलों में ठहरना अपनी पेंशन ना लेना और दूसरे कई आम आदमी जैसे काम ममता की तीसरी रिकॉर्ड जीत के लिये मज़बूत आधार बन गये। उधर वामपंथी और कांग्रेस का बेमेल गठबंधन एक तो लोगों को पसंद नहीं आया।

    दूसरे कांग्रेस के खिलाफ भाजपा ने अपने व्हाट्सएप ग्रुपों से इतना ज़हर घोल दिया है कि वह अब कांग्रेसमुक्त भारत बनाने में लगभग सफल नज़र आ रही है। कम्युनिस्टों के पास चुनाव लड़ने को भाजपा के बराबर तो क्या सत्ताधारी टीएमसी के बराबर भी संसाधन नहीं थे। जिनको ममता से नाराज़गी थी। वे विपक्ष में कांग्रेस और कम्युनिस्टों को छोड़कर इस बार भाजपा के पाले में चले गये। तीन विवादित कानूनों के खिलाफ किसानों का गुस्सा भी किसी सीमा तक बंगाल के चुनाव में देखा जा सकता है।

    इतना ही नहीं कांग्रस और वामपंथियों ने फुरफुरा शरीफ मज़ार के कट्टरपंथी मैनेजर अब्बास सिद्दीकी के हाल ही में बने इंडियन सेकुलर फ्रंट से गठबंधन करके भाजपा के इस आरोप को खुद ही सही साबित कर दिया कि इनको मुस्लिम साम्प्रदायिकता और उनके तुष्टिकरण से कोई परहेज़ नहीं है। इतना ही नहीं यही गल्ती कांग्र्रेस ने असम में कट्टरपंथी मुस्लिम नेता बदरूद्दीन अजमल की यूडीएफ से पैक्ट करके कर दी। मौके की नज़ाकत ना समझते हुए अजमल ने एक से बढ़कर एक भड़काने वाले बयान भी खूब जारी किये। यही वजह थी कि भाजपा सीएए और अन्य तमाम कमियों व शिकायतोें के बावजूद असम का चुनाव हिंदू मुस्लिम बनाकर आराम से जीतने में एक बार फिर सफल हो गयी।

    यही नहीं कांग्रेस ने केरल में भी मुस्लिम लीग के साथ अपना साम्प्रदायिक गठबंधन जारी रखा। कांग्रेस ने वहां सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर भी बिल्कुल भाजपा जैसा रूख़ अपनाया था। आपको याद होगा इस विषय पर हमने पहले ही एक लेख लिखकर कांग्रेस का यह आत्मघाती क़दम बताया था। जिसका बदला अब वहां की महिलाओं ने कांग्रेस गठबंधन से इस चुनाव में ले लिया है। जबकि वहां कई दशकों से बारी बारी से वामपंथी और कांग्रेस सत्ता में आते रहे हैं। लेकिन इस बार वहां यह परंपरा टूट गयी है।

    इतना ही नहीं कांग्रेस वहां मुस्लिम लीग से गठबंधन करने के बावजूद इस बार बड़ी संख्या में मुसलमानों को कम्युनिस्ट पार्टी के साथ जाने से नहीं रोक पायी। इसकी वजह यह बताई जाती है कि पिनराई विजयन की वामपंथी सरकार जिस तरह वहां सबके विकास के निष्पक्ष काम कर ही है। उसका असर मुसलमानों की सोच पर यह देखकर भी पड़ा है कि अगर कम्युनिस्ट हारे तो केरल में भी आगे हिंदू साम्प्रदायिकता के बल पर भाजपा मज़बूत होने लगेगी। उनको वामपंथी यह भी समझाने में सफल होते लगे कि हिंदू साम्प्रदायिकता यानी भाजपा का मुकाबला मुसलमान साम्प्रदायिकता यानी मुस्लिम लीग के साथ मिलकर कांग्रेस नहीं कर पायेगी।

    इसके अलावा कम्युनिस्ट सीएम विजयन ने जिस समर्पण मेहनत और योग्यता से बाढ़ और कोरोना संकट का सामना किया । उसकी केरल की जनता ने ही नहीं पूरे देश और विदेशों तक में चर्चा हो रही है। केरल में 2019 के चुनाव में20 में से 19 लोकसभा सीट जीतने वाली कांग्रेस के लिये यह एक और बड़ा झटका है। कांग्रेस की चुनाव से पहले पुडुचेरी में सरकार थी। जो भाजपा ने चुनाव से कुछ ही दिन पहले उसके कुछ विधायकों से त्यागपत्र दिलाकर अपने जाने पहचाने तौर तरीकों से गिरा दी थी। इस बार चुनाव में कांग्रेस इस केंद्र शासित छोटे से प्रदेश की सत्ता भी गंवा बैठी है।

    हालांकि इसका राष्ट्रीय राजनीति पर कोई बड़ा असर नहीं पड़ता। लेकिन जब कांग्रेस केंद्र के साथ ही एक के बाद एक बड़े राज्यों की सत्ता से बाहर होती जा रही है और फिर कई बार से वहां वापस सत्ता में भी नहीं आ पा रही है तो यह कांग्रेस सत्ता के बचे खुचे राज्यों की गिनती बढ़ाने में तो कुछ मदद कर ही रहा था। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस पुडुचेरी असम बंगाल और केरल में पांच में से चार राज्यों में अपना बहुत कुछ सरमाया लुटा बैठी है। वह केवल तमिलनाडु में डीएमके के साथ बहुत छोटा साझेदार बनकर चंद सीट जीतकर अपने दिल को समझा सकती है कि उसने पांच में एक राज्य आंशिक रूप से जीता है।

    जहां तक कम्युनिस्टों का सवाल है। उनके लिये कभी खुशी कभी ग़म वाला मामला है। यानी वे जीत भी गये हैं और हार भी गये हैं। मतलब हाफ रह गये हैं। उधर तमिलनाडु मेें डीएमके गठबंधन के स्टालिन ने ऐसे समय में10 साल बाद एआईडीएमके को भाजपा से गठबंधन करने बावजूद हराया है। जबकि उसकी एकमात्र नेत्री जयललिता अब दुनिया में नहीं रही है। जयललिता का कोई विकल्प उनके दल के पास नहीं है। उधर स्टालिन को अपने पिता करूणानिधि से राजनीति घुट्टी में मिली है। उनके सीएम बनने के बाद ना केवल एआईडीएमके बल्कि भाजपा को भी उनको सत्ता से बाहर करने में लंबे समय तक संघर्ष करना होगा। कुल मिलाकर यह कह सकते हैं कि अगर राजनीतिक दल पढ़ना चाहें तो इन चुनावी नतीजों में सबके लिये कुछ ना कुछ राजनीतिक रण्नीतिक और सामाजिक संदेश हैैं।                                   

Friday, 30 April 2021

मोदी की लोकप्रियता....

कोरोना संकट में भी में मोदी की लोकप्रियता बरक़रार ?

0 2 मई को जब 5 राज्यों में हो रहे चुनावों के नतीजे आयेंगे तो यह बात एक बार फिर साफ़ हो जायेगी कि तमाम उतार चढ़ाव आरोपों और शिकायतों के बावजूद पीएम मोदी की लोकप्रियता आज भी जनता में बरक़रार है कि नहीं लेकिन कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जब मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश दिया तो उनका वो परंपरागत जोश आक्रामक तेवर और अटूट आत्मविश्वास कहीं नज़र नहीं आया। विदेशी मीडिया में तो उनकी सरकार की गैर ज़िम्मेदारी नासमझी की इस दौरान ज़बरदस्त आलोचना हो रही है।  जबकि मोदी की जनहित की कई योजनाएं आज भी लोगों के सर चढ़कर बोल रही हैं।   

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   मोदी सरकार का मीडिया मैनेजमैंट अब तक बहुत शानदार रहा है। इस सच को उनके विरोधी भी मानते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल चुनाव में उनका यही दांव उल्टा पड़ गया। हुआ यह कि गोदी मीडिया ने बंगाल में उनके चुनाव प्रचार को ही 24 घंटे पूरी तरह कवर किया। जबकि पहले की तरह विपक्ष को या तो पूरी तरह ब्लैकआउट कर दिया या फिर कभी कभी कहीं कहीं तड़का लगाने विरोधी दलोें की खिंचाई करने या उनकी जनसभा व रैली कम भीड़ दिखाकर नाकाम साबित करने को आधी अध्ूारी ख़बरें दिखाईं। इसका नतीजा यह हुआ कि जनता को यह लगा कि एक तरफ देश में कोरोना की दूसरी भयंकर लहर से जनता को ना तो ठीक से सरकारी इलाज मिल रहा है और ना ही उसकी कोई सुनने वाला है।

     जबकि दूसरी तरफ पूरी मोदी सरकार पांच राज्यों के चुनाव में जीत हासिल करने को सब काम छोड़कर पूरी जीजान से लगी हुयी है। इसमें भी खासतौर पर बंगाल का चुनाव 8चरण में इसी लिये रखवाया गया है। जिससे मोदी और उनके सिपहसालार लगभग हर सीट पर चुनाव रैली सभा और रोडशो करके हर कीमत पर बंगाल का चुनाव जीत सकें। छोटी छोटी बात पर राष्ट्र को संबोधित करने वाले मोदी जब कोरोना की दूसरी लहर से देश में हाहाकार मचने के लगभग एक माह बाद भी जनता के आंसू पोछने जनता को संदेश देने को समय नहीं निकाल सके तो पूरे देश में इस बात की चर्चा होने लगी कि मोदी के लिये जनता नहीं बल्कि उनकी चुनावी जीत ही सब कुछ है।

     उधर कोरोना से जैसे जैसे हालात बिगड़ते गये। विपक्ष हावी होने लगा। राहुल गांधी तो एक साल से कहते आ रहे हैं कि कोरोना से निबटने का कोई सुनियोजित प्रोग्राम मोदी सरकार के पास नहीं है। समय ने मोदी विरोधियों का यह आरोप भी सही साबित कर दिया कि मोदी का एक साल पहले चार घंटे के नोटिस पर लगाया गया देशव्यापाी लॉकडाउन पूरी तरह जनविरोधी और मनमाना था। इससे कोरोना तो रूका नहीं उल्टे देश की अर्थव्यवस्था आम आदमी का रोज़गार जीडीपी और हर तरह का कारोबार तबाह हो गया। विपक्ष ने मौका देखकर बढ़ते कोरोना कहर से बचाने को चुनाव आयोग से बंगाल का चुनाव छोटा करने को गुहार लगाई।

    इस पर दिखावे के लिये आयोग ने सर्वदलीय बैठक बुलाई लेकिन केवल भाजपा इस पर राज़ी नहीं हुयी जिससे आयोग ने हाथ खड़े कर दिये। बंगाल में बड़ी बड़ी रैली और जनसभाओं से कोरोना के केस बेतहाशा बढ़ते देख विपक्षी दल कांग्रेस वामपंथी और टीएमसी ने एक तरफा अपने चुनाव प्रचार को या तो रोक दिया या फिर बेहद सीमित कर दिया। इससे पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह जो किसी कीमत पर बंगाल में चुनाव प्रचार कम करने को तैयार नहीं थे। पहली बार मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबाव में आने को मजबूर हो गये।

     उधर पूर्व प्रधनमंत्री मनमोहन सिंह से लेकर राहुल गांधी कम्युनिस्ट शिवसेना ममता बनर्जी शरद पवार किसान नेता वैज्ञानिक वरिष्ठ डाक्टर पूर्व जज मानवतावादी वकील सेकुलर टीचर निष्पक्ष पत्रकार और विभिन्न समाजसेवी संगठन मोदी सरकार पर कोरोना की दूसरी लहर में लोगों को मरता छोड़ बंगाल चुनाव जीतने को लगे होने का आरोप लगाने लगे। जब संघ परिवार भाजपा और मोदी को यह लगा कि अब ना केवल बंगाल कोरोना का बड़े पैमाने पर शिकार होने और बाज़ी विपक्ष के हाथ जाने से निकल रहा है बल्कि पूरा देश उनके खिलाफ होेेेने जा रहा है।

    ऐसे में मजबूरन मोदी राष्ट्र के नाम संदेश देने बेमन बिना किसी ठोस तैयारी बिना किसी प्रमाणिक जानकारी के अचानक प्रकट हुए। लेकिन इस बार उनके पास कहने को कुछ नहीं था। एक अपराधबोध सा मोदी के चेहरे पर साफ झलक रहा था। लेकिन अपने अहंकार और अब तक ज़िम्मेदारी से भागकर झूठे प्रचार के ज़रिये सफल सरकार चलाने का स्वांग रचने वाले प्रधानमंत्री केवल यह कहकर पल्ला झाड़ते नज़र आये कि उनको अहसास है कि लोगों पर क्या बीत रही है। यह बात तो विपक्ष का कोई नेता कहता तो समझ में आ सकती थी।

     लेकिन कोरोना की दूसरी लहर इतनी घातक रही है कि ना तो लोगोें को अस्पताल में बैड मिल रहा है और ना ही रैमिडिसिविर इंजैक्शन ऑक्सीजन आईसीयू वैंटीलेटर और ना ही समय पर कोरोना टैस्ट की रिपोर्ट। इतना ही नहीं सरकारी आंकड़े के मुकाबले कोरोना या इस दौर में दूसरी बीमारियों का इलाज ना मिलने से मरने वालों का वास्तविक आंकड़ा इतना अधिक है कि कई शहरों में शमशान पर चिता जलाने को लकड़ी और कब्रिस्तान में कब्र खोदने को मज़दूर तक उपलब्ध नहीं हैं। अलबत्ता यूपी के पिछले चुनाव में मोदी की यह शिकायत ज़रूर दूर हो गयी होगी कि कब्रिस्तान का विकास होता है तो शमशान का भी होना चाहिये कि नहीं?

    आज मोदी लॉकडाउन से तौबा करते नज़र आ रहे हैं। लेकिन इस एक साल में ना तो वे स्वास्थ्य सुविधायें बढ़ा पायें और ना ही उनमें कोई विशेष सुधार कर पाये। उनकी सरकार की नालायकी की हद यह है कि उनके स्वास्थ्य मंत्री दो माह पहले कोरोना का नाम ओ निशान खत्म होने का दावा कर रहे थे। हालत यह है कि देश के 138 करोड़ में से मात्र तीन करोड़ नागरिकों को कोरोना के दोनों टीके देने के बाद मोदी सरकार विश्वगुरू बनने के चक्कर में विदेशों को इससे कहीं ज़्यादा वैक्सीन सप्लाई कर चुकी थी। इतना ही नहीं आज जिस ऑक्सीजन की कमी से देश के कई अस्पतालों में कोरोना के रोगी दम तोड़ रहे हैं।

    वही ऑक्सीजन मोदी सरकार विदेशों को निर्यात कर रही थी। और तो और दिल्ली हाईकोर्ट को पूछना पड़ा कि जब मरीज़ ऑक्सीजन गैस की कमी से मर रहे हैं। ऐसे में इंडस्ट्रियल प्रयोग को यह गैस अभी तक क्यों दी जा रही हैइस पर भी मोदी सरकार ने तत्काल रोक ना लगाकर कॉरपोरेट को कुछ दिन बाद इस गैस का इस्तेमाल बंद करने का आदेश दिया। ऐसा क्यों किया गया होगा यह अब किसी से छिपा नहीं है कि इस सरकार में किसके हित उूपर हैंमोदी सरकार की नाकामी की हालत यह है कि यह ऑक्सीजन इंजैक्शन रेमिडिसिविर और दूसरी ज़रूर जीवन रक्षक दवाईयों व उपकरणों की कालाबाज़ारी तक रोकने में लकवाग्रस्त साबित हो रही है।

    पहली बार हमें यह देखकर हैरत और दुख हुआ कि पीएम जब टीवी पर लाइव बोल रहे थे तो जिन परिवारों ने कोरोना से इलाज ना मिलने या सही व समय पर उपचार ना मिलने से अपना कोई गंवा दिया वो सोशल मीडिया पर अपने आक्रोश को ऐसे शब्दों में बयान कर रहे थे या कमैंट लिख रहे थे। जिसका उल्लेख हम कम से कम अपनी कलम से यहां नहीं कर सकते। बहरहाल कोरोना के इस भयंकर कहर से पहली बार ऐसा लग रहा है कि मोदी विपक्ष और जनता के सवालों से नज़रें चुराकर लाजवाब असहाय और निराश होकर भविष्य में अपनी परंपरागत लोकप्रियता को बनाये रखने को लेकर सशंकित हैं।                

Wednesday, 21 April 2021

कोरोना की दूसरी लहर

दूसरी लहर: लोग कोरोना से नहीं लॉकडाउन से डरे हुए हैं ?

0भारत सरकार की कोविड प्रसार और उसकी गति पर नज़र रखने वाली कमैटी के सदस्य और आईआईटी कानपुर के कंप्यूटर साइंस विशेषज्ञ मणींद्र अग्रवाल का मानना है कि कोरोना वायरस के स्वरूप में अगर कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ तो मई के पहले सप्ताह से कोविड केस अपने चरम पर पहंुचकर घटने लगेंगे। इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि लोग कोरोना से अधिक लंबे लॉकडाउन से डरे हुए हैं। यानी इस बार जान से अधिक रोज़ी रोटी की चिंता है।     

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   महाराष्ट्र और दिल्ली राज्यों में लॉकडाउन लगने के बावजूद जिस तरह से कोरोना पॉज़िटिव केस ढाई लाख से तीन लाख आंकड़े को छूने की तरफ बढ़ रहे हैं। उससे ऐसा लगता है कि जल्दी ही भारत अमेरिका का एक दिन में सबसे अधिक केस मिलने का रिकॉर्ड अपने नाम कर सकता है। पहली बार देश में 13 हज़ार164 कोरोना नमूनों की सरकार के स्तर पर जीनोम सीक्वेंसिंग हुयी है। इस जांच से सामने आया है कि देश में 10 प्रतिशत संक्रमित जनसंख्या डबल म्यूटेशन वालों की है। 8.77प्रतिशत मामलों में ब्रिटिश ब्राजील और साउथ कोरिया के वेरियेंट पाये गये हैं।

इससे पहले महाराष्ट्र में 361 नमूनों की जब जीनोम सीक्वेंसिंग के तहत इसी तरह की जांच की गयी थी तो पता चला था कि वहां 60प्रतिशत से अधिक केस डबल म्यूटेशन के पाये गये थे। ऐसा माना गया था कि इसी वजह से वहां सारे उपाये करने के बावजूद कोरोना मामले बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि दिल्ली में जीनोम सीक्वेंसिंग का कोई आंकड़ा अधिकारिक रूप से उपलब्ध नहीं है। लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि दिल्ली राजनीतिक और मुंबई आर्थिक राजधानी होने की वजह से दुनिया के लोगों का इन दोनों महानगरों में बहुत अधिक आना जाना भी कोरोना केस इन दोनों जगह पर तेजी से बढ़ने की एक वजह हो सकती है।

लेकिन जिस तरह से हाल ही में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के साथ छत्तीसगढ़ पंजाब व अन्य एक दर्जन से अधिक राज्यों में अचानक कोरोना के मामले बढ़े हैं। उससे यह तय करना मुश्किल होता जा रहा है कि आखि़र अचानक कोरोना के केस बेतहाशा बढ़ने की वास्तविक वजह क्या हैविशेषज्ञों का कहना है कि सरकार और जनता की यह भूल ही मानी जायेगी कि उन्होंने फरवरी में कोरोना के केस घटकर 8500 रह जाने पर यह मान लिया कि कोरोना अब खत्म हो चुका है। जबकि वे यह तथ्य भूल गये कि उन दिनों औसत 5 लाख टैस्ट हो रहे थे। आज यही टैस्ट बढ़कर 15 से 20लाख के बीच पहंुच गये हैं।

इसके साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि इस बार कोरोना के केस अधिकांश महानगरों और बड़े शहरों में अधिक हैं। इसकी वजह यह मानी जा रही है कि चूंकि डबल म्यूटेशन वाले कोरोना वायरस की पहली लहर सीध्ेा इन बड़े शहरों में हवाई अड्डे होने से विदेशों से यहां पहुंची है तो इन शहरों पर अधिक और पहले कहर बरपा रहा है। इसके साथ ही यह तथ्य भी सामने आ रहा है कि सर्दी जाने के बाद जब गर्मी या बरसात आने से मौसम बदलता है तो अकसर संक्रामक रोग फैलते हैं। आम तौर वायरल फीवर खांसी जुकाम नज़ला बदन दर्द डैंगू मलेरिया टाइफाइड और इससे मिलते जुलते लक्ष्णों वाले मौसमी रोग होने पर बड़े नगरों और सम्पन्न नागरिकों को जागरूकता की वजह से डॉक्टर और अस्पताल ब्लड टैस्ट कराने की सलाह देते हैं।

कुछ प्राइवेट क्लीनिक और हॉस्पिटल तो अपने यहां तब तक किसी भी तरह के रोगी को घुसने ही नहीं देते जब तक कि वे कोरोना की जांच रिपोर्ट साथ ना लायें। ज़ाहिर सी बात है कि ऐसे में मरीज़ चाहे जिस रोग का हो अगर उसकी कोरोना की जांच ज़बरदस्ती कराई जायेगी तो जिनको है। उनका कोरोना तो पकड़ में आये या ना आये लेकिन जब जांच अचानक कई गुना बढ़ जायेंगी तो कोरोना का आंकड़ा भी डरावना हो जायेगा। यह भी कहा जाता है कि हमारे यहां कोरोना की जांच किट पूरी तरह विश्वसनीय और सटीक नहीं है। इस वजह से भी कोरोना के बढ़ते आंकड़ों पर अगर विश्वास ना भी किया जाये तो कम से कम आश्चर्य भी नहीं किया जा सकता।

इसकी अब एक वजह यह भी सामने आ रही है कि कोरोना का नया वायरस संक्रमण के बाद एक से 30 से 40 की जगह अब 80 से 90लोगों तक को संक्रमित कर रहा है। दूसरी बात यह थी कि दुनिया के अन्य देशों में कोरोना की दूसरी तीसरी लहर ने कहर जब बरपा करना शुरू कर दिया था तो हमारा यह मानना मूर्खों के स्वर्ग में रहना था कि हमारे यहां ऐसा नहीं होगा?तीसरी बात हम सबने कोरोना से बचाव को मॉस्कफिज़िकल डिस्टेंसिंग और हाथों को बार बार साबुन से वाश करने या सेनिटाइज़ करने की ज़रूरत भी लगभग बंद कर दी थी।

इसके साथ ही कोरोना से बचाव को बनी वैक्सीन कोवैक्सीन और कोविशील्ड हम अपने देशवासियों को प्राथमिकता के आधार पर ना लगाकर विश्व गुरू बनने के चक्कर में पूरी दुनिया को निर्यात करने में लगे थे। इसका नतीजा यह हुआ कि जहां हमारे यहां अभी मात्र लगभग 3 करोड़ लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज़ दी जा सकी हैं। वहीं हमने लगभग 6करोड़ से अधिक वैक्सीन दूसरे मुल्कों को भेज दी है। इसके साथ ही एक गल्ती यह हुयी कि सरकार ने विदेशी वैक्सीन देश में आने को समय रहते अनुमति नहीं दी। हालांकि अब यह आपातकालीन व्यवस्था के तहत किया जा रहा है।

कुछ लोगों को यह भी भ्रम है कि वैक्सीन लगी होने के बावजूद लोगों को कोरोना हो रहा है तो इसका क्या लाभ हैदरअसल दुनिया की कोई भी वैक्सीन किसी को 100 प्रतिशत सुरक्षा का दावा नहीं करती। वैक्सीन कंपनियां 72 से 92प्रतिशत तक कोरोना से बचाव की बात पहले ही स्पश्ट कर चुकी हैं। लेकिन इतना ज़रूर है कि जिस किसी ने भी एक या दोनों डोज़ वैक्सीन की ली है। उनकी इम्युनिटी काफी हद तक बढ़ जाती है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि ऐसे लोगों को कोरोना संक्रमण होने के बावजूद जान जाने का खतरा काफी हद तक टल जाता है।

बेशक उनको कोरोना हो सकता है। लेकिन वैक्सीन की वजह से उनकी रोग से लड़ने की क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि वे कोरोना को हराकर अपने जीवन की जंग अकसर जीत लेते हैं। स्वास्थ्य की जानी मानी लेंसैट मैग्जीन की नई ख़बर यह आ रही है कि अब कोरोना सरफेस खांसी छींक या ड्रॉपलेट से अधिक हवा के द्वारा एक से दूसरे में अधिक फैल रहा है। इसका इलाज फिर वही डबल मॉस्कदो गज़ दूरी और हैंडवाश के साथ ही जल्दी से जल्दी सबको वैक्सीन लगाना ही है। लेकिन बिना ज़रूरत बाहर घूम रहे भीड़ वाली जगह पर निश्चिंत और राजनेताओं की चुनावी रैली व जनसभाओं के साथ कुंभ मंदिर मस्जिद जैसे धार्मिक स्थलों में थोक में जा रहे लोगांे को देखकर लगता है। उनको कोरोना से बिल्कुल डर नहीं लग रहा है। अलबत्ता वे लॉकडाउन के ज़रूर भय खा रहे हैं कि कहीं पिछले साल की तरह पूरे देश में लंबी तालाबंदी ना हो जाये लेकिन वे भूल रहे हैं कि अगर वे मॉस्क और शारिरिक दूरी का पालन नहीं करेेंगे तो कोरोना का शिकार तो बन ही सकते हैं। साथ साथ बढ़ते जनदबाव संक्रमण और मौत के आंकड़ों की स्पीड बेकाबू होने से धीरे धीरे सरकार भी दिल्ली और महाराष्ट्र की तरह एक बार फिर ना चाहते हुए भी लॉकडाउन के लिये मजबूर हो सकती है।                                    

Wednesday, 17 February 2021

सबरीमाला काँग्रेस की दूसरी भूल?

कांग्रेस के लिये शाहबानो जैसी भूल बनेगा सबरीमाला?

0कहावत है कि जो लोग इतिहास से सबक नहीं सीखते वे इतिहास दोहराने को अभिषप्त होते हैं। आजकल दिशाहीन कांग्रेस पार्टी का कुछ ऐसा ही हाल नज़र आ रहा है। कांग्रेस ने केरल में आने वाले चुनाव में जीतने पर एक ऐसा कानून बनाने का वादा किया है। जिससे वहां के सबरीमाला मंदिर में एक खास उम्र की महिलाओं को जाने की अनुमति नहीं होगी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट इस तरह की रोक को गैर कानूनी घोषित कर चुका है। इस निर्णय पर केरल की सत्ताधारी वामपंथी सरकार अमल भी शुरू कर चुकी थी।   

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   ऐसा लगता है कि 2014 के बाद 2019 में भी भाजपा से लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस बुरी तरह बौखला गयी है। उसको यह समझ में नहीं आ रहा है कि वह कैसे भाजपा और संघ परिवार का मुकाबला करे। इतना ही नहीं वह अपनी सोच के वामपंथी क्षेत्रीय और अन्य सेकुलर दलों के साथ भी तालमेल बनाकर नहीं चल पा रही है। पहले राहुल गांधी ने गुजरात में विधानसभा चुनाव के दौरान भगवा वस्त्र धरण कर विभिन्न मंदिरों में पूजा अर्चना और अपने आप को शिवभक्त घाषित कर खुद को पूरी तरह हिंदू साबित करने का प्रयास किया।

उसके बाद कांग्रेस ने खुद पर बार बार लगने वाले मुस्लिम समर्थक पार्टी के आरोप को धोने के लिये केरल की मुस्लिम लीग कश्मीर की पीडीएफ और असम में बदरूद्दीन अजमल की पार्टी एयूडीएफ से दूरी बनानी शुरू की। फिर कांग्रेस ने मुसलमानों के खिलाफ होने वाले पक्षपात और अन्याय पर चुप्पी साधनी शुरू की। इसके बाद उसने मुसलमानों को चुनाव में कम टिकट देना शुरू किया। इसके बाद भी जब उसका मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप से पीछा नहीं छूटा तो उसने नरम हिंदुत्व का रास्ता अपनाना शुरू कर दिया। अचानक देश की सियासत में राष्ट्रीय स्तर पर जब औवेसी की एमआईएम का मुस्लिम पार्टी के तौर पर तेजी से उदय होने लगा तो कांग्रेस ने कुछ राहत की सांस ली।

इसके साथ ही उसने भी एमआईएम को भाजपा की बी टीम बताने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन अब लगता है कि कांग्रेस ने खुद को हिंदू पार्टी के तौर पर पेश करने का मन बना  लिया है। संविधान सबको समानता का अधिकार देता है। कोई भी सरकार ऐसा कोई कानून नहीं बना सकती जिससे संविधान की इस मूल भावना का निषेद्य हो। ऐसा नहीं हो सकता कि कांग्रेस इस बात को नहीं जानती हो। लेकिन उसने केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उस पर वहां की कम्युनिस्ट सरकार के अमल करने को हिंदू धर्म का विरोधी बताते हुए जबरदस्त मोर्चा खोल दिया था।

इतना ही नहीं राजनीतिक लाभ के लिये कांग्रेस को इस मुद्दे पर प्रगतिशील एलडीएफ सरकार के खिलापफ हिंदू साम्प्रदायिकता की खुलकर सियासत करने वाली भाजपा के साथ खड़े होने आंदोलन करने और एक तरह से सुप्रीम कोर्ट व संविधान का विरोध करने में भी कोई संकोच लज्जा या अनैतिकता नहीं दिखाई दी। कांग्रेस के इस महिला विरोधी समानता विरोधी और लिंगभेद वाले अवसरवादी रूख़ से इतना ज़रूर हुआ कि उसको 2019 के लोकसभा चुनाव में केरल की 20 में से 19 सीटें जीतने में सफलता मिल गयी। कांग्रेस ने केरल में अप्रैल में होने जा रहे राज्य विधानसभा चुनाव के लिये अपना जो घोषणापत्र तैयार करना शुरू किया है।

उसमें साफ लिखा है कि वो केरल के लोगों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए यह तय करने का अधिकार सबरीमाला के मुख्य पुजारी मंदिर कमैटी और हिंदू समुदाय को देगी कि वे मंदिर में किस आयु की महिलाओं का प्रवेश नहीं चाहते हैं। कांग्रेस ने दो क़दम आगे बढ़कर यहां तक ऐलान कर दिया है कि अगर कोई इस नियम को तोड़ेगा तो उसको दो वर्ष की सज़ा देने का कानून भी बनाया जायेगा। ज़ाहिर बात है कांग्रेस के इस फैसले से कट्टरपंथी खुश होंगे। हो सकता है कि वह अपने इस फैसले से केरल का अगला विधानसभा चुनाव जीत भी ले। लेकिन यहां कांग्रेस को यह याद दिलाने की ज़रूरत है कि उसने ऐसी ही एक भूल शाहबानो के केेस में की थी। जिसका खामियाज़ा वह आजतक भुगत रही है।

साम्प्रदायिकता अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक नहीं होती। ना ही वह मुसलमानों की अच्छी और हिंदुओं की बुरी होती है। साम्प्रदायिकता तो जातिवाद क्षेत्रवाद और हिंसा व लोभ की तरह एक बुराई ही होती है। लेकिन कांग्र्रेस केरल की सत्ता किसी भी कीमत पर हासिल करने को इतनी उतावली और बेचैन है कि वह भाजपा से भी दो कदम आगे बढ़कर हिंदू कट्टरपंथ का सहारा लेकर सरकार बनाने को उतावली लग रही है। कांग्रेस को यह भी नहीं दिखाई दे रहा कि अब केरल का वह माहौल नहीं है जो 2018 में सबरीमाला पर कोर्ट का फैसला आने के बाद 2019 में बना था।

हालांकि उसमें भी भाजपा का बड़ा रोल था। लेकिन केरल में भाजपा का राजनीतिक स्थान बहुत मामूली होने की वजह से कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल होने से कम्युनिस्ट विरोधी हवा का सियासी लाभ अकेले उठाने में सफल हो गयी थी। हाल ही में स्थानीय निकाय के चुनाव में जिस तरह वामपंथी नेतृत्व मंे एलडीएफ ने भारी जीत हासिल की है। उससे भी साफ लग रहा है कि अब कांग्रेस को फिर से एकतरफा जीत मिलने वाली नहीं है। वह यह भी भूल गयी है कि सुप्रीम कोर्ट के इसी फैसले के पक्ष में वहां 20 लाख महिलाओं ने मानव श्रृंखला बनाकर अपना समर्थन जताया था।

हालांकि बाद में मोदी सरकार की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले पर पुनर्विचार करने के लिये बड़ी बैंच बनाकर एक तरह से अपने ही ऐतिहासिक संवैधानिक और समानता के सराहनीय निर्णय पर रोक लगा दी थी। कांग्रेस की यह हालत तब है जबकि उसके शीर्ष नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी कोर्ट का फैसला आने के बाद शुरू शुरू में महिलाओं के पक्ष में खड़े थे। लेकिन बाद में जब कांग्रेस की केरल यूनिट ने इस मुद्दे पर महिला विरोधी रूख़ अपनाया तो कांग्रेस हाईकमान भी इस मुद्दे पर अपने प्रगतिशील और संवैधानिक समानता के रूख से पलट गया।

कांग्रेस ने 1985 में शाहबानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट के समानता और मानवता के संवैधानिक फैसले को कट्टरपंथियों के दबाव में पलटकर पहले भी ऐसी ही भूल की थी। लेकिन लगता है कि कांग्रेस ने भारत की राजनीति की धुरी पूरी तरह बदलने वाली इस सियासी गल्ती से कोई सबक नहीं सीखा है।                                          

0 लेखक पब्लिक ऑब्जर्वर के प्रधान संपादक व स्वतंत्र पत्रकार हैं।।

Thursday, 14 January 2021

परिवार नियोजन जबरन नहीं...

जनसंख्या नियंत्रण को कानून बनाने से डरी मोदी सरकार?

0किसान आंदोलन से निबटने के लिये मोदी सरकार कॉरपोरेट के पक्ष में बनाये तीन विवादित कृषि विरोधी कानून वापस लेने को किसी कीमत पर तैयार नहीं है। इससे एक साल पहले मुस्लिम विरोधी माने जाने वाले सीएए कानून को भी भाजपा सरकार तमाम आंदोलन और दुनिया के कई मुल्कों में विरोध होने के बावजूद बदलने को तैयार नहीं हुयी थी। लेकिन इसके विपरीत परिवार नियोजन के लिये दो बच्चो का कानून बनाने से मोदी सरकार सुप्रीम कोर्ट में जवाबी हलफ़नामा दाखिल कर एक तरह से डर गयी है।  

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   संघ परिवार का लंबे समय से ये यह प्रचार चलता आ रहा है कि अगर बढ़ती हुयी मुस्लिम आबादी को कानून बनाकर काबू नहीं किया गया तो भारत एक दिन इस्लामी राष्ट्र बन जायेगा। दिलचस्प बात यह है कि खुद भारत सराकर के सर्वे जनगणना और विभिन्न पारिवारिक जांच के आंकड़े इस दावे को झुठलाते रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से कई वर्ष पहले एक जनहित याचिका दायर कर यह मांग की गयी थी कि वह सरकार को जनसंख्या नियंत्रण करने को एक कानून बनाने का आदेश दे जिसमें हर परिवार में केवल दो बच्चे पैदा करने की आज़ादी दी जाये। यह याचिका सबसे बड़ी अदालत में कई सालों से विचाराधीन है। इस पर पहले की सेकुलर यानी कांग्रेस सरकार ने तो कभी कोई सकारात्मक जवाब दिया ही नहीं। इसका कारण यह माना जाता रहा है कि कांग्रेस जैसे कथित धर्मनिर्पेक्ष दल अल्पसंख्यकों यानी मुसलमानों का तुष्टिकरण करते हैं, लिहाज़ा वे अपने वोटबैंक को नाराज़ करने से बचने को इस तरह का कोई कानून बनाने से परहेज़ करेंगे। लेकिन यह हैरत मगर तसल्ली की बात है कि सत्ता में आने के बाद खुद भाजपा को भी यह सच और हकीकत समझ मंे आ गयी है कि चुनाव जीतने को झूठा प्रोपेगंडा कर सत्ता में आना एक बात है। लेकिन जब कानून बनाने की बात आये तो परिवार नियोजन जबरन लागू करना खुद हिंदू जनता के लिये राजनीतिक रूप से नुकसान का सौदा होगा। यही वजह है कि मोदी सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने जवाबी हलफनामे में ऐसा कोई कानून बनाने से साफ साफ मना कर दिया है। उसका कहना है कि इस तरह का कोई काूनन बनाना न तो व्यवहारिक होगा और न ही इसकी कोई आवश्यकता है। सरकार का कहना है कि आंकड़े बताते हैं कि भारत का वर्तमान टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 आज खुद ही उस मैजिक फीगर तक पहंुच रहा है। जो जनसंख्या स्थिर बनाये रखने के लिये हमारा आदर्श और लक्ष्य रहा है। सरकार का यह भी कहना है कि लोगों को अपने परिवार दो बच्चो तक सीमित रखने को कानून बनाना संविधान व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक मूल्यों के लिये घातक होगा। सरकार का कहना है कि जो टीएफआर सन 2000 की जनगणना में 3.2 था अब 2018 के सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम में खुद ही 2.2 तक आ गया है। सरकार मानती है कि परिवार नियोजन का विकल्प अनिवार्य नहीं स्वैच्छिक है। उसका कहना है कि लोग खुद यह बात समझने लगे हैं कि छोटा परिवार देश ही नहीं उनके अपने भी हित में है। पीएम मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरूआत करते हुए कहा भी था कि आज इस बात की चर्चा किये जाने की महती आवश्यकता है कि लोगों में यह जागरूकता पैदा हो कि वे जनसंख्या विस्फोट को रोकने के लिये अपना परिवार छोटा रखें। मोदी का कहना था कि जो ऐसा करते हैं। वे देश के विकास में योगदान देंगे और एक तरह से यही देशभक्ति का भी एक और रूप है। सरकार ने कोर्ट को यह भी बताया कि देश के कुल 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में से 25 ने 2.1 या उससे भी कम का लक्ष्य हासिल कर लिया है। सरकार का कहना है कि जहां 1991 से 2001 तक के दशक में देश की आबादी 21.54 प्रतिशत बढ़ी वहीं2001 से 2010 तक के दस सालों मंे बढ़त घटकर 17.64 तक आ गयी। यह सही है कि भारत ने इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑन पॉपुलेशन एंड डवलपमेंट 1994 के संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर पर सहमति जताई है। इसके लिये अनिवार्य नहीं ऐच्छिक परिवार नियोजन के जो तरीके अब तक सरकार ने अपनाये हैं। उनका सकारात्मक परिणाम सामने आया है। केंद्र सरकार ने यह भी स्पश्ट किया कि परिवार नियोजन का मामला मूल रूप से राज्य सरकारों के स्वास्थ्य विभाग के अधीन आता है। इसमें केंद्र राज्यों को सभी जरूरी सहायता और समय समय पर सलाह व निर्देश देता ही रहा है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पहले यह जनहित याचिका वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी कुमार ने दिल्ली हाईकोर्ट में दाखिल की थी। जहां यह खारिज कर दी गयी थी। यहां यह भी याद रखने की ज़रूरत है कि इंदिरा गांधी की सरकार ने जिस तरह से आपातकाल लगाकर70 के दशक में जबरन लोगांे की नसबंदी करके अनिवार्य परिवार नियोजन का जनविरोधी और अमानवीय अभियान चलाया था। उसका अंजाम कांग्रेस को अब तक की सबसे बुरी हार के तौर पर भुगतना पड़ा था। शायद यही वजह है कि मोदी सरकार उस सयम की इंदिरा की भूल से सबक लेकर ऐसा कोई अतिवादी कदम नहीं उठाना चाहती। जिससे मुसलमानों को दो बच्चो का कानून मनवाने के चक्कर में उल्टा गरीब और अशिक्षित या कम शिक्षित हिंदुओं के भी नाराज़ होने का ख़तरा पैदा हो जाये। वैसे भी सर्वे और सामाजिक पारिवारिक व स्वास्थ्य जांच के आंकड़े और जनसंख्या विशेषज्ञ बताते हैं कि यह प्रमाणित हो चुका है कि परिवार नियोजन करने या ना करने का सीधा रिश्ता धर्म से ना होकर शिक्षा और सम्पन्नता से है। इसका जीता जागता उदाहरण केरल है। जहां सबसे अधिक शिक्षा का स्तर उन्नत है और सभी धर्मों के लोगों में परिवार नियोजन लगभग बराबर ही लोकप्रिय है। यही तथ्य कश्मीर गुजरात और दक्षिण के राज्यों पर लागू होता है। वास्तव में सच यही है कि परिवार नियोजन और जनसंख्या नियंत्रण के लिये सख़्त कानून या तानाशाही की नहीं शिक्षा उच्च शिक्षा वैज्ञानिक व तार्किक शिक्षा के साथ ही सबके विकास और सबको सम्पन्न बनाने की ज़रूरत है। यहां यह भी याद रखना चाहिये कि अगर कोई सरकार या संगठन खुलकर या छिपकर चंद पंूजीपतियों के हाथ में खेल रही है और अधिकांश जनता को गरीब व जाहिल बनाये रखने की नीतियां अपना रही है। साथ ही कोई संगठन अगर एक धर्म विशेष वर्ग विशेष या दलित जैसी जाति विशेष को समाज में अलग थलग करने उनको आर्थिक रूप से लगातार कमज़ोर करने और उनको गरीब बनाये रखने की नीतियांे पर चल रहा है तो वह उनको परिवाार नियोजन से जानबूझकर दूर रखने की हरकत कर रहा है, जो सही मायने में देशविरोधी ही मानी जायेगी।                                           

0 लेखक ब्लॉगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।