Sunday, 21 April 2019

खामोश वोटर

अभूतपूर्व चुनाव: ख़ामोश वोटरचीख़ते लीडर!

0देश के इतिहास में शायद यह पहला अजीब चुनाव है जिसमें सभी दलों के लीडर जो मन चाहे चीख़ रहे हैं। लेकिन वोटर पहले चरण का चुनाव हो जाने के बाद भी अपने मन की बात बताने को तैयार नहीं है। वोटर की ख़ामोशी देश की राजनीति में आने वाले तूफ़ान का संकेत भी मानी जा सकती है। न ही यह चुनाव मोदी बनाम सब है। क्योंकि दोनों तरफ़ ही गठबंधन है।       

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   11 अपै्रल को पहले चरण का चुनाव 91सीटों पर हो चुका है। देश के इतिहास में शायद यह पहला चुनाव है जिसमें लीडर वोटर की ख़ामोशी को समझ नहीं पा रहे हैं। पहली बार न तो चुनाव में बैनर झंडियां पोस्टर फ्लैक्सी बोर्ड बिल्ले रिक्शे से चुनाव प्रचार दीवारों पर नारे नुक्कड़ सभायें घर घर जनसंपर्क हो रहा है। न ही जनता में इस बात पर कोई सार्थक चर्चा चल रही है कि वोट किसको दिया जाये और क्यों दिया जायेहालांकि बड़े बड़े दल के बड़े नेता ज़िला मुख्यालयों पर रैलियां पूर्व की भांति कर रहे हैं। लेकिन उनके पास कहने को कुछ खास नहीं है।

सबसे बड़ी विडंबना सत्ताधारी भाजपा के साथ देखी जा रही है कि उसने जिन 346 योजनाओं का पूरे पांच साल तक ढोल पीटा अब उनमें से किसी का भी वो नाम लेने को तैयार नहीं है। शायद इसकी वजह यह हो सकती है कि उसने उन स्कीमों पर दावा प्रचार और बयान ही अधिक जारी किये हैं जिससे वे ज़मीन पर नहीं उतर पाईं। ऐसे में विकास के नाम पर कैसे वोट मांगा जायेइसका नतीजा यह हुआ है कि हमारे पीएम पुलवामा बालाकोट और पाकिस्तान के आतंकवाद के नाम पर राष्ट्रवाद सुरक्षा और हिंदू अस्मिता के बहाने एक बार फिर साम्प्रदायिक कार्ड खेलकर हिंदू वोट बैंक को अपने साथ रखना चाहते हैं।

इतना ही नहीं वे अपने पांच साल का हिसाब न देकर अभी भी मुख्य विपक्ष कांग्रेस से 2014की तरह 70 साल का हिसाब मांग रहे हैं। अपनी पैदा की गयी समस्याओं के लिये भी नेहरू को ज़िम्मेदार ठहराकर पीएम पद की गरिमा भी गिरा रहे हैं। चुनाव आयोग है कि गांधी जी के बंदरों की तरह न तो सत्ताधरी नेताओं को अलोकतांत्रिक और धर्म व जाति की राजनीति करने से रोक पा रहा है और न ही विपक्ष की जायज़ शिकायतों को सुन रहा है। उधर विपक्ष भी इस मामले में भाजपा से बहुत पीछे नहीं है। उनकी तरफ से भी ऐसे ऐसे बयान आ रहे हैं जिनसे शिष्टाचार चुनावी आचार संहिता और सभ्यता का पता चलता है।

लेकिन एक अंतर है कि ऐसे मामलों में चुनाव आयोग शिकायत की प्रतीक्षा न करके स्वयं संज्ञान लेकर त्वरित कार्यवाही कर रहा है। सवाल असली यह है कि जनता इतनी चुप क्यों हैहमंे लगता है कि जनता ने अपना मन पहले ही बना लिया है कि उसको किसको वोट देना हैनेता चाहे कुछ दावा करें लेकिन असली मुद्दों पर वे चर्चा करने को तैयार नहीं हैं। ऐसे में जनता का धर्म जाति और क्षेत्र के आधार पर बंटवारा हो चुका है। अगर सरसरी तौर पर देखा जाये तो उच्च जातियों का वोट अधिकांश भाजपा के साथ ध्रुवीकृत हो चुका है।

उधर मुसलमान भाजपा के खिलाफ पहले से ही एक साथ रहा है। इस बार दलितों का भी भाजपा के खिलाफ मूड नज़र आ रहा है। आदिवासियों को भी भाजपा के राज से निराशा और धोखा मिला है। सारा चुनाव एक तरह से पिछड़ी जातियों के बीच सिमट कर रह गया है। इनकी तादाद सबसे अधिक मानी जाती है। ओबीसी का एक हिस्सा यह मानकर भाजपा के साथ जुड़ चुका है कि वही हिंदुओं का भला कर सकती है। दूसरी तरफ पिछड़ोें में ही एक हिस्सा ऐसा महसूस करता है कि भाजपा ने 2014 में उनका वोट तो लिया लेकिन काम अधिक अगड़ों के हित में किया।

भाजपा सरकार पर इस मामले में आरक्षण के रोस्टर में छेड़छाड़ और रिज़र्वेशन को धीरे धीरे ख़त्म करने की गुप्त साज़िश करने का पिछड़ों के एक वर्ग का आरोप रहा है। मोदी सरकार ने वास्तव में कई काम ऐसे किये भी हैं। जिनसे पिछड़ों की इस आशंका को बल मिला है। इसका नतीजा यह हुआ है कि सवर्ण दलित और मुसलमानों का वोट तय हो चुका है कि कहां जाना है। इसलिये कोई भी दल या नेता उसको अपनी ओर खींचने को बड़ा या गंभीर प्रयास नहीं कर रहा है। हालांकि यूपी के सुल्तानपुर में भाजपा प्रत्याशी मेनका गांधी ने मुसलमानों को अपने पक्ष में वोट न करने पर उनका काम न करने की धमकी ज़रूर दी है।

लेकिन मुसलमान जानते हैं कि इस बार वे जीतेंगी ही नहीं। सवाल यह भी है कि अगर मेनका जीत भी जाती हैं तो उनको उन हिंदुओं का काम भी क्यों करना चाहिये जो उनको वोट नहीं देंगेक्योंकि जीतने के बावजूद उनको100 प्रतिशत वोट तो मिलेंगे नहीं। तो क्या वोट न देने वाले मुसलमानों का काम न करके ही अपने मुस्लिम विरोधी होने का प्रमाण देंगी?सवाल तो मोदी सरकार से भी किया जाना चाहिये कि उनको पूर देश में केवल 31 प्रतिशत वोट मिले थे तो उन्होंने बाकी 69 प्रतिशत लोगों का काम क्यों कियाक्या भाजपा को वोट न देने वालों में बड़ी संख्या में हिंदू शामिल नहीं थे?

क्या लोकतंत्र में ऐसा कहीं होता है कि जो जीत गया वो केवल खुद को वोट देने वालों का प्रतिनिधि मानकर काम करेगाइसका मतलब भाजपा का नारा सबका साथ सबका विकास एक धोखा थाउसको यह भी कहना चाहिये था कि जो साथ नहीं देंगे उनको दुश्मन मानकर विकास नहीं उनका विनाश करेंगभारत के इतिहास में पहली बार हमारे पीएम से लेकर मोदी सरकार के मंत्रियों मुख्यमंत्रियों गवर्नर सांसद विधायक और नेताओं ने राजनीति को निचले स्तर तक गिरा दिया है।

यही वजह है कि सभी दलों के नेता चीख़ रहे हैं। चिल्ला रहे हैं। बौखला रहे हैं। भड़का रहे हैं। बहका रहे हैं। धमका रहे हैं। हड़का रहे हैं। ललचा रहे हैं। भटका रहे हैं। टकरा रहे हैं। लड़वा रहे हैं। लेकिन मतदाता पर कोई असर नहीं हो रहा है। जो ज़हर नेता पहले ही बो चुके हैं। उसकी नफ़रत अलगाव टकराव और हिंसा की फ़सल लहलहा रही है। घटिया वोटबैंक की सियासत करने वाले नेता एक बात याद रखें कि यह दौर तो जैसे तैसे नुकसान तबाही और बरबादी के बाद गुज़र ही जायेगा लेकिन उनको इतिहास बहुत बुरे दौर के लिये माफ नहीं करेगा। हम आशा करते हैं कि एक दिन ज़रूर आयेगा जब लोग धर्म जाति क्षेत्र और निजी स्वार्थ से उूपर उठकर तर्क तथ्य और सत्य के आधार पर वास्तविक मुद्दों पर वोट किया करेेंगे।                                       

0 उसके होंठों की तरफ़ ना देख वो क्या कहता है,

   उसके क़दमांे की तरफ़ देख वो कहां जाता है।।                   

साध्वी प्रज्ञा

साध्वी प्रज्ञा: भाजपा का बदलता चेहरा!

0भोपाल से भाजपा ने आतंक की आरोपी साध्वी प्रज्ञा को टिकट देकर अपना मुस्लिम विरोधी चेहरा एक बार फिर खुलकर दिखा दिया है। साध्वी को अपना लोकसभा प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने यह भी साबित कर दिया है कि वह आतंक को केवल इस्लाम से जोड़कर देखती है। संतोष की बात यह है कि खुद हिंदू बड़ी संख्या में भाजपा के इस डरावने फैसले का विरोध कर रहे हैं।        

         

   कहते हैं जंग और मुहब्बत में सब कुछ जायज़ है। लेकिन आज इसमें एक तीसरी चीज़ सियासत भी जुड़ गयी है। पहले कांग्रेस पर यह आरोप लगता था कि वह चुनाव जीतने सत्ता हासिल करने और उसको बनाये रखने के लिये साम दाम दंड भेद का ढके छिपे तरीकों से इस्तेमाल करती है। लेकिन जब उसकी ये हरकतें मीडिया या न्यायपालिका तक पहुंच जाती थी तो वह आलोचना निंदा और कार्यवाही के डर से अपने ऐसे फैसलों को कई बार क़दम खींचकर वापस भी ले लेती थी। उसमें थोड़ी बहुत शर्म नैतिकता और लोकतंत्र बचा हुआ था।

   लेकिन 2014 के बाद जब से मोदी पीएम बने और तीन दशक बाद किसी एक पार्टी को अपने दम पर केंद्र में सत्ता में आने को पूर्ण बहुमत मिला। तब से सत्ताधरी दल ने नैतिकता मानवता और निष्पक्षता को पूरी तरह ताक पर रख दिया है। तमाम लोकतांत्रिक मूल्यों को पूरी बेशर्मी से चुनचुनकर ख़त्म किया जा रहा है। नियम कानून और लोकलाज की तो बात ही क्या है। हालत इतनी ख़राब है कि चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट की लताड़ का भी मोदी सरकार पर कई बार असर नज़र नहीं आता है। साध्वी प्रज्ञा पर एक नहीं कई आतंकी घटनाओं के आरोप हैं।

   उन पर कई मामलों मंे चार्जशीट भी दाखि़ल हो चुकी है। खुद सरकारी वकील यह आरोप लगाकर अपने पद से इस्तीफा दे चुकी है कि उनपर मोदी सरकार प्रज्ञा के मामले में केस की पैरवी ठीक से न करने का बेजा दबाव बना रही थी। साध्वी के खिलाफ आतंकी घटना में शामिल होने के सबूत इतने ठोस और मज़बूत हैं कि खुद एनआईए अदालत के जज इस पर नाराज़गी और दुख जता चुके हैं कि साध्वी के खिलाफ सरकार ठीक से पैरवी नहीं कर रही है। दरअसल सच यह है कि साध्वी के तार कहीं न कहीं संघ परिवार से जुड़े पाये गये थे।

   जिससे मोदी सरकार की मजबूरी हो गयी कि वह चाहे जो करे साध्वी को आतंक के इस मामले से क्लीन चिट दिलाये। हालांकि साध्वी अभी स्वास्थ्य कारणों से ज़मानत पर है। लेकिन उसको भाजपा ने भोपाल से चुनाव मंे उतारकर अपना मुस्लिम पूर्वाग्रह और मानवता विरोधी चेहरा एक बार फिर से दिखा दिया है। साध्वी ने बेशर्मी से शहीद एटीएस प्रमुख हेमंत करकरे पर कीचड़ उछाली है। लेकिन बात बात पर पुलिस सेना और शहीदों की दुहाई देकर उनके नाम पर वोट मांगने वाली भाजपा साध्वी की इस संविधान विरोधी देशद्रोही और अपरााधिक हरकत पर चुप्पी साध गयी है।

    हालांकि पीएम मोदी अकसर ऐसा करते रहे हैं। लेकिन इस मामले से भाजपा ने राजनीति का पूरा नैरेटिव बदल कर रख दिया है। इस बार चुनाव में उसने बाबरी मस्जिद शहीद करने के आरोपी आडवाणी जोशी और उमा भारती को किनारे कर मुस्लिम विरोधी आतंकी हत्या की आरोपी साध्वी को अपना टिकट थमाकर यह संदेश दिया है कि वह मुस्लिम विरोधी और हिंदू साम्प्रदायिकता की सियासत में किसी सीमा तक भी जा सकती है। सोचने की बात है कि अगर कोई मुस्लिम आतंक के आरोप में पुलिस द्वारा पकड़ा जाता है तो भाजपा उसको पहले दिन से ही आतंकी बताती है।

    हालत यह है कि जब कोई बेकसूर मुस्लिम आतंक के आरोप से 10 से 20 साल बाद बरी भी हो जाता है तो भाजपा उसको आतंकी बताने से बाज़ नहीं आती । यहां तक कि उसको भाजपा की सरकारें इतने लंबे समय तक बिना अपराध जेल में रखने और उसके परिवार के तबाह और बर्बाद होने पर माफी तो दूर मुआवज़ा तक नहीं देती। एक समय था जब भाजपा कहती थी कि यह ठीक है कि सारे मुसलमान आतंकी नहीं हैं। लेकिन यह भी सच है कि जो भी आतंक के आरोप में पकड़े जाते हैं।

    वे सब मुसलमान ही होते हैं। जबकि इसकी वजह यह थी कि भाजपा सरकारें या उसकी सोच के अधिकारी मुस्लिम विरोधी होने की वजह से वाह वाह लूटने और संघ के एक सोचे समझे मिशन के तौर पर जानबूझकर अधिकांश निर्दोष मुसलमानों को आतंक के फर्जी आरोपों में जेल भेजते रहे हैं। अब भाजपा खुलेआम बेशर्मी से यह दावा कर रही है कि केवल मुसलमान ही आतंकी हो सकते हैं। उनका यह दावा भी है कि हिंदू कभी भी कहीं भी किसी हाल में आतंकी हो ही नहीं सकता। जबकि इतिहास गवाह है कि अनेक हिंदू आतंकवाद के आरोप में देश में न केवल पकड़े गये हैं।

    बल्कि कोर्ट में आरोप साबित होने पर उनको सज़ा भी दी गयी है। लिट्टे दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी संगठन रहा है। उसने हमारे पूर्व पीएम राजीव गांधी की जान भी ली थी। सिखों का खालिस्तान के लिये आतंक का लंबा दौर रहा है। माओवादी जिस तरह से आयेदिन सुरक्षा बलों पर हमले कर 78 सीआरपीएफ वालों की एक झटके में जान ले लेते हैं। उनमें भी लगभग सभी हिंदू ही शामिल हैं। पूर्व उत्तर में जहां जहां अलगाववाद और हिंसा की घटनायेें चलती रहती हैं। उनमें बड़ा हिस्सा हिंदुओं का भी शामिल रहा है। हालत तो यह है कि अगर निष्पक्ष जांच हो जाये तो संघ परिवार के भी कई लोग आतंक के आरोपों में दोषी साबित हो सकते हैं।

    इतिहास याद करें तो देश का सबसे पहला आतंकी नाथूराम गोडसे खुद संघ परिवार की विचारधारा से जुड़ा था। हालांकि गोडसे संघ के किसी पद पर नहीं था लेकिन उसने जिन कारणों से महात्मा गांधी को मारा वे कारण संघ की सोच से मेल खाते थे। हम यह नहीं दावा कर सकते कि मुस्लिम या हिंदू यानी किसी खास मज़हब के लोग ही आतंकी होते हैं। लेकिन यह भी नहीं मान सकते कि केवल मुस्लिम ही आतंकी होते हैं।                                            

0 राज़ शीशे से कभी पूछना तन्हाई में,

  कितना नुकसान है पत्थर से शनासाई में।।                   

Tuesday, 9 April 2019

गुरुग्राम और घोटकी

गुरूग्राम-घोटकीः रोग की जड़ पहचानिये!

0होली पर हरियाणा के गुरूग्राम में एक मुस्लिम परिवार पर कुछ बहुसंख्यकों ने हमला किया। उध्र होली की पूर्व संध््या पर पाकिस्तान के सिंध् प्रांत के घोटकी क्षेत्रा में दो नाबालिग हिंदू लड़कियों का वहां के चार बहुसंख्यकों ने अपहरण कर उनको जबरन मुसलमान बनाकर उनसे निकाह कर लिया। दोनों ही घटनाओं पर कापफी हंगामा मचा लेकिन बाद में सरकारों ने लीपापोती कर अगली घटना होने तक मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया।       

       

   गुरूग्राम में होली के दिन कुछ मुस्लिम बच्चे अपने घर के पास के मैदान में क्रिकेट खेल रहे थे। तभी वहां से कुछ हिंदू युवक गुज़रे और उन बच्चो से कहा कि क्रिकेट खेलना है तो पाकिस्तान जाओ। दोनों पक्षों में कुछ नोकझोंक हुयी और बीचबचाव कराने आये मुस्लिम बच्चो के परिवार के मुखिया को होली खेल रहे युवकों ने पीट दिया। इसके बाद मुस्लिम बच्चे अपने घर चले गये। हिंदू युवकों का गुस्सा इतने से भी शांत नहीं हुआ। वे थोड़ी देर बाद ही लगभग दो दर्जन लड़कों को हॉकी लोहे की रॉड और लाठियों से लैस करके मुस्लिम परिवार के घर में घुसे और परिवार के मुखिया को चारों तरपफ से घेरकर जमकर पीटा।

पीड़ित को बचाने जब परिवार के अन्य सदस्य यहां तक कि महिलायें आगे आईं तो उनको भी पीटा गया। हद तो तब हो गयी जब डरकर पलंग के नीचे छिप गये चार साल के छोटे बच्चे को रोने की आवाज़ सुनकर तलाश कर पीटा गया। इतना ही नहीं हमलावरों के सर पर नपफ़रत और हिंसा का ऐसा भूत सवार था कि उन्होंने एक साल के गोद के बच्चे को भी एक महिला की गोद से छीनकर पटख़ दिया। महिलाओं को गंदी गालियां दीं और घर में तोड़पफोड़ के साथ ही जेवर और नकदी भी लूट ली गयी। हालांकि बाद में इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने से सरकार ने मजबूरन रिपोर्ट दर्ज कर एक आरोपी को पकड़कर जेल भेज दिया।

    लेकिन सबसे अपफसोस की बात यह रही कि संघ भाजपा और सरकार के किसी मंत्राी सांसद या विधयक ने इस घटना की निंदा तक नहीं की। यहां तक कि छोटी छोटी बातों पर ट्वीट करने वाले हमारे प्रधन सेवक और अमीरों के चौकीदार पीएम मोदी जी ने भी इस दुखद घटना पर एक शब्द नहीं बोला। उध्र पाकिस्तान में होली से एक दिन पहले जिन दो हिंदू नाबालिग बहनों का अपहरण करके उनसे जबरन र्ध्मपरिवर्तन कराकर निकाह किया गया। उनके मामले में वहां की पुलिस ने तब तक रपट तक दर्ज नहीं की। जब तक कि हमारी विदेश मंत्राी ने इस मामले को ट्विटर पर उठाकर पाक स्थित भारतीय दूतावास से इस मामले की रपट तलब नहीं की।

हालांकि इस सारे वाद विवाद में ट्विटर पर ही उनकी पाक के सूचना मंत्राी चौध्री पफवाद हुसैन से नोकझोंक भी हुयी। चौध्री का दावा था कि यह उनका अंदरूनी मामला है। लेकिन वे भूल गये कि कश्मीर भारत का भी अंदरूनी मामला है। जिसमें पाक 70 साल से टांग अड़ा रहा है। यह हालत तब है जबकि पाक की टांग भारत चार बार तोड़ भी चुका है। इसके साथ ही चौध्री ने सुषमा स्वराज पर यह कहकर भी व्यंग्य कसा कि यह मोदी का भारत नहीं है। जहां आपकी पार्टी मुसलमान विरोध्ी सियासत पर जिं़दा है। हालांकि यह बात किसी हद तक ठीक भी है।

लेकिन सच यह भी है कि पाक में अल्पसंख्यक हिंदुओं की हालत भारत के मुसलमानों से कई गुना बदतर है। उनकी आबादी भी इसीलिये दिन ब दिन कम होती जा रही है। भारत में मुसलमानों का अपहरण और उनका र्ध्म परिवर्तन व मुस्लिम लड़कियों को हिंदू बनाकर जबरन शादी कर लेने का एक मामला भी 36 साल की पत्राकारिता में हमारे सामने नहीं आया। अगर समस्या को गहराई से देखा जाये तो भारत पाक ही नहीं दुनिया और खासतौर पर एशिया के अध्किांश मुल्कों में अल्पसंख्यकों के साथ चाहे उनका र्ध्म कुछ भी होलगातार पक्षपात हमले और अन्याय के मामले अकसर सामने आते रहे हैं।

इसका मतलब यह है कि जो जहां कमजोर और असहाय है। उसको सताया और मारा ही जाता है। हमें ये सोच बदलनी होगी कि अगर हम शक्तिशाली हैंकिसी देश में बहुसंख्यक हैंया हम सत्ता में हैं। तो कमज़ोर गरीब और अल्पसंख्यक के साथ कुछ भी करने का हमें लाइसेंस मिल जाता है। कम से कम हमारी भारतीय सभ्यता और संस्कृति और मुसलमानों का इस्लाम तो इसकी बिल्कुल इजाज़त ही नहीं देता है। हम सबको मानवीय निष्पक्ष और सेकुलर होकर गुरूग्राम और घोटकी की घटना को देखना चाहिये। दरअसल ये दोनों घटनायें रोग नहीं हैं।

रोग का लक्ष्ण मात्रा हैं। हमें असली रोग की जड़ में जाकर उसकी वजह को पहचानना होगा। नहीं तो कुछ दिन बाद हमारे सामने नया गुरूग्राम और घोटकी का हादसा होगा। एक बार पिफर हम नयी घटना होने तक सरकार पुलिस और कोर्ट से न्याय की उम्मीद कर रहे होंगे जबकि इसकी जड़ें हमारे अंदर नपफरत अन्याय स्वार्थ और पक्षपात के रूप पफलपफूल रही हैं। ज़ाहिर है आज नहीं तो कल इसका इलाज जड़ से करना होगा। नहीं तो दोनों पक्ष घटनाओं की गिनती ही गिनते रहेंगे।                                         

0 उसी का शहर वही मुद्दई वही मुंसिपफ़,

 हमें यक़ीन था हमारा क़सूर निकलेगा।।                

राहुल से भयभीत भाजपा?

राहुल गांधी से क्यों डरती है भाजपा ?

0भाजपा ने लंबे समय तक राहुल गांधी को पप्पू कहकर चिढ़ाया। उसने नेहरू का भी चरित्रहनन किया। कांग्रेस के लंबे राज को मुल्क का दुर्भाग्य बताया। लेकिन राहुल गांधी ने इसकी परवाह न कर अपना संघर्ष जारी रखा। आज जब राहुल मोदी के विकल्प के रूप में स्थापित होने लगे तो भाजपा ने उन पर पर्सनल हमले शुरू कर दिये हैं। कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बताकर अब राहुल के हिंदू होने पर ही सवाल उठाया जा रहा है।      

       

   13 मार्च के एक अंग्रजी अख़बार की ख़बर के अनुसार केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने राहुल गांधी पर आरोप लगाया कि वे मोदी सरकार द्वारा पाकिस्तान में किये गये एयर स्ट्राइक पर सवाल उठाते हैं। हेगड़े ने कहा कि राहुल का हिंदू होना खुद सवालों के घेरे मंे है। हेगड़े का कहना है कि क्या राहुल गांधी के पास इस बात का कोई सबूत है कि वे मुस्लिम पिता के पुत्र होकर कैसे हिंदू ब्रहम्ण होने का दावा करते हैं?हेगड़े का यह भी दावा है कि राहुल के पिता एक मुस्लिम और उनकी माता एक ईसाई हैं। हेगड़े का दावा है कि राजीव गांधी के पिता फिरोज़ गांधी एक मुस्लिम थे।

इसलिये राजीव गांधी और राहुल गांधी मुस्लिम हैं। उनको पता होना चाहिये कि फ़िरोज़ गांधी नाम से मुस्लिम लगते थे लेकिन वह एक पारसी थे। दूसरी बात कोई भी इंसान जन्म से नहीं अपने विश्वास और कर्म से हिंदू मुस्लिम या किसी अन्य धर्म का अनुयायी होता है। राजीव गांधी सोनिया गांधी राहुल गांधी और प्रियंका गांधी सभी अपनी आस्था और धार्मिक कर्मकांड के अनुसार हिंदू रहे हैं। दरअसल सवाल यह नहीं है कि राहुल का धर्म वास्तव में है क्याभाजपा उनकी पार्टी कांग्रेस को लंबे समय से मुस्लिम पार्टी होने का दुष्प्रचार कर रही थी।

कांग्रेस ने इस आरोप की काट के लिये राहुल को मंदिर मंदिर घुमाना जनेऊ धारी हिंदू और शिवभक्त होना प्रचारित करना शुरू कर दिया था। इसके साथ ही कांग्रेस ने गुजरात से लेकर राजस्थान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में अपने घोषणा पत्र में गाय गोशाला संस्कृत पवित्र नदियां रामवनगमनपथ से लेकर गोमूत्र और गोबर को लेकर ऐसे ऐसे वादे कर डाले कि भाजपा से हिंदू पार्टी होने का तमग़ा छीनने की पूरी तैयारी कर दी। इतना ही नहीं वंदे मातरम गाने से लेकर गोहत्या पर आरोपी मुसलमानों पर भाजपा की तरह कांग्रेस सरकार ने एमपी में रासुका लगाकर हिंदुओं को यह संदेश दिया कि वे भाजपा से कम हिंदू भावनाओं का सम्मान नहीं करते हैं।

इसके साथ ही कांग्रेस ने अपने माथे से मुस्लिम पार्टी होने का लेवल हटाने के लिये न केवल चुनाव में कम से कम मुस्लिम प्रत्याशियों को टिकट दिये बल्कि अपने मेनिफेस्टो से सच्चर कमैटी मदरसे और उर्दू को बढ़ावा देने वाली मुस्लिम समर्थक घोषणायें भी हटा दीं। हालांकि कांग्रेस ने यह सब सोची समझी रण्नीति के तहत उन ही राज्यों में किया जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा जैसी कट्टर हिंदूवादी पार्टी से था। इसका सुखद परिणाम भी कांग्रेस को हाथो हाथ गुजरात से लेकर हाल ही में हुए तीन राज्यों के चुनाव में भाजपा से हिंदू वोट बैंक छीनने में मिली कामयाबी में देखने को मिला।

कांग्रेस जानती है कि ऐसा करने से जहां उससे दूर छिटकता हिंदू वोट तेज़ी से उसकी ओर वापस आ रहा है। वहीं विकल्प न होेने की मजबूरी में भाजपा हटाओ का एकसूत्रीय एजेंडा लेकर चलने वाला मुस्लिम वोट भी उसके साथ बना हुआ है। इतना ही नहीं कांग्रेस अब सरकार बनने के बाद भी काम करने से लेकर अपनी हिंदू योजनाओं को ज़मीन पर उतारने से लेकर प्रतीकात्मक हिंदू पहचान को भाजपा से राजनीतिक ज़मीन वापस छीनने के लिये बहुत सोच समझकर बयान दे रही है। कांग्रेस की इस सफल रण्नीति से भाजपा और संघ परिवार के हाथों से तोते उड़ गये हैं।

इतना ही नहीं राफेल विमान ख़रीद घोटाले में चौकीदार ही चोर है का नारा देकर राहुल गांधी ने मोदी सरकार को बचाव की मुद्रा में आने को मजबूर कर दिया है। किसान और बेरोज़गारी के मुद्दों से लेकर कालाधन व नोटबंदी जीएसटी पर भी राहुल मोदी सरकार को घेरने में पूरी तरह कामयाब नज़र आ रहे हैं। ऐसे में भाजपा को थोड़ा बहुत सहारा चुनाव प्रचार में पाकिस्तान में एयर स्ट्राइक से मिलता लग रहा था। इस पर भी राहुल ने जब सवाल उठाये तो भाजपा को एक बार फिर से चुनाव में खुद के बैकफुट पर जाने का ख़तरा मंडराता नज़र आने लगा।

ऐसे में भाजपा ने बालाकोट स्ट्राइक पर तथ्य और प्रमाण देने की बजाये उल्टे राहुल के हिंदू व ब्रहम्ण होने के सबूत मांगकर अपनी घटिया सियासत चुनावी हार के डर और मानसिक बौखलाहट का ही परिचय दिया है। पुलवामा में आतंकी हमले में हमारे 40 से अधिक सुरक्षाकर्मियों के शहीद होने से मोदी सरकार पहले से ही खुफिया चूक लापरवाही और असंवेदनशीलता के आरोपों से घिरी है। भाजपा से पूछा जाना चाहिये कि हमारा संविधान मतदान से लेकर पीएम बनने तक सब नागरिकों को बिना जाति धर्म और क्षेत्र की बाधा के जब समान अधिकार देता है तो राहुल से उनका धर्म और जाति जानने या प्रमाण मांगने का क्या मतलब रह जाता हैमोदी भाजपा और संघ को यह शेर हमेशा याद रखना चाहिये।                                     

0 तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहां तख़्तनशीं था,

  उसको भी अपने खुदा होने पे इतना ही यक़ीं था।।