Thursday, 26 December 2024

आंबेडकर को मानते हैं?

*डा. अंबेडकर को अगर मानते हैं, 
उनके संविधान को क्यों नहीं मानते?*
0 पिछले दिनों संसद में बाबा साहब डा. भीमराव अंबेडकर को लेकर ज़ोरदार बहस हुयी। सरकार और विपक्ष दोनों यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे जैसे उनसे बड़ा अंबेडकर का चाहने वाला कोई दूसरा नहीं हो सकता। लेकिन सच यह है कि बाबा साहब के नाम पर उनकी मूर्ति और संविधान को लेकर बड़े बड़े दावे करने वाले विभिन्न दल और नेता अंबेडकर के विचारों उसूलों और उनके बताये रास्ते पर चलने को तैयार नहीं हैं। खासतौर पर मोदी सरकार और राज्यों की भाजपा सरकारों ने अंबेडकर को लेकर बहुत आडंबर किये हैं। इसके पीछे दलित समाज को खुश करने का नाटक अधिक रहा है। लेकिन बाबा साहब ने भारत का जो संविधान बनाया था। उस पर कोई चलने को तैयार नहीं है। यह ठीक ऐसी ही बात है जैसे हिंदू समाज पूरे विश्व को एक परिवार बताता है। लेकिन जब वर्ण व्यवस्था और अल्पसंख्यकों का सवाल आता है तो इसका एक बड़ा वर्ग उनके खिलाफ खुलेआम खड़ा हो जाता है। ऐसे ही मुसलमान इस्लाम की बड़ी बड़ी बातें करते हैं। लेकिन जब अमल की बात आती है तो पैगंबर का सब्र और सुलह का रास्ता छोड़कर कई जगह कुछ कट्टरपंथी मुसलमान उग्र होकर खुद मुसीबत मोल ले लेते हैं।    
*-इकबाल हिंदुस्तानी*
कहने को हमारे देश में लोकतंत्र है। चुनी हुयी सरकारें हैं। पुलिस है। कोर्ट हैं। जांच एजेंसियां हैं। मीडिया हैं। संविधान है। चुनाव आयोग सूचना आयोग मानव अधिकार आयोग अल्पसंख्यक आयोग सीबीआई और ईडी जैसी कथित स्वायत्त संस्थायें हैं। यानी कानून का राज बताया जाता है। लेकिन वास्तव में क्या सब नागरिकों के अधिकार समान हैं? व्यवहार में तो ऐसा बिल्कुल भी नजर नहीं आता है। विडंबना यह है कि हमारे पीएम सीएम एमपी एमएलए पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी सभी संविधान की शपथ लेकर अपने पद ग्रहण करते हैं। लेकिन हम देख रहे हैं कि कई मामलों में आयेदिन इस शपथ के विपरीत वे आजकल पूरी निडरता और क्रूरता से अन्याय पक्षपात अत्याचार का काम करने में हिचक नहीं रहे हैं। विधानमंडलों में पक्षपातपूर्ण कानून बनाने से लेकर पुलिस के द्वारा अपने विरोधी लोगों को टारगेट करने में अब उनको जरा भी लज्जा नहीं आती है। क्या संविधान इसकी इजाजत देता है? नहीं देता तो आप डा. अंबेडकर को काहे झूठमूठ की श्रध्दांजलि का नाटक करते हो? 
    एक नया संविधान विरोधी चलन देखने में आ रहा था कि अगर किसी पर दंगा या किसी अपराध का आरोप लगता है तो उस पर अपराध साबित होने से पहले ही पुलिस प्रशासन सत्ता में बैठे अपने आकाओं का राजनीतिक एजेंडा लागू करने के लिये उसके घर या दुकान व अन्य प्रोपर्टी पर बुल्डोजर चलवा देता था। क्या कानूनन बिना नोटिस दिये कोई सरकार ऐसा कर सकती है? संविधान से नहीं कर सकती। सुप्रीम कोर्ट ने कुछ दिन पहले ही इस तरह के मामलों पर कुछ हद तक रोक लगा दी है। इसके बाद भी यूपी में कुख्यात अपराधियों के नाम पर फर्जी मुठभेड़ में आरोपियों को मार डालना और कई के पांव में गोली मारकर हाफ एनकाउंटर कर देना अब आम बात हो चुकी है। ऐसे ही भीड़ द्वारा किसी पर भी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहंुचाने का आरोप लगाकर उसकी जान ले लेना अब सामान्य सा हो चुका है। क्या ये संविधान के हिसाब से सही है? नहीं तो बाबा साहब को कहां मान रहे हैं आप? आज दंगा होने पर एक वर्ग विशेष को सबक सिखाने और एक वर्ग विशेष को तुष्टिकरण कर उनसे थोक में वोट लेकर अनैतिक तरीके से चुनाव जीतने को यह सब सोची समझी योजना के तहत करने का विपक्ष का आरोप सही नजर नहीं आ रहा है? 
      अपवाद के तौर पर कभी कहीं हो जाता तो इन हरकतों को नजर अंदाज भी किया जा सकता था। लेकिन ऐसा एक दो बार नहीं एक दो राज्यों में नहीं कई राज्यों में एक पार्टी की सरकारें लगातार कर रही हैं तो क्या इसे कानून का राज कहा जा सकता है? हालांकि विपक्ष की सरकारें भी दूध की धुली नहीं हैं। कांग्रेस ने अपने 40 साल के एकक्षत्र राज में संविधान का खूब मज़ाक बनाया है। चुनी हुयी दर्जनों सरकारें अपने राजनीतिक स्वार्थ में बर्खास्त की हैं। अब भाजपा सरकार उससे भी कई गुना आगे निकलकर तमाम संविधान विरोधी काम खुलेआम कर रही है। क्या इसे संविधान का राज कहा जा सकता है? क्या ऐसा करने वाले बाबा साहब के समर्थक हो सकते हैं? बाबा साहब के संविधान के नाम पर साम्राज्यवादी मनमानी अत्याचारी अन्यायपूर्ण और पक्षपातपूर्ण शासन व्यवस्था लागू करने का काम कैसे किया जा सकता है? अब यह बात ढकी छिपी नहीं रह गयी है कि एक संस्था और एक दल खुलेआम एक वर्ग विशेष का दानवीकरण करने पर तुला है। इस वर्ग के खिलाफ धर्म संसद के नाम पर आयेदिन जहर उगला जा रहा है। 
     सुप्रीम कोर्ट के हेट स्पीच के खिलाफ सख़्त कानूनी कार्यवाही करने के बार बार आदेश के बावजूद सरकारें अव्वल तो इन मामलों का संज्ञान ही नहीं लेती। जब मामला कोर्ट में चला जाता है तो मजबूरन हल्की धाराओं मेें एफआईआर दर्ज की जाती हैं। इसके बाद सत्ता के इशारे पर जांच के नाम पर केस को कमजोर किया जाता है। नतीजा यह होता है कि कोर्ट से आरोपियों को जल्दी ही जमानत मिल जाती है। आरोपी फिर से अपने नफरत और झूठ फैलाने के मिशन में लग जाते हैं। दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों सेकुलर हिंदू दलितों और संघ परिवार की विचार धारा का विरोध करने वाले बहुसंख्यक वर्ग के लोगों के मामलोें मेें जरूरत से ज्यादा तेजी दिखाई जाती है। उनके मामलों में धारायें भी अधिक गंभीर लगाई जाती हैं। उनकी जमानतों का कोर्ट में लगातार विरोध किया जाता है। उधर कोर्ट जहां पहले छोटे छोटे मामलों में स्वतः संज्ञान लेकर पिछली सरकारों से सखती से जवाब तलब करते थे। आजकल देखने में आ रहा है कि या तो सरकार के खिलाफ आने वाले केस सुनवाई के लिये लिस्टेड ही नहीं होते या फिर उन पर कोर्ट राहत देने में पहले जैसे उदार नहीं रहे हैं। 
   सुप्रीम कोर्ट के एक चीफ जस्टिस ने कहा था कि इंसाफ केवल होना ही नहीं चाहिये बल्कि होता हुआ नजर भी आना चाहिये। इतना तो साफ है कि आज न्याय हो भी रहा हो तो वह नजर नहीं आ रहा है। इतना ही नहीं सरकारों ने संविधान के खिलाफ काम करके भी विरोध के रास्ते बंद कर दिये हैं। मीडिया से लेकर कोर्ट चुनाव आयोग ईडी सीबीआई इनकम टैक्स कई बार सरकार का पक्ष लेते नज़र आते हैं। विपक्षी नेताओं को करप्शन का आरोप लगाकर पहले घेरा जाता है, डराया धमकाया जाता है फिर भी नहीं मानने पर उनको जेल भेज दिया जाता है, उनकी सम्पत्यिां ज़ब्त कर ली जाती हैं, जब वे भाजपा में आ जाते हैं तो उनकी एक एक हज़ार करोड़ की सम्पत्यिां वापस करने के साथ ही उनको पाक साफ घोषित कर विधायक सांसद मंत्री और उपमुख्यमंत्री के साथ सीएम तक बना दिया जाता है। क्या बाबा साहब के संविधान पर चलकर यह सब अनर्थ किया जा सकता है? तमाम सरकारी संस्थान निजी हाथों में सौंपकर आरक्षण खत्म किया जा रहा है? सरकारी पदों पर नियुक्तियों में खुलकर घोटाला बेईमानी गड़बड़ी भाईभतीजावाद जातिवाद और साम्प्रदायिकता का खुला खेल फरूखाबादी बेशर्मी से खेला जा रहा है। पक्ष हो या विपक्ष उनकी सरकारों का करप्शन पक्षपात भेदभाव अन्याय अत्याचार बेईमानी और झूठ कई बार साफ नज़र आता है लेकिन बाबा साहब की दुहाई देंगे।                                      
*0 उसके होंठों की तरफ ना देख वो क्या कहता है,*
*उसके क़दमों की तरफ देख वो किधर जाता है।।*
*0 लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर व पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Friday, 20 December 2024

प्लेसेज ऑफ वरशिप एक्ट

*प्लेसेज़ आॅफ़ वर्शिप एक्ट का भाविष्य: 
कोर्ट नहीं सरकार का रूख़ तय करेगा?* 
0 देश में एक बार फिर मंदिर मस्जिद के कई विवाद खड़े होने लगे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वक्ती तौर पर इन पर स्टे कर दिया है। कुछ लोगों को लगता है कि प्लेसेज़ आफ़ वर्शिप एक्ट के रहते इस तरह के विवाद खड़े ही नहीं होने चाहिये थे। कुछ लोग इस तरह के विवादों को तूल देने के लिये पूर्व चीफ़ जस्टिस चंद्रचूड़ की उस मौखिक टिप्पणी को मानते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि यह एक्ट किसी धर्म स्थल का स्वरूप बदलने से रोकता है लेकिन उसका सर्वे कर सच जानने से नहीं रोकता । इसका नतीजा यह हुआ कि बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद का सर्वे का रास्ता इस टिप्पणी से खुल गया। इसके बाद मथुरा की ईदगाह अजमेर की दरगाह और संभल की जामा मस्जिद से लेकर दिल्ली की जामा मस्जिद तक के सर्वे का मामला निचली अदालतों में पहंुच गया।    
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
1991 में जब पी वी नरसिम्हा राव की कांग्रेस सरकार ने प्लेसेज़ आॅफ़ वर्शिप एक्ट पास किया था तो उस टाइम मुस्लिम धार्मिक संस्थाओं का एतराज़ यह था कि इसमें बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि को शामिल क्यों नहीं किया गया। जबकि यह मामला कोर्ट में विचाराधीन था और इसे भाजपा व संघ परिवार ने बहुत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रखा था जिससे इसको एक्ट से बाहर से रखा गया था। कम लोगों को पता होगा कि उस समय भाजपा ने इस एक्ट का भी यह कहकर विरोध किया था इससे हिंदुओं के आस्था पूजा और एतिहासिक धार्मिक धरोहरों को वापस पाने के मौलिक अधिकार का हनन होगा। लेकिन वह सत्ता में नहीं होने की वजह से इस कानून को पास होने से रोक नहीं सकी थी। आज हालात बदल चुके हैं। भाजपा तीसरी बार सत्ता में आई है। काफी लंबे समय से इस एक्ट को भाजपा की सोच से प्रभावित कुछ वकील सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते रहे हैं। कोर्ट इस एक्ट की संवैधानिकता को परखने के लिये केंद्र सरकार से उसका रूख कई बार जानने के लिये कई साल से समय दे रहा है। लेकिन मोदी सरकार इस पर चुप्पी साधे रही है। आमतौर पर किसी भी दल की सरकार सत्ता में हो संसद से पास हुए किसी भी कानून का बचाव वह करती रही है। लेकिन प्लेसेज़ आॅफ वर्शिप एक्ट के पक्ष में भाजपा शुरू से ही नहीं रही है। 
  इसलिये यह माना जा रहा है कि वह आज नहीं तो कल इसके खिलाफ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के संसद से पास कानून के विरोध की तरह कोर्ट में अपना पक्ष रख सकती है। वह इस एक्ट को खत्म भी कर सकती है। यह भी हो सकता है कि वह इसमें कुछ संशोधन करके हिंदुओं के लिये बहुत महत्व के चंद धार्मिक स्थलों को मस्जिद से बदलकर मंदिर करने के अभियान में कानून के स्तर पर सहयोग करने को खुलकर सामने आये। लेकिन इसमें यह भी आशंका है कि इस पर सुप्रीम कोर्ट अपनी मुहर लगाने से मना कर दे। यह अजीब बात है कि जो लोग इस एक्ट को बनाते हुए यह कहकर विरोध कर रहे थे कि इस एक्ट से बाबरी मस्जिद राममंदिर विवाद को बाहर नहीं रखा जाना चाहिये था। आज वही सबसे अधिक इस कानून का हवाला देकर कह रहे हैं कि इसमें साफ लिखा है कि जो धार्मिक स्थल 15 अगस्त 1947 में जिस स्वरूप में था जिसके पास था जिस धर्म का था वह वही रहेगा। यानी उसको बदला नहीं जा सकता, ऐसा इस एक्ट में लिखा है। इतना ही नहीं अब इस एक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर मस्जिद विवाद में जो कुछ कहा था 
उसका वास्ता देकर भी याद दिलाया जा रहा है कि सबसे बड़ी अदालत ने न केवल यह माना था कि बाबरी मस्जिद किसी मंदिर को तोड़कर नहीं बनाई गयी थी बल्कि यह भी कहा था कि बाबरी मस्जिद को गिराया जाना सरासर कानून का उल्लंघन था। कोर्ट ने यह भी दोहराया था कि इतिहास में सैंकड़ो साल पहले अगर किसी धार्मिक स्थल को तोड़कर कोई दूसरा पूजा स्थल बना भी दिया गया हो तो इतिहास की उस गल्ती को अब सुधारा नहीं जा सकता। साथ ही यह भी कहा था कि यह काम कम से कम अदालतें तो बिल्कुल भी नहीं कर सकतीं। अदालत ने इस एक्ट को देश के धर्मनिर्पेक्ष स्वरूप को बनाये और बचाये रखने के लिये भी अपरिहार्य बताया था। इसलिये 1991 का प्लेसेज़ आॅफ़ वर्शिप एक्ट भविष्य में ऐसे किसी विवाद को पूरी तरह से रोकने के लिये सही बनाया गया है। आज इस एक्ट को यह कहकर ही सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गयी है कि यह एक्ट हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत करता है। यह भी कहा गया है कि यह एक्ट संविधान के खिलाफ बनाया गया है। यहां तक दावा किया गया है कि ऐसा कोई कानून बनाने का संसद को अधिकार ही नहीं था। 
     कुछ लोगों का कहना है कि धार्मिक स्थल जैसे के तैसे रखने की कट आॅफ डेट 15 अगस्त 1947 नहीं 1192 होनी चाहिये जब पृथ्वी राज चैहान जंग हार गये थे। इस पर कुछ लोग यह भी कहते हैं कि फिर तो यह तारीख 712 सन होना चाहिये जब मुहम्मद बिन कासिम पहली बार किसी मुस्लिम राजा के तौर पर भारत आया था। हो सकता है कि रिटायर्ड मुख्य न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने विवादित धार्मिक स्थल का सर्वे करने से 1991 के इस कानून में कहीं भी नहीं रोकने की बात मौखिक रूप से सही कही हो लेकिन उस बात का न्यायिक निर्णय में कही चर्चा ना होेेेेने के बावजूद ऐसे विवादित मामले लोवर कोर्ट में दायर करने और उन पर सर्वे का आदेश जल्दबाज़ी में पास करने की बाढ़ आ गयी जिससे इस एक्ट का मकसद मंशा और मूल आत्मा ही ख़तरे में पड़ गयी। हालांकि अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्टे करके उस भूल को सुधारा है। लेकिन इस एक्ट की संवैधनिकता और इस पर केंद्र सरकार के रूख के जाने बिना सुप्रीम कोर्ट किसी अंतिम निर्णय तक नहीं पहंुच सकता। जिससे देश में ऐसे विवादित मामले थोक में सामने आने और उन पर आपसी टकराव बढ़ने की तलवार अभी भी लटकी हुयी है। 
हालांकि यह भी ज़रूरी नहीं है कि केंद्र सरकार या याचिका कर्ताओं के मात्र यह कहने से सुप्रीम कोर्ट इस कानून को असंवैधनिक मानने को तैयार हो जाये कि इससे हिंदुओं के मौलिक पूजा के अधिकार का हनन होता है। लेकिन इतना ज़रूर है कि देश की एकता अखंडता और भाईचारा व शांति बनाये रखने के लिये यह एक्ट बहुत बड़ी चर्चा का विषय बन गया है। संभल मेें जामा मस्जिद के कोर्ट के दूसरी बार सर्वे के आदेश के बाद जो हिंसा हुयी जिसमें कई लोग मारे गये वह भी अफसोसनाक और निंदनीय है। लेकिन जब तक इस देश की जनता को यह बात समझ नहीं आती कि मंदिर मस्जिद के विवादों से राजनीति को लाभ होता है और जनता के असली मुद्दे दफन हो जाते हैं तब तक सुप्रीम कोर्ट से ही यह आशा की जा सकती है कि वह जनहित देशहित और मानवता के हित में इस तरह के मामलों पर स्थाई और ठोस रोक हमेशा के लिये लगा सकता है।
0 वक्त ऐसा कि बग़ावत भी नहीं कर सकते,
और ज़ालिम की हिमायत भी नहीं कर सकते।।
*नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ़ एडिटर हैं।*

Thursday, 5 December 2024

बढ़ती आर्थिक असमानता

बढ़ रही है आर्थिक असमानता, पूंजीवाद इस सच को नहीं मानता!
0 जी 20 सम्मेलन मंे ब्राजील के पीएम लूला डी सिल्वा ने दुनिया में बढ़ती आर्थिक असमानता के लिये पूंजीवाद को ज़िम्मेदार बताते हुए बड़े कारापोरेट घरानों और पूंजीपतियों पर सुपर रिच टैक्स यानी सम्पत्ति कर की मांग की है। आपको याद दिलादें फिलहाल ब्राजील के पास ग्रुप 20 की अध्यक्षता है। ग्रुप की इनइक्विलिटी सम्मिट में यह प्रस्ताव रखा गया था। हमारे देश में मोदी सरकार ने उल्टा बड़े पूंजीपतियों पर टैक्स कम कर दिया है। साथ ही अडानी अंबानी जैसे चंद पूंजीपतियों को सरकार का संरक्षण मिल रहा है। जिससे इनकी सम्पत्ति दिन दूनी रात चैगुनी बढ़ती जा रही है। भारत इस सच से हमेशा आंखें चुराता है लेकिन अब वित्तमंत्री और आरबीआई के गवर्नर इस गंभीर मुद्दे पर चर्चा करने केे लिये मजबूर हो गये हैं।    
 *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
     दुनिया की पूरी इकाॅनोमी लगभग 100 ट्रिलियन डालर है। इनमें सबसे अधिक अर्थव्यवस्था अमेरिका की 30 ट्रिलियन तो चीन की 20 ट्रिलियन डालर है। भारत की इकाॅनोमी मात्र 3.6 ट्रिलियन डालर है। जो कि विश्व में पांचवे स्थान पर आती है। आंकड़ों से समझा जा सकता है कि पूरी दुनिया की कुल दौलत में से आधी अकेले अमेरिका और चीन के पास है। जी 20 की बैठक में शामिल होने वाले दुनिया के तमाम देशों के वित्तमंत्री और सेंटरल बैंकों के गवर्नर के नाम हैं। हमारे देश में न केवल पूंजीवाद चल रहा है बल्कि खुलकर आवारा पूंजी अपना खेल खेल रही है। हालत अब यह है कि पहले पूंजीपति राजनीतिक दलों को चंदा देकर कुछ काम निकाल लिया करते थे। लेकिन अब वे बाकायदा सत्ताधरी दल को इतना बड़ा चंदा देेे रहे हैं कि सरकार उनके हिसाब से न केवल बन रही गिर रही है बल्कि नीतियां भी उनकी सुविधा संरक्षण और लाभ को केंद्र में रखकर बन रही है। मोदी भाजपा और संघ को इस बात से कोई समस्या नहीं है। मोदी तो एक बार आवेश में यहां तक कह चुके हैं कि क्या अमीरों को गरीब कर दे सरकार? दरअसल मोदी का आर्थिक माॅडल शुरू से ही अडानी जैसे पंूजीपतियों को खुला संरक्षण देकर उनसे पार्टी के लिये बेतहाशा चुनावी चंदा लेकर सत्ता में आना और संघ का एजेंडा आगे बढ़ाना रहा है। उनको बढ़ती आर्थिक असमानता से कोई सरोकार नहीं है। उनको घटते रोज़गार से भी कोई प्राॅब्लम नहीं है। 
विडंबना यह है कि मोदी इस मामले में अकेले नहीं हैं बल्कि पूरी दुनिया खासतौर पर अमेरिका ब्रिटेन यूरूप जी 20 के अधिकांश देश पूंजीपतियों के साथ ही खड़े हैं। आॅक्सफेम की आर्थिक सर्वे रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में आर्थिक असमानता अश्लीलता की सभी सीमायें पार कर गयी है। सर्वे के अनुसार पिछले दस साल में विश्व के एक प्रतिशत अमीरों ने कुल 42 प्रतिशत दौलत जोड़ी है। दुनिया के 50 प्रतिशत बाॅटम के लोगों के पास जितनी दौलत है उससे 34 गुना अधिक सम्पत्ति इन चंद धनपतियों के पास है। लोकसभा चुनाव के दौरान जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने यही बात बोली थी तो भाजपा ने उनको ऐसे घेरा जैसे वे कोई देश विरोधी बात कह रहे हैं? पीएम मोदी ने तो राहुल गांधी के इस बयान को साम्प्रदायिक रंग देकर यहां तक कह दिया था कि वे हिंदूआंे की सम्पत्ति छीनकर मुसलमानों को बांटना चाहते हैं। सच यह है कि हिंदुत्व की आड़ में संघ परिवार भाजपा और मोदी चंद पूंजीपतियों के हित में अधिक काम कर रहे हैं। लेकिन सत्ता की पाॅवर अपने पुलिस प्रशासन और गोदी मीडिया के बल पर वे दुष्प्रचार के सहारे जनता को ऐसा महसूस कराते हैं जैसे उनसे बड़ा हिंदू समर्थक कोई दूसरा नहीं है। वे सभी गैर भाजपा दलों विपक्षी नेताओं सेकुलर हिंदुओें को हिंदू विरोधी देश विरोधी और करप्ट बताते हैं लेकिन इन दलों के साथ चुनावी गठबंधन करने में उनको तनिक भी संकोंच नहीं होता। 
साथ ही जिन विरोधी नेताओं को वे बेईमान हिंदू विरोधी और राष्ट्र विरोधी तक बताते रहते हैं उनके भाजपा में आने पर बेशर्म से चुप्पी साध लेते हैं। उनके खिलाफ पहले से दर्ज करप्शन के केस बंद कर क्लीन चिट दे दी जाती है। जी 20 में आर्थिक असमानता का मुद्दा चर्चा का विषय बन जाने पर मोदी सरकार मजबूरी में इस पर अपना पक्ष रख रही है। लेकिन इससे पहले उनकी सरकार आॅक्सफेम की रिपोर्ट को झुठला चुकी है। अब खुद सरकार के आर्थिक सर्वे में भी जब यही बात बार बार उभरकर सामने आ रही है कि आर्थिक असमानता वास्तव में है। यह बढ़ती भी जा रही है। ऐसे में मोदी सरकार के लिये इस मुद्दे से आंखे चुराना अधिक दिन संभव नहीं होगा। जी 20 में यह चर्चा हो रही थी कि दुनिया के कुल 3000 अरबपतियों पर 2 प्रतिशत सुपर रिच टैक्स लगाकर 200 से 250 बिलियन डालर जुटाये जा सकते हैं। मोदी सरकार के तमाम दावों वादों और आश्वासनों के बावजूद देश में बढ़ती बेरोज़गारी महंगाई और गरीबी से जनसंख्या के बड़े हिस्से का जीवन यापन करने को ज़रूरी आय अनाज कपड़ा मकान शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च असहनीय होता जा रहा है। 
हालत यह है कि देश के मीडियम क्लास का साइज़ कम होने लगा है। बड़ी बीमारी नौकरी छूटने या अचानक बड़ा नुकसान होने से तीन करोड़ लोग हर साल मीडियम क्लास से निधर््ान वर्ग में आ जाते हैं। आंकड़े बताते हैं कि केवल जीडीपी बजट और इकाॅनोमी का साइज़ बढ़ने से नहीं बल्कि संसाधनों अर्जित धन और सम्पत्ति के न्यायपूर्ण बंटवारे से ही समग्र समाज का भला हो सकता है। नेशनल संैपल सर्वे आॅफिस एनएसएसओ उपभोग के आंकड़ों के आधार पर आय का विवरण तय करता है लेकिन नई स्टडी इसको ठीक पैमाना नहीं मानती। आर्थिक जानकारों का कहना है कि लोगोें की आय का बड़ा हिस्सा ऐसी मदों में चला जाता है जिसका कंज़प्शन से सीधा सरोकार नहीं होता है। इस मामले में नेशनल काउंसिल आॅफ एप्लाइड इकाॅनोमिक रिसर्च और प्युपिल रिसर्च आॅफ इंडियाज़ कंज्यूमर इकाॅनोमी हाउस होल्ड इनकम के आंकड़े बेहतर पैमाना अपनाने से अधिक कारगर और विश्वसनीय हैं। इससे भारत जैसे विभिन्न क्षेत्रोें आर्थिक स्तरों और सामाजिक वर्गों का आय का स्तर ठीक से समझने में आसानी हो जाती है। विश्व असमानता के आंकड़े भी नेशनल एकाउंट टैक्स रिकाॅर्ड और पंूजीगत आय पर निर्भर होते हैं। इससे पहले कि दुनिया में दस्तक दे रही मंदी बड़ी विकराल समस्या का रूप धारण कर ले भारत जी 20 के देश नाटो देश यूरूपीय यूनियन से जुड़े देश अमेरिका ब्रिटेन चीन रूस फ्रांस अरब देशों को चाहिये कि वे आर्थिक असमानता को रोकने सबको रोज़गार देने और अमीरों पर सुपर रिच टैक्स लगाकर गरीबों को उनके खातों में सीध्ेा मदद भेजने की व्यवस्था सुनिश्चित करें नहीं तो पंूजीवाद भी समाजवाद की तरह धरती से उखड़ना शुरू हो जायेगा।
0 हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये,*
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये।*
नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।

Saturday, 30 November 2024

बढ़ती बेरोजगारी

सरकारी आंकड़ों की जादूगरी जारी, 
फिर भी बढ़ती जा रही है बेरोज़गारी?
0 मोदी सरकार जब से सत्ता में आई है तब से वादों दावों और नारों के साथ फर्जी आंकड़ों की जादूगरी से जनता को ऐसा अहसास कराया जा रहा है। मानो सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा हो। इसके बावजूद देश में महंगाई बेरोज़गारी और गरीबी बढ़ती ही जा रही है। सच यह है कि काॅरपोरेट सैक्टर ने हर साल 1,45,000 करोड़ का टैक्स बचाकर भी नया निवेश नहीं किया है। जिससे रोज़गार के अवसर नहीं बढ़ रहे हैं। 2013 से 2022 तक उत्पादन क्षेत्र में मात्र 32 लाख रोज़गार पैदा हुए हैं। 18 प्रतिशत लोग घरेलू तौर पर अवैतनिक काम में लगे हैं। बड़े वाहनों की बिक्री घट रही है। मीडियम क्लास की तादाद भी कम होने लगी है। लेकिन सरकार धर्म की राजनीति कर चुनाव जीतने में लगी है।    
*-इक़बाल हिंदुस्तानी*
आर्थिक सर्वेक्षण बता रहा है कि सरकार रोज़गार के अवसर बढ़ाने में लगातार नाकाम हो रही है। दस साल से स्किल इंडिया चलने का दावा किया जा रहा है लेकिन 51.25 प्रतिशत युवाओं में नौकरी पाने लायक ज़रूरी योग्यता व क्षमता ही नहीं है। सरकार इसका ठीकरा राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र पर फोड़कर अपना पल्ला झाड़ रही है। इसका दुष्परिणाम यह है कि एआई कौशल क्षेत्र में उल्टा नौकरी कम हो रही हैं। 11 करोड़ रोज़गार कृषि और 06.5 करोड़ एमएसएमई यानी कुल 94 प्रतिशत असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। वित्तमंत्री विपक्ष के बेरोज़गारी के आंकड़ों को विश्वसनीय नहीं मानती लेकिन सवाल यह है कि खुद सरकार के पास भी कोई अधिकृत आंकड़ा क्यों नहीं है। 2017 में सरकार को अरविंद पनगढ़िया ने रोज़गार के आंकड़े दिये थे। जिनको सरकार ने सार्वजनिक न कर ठंडे बस्ते में डाल दिया था। हर दस साल में जनगणना के दौरान ही नियमित रोज़गार और हर पांच साल मेें अनिगमित क्षेत्र के रोज़गार की गणना कराई जाती रही है। लेकिन 2021 में यह कोरोना की वजह से नहीं होने से यह आंकड़ा भी सामने नहीं आ सका है। एक जानकारी के अनुसार 2020 से 2023 तक काॅरपोरेट का लाभ टैक्स छूट से बढ़कर चार गुना तक पहुंच गया है। लेकिन काॅरपोरेट ने न तो नई नौकरियां दीं और न ही पुराने कर्मचारियों का वेतन अपने बढे़ लाभ के अनुपात में बढ़ाया। अरविंद सुब्रमण्यम का कहना है कि इस सरकार में दो खास काॅरपोरेट घरानों को सरकार का खुला संरक्षण मिलने से अन्य उद्योग स्वामी निवेश करने से बचने लगे हैं। 
सरकारी नीतियां इन दो उद्योग समूह के हिसाब से ही बन रही हैं जिससे मीडिया से लेकर पोर्ट एयरपोर्ट टेलिकाॅम और सीमेंट जैसे कई बड़े क्षेत्रों पर इन दोनों का एकतरफा कब्ज़ा हो गया है। हालत यह है कि 2014 से 2023 तक काॅरपोरेट कर घटकर 26 प्रतिशत होने से व्यक्तिगत कर बढ़कर 35 प्रतिशत आ रहा है। काॅरपोरेट एक तो नई नौकरी नहीं दे रहा अगर देता भी है तो संविदा पर सेवा कराने का चलन बढ़ता जा रहा है। आॅनलाइन कारोबार बढ़ते जाने से असंगठित क्षेत्र की 16 लाख नौकरी हाल में चली गयी हैं। जानकार बताते हैं कि देश में हर साल 79 से 81 लाख नये रोज़गार की ज़रूरत होती है। विडंबना यह है कि जिस देश में 80 करोड़ से अधिक लोग सरकारी निशुल्क राशन पर जीवन गुज़ारने पर मजबूर हांे वहां उपभोक्ता बाज़ार कैसे बढ़ेगा? यह भी अर्थशास्त्र का सिध्दांत है कि जब तक खपत नहीं बढ़ेगी नया निवेश कर नया उत्पादन कौन कंपनी और क्यों बढ़ायेगी? यानी नया रोज़गार और नौकरी बढ़ने की संभावना कैसे पैदा होगी? एनसीआरबी का आंकड़ा बता रहा है कि बेरोज़गारी की वजह से 2018 में हर दो घंटे में तीन बेरोज़गार जान देते थे अब यह आंकड़ा बढ़कर एक घंटे में दो बेरोज़गारों की आत्महत्या पर पहंुच गया है। 
   सरकार का झूठ इससे भी पता चलता है कि 2016-17 में काम करने वाली कुल आबादी देश में जहां 42.79 प्रतिशत यानी 40 से 41 करोड़ थी वह 2023-24 में बढ़कर मात्र 41 से 42 करोड़ बताई जा रही है। जबकि वास्तविक काम करने वाली जनसंख्या 55 से 60 प्रतिशत होती है। सरकार ने पिछले दिनों आरबीआई के एक सर्वे का हवाला देते हुए दावा किया था कि पिछले 3 से 4 साल में 8 करोड़ रोज़गार पैदा हुए हैं। सच यह है कि रिज़र्व बैंक ऐसा कोई सर्वे नहीं करता है। यह सरकार को खुश करने और जनता को गुमराह करनेे के लिये पीएलएफएस के आंकड़ों को ही तोड़ मरोड़कर मन माफिक परिणाम निकाल कर परोसने की राजनीतिक कला है। इन आंकड़ों में एक खेल यह किया जाता है कि जो अनपेड लेबर है उसको भी स्वरोज़गार में जोड़कर आंकड़ा काफी बढ़ा चढ़ाकर दिखाया जाता है। मिसाल के तौर पर जो लोग अपने परिवार के मुखिया की खेती या दुकान या ठेले पर काम में बिना किसी वेतन के हाथ बंटा देते हैं उनके श्रम की गणना नये रोज़गार के तौर पर कर ली जाती है। जबकि वास्तविकता यह है कि इससे किसी को नया रोज़गार तो मिला ही नहीं होता। यह कोई देखने को तैयार नहीं है कि भारत की 45 प्रतिशत से अधिक आबादी खेती करती है जबकि जीडीपी में उसकी भागीदारी मात्र 15 प्रतिशत है तो इससे यह असमानता और विषमता कैसे दूर होगी? इससे इस बड़े क्षेत्र की उत्पादकता भी कम रह जाती है। 
सरकार इपीएफ में दर्ज होने वाले नामों को भी नया रोज़गार मानकर आंकड़ों में हेरफेर करती रहती है। जबकि सबको पता है कि जो लोग पहले से संविदा या अनियमित सेवा दे रहे हैं। उनके रोज़गार नियमित होने पर उनका नाम कर्मचारी भविष्यनिधि संगठन में दर्ज करना अनिवार्य होता है। मनरेगा के 50 से 100 दिन के काम को भी कुछ संगठन नये रोज़गार पाने वालों में जोड़कर रोज़गार पाने वालों का फर्जीवाड़ा करते हैं। कोरोना लाॅकडाउन में जब तमाम लोगों के रोज़गार बड़े पैमाने पर चले गये तो उनका आंकड़ा तो बेरोज़गारों में जोड़ा नहीं गया लेकिन जिन लोगों ने मनरेगा छोटी दुकान या ठेला लगाया उनको नये रोज़गार में शामिल कर रोज़गार बढ़ने का ढोल पीट दिया गया।
0 तसल्ली देने वाले तो तसल्ली देते रहते हैं,
 मगर वो क्या करे जिसका भरोसा टूट जाता है।
 नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।

रेवड़ी से जीते झारखंड और महाराष्ट्र

महाराष्ट्र लाडली बहन योजना से, 
झारखंड मईया सम्मान से जीते?
0 महाराष्ट्र में एनडीए और झारखंड में इंडिया गठबंधन की जीत को एक एक से बराबर कहना ठीक नहीं होगा। महाराष्ट्र न केवल बहुत बड़ा राज्य है बल्कि वह मुंबई के देश की आर्थिक राजधानी कहलाने से बहुत अधिक अहम भी है। साथ ही वहां शिवसेना और एनसीपी के बंटवारे से यह देखना भी रोचक था कि मराठी जनता किसको असली दल मानती है। हालांकि लोकसभा चुनाव में 48 में से 30 सीट जीतकर कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने अपनी बढ़त साबित कर दी थी लेकिन उसको यह नहीं भूलना चाहिये था कि सीटों में डेढ़ गुना से अधिक अंतर होने के बावजूद दोनों गठबंधन के वोटों मंे मात्र एक प्रतिशत का ही फ़र्क था। महाराष्ट्र की जीत में लाडली बहन योजना तो झारखंड में मइया सम्मान योजना इंडिया गठबंधन की जीत में बड़ी वजह बनी है।    
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
    महाराष्ट्र की भारी बहुमत वाली बंपर जीत से पीएम मोदी भाजपा संघ परिवार शिवसेना शिंदे गुट और एनसीपी अजित पवार गुट ने एनडीए को हरियाणा के बाद एक और लाइफलाइन देकर यह साबित कर दिया है कि पिछले लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन की बढ़त और भाजपा का संसद में बहुमत के आंकड़े से कुछ पीछे रह जाना महज़ एक अपवाद संयोग और विपक्ष का संविधान खतरे मंे बताकर दलितों आदिवासियों व कुछ पिछड़ों को अपनी तरफ मोड़ लेेने का दांव तात्कालिक क्षणिक और सियासी जुगाड़ था। हालांकि झारखंड में भाजपा का बंग्लादेशी घुसपैठिये आदिवासियों की रोटी बेटी और माटी छीन लेंगे का नारा नाकाम रहा। वहां लोगों ने भाजपा के घोर झूठे और सांप्रदायिक फर्जी दुष्प्रचार को भाव न देकर आदिवासी अस्मिता और क्षेत्रीयता को महत्व दिया है। लोगों ने भाजपा के साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पर इस लिये भी कान नहीं दिये कि अगर वास्तव में घुसपैठ हो भी रही है तो यह केंद्र सरकार की नाकामी है। साथ ही झारखंड मुक्ति मोर्चा के मुखिया और राज्य के सीएम हेमंत सोरेन को केंद्र द्वारा कथित करप्शन के आरोप में जेल भेजे जाने का गुस्सा भी भाजपा के खिलाफ गया। इसके साथ ही आदिवासी जेएमएम सरकार की कल्याणकारी योजनाओं जैसे मय्या सम्मान से भी संतुष्ट नज़र आये। हालांकि यह कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा कि महाराष्ट्र में महायुति गठबंधन की कार्यशैली से खुश होकर मराठी जनता ने इतना ज़बरदस्त बहुमत एनडीए को दिया है। 
सच तो यह है कि महायुति का सत्ता में होना इस दौरान जनकल्याण की कई आकर्षक योजनायें जैसे महिलाओं को खुश करने वाली लाडली बहना योजना लागू करना केंद्र का उसको हर तरह से सहयोग करना बंटेंगे तो कटेंगे जैसे नारों का महाराष्ट्र के चुनाव में पहुंच जाना और पीएम का इसी नारे को थोड़ा परिष्कृत कर एक हैं तो सेफ हैं के ज़रिये खुलकर हिंदू वोट बैंक की राजनीति करना चुनाव आयोग का सत्ताधारी दल के पक्ष में पूरी बेशर्मी से झुक जाना काॅरपोरेट और खासतौर पर अडानी पर मंुबई की धारावी झुग्गी झोंपड़ी का पुनर्निर्माण का ठेका बचाये रखने के लिये अपनी तिजोरी का मंुह खोल देना सत्ताधारी दल पर अकूत धन से वोट खरीदने का आरोप गोदी मीडिया का सत्ता के पक्ष में विपक्ष पर दिन रात झूठे आरोप लगाना बदनाम करना जनविरोधी बताना देशद्रोही तक कहना ईडी सीबीआई और इनकम टैक्स के ज़रिये विरोधी नेताओं उनको चंदा देने वालों और उनका साथ देने वालों को निशाने पर लेने से लेकर तरह तरह के हथकंडे अपनाकर साम दाम दंड भेद से किसी कीमत पर भी चुनाव जीतने का अभियान एनडीए के पक्ष में गया है। अगर निष्पक्षता ईमानदारी और बिना पूर्वाग्रह के देखें तो साफ नज़र आ रहा है कि सत्ताधरी दल का मुकाबला विपक्ष करने की स्थिति में नहीं था। उसको लोकसभा चुनाव में बढ़त मिलने से उसका नैतिक बल ज़रूर बढ़ गया था। 
कांग्रेस अधिक से अधिक सीट पर लड़कर राज्य में अपना महत्व फिर से वापस लाना चाहती थी। शिवसेना ठाकरे भी इसी कोशिश में थी। उधर शरद पवार पर जब से यह आरोप लगा कि 2019 में अडानी के घर हुयी बैठक में वे नई सरकार बनाने की योजना में शामिल थे तो जानकारों का यहां तक कहना है कि वे मोदी से अपने अच्छे रिश्ते की वजह से जानबूझकर अपने भतीजे अजित पवार को दिखावे की बगावत करके एनडीए गठबंधन में भेजने को अपनी मर्जी से तैयार हुए थे। उधर दलितों की सबसे बड़ी पार्टी बहुजन अघाड़ी इंडिया गठबंधन से अलग चुनाव लड़कर एनडीए गठबंधन की जीत का रास्ता तैयार करने में लगी थी। साथ ही मुस्लिम वोटों के ठेकेदार बनकर भाजपा का खेल खेलने वाले एमआईएम के कई प्रत्याशी इंडिया गठबंधन के वोट काटकर महायुति की मदद करने में शर्म महसूस नहीं कर रहे थे। इसके अलावा कांगे्रस और उसके साथी घटक अपने विद्रोही उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से रोकने या एक दूसरे के वोट बैंक को नुकसान पहंुचाने से बाज़ नहीं आये। हालांकि यही काम भाजपा और एनडीए के दूसरे घटकों ने भी कम या अधिक किया है लेकिन भाजपा व महायुति के पास ऐसे बागी प्रत्याशियों को सत्ता से धमकाने या ललचाने का एक अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध था जिससे महाविकास अघाड़ी वंचित था। 
कुल मिलाकर चुनाव नतीजों का विश्लेषण टीका टिप्पणी और क्या हुआ कैसे हुआ क्यों हुआ अभी आंकड़े विस्तार से आने तक चलता रहेगा लेकिन एक बात साफ हो गयी है कि भाजपा और उसके गठबंधन एनडीए के पास जो शक्ति सत्ता और संसाधन हिंदुत्व का तड़का लगाने तक सरकारी एजंसियों के दुरूपयोग के उपलब्ध हैं वे इंडिया गठबंधन के पास न तो हैं और न ही साम्प्रदायिक कट्टर और नफरत का कार्ड विपक्ष सेकुलर होने की वजह से खेल सकता है लिहाज़ा ऐसा लगता है कि भाजपा अभी लंबे समय तक राज करती रहेगी चाहे इसके लिये उसे ‘कुछ भी’ करना पड़े। कल तक पीएम मोदी भाजपा और तथाकथित संघी मानसिकता के अर्थशास्त्री जिन जनहित की योजनाओं को राज्यों के बजट का दिवाला निकालने वाला और रेवड़ी कल्चर कहकर मज़ाक उड़ाया करते थे। आज उन योजनाओं के सहारे ही जब भाजपा एक के बाद एक राज्य का चुनाव जीत रही है तो उसको जनता को नकद सहायता देकर अर्थव्यवस्था को गति देने वाला बताया जा रहा है। जबकि महाराष्ट्र में 7 लाख करोड़ का बजट घाटा पहले ही चल रहा है। 
     जब 2019 में राहुल गांधी ने पहली बार न्याय योजना के नाम से देश के सबसे गरीब 5 करोड़ परिवारों को हर साल 72000 रूपये देने का एलान किया था तो उस योजना का जमकर भाजपा ने विरोध किया था। महाराष्ट्र में इसीलिये चुनाव हरियाणा व कश्मीर के साथ नहीं कराया गया था। महाराष्ट्र में कुल 4.69 करोड़ महिला मतदाता हैं। राज्य में 21 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे रहती है। 52 लाख नई महिलायें इस बार चुनाव में पहली बार वोटर बनी हैं। वहां ढाई करोड़ से अधिक महिलाओं को 1500 रूपये के हिसाब से कुल पांच किश्तों में 7500 रूपये दिये जा चुके हैं। साथ ही चुनाव जीतने पर यह राशि बढ़ाकर 3000 करने का वादा भी किया गया है। यही वजह है कि महिलाओं के मत पुरूषों से 6 प्रतिशत अधिक डाले गये हैं। ज़ाहिर बात है कि इनमें से अधिकांश सत्ताधारी महायुति के पक्ष में गये होंगे। लेकिन यह सवाल अपनी जगह है कि जिस राज्य में 6 माह में 1267 किसानों ने आत्महत्या की हो और बेरोज़गारी चरम पर हो वहां उन पुरूषों को ऐसी कोई नकद सहायता क्या सोचकर नहीं दी गयी है? 
 नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।

Thursday, 14 November 2024

चौहान साहब होते तो....

चैहान साहब आज होते तो कट्टरपंथियों के निशाने पर होते!

0 वरिष्ठ पत्रकार चिंतक और ललित निबंध लेखक स्व. बाबूसिंह चैहान जब तक जीवित रहे अपनी लेखनी बिना यह देखे निष्पक्षता स्पश्टता और मानवता के पक्ष में चलाते रहे कि उनके सच लिखने से किस वर्ग के कट्टरपंथी नाराज़ हो जायेंगे। बाबूजी तो यहां तक कहा करते थे कि अगर उनके लिखने बोलने और कार्य करने से संप्रदायवादी जातिवादी और फासिस्ट तत्व खफ़ा होते हैं तो समझ जाना चााहिये कि वे अपने मिशन पर सही जा रहे हैं। उनका कहना था कि जिस दिन यथास्थितिवादी और अंधवश्विासी लोग आपकी सराहना करने लगे समझ लीजिये आप अपने सत्य तथ्य और प्रमाण्किता के रास्ते से भटक चुके हैं। यही वजह है कि ऐसा माना जाता है कि चैहान साहब आज होते तो कट्टरपंथियों के निशाने पर होते। *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
कहने को देश में लोकतंत्र है। चुनाव भी हो रहे हैं। मीडिया है। न्यायपालिका है। संविधान है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। अखबार छप रहे हैं। टीवी चैनल चल रहे हैं। लेकिन सच इन सबमें गुम सा हो गया है। चैहान साहब आज जीवित होते तो इन मूल्यों लक्ष्यों और उसूलों के लिये लड़ रहे होते। हालांकि उनकी सोच के चंद लोग अपवाद स्वरूप आज भी पूरी तरह पंूजीवाद लाभ और स्वार्थ को लात मारकर न्याय समाजवाद और सौहार्द की लड़ाई लड़ रहे हैं। बिजनौर टाइम्स और चिंगारी जैसे उनके लगाये पौधे भी वटवृक्ष बन गये हैं। उनके सुपुत्र श्री चंद्रमणि रघुवंशी और श्री सूर्यमाणि रघुवंशी भी उनकी विचारधारा को आगे बढ़ा रहे हैं। बि.टा. ग्रुप से जुड़े आॅफिस फील्ड के पत्रकार समाचार पत्र वितरक हाॅकर विज्ञापनदाता लेखक कवि और सबसे बढ़कर पाठकों का एक बड़ा वर्ग इन विषम परिस्थितियों में भी मिशनरी पत्रकारिता के साथ खड़ा है। यह इस बात का प्रमाण है कि झूठ की आंधी चाहे जितनी भी प्रचंड हो लेकिन वह सच के दिये को बुझा नहीं सकती। आज का दौर ऐसा दौर है। जिसमें सत्ता में ऐसे लोग हावी हैं। जिनका विश्वास संविधान लोकतंत्र और समानता में नहीं है। उनका काॅरपोरेट के साथ एक काॅकटेल बन गया है। उन्होंने मीडिया के साथ ही पुलिस और प्रशासन न्यायपालिका और जांच एजंसियों सहित लगभग सभी सरकारी संस्थानों को बंधक बना लिया है।
वे विपक्ष या असहमति के आवाज़ को दुश्मन मानते हैं। ऐसे में अधिकांश पिं्रट और इलैक्ट्राॅनिक मीडिया ने उनके सामने घुटने टेक दिये हैं। इसका समीकरण बहुत सीधा है। पहले दूरदर्शन और आकाशवाणी को सरकार का भोंपू माना जाता था। जब ये दोनों सरकार का राग दरबारी छेड़ते थे तो किसी को बहुत हैरत भी नहीं होती थी। यही वजह है कि आज के दौर में इनकी विश्वसनीयता रसातल में जा चुकी है। लेकिन जब उदारीकरण का दौर शुरू हुआ तो लोगों को लगा था कि अब सरकारी मीडिया की मनमानी पर लगाम लगेगी। शुरू में कुछ दिन यह आशा फलीभूत होती भी नज़र आई लेकिन फिर एक दिन ऐसा आया जब सत्ता और पूंजीपतियों ने हाथ मिला लिया। ऐसे में सत्ता पूंजीपतियों को कानून ताक पर रखकर लाभ देने लगी और बदले में पूंजीपतियों ने न केवल अपनी तिजोरी का मंुह खोल दिया बल्कि सत्ता की चाकरी में अपने अखबार और चैनलों को पूरी तरह से सरकार के कदमों में बिछा दिया। इसी का अंजाम यह हुआ कि निजी मीडिया झूठा नफरती और फर्जी आंकड़ों का रोबोट बन गया है। आज पूरी बेशर्मी बेहयाई और निर्लजता से गोदी मीडिया सरकार की गोद में बैठा है। ऐसे में बाबूजी याद आते हैं। उनको आप किसी तरह के लालच और डर से अपने मकसद से डिगा नहीं सकते थे। वे होते तो सच लिखते। बड़े बड़े अखबारों और टीवी चैनलों की पोल खोल देते। उनके इस अभियान से सरकार नाराज़ होती। सांप्रदायिक और फासिस्ट शक्तियां उनको निशाने पर लेती लेकिन वे हार मानने वाले नहीं थे। 
हालांकि उनके दिखाये रास्ते पर ही आज बिजनौर टाइम्स और चिंगारी चल रहे हैं। इन दोनों अखबारों को भी अपने उसूलों सच और न्याय का साथ देने की कीमत चुकानी पड़ रही है। मुझे याद आ रहा है कि एक बार चैहान साहब ने भुखमरी के दौर में एक आदमी के रोटी चुराने के मामले को लेकर एक खबर छाप दी थी कि भूखा मानव क्या करेगा? इस पर तत्कालीन अधिकारी उनसे खफा हो गये थे। उनका आरोप था कि चैहान साहब जनता को अनाज चोरी और लूट के लिये भड़का रहे हैं। लेकिन चैहान साहब तो एक ज़िम्मेदार संवेदनशील और मानवतावादी पत्रकार का अपना कर्तव्य पूरा कर रहे थे। ऐसा ही शायद उनके जीते आज होता जब वे अन्याय अत्याचार और पक्षपात के खिलाफ खुलकर लिखते बोलते तो शासन प्रशासन के निशाने पर आने के साथ ही उस कट्टर सोच के लोगों की आंख की किरकिरी बन जाते जो सबको अपने हिसाब से हांकना चाहते है। वे बुल्डोज़र के विध्वंस के खिलाफ बहुत तीखा लिखते। वे माॅब लिंचिंग को लेकर सवाल खड़ा करते। वे चुनाव आयोग के पक्षपात पर चुप नहीं रहते और ईडी व सीबीआई के गलत इस्तेमाल पर जमकर आवाज़ उठाते चाहे इसके लिये उनको विपक्षी दलों का साथ देने वाला ही क्यों कहा जाता। वे न्यायपालिका के स्लैक्टिव निर्णयों पर भी कलम चलाने से खुद को नहीं रोक पाते चाहे इसकी कीमत उनको कोर्ट की मानहानि का मुकदमा झेलकर ही क्यों चुकानी पड़ती। वे अडानी अंबानी जैसे चंद पूंजीपतियों को सारे संसाधन बैंक लोन और देश की नवरत्न कंपनियां औने पौने दामों में सौंप दिये जाने का भी मुखर विरोध करते चाहे इसके लिये उनको उनके अंदर का कम्युनिस्ट एक बार फिर जाग जाने का उलाहना ही क्यों ना दिया जाता। 
वे कई वरिष्ठ वकीलों लेखकों मानवाधिकारवादियों और स्वतंत्र सेवा करने वालों को झूठे आरोप लगाकर जेल भेजने और सालों तक बंद रखने का हर हाल में विरोध करते चाहे इसके लिये उनको अरबन नक्सल का समर्थक ही क्यों ना बताया जाता। वे बारी बारी से सबके निशाने पर आते लेकिन उच्च जातियों के गरीबों पिछड़ों वर्ग के कमजोरों दलितों के पीड़ितों और अल्पसंख्कों के साथ होने वाले पक्षपात पर लगातार कलम चलाते रहते चाहे इसके लिये उनको सरकार के कोपभाजन का शिकार ही क्यों होना पड़ता। खास बात यह थी कि वे केवल कलम ही नहीं चलाते थे बल्कि आवश्यकता पड़ने पर सड़क पर उतरकर आंदोलन करना और जेल भरो अभियान चलाना भी उनको आता था। आज वे होते तो यह कदम उठाने से भी नहीं हिचकते। बिजनौर ज़िले की शान मिशनरी पत्रकारिता के जनक और लेखक व चिंतक श्री बाबूसिंह चैहान का नाम आज यूपी ही नहीं पूरे देश में मान सम्मान कलम के ज़रिये समाजसेवा समाज सुधार और युग परिवर्तक के पहचाना जाता है। उनके सहित्य की चर्चा करें तो गिनाने के लिये बहुत लंबी सूची है। कहने का मतलब यह है कि चैहान साहब कोई साधारण पत्रकार लेखक या काॅमरेड नहीं थे। वे अगर आज होते तो उनको यह माहौल घुटनभरा लगता जिसमें पत्रकारिता मिशनरी से व्यवसायिक ही नहीं पूरी बेशर्मी और निर्लजता से चाटुकारिता नफ़रत और समाज को बांटने के काम में लगी है। उनको यह सब किसी कीमत पर सहन नहीं होता और वे इस पतन बेहयायी और समाज विरोधी पत्रकारिता का जमकर विरोध करते। चैहान साहब के लिये गोदी मीडिया का यह दौर असहनीय इसलिये भी होता क्योंकि वे जब जब टीवी चैनल और सरकार के गुलाम बन चुके अधिकांश हिंदी व क्षेत्रीय समाचार पत्र देखते पढ़ते तो उनको ऐसा लगता मानो आज भारत मंे सच लिखना बोलना और उस पर चर्चा करना अपराध बन गया है। जब हम उनके मार्गदर्शन में चिंगारी बि.टा. के संपादन में सहयोगी के तौर पर डेस्क पर काम करते थे तो कभी कभी वे अपने पुराने अनुभव साझा किया करते थे। कहते थे अगर वे चाहें भी तो भी किसी तानाशाह के पक्ष में नहीं लिख सकते। हालांकि उस दौरान भी अख़बार में वे आपातकाल के खिलाफ लिखने से बाज़ नहीं आये।

0 मैं चुप रहा तो मुझे मार देगा मेरा ज़मीर,

  गवाही दी तो अदालत में मारा जाउूंगा।।

 *0 लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक हैं।*

बुलडोजर पर सुप्रीम ऑर्डर

सुप्रीम आॅर्डर से रूकेगा बुल्डोज़र या सरकारें बाईपास निकाल लेंगी?
0 सबसे बड़ी अदालत ने मनमाना बुल्डोज़र चलाने के खिलाफ सख़्त रूख़ अपनाते हुए व्यापक दिशा निर्देश जारी कर दिये हैं। लेकिन जानकारों को शक है कि इसके बावजूद बुल्डोज़र आरोपियों के घर पर चलने से रूक जायेगा या सरकारें कोर्ट के अन्य आदेशों निर्देशों और रूलिंग के खिलाफ पहले की तरह बाईपास निकालकर संविधान के खिलाफ मनमर्जी चलाती रहेंगी और सर्वोच्च न्यायालय चुप रहेगा? ‘बुलडोज़र जस्टिस’ के नाम पर तबाही, बरबादी, अन्याय, मनमानी और अत्याचार का यह सिलसिला यूपी से शुरू हुआ था। देखते ही देखते यह कानून विरोधी अभियान भाजपा शासित दूसरे राज्यों में भी पहुंच गया। यूपी सरकार के प्रवक्ता ने फैसले पर यह कहते हुए अपना पल्ला अभी से झाड़ लिया है कि शीर्ष अदालत का आदेश दिल्ली के संदर्भ में है, उत्तर प्रदेश सरकार इसमें पार्टी नहीं थी।        
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी*
      सुप्रीम कोर्ट ने सैक्शन 142 के तहत डायरेक्शन जारी करते हुए साफ कहा है कि किसी भी आरोपी ही नहीं अपराधी का भी सज़ा के तौर पर घर तोड़ना असंवैधानिक यानी गैर कानूनी है। ऐसा करना सरकारी शक्ति का गलत प्रयोग करना माना जायेगा। जबकि सरकार का काम कानून का राज कायम करना होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना मुकदमा चलाये किसी भी इमारत को नहीं गिराया जा सकता। फिर भी प्रशासनिक अधिकारी अगर मनमाने तरीके से पहले की तरह किसी का घर गिराते हैं तो वे व्यक्तिगत रूप से इस अपराध के ज़िम्मेदार होंगे और उनके वेतन से पीड़ित को हरजाना दिलाया जायेगा। ऐसे अफसरों को दंडित भी किया जायेगा। सरकार दोषी मिली तो उसको अवैध ध्वंस का मुआवज़ा देना होगा। अदालत का कहना है कि पुलिस प्रशासन जज नहीं बन सकता। न्याय करना और सज़ा देना कोर्ट का काम है। अवैध निर्माण को जुर्माना लगाकर नियमित भी किया जा सकता है। किसी आरोपी ही नहीं अपराधी के अपराध का दंड उसके बेकसूर पूरे परिवार को बेघर करके नहीं दिया जा सकता। 15 दिन का नोटिस देना नोटिस स्थानीय नगर निकाय के अनुसार होना नोटिस रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजना मकान के अवैध हिस्से का उसमें सपश्ट उल्लेख करना आरोपी को अपना पक्ष रखने का मौका देना तीन महीने में पोर्टल बनाकर उस पर नोटिस साझा करना नोटिस की जानकारी ज़िलाधिकारी को देना डीएम द्वारा एक माह के भीतर नोडल अधिकारी नियुक्त करना अवैध निर्माण तोड़ने की वीडियो बनाना आदि आदि अनिवार्य किया गया है। 
नोटिस के दो बड़े मकसद होते हैं। एक तो यह कि आप विवादित जगह को छोड़कर सुरक्षित कहीं और चले जायें और अपना जीवन यापन का सामान टूटने से बचाने के लिये वहां से समय रहते निकाल लें। दूसरा मकसद यह होता है कि अगर कोई छोटा या मामूली कानूनी उल्लंघन हुआ है तो उसको मानचित्र के हिसाब से सही कर के भूल सुधार कर लें। सौ टके का सवाल यह है कि सुप्रीम कोर्ट के इस महत्वपूर्ण फैसले पर राज्य सरकारें अमल करेंगी या नहीं करेंगी? आप कहेंगे लागू नहीं करेंगी तो न्यायालय की मानहानि में फंस जायेंगी? यूपी सरकार के मंत्री ओमप्रकाश राजभर दावा किया है कि उनकी सरकार किसी की निजी सम्पत्ति पर बुल्डोज़र नहीं चलाती है। उनका यह भी कहना है कि सार्वजनिक सम्पत्तियों और अवैध कब्ज़ों पर बुल्डोज़र चलाया जाता है। यूपी सरकार का कहना है कि कोर्ट के इस आॅर्डर से अपराधियों के मन में कानून का भय पैदा होगा। साथ ही माफिया व संगठित अपराधियों पर लगाम लगाने में आसानी होगी। इन बयानों से आप समझ सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट के बुल्डोज़र के खिलाफ फैसले से क्या बदलने जा रहा है? दरअसल कोर्ट ने खुद ही मनमानी करने वाली सरकारों को इसके लिये एक वैकल्पिक रास्ता दे दिया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि अगर सार्वजनिक स्थान जैसे सड़क गली फुटपाथ रेलवे लाइन नदी या जल निकाय पर अनधिकृत निर्माण हो तो यह निर्देश लागू नहीं होंगे। 
सरकारें इन अपवादों का सहारा लेकर अपना ध्वस्तीकरण अभियान जारी रख सकती हैं? अधिकांश मामले तो कार्ट में उसके निर्देशोें का उल्लंघन करने को लेकर पहुंचेगे ही नहीं क्योंकि जिस का घर गिरा दिया गया और उस पर असली नकली आरोप लगाकर केस बनाकर उसे जेल भेज दिया गया हो वह कोर्ट कैसे जायेगा? निचली अदालते ऐसे मामलों में अकसर स्टे देती नहीं। बड़ी अदालतों में जाने को धन संसाधन और समय अधिक चाहिये जो सबके पास होता नहीं। सुप्रीम कोर्ट किसी समाजसेवी संस्था के शिकायत करने पर ऐसे व्यक्तिगत मामलों पर तब तक सुनवाई करता नहीं जब तक पीड़ित स्वयं कोर्ट में ना आये। इससे पहले बड़ी अदालत फर्जी एनकाउंटर के खिलाफ भी कई बार कडे़ दिशा निर्देश जारी कर चुकी है। लेकिन हम देख रहे हैं कि अब फर्जी एनकाउंटर पहले से अधिक हो रहे हैं। साथ साथ यूपी में तो हाफ एनकाउंटर जिनमें आरोपी के पैर में गोली मार दी जाती है। थोक में हो रहे हैं। लेकिन न तो कोई सुप्रीम कोर्ट जाता है न ही सुप्रीम कोर्ट इन मामलों में सू मोटो लेकर खुद किसी सरकार डीजीपी या प्रशासन से जवाब तलब करता है। 
     हमें आशंका है कि जिस तरह से बुल्डोज़र जस्टिस के नाम पर अन्याय कर राजनीति करके सरकारें अपना वोट बैंक मज़बूत कर बार बार बिना ठोस विकास रोज़गार और वास्तव में कानून व्यवस्था ठीक किये आराम से चुनाव जीत जाती हैं। उसके चलते वे अपना बुल्डोज़र अभियान किसी ना किसी तरह से चालू रखेंगी और कानून व संविधान का उल्लंघन ठीक वैसे ही करती रहेंगी जैसे कि वे धर्म परिवर्तन संवैधानिक होते हुए भी लव जेहाद के नाम पर उसको रोकने में काफी सीमा तक सफल रही हैं। सब देख रहे हैं कि कैसे सरकारंे उनके समर्थक और सत्ताधारी दल नफरत झूठ और करप्शन करके भी साफ बचके निकल जाते हैं जबकि विरोधी नेता सेकुलर हिंदू और अल्पसंख्यक दलित व गरीब बिना अपराध साबित हुए ही केवल आरोप लगने पर केस दर्ज होने और हिरासत में लेने के बाद सालों तक जेलों में बंद कर ज़मानत ना दिये जाने से अपना काम धंधा बंद होने और घर दुकान पर बुल्डोज़र चला दिये जाने से तबाह और बर्बाद हो रहे हैं।
*0 यहां मज़बू से मज़बूत लोहा टूट जाता है,*
 *कई झूठे इकट्ठे हों तो सच्चा टूट जाता है।*
 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ एडिटर हैं।*