Thursday, 11 July 2019

परिवारवादी दल

परिवारवादी दलों का सफ़ाया होना ही था!

0यूपी में समाजवादी पार्टी और बिहार में राष्ट्रीय जनता दल जैसे परिवारवादी दलों की सीटें ही नहीं बल्कि वोट प्रतिशत भी आज ऐसी ढलान पर आ गया है। जहां से उनकी सत्ता में वापसी की दूर दूर तक कोई संभावना दिखाई नहीं दे रही है। क्या बहुजन समाज पार्टी ने इनके पतन से परिवारवाद से कोई सबक लिया है?        

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   दरअसल मुलायम सिंह यादव और लालू प्रसाद यादव मंडल आयोग की सिफारिशंे लागू करने के दौर में उत्तर भारत के राज्यों में पिछड़ों के मसीहा बनकर उभरे थे। उन्होंने दो दशक तक यूपी और बिहार में सत्ता या मुख्य विपक्ष का दर्जा हासिल रखा। आपको याद दिलादें मुलायम सिंह जहां समाजवादी नेता राममनोहर लोहिया से प्रभावित थे। वहीं लालू प्रसाद यादव आपातकाल का तीखा विरोध करने वाले जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में छात्र आंदोलन की देन माने जाते थे। ये दोनों ही कई बार अपने अपने राज्यों के मुख्यमंत्री बने।

     1989 के मंडल बनाम कमंडल के दौर में मुलायम सिंह के साथ जहां गैर यादव पिछड़ी जातियों के बड़े नेता रेवती रमण सिंह बेनी प्रसाद वर्मा जनेश्वर मिश्र रामशरण दास और मोहन सिंह कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे। वहीं बिहार में लालू के साथ दूसरी पिछड़ी जातियों के वरिष्ठ नेता रघुवंश प्रसाद सिंह नीतीश कुमार और दलित नेता रामविलास  पासवान व खांटी समाजवादी जार्ज फर्नांडीज़ भी हुआ करते थे। हालांकि इन राज्यों में पहले कांग्रेस का एकक्षत्र राज हुआ करता था। लेकिन इन पिछड़ी जाति के नेताओं के उदय से लंबे समय तक सत्ता में बने रहने से वहां भाजपा को राम मंदिर के आंदोलन से उभरने का राजनीतिक अवसर भी मिला।

    यूपी में दलित अति पिछड़ों और आंशिक मुसलमान वोट के समर्थन से बसपा ने भी धीरे धीरे अपनी सियासी पकड़ बनानी शुरू की। बाद में यूपी में ब्रहम्णों ने कांग्रेस और भाजपा को सत्ता में ना आता देख सपा को हराने के लिये सतीश मिश्रा की सोशल इंजीनियरिंग का नया प्रयोग करते हुए मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार बनवाद दी। लेकिन इस बार बहनजी कड़क प्रशासक की कसौटी पर खरी ना उतरकर उल्टा जाटव वोट बैंक मज़बूत बनाने और भ्रष्टाचार में गले तक डूब गयीं। इसके बाद वे एक के बाद एक चार चुनाव हार चुकी हैं।

    उधर मुलायम और लालू ने पहले अपने दलों को अपनी जाति यादवों के इर्द गिर्द समेटा और बाद में केवल अपने परिवार तक सीमित कर दिया। देश की आधे से अधिक आबादी यानी54 प्रतिशत पिछड़ों की बजाये धीरे धीरे सपा और राजद प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की तरह अपनी जातियों के बाद अपने परिवार तक केंद्रित हो गयी। लगभग सभी लाभ के पदों पर इन दोनों ने अपने परिवार के लोगों के चुन चुनकर बैठाना शुरू कर  दिया। हद तो तब हो गयी जब लालू प्रसाद को चारा घोटाले में जेल जाना पड़ा तो उन्होंने अपने दल के किसी दूसरे पिछड़े नेता को मुख्यमंत्री की कुर्सी ना सौंपकर अपनी घरेलू पत्नी राबड़ी देवी को सत्ता की बागडोर सौंप दी।

     यहां से ही राजद का पतन शुरू हो गया। लालू के बाद दूसरे नंबर के नेता नीतीश कुमार को लगा कि वे लालू के साथ रहते कभी सीएम नहीं बन पायेंगे। ऐसे ही यूपी में मुलायम ने धीरे धीरे कुर्मी गूजर और दूसरे पिछड़े नेताओं को या तो बाहर का रास्ता दिखा दिया या फिर उनकी हैसियत सपा में दो कौड़ी की कर दी। जनेश्वर मिश्र के बाद उन जैसे नये नेताओं को भी मुलायम ने सपा से जोड़ने की ज़हमत नहीं की। हद तो तब हो गयी जब मुलायम के बाद पार्टी में नंबर दो माने जाने वाले सगे भाई शिवपाल सिंह को भी मुलायम ने पुत्रमोह में नज़र अंदाज़ कर अखिलेश यादव को सीएम बना दिया।

     इसके बाद उनके परिवार में ही बगावत हो गयी। परिवारवाद यहां बाद में वंशवाद में बदल गया। उधर लालू ने भी अपने बाद राजद की बागडोर अपने छोटे बेटे तेजस्वी यादव के हाथ में सौंप दी। वहां उनके बड़े बेटे तेजप्रताप ने बग़ावत का झंडा बुलंद कर दिया। इसके साथ ही गैर यादव अन्य पिछड़े दल के नेता धीरे धीरे इन दोनों दलों से किनारा करते गये। बिहार में तो नीतीश कुमार भाजपा से गठबंधन कर2005 में लालू को सत्ता से बाहर करने में सफल हो गये।

    उन्होंने अपने मामूली से कुर्मी वोटबैंक की बजाये मुसलमानों दलितों सहित अगड़ी जाति के गरीबों के लिये जमकर जनहित के काम करके खुद को बहुत जल्दी ही सुशासन बाबू की उपाधि से सुसज्जित कर लालू की सत्ता में वापसी के दरवाज़े लगभग बंद कर दिये। बाद में दस साल बाद जब लालू को अपनी सियासी ज़मीन खिसकने का अहसास हुआ तो उन्होंने नीतीश को अपना गठबंधन नेता स्वीकार कर2015 में सत्ता में भागीदारी स्वीकार कर ली।

    इधर यूपी में मुलायम के यादववाद परिवारवाद और मुसलमानवाद से तंग अन्य पिछड़ी जातियों ने पहले बसपा का दामन थामा और बाद मंे मौका देखकर वे अगड़ी जातियों के साथ 2017 में भाजपा में जा मिलीं। सवाल यह है कि इसमें गल्ती किसकी हैक्या गैर यादव पिछड़ों को मुलायम और लालू ने खुद सपा और राजद से बाहर जाने को मजबूर नहीं कियालेकिन हैरत और दुख की बात यह है कि मायावती ने मुलायम और लालू की इस गल्ती से सबक ना सीखकर न केवल अकेले चुनाव लड़ने का आत्मघाती निर्णय किया है।

     उल्टे अपने भाई और भतीजे को बसपा में बड़े पदों पर आसीन कर भाईभतीजावाद का खुला खेल खेला है। ऐसे में बसपा से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन अखिलेश और तेजस्वी के पास अभी लंबा राजनीतिक कैरियर है। देखना यह है कि ये अपने पिताओं द्वारा अपनी पार्टियों में की गयी महाभूल को जारी रखते हैं या फिर गैर यादव पिछड़ों के साथ ही आन्ध््राा के जगन रेड्डी और तमिलनाडू के स्टालिन की तरह अन्य पिछड़ों अल्पसंख्यकों दलितों व सवर्ण जातियों के गरीबों को भी साथ लेकर उनको शीर्ष नेतृत्व में भागीदार बनाकर सर्वसमाज के लिये भाजपा और कांग्रेस से इतर नया व्यापक जनहित का सियासी विकल्प लोकतंत्र को मज़बूत बनाने को उपलब्ध कराते हैं?                                                        

0 आपने तीर चलाया तो कोई बात ना थी,

  हमने ज़ख़्म दिखाये तो बुरा मान गये ।।                   

डॉक्टर बनाम मरीज़

डाक्टर की सुरक्षा-रोगी का विश्वास!

0सोशल मीडिया पर डाक्टर्स की हड़ताल के दौरान एक पोस्ट वायरल हो रही थी। अगर भगवान नाराज़ होता है। तो डाक्टर के पास जाना पड़ता है और डाक्टर नाराज़ हो जाये तो भगवान के पास जाना पड़ता है। कलकत्ता मेें जब हिंसा से नाराज़ होकर डाक्टर्स ने हड़ताल की तो यह व्यंग्य सच साबित हो गया।        

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   हिंसा डाक्टर्स के खिलाफ ही नहीं सभ्य समाज के किसी भी वर्ग के खिलाफ भी स्वीकार नहीं की जा सकती। डाक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है। वे दिन रात मेहनत से काम करते हैं। सप्ताह की छुट्टी तक उनको नहीं मिल पाती। घर के ज़रूरी काम और परिवार के साथ सैर सपाटा करने की भी उनको कभी कभी लंबे समय तक मोहलत नहीं मिलती। एमरजेंसी में रात को सोते हुए उनको अकसर उठा दिया जाता है। अस्पतालों में ज़रूरी उपकरणों का अभाव और दवाओं की कमी की वजह से अगर कोई अनहोनी हो जाये तो भी उनको निशाना बनाया जाता है।

    हम यहां उन ढेर सारे आरोपों की चर्चा नहीं करेंगे जो डाक्टर्स पर मरीज़ और उनके तीमारदारों द्वारा गाहे ब गाहे लगाये जाते हैं। इसकी वजह यह है कि हम डाक्टर्स के खिलाफ़ होने वाली हिंसा को किसी भी कीमत पर किसी भी कारण से और किसी भी बहाने से सही नहीं ठहरा सकते। लेकिन एक सवाल ज़रूर उठाना चाहते हैं। क्या हमारे देश में हिंसा केवल डाक्टर्स के साथ ही होती हैराजनीतिधर्म,जातिलिंग और गरीबी की वजह से क्या देश के कोने कोने में जमकर रोज़ हिंसा नहीं हो रहीक्या दंगों में सामूहिक हिंसा नहीं होती?क्या आंदोलन के नाम पर हिंसा नहीं होती?

    मिसाल के तौर पर खैरलांजी नरसंहार,भागलपुर आंख फोड़ कांडनरोदा पटिया,आदिवासी आंदोलन को कुचलने के लिये राज्य द्वारा हिंसक दमनअल्पसंख्यकों की मोब लिंचिंगदलितमहिलाबच्चो और कमज़ोर व बेसहारा गरीब लोगों के खिलाफ हिंसा पर आप चुप रहते हैं। लेकिन आप चूंकि उच्च शिक्षित सम्पन्न और राजनीतिक रसूख रखते हैं। इसलिये आप चाहते हैं कि केवल आप हिंसा से सुरक्षित रखे जायें। आप यह भी जानते हैं कि स्वास्थ्य सेवायें प्राइवेट क्षेत्र में बहुत महंगी हैं। महंगी भी इतनी कि हर साल 6 करोड़ लोग उनका बोझ उधार धन लेकर उठाने से सामान्य वर्ग से बीपीएल में चले जाते हैं।

    सरकारी अस्पतालों की हालत यह है कि यहां या तो वीआईपी लोग इलाज के लिये आते हैं या फिर बेहद गरीब मजबूरी में आते हैं। यह रहस्य किसी से छिपा नहीं है कि दोनों के साथ कितना अलग अलग व्यवहार होता है। बहुत पुरानी बात नहीं है। जब भाजपा सांसद अनंत हेगड़े ने एक डाक्टर को कैमरे पर जमकर कूटा था। सतना में ऐसे ही एक विधायक ने डाक्टर पर हमला कर गुस्सा निकाला था। अन्य दलों के नेता और बदमाश दबंग और रसूख वाले लोग आयेदिन डाक्टर्स के साथ हिंसा करते ही रहते हैं। लेकिन तब डाक्टर हड़ताल पर नहीं जाते।

    कलकत्ता की हिंसा के लिये भाजपा के प्रदेश मुखिया ने एक वर्ग विशेष को उत्तरदायी बताकर बंगाल में अपनी सरकार बनाने की ज़रूरत भी बता दी। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने वोटबैंक पर आंच आने से बचाने को शुरू में उल्टा डाक्टर्स को धमकाने लगीं। बाद में न केवल डाक्टर्स की सभी शर्तें मानीं बल्कि आरोपियों के खिलाफ सख़्त कानूनी कार्यवाही भी की। लेकिन सवाल यह है कि क्या ऐसा संभव है कि देश में किसी डाक्टर पर हमला हो ही ना?

    सुप्रीम कोर्ट ने डाक्टर्स की हड़ताल के खिलाफ एक जनहित याचिका पर सुनवाई स्थगित करते हुए उनको उनकी शपथ की याद दिलाते हुए कहा भी कि हिंसा ना होने देने के लिये हर डाक्टर के लिये एक पुलिसवाला तैनात नहीं किया जा सकता। सच तो यह है कि डाक्टर की सुरक्षा मरीज़ का यह विश्वास ही कर सकता है कि डाक्टर ने पूरी ईमानदारी ज़िम्मेदारी और समय पर सही इलाज किया है। डाक्टर को भगवान मानना भी बड़ी समस्या बन गया है। चूंकि भगवान तो गल्ती करता ही नहीं। ऐसे में रोगी के परिवार वाले डाक्टर को इंसान ना मानकर यह जानना चाहते हैं कि वह हर कीमत पर उनके मरीज़ को बचा क्यों नहीं पाया?

    जबकि डाक्टर की भी अपनी सीमायें हैं। अगर कानून पुलिस और सरकार हिंसा ना होने की गारंटी होते तो फांसी की सज़ा का प्रावाधान होने के बावजूद बच्चो महिलाओं और दलितों के साथ हिंसा की घटनाये ंना बढ़ती। डाक्टर्स को यह बात जितनी जल्दी समझ मंे आ जाये उतना ही अच्छा है कि उनको तमाम कमियों दबाव और सुविधाओं के अभाव में भी रोगी और उसके परिवार के साथ विश्वास का रिश्ता मज़बूत करना होगा। उनके साथ हमदर्दी अपनापन मानवता दर्शानी होगी। उनसे लगातार संवाद जारी रखना होगा।

     उनके साथ हंसी मज़ाक संवेदनशीलता सहायता और उनके दुख में आंसू बहाने होंगे। नहीं तो जिस समाज में अलग अलग वर्गों के साथ हिंसा आम हो। उनकी रपट भी ना होती हो। उसमें किसी को सज़ा भी ना मिलती हो। उसमें हड़ताल करके डाक्टर्स अपनी मांगे तो मनवा सकते हैं। लेकिन किसी भी सख़्त से सख़्त कानून से हिंसा पूरी तरह रूक सकती है,इसमें हमें शक है।                                                    

0 फ़क़त बातें अंधेरों कीमहज़ क़िस्से उजालों के,

  चिराग़े आरज़ू लेकर ना तुम निकले ना हम निकले।                   

कांग्रेस का हश्र

कांग्रेस का यह हश्र हमें पहले ही पता था!

02014 का चुनाव जीतने के बाद जिस दिन मोदी ने कांग्रेसमुक्त भारत का नारा दिया था। जानकार लोग तभी समझ गये थे कि वे पूर्व पीएम नेहरू इंदिरा और राजीव पर दिवंगत होने के बावजूद भी तीखे हमले क्यों कर रहे हैं?हमने भी 4 मई को ही एक लेख में लिख दिया  था-‘‘क्या कांग्रेस 2024 की तैयारी कर रही है?’’आज वही हुआ जो हमने कहा था कांग्रेस की दुगर्ति आपके सामने है।       

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   देश में कुल 90 करोड़ मतदाता हैं। बीते आम चुनाव में लगभग 62 करोड़ ने मतदान किया है। इनमें से लगभग 22 करोड़ ने भाजपा को वोट किया है। वहीं लगभग 12 करोड़ ने कांग्रेस को वोट किया है। बाकी वोट अन्य दलों को गये हैं। हालांकि इस चुनाव में कांग्रेस के वोट बढ़े हैं। लेकिन उसका जिस भाजपा से मुकाबल था। उसके वोट कांग्रेस के मुकाबले कहीं अधिक बढ़ें हैं। साथ ही हमारे देश में वोटोें की गिनती में ब्रिटिश फ़सर््ट पास्ट पोस्ट सिस्टम लागू होने से कांग्रेस की सीट उसको मिले वोट के अनुपात में नहीं मिली हैं।

   वैसे तो इस चुनाव में मोदी ब्रांड की जिस तरह से साम दाम दंड भेद यानी हर मोर्चे पर ज़बरदस्त मार्केटिंग की गयी थी। उससे ना केवल कांग्रेस बल्कि कई राज्यों में राज कर चुके वामपंथी क्षेत्रीय दल सपा बसपा आरजेडी एनसीपी लोकदल आम आदमी पार्टी व टीएमसी जैसे सेकुलर दल भी बुरी तरह से धराशायी हो गये। लेकिन कांग्र्रेस का जहां तक सवाल है। वह न केवल राष्ट्रीय दल रही है बल्कि उसने तीन दशक तक केंद्र व राज्यों में एकक्षत्र राज भी किया है। कांग्रेस का इतिहास स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने और आज़ादी के बाद सबको साथ लेकर चलने का भी रहा है।

   आंध््राा उड़ीसा और तमिलनाडू में वहां के क्षेत्रीय दलों ने अपनी पकड़ अभी भी बनाये रखी है। अगर राहुल गांधी पर वंशवाद की सियासत का आरोप लगाकर असफलता का ठीकरा उनके सर फोड़ा जाये तो इसका अपवाद नवीन पटनायक एम के स्टालिन और जगन मोहन रेड्डी ने देश के सामने ज़बरदस्त जीत से पेश कर दिया है। खुद भाजपा में 25प्रतिशत एमपी और बड़े नेता किसी न किसी वंशवादी परिवार से चुनकर आये हैं। अरब के एक बड़े विद्वान ने कहा है कि वंशवादी नेतृत्व तीसरी पीढ़ी आते आते कमज़ोर पड़ जाते हैं। राहुल गांधी चौथी पीढ़ी के हैं।

   कुछ लोगों का कहना है कि कांग्रेस ने पूरे देश में सेकुलर और क्षेत्रीय दलों से गठबंधन ना करके 2019 का चुनाव भाजपा को थाली में रखकर जीत के तौर पर उपहार में भेंट कर दिया। इतना ही नहीं यूपी में उसने बांदा,बाराबंकीबस्तीचंदौलीधैरहराफिरोज़ाबाद,मेरठसंत कबीर नगरबदायंू और सुल्तानपुर जैसी 10 सीट सपा बसपा का वोट काटकर गठबंधन को हरा दिया। उल्टे पीएम पद के दावेदार राहुल खुद अपनी पारिवारिक सीट अमैठी भाजपा से हार गये। उन पर भाजपा ने आरोप लगाया कि वे केरल के वायनाड चुनाव लड़ने इसलिये गये क्योंकि वहां अल्पसंख्यक बहुसंख्यक हैं।

   राहुल किसी हिंदू बहुल सीट से चुनाव जीत नहीं सकते। यानी राहुल और उनकी कांग्रेस को हिंदू विरोधी साबित किया गया। लेकिन कांग्रेस भाजपा के जाल में फंसकर नरम हिंदुत्व के रास्ते पर चल पड़ी। चुनाव विश्लेषक योगेंद्र यादव ने तो राष्ट्रहित में अब कांग्रेस को ख़त्म करने की सलाह तक दे डाली है। लेकिन हमें लगता है कि असफलता अनाथ होती है। जबकि सफलता के कई बाप होते हैं। यह सच है कि कांग्रेस ने क्षेत्रीय और सेकुलर दलों से चुनाव पूर्व तालमले कर गठबंधन नहीं किया। जिससे उसकी बुरी तरह से हार हुयी। लेकिन यह भी सच है कि भाजपा ने 200 से अधिक सीटों पर 50 प्रतिशत से अधिक वोट प्राप्त किये हैं।

   जिससे कांग्रेस गठबंधन नहीं कोई भी महागठबंधन बना लेती वह मोदी को फिर से पीएम बनने से रोकने में नाकाम रहती। लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि कांग्रेस अन्य दलों के साथ तालमेल करके चुनाव लड़ती तो उसकी इतनी बुरी हालत ना होती। साथ ही भाजपा और एनडीए की सीट 2014 के मुकाबले शायद इतनी अधिक बढ़कर ना आतीं। लेकिन वह भाजपा नहीं सेकुलर दलों को भी निबटाना चाहती थी। कांग्रेस तो देश में टू पार्टी सिस्टम लाना चाहती रही है। कांग्रेस को दिसंबर 2018 में तीन राज्यों के चुनाव जीतने से भी खुशफहमी हो गयी थी।

   लेकिन उसको यह अंदाज़ नहीं था कि राजस्थान में तभी नारा लगा था कि मोदी तुझ से बैर नहींरानी तेरी ख़ैर नहीं। यानी केंद्र और राज्यों के चुनाव के एजेंडे व मुद्दे अलग अलग थे। साथ ही कांग्रेस को यह सच भी स्वीकार करना चाहिये कि राहुल को मोदी के मुकाबले सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है। कांग्रेस के पास देश के लिये कोई नया एजेंडा प्रोग्राम या सपना भी नहीं था। कांग्रेस के पास संघ परिवार की तरह संगठन राष्ट्रवाद मीडिया और कारपोरेट व अन्य सरकारी सहारे भी नहीं थे। यानी कुल मिलाकर यह गैर बराबरी का चुनाव था।

   जिसमें मोदी के मुकाबले राहुल ही नहीं कोई विरोधी दल का नेता दूर दूर तक टिक ही नहीं पाया। यह ठीक ऐसा ही मुकाबल था। जिसमें मोदी तो हवाई जहाज़ पर सवार थे। जबकि राहुल और अन्य विपक्षी नेता पैदल बैलगाड़ी या साइकिल से उनको पीछे छोड़ने की नाकाम व हास्यस्पद होड़ कर रहे थे। राहुल व दूसरे सेकुलर विपक्ष ने ये 5 साल तो गलतफहमी में गंवा दिये। उनको चाहिये कि वे आंध्रा के जगन रेड्डी की तरह अभी से 2024 के चुनाव की तैयारी ज़मीन से जुड़कर पदयात्रा कर आम आदमी से मिलकर नरम हिंदुत्व नहीं कट्टर धर्मनिर्पेक्षता समानता और सही मायने में सबके समान विकास का विस्तृत वैकल्पिक एजेंडा लेकर सड़क पर उतरें नहीं तो अमित शाह की 50 साल राज करने की भविष्यवाणी सच साबित होने जा रही है।                                                  

0 क़ातिल के तरफ़दार का कहना है कि उसने,

  मक़तूल की गर्दन पे कभी सर नहीं देखा ।।

Sunday, 7 July 2019

Sultana....

400 साल पुराना सुल्ताना डाकू का किला

रिपोर्ट :- फैसल खान, बिजनौर

एंकर :-  बिजनौर जिला  अपने आप मे एक बहुत बड़ा इतिहास है यहाँ पर मुग़ल काल के बहुत सारे  प्रमाण मिलते है जो आज भी मौजूद है लेकिन हम आपको ऐसी चीजों से रूबरू करवाएंगे जिसे आप  देखकर आप सोच मे पड़ जायेंगे और आप यहाँ आने के लिए मजबूर हो जायेंगे हम बात कर रहे है नजीबाबाद स्थित सुल्ताना डाकू के किले कि  जिसका इतिहास काफ़ी पुराना है और ये किला वो तमाम यादो को लिए आज भी मौजूद है देखिये बिजनौर से हमारे सहयोगी फैसल खान की रिपोर्ट l

वीओ 1:- सबसे पहले हम आपको नजीबाबाद के सुल्ताना डाकू का इतिहास बताते है l
सुल्ताना डाकू इतिहास का सच है परन्तु उससे सम्बंधित अनेक मिथक फिल्मों, नौटंकियों और लोकगीतों में हैं। कल्पना की धुंध में सुल्ताना का वास्तविक जीवन लिपट गया है। अंग्रेजों, सेठों और सामंतों ने उसे डाकू कहा। जनता के लिए तो वह गरीबों का प्यारा सुल्तान  था। सुल्ताना नाम तो उसे हिकारत से देखने वालों ने उसे दिया। सुल्ताना पर शोध करने वाले सीमैप के पूर्व वैज्ञानिक डॉ. एनसी शाह ने उसे मजबूत इरादे और उच्च चरित्र का इंसान कहा है।सुल्ताना डाकू का जन्म उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जनपद के सटे गाँव हरथला में हुआ था। वह जाति का था। भातू एक खानाबदोश जाति है। सुल्ताना का ननिहाल काँठ में था। किंतु अंग्रेजों ने भातुओं को काठ से नवादा में बसा दिया था। सुल्ताना के नाना नवादा में आ बसे और उसका बचपन नवादा में गुजरा। जीते-जी किंवदंती बन गया था सुल्ताना। कहा जाता है कि वह अमीरों को लूटता था और गरीबों में बाँटता था। यह समाजवाद का उसका ब्रांड था। सभी जानते हैं कि वह हत्यारा नहीं था। उसने कहा भी है कि उसने कभी किसी की हत्या नहीं की। बावजूद इसके उसे एक मुखिया की हत्या के जुर्म में फाँसी हुई। 14 दिसंबर, 1923 को नजीबाबाद के जंगल में सुल्ताना को गिरफ्तार किया गया।

वीओ 2:-  उसकी गिरफ्तारी के लिए ब्रिटिश सरकार ने फ्रेड्रिक यंग के नेतृत्व में विशेष दल बनाया था। फ्रेड्रिक यंग इंग्लैण्ड के तेज-तर्रार पुलिस अधिकारियों में से एक थे। उस विशेष दल में प्रसिद्ध शिकारी जिम कार्बेट भी शामिल थे। जिम कार्बेट आयरिश मूल के भारतीय लेखक एवं दार्शनिक थे। वे नैनीताल के पास कालाढूंगी में रहते थे। वे आजीवन अविवाहित रहे और उनकी बहन भी अविवाहित थीं।जिम कार्बेट ने अपनी पुस्तक ”माई इंडिया’’ में ”सुल्ताना : इंडियन रॉबिनहुड’’ नाम के अध्याय में उसकी जमकर प्रशंसा की है। इससे सुल्ताना के व्यक्तित्व को समझा जा सकता है। क्या यह महत्वपूर्ण नहीं कि सुल्ताना की गिरफ्तारी में मदद करने वाले जिम कार्बेट ने उसकी भूरी-भूरी प्रशंसा की? इतना ही नहीं, जिस पुलिस पदाधिकारी फ्रेड्रिक यंग ने उसकी गिरफ्तारी की थी, उसी ने सुल्ताना के पुत्र और पत्नी को पुराने भोपाल में बेलवाड़ी के पास बसाया, बेटे को अपना नाम दिया और लंदन में पढ़ाकर आईसीएस अधिकारी बनाया। डॉ. एन. सी. शाह ने लिखा है कि जंगलों में सुल्ताना ने दो बार यंग और जिम कार्बेट की जिंदगी बख्शी थी। इससे डाकू सुल्ताना का उज्ज्वल चरित्र उजागर होता है। 1923 में फ्रेड्रिक यंग ने गोरखपुर से लेकर हरिद्वार तक ताबड़तोड़ 14 छापे मारे थे। आखिरकार 14 दिसंबर, 1923 को सुल्ताना अपने खास साथी पीतांबर, नरसिंह, बलदेवा और भूरे के साथ गिरफ्तार कर लिया गया। सुल्ताना पर नैनीताल की अदालत में मुकदमा चला। वह मुकदमा ”नैनीताल गन केस’’ के नाम से जाना जाता है। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद सुल्ताना को आगरा के जेल में फाँसी दे दी गई। सुल्ताना डाकू के जीवन और कार्यों को काव्य-नाटक में बांधने का श्रेय नथाराम शर्मा गौड़ और अकील पेंटर को है। नथाराम शर्मा गौड़ हाथरस के रहने वाले थे और उनकी पुस्तक का नाम है ‘सुल्ताना डाकू उर्फ गरीबों का प्यारा।’ अकील पेंटर ग्राम चांदन (लखनऊ) के थे और उनकी पुस्तक का नाम है ‘शेर-ए-बिजनौर: सुल्ताना डाकू।’ उत्तर प्रदेश और बिहार के कस्बों, मुफस्सल और गाँवों में शायद ही कोई ऐसा नाटक हो, जिसे इतनी लोकप्रियता मिली हो जितनी सुल्ताना डाकू के नाटकों को मिली। लगभग चार सौ साल पूर्ब यह किला बनवाया था नजीबाबाद के नवाब नाजीबुद्दोला ने बनवाया था। बाद में इस पर सुलताना डाकू जो इसी जगह का था, कब्जा कर लिया। आज लोग इसे सुलताना डाकू का किला कहते है सुल्ताना एक बहादुर डाकू था जिसे पकड़ना नामुमकिन था। उस समय की पुलिस ने उसे पकड़ने की लगातार प्रयास कि‍ए। सुल्ताना डाकू का अपना एक इतिहास है, सुलताना डाकू पर एक फि‍ल्‍म भी बनाई गई जि‍समें दारा सिंह  ने सुल्ताना  का कि‍रदार नि‍भाया था।सुल्ताना डाकू ने यह किला अपने छुपने की जगह के तोर पे इस्तेमाल किया। सुल्ताना अपने समय का माना हुआ डाकू था जोकि 1920 के आस पास उत्तर प्रदेश में मिलने वाले भात्तू काबिले से था।

वीओ 3:-किले के चारों कोनों पर चार कुएं बने हुए हैं, जो अब सूख चुके है। ये कुएं किले की दीवार के अंदर इस प्रकार से बने हुए है कि दुश्मनों को इनका पता न चल सके। किले की दीवार के ऊपरी हिस्से से ही सैनिक इन कुओं से पानी खींच लेते थे। वर्तमान में इस बावड़ी की देख-रेख न होने के कारण जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। पुरातत्व विभाग व अन्य संबंधित विभाग को इसकी तनिक भी चिन्ता नहीं है। जिस कारण ये ऐतिहासिक धरोहर नष्ट होने के कगार पर है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद मंडल में स्थित जिला बिजनौर एक ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। इस जिले में महाभारतकालीन एवं मुगलकालीन कई ऐतिहासिक प्रसिद्ध इमारते एवं जल स्रोत है। जिले में गंगा एवं रामगंगा बारहमासी बहने वाली नदियां हैं। इसके अतिरिक्त पीली, मालिन, गागन, छोइयां , करूला, धारू बनाली, पावंधोई इसकी मौसमी नदियां हैं। इस जिले के कस्बे नजीबाबाद जो कि मुगल शासक नजीबुद्दौला द्वारा बसाया गया था। इनके द्वारा बनाये गये किले एवं ऐतिहासिक जल स्रोत आज भी यहां विद्यमान है जो कि अब जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। ऐसा ही यहां एक किला है डाकू सुल्तान का किला जो लगभग 70 एकड़ में फैला हुआ है। इस किले में दो प्रवेश द्वार है। यह किला पत्थर गढ़ के नाम से भी जाना जाता है। इसके विषय में कहा जाता है कि जब इस किले का निर्माण हुआ तो आस-पास के क्षेत्रो से पत्थरों को एकत्र कर यह किला बनाया गया था।

वीओ 4:-यह किला मुगल काल में बनाया गया था। मुगल काल के पतन के बाद इस किले में अंग्रेजों ने डेरा डाल लिया था अंग्रेजों ने यहां रहकर भारतीयों पर जुल्म ढाये इस कारण डाकू सुल्ताना ने इसका विरोध किया तथा भारतीयों के हक के लिए लड़ाई लड़ी। इस किले के नजदीक एक मौसमी नदी गांगड़ बहती है जो अपनी छोटी-छोटी शाखाओं को मिलाकर एक बड़ी नदी का रूप लेती है। यहीं पर गांगड़ का मंदिर भी है जिसमें श्रद्धालु काफी दूर-दूर से आते है। वर्तमान में यह किला निजामतपुर गांव के पास है। इस किले के बीचों-बीच एक प्राचीन बावड़ी है जिस पर नहाने के लिए सीढ़ी भी बनी हुई है और इस बावड़ी के दोनों ओर सुरंग भी बनी हुई है जिनका प्रयोग संभवतः इस बावड़ी को जल से भरने के लिए किया जाता रहा होगा अथवा दुश्मनों के आक्रमण के समय घेराबंदी में किया जाता होगा।

वीओ 5:- आज बहुत ही जर्जर स्थिति में सुल्ताना डाकु के किले का हालत हो गयी है l

यह सुरंग बावड़ी से होकर एक किलोमीटर तक बनी हुई है। उस समय इस बावड़ी के जल का प्रयोग सेना के लिए स्वच्छ जल के रूप में पीने के लिए किया जाता था। दुश्मनों को झांसा देने के लिए भी इस बावड़ी का प्रयोग किया जाता था। यह बावड़ी पत्थरों एवं ईटों से चारों ओर से पक्का बनाया गया था। सुरंगें भी पक्की बनी हुई हैं। इस बावड़ी की खासियत यह है कि कितनी भी भयंकर गर्मी पड़े आज तक यह बावड़ी सूखी नही है। हर समय इस बावड़ी में पानी रहता है। इस बावड़ी की लंबाई व चौड़ाई लगभग 40-50 मीटर हैं। पुराने जमाने में इस किले में यह एक मात्र जल का स्रोत था जो प्यास बुझाने एवं अन्य तरीकों के प्रयोग में लाया जाता था। किले के पास के गांव के बच्चे अब भी इस बावड़ी में नहाने के लिए आते है।

कुछ बुजुर्ग ग्रामीणों ने बताया कि यह बावड़ी पर्दाफाश व दलदल की स्थिति बनी हुई है। हाल ही में एक बच्चा इस बावड़ी में डूब गया जिससे बड़ी मुश्किल से निकाला गया। किले के चारों कोनों पर चार कुएं बने हुए हैं, जो अब सूख चुके है। ये कुएं किले की दीवार के अंदर इस प्रकार से बने हुए है कि दुश्मनों को इनका पता न चल सके। किले की दीवार के ऊपरी हिस्से से ही सैनिक इन कुओं से पानी खींच लेते थे। वर्तमान में इस बावड़ी की देख-रेख न होने के कारण जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। पुरातत्व विभाग व अन्य संबंधित विभाग को इसकी तनिक भी चिन्ता नहीं है। जिस कारण ये ऐतिहासिक धरोहर नष्ट होने के कगार पर है। क्षेत्रीय ग्रामीण डॉ. अतुल नेगी ने इस क्षेत्र से संबंधित कई तथ्यों को अपने पास संजो कर रखा है और वे लगातार क्षेत्र के पुरातात्विक चीजों में काफी रूचि रखते हैं।
इस तरह तमाम बाते हमने आपको दिखाई जो इतिहास के अतीत को उजागर करती है और आज भी इस किले के माध्यम से सजीव वर्णन दिखाई पड़ता है l