Sunday, 30 January 2022

अखिलेश नहीं मायावती...

योगी के लिये अखिलेश नहीं माया बन सकती थीं बड़ी चुनौती?

0सभी ओपिनियन पोल में यूपी में भाजपा की जहां सत्ता में वापसी होना तय बताया जा रहा है। वहीं योगी सरकार को मुख्य टक्कर अखिलेश के सपा गठबंधन से मिलती मानी जा रही है। लेकिन कम लोगों को पता है कि सपा की बजाये अगर बसपा से भाजपा को मुख्य चुनौती मिलती तो योगी सरकार के लिये बड़ी समस्या खड़ी हो जाती। इसकी वजह यह है कि बसपा के साथ उसका दलित वोटबैंक दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनाव हार जाने के बावजूद पूरी मज़बूती से खड़ा है। इतना ही नहीं अकेले दलित वोट इतना अधिक है कि उसके सामने यादव वोटबैंक गिनती में कहीं नहीं टिक पाता है। यहां तक कि यादव दलित से आधे और मुसलमान भी बंट जाने से कम हो जाते हैं।     

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       यूपी में तीन बार भाजपा के सहयोग से और एक बार अपनी पार्टी बसपा के बहुमत के बल पर मुख्यमंत्री बन चुकी मायावती हालांकि लंबे समय से चुप हैं। लेकिन राजनीति के जानकारों का कहना है कि उनके साथ उनका दलित वोटबैंक आज भी चट्टान की तरह मज़बूती से खड़ा है। हालांकि यह भी सही है कि उनके वोटबैंक में अधिकांश जाटव हैं। लेकिन यह कहना भी सही नहीं होगा कि गैर जाटव में से उनके साथ कोई नहीं है। बल्कि इस बात को ठीक तरह से समझना हो तो यह कहा जा सकता है कि गैर जाटव वोट में अन्य दलों का बंटवारा है। जिस तरह से यह आम राय है कि सारा सवर्ण समाज भाजपा के साथ है। लेकिन जिन सीटों पर भाजपा का प्रत्याशी सवर्ण नहीं होता और सपा बसपा से कोई असरदार या पूर्व मंत्री विधायक सांसद सवर्ण जाति का टिकट ले आता है। उस विधानसभा क्षेत्र मंे सवर्ण वोट भी भाजपा से काफी अधिक छिटक जाता हैै। ऐसे ही मुसलमानों के बारे में यह धारणा आम है कि वे तो पूरी तरह सपा का वोटबैंक हैं। लेकिन सच यह है कि जिन क्षेत्रों में सपा मुख्य मुकाबले में नहीं होती या उसका प्रत्याशी कमज़ोर लगता है। वहां मुसलमान बिना किसी संगठन या मुस्लिम नेता के कहे चुपचाप बसपा के साथ हो लेता है। जबकि दलितों के बारे में यह माना जाता है कि वे हर हाल में अधिकांश बसपा के साथ बने रहते हैं। लेकिन अब यह भी देखा जा रहा है कि जिन जनरल सीटोें पर गैर बसपा दल किसी दलित को उतार देते हैं और वहां बसपा पहले ही किसी गैर दलित को टिकट दे चुकी होती है। वहां दलितों का बड़ा हिस्सा या उस दलित प्रत्याशी की जाति का लगभग सारा वोट शेष दलित जातियों का अधिकांश वोट उस दलित प्रत्याशी को चला जाता हैै। अगर किसी सीट से अकेला मुस्लिम उम्मीदवार किसी भी पार्टी यानी कांग्रेस एमआईएम या प्रभावशाली निर्दलीय भी खड़ा हो जाता हैै तो कई बार मुसलमानों का बड़ा हिस्सा उसके साथ हो जाता  है। ऐसा और दलों के साथ भी उनका परंपरागत वोटबैंक साथ छोड़कर कभी कभी ऐसे प्रयोग करता रहा है। इसमें हमारे समाज का जातिवाद क्षेत्रवाद और साम्प्रदायिकता छिपी होती है। बहरहाल हम अपने मूल विषय पर लौटते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस ने कुछ साल पहले मायावती पर एक किताब लिखी थी। जिसका शीर्षक था-मायावती की राजनीतिक जीवनी। लेकिन बाद मंे बोस ने उस पुस्तक का हैडिंग बदलकर मायावती का उत्थान और पतन कर दिया। उस समय बसपा समर्थक बोस से काफी नाराज़ हो गये थे। लेकिन 2012, 2014, 2017 और 2019 के चार चुनाव यह बात सही साबित करते नज़र आये कि बसपा का हश्र महाराष्ट्र की रिपब्लिकन पार्टी जैसा होता जा रहा है। बसपा के साथ जब तक पिछड़े मुसलमान या ब्रहम्ण नहीं जुड़े तब तक ना तो वह सत्ता में आई और ना ही उसको किसी ने गंभीरता से लिया। लेकिन बहनजी ने इस तथ्य को भी भुला दिया कि ब्रहम्णों के बसपा के साथ आने से उनका कोर वोट दलित उनसे नाराज़ हो सकता है। साथ ही जिन पिछड़ी जातियों को बड़े जतन से बसपा संस्थापक मान्यवर कांशीराम ने बसपा के वोटबैंक दलितों के साथ जोड़कर बहुजन समाज की कल्पना की थी। बहनजी ने  पिछड़ी जाति के नेताओं को भी एक के बाद एक अपने अहंकार और मनमाने तरीके से काम करने के चलते बाहर का रास्ता दिखा दिया। जब ये पिछड़े नेता बसपा से निकले तो साथ साथ उनका पिछड़ा समाज भी उनके साथ साथ बहनजी का साथ छोड़कर चलता बना। उधर जो मुसलमान बसपा के साथ 2007 में पहली बार बड़े पैमाने पर जुड़े थे। विपक्ष ने आरोप लगाया कि मायावती ने उनको कभी ग़द्दार तो कभी आतंकी बताया और उनके काम सरकारी स्तर पर करने में पक्षपात किया। यहां तक कि उनके किसी महापुरूष का नाम तक दलित महापुरूषों के साथ पोस्टर बैनर पर जोड़ना गवाराह नहीं किया। बहनजी को यह गलतफहमी हो गयी कि अगर वे अधिक से अधिक मुसलमानों को बसपा का टिकट देंगी और उनको अपना दलित वोटबैंक भी पूरी तरह से चुनाव मंे ट्रांस्फर करा देंगी तो मुसलमान मजबूरी में खुद ब खुद बसपा के साथ जुड़ जायेंगे। जबकि वह यह कठोर सच भूल गयीं कि अगर किसी नेता पर मुसलमानों ही नहीं किसी भी वर्ग या जाति का भरोसा ही नहीं रहेगा तो वह चाहे जितने भी टिकट उस समाज के लोगों को दे दे उस समाज का वोट उसको नहीं मिलेगा। इसकी एक और जिं़दा मिसाल भाजपा भी है। जिसने शुरू शुरू में दिखावे के लिये एक दो मुसलमानों को एमएलए और एमपी के चुनाव में टिकट दिये लेकिन उनको उस क्षेत्र में अकेला मुस्लिम प्रत्याशी होने पर भी मुसलमानों ने वोट नहीं दिये। वजह साफ थी कि भाजपा हिंदू समर्थक नहीं मुस्लिम विरोधी पार्टी मानी जाती है। बहनजी की चुप्पी का राज़ राजनीतिक जानकार उनके खिलाफ चल रही घोटालों की जांच को मानते हैं। जिस तरह से लालू जेल गये उसी तरह बहनजी को भी जेल जाने के डर से चुप्पी साधनी पड़ी है। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि अगर बसपा का दलित वोट इस चुनाव में और बिखरता है तो क्या वह दलित विरोधी समझी जाने वाली भाजपा के साथ हिंदू बनकर जायेगा या उसके प्रति उदासीन सपा के साथ जायेगा?                                         

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।

Sunday, 23 January 2022

विकास मुद्दा क्यों नहीं?

सामाजिक धार्मिक नहीं विकास के मुद्दे पर लड़ें सब दल चुनाव!

0विश्व विख्यात सूचना एवं तकनीकी कंपनी इनफ़ोसेज़ के संस्थापक एन आर नारायण मूर्ति ने कहा है कि वह निजी जीवन में बहुत अधिक धार्मिक हैं। लेकिन घर से बाहर निकलने के बाद वे न तो धार्मिक कर्मकांड करते हैं ना ही किसी के साथ धर्म के आधार पर भेदभावपूर्ण व्यवहार। यहां तक कि वह कभी एक नारियल तक व्यक्तिगत आस्था के नाम पर सार्वजनिक रूप से नहीं तोड़ते। उधर जो राजनीति केवल और केवल विकास रोज़गार शिक्षा स्वास्थ्य और आर्थिक मुद्दों पर केंद्रित होनी चाहिये थी। वह आज कल कई दल और नेता पूरी तरह धार्मिक जातीय क्षेत्रीय झूठ दुष्प्रचार भय भावनात्मक ब्लैकमेल और भारी कालेधन व सत्ता के दुरूपयोग के बल पर की जा रही है।    

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       यूपी सहित पांच राज्यों में चुनाव का ऐलान हो चुका है। लेकिन इस बार भी ये चुनाव विकास पर ना होकर तरह तरह के भावनात्मक मुद्दों पर केंद्रित होते नज़र आ रहे हैं। अगर ऐसा ना होता तो कुछ दिन पहले हरिद्वार में धर्म संसद के नाम पर एक वर्ग विशेष के खिलाफ़ जमकर ज़हर ना उगला जाता। हालांकि आरोपियों के खिलाफ औपचारिक रपट दर्ज हो गयी है। लेकिन सत्ता मेें बैठे दल के नेताओं के तेवर देखकर लगता नहीं कि वे इस मामले मंे कोई ठोस या सख़्त कार्यवाही करने के मूड में हैं। इतना ही नहीं छोटी छोटी बात पर ट्वीट और राष्ट्र के नाम संदेश जारी करने वाले हमारे पीएम तो इस घिनौैैनी घटना पर आज तक चुप्पी साधे हुए हैं। इसकी प्रतिक्रिया में बरेली में हज़ारों मुसलमानों ने पिछले जुमे की नमाज़ के बाद जवाबी चेतावनी जारी की कि अगर देश में हरिद्वार जैसी धर्मसंसदें होती रहीं तो वह उस दिन से डरते हैं जिस दिन मुसलमान नौजवान कहीं से न्याय ना मिलने पर खुद कानून हाथ में लेने की सोचने लगेगा। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके खून से किसी की प्यास बुझती हो तो वे अपनी जान देने को तैयार हैं। उनका कहना था कि उनका हिंदू समाज से कोई विवाद नहीं है। वे उनके साथ मिलजुलकर रहना चाहते हैं। अगर लड़ना ही है तो हम सबको मिलकर चीन की सीमा पर उन विदेशी ताक़तों से लड़ना चाहिये जो हमारी मातृभूमि पर अवैध कब्ज़ा कर रही है। इससे पहले गिटहब सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर बुल्ली बाई एप पर सैंकड़ो मुस्लिम औरतों की नीलामी की घटिया हरकत उनके अश्लील फोटो डालकर की गयी। इस मामले में भी पुलिस ने रपट दर्ज कर कुछ आरोपियों को पकड़ा है। लेकिन जिस तरह से इससे पहले इसी एप प्लेटपफाॅर्म पर सुल्ली डील एप बनाकर मुस्लिम महिलाओं को ज़लील किया गया था।उस पर दिल्ली पुलिस ने आज तक कोई ठोस कार्यवाही नहीं की थी। जिस तरह पीएम मोदी ने भारत के एक सेकुलर देश होते हुए बनारस में विश्वनाथ मंदिर कोरिडोर का उद्घाटन  किया और मुसलमानों को छोड़कर जितने भी धार्मिक स्थलों का इतिहास बताया उनमें हिंदू जैन और सिख समाज को ही शामिल किया गया। इससे पहले यूपी में जिस तरह से चुनाव की घोषणा होने से कई माह पहले से ही सत्ताधारी दल चुनाव प्रचार के लिये मीडिया में बड़े बड़े विज्ञापन दे रहा है। उससे भी यह मिथक स्थापित करने की काफी हद तक सफल कोशिश की जा रही है कि एक धर्म विशेष के लोग अपराधी गुंडे माफिया और आतंकी होते हैं। साथ ही यह प्रचार भी जोरशोर से किया जा रहा है कि पहले की कांग्रेस सपा बसपा या सेकुलर दलों की सरकारें हिंदू विरोधी और घोर मुस्लिम समर्थक थीं। हालत यह है कि जिस सरकार को सभी धर्म के लोगों से टैक्स मिलता है। वही सरकार उस कर के पैसे से एक धर्म विशेष के लोगों के खिलाफ मीडिया में ज़रदस्त प्रचार अभियान चला रही है। संविधान और कानून एक होते हुए भी सभी के साथ एक सा व्यवहार नहीं हो रहा है। लगातार यह झूठा दुष्प्रचार किया जा रहा है कि मुसलमानों की आबादी इतनी तेज़ी से बढ़ रही है कि वे जल्दी ही देश में बहुसंख्यक हो जायेंगे। जबकि खुद सरकारी आंकड़े इसको झुठलाते हैं। बार बार ऐसे उर्दू शब्दों का प्रयोग कर यह आरोप लगाया जाता है कि सपा बसपा के राज में सारा विकास और रोज़गार मुसलमानों का मिल रहा था। जबकि इसके पक्ष में वर्तमान सत्ताधारी नेता कोई सबूत आज तक पेश नहीं कर पाये हैं। यह धारणा बनाने की भी कोशिश की जा रही है कि राम मंदिर भाजपा बनवा रही है। जबकि सबको पता है कि ऐसा कोर्ट के आदेश पर हो रहा है। यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि पहले सपा बसपा और कांग्रेस मंदिर बनने से रोक रही थी। यह दावा भी किया जा रहा है कि अगर सपा की सरकार यूपी में बनी तो मंदिर का निर्माण रूक जायेगा? साथ ही यह प्रोपेगंडा भी चल रहा है कि अगर भाजपा सत्ता में वापस नहीं लौटी तो सपा की सरकार मुसलमानों को खुली लूट और मनमानी की छूट दे देगी। हमारी समझ से यह बात बाहर है कि अगर भाजपा ने वास्तव में विकास किया है। नौजवानों को रोज़गार दिया है। कानून व्यवस्था को सुधारा है। सरकारी विभागों में रिश्वतखोरी बंद कर दी है। सड़कें बन रही हैं। बिजली पर्याप्त आ रही है। सरकारी अस्पताल और स्कूल पहले से बेहतर काम कर रहे हैं। जनहित की योजनायें पहले से अगर बेहतर चल रही हैं तो इसके लिये करोड़ों रूपये के विज्ञापन देने और एक धर्म विशेष के लोगों को विलेन बनाकर हिंदू समाज के लिये झूठा ख़तरा बताने की ज़रूरत क्यों पड़ रही है? क्या भाजपा हिंदू समाज को इतना नासमझ नादान और भोला समझती है कि उसको पांच साल में यह पता ही नहीं चला कि सरकार कितना अच्छा काम कर रही है? अगर अच्छा काम हो रहा होगा तो जनता को खुद ही दिखाई देगा महसूस होगा। आज का माहौल देखकर ऐसा लगता है जिस तरह से मुसलमानों को भाजपा का ख़तरा दिखाकर सेकुलर दलों ने लंबे समय तक उनको वोटबैंक बनाकर सत्ता का सुख भोगा उसी तरह से आज भाजपा मुसलमानों से डराकर और हिंदुओं का धार्मिक तुष्टिकरण कर उनको वोटबैंक बना रही है।                                         

 *0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।*

Tuesday, 18 January 2022

पिछड़े किसके साथ ?


पिछड़ों को साधने में भाजपा आज भी सबसे आगे है?
02017 के यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा को कुल पड़े वोट में से 39.67 प्रतिशत यानी 3,44,03,299 बसपा को 22.23 प्रतिशत यानी 1,92,81,340 और सपा को 21.82 प्रतिशत यानी 1,89,23,769 वोट मिले थे। विकीपीडिया के अनुसार यूपी में सवर्ण जाति 14.2 दलित 20.8 पिछड़ी जाति 44 फीसदी और मुसलमान 20 प्रतिशत हैं। आज सवर्ण की भाजपा दलित की बसपा और मुसलमान की सपा पहली पसंद बन चुकी हंै। जबकि अपवाद स्वरूप यादवों का बड़ा हिस्सा भी विधानसभा चुनाव में सपा के साथ माना जाता है। कुछ सीटों पर भाजपा को हराने के लिये मजबूरी में मुसलमान भी बसपा के साथ चला जाता है। लेकिन पिछड़ी जातियों का निर्णायक व अधिकांश वोट क्या आज भी भाजपा के साथ माना जा रहा है?      
                  -इक़बाल हिंदुस्तानी
       पांच राज्यों के चुनाव घाषित होते ही जिस तरह से अचानक यूपी में पिछड़ी जाति के कुछ मंत्री और विधायक भाजपा छोड़कर थोक में सपा का दामन थाम रहे हैं। उससे ऐसा लगता है मानो भाजपा इस बार 2017 की तरह पिछड़ी जाति के गैर यादव और दलितों के गैर जाटव मतदाता को खोने जा रही है। जबकि सच यह है कि आज भी बड़ी संख्या में पिछड़ी जाति के छोटे दल नेता मंत्री और विधायक पूर्व की तरह भाजपा के साथ ही बने हुए हैं। अलबत्ता इतना ज़रूर है कि जिस तरह से अखिलेश ने सुनियोजित तरीके से एक के बाद एक पिछड़ी जााति के मंत्री का पहले भाजपा सरकार से इस्तीफा दिलाया। उसके बाद कुछ भाजपा विधायकों को तोड़कर बारी बारी से सपा में शामिल किया। उसके बाद त्यागपत्र देने वाले एक एक मंत्री को प्रतिदिन सपा में शामिल करते हुए उनको मीडिया के सामने पेश कर उससे भाजपा के पिछड़ा विरोधी होने का आरोप जोरशोर से लगा। उससे ऐसा संदेश गया कि इस बार पिछड़ी जातियां भाजपा को छोड़कर सपा के साथ जाने वाली हैं। हो सकता है कि यह लेख प्रकाशित होने तक कुछ और मंत्री और विधायक भाजपा को अलविदा कहकर सपा या बसपा का दामन थाम लें। लेकिन दाल में काला मानकर खुद सपा मुखिया आगे दलबदल करने वाले भाजपा के नेताओं को ना लेने का दावा भी कर रहे हैं। यह भी हो सकता है कि भाजपा भी बड़े पैमाने पर सपा या अन्य विरोधी दलों के कुछ बड़े नेताओं या इन दलों के मुखियाओं के परिवार के कुछ बड़े चेहरों को अपने साथ लाकर डैमेज कंट्रोल करे। बहरहाल इस चुनाव में यह नया नहीं हो रहा है। जब जब चुनाव आते हैं। दलबदल होता ही है। लेकिन नया यह है कि इस बार सत्ताधारी दल से अधिक दलबदल हो रहा है। हालांकि छिटपुट दलबदल सपा बसपा कांग्रेस से भी एक दूसरे दलों में जारी है। दलों ने इस पर यह सफाई भी दी है कि दलबदलू नेता अपना टिकट कटने या अपने परिवार के अन्य सदस्यों को मनचाहे या अपनी पसंद की सीट से टिकट ना मिलने के कारण भी पार्टी छोड़कर जा रहे हैं। यह बात भी सही है कि यूपी में जिस तरह से पांच साल योगी सरकार चली है। उसमंे भाजपा विधायकों की तो बात ही क्या खुद मंत्री तक यह कहते सुने गये कि उनकी सुनी नहीं जाती। इतिहास मंे पहली बार 18 दिसंबर 2019 को गाजियाबाद के लोनी क्षेत्र से भाजपा विधायक नंद किशोर गूजर ने जब विधनसभा में उत्पीड़न का सरकार पर आरोप लगाया और उनके समर्थन में सत्ताधारी भाजपा के ही 200 विधायकों ने मोर्चा खोल दिया तो विपक्ष को सरकार को घेरने का बड़ा अवसर हाथ लग गया था। योगी सरकार पर मुख्यमंत्री की जाति के अफसरों को प्राथमिकता देने और महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करने का आरोप भी लगा। लेकिन ऐसे आरोप पूर्व की सपा बसपा सरकारों पर भी लगते रहे हैं। यह भी चर्चा हुयी कि इस सरकार में ब्रहम्ण खुश नहीं हैं। उनको ना केवल पूरा प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है बल्कि उनके साथ सौतेला व्यवहार व पक्षपात किया जा रहा है। लेकिन यह भी तथ्य है कि ब्रहम्ण जाति का जो स्वभाव रहा है। उस हिसाब से चाहे जो हो उसके लिये भाजपा से अलग कोई और विकल्प ही नहीं है। ऐसे ही सपा सरकार के रहते जिस तरह से यादवों  को अनड्यू लाभ दिये गये और एक ही परिवार के दो दर्जन से अधिक लोगों को जनप्रतिनिधि बनाकर सर माथे पर रखा गया। उससे गैर यादव पिछड़े और अति पिछड़े सपा से नाराज़ हो कर कोई अन्य विकल्प तलाश ही रहे थे। उनको भाजपा ने अपने साथ इस वादे के साथ जोड़ लिया कि वह सभी हिंदुओं को उनके समान जनसंख्या अनुपात में जातिवार हिस्सेदारी देगी। उसने यह आरोप भी लगाया कि सपा बसपा हिंदू समाज का हिस्सा अपने वोटबैंक मुसलमानों को उनकी आबादी से अधिक देकर खासतौर पर पिछड़ी जातियों के साथ खुला पक्षपात कर रही हैं। यह हुआ कि जिस तरह से मुसलमानों को इस्लाम के नाम पर किये गये चंद दिखावटी काम भावनात्मक रूप से अच्छे लगते हैं। उसी तरह से योगी सरकार ने कांवड़ यात्रा कुंभ मेला दिवाली समारोह बनारस विश्वनाथ मंदिर कोरिडोर और राम मंदिर का सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर निर्माण शुरू कराकर हिंदुओं का धार्मिक तुष्टिकरण करना शुरू कर दिया।  यूपी में जिस तरह से संघ ने योगी को बिना किसी अनुभव के उनके मुस्लिम विरोधी रूख के कारण गुजरात की तरह एक और नई प्रयोगशाला बनाना चाहा। उसका कोई खास लाभ पिछड़ी जातियों को जब मिलता नज़र नहीं आया तो उनमें बगावत के आसार बन गये। लेकिन आज भी हिंदुत्व के नाम पर पिछड़ों का बड़ा वर्ग भाजपा के साथ माना जा रहा है। यह अनुमान कितना सही है यह तो 10 मार्च को मतगणना के बाद ही पता चलेगा। लेकिन जिस तरह से योगी ने लवजेहाद एंटी रोमियो सीएए के खिलाफ आंदोलन करने वालों से सरकारी संपत्ति के नुकसान की वसूली जनसंख्या कानून मांस की दुकानों पर लगाम और एक वर्ग विशेष के खिलाफ पूर्वाग्रह ना छिपाते हुए खुलेआम चुनाव को 80 बनाम 20 प्रतिशत यानी प्रदेश की आबादी के हिसाब से सांप्रदायिक बनाया उससे यह भी लगता है कि उनको पिछले चुनाव के मुकाबले वोट और सीटें घटती साफ नज़र आ रही हैं।                                        
 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।          
  

Thursday, 30 December 2021

लड़की की शादी की उम्र

लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने की ज़रूरत क्यों है?

018 साल का लड़का लड़की बालिग माने जाते हैं। वे चुनाव में वोट देकर सरकार चुन सकते हैं। लेकिन इस उम्र में वयस्क होने के बाद भी वे अपना जीवन साथी नहीं चुन सकते। पहले केवल लड़कों के लिये शादी की आयु 21 साल थी। लेकिन अब सरकार कानून में संशोधन करके लड़कियों के लिये भी विवाह की आयु 21 साल करने जा रही है। संसद से लेकर समाज तक इस संशोधन को लेकर दो वर्ग  हैं। जिनकी राय इस मुद्दे पर अलग अलग है। एक वर्ग इस बदलाव को लड़कियों के लिये अच्छा मानता है। वहीं दूसरा वर्ग इस संशोधन से अभिभावकों के लिये नई समस्यायें खड़ी होती देख रहा है। दोनों के अपने अपने तर्क हैं। जिनको सिरे से खारिज भी नहीं किया जा सकता है।   

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       निर्भया कांड के बाद सरकार ने कानून में संशोधन करके बलात्कार के मामलों में 16 साल के लड़कांे को बालिग मानने का कानून बनाया था। ब्रिटेन और यूरूप के कुछ देशों में पहले से ही कन्या और बालकों के लिये वयस्कता की आयु 16 साल तय है। कुछ मुस्लिम मुल्कों में भी ऐसा ही है। वहां इस आयु की प्राप्ति करने के बाद वे शादी भी कर सकते हैं। हालांकि इस मामले में अलग अलग देशों की अपनी परंपरायें धर्म संस्कृति और जलवायु भी कारण होते हैं। इसलिये हम अपने देश की तुलना हर मामले में दूसरे देशों से समानत आधार ना होने पर नहीं कर सकते। हमारे देश में व्यस्कता और विवाह की आयु अलग अलग रही है। कुछ समाज विज्ञानियों का कहना है कि लड़का लड़की दोनों की शादी की आयु बराबर होने से संविधान द्वारा दी गयी समानता को समाज में स्थापित करने में सहायता मिलेगी। इसके बाद साथ ही लड़कियों की भी शादी की उम्र लड़कों की तरह 21 साल करने से समाज का उच्च शिक्षित अभिजात्य सम्पन्न और प्रगतिशील वर्ग मानता है कि ऐसा करने से लड़कियों को पढ़ाई मौज मस्ती आज़ादी स्वास्थ्य और रोज़गार में जाकर अपने पैरों पर खड़े होने में आवश्यक समय मिलेगा। लेकिन समाज का गरीब अनपढ़ या कम शिक्षित और परंपरावादी वर्ग यह मानता है कि इससे परिवार पर अनावश्यक हर तरह का बोझ बढ़ जायेगा। उनको लगता है कि लड़की की शादी जवान होते ही जल्दी से जल्दी कर देनी चाहिये। उनको यह भी महसूस होता है कि लड़की की शादी कब करनी है। यह तय करने का सारा अधिकार समाज के पास होना चाहिये। इसमें सरकार को अवांछित दख़ल नहीं देना चाहिये। यही वजह है कि बाल विवाह के मामले में हमारा देश दुनिया में तीसरे नंबर पर है। आज भी हमारे यहां दस करोड़ लड़कियों की शादी 15 साल की होने तक कर दी जाती है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे बताता है कि 50 प्रतिशत से अधिक गर्भवती महिलाओं में खून की कमी यानी एनीमिया होता है। स्वास्थ्य कारणों से ही कम उम्र में शादी होने से उनकी बच्चे के जन्म के समय मौत तक हो जाती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हमारा देश पुरूष प्रधान है। जिसका परिणाम यह है कि कन्या के पैदा होने के साथ ही नहीं उसके पैदा होने से पहले ही उसके साथ पक्षपात शुरू हो जाता है। यानी हर वर्ष लाखों कन्या भ्रूण की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है। इतना ही नहीं कन्या होने पर परिवार में या तो खुशी मनाई ही नहीं जाती या उतनी नहीं अनुभव होती जितनी बालक होने पर होती है। समाज का एक बड़ा वर्ग आज भी कन्या को बोझ और हुंडी समझता है। यहां तक कि उनके पालन पोषण खान पान और शिक्षा दीक्षा में भी पक्षपात आम है। इसी का अंजाम यह है कि उसको लड़कों की बराबर पौष्टिक आहार और समान सुविधायें ना मिलने से वे कमज़ोर कम शिक्षित और कम आत्मनिर्भर बन पाती हैं। प्रगतिशील और सम्पन्न वर्ग का मानना है कि सरकार के इस कदम से शादी की उम्र आने तक लड़कियों का ना केवल शारिरिक बल्कि मानसिक विकास भी पूर्ण हो सकेगा। विज्ञान कहता है कि इंसान के दिमाग का फ्रंटल रोब रीजन 18 से 20 साल के बीच ही विकसित हो पाता है। इसके बाद ही इंसान में ना केवल सोच समझकर निर्णय करने की क्षमता आती है बल्कि उसमें बेहतर भावनात्मक नियंत्रण और परिपक्वता भी आती है। ज़ाहिर बात है कि एक परिपक्व मां ही बेहतर परिवार चला सकती है। इससे उनको स्कूल काॅलेज अस्पताल यातायात और रोज़गार की पहले से अधिक और बेहतर सुविधायें उपलब्ध होने के बाद ब्याहने का अवसर मिलेगा। लेकिन सवाल यह है कि लड़कियों की विवाह की आयु बढ़ाने वाली सरकार क्या इन सब मुद्दों पर चिंतन मनन करके उपरोक्त सुविधायें बढ़ाने पर विचार करेगी? या केवल कानून बनाकर अपना पल्ला झाड़ लेगी? सवाल यह भी है कि आज जब शादी की उम्र 18 साल है। तब भी गांव में 27 प्रतिशत और शहर में 14 प्रतिशत कन्याओं की शादी उससे पहले ही कर दी जाती है। सर्वे यह भी बताते हैं कि कम आयु में शादी से दहेज़ की मांग दहेज़ हत्या पारिवारिक विवाद हिंसा और तलाक के केस  अधिक हो रहे हैं। 2017 में एक मुक़दमें की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से भारतीय दंड संहिता की धारा 375 में संशोधन को कहा था। इस धारा में दरअसल 15 साल तक की पत्नी से पति द्वारा किया गया संभोग बलात्कार नहीं माना गया है। जबकि कानूनन ऐसी शादी करना अपराध है। बाल विवाह कानून 1929 कहता है कि बाल विवाह अपराध है। लेकिन सरकार पुलिस प्रशासन आज तक इसे खत्म नहीं कर पाये हैं। नये संशोधन के अनुसार चर्चा है कि अगर कोई लड़का लड़की 21 साल के होने से पहले शादी करते हैं तो ना केवल वे खुद अपितु उनके माता पिता शादी कराने वाले धार्मिक गुरू बैंक्वट हाॅल व आयोजन से जुड़े सभी लोग और यहां तक कि उस समारोह में शरीक होने वाले मेहमान तक जवाबदेह हो सकते हैं। भविष्य में कोई शादी का कार्ड आये तो कार्ड के साथ दुल्हा दुल्हन का आयु प्रमाण पत्र अवश्य देख लीजिये अन्यथा मुसीबत आ सकती है।                                        

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।

Saturday, 18 December 2021

बैंक निजीकरण


सरकार किसके हित में बैंको का निजीकरण करना चाहती है ?

0पिछले दिनों सरकारी बैंकों के लगभग 10 लाख अधिकारी व कर्मचारी बैंकों के निजीकरण करने के सरकार के इरादे के खिलाफ दो दिन हड़ताल पर रहे। सरकार 27 बैंकों को विलय कर पहले ही 12 बड़े बैंक बना चुकी है। आगे इनको चार तक सीमित करने की योजना है। इसके साथ ही बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 और 1970 में संशोधन कर सरकारी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम कर 26 प्रतिशत किये जाने की चर्चा है। आज सरकारी बैंकोें के कुल कर्ज़ का 35 प्रतिशत ख़तरे में है। बैंकों में ठगी के मामले भी तेज़ी से बढ़े हैं। रोज़ ठगी के 229 मामले हो रहे हैं जिससे बैंको को 1.31 लाख करोड़ का चूना लगा है।   

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       देश के नेशनल बैंकों की कुल 1 लाख 10 हज़ार शाखाआंे मेें 150 ट्रिलियन रकम जमा है। इन राष्ट्रीयकृत बैंकों के लाभ से सरकार जनहित की अनेक योजनायंे चलाती है। जनता के खून पसीने की इस गाढ़ी कमाई से न केवल देश का आधारभूत ढांचा मज़बूत होता है बल्कि तमाम लोगों को बैंक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीकों से रोज़गार भी उपलब्ध कराता है। याद रखने वाली खास बात यह है कि देश के बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद से एक भी सरकारी बैंक डूबा नहीं है। अगर कहीं किसी बैंक में कोई घोटाला या गड़बड़ी हुयी भी तो सरकार और बीमा कवर के ज़रिये लगभग 98 प्रतिशत खाताधारकों का धन वापस मिल गया है। इन बैंकों के द्वारा ही देश मंे कृषि क्रांति दुग्ध क्रांति और औद्योगिक क्रांति को अंजाम दिया गया है। पिछले वर्षों में जब जनधन खाते खोले गये तो कुल 44 करोड़ में से 41 करोड़ इन सरकारी बैंकों में ही खोले गये। आज भी निजी बैंकों के मुकाबले इन बैंकों में खाता खोलना लोन लेना एटीएम कार्ड लेना और दूसरी सुविधायें हासिल करना आसान सस्ता और सुगम है। ये अलग बात है कि बैंक स्टाफ का बड़ा वर्ग भी कुछ समय पहले तक किसानों के एक हिस्से की तरह मोदी सरकार का बड़ा समर्थक रहा है। लेकिन आज जब बैंक निजीकरण का बिल संसद के शीतकालीन सत्र में आने वाला है तो उसकी आंखें खुल गयी हैं। यूनाइटेड फोरम आॅफ बैंक यूनियन्स का दावा है कि मोदी सरकार 13 काॅरपोरेट के 4 लाख 86 हज़ार 800 करोड़ बकाया का 2 करोड़ 84 लाख 980 करोड़ लोन एनपीए करना चाहती है। फोरम का आरोप है कि जिन सरकारी बैंको को सरकार प्राइवेट कर अपना पल्ला झाड़ना चाहती है। उनमें से ही एसबीआई के बेल आउट पैकेज और एलआईसी की सहायता से आईएल एंड एफएस ग्लोबल ट्रस्ट बैंक बैंक आॅफ कराड यूनाइटेड वेस्टर्न बैंक और यस बैंक जैसों को संकट से उबारने के लिये सरकारी पूंजी का दुरूपयोग किया गया है। सवाल यह है कि सरकार किसके हित में पीएसबी यानी पब्लिक सैक्टर बैंकों को प्राइवेट करना चाहती है? विपक्ष का आरोप तो यह है कि सरकार इनको जनहित दांव पर लगाकर अपने चहेते पंूजीपति मित्रों को इसलिये देना चाहती है जिससे चुनाव आने पर उनसे मोटा चंदा वसूला जा सके। उधर पिछड़ी जाति दलितों व आदिवासी वर्ग को लगता है कि सरकार ऐसा कर उनके रोज़गार आरक्षण को चोर दरवाजे़ से बंद करना चाहती है। आरबीआई की रिपोर्ट कहती है कि 2014 से 2021 तक बैंकों का एनपीए यानी नाॅन परफाॅर्मिंग एसेट्स घोषित रूप से 15 लाख करोड़ लेकिन अपुष्ट के सूत्रों के अनुसार 25.4 लाख करोड़ हो चुका है। इसमें अगर एनबीएफसी का एनपीए और जोड़ लिया जाये तो यह 32 लाख करोड़ से भी अधिक हो जायेगा। लेकिन आरबीआई ने इसको फिलहाल रिस्ट्रक्चर्ड लोन में डालकर एनपीए के आंकड़ों को डरावना नज़र आने से रोक दिया है। आज के कुल एनपीए में 60 प्रतिशत तो केवल ब्याज का ही हिस्सा है। खास बात यह है कि कुल एनपीए का 5 प्रतिशत भी रिटेल यानी कृषि कार पढ़ाई या पर्सनल लोन नहीं है। यानी आप इस तरह समझ सकते हैं कि ये कर्ज़ देश की 95 प्रतिशत जनता को दिया गया कजऱ् नहीं है। अधिकांश लोन कारपोरेट को दिया गया है। ऐसा भी नहीं है कि सभी काॅरपोरेट डिफाल्टर हो गये हों। या विजय माल्या और नीरव मोदी की तरह बैंकों का पैसा मारकर विदेश भाग गये हों। इनमें अधिकांश लोन उस समय का है। जब इकाॅनोमी बूम पर थी। यानी ये बड़े विशालकाय कर्ज़ पाॅवर सैक्टर टेलीकाॅम बिल्डर्स बड़े कारखानों और कोयला खदानों के लिये दिये गये थे। सवाल यह है कि आखि़र इन सबका पैसा इतना और एक साथ कैसे डूबा? तो जनाब हमारे देश में सरकार राजनीति और पूंजीवाद जो ना करा दे थोड़ा है। मोबाइल काॅल और नेट सस्ता हो रहा था तो टेलीकाॅम यानी टू जी घोटाले का नकली भूत खड़ा किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि स्पैक्ट्रम कई गुना महंगा हुआ। टेलीकाॅम की अधिकांश कंपनियों पर जुर्माना और महंगे चार्ज लगे तो जियो सरकार के अनड्यू सपोर्ट और बीएसएनएल की बरबादी की कीमत पर और एक दो और मोबाइल कंपनी को छोड़कर अधिकांश का बोरिया बिस्तर बंध गया। अब उन पर जो लोन थे वे सब एनपीए होते चले गये। कुछ ऐसा ही मामला कोयला खदानों का था। कोयला घोटाले का शोर मचा तो जिन कंपनियों को कैप्टिव पाॅवर प्लांट के लिये भारी भरकम कजऱ् बैंकों ने दिये थे। उनके लाइसेंस रद्द होने से उनको दिया लोन एनपीए हो गया। उधर अर्थव्यवस्था झूम कर मस्त हाथी की चाल चल रही थी। लोगों के हाथ में पैसा आ रहा था तो वे मकान दुकान और नई नई बनती जा रही काॅलोनियों में रिहायशी काॅमर्शियल प्लाॅट खरीद रहे थे। बड़े बड़े बिल्डर्स बैंकों से एक के बाद एक बड़ा लोन लेकर रियल स्टेट विकसित कर रहे थे। जैसे ही इकाॅनोमी गिरनी शुरू हुयी लोगों ने अपनी जेब में पैसा कम आने रोज़गार जाने नोटबंदी व देशबंदी से कारोबार तबाह या पूरी तरह बंद हो जाने से अपना हाथ खींच लिया। उधर बिल्डर्स बैंकों से लिया कजऱ् ना चुका पाने से अपना लोन एनपीए करा बैठे। ऐसे ही ओवरब्रिज हाईवे और सड़कों का जाल फैलता जा रहा था। सरकार के साथ पीपीपी यानी पब्लिक प्रावेट प्रोजैक्ट के तहत बैंकों से लोन लेकर काम करने वाली कंपनी एकाएक मुंह के बल गिरनी शुरू हो गयी। वजह यह थी कि 30 से 32 लाख करोड़ के बजट वाली सरकार ने चुनावी मोड में जनता को बहलाने के लिये 100 लाख करोड़ केे ढांचागत प्रोजैक्ट का ऐलान तो कर दिया लेकिन इतना पैसा आता कहां से? ऐसे में जो योजनायें पहले से चल भी रही थी वे भी बैंकों से आगे लोन ना मिलने से बीच में ही लटक गयीं। अब जब आगे काम ही नहीं होगा तो पिछला पैसा तो एनपीए होना ही था। इस दौरान मोदी सरकार ने मुद्रा लोन के नाम पर बिना गारंटी बिना ठोस आधार के अपने चहेते लोगों को राजनीतिक रूप से इनाम देने के लिये कई लाख करोड़ बैंक से दबाव डालकर बंटवा दिये। आज इनमें से अधिकांश का काम चैपट हो चुका है। बैंकों के पास कोई ऐसा तरीका नहीं है कि इनसे पैसा वापस वसूल सके। ऐसा ही मामला मनमोहन सरकार से लेकर मोदी सरकार तक का काॅरपोरेट को लेकर उदार लोन देने का रहा है। आज जब उन चहेते पंूजीपतियों उद्योगपतियों और व्यवसायियों के दिवाले निकल चुके हैं तो उनका लोन एनपीए होने के अलावा कोई रास्ता बचा ही नहीं है। एक आंकड़े के अनुसार देश के सरकारी बैंकों का कुल लोन 101 लाख करोड़ के आसपास है। कोरोना के दौर में पिछले साल मोदी सरकार ने 20 लाख करोड़ का पैकेज कारोबारियों को देने का एलान बड़े जोरशोर से किया था। लेकिन इसका कोई विशेष लाभ हमारी अर्थव्यवस्था को नहीं मिलता दिखा क्योंकि हमारे देश में उत्पादन बढ़ाने को पैसे की नहीं खरीदारी करने को आम जनता के पास पैसे की कमी लगातार बढ़ती जा रही है। अगर मोदी सरकार बैंक निजीकरण का घातक विचार नहीं छोड़ती है तो देश में जो थोड़ी बहुत जनहित की स्कीमंे चल रही है और धीरे धीरे अर्थव्यवस्था सुधरने की आशा की जा रही है वह भी संकट में पड़ जायेगी।                                    

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।  

Monday, 13 December 2021

आर्थिक असमानता


 

असमानता: 57 % आय पर 10 फीसदी लोगों का क़ब्ज़ा क्यों ?

वर्ल्ड इनइक्विलिटी रिपोर्ट 2022 के  भारत दुनिया के सबसे गरीबी और गै़र बराबरी वाले मुल्कों की सूची में शामिल हो गया है। पूंजीवादी नीतियों से देश में अमीर और अमीर तो गरीब और गरीब बनते जा रहे हैं। हालांकि धनवान भारतीयों के और धनवान बनने से ईश्र्या नहीं करनी चाहिये लेकिन सवाल यह है कि ये किनके गरीब बनने की वजह से पंूजी का एकत्रीकरण कर रहे हैं? आर्थिक हालत इतनी ख़राब और चिंताजनक है कि मात्र 1 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल आय का 22 प्रतिशत हिस्सा जमा हो गया है। वहीं 50 प्रतिशत जनसंख्या को केवल 13 परसंेट ही आमदनी मिल रही है।  

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

       रिपोर्ट के मुताबिक भारत में औसत नेशनल इनकम प्रति व्यक्ति 2,04,200 रू. है। जबकि इसके विपरीत निचले स्तर पर जीवन बसर कर रहे गरीब भारतीय की आय मात्र 53,610 रू. ही है। उधर टाॅप पर 10 परसेंट नागरिकों की आमदनी गरीब लोगों की लगभग 20 गुना यानी 11,66,520 रू. है। इतना ही नहीं हमारे देश का मीडियम क्लास भी दुनिया के दूसरे मुल्कों की तुलना में काफी पीछे है। उसकी औसत सम्पत्ति 7,23,930 रू. है। जबकि शीर्ष पर मौजूद 10 प्रतिशत सबसे अमीर भारतीयों के पास 63,54,070 रू. यानी 65 प्रतिशत है। इतना ही नहीं इनमें भी 1 प्रतिशत के पास कुल सम्पत्ति का 33 प्रतिशत हिस्सा यानी 3,24,49,360 रू. है। वल्र्ड इनइक्वालिटी लैब के सह निदेशक लुकास चांसल ने यह विश्व असमानता रिपोर्ट फ्रांस के सुविख्यात इकोनोमिस्ट थाॅमस पिकेटी सहित कई विश्व प्रसिध्द विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार कर हमें आईना दिखाने को जारी की है। रिपोर्ट का एक स्याह पहलू यह है कि देश में औसत घरेलू सम्पत्ति 9,83,010 रू. है। जिनमें से सबसे नीचे के कुल आबादी के आधे गरीब वर्ग यानी 50 प्रतिशत के पास मात्र 6 प्रतिशत 66,280 रू. ही हैं। इतना ही नहीं हमारे देश मंे लिंग के आधार पर आर्थिक असमानता हाल यह है कि महिला मज़दूरों को आय मंे भागीदारी एशिया के औसत 21 से भी कम यानी 18 प्रतिशत है। हमारे देश की जो आज आर्थिक स्थिति है। उसके लिये अकेले वर्तमान मोदी सरकार को कसूरवार ठहराना ठीक नहीं होगा क्योंकि कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार 1991 में ही एल पी जी यानी लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल इकोनिमिक पाॅलिसी की नींव रख गयी थी। इसके बाद विपक्ष की संयुक्त मोर्चा सरकार देवगौड़ा और गुजराल के नेतृत्व में भी बनी। लेकिन किसी ने भी आर्थिक नीतियों को बदलने की ज़रूरत महसूस नहीं की। हालांकि इस दौरान एनडीए की भाजपा के नेतृत्व में वाजपेयी सरकार भी दो बार सत्ता में रही। लेकिन उनसे तो आमूलचूल बदलाव की आशा इसलिये भी नहीं की जा सकती थी कि वे समाजवाद के खिलाफ और पंूजीवाद के पक्ष में पहले ही खुलेआम थे। यही हाल आज मोदी सरकार का है। मोदी ने तो लगभग सारी आर्थिक नीतियां काॅरपोरेट उद्योगपतियों व पंूजीपतियों के हिसाब से ही बनानी शुरू कर दी हैं। इसलिये मोदी सरकार को विपक्ष शुरू से ही सूटबूट की सरकार कहकर चिढ़ाता रहा है। मोदी सरकार आने के बाद हमारी अर्थव्यवस्था एक तरह से बीमार हो गयी है। हालांकि इसकी वजह बिना किसी से सलाह लिये नोटबंदी बिना कैबिनेट को विश्वास में लिये देशबंदी और बिना विशेषज्ञों से चर्चा किये बिना पूरी तैयारी के लागू किया गया जीएसटी भी रहा है।  यह सच है कि 2021-22 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई से सितंबर की जीडीपी ग्रोथ 8.4 प्रतिशत रही है। इससे जनता को यह लगा कि शायद हमारी अर्थव्यवस्था एक बार फिर से पटरी पर लौट आई है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि पिछले साल हमारी अर्थव्यवस्था इसी तिमाही मंे 32.97 लाख करोड़ थी। जो इस साल 8.4 प्रशित बढ़कर 35.73 लाख करोड़ की हुयी है। लेकिन इस सच में आधा ही सच है क्योंकि पिछले साल कोरोना महामारी के असर की वजह से हमारी अर्थव्यवस्था शून्य ग्रोथ से भी नीचे चली गयी थी। इस तरह से समझ सकते हैं कि जो अर्थव्यवस्था पहले 100 रू. की थी वह 24 प्रतिशत गिरावट के बाद 76 रू. की रह गयी थी। अगर इसमें इस साल हुयी बढ़ोत्तरी जोड़ी जाये तो भी यह वहां तक भी पहुंची जहां से विगत साल नीचे गयी थी। इसको परखने का सही तरीका यह होगा कि हम अपनी अर्थव्यवस्था के हर साल के ग्रोथ रूजहान को देखें। इसके साथ ही हम जीडीपी के उन घटकों को भी चैक कर सकते हैं जिनके आधार पर किसी देश की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था 2008 से 2019 तक कम होते होते भी लगभग 7.2 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रही थी। लेकिन 2020 आते आते यह कुल 20 प्रतिशत तक कम हो चुकी है। जीडीपी को देखें तो यह निर्यात आयात के अंतर व्यवसायियों के निवेश और व्यय सरकार द्वारा जनता पर किये गये खर्च और जनता के खुद के किये व्यय को जोड़कर बनती है। इस हिसाब से मिलान करें तो पायेंगे कि कोरोना से पहले वित्त वर्ष की दूसरी तिमारी में लोगों ने कुल 20 लाख करोड़ खर्च किये थे। लेकिन इस वर्ष इसी दौरान 19 लाख करोड़ व्यय किये हैं। इसकी वजह यह हो सकती है कि उनके हाथ में खर्च करने के लिये आमदनी के तौर पर पैसा ही कम आया है। इसकी वजह यह भी है कि नये लोगों को नया रोज़गार या तो मिला नहीं रहा या कम मिल रहा है। या फिर कम वेतन पर मिल रहा है। दूसरे जिनकी कोरोना लाॅकडाउन में नौकरी चली गयी या सेलरी कम हो गयी या फिर नोटबंदी या देशबंदी से कारोबार हमेशा के लिये बंद हो गया उसका कोई ठोस व पर्याप्त हल सरकार ने सिवाय मनरेगाा पांच किलो निशुल्क अनाज और किसानों के खाते में साल में तीन बार दो दो हज़ार रू. के अब तक भी तलाश नहीं किया है। सबसे चिंता की बात यह है कि जहां अभी तक हमारा आयात निर्यात से एक लाख करोड़ अधिक है। वहीं सरकार गत वर्ष के 4 लाख करोड़ के बजाये 3 लाख करोड़ खर्च कर रही है। हमारे देश में केवल 1 से 2 प्रतिशत लोगों की आमदनी ही 50 रू. से अधिक है। अमीर लोगों की ही आमदनी बेतहाशा बढ़ते जाने से ट्रिकल डाउन होकर गरीब लोगों तक पहंुचने और उनकी गरीबी दूर होने का दावा नाकाम हो गया है। सरकार को चाहिये कि वह असंगठित क्षेत्र पर फोकस कर कृषि पर अनुदान बढ़ाये सीधे गरीबों के खाते में धन भेजे और ऐसे उद्योगों को सुविधायें बढ़ायें जो अधिक से अधिक रोज़गार पैदा करते हों, नहीं तो जीडीपी बढ़ने राष्ट्रीय आय बढ़ने और देश की सम्पत्ति बढ़ने से भी केवल अडानी अंबानी जैसे चंद मोदी मित्रों को ही लाभ होगा।                               

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

 

           

  


Wednesday, 8 December 2021

एम एस पी और किसान


 

एम एस पी: धनवानों के लिये है पैसा किसानों के लिये नहीं ?

0मोदी सरकार समझ रही थी कि तीन कृषि कानून वापस लेते ही किसान आंदोलन तत्काल ख़त्म हो जायेगा। उसको यह भी लग रहा था कि ऐसा करने से उससे नाराज़ किसान खासतौर पर पंजाब के सिख और पश्चिमी यूपी के जाट आने वाले पांच राज्यों के चुनाव में उसके साथ बिना किसी अगर मगर के थोक में खड़े हो जायेंगे। यह लेख लिखे जाने तक किसान आंदोलन न केवल चल रहा है बल्कि शहीद किसानों के परिवारों को मुआवज़ा व आंदोलन सम्बंधी मुकदमे वापस लेने की मांग सहित सरकार और किसानों के बीच एम एस पी को लेकर पंेच फंस गया है। सही मायने मंे यह एम एस पी नहीं मोदी सरकार के प्रति किसानों का अविश्वास का मामला अधिक है।

              

       एक साल से चल रहा किसान आंदोलन अपने आप में विश्व इतिहास पहले ही बन चुका है। मोदी के पहले कार्यकाल और इस बार के आध्ेा कार्यकाल में शायद ऐसा पहला मौका है। जब मोदी सरकार को जनता के किसी वर्ग के सामने झुकना पड़ा है। लेकिन ऐसे जन आंदोलन सफल होने के बाद यह भी होता रहा है कि जब सरकार दो क़दम पीछे हटती है तो आंदोलनकारी अपनी सफलता से साहस बढ़ने की वजह से उसको चार क़दम और पीछे धकेलने लगते हैं। सच तो यह है कि सरकार जिन तीन कृषि कानूनों को बनाकर किसानों की नज़र में विलेन बनी थी। उनको बिना शर्त वापस लेकर वहीं आ चुकी है। जहां से वह चली थी। लेकिन अब सही मौका  देखकर किसानों ने अपनी दूसरी अहम मांगों पर ज़ोर इसलिये देना शुरू किया है क्योंकि वे जानते हैं कि अब तवा गर्म है। अगर लंबा खिंचने या सरकार के आक्रामक रूख़ के कारण किसान आंदोलन भटक जाता या हिंसक होकर अराजकता का शिकार हो जाता तो सरकार उसको कभी का खत्म कर चुकी होती लेकिन अब चूंकि सरकार चुनाव की वजह से दबाव में आ गयी है तो किसान आगे से उसके ऐसा कानून बनाने का रास्ता बंद करने को एमएसपी की गारंटी मांग रहे हैं। ज़ाहिर है कि सरकार गारंटी का मतलब बखूबी समझती है। लेकिन अब वह ऐसी दुविधा में फंस गयी है कि न तो एमएसपी कानून बनाना चाहती है और न ही ऐसा करने से सीध्ेा मना कर सकती है। ऐसे में उसने कमैटी बनाने इस पर चर्चा करने और इस मुद्दे को टालने की लंबी कवायद की चाल चली है। सरकार चाहती है कि किसानों से टकराव हुए बिना किसी तरह फिलहाल आंदोलन ख़त्म हो जाये। जिससे आने वाले 5 राज्यों के चुनाव में उसको कम से कम नुकसान हो। उसने किसानों की पराली जलाना निरपराध होने की मांग भी समय रहते स्वीकार कर ली है। 689 किसानों के आंदोलन के दौरान शहीद होने को लेकर पहले तो केंद्र सरकार ने उसके पास कोई आंकड़ा उपलब्ध न होने का बहाना लेकर बचना चाहा लेकिन जब किसाना जि़द पर अड़ गये तो मोदी सरकार ने यह मामला राज्यों के अधिकार क्षेत्र में बताकर बीच का रास्ता निकाला। सीधी बात है कि भाजपा की राज्य सरकारें मोदी सरकार की सलाह किसी कीमत पर टाल नहीं सकती। उधर विपक्षी सरकारों ने पहले ही किसानों की शेष मांगों पर अमल करना शुरू कर दिया था। जिससे केंद्र सरकार पर किसानों का और अधिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक ही था। अब लगभग सभी राज्य सरकारें किसानों के खिलाफ आंदोलन के दौरान दर्ज केस भी वापस लेने को तैयार नज़र आ रही हैं। शहीद किसानों की वास्तविक संख्या का मामला सुलझने के बाद देर सवेर किसान परिवारों को मुआवज़ा मिलने का रास्ता भी खुल ही जायेगा। असली पेंच एम एस पी यानी फ़सलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइस पर फंसने का अंदेशा है। सरकार का दावा रहा है कि तत्काल यह इसलिये संभव नहीं है क्योंकि सरकार की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। सरकार का यह भी कहना है कि किसानों की मांग के अनुसार सभी फ़सलों पर एमएसपी की गारंटी देने से सरकार को हर साल 17 लाख करोड़ से अधिक का धन उपलब्ध कराना होगा। जबकि किसानों का कहना है कि सरकार इस मामले में दोहरा रूख़ अपना रही है। उनका आरोप है कि एक तरफ मोदी सरकार जहां अपने चहेते पूंजीपतियों कारपोरेट और चुनावी चंदा देने वाले अपने मित्रों को बैंक कर्ज ना चुकाने के बावजूद जनता के खून पसीने की कमाई से बड़ी मात्रा में राइट आॅफ यानी दिवालिया कानून के तहत एक तरह से माफ कर रही है। वहीं उन किसानों को मात्र 36,105 करोड़ रूपया एमएसपी में देने से मंुह चुरा रही है। जिनकी बदौलत देश का बजट जीडीपी और आधे से अधिक रोज़गार क्षेत्र चलता है। हाल ही में आॅल इंडिया बैंक एम्पलाइज़ एसोसियेशन ने 13 ऐसे बड़े डिफाल्टर कारोबारियोें की सूची जनहित में सार्वजनिक की है। जिसमें मोदी सरकार ने 4,46,800 करोड़ की देनदारी वाले इन काॅरपोरेट की कुल लोन की 64 प्रतिशत रकम बट्टा खाते में डालकर मात्र 1,61,820 करोड़ में मामला निबटा दिया है। हैरत और दुख  की बात यह है कि कुछ खासमखास उद्योगपतियों की तो इस लिस्ट में 95 फीसदी तक कर्ज़ राशि माफ कर दी गयी है। इतना ही नहीं जब से मोदी सरकार बनी है। उसने अपनी पसंद के ऐसे काॅरपोरेट घरानों की लगभग हर साल ही इतनी या इससे अधिक लोन की रकम माफ की है। विपक्ष का आरोप है कि इन धन्नासेठों से इसके बदले भाजपा ने मोटी रकम चुनावी चंदे के तौर पर ली है। हालांकि यह काम कांग्रेस सहित लगभग सभी दल जब जब सत्ता में रहे हैं। कम या अधिक छिपकर या खुलेआम करते ही रहे हैं। लेकिन भाजपा ने ऐसा लगता है। सभी सीमायें पार कर ली हैं। यह बात अब आईने की तरह साफ होती जा रही है कि भाजपा जनता को हिंदू मुस्लिम में उलझाकर ना केवल दोनोें वर्गों का लगातार रोज़गार शिक्षा चिकित्सा जीएसटी नोटबंदी लाॅकडाउन बंैकिंग चार्ज एटीएम चार्ज टैक्स टोल महंगाई भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी कालाधन रेल व बस किराया बढ़ाकर नुकसान करती जा रही है। वहीं अपने चहेते मुट्ठीभर पूंजीपतियों उद्योगपतियों धन्नासेठों व्यवसाइयों व्यापारियों और चहेते पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों का भरपूर जायज़ नाजायज़ भला व बचाव कर रही है। यही कारण है कि देश की कुल पंूजी और जीडीपी का लाभ चंद हाथों तक सीमित हो रहा है। इससे अमीर और अमीर व गरीब और गरीब होता जा रहा है। किसान आंदोलन की सफलता ने न केवल लोकतंत्र को मज़बूत किया है बल्कि जनता के सभी वर्गों को आंखे खोलकर धर्म जाति व भावनाओं की क्षणिक राजनीति के जाल में ना फंसकर जीवन के बुनियादी मुद्दों पर सोचने समझने और आने वाले समय में आर्थिक सामाजिक सुरक्षा प्रगति व विकास के असली मुद्दों पर चिंतन मनन करने का मौका भी दिया है।                           

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।