Saturday, 11 November 2017

स्मॉग

दिल्ली में स्मॉग है कहां?

दिल्ली को दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बताकर ‘बदनाम’ किया जा रहा है। मोदी सरकार को चाहिये ऐसा‘प्रोपेगंडा’ करने वालों के खिलाफ‘देशद्रोह’ की कार्यवाही करे। हम इस मामले में मोदीभक्तों के साथ हैं। यह नाकाम विपक्ष की ‘साज़िष’ लगती है।

हज़ार बार बता दिया कि विकास के सामने आजकल प्रदूषण कोई मुद्दा नहीं है। इतने बड़े बड़े बांध बन गये। कहीं प्रदूषण से कोई समस्या खड़ी हुयी। लेकिन ये कथित बुध््िदजीवी बार बार न जाने कहां से दिल्ली के स्मॉग को हर साल ही बड़ा मुद्दा बनाने पर तुले हैं। दूसरी तरफ पता नहीं मीडिया को क्या हो गया है? अच्छा खासा अब तक राष्ट्रहित में हर मुद्दे पर मोदी सरकार का आंख बंद कर साथ दे रहा था। लेकिन अचानक भटक गया है। पिं्रट के साथ ही इलैक्ट्रॉनिक मीडिया कुछ ज़्यादा ही स्मॉग को लेकर चिल्ला रहा है। अरे भाई अगर यह इतनी बड़ी प्रॉब्लम होती तो सरकार इसके लिये अब तक ज़रूर कुछ बड़े फैसले कर चुकी होती।

हर साल कई साल से इन दिनों दो चार दिन के लिये दिल्ली में स्मॉग आता ही है। कोई पहली बार तो आया नहीं है। जो दिल्लीवासी इतना घबरा रहे हैं । अब देखिये ना बिहार और असम में हर साल कई दिनों तक बाढ़ आती है तो आती है। वो तो हर साल आयेगी न? इसमें सरकार क्या कर सकती है?कुछ आपदायेें भगवान भरोसे भी छोड़ दिया करो। अब दिल्ली में जब सर्दी दस्तक देती है तो उसके पीछे पीछे कोहरा भी आता ही है। अब ऐसा तो हो नहीें सकता कि सर्दी आये और कोहरा ना आये। ऐसे ही हर साल इन दिनों सर्दी की शुरूआत के साथ ही स्मॉग भी आने लगा है।

अरे भाई दिल्ली में पूरे भारत से लोग आते हैं तो किसी को कभी कोई प्रॉब्लम नहीं होती तो स्मॉग भी आ गया। अब ऐसा तो है नहीं कि दिल्ली इसी स्मॉग की वजह से सांस नहीं ले पा रही। दिल्ली में पहले ही इतने वाहन हैं कि उनकी वजह से प्रदूषण हो ही रहा है। साथ साथ हर दिन नये वाहन सड़कों पर आते जा रहे हैं। उनको सरकार लोकतंत्र में कैसे रोक सकती है? दिल्ली में इंडस्ट्री भी बड़े पैमाने पर लगी हुयी हैं। उनमें बड़ी तादाद में लोगों को रोज़गार भी मिला हुआ है। इस तरह से अगर इंडस्ट्रीज़ की चिमनियों से धुआं निकल रहा है तो सरकार क्या करे?

अब यह तो संभव नहीं कि आप गुड़ खायें और गुलगुलों से परहेज़ भी करें। ऐसे ही दिल्ली में विकास होगा तो निर्माण भी होगा। और जब निर्माण होगा तो ध्ूाल भी उड़ेगी। इसमें सरकार क्या कर सकती है? अब इस‘मामूली नुकसान’ यानी प्रदूषण की वजह से दिल्ली का विकास तो रोका नहीं जा सकता। ऐसे ही दिल्ली में जो वाहन चल रहे है। बताया जाता है कि उनमें से जो वाहन डीज़ल से चलते हैं। उनसे अधिक प्रदूषण होता है। अब इनमें जो बसें या ट्रक हैं। उनके बारे में तो सोचा जा सकता है। लेकिन जो अत्यधिक ‘गरीब’ लोग डीजल से चलने वाली 50 लाख तक की ‘सस्ती’कारें जैसे तैसे अपना पेट काटकर खरीद रहे हैं।

उनको सरकार किस मंुह से रोक सकती है? ऐसे ही पड़ौस के राज्यों पंजाब और हरियाणा में किसान पराली जलाते हैं। बताया जाता है कि उसका ध्ुाआं दिल्ली व एनसीआर में हर साल स्मॉग बनकर कई दिन तक के लिये ठहर जाता है। यह मामला भी काफी नाजुक है। एक तो देशभर का किसान पहले ही आर्थिक तंगी से अपनी जान दे रहा है। अब उसको पराली भी ना जलाने दी जाये तो वह और नाराज़ हो जायेगा। इस समय सरकार का सारा फोकस उन व्यापारियों पर है। जो जीएसटी की वजह से ख़फ़ा है। पराली पर किसानों से फिर किसी साल निबटेंगे।

दिल्ली सरकार कहती है कि यह केंद्र सरकार का काम है। केंद्र सरकार कहती है कि नहीं यह पड़ौस के राज्यों की कानून व्यवस्था का सवाल है। एनजीटी कहती है कि प्रदूषण रोको चाहे जो करना पड़े। सुप्रीम कोर्ट कहता है कि पता लगाओ यह किसका काम है। हम समझते हैं कि दो चार दशक में पता लग ही जायेगा।

0खुदा के हाथ मत सौंप सारे कामों को,

बदलते वक़्त पे कुछ इख़्तियार भी रख।।

Thursday, 9 November 2017

नोटबन्दी का एक साल

नोटबंदीः क्या खोया क्या पाया?

0 8 नवंबर को नोटबंदी का एक साल पूरा हो गया। सरकार जहां 99 प्रतिषत पुराने 500 और 1000 के नोट बैंक में वापस आ जाने के बावजूद नोटबंदी के सफल होने का दावा करती है। वहीं विपक्ष 200 लोगों के इसमें मरने से इसको पूरी तरह नाकाम बताता है। लेकिन सच्चाई कहीं इसके बीच है।

नोटबंदी का फैसला करप्शन कालाधन और आतंकवाद से लेकर नक्सलवाद तक को ख़त्म करने के दावे के साथ लेने का मोदी सरकार ने दावा किया था। जानकारों का कहना था कि इसके लिये सरकार ने नीयत ठीक भी हो तो पूरी तरह से होमवर्क नहीं किया था। यह बात तब किसी हद तक सही होती भी नज़र आई जब सरकार को 50 दिन की नोटबंदी के दौरान लगभग 100 बार नियम बदलने पड़े। उधर सरकार का कहना था कि सैध््दांतिक रूप से सही होने के बाद भी कई बार फैसले लागू करने में व्यवहारिक कठिनाइयां आती ही हैं।

इसलिये जनहित में बार बार नियम बदलने में काई बुराई नहीं है। लेकिन सरकार आज तक इस बात का जवाब नहीं दे पाई कि जब उसको कुल चलन के नोटों में से लगभग 86 प्रतिशत नोट हटाने थे तो उसने जनता की सुविधा के लिये विकल्प के तौर पर पहले ही इतनी ही मुद्रा छापकर तैयार क्योें नहीं की? दूसरे जो 2000 का नया नोट छापा गया उसके लिये एटीएम को पहले ही कैलिब्रेट क्यों नहीं किया गया? तीसरे 100 और 50 के छोटे नोटों की आपूर्ति पहले से ही बढ़ाकर बाज़ार के चलन में इनकी हिस्सेदारी कुल मुद्रा में कम से कम 50 प्रतिशत तक करके जनता को भारी मुसीबतों से बचाने के लिये कोई फैसला क्यों नहीं लिया गया?

इसके साथ ही बैंकों के मैनेजर और स्टाफ ने मिलकर सरकार की कालेधन को निकालने की योजना को अपनी जेब भरकर जो चूना लगाया उसके बारे में पहले से कोई तैयारी क्योें नहीं की गयी थी? साथ ही कालाधन रखने वालों ने जिस तरह से अपना कालाधन जनधन खातों और सोने में खपाया उसको लगाम लगाने में भी सरकार असहाय नज़र आई। जब नोटबंदी चल ही रही थी। तभी आतंकवादियों और नक्सलवादियों के पास से नये 2000के नोट बरामद होने शुरू हो चुके थे। साथ ही बाज़ार में नये नक़ली नोट भी आने लगे।

इतना ही नहीं पहले 500 और 1000के जो नक़ली नोट बाज़ार में चलन मंे थे। उनमें से अधिकांश बैंकों में इसलिये जमा हो गये क्योंकि सब बैंकोें में न तो नकली नोट चैक करने वाली मशीनें थीं और न ही उनको भारी भीड़ के बीच आपाधापी मेें इनको चैक करने का होश ही मिल पा रहा था। यह आशंका भी पहले से ही थी कि कालाधन रखने वाले इसको ठिकाने लगाने के लिये जुगाड़ ज़रूर लगायेगें। उन्होंने कामयाबी के साथ ऐसा किया भी। लेकिन सरकार उनको ऐसा करने से नहीं रोक पाई। यह सरकार की नाकामी ही मानी जायेगी।

लेदेकर सरकार का सारा ज़ोर अब इस बात पर है कि बाज़ार में नोटों की कम उपलब्ध्ता से लोग डिजिटल मनी की ओर बढ़े हैं। लेकिन यह भी आंशिक सच है। जैसे ही बाजार में पर्याप्त नोट पहंुच गये लोग फिर से नकद लेनदेन करने लगे। उधर नोटबंदी से कारोबार एक तरह से चौपट हो गया। सरकार का दावा है कि उसने बहुत बड़ी तादाद में फर्जी और नकली कंपनियों को इस दौरान पहचाना हैै। इसके साथ ही सरकार ने बड़ी रकम बैंकों मंे जमा कर आयकर रिटर्न न भरने वालों पर नज़र गड़ाई है। लेकिन इन मामलों को करप्ट सरकारी मशीनरी से अंजाम तक पहुंचान कठिन है।

सोचा था जाकर हम उससे फ़रियाद करेंग,

कमबख़्त वो भी उसका चाहने वाला निकला ।।

धर्मनिरपेक्षता

धर्मनिर्पेक्षता कोई समस्या नहीं!

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर देश की धर्मनिर्पेक्षता पर ज़ोरदार हमला बोला है। हालांकि यह उनका निजी विचार नहीं है बल्कि यह संघ परिवार के ही एजेंडे का एक सोचा समझा हिस्सा है। लेकिन इस तरह वे यूपी में अपनी नाकामियों को बहुत दिन तक छिपा नहीं पायेंगे। क्योंकि यह असली मुद्दा नहीं है।

जब आदमी परेशान होता है तो वह किसी की कोई भी बात विकल्प के तौर पर मानने को जल्दी ही तैयार हो जाता है। देश कांग्रेस और उसके जैसे सेकुलर दलों के करप्शन वंशवाद परिवारवाद अल्पसंख्यकवाद और जातिवाद से आज़ादी के बाद 60 साल में काफी तंग आ चुका था। ऐसे में लोहा गरम देखकर आरएसएस ने मोदी को गुजरात के कथित विकास मॉडल और हिंदुत्व के तड़के के साथ देश की जनता के सामने विकल्प के तौर पर पूरी तैयारी के साथ पेश कर दिया। जनता खासतौर पर हिंदुओं को यह आईडिया काफी अपील कर गया। मोदी पीएम बन गये।

साढ़े तीन साल बीत गये लेकिन आज तक उनकी कोई ठोस उपलब्धि जनता के सामने नहीं है। उल्टा नोटबंदी से लेकर जीएसटी तक से अर्थव्यवस्था चौपट है। इसके बाद यूपी सहित कई राज्यों के चुनाव भी मोदी को ब्रांड बनाकर भाजपा ने जीत लिये। इसके बाद यह समस्या सामने आई कि यूपी जैसे बड़े राज्य का सीएम किसे बनाया जाये? संघ परिवार ने बहुत सोच समझकर फायरब्रांड हिंदुत्ववादी नेता योगी आदित्यनाथ को यूपी जैसे उलझे हुए विशाल प्रदेश का मुख्यमंत्री बना तो दिया। लेकिन आज तक न तो योगी और न ही संघ परिवार ऐसी कोई योजना सामने रख सका है।

जिससे लगे कि उनके पास यूपी के विकास का कोई व्यापक एजेंडा हो। दरअसल चुनाव जीतना अलग बात है। इसके बाद कामयाब सरकार चलाना बिल्कुल दूसरी बात है। सपा बसपा के दौर में भी यूपी के साथ यही सबसे बड़ी प्रॉब्लम आती थी कि ये पार्टियां जातीय समीकरण के हिसाब से मुस्लिम धार्मिक तुष्टिकरण से जीतने का जुगाड़ तो कामयाबी से कर लेती थीं। लेकिन चुनाव जीतने के बाद टोटकों से सरकार चलती थी। कभी सैफई उत्सव में करोड़ो फंूके जाते थे तो कभी अंबेडकर पार्क में हाथियोें की मूर्तियों पर अरबों रूपया पानी की तरह बहाया जाता था।

यानी इन क्षेत्रीय जातिवादी परिवारवादी भ्रष्ट दलों को यही मालूम नहीं था कि यूपी की सबसे बड़ी समस्यायें क्या हैं? और उनका समाधान करने का टाइमबाउंड रोडमैप क्या होना चाहिये? इस बार मोदी की तथाकथित विकास पुरूष की झूठी घड़ी हुयी छवि के बल पर बड़ी उम्मीदों से यूपी की जनता ने भाजपा को यूपी की बागडोर सौंपी थी। लेकिन उन्होंने भविष्य मेें अपना विकल्प तैयार करने को भाजपा के किसी अनुभवी और योग्य नेता को यूपी की कमान न देकर योगी जैसे एक धार्मिक मठ के मुखिया को सीएम की कुर्सी पर बैठा दिया।

योगी ने आते ही जो दावे किये थे। उनकी सरकार को 6 माह से अधिक हो चुके हैं। एक भी वादा पूरा होता नज़र नहीं आ रहा है। यहां तक की यूपी की सड़के 100 दिन में गड्ढा मुक्त तक नहीं हो पाईं हैं। एंटी रोमियो अभियान दिखावा बनकर रह गया है। कानून व्यवस्था पहले की तरह रामभरोसे चल रही है। योगी की नाक के नीचे गोरखपुर के सरकारी अस्पताल में मासूम बच्चों की मौत लगातार जारी है। योगी मोदी की तरह ही सबसे बड़े पद पर आसीन होकर अभी भी चुनाव मोड में लगते हैं। यही वजह है कि वे यूपी को चमकाने की बजाये धर्मनिर्पेक्षता अल्पसंख्यक तुष्टिकरण और मदरसों पर फोकस कर हिंदू वोटबैंक मज़बूत करने में लगे हैं।

उनको याद रखना चाहिये कि जनता ने उनको एक मौका दे दिया है। हो सकता है। उनकी लुभावनी बातों में आकर एक मौका आगे और मिल जाये। लेकिन अगर वे राज्य व केंद्र की सरकार में रहकर भी केवल बयानबाज़ी से सेक्युलर दलों को कोसते रहेंगे तो जनता उखाड़ फैंकेगी।

कहां तो चिराग़ तय था हरेक घर के लिये,

कहां चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये ।

Saturday, 4 November 2017

चिंगारी

चिंगारी: आंधियों के बीच एक दीया!

0 आज के पूंजीवादी दौर में जब छोटी मछली को लगातार बड़ी मछली अपना शिकार बना रहीं हैं। इस भौतिकतावादी सोच से मीडिया भी नहीं बचा है। लेकिन यूपी के बिजनौर जैसे छोटे और पिछड़े हुए ज़िले से हिंदी अख़बार चिंगारी सांध््य दैनिक ने ऐसे में भी अपनी विश्वसनीयता के बल पर खुद को मशाल बनाया है।  

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   25 अक्तूबर 1985 को जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह ने बिजनौर टाइम्स ग्रुप के इवनिंग एडिशन चिंगारी दैनिक का विमोचन किया तो इन पंक्तियों का लेखक भी उस समारोह में ग्रुप के एक प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर वहां मौजूद था। उस समय चिंगारी के संरक्षक और सर्वे सर्वा वरिष्ठ पत्रकार चिंतक व विचारक स्व. बाबू सिंह चौहान से उनके कुछ मित्रों और शुभचिंतकों ने बिना किसी लाग लपेट के कहा था कि चिंगारी का भविष्य उज्जवल नहीं है।

उनकी भावना आगाह करने को अच्छी भले ही रही होगी लेकिन उनको पूरी आशंका इस बात की थी कि शाम का अख़बार वह भी दैनिक चलाना और भी कठिन ही नहीं एक तरह से नामुमकिन काम है। लेकिन अपनी धुन के पक्के वामपंथी सोच के पैरोकार स्व. चौहान साहब ने नकारात्मक बातों पर कान न देकर अपना मिशन शुरू कर दिया। शुरू में उनके बड़े पुत्र श्री चंद्रमणि रघुवंशी ने चिंगारी के संपादन की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई। कुछ समय बाद उनके छोटे पुत्र मिलनसार इंसान श्री सूर्यमणि रघुवंशी ने चिंगारी का संपादन पूरी तैयारी के साथ अपने हाथ में लिया तो चिंगारी की चमक दिन ब दिन और तेजी से बढ़ने लगी।

इसमें कोई दो राय नहीं चिंगारी का 32साल का सफर उसके साइज़ उसके कागज़ या उसकी छपाई की किसी खास तकनीक की वजह से नहीं बल्कि पाठकों में उसकी विश्वसनीयता की वजह से आगे बढ़ता गया है। चिंगारी के हैडिंग शेर ओ शायरी की तरह रदीफ काफ़िये के हिसाब से तुकांत होने को लोगों ने हाथो हाथ लिया। चिंगारी लोगों के लिये चटपटी और गुदगुदाने वाली ख़बरोें के साथ ही शाम की चाय का साथी बन गया। इसके बाद इसमें ख़बरों का ऐसा सैलाब आया कि इसके पन्ने लगातार बढ़ाने पड़े। लेकिन कीमत वही रखी गयी।

एक दिन ऐसा आया कि जो बड़े पत्रकार और अख़बार चिंगारी को हिकारत की निगाह से देखते थे और इसके जल्दी ही बंद होने का एलान कर रहे थे। उनको निराशा हाथ लगी। चिंगारी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करता गया। हालत यह हो गयी कि बड़े अख़बार और चैनल तक इसकी ख़बरों की स्टाइल की नकल करने लगे। कुछ कथित बड़े ब्रांड समझे जाने वाले मीडिया हाउसों को तो इसकी शाम को सबसे पहले छपने वाली ख़बरों से अपनी अहम ख़बरें न छूटने का एलर्ट भी मिलने लगा है। चिंगारी आज के स्वार्थ के दौर में भी पूरी तरह व्यसवायिक तौर तरीके नहीं अपनाता है।

चिंगारी अपने संस्थापक और राष्ट्रीय स्तर के मूर्धन्य पत्रकार रहे स्व. चौहान साहब के दिखाये गरीब और कमज़ोर समर्थक रास्ते पर आज भी तमाम कठिनाइयों के बावजूद चल रहा है। इसके पाठकोें की तादाद ही नहीं बढ़ी बल्कि इसके सहयोगी संवाददाता विज्ञापनदाता और शुभचिंतक भी इसके तेवर और इसके संपादक पिंटू भाई की खुशअख़लाकी डाउन टू अर्थ छवि सादगी नफ़ासत सदाकत और सहाफत के लोग कायल होेते गये।

बिजनौर से निकलकर अब चिंगारी देखते देखते ही उत्तराखंड के साथ ही आसपास के कई सीमावर्ती ज़िलों में भी छाने लगा। कई बार बिजनौर के और कई बार बाहर के बडे़ समाचार पत्र समूहों ने चिंगारी को चुनौती देने के लिये अपना सुबह का अख़बार न चलता देख शाम का अख़बार इस इलाके में प्रकाशित करना चाहा। लेकिन वे नकारात्मक सोच और ईष्या की वजह से कामयाब नहीं हो सके। कोई माने या ना माने आज के प्रतिस्पर्धा महंगाई और तमाम तरह के दबाव के दौर में चिंगारी जैसा अख़बार लगातार तीन दशक से अधिक से चलाये रखना एक तरह से लोहे के चने चबाने जैसा ही है।

चिंगारी की निष्पक्षता निडरता और स्पश्टता के तो उसके आलोचक भी कायल हैं। चिंगारी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सच और न्याय के मामले में किसी से समझौता नहीं करता है। हमारी शुभकामनायें चिंगारी उसके संपादक और सभी संवाददाताओं को है।                   

0 नज़र बचाके निकल सकते हो निकल जाओ,

  मैं इक आईना हूं मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है ।।            

नफ़रत का विस्तार

नफ़रत का विस्तार विदेशियों तक ?

वोटबैंक की राजनीति के चक्कर मंे देश के अल्पसंख्यकांे बनाम बहुसंख्यकों का जो खेल अब तक आपस में चल रहा था। वो अब बढ़कर फतेहपुर सीकरी में विदेशी पर्यटकों की पिटाई तक पहुंच गया है।

स्विटज़रलैंड का प्रेमी जोड़ा क्वेंटिन जेरेमी क्लेर्क और मैरी द्रोज 30सितंबर को बड़े अरमानों के साथ भारत घूमने आये थे। वे पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुके मुहब्बत का प्रतीक और सातवां वंडर आगरा का ताजमहल देखने के बाद फतेहपुर सीकरी गये थे। वहां वे रेलवे स्टेशन के पास घूम रहे थे। अचानक भीड़ ने उनका पीछा करना शुरू कर दिया। पहले उनकी हूटिंग की गयी। इसके बाद उनपर पत्थर बरसाये गये। इतने पर भी अराजक तत्वों का मन नहीं भरा तो उन पर लाठी डंडो से हमला कर दिया गया। वे बुरी तरह घायल पड़े हुए तड़पते रहे।

किसी ने उनकी काफी देर तक कोई मदद भी नहीं की। उल्टा उनके ज़ख़्मों से खून रिस्ता रहा और अमानवीय लोग उनकी वीडियो बनाते रहे। जब किसी ने पुलिस को ख़बर की तो पुलिस ने आकर उनको अस्पताल मेें भर्ती कराया। उनको ले जाने के लिये एंबुलैंस भी नहीं मिली। वजह 108नंबर की एंबुलैंस बहुत दिनों से ख़राब पड़ी है। पुलिस ने उन पर हमला करने वालों को अज्ञात मानकर औपचारिकता के लिये प्रथक सूचना रिपोर्ट दर्ज कर ली। ज़ाहिर बात है कि वे इस एफआईआर की पैरवी करने के लिये बरसों तक भारत में नहीं रहेंगे। न ही वे अदालत में तारीख पर तारीख मिलने पर चक्कर काट सकेंगे।

लिहाज़ा कुछ समय बाद पुलिस इस मामले में क्लोज़र रिपोर्ट लगाकर मामले को हमेशा के लिये बंद कर देगी। इस मामले का एक दुखद पहलू यह रहा कि जब इस प्रेमी जोड़े को इलाज के लिये सरकारी अस्पताल ले जाया गया तो उनको एनेस्थीसिया दिये बिना ही उनका ऑप्रेशन शुरू कर दिया गया। इस पर उनको हैरत के साथ ही काफी पीड़ा और क्षोभ हुआ। इसके बाद उनके वहां इलाज न कराने पर अड़ जाने से उनकी मांग पर दिल्ली अपोलो अस्पताल भेजा गया। सबसे अहम बात यह है कि जब इस मामले की प्राथमिक जांच की गयी तो पता चला उनके साथ यह सब हरकतें इसलिये की गयीं कि वे सुनसान जगह पर एक दूसरे को किस कर रहे थे।

हालांकि अभी तक पुलिस उन हमलावरों को नहीं पकड़ सकी है। जिनपर हमले का आरोप है। लेकिन सोचने की बात यह है कि क्या आपको यह बात जानकर कुछ अनुमान नहीं लग रहा कि वे लोग किस विचारधारा से जुड़े हो सकते हैं? अभी तक तो हमें पड़ौसी मुल्क पाकिस्तान और बंग्लादेश से ही यह ख़बरें मिलती थीं कि वहां लोगों को अलग धर्म संस्कृति और सोच की वजह से हमला कर मारा जा रहा है। लेकिन अब हमारे देश में भी यह रोग बढ़ता जा रहा है। हालांकि लोकतंत्र में यह संभव नहीं कि जो एक आदमी पार्टी या धर्म के लोग चाहे वो ही सबको मानना होगा। समानता विविधता में ही निहित होती है।

सबको अपनी अपनी सोच पसंद और सम्मान के साथ जीने का अधिकार हमारा संविधान देता है। जिस तरह से पाकिस्तान में ईश निंदा करने पर लोग अब कानून हाथ मंे लेकर मौके पर ही आरोपी को मार डालते हैं। वैसे ही देश में एक नेता एक पार्टी और एक धर्म व संस्कृति के नाम पर जगह जगह कुछ अतिवादी संकीर्ण सोच के हिंसक लोग कभी गाय के नाम पर कभी धार्मिक भावना आहत होने के नाम पर और कभी एक खास सोच के खिलाफ होने पर विदेशियों पर भी हमला करने लगे हैं। अगर गौर से देखा जाये तो यह उस अभियान का हिस्सा है।

जो अल्पसंख्यकों के खिलाफ काफी लंबे समय से चलाया जा रहा है। पहले इसका विस्तार दलितों के विरूध्द किया गया। इसके बाद कम्युनिस्टों का नंबर आया। अब यह दो क़दम आगे बढ़कर विदेशियों के खिलाफ भी चल निकला है। कोई यह दावे से नहीं कह सकता कि ये हिंसा घृणा और अराजकता कहां तक और बढ़ेगी।

मज़हब को लौटा ले उसकी जगह दे दे,

तहज़ीब सलीक़े की इंसान क़रीने के ।।

ताजमहल का विरोध

ताजमहल नहीं मुस्लिम विरोध ?

ताजमहल को ‘तेजोमहालय’ मंदिर बताने से लेकर ग़द्दारों की निशानी ठहराये जाने तक संघ परिवार का एक खास एजेंडा रहा है। इसके पीछे हीनभावना से लेकर हिंदू वोटबैंक बनाये रखने की सोची समझी योजना के तहत मुस्लिम विरोध माना जा सकता है।

जिन लोगों को ताजमहल से इतनी परेशानी है कि वे दुनिया के इस सातवंे आश्चर्य को यूपी की पर्यटन सूची में भी जगह नहीं देना चाहते। दरअसल उनको असली परेशानी मुसलमानों से है। वे एक तरह से इस हीनभावना से भी ग्रस्त हैं कि उनके पास ऐसी कोई इमारत ही नहीं जिस पर वे मुसलमानों की तरह ताज के बहाने गर्व कर सकें। अगर ताज से ही नफ़रत होती तो फिर लालकिले से भी घृणा होनी चाहिये थी। उनको कुर्ता पायजामा भी नहीं पहनना चाहिये। उनको केवल अपनी भारतीय प्राचीन पोशाक धोती और उत्तरीये ही शोभा देती है।

इसके साथ ही चाय भी चीन की देन है। चीन हमारा पक्का दुश्मन है। वह हमारे एक और दुश्मन पाकिस्तान का दोस्त है। वह हमारी ज़मीन कब्ज़ा चुका है। वह आज भी हमारी ज़मीन दोकलाम पर दावा करता है। वह हमारे दुश्मन पाकिस्तानी आतंकवादी मसूद अज़हर को आतंकवादी नहीं घोषित करने दे रहा है। इसके साथ ही ताज को मुसलमानों से जोड़कर देखने वालों को समोसा और गुलाब जामुन भी छोड़ना चाहिये। ये भी दुश्मनों के देश से ही आये हैं। ऐसे और भी अनेक व्यंजन गिनाये जा सकते हैं जो पश्चिमी एशिया यानी वहां से आये हैं।

जहां से आपके दुश्मन ग़द्दार और आक्रमणकारी मुसलमान आये थे। इतना ही नहीं बहुत से फूल और सब्ज़ियां भी उन्हीं मुल्कों से आये हैं। जहां से मुसलमान आये थे। यूपी के वो भाजपा विधायक जो ताज के खिलाफ ज़हर उगल रहे हैं। उनको सरधना से दिल्ली उस ग्रैंड ट्रंक रोड से भी नहीं जाना चाहिये क्यांेकि उसका निर्माण भी एक अफ़गान ग़द्दार शेरशाह सूरी ने कराया था। आज जब संघ परिवार अपनी सियासी रोटी सेंकने के लिये सब कुछ हिंदू मुस्लिम में बांट ही रहा है तो उर्दू भी ग़द्दारों की भाषा मानी जायेगी। तब तो हिंदी से उर्दू फारसी के शब्द भी हटाने होंगे।

उन भाजपा विधायक को यह भी नहीं पता कि ग़द्दार शब्द भी उसी उर्दू का है। वो साहित्य भी बदला जाना चाहिये जिसमें उर्दू के शब्द शामिल किये गये हैं। मिसाल के तौर पर रामचरित मानस में तुलसीदास जी ने श्रीराम को एक ही पद में तीन बार गरीबनवाज़ कहकर संबोधित किया है। उनको गरीबनवाज़ की जगह दरिद्रनारायण कहना चाहिये था। मशहूर हिंदी विद्वान प्रेमचंद डा. रामविलास शर्मा साहिर लुधियानवी गालिब मीर रसखान जायसी टैगोर सबको ताज और उर्दू की तारीफ के लिये दंडित किया जाना चाहिये। मुग़ले आज़म और पाकीज़ा जैसी फिल्मों को भी बैन किया जाना चाहिये।

पूरी फिल्म इंडस्ट्री को तो बंद ही कर देना चाहिये क्यांेकि वे हिंदी फिल्मों के नाम पर उर्दू डायलॉग और उर्दू गाने को ठूस ठूस कर देश का मुस्लिकरण करने की ग़द्दारी कर रहे हैं। एक सवाल और जब मुगल बाहर से आने पर ग़द्दार हैं तो अंग्रेज़ क्यों नहीं जिन्होंने हमें200 साल तक गुलाम बनाया और भयंकर पीड़ायें दीं। हमारे हीरे जवाहरात और धन दौलत लूटकर वापस भाग भी गये। अपने रहनसहन भी हम पर थोप गये। हमें अंग्रेज़ी भाषा क्यों नहीं छोड़ देनी चाहिये? अंग्रेज़ों की आध्ुानिक तकनीक से भी संघ परिवार को परहेज़ करना चाहिये।

पेस्ट ब्रश छोड़ नीम की दतौन इस्तेमाल करनी चाहिये। साबुन की जगह मिट्टी का लेपकर नहाना चाहिये। बैल गाड़ी से यात्रा करें। संसद भवन भी अंग्रेज़ों का बनाया हुआ कलंक है। उसको भी जल्द से जल्द छोड़ दें। चाय की जगह दूध पियें वह भी देसी गाय का यूरूप की जर्सी गाय का भूलकर भी न पियें। दरअसल भाजपा का यह सारा खेल मुसलमानों का अंध विरोध कर हिंदू वोटबैंक को अपने काबू में रखने का है। लेकिन सुंदरता पर कुरूपता प्रेम पर घृणा और सृजन पर तालिबानी हमला इतिहास में कभी लंबे समय तक टिक नहीं पाया है। भारत की उदार सहिष्णु और साझा सभ्यता व संस्कृति हज़ारों साल से रही है। आगे भी हमेशा ऐसे ही सुरक्षित रहेगी। नफ़रत और ढोंग की सियासत करने वाले आज नहीं तो कल खुद जनसमर्थन न मिलने से सत्ता से बाहर होते ही ख़त्म हो जायेंगें। मुहब्बत की निशानी ताजमहल सदा ऐसे ही चमकता रहेगा।

किसी मर्तबे की ख़्वाहिश ना मक़ाम चाहते हैं,

जो हम सबको हो पसंद वो निज़ाम चाहते हैं।।