Tuesday, 1 August 2017

टैक्स चोर कौन?

*क्या वास्तव में जनता टैक्स चोर है?*

हमारे देश में जनता का यह आरोप रहा है किअपवादों को छोड़कर आमतौर पर नेता बेईमानऔर झूठे होते हैं। लेकिन नेताओं ने खुद कोईमानदार और सच्चा साबित करने की बजायेजनता को टैक्स चोर बताना शुरू कर दिया है।

पहले हमारे देश में यह धरणा बनाई गयी कि व्यापारी अकसर टैक्स चोरी करते हैं। इसके बादइस दायरे का विस्तार करते हुए लगभग सारीजनता को को लपेटे में ले लिया गया। सरकारका कहना है कि देश की सवा सौ करोड़ आबादीमें मात्र 3 करोड़ 60 लाख लोग ही इनकम टैक्सअदा करते हैं। सरकार का दावा है कि मुल्क मेंवास्तव में इतने कम लोग आयकर दाता कैसेनहीं हो सकते। जब हम 125 करोड़ और 3.6करोड़ के आंकड़े को आमने सामने रखते हैं तोवास्तव में ऐसा भ्रम होना स्वाभाविक है किअधिकांश जनता कर चोरी कर रही है। कई बारमिथक और झूठ का इतना प्रोपेगंडा किया जाताहै कि वह सच पर भारी पड़ने लगता है। इतनीबड़ी विशाल आबादी के समंदर से इतने कमलोगों का आयकर देना भी पानी की चंद बूूंदोजैसा ही लगता है। इससे खुद ब खुद यह लगनेलगता है कि हो न हो जनता कर ज़रूर चुरा रहीहै। हो सकता है कि ऐसा किसी हद तक सही भीहो। लेकिन जिस कुल आबादी से आयकर देनेवाले मामूली तादाद के लोगों की तुलना की जारही है। वह तुलना ही बिल्कुल गलत है। आजहम आपको इन आंकड़ों के पीछे छिपे असलीखेल को समझायेंगे। हो सकता है यह ब्लॉगपढ़ने से पहले आप भी इस अपराध बोध सेग्रस्त होें कि वास्तव में जनता का अधिकांशहिस्सा टैक्स चोर होगा ही। आपको पता नहींहोगा कि 125 करोड़ की आबादी में खुद सरकारआंकड़ो के अनुसार 43 करोड़ तो 18 साल सेकम आयु के युवा हैं। अगर आपको यह पताचल गया कि देश की कुल आबादी का लगभग40 प्रतिशत तो नाबालिग है। जिस पर टैक्सलागू ही नहीं है तो आपको यह भी पता ही होगाकि अगर कोई युवा 18 साल से कम आयु काहोकर भी काम ध्ंाधा करता है तो उसकी आयउसके संरक्षक यानी माता पिता के इनकम टैक्सरिटर्न मेें शामिल करके दिखाई जाती है। ऐसे मेंउस नाबालिग के परिवार वाले भले ही अप्रत्यक्षरूप से उसकी ओर से सरकार को उसकी ओरवाजिब कर अदा कर दें। लेकिन वह नाबालिगतो सरकर के रिकॉर्ड पर आयकर दाता के तौरपर अलग से दर्ज होता नहीं। इससे कुलकरदाताओं की तादाद भी उस नाबालिग केटैक्स अदा करने के बावजूद उतनी ही रहती है।वैसे अधिकांश नाबालिग कमाने की हालत मेंहोते भी नहीं। अब इन 43 करोड़ को अगर सवासौ करोड़ में से कम कर दें तो बाकी तादाद कुलआबादी में से 82 करोड़ बचती है। इनमें से 75प्रतिशत यानी 61.50 करोड़ किसान हैं। जिनकोस्वयं सरकार ने इनकम टैक्स की रेंज से बाहर रखा हुआ है। अब बाकी बचते हैं 20.5 करोड़लोग। इनमें से 5.5 करोड़ भूमिहीन औरबीपीएल की श्रेणी मेें आते हैं। अब शेष  15करोड़ में से 11.40 करोड़ वरिष्ठ नागरिक घरेलूमहिलायें और 18 साल से बड़े लेकिन बेरोज़गारनागरिक रह जाते हैं। 15 करोड़ में से 11.40करोड़ घटाकर देखिये तो 3.60 करोड़ लोग हीबाकी बचते हैं तो जनाब इतने लोग तो पहले सेही टैक्स दे रहे है। सरकार फिर किन लोगों केखिलाफ टैक्स चोर का शोर मचा कर पूरे देश कोगुमराह कर रही है। यह माना जा सकता है किकिसान की आड़ में कई बड़े नेताओं से लेकरकारपोरेट तक अपनी काली कमाई को खेती कीआय बताकर सफेद कर लेते हैं। लेकिन बेचारेआम आदमी को बदनाम मत करो। आबादी काआंकड़ा 125 करोड़ थोड़ा पुराना हो सकता है।आज की तारीख़ में जनसंख्या कुछ बढ़ गयी है।लेकिन जिन लोगों की चर्चा टैक्स न देने वालों में की गयी है उनका आंकड़ा भी पुराना ही है।

0मकतब ए इश्क का दस्तूर निराला देखा

उसको छुट्टी ना मिली जिसने सबक याद किया।

Wednesday, 26 July 2017

इंसान नहीं उपभोक्ता

*हम इंसान नहीं उपभोक्ता हैं?*

एल पी जी यानी लिबरलाइजेशन प्राइवेटाइजेशन और ग्लोबलाइजेशन के इस दौरमें सरकार और कंपनियों ने हमें ग्राहक बनाकर बाज़ारवाद  के हवाले कर दिया है।

आज दुनिया में पूंजीवाद पूरी तरह छा चुका है।पंूजीवाद को बाज़ार चाहिये। बाज़ार को ग्राहक चाहिये। यही वजह है कि आज हम नागरिक नहीं बाज़ार के लिये मात्र ग्राहक हैं। देसीकंपनियोें से लेकर एम एन सी यानी मल्टीनेशनल कंपनियों तक को किसी कीमत पर भीअधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना है। अबसवाल यह है कि जब इंसान की ज़रूरतें सीमितहैं तो उसको ज़्यादा से ज़्यादा बिना ज़रूरत केमाल कैसे बेचा जाये? इसके लिये पूंजीवाद नेसमाज शस्त्रियों मानव विज्ञानियों और दर्शनशास्त्र के विशेषज्ञों की सेवा भारी किराये परलेनी शुरू की हैं। पूंजीवाद को इंसान की ज़रूरतसे कहीं अधिक सामान बाज़ार में उतारने औरउसको ग्राहक को न चाहते हुए खरीदने के लियेमजबूर करने का नुस्खा हाथ लग गया है।

पूंजीवाद ने एक योजना के तहत लोगों कीआवश्यकताओं के बजाये उनकी इच्छाओं परकाम करना चालू किया है। इसके लिये कंपनियोंने अपने गैर ज़रूरी प्रोडक्ट थोक में बेचने केलिये झूठे दावोें पेड मीडिया और बाज़ार केनक़ली विशेषज्ञों का सहारा लिया है। आपअकसर टीवी और अख़बारों में एड देखते होंगे।उनमें यह दावा किया जाता है कि आप चूंकिकाले हैं। इसलिये आप नाकाम हो रहे हैं। इसबहाने गोरे होने की क्रीम खूब बिक रही है। इतनाही नहीं लेडीज़ को सुंदर दिखाने के लिये भीगोरा होने की क्रीम बेची जा रही है। उनको यहसमझाया जा रहा है कि अच्छे वर और अच्छीनौकरी के लिये गोरा होना ही सबसे अधिकज़रूरी है। एक सोचे समझे प्लान के तहत 24घंटे 365 दिन ऐसे विज्ञापन मीडिया पर चलायेजा रहे हैं।

जिनमें हर स्तर पर यह प्रयास किया जाता है किआपकी महत्वकांक्षाओं को लगातार जगाये रखाजाये। अमेरिका जैसे विकसित देश में सिगरेटपीती औरतों को यह कहकर गौरान्वित कियागया कि ऐसा करना महिलाओं की आज़ादी काहिस्सा है। इधर भारत जैसे विकासशील देश मेंमर्दों को रेंड एंड व्हाइट सिगरेट पीते दिखाकरदावा किया गया कि ऐसा करना ही मर्दानगी कीपहचान है। सिगरेट के इस एड में बड़ी चालाकीसे सिगरेट पीने वाले हीरो या किसी अन्यसेलिब्रिटी को किसी की जान बचाते दिखाकरयह भ्रम फैलाया जाता है कि केवल सिगरेट पीनेवाले ही इतने बहादुर होते हैं। हंसी आती है  यहसोचकर कि क्या कोई सिगरेट पीने वालाताक़तवर और बहादुर होगा ही, यह ज़रूरी है?

ऐसे ही मोटरसाइकिल के एड में यह नारा दियाजाता है कि बाइक चलाना युवाओं की आज़ादीकी गारंटी है। इस एड के इस नकरात्मक पहलूपर आज तक पता नहीं क्यों किसी मानवअधिकार संगठन ने कोर्ट में जनहित याचिकादायर नहीं की। इस एड से यह संदेश जा रहा हैमानो जिस गरीब के पास मोटरसाइकिल नहीं है।वह तो गुलाम है? अजीब बात है कि समानतास्वतंत्रता और ख़्वाहिशों का गलत इस्तेमाल करविभिन्न वस्तुओं के उत्पादक अपना माल बेचनेमें लगे हैं। आवश्यकता से अधिक सामानखरीदने को मूर्खता और फ़िजूलखर्ची के बजायेझूठी शान ओ शौकत और कामयाबी का सबूतबताया जा रहा है।

ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि एक फालतूसामान ख़रीदने के बाद भी आप चुपचाप घर मेंन बैठें बल्कि प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा के इसदौर मंे पुराने मॉडल को रिजेक्ट कर अब नयापरचेज़ करने निकल पड़ें। दरअसल पूंजीपतिउद्योगपति और व्यापारी आपकी ज़रूरत नहींबल्कि जेब का वज़न देखकर अपना कूड़ा कचराभी आपको बेचने में लगा है। गांधी जी अकसरकहा करते थे। यह धरती दुनिया के सभी इंसानोंकी ज़रूरत तो पूरी कर सकती है। लेकिन यहहवस एक आदमी की भी पूरी नहीं कर पायेगी।आज हमारी सरकार ने गांधी की इस सोच कोनकार दिया है। अमेरिका में हाल ही में इसउपभोक्तावाद पंूजीवाद और विलासिता के दौरके खिलाफ एक आंदोलन अमिश समुदाय नेखड़ा किया है।

वे खुद बहुत सादगी से रहते हैं। उनका कहना हैकि धरती के साधनों का गलत इस्तेमाल रूकनाचाहिये। इस समुदाय का कहना है कि आनेवाली नस्लों के लिये हमें संसाधनों को विरासतके तौर पर सौंपकर जाना है। यह समुदाय कार नरखकर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करताहै। इन्होंने एक अच्छी पहल यह भी की है किएक दुकान खोली है। जिसका नाम दरियादिलरखा गया है। यहां जिसके पास जो ज़रूरत सेफालतू सामना होता है। वह रख जाता है।जिसके पास ज़रूरत का सामान भी नहीं होताहै। वह दरियादिल दुकान से चुपचाप उठाकर लेजा जाता है। उनसे उस सामान की कोई कीमतनहीं वसूल की जाती है। ऐसे ही कुछ होटलों नेभूखे लोगों को बिना बिल खाना खिलाना शुरूकिया है।

इन होटल मालिकों का कहना है कि अगरआपको ठीक लगे तो जो चाहो उतना पैसा बिलके तौर पर चुका भी सकते हो। इन होटलमालिकों का कहना है कि उनको नुकसान नहींहुआ। इसकी वजह यह है कि होटल वालों कायह नेक काम देखकर कुछ अमीर औरसमाजसेवी ग्राहक अपने बिल से अधिकभुगतान भी कर जाते हैं। सबको पता है किपंूजीवाद मानव स्वभाव के खिलाफ है। लेकिनइंसान अपनी सोच से न चलकर मीडिया केप्रभाव और दिखावटी समाज के झांसे में आकरयही सोचकर अधिक से अधिक फालतू खरीदारीकरने में तल्लीन है कि ऐसा नहीं करेंगे तो लोगउनको क्या कहेंगे? सच तो यह है कि कारपोरेटसे विशाल चंदा लेने के लालच में मुख्य दलों कीसरकारें भी आजकल पूंजीवाद के एजेंट के तौरपर काम करती नज़र आ रही है।

पूंजीवाद भौतिकवाद और उपभोक्तावादबेतहाशा दौलत और फालतू दिखावे का सामानसमेटने के चक्कर में आज  के इंसान को ज़ालिमअन्यायी अमानवीय स्वार्थी असभ्य औरसंस्कृति विहीन बनाने पर तुला है।

आज सड़कों पर लिखे सैकड़ों नारे न देख,

घर अंधेरे देख तू आकाश के तारे न देख।

Wednesday, 19 July 2017

हिंसा सबकी असहनीय

*हिंसा किसी की भी असहनीय!*

हिंसा किसी की भी असहनीय! गोरक्षा के नाम पर धर्म देखकर पहले ही देशके विभिन्न राज्यों में एक वर्ग के लोगों कोचुनचुनकर मारा जा रहा था। अब इसमें कश्मीर के डीएसपी अयूब पंडित अमरनाथ यात्रियों और पश्चिमी बंगाल के कार्तिक घोष का नाम और जुड़ गया है।

पहले अमेरिका को यह लगता था कि वह सुपरपॉवर होने की वजह से जो चाहे वो कर सकता है। अमेरिका की यह खुशफहमी पहले छोटे से मुल्क वियतनाम ने उसके अवैध क़ब्ज़े को हटाकर दूर की। इसके बाद रूस ने अफ़गानिस्तान पर इसी महाशक्ति होने की भूल से क़ब्ज़ा किया। लेकिन उसको भी मुंह की खानी पड़ी। रूस को वहां से हटाने के लिये अमेरिका ने पाकिस्तान के सहयोग से जोतालिबान का जेहादी खेल शुरू किया। वह उसको अलकायदा में बदलकर वर्ल्ड ट्रेड सेंटरतक  नुकसान पहुंचाकर भी बख़्शने के लिये तैयार नहीं है। इसके बाद अमेरिका ने बिना किसी सबूत के रसायनिक हथियारों का आरोप लगाकर ईराक पर चढ़ाई कर दी। वहां से वहबड़ा बे आबरू होकर निकला।

इतना ही नहीं अपने साथ ही वह पूरी दुनिया केपीछे तालिबान अलकायदा के बाद एक औरतीसरा आतंकवादी भूत आईएसआईएस औरलगा आया। आतंकवाद ही नहीं हम अमेरिकासहित भारत में गोरक्षा के नाम पर हो रही हिंसाके भी खिलाफ हैं। अमेरिका की मिसाल इसलियेदी है कि आतंकवादी और कथित गोरक्षक यहबात समझ लें कि उनका आक़ा अमेरिका अगरइतनी बड़ी ताक़त होकर मनचाहा नतीजाहासिल नहीं कर सकता तो बाकी तो पिद्दी नपिद्दी का शोरवा। कश्मीर में मुट्ठीभर आतंकियोंको अपने आक़ा पाकिस्तान  से हथियारप्रशिक्षण और अकूत धन मिलने से यहगलतफहमी हो गयी है कि एक दिन वे हमें औरहमारे देश को कश्मीर को आज़ाद करने के लियेमजबूर कर देंगे।

लेकिन यह मात्र एक सपना ही है। कश्मीर मेंजिस तरह अलविदा जुमे की नमाज़ के दौराननमाज़ियों की सुरक्षा में तैनात एक पुलिसअधिकारी अय्यूब पंडित की हत्या की गयी। वहकेवल इसलिये नहीं की गयी कि वह पुलिस केडीएसपी थे। बल्कि इसकी बड़ी वजह यह थीकि उनकी नेमप्लेट पर नाम ए पंडित लिखा था।जिससे नमाज़ियों ने उनको हिंदू मानकर पीटपीटकर जान से मारा। ऐसे ही बंगाल के बशीरहाट में एक 17 साल के लड़के ने इस्लाम केखिलाफ आपत्तिजनक पोस्ट फेसबुक पर की।शिकायत पर पुलिस ने न केवल फौरन रपट दर्जकी। बल्कि उस लड़के के नाबालिग होने केबावजूद घर से पकड़कर थाने थाने ले आई।कट्टर मुसलमानों की भीड़ इतने पर भी शांत नहींहुयी।

वह आरोपी के घर तोड़फोड़ पर उतर आई।इसके बाद भी भीड़ का गुस्सा बेकसूर हिंदुओं केघर व दुकानों को जलाने पर उतरा। भीड़आरोपी को पुलिस से अपने हवाले कर उसकासंगसार करना चाहती थी। इसके बाद जबउनकी नाजायज़ मांग पूरी नहीं हुयी। जो होनीभी नहीं चाहिये थी। ऐसे में भीड़ रोड जाम करनेलगी। उधर से कुछ समय बाद एक हिंदू कीशवयात्रा निकली तो भीड़ ने उसको भी रास्तानहीं दिया। जिससे दोनों वर्ग आमने सामने आगये। इसके कुछ देर बाद उधर से कार्तिक घोषनाम का वह आदमी गुज़र रहा था। जो कट्टरमुसलमानों के निशाने पर पहले से ही चल रहे साम्प्रदायिक विवाद के कारण था। भीड़ ने उसको पकड़ा और पीट पीटकर मार डाला।

उधर अमरनाथ यात्रा के दौरान कश्मीर में तीनस्तर की सुरक्षा व्यवस्था में चल रही काफिले कीएक बस पिछले दिनों अचानक टायर पंक्चर होनेसे पीछे छूट गयी। इसके बाद बिना सुरक्षा के रातमें जब यह बस चली तो आतंकवादियों कोअपने  बेशर्म और दुस्साहसी नापाक मंसूबे पूरेहोते नज़र आये। बस पर अंधाधुंध फायरिंग कीग यी। जिससे 7 अमरनाथ यात्रियों की मौके पर दुखद मौत हो गयी। वह तो अच्छा हुआ बस के चालक सलीम ने अपनी बहादुरी और समझदारी दिखाते हुए बस को तेज़ दौड़ाये रखा। उसने कंडक्टर को भी चिल्लाकर गेट बंद करने को कहा जिससे बाकी अमरनाथ यात्रियों की जान सही सलामत बच गयी। वर्ना एक आतंकी बसके अंदर एक पांव रखकर घुसने की तैयारी मेंथा।

जिसे धक्का देकर नीचे उतारा गया। एक अच्छीबात यह भी हुयी कि इस बार पूरे कश्मीर ने एक आवाज़ में आतंकियों की इस हरकत को बिनाडरे बुरा और घिनौना बताया। देश के कोने कोने से न केवल गैर मुस्लिम मानवतावादियों बल्कि मुसलमानों ने भी सेकुलर हिंदुओं की तरह अमरनाथ यात्रियोें की हत्या की खुलकर निंदा की। हालांकि मोदी भक्त संघ परिवार के कुछ कट्टर नेता और साम्प्रदायिकता की नफ़रत में अंदर से जल रहे कुछ लोगों ने एक बार फिर सेअपनी हिंसा को सही ठहराने को इस कुतर्क का सहारा लिया कि मुसलमानों की हत्या पर बोलनेवाले कथित सेकुलर अब हिंदुओं की हत्या पर चुप हैं। लेकिन सच यह है कि मानवतावादी औरनिष्पक्ष लोग चाहे जिस मज़हब और पार्टी के होंवे हर हत्या पर अपना विरोध दर्ज कराते हैं।

लेकिन हिंदू कट्टरपंथी बड़ी चालाकी से मोदी और अपनी भाजपा की साझा सरकार को बचाते हुए सारा कसूर विपक्ष का बता रहे हैं।अब समय आ गया है कि सब वर्गों के मुट्ठीभर कट्टरपंथियों अलगाववादियों और आतंकवादी हत्यारों को समाज से अलग थलग किया जाये और सरकार को वोटबैंक की सियासत के कारण इस तरह ही हरकतों को शह देने या चुप्पी साधनेपर संविधान कानून और शांति व्यवस्था कोबहाल करने के लिये मजबूर किया जाये।

न इधर उधर की बात कर यह बता क़ाफ़िला क्यों लुटा,

मुझे रहज़नों से गिला नहीं तेरी रहबरी कासवाल है।।

Tuesday, 27 June 2017

नरेश जी का 40वां

*नरेश जी के लिए  क़ुरान पाक का पाठ!*
Nbt blog
*तीन दशक से अधिक के मेरे पत्रकारिता जीवन में पहली बार यह ख़बर मिली है कि किसी मुस्लिम ने अपने प्रिय एक ग़ैर मुस्लिम के लिये कु़रान का पाठ कराकर बाक़ायदा उनका चालीसवां मुस्लिम रीति रिवाज से मनाया है।*

साम्प्रदायिकता और जातिवाद की सियासत के ज़हरीले दौर में क्या आप विश्वास कर सकते हैं कि यूपी के बिजनौर ज़िले के नजीबाबाद नगर में पूर्व चेयरमैन और समाजसेवी स्व. श्री नरेशचंद अग्रवाल का एक मुस्लिम परिवार ने बाक़ायदा मुस्लिम रीति रिवाज से 40वां ठीक उसी तरह से मनाया जैसा अपने परिवार के मुखिया का मनाया था। जी हां यह बिल्कुल सच है। इरशाद अहमद ‘इरशाद’ भी यहां के उन गिने चुने समाजसेवियों में रहे हैं। जिनका नाम शहर का हर आदमी सम्मान के साथ लेता है। इरशाद साहब का इंतक़ाल लगभग चार महीने पहले हो गया था। उनका 40वां उनके परिवार ने धार्मिक तौर तरीकों से मनाया था। उनसे उम्र में लगभग दो महीने बड़े पूर्व चेयरमैन स्व. नरेशचंद अग्रवाल मरहूम इरशाद साहब के पक्के दोस्तों मंे शामिल थे।

इरशाद साहब नगरपालिका के उसी बोर्ड मंे वाइस चेयरमैन रहे थे। जिसमें नरेशचंद जी चेयरमैन चुने गये थे। बीती 11 मई को श्री नरेशचंद जी का भी दुखद निधन हो गया। स्व. अग्रवाल जी और मरहूम इरशाद साहब के परिवार दोनों को ही अपना सरपरस्त और बुज़ुर्ग मानते थे। दोनों की ही बात दोनों परिवार का हर सदस्य सर माथे पर लेता रहा है। इरशाद साहब के परिवार ने पहले इरशाद साहब का 40 वां किया। इसके बाद जब 20 जून को नरेशचंद जी के निधन को 40 दिन पूरे हुए तो ठीक उसी तरह से नरेशचंद जी के 40वंे की रस्म पूरी की जैसे मरहूम इरशाद साहब के लिये आयोजित की थी।

इरशाद साहब के बड़े पुत्र और मिलनसार हंसमुख युवा समाजसेवी ज़ीशान सैफ़ी ने स्व. नरेशचंद अग्रवाल जी के लिये भी 40वें पर बाक़ायदा मदरसे के बच्चो को अपने घर बुलाया और कु़रानख़्वानी कराई। इस अवसर पर कुरान पाक के 30 सिपारों का पाठ पूरा होने पर नरेशचंद जी की आत्मा की शांति और उनको जन्नत में जगह दिलाने के लिये वहां मदरसे के बच्चो के साथ ही मौजूद मुस्लिम नागरिकों और मरहूम इरशाद साहब के परिवार ने दुआ मांगी। इसी दिन शाम को ज़ीशान सैफ़ी ने स्व. नरेशचंद जी को याद करने और श्रध्दा सुमन अर्पित करने को नगर के सैकड़ों गणमान्य लोगों की एक शोक सभा आयोजित की।

इस प्रोग्राम में नरेशचंद जी का एक चित्र बतौर यादगार एक टेबिल पर न केवल रखा गया। बल्कि उनके परिवार के एक वरिष्ठ सदस्य और चंद्रा कत्था इंडस्ट्रीज़ के एमडी श्री राकेश कुमार अग्रवाल से उस तस्वीर पर माल्यार्पण भी कराया गया। इसके बाद वहां रखे फूल भी कई वक्ताओं ने अपने संबोधन से पहले स्व. नरेशचंद के चित्र पर अर्पित किये। ये बातें हम यहां इसलिये बयान कर रहे हैं कि कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम किसी गैर मुस्लिम के लिये यह सब करना ठीक नहीं मानते। साथ ही तस्वीर को लेकर मना किया जाता है। उस चित्र पर फूल माला पहनाना और फूल चढ़ाना तो पहली बार ही किसी मुस्लिम परिवार द्वारा आयोजित प्रोग्राम में हुआ है।

हालांकि रमज़ान का पवित्र माह चल रहा है। इसलिये प्रोग्राम समाप्त होने पर सभी के लिये भोजन के साथ मुस्लिम रोज़ेदारों के लिये अफ़तार का भी आयोजन किया गया था। जब सब लोगों ने मिलजुलकर अफ़तार और खाना साथ साथ खाया तो नरेशचंद जी की आत्मा प्रसन्न ज़रूर हुयी होगी क्योंकि उनका जीवन नगर और आसपास की जनता को सदा यह समझाने में ही बीता है कि आपस में मेल मिलाप से प्यार मुहब्बत और भाईचारे से रहो। साथ ही गरीब को तलाश करो और उसकी बिना ढिंढोरा पीटे मदद करो। इस मौके़ पर सभी वर्गों के वक्ताओं ने कहा कि नरेशचंद जी आज के दौर में भी ऐसे विरले इंसान थे। जिनको हिंदू मुस्लिम यानी नगर के हर नागरिक का विश्वास प्राप्त था।

वो सबकी सेवा करते थे। सब उनका सम्मान करते रहे हैं। इस ऐतिहासिक प्रोग्राम में मौजूद सभी नागरिकों का कहना था कि नरेशचंद जी को सच्ची श्रध्दांजलि तो यही होगी कि उनके दिखाये रास्ते पर हम सब चलें। नरेशचंद जी न केवल जीवनभर गरीबों की बिना किसी स्वार्थ के मदद करते रहे। बल्कि शिक्षा साहित्य एकता भाईचारा आपसी सौहाद और नगर कल्याण के भी अनेक काम बिना प्रचार किये करते थे। इस मौके पर सबसे खास और अहम बात कई बड़े सम्मान और पुरस्कार प्राप्त राष्ट्रीय स्तर के कवि,साहू जैन डिग्री कॉलेज के प्रोफेसर और समालोचन वेब पत्रिका के संपादक डा. अरूण देव ने कही। उनका कहना था कि आज नगर को ही नहीं पूरे मुल्क को हज़ारों नरेशचंद जी की ज़रूरत है।

उन्होंने सियासत के नाम पर हिंदू मुस्लिम के बीच पैदा की जा रही दरार का हल नरेशचंद जी जैसे एकता के मसीहा को बताया। उनका दो टूक कहना था कि दुनिया में नफ़रत हिंसा और अलगाव के साथ कभी इंसान सहज भाव से नहीं जी सकता। बल्कि प्रेम भाईचारे इंसानियत सौहार्द एकता आपसी तालमेल सहयोग और मिलनसारी से ही कोई मुल्क तरक्की कर सकता है। डा. देव ने बड़ी साफगोई से उन अलगाववादी और समाज के दुश्मन तत्वों को चेतावनी दी कि एक दिन आयेगा जब पूरा देश ही नहीं बल्कि दुनिया स्व. नरेशचंद जी जैसे चिंतकों और संत प्रवृत्ति के लोगों के दर्शन और विचार को अपनाने पर मजबूर होगी। उनका कहना था कि नरेशचंद जी ने जो मशाल जलाई है। उसको हम जैसे लोग अपनी जान की बाज़ी लगाकर भी बुझने नहीं देेंगे।

*ग़मों की आंच पर आंसू उबालकर देखो,*

*बनेंगे रंग जो किसी पर डालकर देखो।*

*तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी,*

*किसी के पांव का कांटा निकालकर देखो।*

Tuesday, 20 June 2017

मानव क्रूरता और बढ़ेगी?

पशु क्रूरता रुकेगी, मानव क्रूरता बढ़ेगी?

पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 में मोदी सरकार द्वारा आस्था के नाम पर किये गये संशोधन से जानवरों के साथ क्रूरता कम हो या ना हो लेकिन मानव कू्ररता बढ़ने की आशंका लगातार बढ़ रही है। इससे किसानों का कारोबार प्रभावित होना तय माना जा रहा है।

हिंदुओं के एक वर्ग के लिये गाय पूजनीय रही है। हिंदुओं का ही दूसरा वर्ग भले ही तादाद में कम हो लेकिन वह ऐसा नहीं मानता। इसके साथ ही पूर्वोत्तर और दक्षिण के कई राज्य गाय का मांस आमतौर पर खाते हैं। कई राज्यों ने पहले से और कुछ ने भाजपा की सरकार बनने के बाद गाय काटने और उसके मांस के कारोबार पर रोक लगा दी है। हालांकि आस्था के नाम पर उन वर्गों पर कोई नियम कानून नहीं थोपा जाना चाहिये जो ऐसा नहीं मानते हैं। हमारा मानना है कि खुद उन वर्गों को यह पहल करनी चाहिये। जिससे दूसरे लोगों की भावना का सम्मान किया जा सके। लेकिन केंद्र मंे जब से मोदी सरकार बनी है। वह लगातार संघ के दबाव में ऐसे एक के बाद एक फैसले कर रही है।

जिनसे इस तरह की आशंका पैदा हो रही है कि ये सब एक सोची समझी रण्नीति के हिसाब से वोटों की राजनीति का हिस्सा है। जब से केंद्र सरकार ने पशु क्रूरता कानून में संशोधन कर यह प्रावधन किया है कि पशु हाट में कोई भी गाय भैंस काटने के लिये नहीें बेची जायेगी। तब से पूरे देश में इस पर चर्चा चल रही है। मामला कोर्ट में भी पहंुच गया है। कोर्ट ने अभी कोई फैसला हालांकि नहीं दिया है। लेकिन यह साफ कर दिया है कि किसी भी सरकार को लोगों को यह बताने का अधिकार नहीं है कि वे क्या खायें और क्या नहीं। यह बात लोगों की समझ से बाहर है कि गाय का बचाव करते करते अचानक सरकार भैंस के पक्ष में भी कैसे खड़ी हो गयी?
जहां तक गाय का सवाल है। वह भी हिंदू वोटबैंक की राजनीति के लिये भाजपा खुलकर साम्प्रदायिक कार्ड खेल रही है। लेकिन जहां तक भैंस पर भी गाय वाले नियम कानून लागू करने की बात है तो यह भाजपा का मुस्लिम विरोधी एजेंडा भी हो सकता है। हालांकि देश में 70 प्रतिशत से अधिक लोग मांसाहारी है। लेकिन उनमें अल्पसंख्यक खासतौर पर मुसलमान और ईसाई पूरी तरह मीट खाने वाले वर्गों में गिने जाते हैं। भैंस के मीट का कारोबार भी अधिकांश मुसलमान ही करते हैं। हालांकि मशीनी स्लॉटर हाउसों को इससे छूट दी गयी है। लेकिन वे अपने यहां तैयार अधिकांश मीट विदेश निर्यात करते हैं। भारत में जो मुसलमान भैंस का मीट खाते हैं।

इससे उनके सामने बड़ी समस्या खड़ी होने लगी है। इसके साथ ही ईद ए कुर्बां पर वो बकरों के साथ ही भैंस भी बड़ी तादाद में काटते रहे हैं। ऐसा लगता है इस बार बकरा ईद पर इस ईद के नाम के अनुसार उनको केवल बकरे काटकर ही काम चलाना होगा। उधर इससे चमड़े का कारोबार भी प्रभावित होने जा रहा है। चमड़े के काम से जुड़े दलित समाज के लोग भी इस फैसले को अपनी रोज़ी रोटी पर हमला मानकर चल रहे हैं। इस नये कानून का और विस्तार देखें तो जो किसान पशु पालन और डेयरी का कारोबार करते थे। उनके हालात भी बिगड़ने के आसार बन रहे हैं। कोई भी किसान गाय भैंस तब तक ही पालना पसंद करता है। जब तक कि वह दूध देती रहे।

लेकिन सरकार ने दूध से भागने वाली गाय भैंस को काटने पर भी रोक लगा दी है। सवाल यह है कि दूध न देने वाली भैंस कौन पशु पालक किसान या डेयरी वाला अपने यहां रखकर चारा खिलायेगा? साथ ही उसे बेचकर जो 30 से 40 हज़ार रक़म मिलने वाली थी वह उसे कौन देगा? इससे आगे दूध की भी कमी हो सकती है ? जानवर पालने वाले किसानों का कहना है कि सरकार ने इतनी काग़जी़ कार्यवाही ज़रूरी कर दी है कि इसके अनुसार जानवरों को खरीदना बेचना बड़ा पेचीदा काम हो गया है। पहले पंजाब यूपी दिल्ली बिहार गुजरात राजस्थान के साथ दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों के व्यापारी अच्छी नस्ल की गाय भैंस मंुह मांगे दाम पर ख़रीद लेते थे।

लेकिन अब दूध से भागने पर जानवर को काटने को बेचने के लिये कानूनन मनाही होने की वजह से उससे मिलने वाली रक़म मूल खरीद की रकम में से घट गयी है। इससे गाय भैंस की कीमतों में एक झटके में भारी गिरावट आ गयी है। इसके बावजूद इन जानवरों के ग्राहक मौजूद नहीं है। कथित गौरक्षकों के नाम पर कुछ अराजक तत्वों द्वारा खासतौर पर गाय के बहाने मुसलमानों के साथ आये दिन की जा रही लूट मारपीट और गुंडागर्दी से मुस्लिम व्यापारी ने तो लगभग पूरी तरह गाय से दूरी बना ली है। पिछले दिनों तमिलनाडु के हिंदू अधिकारियों तक को गौरक्षक ने बाड़मेर मेें गाय ले जाते देख सारे कागज़ दिखाने के बावजूद जमकर पीटा और उस ट्रक में आग लगाने का प्रयास किया जिसमें गाय और बछड़े मौजूद थे। किसी ने ठीक कहा है कि आप दूसरों के घरों में आग लगायेंगे तो आग एक दिन आपके घर में भी लगेगी।