Monday, 13 July 2020
विकास दुबे का एनकाउंटर
Saturday, 4 July 2020
जनसँख्या नियंत्रण
शिक्षित महिलायें हल कर रही हैं आबादी की प्रोब्लम!
0दि सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम स्टेटिस्टिकल रिपोर्ट 2018 का सर्वे बता रहा है कि देश की बढ़ती आबादी की समस्या का समाधान पढ़ी लिखी और विशेष रूप से उच्च शिक्षित महिलायें बखूबी अंजाम दे रही हैं। खुशी की बात यह है कि देश के जिन 22 राज्यों में यह सर्वे किया गया है। उससे पता चलता है कि इनमें से 13 में जनसंख्या अनुपात बहुत तेज़ी से नीचे आ रहा है। इससे एक बार फिर यह साबित हो रहा है कि बढ़ती जनसंख्या का कोई विशेष संबंध धर्म से नहीं शिक्षा से है।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
ज्नसंख्या नियंत्रण पर एक ताज़ा सर्वे बता रहा है कि हिंदी पट्टी के बड़ी जनसंख्या के राज्य यूपी बिहार व एमपी और अन्य राज्यों में असम आज भी आबादी स्थिर रखने की आदर्श टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 को लांघकर 2.4 से लेकर 3.2 प्रतिशत तक पहुंच रहे हैं। उधर पूर्व, दक्षिण और पश्चिम के अनेक राज्य बढ़ती शिक्षा और सम्पन्नता से अब एक या दो बच्चों के फार्मूले पर सख्ती से अमल कर रहे हैं। यानी देश के आधे से अधिक राज्य पॉपुलेशन रिप्लेसमेंट रेट 2.1 पर पहले ही पहुंच चुके हैं। सर्वे मंे यह भी देखने को मिला है कि जिन राज्यों में हाल ही के वर्षों में तेजी से बढ़ती आबादी पर लगाम लगी है।
वहां वे अपने राज्य से दूर दराज़ के क्षेत्रों मेें काम की तलाश में जाने वाले प्रवासी मज़दूरों के लिये घर पर अपने परिवार के बीच रहकर ही रोज़गार करने के संसाधनों को बढ़ाने पर खासा ज़ोर दे रहे हैं। इसकी वजह यह भी है कि अगर ये राज्य ऐसा नहीं करेंगे तो एक बार फिर से इनके राज्यों में श्रम की कमी होने से उद्योग धंधे माल की न्यूनतम लागत की वजह से बाहर का रास्ता अपना सकते हैं। इसके साथ ही ये राज्य अपने वरिष्ठ नागरिकों के लिये समाज कल्याण की अधिक से अधिक योजनायें लागू करने के साथ साथ उनके लिये बेहतर स्वास्थ्य सुविधायंे भी अपने राज्य में ही उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहे हैं।
सबसे बड़ी संतोष की बात यह है कि यह सर्वे साफ बता रहा है कि टीएफआर यानी शिशु जन्म दर और महिला शिक्षा के बीच सीधा रिश्ता है। मिसाल के तौर पर स्नातक महिलाओं के बीच 1.7 इंटर पास के बीच 1.8 और हाईस्कूल पास के बीच 1.9 जबकि प्राइमरी शिक्षा प्राप्त महिला का आंकड़ा जहां 2.5 तो अनपढ़ लेडी के बच्चों की जन्मदर 3.0 प्रतिशत तक पायी गयी है। सर्वे से यह भी सीख मिलती है कि जन्म दर को नियंत्रित रखने के लिये जहां लड़कियों को हर हाल में ना केवल पढ़ाया जाना चाहिये बल्कि उनको उच्च शिक्षित कर परिवार नियोजन के साधनों को पहले से और अधिक सुलभ सस्ता और आसान बनाया जाना चाहिये।
इस तथ्य पर भी काम होना चाहिये कि लड़कियों की घटती जन्मदर को कैसे रोका जाये? क्योंकि 2016-18 में जहां 1000 लड़कों पर 899 लड़कियां पैदा हो रही थीं। वहीं2012-14 में यह दर 906 थी। हमारे लिये यह भी चिंता और शर्म की बात होनी चाहिये कि जो शिक्षित महिलायें हमारी बढ़ती जनसंख्या का हल हमारे सामने पेश कर रही हैं। हमारा निष्ठुर स्वार्थी और लिंगभेद करने वाला पक्षपाती समाज उनकी जन्म से पहले ही कोख में जान लेने से आज भी बाज़ नहीं आ रहा है। यूएनएफपी स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट2020 बता रही है कि भारत में 4 लाख 60हज़ार कन्यायें हर साल गर्भ में ही लड़कों की चाह में मार दी जाती हैं।
अगर हम सरकारी नारे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर गंभीरता से अमल करें तो इस समस्या का समाधान हो सकता है। पिछले दिनों राज्यसभा में शिवसेना के सांसद अनिल देसाई ने एक प्राइवेट बिल पेश किया था। जिसमें संविधान में संशोधन कर एक नया कानून बनाने की मांग की गयी है। इस कानून के तहत हर भारतीय परिवार को केवल दो बच्चों तक पैदा करने की छूट होगी। यदि कोई इस कानून का उल्लंघन करेगा तो उससे सरकारी नौकरी शिक्षा इलाज सस्ता राशन रेलवे रिज़र्वेशन और अन्य सरकारी सुविधा छीन ली जायेंगी।
हैरत की बात है कि जहालत से आबादी बढ़ रही है और दूसरी तरफ ऐसे लोगों को शिक्षा से वंचित करने का कानून लाने की मांग हो रही है। साथ ही अपने परिवार को दो बच्चो तक सीमित कर सहयोग करने वालों को कुछ अतिरिक्त यानी सरकारी नौकरी आयकर मंे छूट व अन्य सरकारी सुविधाएं भी दी जायेंगी। असम तेलंगाना आंध्र प्रदेश महाराष्ट्र राजस्थान गुजरात एमपी छत्तीसगढ़ उड़ीसा बिहार और उत्तराखंड जैसे राज्यों में पहले ही इस तरह के कानून मौजूद हैं। जिनमें स्थानीय निकाय पंचायत ग्राम प्रधान के चुनाव व सरकारी सेवा से ऐसे लोगों को वंचित रखने का प्रावधान किया गया है।
जिनके दो से अधिक बच्चे हैं। लेकिन ज़मीनी सच यह है कि इससे इन राज्यों की आबादी को कम करने में कोई सहायता नहीं मिली है। दो बच्चो पर ज़ोर देने वालों का दावा है कि देश में संसाधन कम हैं। जबकि यह आधा सच है। पूरा सच यह है कि जितने संसाधन पूंजी और सुख सुविधायें हमारे देश में उपलब्ध हैं। उनमें से आधे से अधिक पर केवल एक प्रतिशत अमीर और शक्तिशाली लोगों का कब्ज़ा है।
आबादी घटाने की बात सुनने में अच्छी लगती है। लेकिन यह ख़तरा भी बना रहता है कि अगर एक बार यह वर्तमान आबादी से नीचे गयी तो फिर यूरूप और जापान की तरह सरकारें आबादी बढ़ाने के लिये लोगों को प्रेरित और पुरस्कृत करने को मजबूर हो जाती हैं। चीन में एक बच्चे की सख़्त नीति लागू करने के बाद मानव शक्ति उपलब्ध्ता में गिरावट के बाद वहां की सरकार इसमें छूट दे चुकी है। हमारे देश में सियासी लाभ लेने के लिये लंबे समय से यह भी दुष्प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमान चार चार शादी और 25 बच्चे पैदा करते हैं।
जबकि सरकारी आंकड़े बताते हैं कि दलित पिछड़ों और गरीब उच्च जाति के हिंदू भी अधिक बच्चे पैदा करते हैं। इसके विपरीत शिक्षित और सम्पन्न मुसलमानों के भी एक या दो ही बच्चे होते हैं। इसकी एक मिसाल सबसे शिक्षित राज्य केरल और सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला राज्य कश्मीर भी है। जिनमें मुसलमानों की आबादी का अनुपात अन्य शिक्षित व सम्पन्न राज्योें के हिंदुओं की तरह कम है।
Monday, 29 June 2020
चीन का बायकॉट
ऐसे कर सकते हैं हम चीन का बायकॉट!
0चीन ने 1962 की जंग के बाद एक बार फिर हमारी सीमा में घुसपैठ कर एशिया का साम्राज्यवादी देश बनने का सपना पूरा करने की हिमाकत की है। इतिहास गवाह है कि नेहरू सरकार ने भी चीन पर अपनी गल्ती नहीं मानी थी और आज मोदी सरकार भी चीन के अवैध कब्ज़े को अनदेखा कर उसी चूक को दोहराती नज़र आ रही है। ऐसे में जनता चीन को आर्थिक चोट देने के लिये उसके माल का बायकॉट कर सबक सिखाने का रास्ता अपनाना चाहती है तो बुराई क्या है?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया ने चीनी सामान का विकल्प तलाशने का काम बहुत पहले शुरू कर दिया था। अमेरिका ने तो बाकायदा उससे टैरिफ वार शुरू कर दिया था। ट्रेड वार मेें अमेरिका ने जब चीनी सामान के आयात पर टैक्स बेतहाशा बढ़ाया तो जवाब में चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ काफी बढ़ा दिया था। लेकिन इसका नतीजा यह हुआ कि अमेरिका को जहां 0.9 प्रतिशत तो चीन को पूरे एक प्रतिशत का नुकसान हुआ। अमेरिका ने इसके साथ ही चीन को अन्य देशों और दूसरे मोर्चों पर भी घेरा। अमेरिकी कम्पनियां चीन में अपना उत्पादन बंद कर नीदरलैंड थाइलैंड और वियतनाम चली गयीं।
इससे पहले कि अमेरिका चीन के खिलाफ कुछ और कड़े आर्थिक कदम उठाता। चीन ने एक तरह से उसके सामने घुटने टेक दिये। चीन ने जनवरी 2020 में अमेरिका से इन सारे विवादों पर बैठकर बात शुरू की। चीन ने वादा किया कि वह भविष्य में करेंसी मेनिपुलेशन रोकेगा, इंटलैक्चुअल प्रोपर्टी को कवच उपलब्ध करायेगा, साथ ही कॉपीराइट ट्रेडमार्क व पेटैंट्स की चोरी रोकने में मदद भी करेगा। चीन ने यह आश्वासन भी दिया कि वह भविष्य में विदेशी कंपनियों को अपनी टैक्नालॉजी चीन में उत्पादन करने पर चीन को ज़बरदस्ती देने के लिये दबाव नहीं बनायेगा।
इसके अलावा भी अमेरिका ने मौका देख कुछ और कड़ी व एकतरफा शर्तों के साथ चीन के साथ एक बार फिर से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किये। हालांकि हम यह दावा नहीं कर रहे कि हम भी चीन पर अमेरिका की तरह से उतना ही दबाव बनाकर उसको झुकने के लिये मजबूर कर सकते हैं। लेकिन इतना तो साफ है कि चीन झुकता है। उसको झुकाने वाला अमेरिका जैसा मुल्क चाहिये। चीन के साथ आप चाहे जितना झूला झूलें और चाहे जितना गले मिल लें। लेकिन बेवफाई और अहसान फरामोशी उसके मिज़ाज में है।
पहले भी चीन हिंदी चीनी भाई भाई का नारा लगाते लगाते हमारी सीमा में घुस आया था। उसने 1962 की जंग में किये गये अवैध कब्जे़ को आज तक नहीं छोड़ा है। अब उसने गलवान घाटी के साथ अन्य दो तीन और सीमा क्षेत्रों मेें अवैध घुसपैठ कर लगभग 60 किलो मीटर अंदर तक हमारे देश में नाजायज़ जगह घेर ली है। उसने हमारे तीन बड़ अफसरों सहित 20जवानों को भी शहीद कर दिया है। हमारी सरकार के पास दो ही विकल्प थे। एक तो वह चीन को बलपूर्वक पीछे उसकी वास्तविक सीमा रेखा तक वापस धकेल दे।
दूसरा नेहरू सरकार की तरह वह चीन द्वारा कब्ज़ाये गये क्षेत्र पर चुप्पी साधकर भविष्य में फिर से ऐसा ना हो इस रण्नीति पर काम करे। ऐसे में सरकार ने लगता है कि दूसरा विकल्प चुना है। उधर जनता का गुस्सा चीन के प्रति बढ़ता ही जा रहा है। चीनी सामान के बायकॉट की आवाज़ें तेज़ हो गयी हैं। हालांकि जनता को चाहिये था कि वह सरकार पर दबाव बनाती कि सरकार चीनी सामान के आयात पर या तो पूरी तरह रोक लगा दे या फिर उस पर टैरिफ़ इतनी अधिक बढ़ा दे कि वह अन्य देशों के उत्पादोें के मुकाबले काफी अधिक महंगा हो जाये। लेकिन सरकार इस मामले में अभी कशमकश में नज़र आती है।
सरकार ने फिलहाल इतना ज़रूर किया है कि उसके डिपार्टमेंट फॉर प्रमोशन ऑफ इंडस्ट्री एंड इंटरनल ट्रेड ने ई कॉमर्स कंपनियों जैसे अमेज़न फिलिपकार्ट व पेटीएम को निर्देश दिये हैं कि वे यह सुनिश्चित करें कि उनके सप्लाई किये जाने वाले प्रोडक्ट मूल रूप से किस देश के हैं। ये खरीदने वालों को बिना किसी खास मशक्कत के पता चल जाना चाहिये। 2018-19 के आंकड़ों के हिसाब से देखें तो पता चलता है कि भारत ने चीन से 70 बिलियन डॉलर का सामान आयात किया तो मात्र16.70 बिलियन डॉलर का माल उसे निर्यात किया।
इसमें भी सबसे अधिक हमने 76 प्रतिशत सामान इलैक्ट्रानिक्स और 65 से 70 प्रतिशत फार्मास्युटिकल्स यानी दवा आदि का आयात किया है। इस आंकड़े से पता चलता है कि हमारी निर्भरता चीन पर अन्य देशों से बहुत अधिक ही बढ़ चुकी है। इसका हमें विकल्प तलाशना ही होगा। जहां तक चीनी साफ्टवेयर का सवाल है। अपने मोबाइल से इन चीनी एप को हम तत्काल डिलीट कर सकते हैं। इनके विकल्प हमारे अपने देश व दूसरे देशों के मौजूद हैं। जहां तक हार्डवेयर की बात है तो अगली बार जब आप फोन लैपटॉप या कंप्यूटर व अन्य कोई ऐसा सामान खरीदने जायें तो सेमसंग एचटीसी नोकिया या भारतीय लावा व माइक्रोमैक्स का सामान खरीद कर चीन को आर्थिक नुकसान पहंुचा सकते हैं।
लेकिन इसके लिये हमें टिकटॉक जैसे एप और सस्ते चीनी सामान का मोह व लालच छोड़ना होगा। अब बात कर लेते हैं कि चीन की कंपनियों को कैसे नुकसान पहंुचा सकते हैं। इसे हमें चार हिस्सों में बांटकर समझना होगा। एक-चीन की कंपनी का बनाया सामान। दो- किसी विदेशी कंपनी का चीन में बनाया सामान। तीन-चीन से आये पार्ट्स से बना सामान। चार-चीन की किसी कंपनी के भारी निवेश से चल रही कंपनी का बना सामान। इसमें हम चीन की किसी भी कंपनी के बने सामान का खुला और सीधा बहिष्कार कर सकते हैं। लेकिन याद रहे कि एप्पल का चीन में बना फोन ना खरीदने से चीन का नहीं एप्पल का अधिक नुकसान होगा।
इस तरह के माल की खरीद से बचना मुमकिन भी नहीं है। भारतीय व अन्य विदेशी कई कंपनी चीन में माल बनाकर पूरी दुनिया में इसलिये बेच रही हैं कि वहां वह बहुत सस्ता पड़ता है। अब देखते हैं कि चीन की कंपनियों जैसे पेटीएम ज़ोमाटो स्वीगी व बाईजस जिन्होंने 50 प्रतिशत से अधिक पूंजी किसी अन्य कंपनी के साथ लगा रखी है। उनका बायकॉट किया जा सकता है। क्योंकि इनके लाभ का बड़ा हिस्सा चीन जा रहा है। जहां तक चाइनीज़ फूड का सवाल है। उसका बायकॉट करना समझ से बाहर है। आज दुनिया पूरी तरह एक ग्लोबल विलेज बन रही है।
भारत में बिकने वाला चाइना का खाना चीन से आयात नहीं होता है। मिसाल के तौर पर चाइजीज़ मेमोज़ भारत में ही बनते हैं। होटल भी भारतीय लोगों का है। उसमें शैफ़ और कुक और बैरे भी हमारे ही नागरिक हैं। ऐसे में इन आइटम का बहिष्कार कर हम अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मार रहे होंगे। ऐसे ही चीन के खिलौने बेचने वाली किसी दुकान या घर का चीनी टीवी तोड़ना मूर्खता ही कहलायेगी। सच तो यह है कि चीन का सामना इतना सस्ता और इतना आकर्षक है कि उसे ग्राहक खरीदते समय सारी देशभक्ति और राष्ट्रवाद भूल जाता है।
वैसे भी जनता की स्मृति इतनी कमज़ोर और इतनी क्षणभंगुर होती है कि वह आज जोश में खूब उबल रहा है। लेकिन सीमा पर विवाद ठंडा पड़ते ही सबकुछ भूलकर फिर से चीनी सामान खरीदने निकल पड़ेगा। ऐसे मंे सरकार से आशा की जाती है कि वह चीन को लंबी सोच विचार से तय रण्नीति के हिसाब से मात देने को गैर चीनी देशों के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट तेज़ी से बढ़ाये। मिसाल के तौर पर ऑस्ट्रेलिया के साथ8 साल से तो यूरूपीय यूनियन के देशों के साथ10 साल से हमारी सरकार बातें ही कर रही है। जबकि वियतनाम जैसे छोटे से देश ने यह काम कर हमें पीछे छोड़ दिया है। हमें यह सवाल भी खुद से करना चाहिये कि अमेरिका जैसे मित्र देश की कंपनियां चीन छोड़कर दक्षिण कोरिया क्यों जा रही हैं हमारे देश में क्यों नहीं आ रही हैं?
सहल
Monday, 22 June 2020
कोरोना और अख़बार
कोरोना से उखड़ रही हैं अख़बारों की सांसे ?
0‘‘प्रिंट मीडिया दो दशक से बंद होने की आशंका से ग्रसित था। आज कोरोना ने पूरे ब्रिटेन में 380 साल पुराने अख़बार उद्योग को नष्ट कर दिया है। लगता नहीं अब अख़बार बच पायेंगे।’’ कोरोना के इस विकट दौर में अख़बारों के संकट पर यह टिप्पणी जाने माने अख़बार द गार्जियन ने की है। जानकारों का यह भी कहना है कि यह आहिस्ता आहिस्ता ख़त्म होते प्रिंट मीडिया की एक लंबी बीमारी है। जिसे कोरोना महामारी ने अख़बारों की सांसे उखाड़कर और तेज़ किया है।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
हाल ही में एक बड़े पत्रकार ने सोशल मीडिया पर अपना दर्द बयान करते हुए बताया कि उनका वेतन 30 प्रतिशत से अधिक कम कर दिया गया है। उनका कहना है कि अमेरिका और दूसरे विकसित देशों की तरह फरलो यानी बिना वेतन लंबी छुट्टी पर भेजने का सिलसिला भारतीय मीडिया हाउस भी तेजी से अपना रहे हैं। कई पत्रकारों की नौकरी चली गयी है तो कई अख़बार या तो बंद हो गये हैं या फिर उनके पेज व एडिशन कम हो गये हैं। इसकी वजह कोरोना महामारी से बचने को लंबे लॉकडाउन से मीडिया के बंद होते विज्ञापन भी हैं।
इस बारे में शेवंती नाइनन ने द टेलीग्राफ में विस्तार से चर्चा करते हुए एक लेख लिखा है। इस लेख मेें नाइनन ने बताया है कि पूरी दुनिया में अख़बार क्यों संकट में हैं? इंडियाज़ न्यूज़ पेपर्स रिवॉल्यूशन जैसी पुस्तक लिखने वाले ऑस्टेªलिया के मीडिया एक्सपर्ट राबिन जैफ्री अभी इस मुद्दे पर गहन विचार विमर्श कर अपनी राय दुनिया के सामने रखने वाले हैं। राबिन ने 1991 के बाद हमारे देश में एल पी जी यानी लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल नीतियां अपनाये जाने के बाद पूंजीवादी विकास में प्रिंट मीडिया के बदलाव पर बहुत कुछ लिखा था।
राबिन आज इस बात पर गहन चिंतन में है कि किस तरह से क्षेत्रीय और राष्ट्रीय अख़बारों के साथ जो लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आज़ादी का विकास हुआ था। वह आज ख़तरे में है। जानकारों का कहना है कि कोरोना से पहले लोग तीन चार तक अख़बार लेते थे। लेकिन आज उनके घरों में इस मुद्दे पर गरमा गरम बहस और विवाद हो रहा है कि अख़बार फालतू खर्च है कि नहीं? कई घरों में एक अख़बार वह भी सबसे सस्ता वाला लेने पर एकराय बनी है। दरअसल कम लोगों को पता है कि जो अख़बार भी वे पढ़ते हैं कि वह जितने पेज का होता है।
लगभग उतने रूपये ही उसकी लागत होती है। लेकिन यह आपको 2 से 5 रूपये में आराम से मिलता रहा है। इसकी वजह यह है कि इसको बेचने का घाटा इसको मिलने वाले विज्ञापनों से पूरा होता रहा है। लेकिन आज पिं्रट मीडिया की लाइफलाइन यानी विज्ञापनों पर ही ज़बरदस्त चोट पड़ रही है। जहां सरकार ने दिये जाने वाले अपने हिस्से के सबसे बड़े बजट वाले विज्ञापन या तो बंद कर दिये हैं। या फिर ना के बराबर रह गये हैं। वहीं सरकार ने विगत कई साल से सभी मीडिया के लगभग दो हज़ार करोड़ के बिलों का भुगतान भी नहीं किया है।
इसकी वजह यह भी मानी जा रही है कि जो विज्ञापन पहले सरकार मीडिया में अपनी बात रखने और अपने खिलाफ जोरशोर से चलने वाले अभियान को धीमा करने के लिये देती थी। मीडिया ने आज सरकार के सामने दंडवत करके वो दोनों ही कारण खुद ख़त्म कर दिये हैं। ऐसे में मीडिया को विज्ञापन देने या उनका पेमेंट करने की सरकार को क्या ज़रूरत है? उधर अख़बार पहले ही आर्थिक संकट का सामना कर रहे थे। लेकिन आज कोरोना की इस अफवाह ने उनके ताबूत में एक तरह से अंतिम कील ठोंक दी है कि इसकी स्याही और काग़ज़ में कोरोना का संक्रमण हो सकता है।
जबकि दुनिया की हर लैब डाक्टर और वैज्ञानिक ने साफ कर दिया है कि ऐसा कुछ नहीं है। खुद अख़बारों ने भी अपने स्तर पर इस अफवाह को रोकने के लिये जोरदार प्रयास कर अपने ऑफिस से लेकर प्रैस तक बड़े पैमाने पर सेनिटाइज़ेशन का अभियान चलाया है। सच यही है कि अख़बारों की छपाई का सारा काम आजकल पूरी तरह से मशीनों से होता है। इस दौरान इस पूरी प्रक्रिया में किसी का हाथ किसी अख़बार से टच तक नहीं होता है। यहां तक कि पैकिंग के लिये इन अख़बारों के बंडल की गिनती भी मशीन ही करती है।
इस लेखक ने खुद लोकप्रिय चिंगारी और बिजनौर टाइम्स दैनिक अख़बारों की डैस्क पर कई साल संपादन सहयोगी का काम करने के दौरान इस पूरी प्रोसेज़ को करीब से देखा है। यहां तक कि डब्ल्यू एच ओ ने भी यह स्पश्ट किया है कि अख़बार सच्ची और प्रमाणिक जानकारी का ज़रिया है। इनको छूने पकड़ने और पढ़ने से कोरोना होने का कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन इन दोनों कारणों ने मिलकर प्रिंट मीडिया के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। यह सच अपनी जगह है कि अख़बारों के सामने आज के संकट का एक बड़ा कारण आधुनिक तकनीक यानी इंटरनेट भी है।
डिजिटल मीडिया ने पिं्रट मीडिया को धीरे धीरे साइबर मीडिया में बदलने को मजबूर कर दिया है। आप अगर पिछले दो तीन दशक का इतिहास देखें तो पायेंगे कि गूगल और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इन अख़बारों की खास खास ख़बरे चुराकर बिना किसी शुल्क के अपने उपभोक्ताओं को 24 घंटे लगातार परोसकर पिं्रट मीडिया को धीमा ज़हर देने का काम किया है। इस दौरान इंडियन न्यूज़ पेपर्स सोसायटी ने सूचना प्रसारण मंत्रालय को पत्र लिखकर अख़बार उद्योग को संकट से बचाने के लिये विज्ञापन दर 50प्रतिशत बढ़ाने, न्यूज़ पिं्रट का सीमा शुल्क 5प्रतिशत घटाने और दो साल तक टैक्स में छूट की मांग की है। कम या ज़्यादा पूरी दुनिया में ही अख़बारों के सामने यह संकट मौजूद है। लेकिन पिं्रट मीडिया के विज्ञापनों का बड़ा हिस्सा आज इलैक्ट्रॉनिक और डिजिटल मीडिया की तरफ खिसक जाने से यह संकट कोरोना के साथ मिलकर और भी गहरा गया है।
(लेखक नवभारत टाइम्स डॉटकॉम के ब्लॉगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं ।)
Sunday, 7 June 2020
अनलॉक 1 में हम
अनलॉक-1 में हमारा व्यवहार, आ कोरोना हमें मार ?
0सरकार ने 25 मार्च से जब सख़्ती से लॉकडाउन लगाकर कोरोना से लड़ना चाहा तो कुछ लोगों का कहना था कि लॉकडाउन की ज़रूरत ही नहीं थी। इसके बाद सरकार को भी अहसास हुआ तो उसने जान भी जहान भी का नारा देकर लोगों की रोज़ी रोटी को लॉकडाउन में कुछ छूट दीं। इसके बाद भी जब बात नहीं बनी और नौबत यह आ गयी कि सरकार के पास वेतन देने तक को पैसा नहीं था और घरों मेें बंद गरीब मज़दूर लोग भूखों मरने की कगार पर आ गये तो अनलॉक एक का ऐलान हुआ। लेकिन अब हालत यह है कि लोग मास्क व डिस्टैंसिंग का पालन तक नहीं कर रहे हैं।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
कभी कभी सरकार उसका नेतृत्व और उसके निर्णय को लागू करने वाली पुलिस व अन्य अधिकारियों की मशीनरी ऐसे दोराहे पर आ जाते हैं। जहां उनको यह तय करना बड़ा कठिन होता है कि कौन सा रास्ता सही होगा?दरअसल यह समय की कसौटी पर भविष्य ही तय करता है कि कौन सा फैसला सही साबित हुआ? कोविड 19 यानी कोरोना वायरस डिसीज़ 2019 का जितना डर और बड़े पैमाने पर लोगों की जान जाने का नुकसान का अंदेशा शुरू शुरू में था। उस दौरान हमारी सरकार ने जिस तरह से पहले 21 और बाद में 19 और फिर दो दो सप्ताह का बारी बारी से लॉकडान लगाया।
ऐसा लगा कि इसके अलावा कोई चारा ही नहीं था। हालांकि इस लॉकडाउन को लगाने का तरीका और इसके सख़्ती से लागू करने का पुलिस का अति उत्साह व बल प्रयोग आलोचना का विषय भी ठीक ही बना। लेकिन इस दौरान स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने पहले से बेहतर करने और लोगों को कोरोना की भयावहता का अहसास कराने का शासन प्रशासन एनजीओज़ व जागरूक नागरिकों का सतत अभियान काफी काम आया। दो माह बाद सरकार को भी यह लगा कि हमारे जैसे गरीब अविकसित और कम शिक्षित देश में इतना सख़्त और इतना लंबा लॉकडाउन व्यवहारिक और आवश्यक नहीं है।
साथ ही अमेरिका यूरूप के मुकाबले हमारे यहां ही नहीं बल्कि गर्म मुल्कों व पूरे दक्षिण ऐशिया में कोरोना का असर बहुत कम हुआ। इसकी कुछ बड़ी वजह में से हमारे यहां लगने वाला बीसीजी का टीका और हम लोगों का इम्युनिटी सिस्टम मज़बूत होना भी था। इसके बाद सरकार ने अनलॉक एक शुरू किया। जिसमें कोरोना के सबसे अधिक केस वाले स्थानों को छोड़कर बाकी सब जगह लगभग लॉकडाउन ना के बराबर ही रह गया। लेकिन इस दौरान भी सरकार ने जनता को पूरी सावधानी और बचाव को व्यापक दिशा निर्देश जारी किये।
मगर देखने में यह आ रहा है कि कड़े नियम कानून की तो बात ही क्या है? लोग मामूली और बुनियादी बचाव यानी मास्क या उसके विकल्प का इस्तेमाल और 6 फुट की फिज़िकल दूरी तक का पालन नहीं कर रहे। जिन दुकानों की बारी सप्ताह में जिन तीन दिन है। वे पूरे सात दिन दुकान खोले बैठे हैं। वहां आने वाले ग्राहक पांच की सीमा लांघकर भीड़ के रूप में दुकान में घुसे चले जा रहे हैं। रिक्शा कार बाइक बस रेल और हवाई जहाज़ों तक में बीच की सीट खाली छोड़ने के नियम की अनदेखी हो रही है। लोग बार बार मना करने के बावजूद धार्मिक स्थलों और बाबाओं के पास थोक में जमा हो जा रहे हैं।
वे एक दूसरे को स्पर्श करने में भी परहेज़ नहीं कर रहे हैं। एटीएम राशन की दुकान बैंक अस्पताल रेलवे स्टेशन बस स्टैंड और अन्य भीड़ वाली जगहों पर लोग सेनिटाइज़र का इस्तेमाल उपलब्ध होने के बावजूद करना भी गवाराह नहीं कर रहे हैं। दुख की बात यह है कि ऐसा अनपढ़ गरीब व कम शिक्षित व विपन्न लोग ही नहीं बड़े बड़े सूटेड बूटेड व्हाइट कॉलर जॉब वाले लोग भी कर रहे हैं। लोग यह बात पूरी तरह से भूल गये हैं कि सरकार ने लॉकडाउन को अनलॉक किया है। लेकिन कोरोना बीमारी ने हमें अभी टीका या दवाई बन जाने तक छूट या आज़ादी नहीं दी है।
यह अजीब बात है कि देश में जब 552कोरोना केस थे तो हम सजग थे। लेकिन आज जब यह लेख लिखे जाने के समय तक2,36,657 कोरोना के मामले सामने आ चुके हैं तो हम लापरवाह गैर ज़िम्मेदार और निश्चिंत नज़र आ रहे हैं। यह तो ऐसा लग रहा है कि जैसे हम अपने लापरवाह व्यवहार से कोरोना को चुनौती दे रहे हों कि आ कोरोना हमें मार?
Thursday, 28 May 2020
कोरोना के दौर में ईद
0इस बार ज़िंदगी की पहली ईद ऐसी आई। जिसको मनाने का मन ही नहीं किया। ना तो हमने नये कपड़े बनाये और ना ही तरह तरह के पकवान। ना तो हमारे घर कोई आया। ना ही हम किसी के घर गये। हालांकि पिछले साल ही हमारे बाबूजी के दुनिया से विदा होने के बाद आई पहली ईद पर भी हम दुखी ज़रूर थे। लेकिन आप विश्वास कीजिये इतना अकेलापन इतना दुख इतनी बेचैनी तब भी नहीं थी। जितनी इस बार लॉकडाउन के भयावह दर्दनाक और कलेजा मुंह को लाने वाले कभी ना भूलने वाले हादसों लम्हों व चीख़ती तस्वीरों को देखकर हुयी।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
कोई माने या ना माने मुझे लगा था कि सरकार ने चौथे दौर के लॉकडाउन में जो बड़े पैमाने पर नागरिकों को छूटें और आज़ादी दी थी। उसके पीछे अन्य वजहों के साथ ही मुस्लिम भाइयों को ईद की खरीदारी करने ईद ठीक से मनाने व अपने रिश्तेदारों और दोस्तों से मिलने की आज़ादी देने के लिये भी गुंजाइश नज़र में रखी थी। चंद लोगों ने कोरोना लॉकडाउन और तबाह व बर्बाद होती इकॉनोमी को नज़रअंदाज़ करके ईद को अपने परंपरागत तरीके से मनाया भी होगा। लेकिन हमने अपने आसपास दोस्तों रिश्तेदारों से फोन पर बात करके पता किया तो ज़्यादातर लोगों ने ईद पर कोई खास जश्न नहीं मनाया।
जहां तक हमारा अपना सवाल है। हम सोशल मीडिया पर बहुत अधिक समय बिताते हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि जहां मेनस्ट्रीम मीडिया पर देश और दुनिया की सच्ची तस्वीर देखने को नहीं मिलती। वहीं सोशल मीडिया पर इतनी ज़्यादा गहराई बारीकी और शिद्दत से सब कुछ टैक्सट ऑडियो और वीडियो की शक्ल में हर पल हम तक पहंुच रहा है कि दिल और दिमाग़ उन लोगों की तकलीफ़ों दर्द व चीखों से लबालब भरा रहता है। हालत यह है कि ऐसा लगता है कि कोई अपना हमवतन बिल्कुल नज़दीकी या खास भूख प्यास रेल रोड एक्सीडेंट कोरोना से जान गंवा चुका है।
हज़ारों कि.मी. पैदल चलता, साइकिल रिक्शा और बैलगाड़ी दूध व तेल के टैंकर ट्रकों में बंद होकर मौत और ज़िंदगी के बीच झूलता अपने घर जाने को छटपटा रहा है। कोई सड़कों पर 48 डिग्री तपिश में बेसहारा परेशान और लाचार कर्राह रहा है। चीख़ रहा है। रो रहा है। मदद के लिये आवाज़ें दे रहा है। छोटे मासूम बच्चे रोटी रोटी भात भात चिल्ला रहे हैं। पानी की एक एक बूंद को रेगिस्तान व कर्बला की तरह तलाश रहे हैं। ये सब देखकर मेरी भूख उड़ गयी है। मुझे कई रात नींद नहीं आती। कई बार सोचता हूं नींद की दवा लेनी पड़ेगी। कई बार सोचता हूं किसी मनोचिकित्सक से मिलकर सलाह लेनी होगी।
कई बार अपने इन दुखी हमवतनों की वेदना व्यथा और आंखों से बहते आंसू देखकर मन इतना दुखी हो जाता है कि मैं खुद बैठे बैठे रोने लगता हूं। अचानक हालात पर गुस्सा आने लगता है। बहुत अधिक तनाव महसूस करने लगता हूं। करोड़ों इंसानों के इन दुखों को दो माह से देखते सुनते और पढ़ते रहने से यह दीवानगी बैराग और अजीबो गरीब हालत हो गयी है कि बिना किसी ठोस और बड़ी वजह के परिवार के सदस्यों दोस्तों व संबंधियों से बात करने हंसने बोलने या मनोरंजन को दिल नहीं चाहता है। शेविंग किये एक अरसा बीत गया है।
कपड़ों पर पै्रस करानी छोड़ दी है। खूश्बू लगाने का शौक कब का विदा हो चुका है। जूते मौज़े पहनने का मतलब ही नहीं है। जब कहीं जाना ही नहीं है। मांस खाना छोड़ दिया है। मिठाई का चाव था लेकिन वह भी बंद कर दी। कराओके सिस्टम पर गाने गया करता था। अब वे तो क्या अच्छे लगेेंगे गाने सुनना तक नहीं सुहाता। हालांकि मन को अकसर समझाता भी हूं कि कभी कभी हालात इंसान के काबू से बाहर हो जाते हैं। एक दिन सब ठीक हो जायेगा। लेकिन दिल है कि मानता नहीं। ऐसे में ईद आई और चली गयी। जब मेरे हमवतन खुश होंगे। लॉकडाउन पूरी तरह खुल जायेगा। कोई भूख प्यास गरीबी लाचारी या कोरोना से नहीं मरेगा। उसी दिन हमारी सच्ची और अच्छी ईद होगी।
0अंध्ेारे मांगने आये थे हमसे रोश्नी की भीख,
हम अपना घर ना जलाते तो और क्या करते।
;लेखक नवभारत टाइम्स डॉटकॉम के ब्लॉगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं