Tuesday, 20 February 2018

प्यार बनाम नफ़रत

आखि़र प्यार से हार ही गयी नफ़रत!

0इस बार 14 फ़रवरी को एक खास बात हुयी। वैलंेटाइन डे का हर बार विरोध करने वाले विश्व हिंदू परिषद के इंटरनेशनल प्रेसीडेंट प्रवीण तोगड़िया ने ऐलान किया कि वे इस बार प्यार के दिन का विरोध नहीं करेंगे। उनका कहना था कि प्यार करने का हर युवक युवती को पूरा अधिकार है।       

       

   तोगड़िया ने कहा कि युवक युवतियां प्रेम नहीं करेंगे तो शादी नहीं होगी और जब शादी ही नहीं होगी तो सृष्टि कैसे चलेगी? उनका कहना है कि युवक युवतियों को प्रेम करने का पूरा अधिकार है। यह उनको मिलना ही चाहिये। हमारी बेटी और हमारी बहन को भी प्यार करने का अधिकार है। यह हैरतनाक है। आपको याद होगा पहले हर साल इस दिन विहिप बजरंग दल और विद्यार्थी परिषद के उग्र तत्व प्रेमी जोड़ों को पार्कों होटलों और सार्वजनिक स्थानों पर दौड़ा दौड़ा कर पीटा करते थे। वे प्रेमी प्रेमिकाओें को पकड़कर जबरदस्ती भाई बहन भी मनवाया करते थे।

पुलिस ऐसे मामलों में अव्वल तो खुद ऐसे प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा उपलब्ध नहीं कराती थी। अगर कोई उनसे संघ परिवार के इस उग्र तत्वों के काले कारनामों की शिकायत भी करता तो पुलिस ऐसे पेश आती थी। जैसे उसको प्रेमी प्रेमिका को नहीं उनका विरोध कर रहे हिंसक तत्वों के बचाव के लिये नियुक्त किया गया हो। कई बार जब मीडिया और प्रगतिशील लोगों ने पुलिस प्रशासन और सरकार की इन कथित भारतीय संस्कृति के ठेकेदारोें की कड़ी निंदा की तो पुलिस को इन मामलों में कार्यवाही करने को मजबूर होना पड़ा। बाद में ऐसे मामले जब कोर्ट में पहुंचे तो वहां भी पुलिस प्रशासन को जमकर डाट लगाई गयी।

इसके बाद सरकार बार बार किरकिरी होने से ऐसे मामलों में सक्रिय होनी शुरू हुयी। इसके साथ देश में बढ़ती बे रोज़गारी से युवाओं में वर्तमान सरकार के प्रति लगातार रोष बढ़ रहा है। खुद तोगड़िया का संघ परिवार में विवाद चल रहा है। उनको उनके पद से हटाने की तैयारी चल रही है। लेकिन वे अभी अपना पद किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। उनका सरकार के वर्तमान मुखिया से वैचारिक मतभेद है। उन्होंने पिछले दिनों अपने फर्जी एनकाउंटर तक की आशंका व्यक्त की थी। ऐसे में तोगड़िया को लगता होगा कि उनको अगर युवाओं का दिल जीतना है तो उनको 14फ़रवरी को प्यार करने से नहीं रोकना चाहिये।

इतना ही नहीं इस बार हर बार की तरह संघ परिवार के अन्य घटक भी उतनी उग्रता और हिंसक तरीके से वैलेंटाइन डे का विरोध नहीं कर पाये जितना तीखा विरोध वे 14 फ़रवरी का किया करते थे। इसका एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि देर से ही सही संघ परिवार और तोगड़िया को यह बात धीरे धीरे समझ आने लगी है कि आज के युवाओं को वे न तो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की दुहाई देकर और न ही डरा धमकाकर हिंसक तरीके से प्यार करना छोड़ने को तैयार कर पायेेंग।

इसके विपरीत आज की युवा पीढ़ी धीरे धीरे यह समझती जा रही है कि संघ और भाजपा सरकारें उनको रोज़गार शिक्षा स्वास्थ्य और व्यक्तिगत आज़ादी देने की बजाये झूठे इतिहास में उलझाकर अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिये मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। यही वजह है कि हाल ही मंे कई विश्वविद्यालयों के छात्र संगठनों के चुनाव में संघ की विद्यार्थी परिषद से छात्र छात्राओं का मोहभंग होता नज़र आने लगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि संघ परिवार को यह अहसास होने लगा है कि आज का युवा उसके झांसे में अधिक दिन तक नहीं रह पायेगा। यह एक तरह से नफ़रत पर प्रेम की जीत है।                           

0 लहजे के बाद अब वो बदलता निगाह भी,

  रस्ता बदल के हमने उसे हैरान कर दिया ।।

Thursday, 15 February 2018

भागवत जी बताएं

भागवत जी से पूछा जाना चाहिए !

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत जी ने कहा है कि सेना को जंग के लिये तैयार होने में 6 माह लग जाते हैं। जबकि उनके स्वयंसेवक मात्र तीन दिन में इस काम के लिये तैयार हो सकते हैं। लेकिन भागवत जी से पूछा जाना चाहिये कि उनके स्वयंसेवकों ने आज तक कौन सी जंग लड़ी है? जबकि हमारी सेना ने तो कई जंग लड़ी और जीती हैं।

आरएसएस खुद को सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करता है। लेकिन सबको पता है कि हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और होते हैं। संघ एक साम्प्रदायिक संगठन है। यह बात उसके न मानने के बावजूद किसी से छिपी नहीं है। संघ का राजनीतिक मुखौटा भाजपा है। एक तरह से देखा जाये तो आज संघ ही सत्ता मंे है। मोदी जी एक दिखावटी प्रधनमंत्री हैं। अटल बिहारी वाजपेयी तो एनडीए सरकार का पीएम रहते संघ की कई बातों को टाल भी देते थे। लेकिन मोदी जी संघ के अनुशासित स्वयंसेवक हैं। जिस तरह से सत्ताधारी दल सरकार में रहने पर कभी कभी मनमाहनी और तानाशाही पर उतर आता है।

उसी तरह अप्रत्यक्ष रूप से आज केंद्र और देश के आध्ेा से अधिक राज्यों में संघ या उसके घटक दलों की सरकार होने से संघ अहंकार का शिकार होकर खुद को कानून से बाहर समझने लगा है। यह बात किसी हद तक सही भी साबित होती नज़र आ रही है। सेना की तैयारी को लेकर जो बयान भागवत जी ने दिया है। अगर ठीक ऐसा ही बयान किसी विपक्षी दल के नेता या दलित व अल्पसंख्यक नेता ने दिया होता तो संघ परिवार न केवल अब तक आसमान सर पर उठा लेता बल्कि उसपर सेना का मनोबल गिराने के आरोप में पुलिस केस भी दर्ज कर चुकी होती।

इससे पहले भागवत संविधान और आरक्षण को लेकर भी विवादित बयान दे चुके हैं। लेकिन चंूकि वे सत्ता मेें हैं तो उनको सात खून माफ हैं। खुद देशभक्त होने और दूसरों की देशभक्ति को चैक करने का ठेका लेने वाला संघ एक बार सभी भारतवासियों को हिंदू भी घोषित कर चुका है। जबकि हिंदुओं का ही बड़ा वर्ग उनकी इस बात से सहमत नहीं हुआ है। हम सब भारतीय या हिंदुस्तानी तो हो सकते हैं। सब हिंदू कैसे बताये जा सकते हैं? मुसलमान सिख ईसाई जैन पारसी यहूदी और अन्य अनेक धर्मों को मानने वाले खुद को किसी कीमत पर हिंदू मानने को तैयार नहीं हैं।

ऐसे ही एक बार भागवत जी ने यह ऐलान कर दिया कि अयोध्या के विवादित मंदिर मस्जिद स्थान पर राम मंदिर ही बनेगा चाहे कोर्ट का फैसला किसी के भी पक्ष में आये। इसका मतलब उनका कानून कोर्ट और संविधान में ही विश्वास नहीं है। इससे पहले संघ अपने नागपुर मुख्यालय पर 50 साल से अधिक समय तक भारतीय तिरंगा भी नहीं फहराता था। संघ पर देश के आज़ादी के आंदोलन में अंग्रेज़ों का साथ देकर स्वतंत्रता सेनानियों को धोखा देने के आरोप भी लगते रहे हैं। संघ की विचारधारा से ही प्रभावित एक उग्र युवा नाथूराम गोडसे पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या का आरोप लगा था।

इसी वजह से संघ पर कई साल तक प्रतिबंध भी लगा था। बाद मंे उसने लिखित माफीनामा देकर सरकार से यह वादा किया था कि वह कभी भी राजनीतिक गतिविधि नहीं करेगा। लेकिन बाद में उसने पहले जनसंघ और फिर भाजपा बनाकर बैक गेट से सियासत शुरू कर दी। आज जब उसके नियंत्रण में चल रही मोदी और राज्यों की अन्य भाजपा सरकारें हर मोर्चे पर नाकाम है तो वे ऐसे बयान देते हैं।

कुर्सी ही तो है, तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है,

कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते।

मंदिर मस्जिद

मंदिर मस्जिद विवादः समझौता मानेगा कौन ?

0बाबरी मस्जिद राम मंदिर विवाद सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। इसके साथ साथ कुछ समझदार ज़िम्मेदार और सुलझे हुए लोग इस विवाद को आपसी बातचीत से निबटाने की भी कोशिश करते रहे हैं लेकिन मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सीनियर संस्थापक सदस्य मौलाना सलमान नदवी को जिस तरह सुलह सफाई की इस कोशिश में शामिल होने पर बोर्ड से निकाला गया वह कट्टरता और संकीर्णता को ही दर्शाता है।

आर्ट ऑफ़ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर आजकल रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद आपसी बातचीत से अदालत से बाहर निबटाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने एक बार पहले भी ऐसा प्रयास शांति और सद्भाव के लिये शुरू किया था। लेकिन दोनों पक्षों का सहयोग न मिलने से उनको आशातीत सफलता नहीं मिल सकी थी। इस बार उन्होंने फिर से यह कोशिश शुरू की है। उनका मानना है कि कोर्ट का फैसला किसी एक पक्ष में जायेगा जिससे दूसरा पक्ष या तो उसको मानने से मना करेगा या  फिर अंदर ही अंदर नाराज़ रहेगा। हारने वाले पक्ष को लगेगा उसके साथ न्याय हुआ।

ऐसे में देर सवेर इस मुद्दे पर टकराव बना रहेगा। श्री श्री को लगता है कि किसी एक पक्ष को इस अपमान और दुखी होने से बचाने के लिये आपसी बातचीत के ज़रिये कोई बीच का सम्मानजनक समझौते का रास्ता बातचीत से निकाला जाना चाहिये। हमें नहीं लगता इसमें श्री श्री का कोई निजी स्वार्थ या आकांक्षा हो सकती है। इस बार उनके साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक वरिष्ठ सदस्य मौलाना सलमान नदवी खुलकर खड़े हो गये।

मौलाना ने एक प्रस्ताव उनके सामने रखा कि अगर मुसलमान हिंदू भाइयों की भावना आस्था और परस्पर सौहार्द का सम्मान करते हुए बाबरी मस्जिद को कथित रामजन्म भूमि से हटाकर कहीं और बनाने को तैयार हो जाते हैं तो क्या हिंदू भाई इस बात की गारंटी देंगे कि वे भविष्य में किसी और मस्जिद पर इस तरह का विवाद नहीं करेंगे। मौलाना सलमान का यह सवाल भी था कि इसके बदले में खुद हिंदू भाई जो आलीशान मस्जिद तैयार कराकर देंगे उसमें मुसलमानों को बे रोकटोक आने जाने नमाज़ पढ़ने और घूमने की पूरी आज़ादी मिलेगी?

मौलाना की यह मांग भी थी कि अगर मुसलमान शांति एकता और आपसी भाईचारे के लिये इतनी बड़ी कुरबानी देते हैं तो क्या सरकार उनको मॉडर्न एजुकेशन के लिये एक नई यूनिवर्सिटी अलीगढ़ और रामपुर की तरह बनाकर दे सकती है? उनका यह भी कहना है कि बाबरी मस्जिद के केवल उस हिस्से से दावा छोड़ने पर जिसको हिंदू भाई अपने भगवान राम की जन्मभूमि मानते हैं क्या भविष्य में मुसलमानों के साथ समय समय पर होने वाले पक्षपात और अन्याय को ख़त्म कर बराबरी का सलूक और शोषण से मुक्ति का रास्ता खोल सकता है?

अभी मौलाना नदवी ने इस मुद्दे पर सवाल जवाब और चर्चा शुरू ही की थी कि बोर्ड ने उनको बोर्ड से अलग राय रखने पर अनुशासनहीनता के आरोप में निकाल दिया है। यह बोर्ड का कट्टर संकीर्ण और जल्दबाज़ी में उठाया गया क़दम ही माना जायेगा। बोर्ड यह नहीं समझ पा रहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट का फैसला बाबरी मस्जिद के पक्ष में आ भी जाता है तो आज ऐसे हालात बन गये हैं कि उस पर अमल कराने के लिये सरकार तैयार नहीं होगी। दूसरी बात शाहबानो के फैसले की तरह भाजपा सरकार कोर्ट के फैसले को संसद में पलटने के लिये कानून बना सकती है।

अपै्रल में भाजपा का राज्यसभा में भी बहुमत होने जा रहा है। जिससे मोदी सरकार को हिंदुओं को खुश करने का एक सुनहरा मौका नज़र आ रहा है। उसको पता है कि वह अपने वादे विकास रोज़गार करप्शन और कालेधन यानी लगभग सभी मुद्दों पर नाकाम है। ऐसे में उसके पास एक ही रास्ता बचता है कि वह मंदिर के पक्ष में कोर्ट का निर्णय न आने पर भी कानून बनाकर अपना हिंदू वोट बैंक मज़बूत कर 2019 का आम चुनाव जीत ले। जबकि कम लोगों को पता है कि समझौता कुछ लोगों के विवाद में हो सकता है। जिस मंदिर मस्जिद विवाद में लगभग पूरा मुल्क ही दो हिस्सों बंट गया हो वहां कोई न कोई असहमत होकर कोर्ट का फैसला ही चाहेगा।

ज़ख़्म भर जाते मगर उफ़ ये खुरचने वाले,

रोज़ आ जाते हैं दिखलाइये अब कैसे हैं ।।

Tuesday, 13 February 2018

जय श्री राम

सबको बोलना होगा जय श्रीराम ?

0राजस्थान से पहले कई ख़बरें गोभक्तों द्वारा कई मुसलमानों को गो तस्करी के झूठे आरोप में पीट पीटकर मारने की आईं। अब सिरोही क्षेत्र के आबू रोड पर एक बुज़ुर्ग को पीट पीटकर उससे जबरन जय श्रीराम कहलवाने का वीडियो सोशल नेटवर्किंग पर वायरल हो रहा है। पता नहीं ऐसे कट्टर लोगों को यह बात कब समझ आयेगी कि इस तरह आप किसी से कुछ भी ज़बरदस्ती नहीं करा सकते।

तीन मिनट के इस वीडियो में 18 साल का विनय मीणा 45 साल के एक बुज़ुर्ग सलीम को पीट पीटकर जय श्रीराम कहने के लिये मजबूर कर रहा है। विनय तीन मिनट में इस आदमी को 25 थप्पड़ मारता दिखाई दे रहा है। सलीम विनय को यह कहकर समझाने की कोशिश कर रहा है कि परवरदिगार सबसे बड़ा है। लेकिन विनय के सर पर तो मानो खून सवार है। वह सलीम को जबरन जय श्रीराम का नारा लगाने को कह रहा है। हालांकि इस वीडियो की शिकायत जब आसपास के लोगों ने सिटी थाने में की तो पुलिस ने तत्काल गंभीर धाराओं में रपट दर्ज कर विनय को पकड़कर जेल भेज दिया।

एसपी ओमप्रकाश ने यह भी बताया कि यह साम्प्रदायिक सौहार्द के लिये गंभीर मामला था। इसलिये इस केस में मारपीट की धाराओं केे साथ दो समुदायों में दुश्मनी बढ़ाने, धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने और शांति भंग की धारायें भी लगाई गयीं हैं। कानून के हिसाब से देखा जाये तो इस मामले में पुलिस ने ख़बर मिलते ही अपना काम अंजाम दे दिया है। लेकिन सवाल यह है कि इस तरह के मामले एकाएक बढ़ क्यों रहे हैं? इससे पहले इसी राज्य के राजसमंद में 6 दिसंबर को अफराजुल नाम के बंगाली मज़दूर को शंभूलाल रैगर ने झूठा लव जेहाद का आरोप लगाकर बेदर्दी से मौत के घाट उतार दिया था।

जबकि उसका अपनी अपनी मुंह बोली बहन से ही नाजायज़ सम्बंध था जिसमें अफराजुल आड़े आ रहा था। यह पुलिस की जांच में सामने आई है। राजस्थान के ही अलवर में दूध की डेरी चलाने वाले पहलू खान को कुछ कथित गो रक्षकों ने पीट पीटकर मार डाला था। जबकि वह रसीद के साथ गाय खरीदकर ला रहा था। उस मामले में पुलिस ने लीपापोती कर मौके से पकड़े गये आरोपियों को बाद में राजनीतिक दबाव में क्लीनचिट देकर छोड़ दिया है। इतना ही उल्टा पहलू खान के खिलाफ ही चार्जशीट दाखिल की है। सवाल यह है कि इस तरह से कुछ लोग क्या समझते हैं कि वे जो चाहे कर लेंगे?

उनको लगता है कि वंदे मातरम की तरह जय श्रीराम भी अल्पसंख्यकों को बोलना ही होगा?वे उनकी देशभक्ति को चैक करने का ठेका लेने वाले भला कौन होते हैं? उनको यह भी समझ मंे नहीं आ रहा है कि ऐसा कोई कानून नहीं है कि वे जिससे चाहें जो चाहें उसकी देश भक्ति चैक करने को बुलवा सकते हैं? अगर शक्ति के बल पर सारे काम हो जाया करते तो अमेरिका जैसी सुपर पॉवर ईराक सीरिया और अफगानिस्तान में अब तक अपनी बात सबको मनवा चुका होता।

लेकिन एक संगठन विशेष ने एक वर्ग विशेष के बारे में बहुसंख्यकों के एक हिस्से के दिमाग में इतना ज़हर भर दिया है कि बात चाहे कुछ भी हो लेकिन वे मौका मिलते ही सभी अल्पसंख्यकों को पाकिस्तान समर्थक मानकर हिंसा के बल पर सबक सिखाने पर उतारू हो जाते हैं। उनको यह सीधी और साफ बात भी समझ में नहीं आ रही कि अगर आप किसी वर्ग विशेष का जानबूझकर लगातार एकतरफा नुकसान और अपमान करोगे तो आज नहीं कल देश में गृहयुध्द के हालात बन जायेंगे। कोई भी हो सहने की भी एक सीमा होती है। अगर मुट्ठीभर कट्टरपंथियों को लगता है कि वे सत्ता में बैठे अपने आक़ाओं के बल पर कुछ भी करके बच जायेंगे तो यह उनकी भूल है। अगर माहौल एक बार बिगड़ गया तो इससे सबका नुकसान होना तय है।

इलाज ए दर्द ए दिल तुमसे मसीहा हो नहीं सकता,

तुम अच्छा कर नहीं सकते मैं अच्छा हो नहीं सकता ।।

Saturday, 10 February 2018

मोदी विरोध

मोदी का भाजपा में विरोध ?

0पहले वरिष्ठ भाजपा नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा और अरूण शौरी ने जब मोदी की जन विरोधी नीतियों का विरोध किया तो उनको यह कहकर पल्ला झाड़ लिया गया कि वे सरकार में कोई पद न मिलने से बदले की भावना से आरोप लगा रहे हैं। इसके बाद अब एक तरह से खुद भाजपा सांसदों ने बग़ावत का बिगुल बजाना शुरू कर दिया है। अब भाजपा इसका क्या जवाब देगी?

पहले महाराष्ट्र के भाजपा सांसद नाना पटोले ने यह कहकर लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था कि मोदी पार्टी की मीटिंग में उनकी बात ही सुनने को तैयार नहीं हैं? ऐसे में उनका एमपी रहने का क्या लाभ हो सकता है? उनका यह भी कहना था कि उनकी पहली जवाबदेही भाजपा या मोदी के प्रति के नहीं बल्कि अपने क्षेत्र की जनता के प्रति है। पटोले खासतौर पर अपने राज्य के किसानों की आत्महत्या को लेकर दुखी थे। अब वे सांसदी त्याग कर किसानों के लिये आंदोलन कर रहे हैं। उनको अब इस बात की भी चिंता नहीं है कि पार्टी उनको निष्कासित कर सकती है।

पटोले ने इस्तीफा देते हुए मोदी को तानाशाह बताते हुए उनके काम करने के तौर तरीकों को मनमाना बताया था। उस समय गुजरात के चुनाव चल रहे थे। हालांकि कांग्रेस में अगर ज़रा भी राजनीतिक सूझबूझ होती तो वह भाजपा के सांसद के इस्तीफे और उनके आरोपोें को मादी और भाजपा सरकार के खिलाफ बड़ा मुद्दा बना सकती थी। लेकिन बाद में ऐसा लगा कि गुजरात में भाजपा को जीत के लिये जो नाको चने चबाने पड़े। उसको150 की बजाये 99 सीटों तक सीमित करने में इस विद्रोही लेकिन साहसी भाजपा सांसद के त्याग पत्र का भी बड़ा अहम रोल था।

अभी इस इस्तीफे की स्याही सूखी भी नहीं थी। अब मध्य प्रदेश के मुरैना से भाजपा सांसद अनूप मिश्रा ने खुलेआम संसद में ही मोदी सरकार की किरकिरी कर दी है। मिश्रा ने सदन में मोदी की मौजूदगी में कटाक्ष किया कि मोदी चाहे जितने सपने देख लें लेकिन उनकी योजनायें धरातल पर नहीं उतर रहीं। ठीक यही आरोप मोदी पर विपक्ष भी लगाता रहा है। लेकिन जब आरोप और व्यंग्य सरकार व सत्ताधरी पार्टी के अंदर से ही होने लगे तो समझा जा सकता है कि भाजपा के कुछ नेता यह समझ रहे हैं कि 2019 में उनको चुप रहने की राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है।

भाजपा सांसद मिश्रा इतना कहकर ही नहीं रूके वे गृहमंत्री राजनाथ सिंह के इशारे को अनदेखा करके लगातार मोदी सरकार पर हमला करते रहे। उन्होंने आगे कहा कि मोदी की योजनाएं इसलिये सफल नहीं हो पा रहीं क्योकि उनकी ठीक से निगरानी नहीं हो रही है। इसीलिये जनता को इन योजनाओं की घोषणा होने से काई लाभ नहीं मिल पा रहा है। उनका यह सुझाव भी था कि हर योजना से संबंधित लोगों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिये। उन्होंने इस बात पर भी मोदी सरकार को आड़े हाथ लिया कि एमपीलैड का धन भी तीन साल से जारी नहीं हुआ है।

ऐसे में अधिकारियों की नालायकी के चलते खुद अपनी सांसद निधि से भी विकास कार्य नहीं करा पा रहे हैं। उनका दो टूक सवाल था कि यह बताया जाये कि इस लापरवाही के लिये कौन ज़िम्मेदार है? उन्होंने योजनाओं की दयनयी दशा पर अपने क्षेत्र का एक आंकड़ा देते हुए बताया कि उनके संसदीय क्षेत्र में कुल703 में मात्र 133 ग्राम पंचायतें ही अभी तक खुले मंे शौच से मुक्त हो सकीं हैं। ऐसा लगता है मोदी लगातार कमज़ोर हो रहे हैं।

जिन पत्थरों को हमने अता की थीं धड़कनें,

जब बोलने लगेे तो हम ही पर बरस पड़े ।।

Wednesday, 7 February 2018

अंकित और प्यार के दुश्मन

अंकित की हत्या पर प्यार के दुश्मन क्योें बोले?

0हमारे देश में कट्टरपंथी लोग हमेषा से ही प्यार के दुश्मन रहे हैं। वे अंतरधार्मिक ही नहीं अंतरजातीय और सगोत्राीय विवाह तक खिलाफ़ खुलकर विरोध करते रहे हैं। ख़बर यह है कि जब दिल्ली में अंकित सक्सेना को एक मुस्लिम लड़की से शादी करने के आरोप में कट्टरपंथी वधु पक्ष ने मार डाला तो उस मुस्लिम लड़की ने ही रपट दर्ज कराकर अपने हत्यारे परिवार को जेल की हवा खिला दी। यह बात तो समझ में आती है। लेकिन इस मामले में वे लोग किस मुंह से आवाज़ उठा रहे हैं। जो हमेशा अंतरधार्मिक शादियों और प्यार करने वालों को खुद हमला करके मौत के घाट तक उतारने को तैयार रहते हैं? अंकित की जान जाने के लिये एक तरह से ऐसे कट्टरपंथी भी ज़िम्मेदार हैं जिन्होंन नफ़रत के ये बीज बोये।

 

दिल्ली का अंकित सक्सेना एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता था। बताया जाता है कि उसने उस लड़की से कोर्ट मैरिज भी कर ली थी। ऐसा करना उन दोनों का निजी मामला था। हमारा संविधान और कानून उनको अपनी मर्जी से ऐसा करने का अधिकार भी देता है। इसमें समाज या उनके परिवार को बाधा बनने का न केवल नैतिक अधिकार नहीं था बल्कि कानूनन भी उनको ऐसा करने से रोकने का किसी को हक नहीं था। लेकिन लड़की के परिवार ने अंकित की जान ले ली।

हालांकि उस मुस्लिम लड़की की हिम्मत और अपने हिंदू प्रेमी के प्रति सच्चे प्यार की सराहना करनी होगी कि उसने अपना पति खोने का पहाड़ जैसा ग़म उठाने के बावजूद उसके हत्यारे अपने परिवार को जेल भेजने का साहस दिखाया है। उम्मीद की जानी चाहिये कि यह बहादुर लड़की अपने पति के हत्यारों को सज़ा दिलाये बिना चैन से नहीं बैठेगी। हालांकि यह ऑनर किलिंग की पहली या आखि़री घटना नहीं है।

लेकिन हैरत इस बात की है कि सुप्रीम कोर्ट के बार बार आदेश देने के बावजूद हमारे देश में खाप पंचायतों समेत कुछ कट्टरपंथी संगठन खुलेेआम ऐसे प्रेमी युगलों को हमला कर डराते धमकाते ही नहीं बल्कि कई बार बेदर्दी से मौत के घाट तक उतार देते हैं। यह भी अजीब विडंबना है कि ऐसे मामलों में हमारी सरकार से लेकर समाज तक ही नहीं कानून के रखवाले माने जाने वाले पुलिस वाले भी पहले तो ऐसे प्रेमी जोड़ों को सुरक्षा नहीं देते और इसके बाद उल्टा उनके खिलाफ ही फर्जी केस दर्ज कर प्रेमी का उत्पीड़न करते हैं और प्रेमिका को डरा धमकाकर उसके परिवार के हवाले कर कानून की हत्या करते हैं।

केरल की हादिया का मामला तो और भी दुखद और चिंतनीय है। इस केस में केरल हाईकोर्ट ने न केवल कानून की भावना से बाहर जाते हुए हादिया की शादी कैंसिल करके उसके पति के साथ अपनी मर्जी से रहने के साफ साफ बयान के बावजूद उसको जबरन उसके परिवार के हवाले कर दिया बल्कि उसके पति के खिलाफ लड़की के परिवार के मात्र आरोप लगाने से उसके आइएसआइएस से जुड़े होने की एनआईए से जांच कराने के आदेश तक कर दिये। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दखल देकर दो टूक कहा कि हादिया को अपने पति के साथ रहने का हक कोई तीसरा नहीं छीन सकता।

यह भी हैरत की बात है कि जो कट्टरपंथी आज तक हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के के बातचीत करने प्यार करने या शादी करने को जबरन रोकते रहे हैं। वे आज अंकित सक्सेना के हिंदू होने और उसकी प्रेमिका मुस्लिम होने से ही उसकी हत्या पर आसमान सर पर उठा रहे हैं। वे यह भी दावा कर रहे हैं कि दिल्ली में केजरीवाल की सरकार मुस्लिम तुष्किरण की वजह से अंकित को न्याय नहीं दिला पायेगी। उनसे पूछा जाना चाहिये कि दिल्ली पुलिस तो केंद्र सरकार के अंडर मंे है तो इसमें आम आदमी पार्टी सरकार का क्या रोल है?

ऐसे ही यूपी में तो भाजपा की सरकार है। यहां कासगंज में एक हिंदू युवक चंदन गुप्ता 26जनवरी को तिरंगा यात्रा निकालता हुआ मारा गया। इसके लिये कौन ज़िम्मेदार है? अगर दिल्ली में भी भाजपा सरकार आ जायेगी तो यह गारंटी यूपी की तरह कौन दे सकता है कि इस तरह की घटनायें नहीं दोहराई जायेंगी? हम भी अंकित और चंदन की हत्या की कड़े शब्दों में निंदा कर चुके हैं। हम उनके हत्यारों को सज़ा देने की भी मांग करते रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि कट्टरपंथी धर्म देखकर हंगामा करने की घटिया वोटबैंक की सियासत करना बंद कब बंद करेंगे?

अंकित के पिता ने यह सवाल पूछकर ऐसे लोगों के मंुह पर बिल्कुल ठीक समय पर जोरदार तमाचा मारा है। मगर पता नहीं सभी वर्गो के ऐसे संकीर्ण घृणा से भरे और मूर्ख कट्टरपंथियों को कब अक़्ल आयेगी? अब हिंदू जनता भी भाजपा सरकारों से यह पूछने ही वाली है-

न इधर उधर की बात कर यह बता काफ़िला क्यों लुटा,

मुझे रहज़नों से गिला नहीं तेरी रहबरी का सवाल है।।