Thursday, 30 December 2021
लड़की की शादी की उम्र
Saturday, 18 December 2021
बैंक निजीकरण
सरकार किसके हित में बैंको का निजीकरण करना चाहती है ?
0पिछले दिनों सरकारी बैंकों के लगभग 10 लाख अधिकारी व कर्मचारी बैंकों के निजीकरण करने के सरकार के इरादे के खिलाफ दो दिन हड़ताल पर रहे। सरकार 27 बैंकों को विलय कर पहले ही 12 बड़े बैंक बना चुकी है। आगे इनको चार तक सीमित करने की योजना है। इसके साथ ही बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 और 1970 में संशोधन कर सरकारी हिस्सेदारी 51 प्रतिशत से कम कर 26 प्रतिशत किये जाने की चर्चा है। आज सरकारी बैंकोें के कुल कर्ज़ का 35 प्रतिशत ख़तरे में है। बैंकों में ठगी के मामले भी तेज़ी से बढ़े हैं। रोज़ ठगी के 229 मामले हो रहे हैं जिससे बैंको को 1.31 लाख करोड़ का चूना लगा है।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
देश के नेशनल बैंकों की कुल 1 लाख 10 हज़ार शाखाआंे मेें 150 ट्रिलियन रकम जमा है। इन राष्ट्रीयकृत बैंकों के लाभ से सरकार जनहित की अनेक योजनायंे चलाती है। जनता के खून पसीने की इस गाढ़ी कमाई से न केवल देश का आधारभूत ढांचा मज़बूत होता है बल्कि तमाम लोगों को बैंक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तरीकों से रोज़गार भी उपलब्ध कराता है। याद रखने वाली खास बात यह है कि देश के बैंकों का राष्ट्रीयकरण होने के बाद से एक भी सरकारी बैंक डूबा नहीं है। अगर कहीं किसी बैंक में कोई घोटाला या गड़बड़ी हुयी भी तो सरकार और बीमा कवर के ज़रिये लगभग 98 प्रतिशत खाताधारकों का धन वापस मिल गया है। इन बैंकों के द्वारा ही देश मंे कृषि क्रांति दुग्ध क्रांति और औद्योगिक क्रांति को अंजाम दिया गया है। पिछले वर्षों में जब जनधन खाते खोले गये तो कुल 44 करोड़ में से 41 करोड़ इन सरकारी बैंकों में ही खोले गये। आज भी निजी बैंकों के मुकाबले इन बैंकों में खाता खोलना लोन लेना एटीएम कार्ड लेना और दूसरी सुविधायें हासिल करना आसान सस्ता और सुगम है। ये अलग बात है कि बैंक स्टाफ का बड़ा वर्ग भी कुछ समय पहले तक किसानों के एक हिस्से की तरह मोदी सरकार का बड़ा समर्थक रहा है। लेकिन आज जब बैंक निजीकरण का बिल संसद के शीतकालीन सत्र में आने वाला है तो उसकी आंखें खुल गयी हैं। यूनाइटेड फोरम आॅफ बैंक यूनियन्स का दावा है कि मोदी सरकार 13 काॅरपोरेट के 4 लाख 86 हज़ार 800 करोड़ बकाया का 2 करोड़ 84 लाख 980 करोड़ लोन एनपीए करना चाहती है। फोरम का आरोप है कि जिन सरकारी बैंको को सरकार प्राइवेट कर अपना पल्ला झाड़ना चाहती है। उनमें से ही एसबीआई के बेल आउट पैकेज और एलआईसी की सहायता से आईएल एंड एफएस ग्लोबल ट्रस्ट बैंक बैंक आॅफ कराड यूनाइटेड वेस्टर्न बैंक और यस बैंक जैसों को संकट से उबारने के लिये सरकारी पूंजी का दुरूपयोग किया गया है। सवाल यह है कि सरकार किसके हित में पीएसबी यानी पब्लिक सैक्टर बैंकों को प्राइवेट करना चाहती है? विपक्ष का आरोप तो यह है कि सरकार इनको जनहित दांव पर लगाकर अपने चहेते पंूजीपति मित्रों को इसलिये देना चाहती है जिससे चुनाव आने पर उनसे मोटा चंदा वसूला जा सके। उधर पिछड़ी जाति दलितों व आदिवासी वर्ग को लगता है कि सरकार ऐसा कर उनके रोज़गार आरक्षण को चोर दरवाजे़ से बंद करना चाहती है। आरबीआई की रिपोर्ट कहती है कि 2014 से 2021 तक बैंकों का एनपीए यानी नाॅन परफाॅर्मिंग एसेट्स घोषित रूप से 15 लाख करोड़ लेकिन अपुष्ट के सूत्रों के अनुसार 25.4 लाख करोड़ हो चुका है। इसमें अगर एनबीएफसी का एनपीए और जोड़ लिया जाये तो यह 32 लाख करोड़ से भी अधिक हो जायेगा। लेकिन आरबीआई ने इसको फिलहाल रिस्ट्रक्चर्ड लोन में डालकर एनपीए के आंकड़ों को डरावना नज़र आने से रोक दिया है। आज के कुल एनपीए में 60 प्रतिशत तो केवल ब्याज का ही हिस्सा है। खास बात यह है कि कुल एनपीए का 5 प्रतिशत भी रिटेल यानी कृषि कार पढ़ाई या पर्सनल लोन नहीं है। यानी आप इस तरह समझ सकते हैं कि ये कर्ज़ देश की 95 प्रतिशत जनता को दिया गया कजऱ् नहीं है। अधिकांश लोन कारपोरेट को दिया गया है। ऐसा भी नहीं है कि सभी काॅरपोरेट डिफाल्टर हो गये हों। या विजय माल्या और नीरव मोदी की तरह बैंकों का पैसा मारकर विदेश भाग गये हों। इनमें अधिकांश लोन उस समय का है। जब इकाॅनोमी बूम पर थी। यानी ये बड़े विशालकाय कर्ज़ पाॅवर सैक्टर टेलीकाॅम बिल्डर्स बड़े कारखानों और कोयला खदानों के लिये दिये गये थे। सवाल यह है कि आखि़र इन सबका पैसा इतना और एक साथ कैसे डूबा? तो जनाब हमारे देश में सरकार राजनीति और पूंजीवाद जो ना करा दे थोड़ा है। मोबाइल काॅल और नेट सस्ता हो रहा था तो टेलीकाॅम यानी टू जी घोटाले का नकली भूत खड़ा किया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि स्पैक्ट्रम कई गुना महंगा हुआ। टेलीकाॅम की अधिकांश कंपनियों पर जुर्माना और महंगे चार्ज लगे तो जियो सरकार के अनड्यू सपोर्ट और बीएसएनएल की बरबादी की कीमत पर और एक दो और मोबाइल कंपनी को छोड़कर अधिकांश का बोरिया बिस्तर बंध गया। अब उन पर जो लोन थे वे सब एनपीए होते चले गये। कुछ ऐसा ही मामला कोयला खदानों का था। कोयला घोटाले का शोर मचा तो जिन कंपनियों को कैप्टिव पाॅवर प्लांट के लिये भारी भरकम कजऱ् बैंकों ने दिये थे। उनके लाइसेंस रद्द होने से उनको दिया लोन एनपीए हो गया। उधर अर्थव्यवस्था झूम कर मस्त हाथी की चाल चल रही थी। लोगों के हाथ में पैसा आ रहा था तो वे मकान दुकान और नई नई बनती जा रही काॅलोनियों में रिहायशी काॅमर्शियल प्लाॅट खरीद रहे थे। बड़े बड़े बिल्डर्स बैंकों से एक के बाद एक बड़ा लोन लेकर रियल स्टेट विकसित कर रहे थे। जैसे ही इकाॅनोमी गिरनी शुरू हुयी लोगों ने अपनी जेब में पैसा कम आने रोज़गार जाने नोटबंदी व देशबंदी से कारोबार तबाह या पूरी तरह बंद हो जाने से अपना हाथ खींच लिया। उधर बिल्डर्स बैंकों से लिया कजऱ् ना चुका पाने से अपना लोन एनपीए करा बैठे। ऐसे ही ओवरब्रिज हाईवे और सड़कों का जाल फैलता जा रहा था। सरकार के साथ पीपीपी यानी पब्लिक प्रावेट प्रोजैक्ट के तहत बैंकों से लोन लेकर काम करने वाली कंपनी एकाएक मुंह के बल गिरनी शुरू हो गयी। वजह यह थी कि 30 से 32 लाख करोड़ के बजट वाली सरकार ने चुनावी मोड में जनता को बहलाने के लिये 100 लाख करोड़ केे ढांचागत प्रोजैक्ट का ऐलान तो कर दिया लेकिन इतना पैसा आता कहां से? ऐसे में जो योजनायें पहले से चल भी रही थी वे भी बैंकों से आगे लोन ना मिलने से बीच में ही लटक गयीं। अब जब आगे काम ही नहीं होगा तो पिछला पैसा तो एनपीए होना ही था। इस दौरान मोदी सरकार ने मुद्रा लोन के नाम पर बिना गारंटी बिना ठोस आधार के अपने चहेते लोगों को राजनीतिक रूप से इनाम देने के लिये कई लाख करोड़ बैंक से दबाव डालकर बंटवा दिये। आज इनमें से अधिकांश का काम चैपट हो चुका है। बैंकों के पास कोई ऐसा तरीका नहीं है कि इनसे पैसा वापस वसूल सके। ऐसा ही मामला मनमोहन सरकार से लेकर मोदी सरकार तक का काॅरपोरेट को लेकर उदार लोन देने का रहा है। आज जब उन चहेते पंूजीपतियों उद्योगपतियों और व्यवसायियों के दिवाले निकल चुके हैं तो उनका लोन एनपीए होने के अलावा कोई रास्ता बचा ही नहीं है। एक आंकड़े के अनुसार देश के सरकारी बैंकों का कुल लोन 101 लाख करोड़ के आसपास है। कोरोना के दौर में पिछले साल मोदी सरकार ने 20 लाख करोड़ का पैकेज कारोबारियों को देने का एलान बड़े जोरशोर से किया था। लेकिन इसका कोई विशेष लाभ हमारी अर्थव्यवस्था को नहीं मिलता दिखा क्योंकि हमारे देश में उत्पादन बढ़ाने को पैसे की नहीं खरीदारी करने को आम जनता के पास पैसे की कमी लगातार बढ़ती जा रही है। अगर मोदी सरकार बैंक निजीकरण का घातक विचार नहीं छोड़ती है तो देश में जो थोड़ी बहुत जनहित की स्कीमंे चल रही है और धीरे धीरे अर्थव्यवस्था सुधरने की आशा की जा रही है वह भी संकट में पड़ जायेगी।
Monday, 13 December 2021
आर्थिक असमानता
असमानता: 57 % आय पर 10 फीसदी लोगों का क़ब्ज़ा क्यों ?
वर्ल्ड इनइक्विलिटी रिपोर्ट 2022 के भारत दुनिया के सबसे गरीबी और गै़र बराबरी वाले मुल्कों की सूची में शामिल हो गया है। पूंजीवादी नीतियों से देश में अमीर और अमीर तो गरीब और गरीब बनते जा रहे हैं। हालांकि धनवान भारतीयों के और धनवान बनने से ईश्र्या नहीं करनी चाहिये लेकिन सवाल यह है कि ये किनके गरीब बनने की वजह से पंूजी का एकत्रीकरण कर रहे हैं? आर्थिक हालत इतनी ख़राब और चिंताजनक है कि मात्र 1 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल आय का 22 प्रतिशत हिस्सा जमा हो गया है। वहीं 50 प्रतिशत जनसंख्या को केवल 13 परसंेट ही आमदनी मिल रही है।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
रिपोर्ट के मुताबिक भारत में औसत नेशनल इनकम प्रति व्यक्ति 2,04,200 रू. है। जबकि इसके विपरीत निचले स्तर पर जीवन बसर कर रहे गरीब भारतीय की आय मात्र 53,610 रू. ही है। उधर टाॅप पर 10 परसेंट नागरिकों की आमदनी गरीब लोगों की लगभग 20 गुना यानी 11,66,520 रू. है। इतना ही नहीं हमारे देश का मीडियम क्लास भी दुनिया के दूसरे मुल्कों की तुलना में काफी पीछे है। उसकी औसत सम्पत्ति 7,23,930 रू. है। जबकि शीर्ष पर मौजूद 10 प्रतिशत सबसे अमीर भारतीयों के पास 63,54,070 रू. यानी 65 प्रतिशत है। इतना ही नहीं इनमें भी 1 प्रतिशत के पास कुल सम्पत्ति का 33 प्रतिशत हिस्सा यानी 3,24,49,360 रू. है। वल्र्ड इनइक्वालिटी लैब के सह निदेशक लुकास चांसल ने यह विश्व असमानता रिपोर्ट फ्रांस के सुविख्यात इकोनोमिस्ट थाॅमस पिकेटी सहित कई विश्व प्रसिध्द विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार कर हमें आईना दिखाने को जारी की है। रिपोर्ट का एक स्याह पहलू यह है कि देश में औसत घरेलू सम्पत्ति 9,83,010 रू. है। जिनमें से सबसे नीचे के कुल आबादी के आधे गरीब वर्ग यानी 50 प्रतिशत के पास मात्र 6 प्रतिशत 66,280 रू. ही हैं। इतना ही नहीं हमारे देश मंे लिंग के आधार पर आर्थिक असमानता हाल यह है कि महिला मज़दूरों को आय मंे भागीदारी एशिया के औसत 21 से भी कम यानी 18 प्रतिशत है। हमारे देश की जो आज आर्थिक स्थिति है। उसके लिये अकेले वर्तमान मोदी सरकार को कसूरवार ठहराना ठीक नहीं होगा क्योंकि कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार 1991 में ही एल पी जी यानी लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल इकोनिमिक पाॅलिसी की नींव रख गयी थी। इसके बाद विपक्ष की संयुक्त मोर्चा सरकार देवगौड़ा और गुजराल के नेतृत्व में भी बनी। लेकिन किसी ने भी आर्थिक नीतियों को बदलने की ज़रूरत महसूस नहीं की। हालांकि इस दौरान एनडीए की भाजपा के नेतृत्व में वाजपेयी सरकार भी दो बार सत्ता में रही। लेकिन उनसे तो आमूलचूल बदलाव की आशा इसलिये भी नहीं की जा सकती थी कि वे समाजवाद के खिलाफ और पंूजीवाद के पक्ष में पहले ही खुलेआम थे। यही हाल आज मोदी सरकार का है। मोदी ने तो लगभग सारी आर्थिक नीतियां काॅरपोरेट उद्योगपतियों व पंूजीपतियों के हिसाब से ही बनानी शुरू कर दी हैं। इसलिये मोदी सरकार को विपक्ष शुरू से ही सूटबूट की सरकार कहकर चिढ़ाता रहा है। मोदी सरकार आने के बाद हमारी अर्थव्यवस्था एक तरह से बीमार हो गयी है। हालांकि इसकी वजह बिना किसी से सलाह लिये नोटबंदी बिना कैबिनेट को विश्वास में लिये देशबंदी और बिना विशेषज्ञों से चर्चा किये बिना पूरी तैयारी के लागू किया गया जीएसटी भी रहा है। यह सच है कि 2021-22 की दूसरी तिमाही यानी जुलाई से सितंबर की जीडीपी ग्रोथ 8.4 प्रतिशत रही है। इससे जनता को यह लगा कि शायद हमारी अर्थव्यवस्था एक बार फिर से पटरी पर लौट आई है। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि पिछले साल हमारी अर्थव्यवस्था इसी तिमाही मंे 32.97 लाख करोड़ थी। जो इस साल 8.4 प्रशित बढ़कर 35.73 लाख करोड़ की हुयी है। लेकिन इस सच में आधा ही सच है क्योंकि पिछले साल कोरोना महामारी के असर की वजह से हमारी अर्थव्यवस्था शून्य ग्रोथ से भी नीचे चली गयी थी। इस तरह से समझ सकते हैं कि जो अर्थव्यवस्था पहले 100 रू. की थी वह 24 प्रतिशत गिरावट के बाद 76 रू. की रह गयी थी। अगर इसमें इस साल हुयी बढ़ोत्तरी जोड़ी जाये तो भी यह वहां तक भी पहुंची जहां से विगत साल नीचे गयी थी। इसको परखने का सही तरीका यह होगा कि हम अपनी अर्थव्यवस्था के हर साल के ग्रोथ रूजहान को देखें। इसके साथ ही हम जीडीपी के उन घटकों को भी चैक कर सकते हैं जिनके आधार पर किसी देश की अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था 2008 से 2019 तक कम होते होते भी लगभग 7.2 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रही थी। लेकिन 2020 आते आते यह कुल 20 प्रतिशत तक कम हो चुकी है। जीडीपी को देखें तो यह निर्यात आयात के अंतर व्यवसायियों के निवेश और व्यय सरकार द्वारा जनता पर किये गये खर्च और जनता के खुद के किये व्यय को जोड़कर बनती है। इस हिसाब से मिलान करें तो पायेंगे कि कोरोना से पहले वित्त वर्ष की दूसरी तिमारी में लोगों ने कुल 20 लाख करोड़ खर्च किये थे। लेकिन इस वर्ष इसी दौरान 19 लाख करोड़ व्यय किये हैं। इसकी वजह यह हो सकती है कि उनके हाथ में खर्च करने के लिये आमदनी के तौर पर पैसा ही कम आया है। इसकी वजह यह भी है कि नये लोगों को नया रोज़गार या तो मिला नहीं रहा या कम मिल रहा है। या फिर कम वेतन पर मिल रहा है। दूसरे जिनकी कोरोना लाॅकडाउन में नौकरी चली गयी या सेलरी कम हो गयी या फिर नोटबंदी या देशबंदी से कारोबार हमेशा के लिये बंद हो गया उसका कोई ठोस व पर्याप्त हल सरकार ने सिवाय मनरेगाा पांच किलो निशुल्क अनाज और किसानों के खाते में साल में तीन बार दो दो हज़ार रू. के अब तक भी तलाश नहीं किया है। सबसे चिंता की बात यह है कि जहां अभी तक हमारा आयात निर्यात से एक लाख करोड़ अधिक है। वहीं सरकार गत वर्ष के 4 लाख करोड़ के बजाये 3 लाख करोड़ खर्च कर रही है। हमारे देश में केवल 1 से 2 प्रतिशत लोगों की आमदनी ही 50 रू. से अधिक है। अमीर लोगों की ही आमदनी बेतहाशा बढ़ते जाने से ट्रिकल डाउन होकर गरीब लोगों तक पहंुचने और उनकी गरीबी दूर होने का दावा नाकाम हो गया है। सरकार को चाहिये कि वह असंगठित क्षेत्र पर फोकस कर कृषि पर अनुदान बढ़ाये सीधे गरीबों के खाते में धन भेजे और ऐसे उद्योगों को सुविधायें बढ़ायें जो अधिक से अधिक रोज़गार पैदा करते हों, नहीं तो जीडीपी बढ़ने राष्ट्रीय आय बढ़ने और देश की सम्पत्ति बढ़ने से भी केवल अडानी अंबानी जैसे चंद मोदी मित्रों को ही लाभ होगा।
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Wednesday, 8 December 2021
एम एस पी और किसान
एम एस पी: धनवानों के लिये है पैसा किसानों के लिये नहीं ?
0मोदी सरकार समझ रही थी कि तीन कृषि कानून वापस लेते ही किसान आंदोलन तत्काल ख़त्म हो जायेगा। उसको यह भी लग रहा था कि ऐसा करने से उससे नाराज़ किसान खासतौर पर पंजाब के सिख और पश्चिमी यूपी के जाट आने वाले पांच राज्यों के चुनाव में उसके साथ बिना किसी अगर मगर के थोक में खड़े हो जायेंगे। यह लेख लिखे जाने तक किसान आंदोलन न केवल चल रहा है बल्कि शहीद किसानों के परिवारों को मुआवज़ा व आंदोलन सम्बंधी मुकदमे वापस लेने की मांग सहित सरकार और किसानों के बीच एम एस पी को लेकर पंेच फंस गया है। सही मायने मंे यह एम एस पी नहीं मोदी सरकार के प्रति किसानों का अविश्वास का मामला अधिक है।
एक साल से चल रहा किसान आंदोलन अपने आप में विश्व इतिहास पहले ही बन चुका है। मोदी के पहले कार्यकाल और इस बार के आध्ेा कार्यकाल में शायद ऐसा पहला मौका है। जब मोदी सरकार को जनता के किसी वर्ग के सामने झुकना पड़ा है। लेकिन ऐसे जन आंदोलन सफल होने के बाद यह भी होता रहा है कि जब सरकार दो क़दम पीछे हटती है तो आंदोलनकारी अपनी सफलता से साहस बढ़ने की वजह से उसको चार क़दम और पीछे धकेलने लगते हैं। सच तो यह है कि सरकार जिन तीन कृषि कानूनों को बनाकर किसानों की नज़र में विलेन बनी थी। उनको बिना शर्त वापस लेकर वहीं आ चुकी है। जहां से वह चली थी। लेकिन अब सही मौका देखकर किसानों ने अपनी दूसरी अहम मांगों पर ज़ोर इसलिये देना शुरू किया है क्योंकि वे जानते हैं कि अब तवा गर्म है। अगर लंबा खिंचने या सरकार के आक्रामक रूख़ के कारण किसान आंदोलन भटक जाता या हिंसक होकर अराजकता का शिकार हो जाता तो सरकार उसको कभी का खत्म कर चुकी होती लेकिन अब चूंकि सरकार चुनाव की वजह से दबाव में आ गयी है तो किसान आगे से उसके ऐसा कानून बनाने का रास्ता बंद करने को एमएसपी की गारंटी मांग रहे हैं। ज़ाहिर है कि सरकार गारंटी का मतलब बखूबी समझती है। लेकिन अब वह ऐसी दुविधा में फंस गयी है कि न तो एमएसपी कानून बनाना चाहती है और न ही ऐसा करने से सीध्ेा मना कर सकती है। ऐसे में उसने कमैटी बनाने इस पर चर्चा करने और इस मुद्दे को टालने की लंबी कवायद की चाल चली है। सरकार चाहती है कि किसानों से टकराव हुए बिना किसी तरह फिलहाल आंदोलन ख़त्म हो जाये। जिससे आने वाले 5 राज्यों के चुनाव में उसको कम से कम नुकसान हो। उसने किसानों की पराली जलाना निरपराध होने की मांग भी समय रहते स्वीकार कर ली है। 689 किसानों के आंदोलन के दौरान शहीद होने को लेकर पहले तो केंद्र सरकार ने उसके पास कोई आंकड़ा उपलब्ध न होने का बहाना लेकर बचना चाहा लेकिन जब किसाना जि़द पर अड़ गये तो मोदी सरकार ने यह मामला राज्यों के अधिकार क्षेत्र में बताकर बीच का रास्ता निकाला। सीधी बात है कि भाजपा की राज्य सरकारें मोदी सरकार की सलाह किसी कीमत पर टाल नहीं सकती। उधर विपक्षी सरकारों ने पहले ही किसानों की शेष मांगों पर अमल करना शुरू कर दिया था। जिससे केंद्र सरकार पर किसानों का और अधिक दबाव बढ़ना स्वाभाविक ही था। अब लगभग सभी राज्य सरकारें किसानों के खिलाफ आंदोलन के दौरान दर्ज केस भी वापस लेने को तैयार नज़र आ रही हैं। शहीद किसानों की वास्तविक संख्या का मामला सुलझने के बाद देर सवेर किसान परिवारों को मुआवज़ा मिलने का रास्ता भी खुल ही जायेगा। असली पेंच एम एस पी यानी फ़सलों के मिनिमम सपोर्ट प्राइस पर फंसने का अंदेशा है। सरकार का दावा रहा है कि तत्काल यह इसलिये संभव नहीं है क्योंकि सरकार की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। सरकार का यह भी कहना है कि किसानों की मांग के अनुसार सभी फ़सलों पर एमएसपी की गारंटी देने से सरकार को हर साल 17 लाख करोड़ से अधिक का धन उपलब्ध कराना होगा। जबकि किसानों का कहना है कि सरकार इस मामले में दोहरा रूख़ अपना रही है। उनका आरोप है कि एक तरफ मोदी सरकार जहां अपने चहेते पूंजीपतियों कारपोरेट और चुनावी चंदा देने वाले अपने मित्रों को बैंक कर्ज ना चुकाने के बावजूद जनता के खून पसीने की कमाई से बड़ी मात्रा में राइट आॅफ यानी दिवालिया कानून के तहत एक तरह से माफ कर रही है। वहीं उन किसानों को मात्र 36,105 करोड़ रूपया एमएसपी में देने से मंुह चुरा रही है। जिनकी बदौलत देश का बजट जीडीपी और आधे से अधिक रोज़गार क्षेत्र चलता है। हाल ही में आॅल इंडिया बैंक एम्पलाइज़ एसोसियेशन ने 13 ऐसे बड़े डिफाल्टर कारोबारियोें की सूची जनहित में सार्वजनिक की है। जिसमें मोदी सरकार ने 4,46,800 करोड़ की देनदारी वाले इन काॅरपोरेट की कुल लोन की 64 प्रतिशत रकम बट्टा खाते में डालकर मात्र 1,61,820 करोड़ में मामला निबटा दिया है। हैरत और दुख की बात यह है कि कुछ खासमखास उद्योगपतियों की तो इस लिस्ट में 95 फीसदी तक कर्ज़ राशि माफ कर दी गयी है। इतना ही नहीं जब से मोदी सरकार बनी है। उसने अपनी पसंद के ऐसे काॅरपोरेट घरानों की लगभग हर साल ही इतनी या इससे अधिक लोन की रकम माफ की है। विपक्ष का आरोप है कि इन धन्नासेठों से इसके बदले भाजपा ने मोटी रकम चुनावी चंदे के तौर पर ली है। हालांकि यह काम कांग्रेस सहित लगभग सभी दल जब जब सत्ता में रहे हैं। कम या अधिक छिपकर या खुलेआम करते ही रहे हैं। लेकिन भाजपा ने ऐसा लगता है। सभी सीमायें पार कर ली हैं। यह बात अब आईने की तरह साफ होती जा रही है कि भाजपा जनता को हिंदू मुस्लिम में उलझाकर ना केवल दोनोें वर्गों का लगातार रोज़गार शिक्षा चिकित्सा जीएसटी नोटबंदी लाॅकडाउन बंैकिंग चार्ज एटीएम चार्ज टैक्स टोल महंगाई भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी कालाधन रेल व बस किराया बढ़ाकर नुकसान करती जा रही है। वहीं अपने चहेते मुट्ठीभर पूंजीपतियों उद्योगपतियों धन्नासेठों व्यवसाइयों व्यापारियों और चहेते पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों का भरपूर जायज़ नाजायज़ भला व बचाव कर रही है। यही कारण है कि देश की कुल पंूजी और जीडीपी का लाभ चंद हाथों तक सीमित हो रहा है। इससे अमीर और अमीर व गरीब और गरीब होता जा रहा है। किसान आंदोलन की सफलता ने न केवल लोकतंत्र को मज़बूत किया है बल्कि जनता के सभी वर्गों को आंखे खोलकर धर्म जाति व भावनाओं की क्षणिक राजनीति के जाल में ना फंसकर जीवन के बुनियादी मुद्दों पर सोचने समझने और आने वाले समय में आर्थिक सामाजिक सुरक्षा प्रगति व विकास के असली मुद्दों पर चिंतन मनन करने का मौका भी दिया है।
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Saturday, 27 November 2021
संविधान दिवस
Monday, 22 November 2021
कृषि कानून की वापसी
किसान कानूनों की वापसी लोकतंत्र की जीत ?
0 अब तक का रिकाॅर्ड तो यही बताता है कि पीएम मोदी एक बार कोई फ़ैसला कर लें तो उससे पीछे नहीं हटते। लेकिन 3 विवादित कृषि कानूनों की वापसी से यह धारणा टूटी है। हालांकि अभी गारंटी से यह नहीं कहा जा सकता कि ये काले कानून फिर से किसी और रूप और उचित समय पर वापस नहीं आयेेेंगे। जैसा कि भाजपा नेता और राजस्थान के गवर्नर कलराज मिश्र और भाजपा सांसद साक्षी महाराज ने कहा भी है कि फिलहाल के हालात में कानून वापस लिये गये हैं। अगर चुनाव में हार के डर से भी ऐसा हुआ है तो इसे बचे खुचेे लोकतंत्र की जीत माना जाना चाहिये।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
3 किसान कानून जिस तरह शाॅर्टकट से जल्दीबाज़ी में संसद से पास हुए थे। तभी से यह आरोप लग रहे थे कि मोदी सरकार काॅरपोरेट के पक्ष में किसानों के हितों की बलि चढ़ा रही है। दुर्भाग्य से विपक्ष न तो राज्यसभा में सरकार के अल्पमत में होने के बाद भी और न ही सड़कों पर कोई बड़ा आंदोलन चलाकर सरकार को इन काले कानूनों की वापसी के लिये मजबूर कर सका। उधर सुप्रीम कोर्ट में जब इन विवादित कानूनों के खिलाफ जनहित याचिका दाखि़ल की गयीं तो सबसे बड़ी अदालत ने इन पर कुछ समय के लिये रोक तो लगा दी थी लेकिन इनकी वैधता पर विचार करने को जो हाईपाॅवर कमैटी बनाई उस पर किसानों ने भरोसा नहीं किया। उधर सरकार ने शुरू शुरू में तो इन कानूनोें के विरोध पर कान ही नहीं दिये। साथ ही किसानों को इनके विरोध में आंदोलन करने से रोकने को दिल्ली को सील कर दिया। उनके रास्ते में कीलें और दीवारें बना दी गयीं। सरकार ने दिखावे के लिये किसानों से बात भी की लेकिन वह कानून किसी हाल में वापस न लेने पर अड़ी रही जिससे कोई बीच का रास्ता नहीं निकल सका। पहले सरकार ने किसानोें के आंदोलन को चंद प्रोफेशनल व आंदोलनजीवी लोगों का व्यवसायिक स्वार्थ वाला मामूली आंदोलन बताया। उसके बाद विरोध करने वाले किसानों को अमीर मुट्ठीभर किसानों की संज्ञा दी गयी। इसके बाद ऐसे किसानों को विपक्ष का एजेंट बताकर पाॅलिटिकल एजेंडा चलाने का अभियान चलाया गया। इसके बाद इन कानूनों का विरोध करने वालों को विदेशी शक्तियोें के इशारे पर देशविरोधी क़रार देकर सोशल मीडिया पर टूलकिट बनाकर साजि़श रचने के मामले मंे किसानों को गुमराह करने का आरोप लगाकर दिशा रवि जैसी एक युवा समाज सेविका को जेल भेजा गया। इसके बाद इसी साल 26 जनवरी को जब किसान लालकिले पर प्रतीक रूप से अपना विरोध दर्ज कराने को जा रहे थे। तब भी उन पर बड़ा षड्यंत्र का हिस्सा होने का आरोप लगाकर कई गंभीर केस दर्ज किये गये। इतना ही नहीं 12 जनवरी को सरकार के अटाॅर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने सुप्रीम कोर्ट में इन कानूनों पर सुनवाई के दौरान यहां तक आरोप लगाया कि किसानों के विरोध प्रदर्शन की आड़ में दिल्ली की सीमा पर खालिस्तानियों ने अपनी पैठ बना ली है। जबकि इसकी वजह किसान आंदोलन में पंजाब के सिख किसानों की बड़ी भागीदारी होना था। इस दौरान जहां एक केंद्रीय मंत्री और हरियाणा के सीएम पर आंदोलनकारी किसानों को धमकाने और मंत्री पुत्र पर किसानों पर जानबूझकर जीप चढ़ाने का आरोप लगा। वहीं लगभग 700 किसानों के इस दौरान शहीद होने के बावजूद पीएम से लेकर भाजपा के किसी सीएम या बड़े नेता ने सहानुभूति का एक शब्द नहीं बोला। ऐसे में मृतक किसानों के परिवारों को मुआवज़ा देने का तो सवाल ही नहीं उठता। इतना कुछ होने के बावजूद पीएम ने इन काले कानूनों को वापस लेने के ऐलान के दौरान एक बार भी यह नहीं माना कि ये किसान विरोधी कानून लाना उनकी सरकार की भूल थी। उनका दावा था कि उनकी तपस्या में कुछ कमी रह गयी। उन्होंने यह भी स्वीकारा कि वे किसानों को इन कानूनों के उनके ही पक्ष में होने के लाभ नहीं समझा पाये। अब यह बात अलग है कि जब लाभ थे ही नहीं तो वे समझाते कैसे? कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का शुरू से ही दावा था कि विरोध करने वाले चंद किसान हैं। जबकि बड़ी संख्या में किसान इन कानूनों के पक्ष में हैं। अब सवाल यह उठता है कि जब ऐसा था तो सरकार ने इन कानूनों को वापस लेकर अधिकांश किसानों का अहित क्यों किया? लोकतंत्र तो बहुमत से चलता है। इसका जवाब यह माना जा सकता है कि अगले साल के शुरू मंे यूपी सहित पांच राज्यों के चुनाव में भाजपा को इन कानूनों के रहते अपनी हार का डर कुछ अधिक ही सता रहा था। पंजाब में कांग्रेस से अलग हुए पूर्व सीएम कैप्टन अमरेंद्र सिंह अब भाजपा के साथ गठबंधन कर सकते हैं। इसके साथ भाजपा का पूर्व साहयोगी अकाली दल भी फिर से उसके साथ आने पर विचार कर सकता है। उधर कानून वापसी से हरियाणा में भाजपा के सहयोगी जाट नेता दुष्यंत चैटाला भाजपा सरकार में बने रहेंगे। यूपी में भाजपा का बहुत कुछ दांव पर लगा है। यहां खराब कानून व्यवस्था से लेकर बेलगाम पुलिस रिश्वतखोर नौकरशाही जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था लगातार सिमटते सरकारी स्कूल बढ़ती महंगाई बेरोज़गारी और रूका हुआ विकास सीएम योगी के लिये किसानों का विरोध ताबूत में आखि़री कील की तरह साबित होने का ख़तरा लग रहा था। हालांकि योगी की अपनी कट्टर हिंदूवादी छवि के चलते भाजपा की जीत को पहले से कुछ वोट और सीट घटने के बावजूद संघ पक्का मानकर चल रहा है। अब किसान कानून वापसी से यूपी में ही नहीं अन्य चार राज्यों में भी भाजपा को सियासी नुकसान कम होगा। इससे एक बात साफ हो गयी है कि भाजपा हिंदू मुस्लिम के मुद्दे पर भावनाओं की राजनीति करके एक दो बार तो सरकार बना सकती है। लेकिन आर्थिक भौतिक सामाजिक यानी जीवन के बुनियादी मुद्दों को दरकिनार करके लगातार न तो चुनाव जीत सकती है ना ही अपनी जि़द मनमानी और साम्प्रदायिक नीतियों से सत्ता में टिकी रह सकती है। चुनाव में हार के डर सेे ही सही विपक्ष के अपर्याप्त विरोध और बिके हुए गोदी मीडिया से ना सही लेकिन किसानों ने अपनी मेहनत लगन और कुरबानी से अपनी जायज़ बात मनवाकर लोकतंत्र को एक बार फिर से जि़दा कर दिया है। अब देखना यह है कि आगे देश के अन्य वर्ग भी मोदी और भाजपा सरकारों के जनविरोधी कामों का किसानोें की तरह जबरदस्त विरोध करते हैं कि नहीं और भाजपा सरकार उन की मांगों पर भी झुकती है या फिर से आगे मौका देखकर होमवर्क कर विरोध से निबटने की पूरी तैयारी कर घुमा फिराकर कृषि कानून एक बार फिर वापस लाती है?
0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।
Sunday, 7 November 2021
योगी बनाम केजरीवाल
मोदी का हिंदुत्व कार्ड छीन सकते हैं योगी या केजरीवाल?
0 स्व0 अटल बिहारी वाजपेयी लालकृष्ण आडवाणी नरेंद्र मोदी के बाद योगी या केजरीवाल? कट्टरपंथ साम्प्रदायिकता और जातिवाद जैसी चुनावी धरणाओं में आपने देखा होगा कि इनके नायक एक के बाद एक पहले वाले से और अधिक उग्र संकीर्ण व आक्रामक होते जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनता का बड़ा वर्ग अपने मूल बुनियादी मुद्दों को छोड़कर आगे भी मोदी के और अधिक कट्टर विकल्प आदित्यनाथ योगी को यूपी के आगामी चुनाव में जिताकर भविष्य का पीएम बनाने का सपना देख रहा है या फिर नरम हिंदुत्व के साथ साथ सबके विकास का प्रतीक बने अरविंद केजरीवाल को दिल्ली के बाद पूरे देश में विस्तार का मौका मिल सकता है?
-इक़बाल हिंदुस्तानी
पहले गुजरात जिस तरह से हिंदुत्व की प्रयोगशाला माना जाता था। उसी तरह से आज यूपी योगी के नेतृत्व में हिंदुत्व की नई प्रयोगशाला बन गया है। वैसे तो योगी सीएम बनने से पहले कई बार सांसद रहे। लेकिन वे कभी किसी सरकार में मंत्री नहीं रहे। उनको बिना शासन का अनुभव कराये सीध्ेा यूपी जैसे बड़े प्रदेश का सीएम बनाने का फैसला आरएसएस ने बहुत सोच समझकर ही किया था। जिस तरह से गुजरात के सीएम रहते और केंद्र में पीएम बनकर भी मोदी संघ की कोई बात नहीं टालते। ठीक इसी तरह योगी भी संघ को किसी बात पर नाराज़ नहीं करते हैं। यही उनकी उनकी सबसे बड़ी ताकत है। पिछले दिनों उत्तराखंड कर्नाटक और गुजरात में भाजपा ने एक के बाद एक अपने पुराने और धुरंधर सीएम एक झटके में बदल डाले लेकिन योगी को हटाने की हिम्मत नहीं की। योगी की शक्ति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने भाजपा हाईकमान और मोदी शाह के चाहने के बावजूद एक ब्रहम्ण पूर्व नौकरशाह को अपने मंत्रिमंडल में लेने से साफ मना कर दिया लेकिन उनको किसी ने ऐसा करने या पद छोड़ने को मजबूर नहीं किया। दरअसल यह संघ की ही सपोर्ट थी जो योगी के पीछे चट्टान की तरह खड़ी रही है। अब सवाल यह है कि योगी का हिंदुत्व माॅडल यूपी में उनके ही नेतृत्व में फिर से जीत हासिल करेगा? अमित शाह ने यहां तक कह दिया है कि अगर योगी यूपी में फिर से जीतकर सरकार बनाते हैं तो ही 2024 में मोदी भी पीएम बन पायेंगे। यह बात सच है कि योगी अपनी कट्टर हिंदूवादी सोच की वजह से यूपी में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। लेकिन विकास रोज़गार कानून व्यवस्था कोरोना संकट भ्रष्टाचार शिक्षा चिकित्सा यानी जीवन के बुनियादी क्षेत्रों में उनका रिकार्ड अच्छा नहीं है। विपक्ष ने उनकी छवि सबसे अधिक अल्पसंख्यक विरोधी बना दी है। उन पर नौकरशाही में अपनी जाति के लोगों को बढ़ावा देने का आरोप भी लगता रहा है। लेकिन सीट और वोट घटने के बावजूद उनकी यूपी में फिर से जीत के आसार अधिक नज़र आते हैं। दूसरी तरफ मोदी के हिंदुत्व के तौर तरीकों की नकल करते हुए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल आम आदमी पार्टी का पूरे देश मेें विस्तार करने का सपना देख रहे हैं। हालांकि आज भी देश में भाजपा के बाद सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है। लेकिन लोग मोदी या भाजपा से नाराज़ होने के बाद क्या 50 साल तक आज़माई हुयी कांग्रेस पार्टी को एक और मौका देंगे या केजरीवाल जैसे नरम हिंदुत्व के साथ दिल्ली विकास का माॅडल लेकर चल रही आम आदमी पार्टी जैसी जुमा जुमा आठ दिन की पार्टी को केवल और केवल उसके भाजपा एजेंडे की नक़ल करने से धीरे धीरे कुछ राज्यों में उसकी ओर आकृषित होने लगेंगे? यह भी हो सकता है कि कम्युनिस्टों के साथ बंगाल बिहार और यूपी की क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस की बजाये आप जैसी पार्टियों से गठबंधन कर राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा मोर्चा खड़ा करें। आप टीएमसी के बाद अकेली पार्टी है जिसका विस्तार अब तक दिल्ली से बाहर पंजाब गुजरात गोवा और उत्तराखंड में होने जा रहा है। अगले साल पांच राज्यों के चुनाव के बाद वह देश की आठवीं राष्ट्रीय स्तर की मान्यता पाने वाली पार्टी बन सकती है। हालांकि केंद्र की सत्ता में पैर जमाने या अपने समर्थन से सरकार बनाने में आप को अभी कई दशक भी लग सकते हैं। लेकिन अरविंद केजरील जिस तरह से नरम हिंदुत्व का कार्ड खेल रहे हैं। उससे साफ नज़र आ रहा है कि भाजपा का विकल्प कांग्रेस वामपंथी या क्षेत्रीय दल आज इसलिये नहीं बन सकते क्योंकि इन सबकी छवि संघ परिवार ने हिंदू विरोधी देशविरोधी और मुसलमान समर्थक बना दी है। आप ने इस रण्नीति को समझा है। केजरीवाल ने राष्ट्रवाद हिंदू इतिहास और सेना का महिमामंडन शुरू कर दिया है। वो दिल्ली में सार्वजनिक रूप से हनुमान मंदिर जाते हैं। साथ ही सरकारी स्तर पर दिवाली की पूजा करते हैं। वे शाहीन बाग़ के आंदोलन और दिल्ली दंगों पर राजनीतिक गुण भाग के हिसाब से चुप्पी साध जाते हैं। वे जेएनयू के कन्हैया और उमर खालिद पर देशद्रोह का मुकदमा चलाने की अनुमति दे देते हैं। वे दिल्ली के हिंदू तीर्थ यात्रियों को 2018 में ही रामायण एक्सप्रैस के द्वारा सीतामढ़ी नेपाल के जनकपुर वाराणसी प्रयाग चित्रकूट हम्पी नासिक और रामेश्वरम जैसे तीर्थ स्थलों पर सरकारी खर्च पर रवाना कर चुके हैं। इसके एक महीने बाद ही केजरीवाल ने अपनी सेकुलर छवि को थोड़ा बहुत बचाये रखने के लिये मुसलमानों और सिखों के लिये भी ऐसी ही तीर्थ यात्रा का ऐलान किया था। दिल्ली विधानसभा के चुनाव से पहले जब मोदी ने राम मंदिर के लिये ट्रस्ट की घोषणा की तो केजरीवाल ने सारे विपक्ष से बाजी लेते हुए बयान दिया कि अच्छे काम के लिये कोई सही समय नहीं होता है। हाल ही में केजरीवाल रामलला के दर्शन भी कर आये हैं। उन्होंने उत्तराखंड के चुनाव में देवस्थानम कानून जो कि हिंदू मंदिरों में सरकारी दख़ल की व्यवस्था करता है, को सत्ता में आने पर ख़त्म करने और इस देवभूमि को विश्व की सर्वश्रेष्ठ हिंदू आध्यात्मिक केेंद्र के रूप में विकसित करने का एलान किया है। यह एक तरह से भाजपा से उसका हिंदू कार्ड छीनने का प्रयास माना जा रहा है क्योंकि भाजपा वहां सत्ता में रहते हुए ये काम नहीं कर सकी है। गुजरात में भी केजरीवाल ने चुनाव प्रचार की शुरूआत करते हुए अहमदाबाद के एक मशहूर मंदिर में भगवान श्रीकृष्ण का आशीर्वाद लेने की पहल की थी। हाल ही में केजरीवाल ने भगत सिंह की जयंती पर स्कूली बच्चो को कोर्स में देशभक्ति पढ़ाने तिरंगा यात्रा का समापन अयोध्या में राम मंदिर में करने दिल्ली में 500 हाईमास्ट तिरंगे लगाने का फैसला भी किया है। अब देखना यह है कि जब राजनीति में भाजपा जैसा कट्टर हिंदूवादी विकल्प मौजूद है तो ऐसे में केजरीवाल के नरम हिंदूवादी विकल्प को केवल सस्ती बिजली निशुल्क पानी और बेहतर इलाज के नाम पर मतदाता कितना पसंद करते हैं? या फिर वे योगी के मोदी से भी कट्टर हिंदुत्व नायक और कड़क शासक के साथ बिना किसी ठोस विकास के भी जाने का फैसला करते हैं?