Sunday, 7 May 2017

निर्भया और बिलकीस प्रतीक

और कितनी निर्भया कितनी बिलकीस ?

0बेशक क़ानून ने इन मामलों में अपना काम जल्दी और मुस्तैदी से किया है। लेकिन ये अपवाद व प्रतीकात्मक केस बनकर न रह जायें क्योेंकि अधिकांश मामलों में सिस्टम व समाज आज भी बहुत करप्ट यथास्थितिवादी व सुस्त ही बना हुआ है।
दिल्ली गैंग रेप पीड़िता निर्भया के मामले में सुप्रीम कोर्ट और गुजरात दंगों की बलात्कार पीड़ित बिलकीस बानो के केस में मुंबई हाईकोर्ट ने 4 को फंासी और 11 को उम्रकैद की सज़ा के जो सख़्त फैसले किये हैं। वे आज के माहौल मंे राहत देने वाले ही माने जायेंगे। हालांकि निर्भया के मामले में साढ़े चार साल में ही फैसला सुप्रीम कोर्ट से हो गया। लेकिन बिल्कीस बानों के मामले में केस अभी 15 साल में भी हाईकोर्ट तक ही पहुंचा है। ज़ाहिर है कि निर्भया के मामले में अभी जहां रिव्यू पिटीशन क्यूरेटिव पिटीशन और दया याचिका की गुंजाइश बाकी है तो बिलकीस केस में मामले की अपील सुप्रीम कोर्ट में होना तय है।
अगर तकनीकी बारीकियों को छोड़ दें तो यह बात सराहनीय है कि कोर्ट ने ही नहीं दिल्ली पुलिस और सीबीआई ने भी इन मामलों में पूरी मेहनत ईमानदारी और लगन से अंजाम तक पहंचाने में जी जान से काम किया है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है कि खुद सबसे बड़ी अदालत इन मामलों की निगरानी कर रही थी। हालांकि गुजरात सरकार ने बिलकीस केस में अपने सिपाहियों और अन्य आरोपियों को बचाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी लेकिन केस निष्पक्ष सुनवाई के लिये महाराष्ट्र में भेज देने से उसकी एक नहीं चली।
सकारात्मक बात तो यही है कि कुछ नहीं होने से देर से और चुनिदा मामलों में भी न्याय होने से समाज में यह संदेश गया है कि आप सियासत सरकार या किसी भी प्रकार की ताकत के नशे में चूर होकर जघन्य अपराध करेंगे तो कानून आपको छोड़ेगा नहीं। सुप्रीम कोर्ट को इस पहल और ईमानदारी के लिये साध्ुावाद दिया जाना चाहिये। लेकिन यहीं यह सवाल भी उठता है कि क्या हर मामले में कोर्ट पुलिस और सरकार ऐसा बार बार कर सकती है? आखि़र ऐसे अपवाद स्वरूप तय होने वाले हाईप्रोफाइल और चर्चित मामलों की तादाद तो ना के बराबर है। क्या हमारे देश में हर किसी अपराध की रपट दर्ज होती है? बिना पैसा लिये मेडिकल होता है?
हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट तक पहंुचने के लिये हर कोई महंगा वकील और दूसरे खर्च वहन कर सकता है? तो जवाब नहीं मिलेगा। सरकार और पुलिस के बाद समाज की चर्चा हमने इसलिये की है क्यांेकि बलात्कार के कुल मामलों में 94.2 प्रतिशत बलात्कारी परिचित होते हैं। इसका मतलब यह है कि लड़की अपनों के बीच ही सुरक्षित नहीं है। अकसर ख़बरें आती रहती हैं कि लड़की के साथ उसके बाप, भाई, पड़ौसी, रिश्तेदार, गुरू, दोस्त और अपने ही घर के नौकर व ड्राइवर ने ज़बरदस्ती जिस्मानी रिश्ते बना लिये। सवाल यह है कि लड़की अगर अपनों की ही कभी भी शिकार बन सकती है तो वह कानून से भी पूरी तरह कैसे हिफाज़त हासिल कर सकती है?
विडंबना यह है कि कई बार बलात्कार पीड़ित युवती या महिला जब थाने गयी तो एक बार फिर उसके साथ पुलिस ने शर्मनाक सवालों से मानसिक बलात्कार किया। उसके बाद जब मुकद्मा अदालत में चलता है तो उससे ऐसे ऐसे सवाल पूछे जाते हैं कि मानसिक रूप से एक बार उसे उन्हीं दर्दनाक और शर्मनाक लम्हों से गुज़रना पड़ता है। जिनसे वह बलात्कार के दौरान गुज़री होती है। अगर हर मामले में कानून सख़्त बन भी जाये और बलात्कार के आरोपी को फांसी और नपंुसक बनाने का फैसला लागू कर भी दिया जाये तो क्या घर घर गली गली मुहल्ले मुहल्ले पुलिस तैनात की जा सकती है? बलात्कारी के हिमायती और रिश्वत खाने वाले नेता, पुलिस, डाक्टर और वकील का क्या किया जायेगा?
जिसका पता ही नहीं चलता कि वह ओरोपी से हमसाज़ हो चुके हैं। पूरा समाज बलात्कारी के बजाये बलात्कार पीड़ित लड़की से नफ़रत क्यों करने लगता है? उसका नाम स्कूल से क्यों काटा जाता है? उसको नौकरी से क्यों निकाला जाता है? उसका पति उसे कुलटा बताकर क्यों छोड़ देता है? जबरन उसके साथ किसी के यौन सम्बंध बनाने से उसकी इज्ज़त कैसे चली जाती है? बलात्कार करने वाला शर्मिंदा क्यों नहीं होता? उसकी पत्नी और परिवार उसको क्यों नहीं छोड़ देते? उसकी होने वाली शादी क्यों नहीं रूक जाती?
उसके भाइयों को समाज शक की निगाह से क्यों नहीं देखता कि शायद यह भी कल किसी से बलात्कार कर सकता है? इस सच को हमें नज़र में रखना होगा कि हमारा देश तेज़ी से कम्प्यूटर, इंटरनेट और मोबाइल आदि नई तकनीक अपनाता जा रहा है। जिससे यूरूपीय तकनीक के साथ उनकी सभ्यता और संस्कृति भी हमारे देश में पांव पसार रही है। लिव इन रिलेशनशिप, पोर्न साइटें देखना, डेटिंग, चैटिंग और शादी से पहले सैक्स को बुरा ना मानना इस सोच का एक हिस्सा है। हमारा कहना है कि यह संभव नहीं हो सकता कि आप विदेश की तकनीक, फैशन और तौर तरीकों को अपनायें और उसके दुष्प्रभाव से बच जायें। इसलिये विदेशों की तरह सख़्त ईमानदार और जल्दी न्याय देने वाला सिस्टम भी अपनाना होगा।
0 बदनज़र उठने ही वाली थी किसी गै़र की जानिब,
अपनी बेटी का ख़याल आया तो दिल कांप गया।

Friday, 5 May 2017

U turn politics for muslim

*Time for a U-Turn Politics from Muslims:*

Muslims have played an important role in Indian Politics, albeit only to their detriment.

The spectacular performance of BJP in UP elections should be an eye opener.

It is ironical that party is able to gather majority Hindu votes by showcasing the fear of 15% Muslim population.

Many Muslims are concerned about their future in this country and the impending dangers of a Hindu Rashtra.

My suggestion to them-
Take a chill pill.
Relax and retrospect.

What are the main issues propped up by the party?

1. Beef
2. Uniform Civil Code
3. Triple Talaq
4. Ram Mandir
5. Hajj subsidy

Now what is the stand of an average Muslim on the above issues?

They take the above issues as a threat to their identity.

As issues which are deliberately propped up by the BJP to abuse them, chide them, harass them and instigate them.

*What is the Muslim reaction?*

It is on the lines of expectation of BJP.

Vehement Protest.

Things go exactly as per planned by the party.

The aforesaid issues are propped up during election times,
Muslims protest.

Their protest is showcased as not against BJP but against Hindus, thereby consolidating the Hindu votes to the BJP, ensuring its victory.

That’s how Muslims have been (ab)used in the communal politics of India.
.
*So what should be done?*

I am reminded of the scene from the movie Guru (made on the life of Dhirubhai Ambani).

When the media went against him, and started exposing his nefarious activities, what was his reaction?

He asked his secretary to increase the Ad spending on those newspapers that were critical of him. 
.
Muslims, you need to take a clue from that.

*Make a complete U-turn on the above issues.*

It would take the gas out their communal politics and would be advantageous to you as well.

*1. Ask for a complete ban on beef.*

It’s the corporate and the state that make a kill out of this bloody business.

India is the largest beef exporter country in the world.

Why are you playing into the hands of the party?

Ask for a complete ban, and see how it sends shivers down the spine of the corporate as well as the state.

_(see: https://www.facebook.com/farhan0651/posts/1435474913144950 and http://www.jansatta.com/blog/open-letter-to-gau-rakshaks-and-their-supporters/124460/ )_

*2. Uniform Civil Code.*

Ask for implementation of UCC.

Believe me it’s not against Muslims (though it is always showcased as such).

Vast majority of Hindus and Tribals would stand against UCC to protect their customs and cultural practices.

Why are you standing in the firing line and making it appear as if Muslims don’t want UCC?

_Read at: https://www.facebook.com/farhan0651/posts/1538061816219592_

*3. Triple Talaq.*

Ask for abolishment of Triple Talaq. It is unislamic.

Don’t play into the hands of AIMIM.

Asaduddin Owaisy is a barrister and claims to be learned on Islamic jurisprudence.

Doesn’t he know that?

_Read at: https://www.facebook.com/farhan0651/posts/1398559946836447_

*4. Ram Mandir:*

Have a big heart and support the construction of Ram Mandir at Ayodhya.

The issue has already engulfed many innocent lives.

Anyways, the whole world is a Masjid for you.

It is better to offer your namaaz in your neighbourhood Masjid than to fight for a piece of land where (probably) you might never in your lifetime visit to offer your prayer.

You’d in fact be mending broken ties through this, and it would go as per Islamic principles as well- to mend ties with your adversaries.

*5. Hajj Subsidy:*

Ask for abolishing Hajj subsidy.

There is no subsidy at all.

The subsidy given in your name goes to Air India, and it is you who takes all the blame.

Don’t just ask for abolishing Hajj subsidy, ask for abolishing the Hajj committee as well.

Ask for privatization of the Hajj. You anyway pay 2 to 2.5 lakh for the pilgrimage.

You’d be getting better services for lesser amount. And without subsidy.
.
.
Don’t just make a U-Turn on the above mentioned politics.

Make a U-Turn towards your stand towards BJP as well.

Nothing irks your adversary more than a tight warm embrace :

The more you speak against Modi, the more it is construed to be against Hindus.

When people have abdicated their intellect, their capability to think logically and are willing to be carried away by a pied piper to a distant heaven, why should you take the pains of waking them from them slumber?

Turn apolitical.

Refrain from commenting/posting against Modi.

The more you complain, the more it adds to his popularity.

Chill.
Nothing is at peril.
No. Not even Democracy or Secularism.
Trust your secular Hindu brothers.
In fact, it is they who are fighting for you, trying to protect your democratic rights.

How many Muslims leaders can you count who have stood at times of adversity?

How many Muslims MP/MLA’s can you recollect who have resigned post any riot or lynching?
.
Turn apolitical.

Can’t you see that wherever Muslims are in majority, dozens of opportunist Muslim candidates stand up to fight elections, thereby effectively dividing the votes, ensuring a win for whom?
.
It’s time for Muslims to retrospect and make a U-turn.

Focus on economic empowerment,
Shun from politics,
Strive to build up your community, like the Sikhs have done,
Adjust yourself,
And try to live in diversity.
A complete overhauling is required.
Not just for your betterment, but for the betterment of this country as well.

Wednesday, 3 May 2017

एमसीडी चुनाव का मतलब

करप्शन, गंदगी और डेंगू के बावजूद तीसरी बार बीजेपी की जीत बता रही है कि जनता का भरोसा मोदी पर क़ायम है।

चाहे इसे आप हिंदू साम्प्रदायिकता कहें, मोदी की दिल छू लेने वाली भाषण देने की बेमिसाल कला बतायें या फिर विपक्ष का जनता का मूड न पहचानना? लेकिन अब देश के कई हिस्सों में हुए लोकसभा विधानसभा के कुछ उपचुनाव के बाद *दिल्ली नगर निगम के चुनाव में भी बीजेपी को मिली ज़बरदस्त जीत से यह साफ हो गया है कि फिलहाल प्रधनमंत्री मोदी देश के किसी भी चुनाव में बिना किसी ठोस उपलब्धि के भी विपक्ष पर भारी हैं।* वे और संघ परिवार बहुसंख्यकों को अल्पसंख्यकों से भयभीत कर जीतने के नायाब तरीके में सफल हैं। हालांकि कमाल की बात यह है कि न तो बीजेपी शासित राज्यों में कोई रामराज आ गया है। और न ही केंद्र में तीन साल से सरकार चला रहे मोदी व्यवस्था में कोई आमूल चूल परिवर्तन कर सकेें हैं।
बल्कि इसके विपरीत सच तो यह है कि इस दौरान जहां असहिष्णुता तेज़ी से बढ़ी है। वहीं साम्प्रदायिक सौहार्द और एकता भाईचारे को हिंदू कट्टरपंथी लगातार दादरी में अख़लाक और अलवर में पहलू खान जैसे अल्पसंख्यकों को बिना वजह और बिना सबूत गाय के नाम पर बेदर्दी से पीट पीटकर मौत के घात उतार चुके हैं। हालांकि दोनों मामलों में बाद में कानून ने अपना काम जारी रखा है। लेकिन इन घटनाओं को किसी अंजाम तक पहुंचाया जा सकेगा। इसमें देश के निष्पक्ष और मानवीय सोच रखने वाले उदार लोगों को शक है। दरअसल आज मोदी की (बीजेपी की नहीं) वही वनमैनशो पोज़ीशन हो चुकी है। जो कभी कांग्रेस के एकक्षत्र राज में नेहरू और इंदिरा गांधी की हुआ करती थी।
अब यह अलग से चर्चा का विषय है कि मोदी का जीवन जब तक अटल जी जैसा अशक्त नहीं हो जाता तब तक ही बीजेपी का भविष्य भी उज्जवल माना जा सकता है? इससे पहले कभी बीजेपी का कट्टर चेहरा रहे एल के आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा 2004 और 2009 का आम चुनाव बुरी तरह हार ही चुकी है। सियासत के जानकार जानते हैं कि आडवाणी ने बीजेपी को अपनी राम रथयात्रा से 2 सीटों से लोकसभा में 182 सीट तक पहुंचाया था। लेकिन मोदी ने अपने बोलने के जादू और संघ परिवार के सतत प्रयासों से बीजेपी को अपने बल पर 282 के आंकड़े तक ले जाकर 30 साल में पहली बार किसी एक दल को पूर्ण बहुमत का स्वाद चखाने का बड़ा कारनामा अंजाम दिया है।
ऐसा लगता है कि नोटबंदी से कुछ भी हासिल न होने और आम जनता को उसकी भारी कीमत चुकाने के बावजूद मोदी का एक के बाद एक चुनाव बीजेपी को जिताना जनता का उन पर यह भरोसा कायम हो जाना है कि यही वो नेता है। जो उसके सपनों का भारत बना सकता है। कांग्रेस, एसपी, बीएसपी, वामपंथी और आम आदमी पार्टी के नेता मानें या ना मानें। देश की जनता कम से कम फिलहाल तो मोदी पर अविश्वास और विपक्ष पर विश्वास करने को तैयार नहीं है।
*करप्शन, बेरोज़गारी, आतंकवाद, माओवाद, महंगाई, अशांति, साम्प्रदायिकता, असहनशीलता, अनुदारता, कश्मीर में टकराव, पाक सीमा पर बार बार हमला, नकली नोट, शिक्षा, चिकित्सा आम आदमी की पहुंच से बाहर, बढ़ता पूंजीवाद, घटता विदेशी निवेश, गिरता संसेक्स, बढ़ती किसान आत्महत्यायें, असुरक्षा, पुलिस प्रशासन का नाकारापन और चंद क्षेत्रों में गिनी चुनी छोटी छोटी उपलब्ध्यिों के बावजूद अगर मोदी के नाम पर जनता आज वोट कर रही है। तो इसका मतलब साफ है कि मोदी युग अभी लंबा चलेगा।* इसकी वजह यह भी है कि एक तो विपक्ष मोदी का विजय रथ रोकने को एक मात्र रास्ता यानी बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन कर नहीं पायेगा और अगर विपक्षी नेताओं में अहंकार अलग रखकर यह एका हुई भी तो लंबी चलेगी नहीं।
इसकी वजह साफ है कि जिस तरह दिल्ली का चुनाव जीतते ही केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी को खड़ा करने में अपना खून पसीना लगाने वाले योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उसी तरह बिना कार्यक्रम और ठोस नीति के विपक्षी एकता का भी वही हाल होगा जो 1989 में जनता दल के जीतने पर वीपी सिंह, चन्द्रशेखर, देवीलाल और उससे पहले 1979 में जनता पार्टी के जीतने पर मुरारजी देसाई, जगजीवन राम और जयप्रकाश नारायण के बीच उभरे मतभेदों से इन साझा दलों के गठबंधन का बार होता रहा है। *अब बीजेपी को केवल एक ही आदमी हरा सकता है। वो हैं खुद मोदी। अगर वे बार बार जनविरोधी काम करते हैं। तब वे लंबे समय तक नहीं टिक पायेेंगे।*

Saturday, 29 April 2017

सुकमा हमला

*सुकमा हमले पर उतना गुस्सा क्यों नहीं ?*

 बात बात पर आसमान सिर पर उठा लेने वाले संगठन सुकमा हमले पर उतना उग्र और सक्रिय नज़र नहीं आये!

24 अप्रैल को छत्तीसगढ़ के सुकमा में नक्सलवादियों ने हमला कर सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद कर दिये। इससे पहले 11 मार्च को 12 जवानों की सुकमा में ही नक्सलवादियों ने पहले ही जान ले ली थी। थोड़ा और पीछे चलें तो 7 साल पहले नक्सलियों ने हमारे 76 जवानों को इसी तरह घात लगाकर मौत की नींद सुला दिया था। जब जब ऐसे हमले होते हैं। राजनेता इनकी कड़ी निंदा करते हैं। मीडिया जवानों के खून का बदला लेने की मांग करता है। सरकार बड़े बड़े दावे करती है। लेकिन हम कुछ ही दिन बाद अपने अपने काम में लग जाते हैं।

आखि़र यह सवाल क्यों नहीं पूछा जाना चाहिये कि जब भाजपा विपक्ष में थी तो वो नक्सलियों को सत्ता में आने के कुछ ही समय बाद जड़ से ख़त्म करने का जो दावा करती थी, वो आज 14 साल बाद भी पूरा क्यों नहीं हो पा रहा है? छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार की बात अगर फिलहाल छोड़ भी दें तो केंद्र में भी अब तीन साल से भाजपा की सरकार है। ऐसे में यह कहकर बचा नहीं जा सकता कि राज्य की रमन सिंह सरकार को केंद्र की मोदी सरकार नक्सलियों से निबटने के लिये पर्याप्त संसाधन और आवश्यक धन उपलब्ध नहीं करा रही होगी?

*ऐसे ही गाय जैसे धार्मिक और जेएनयू जैसे देशभक्ति के नारों के मुद्दोें पर आये दिन उग्र होकर प्रदर्शन करने वाले और अपने विरोधियों पर असहमति होने पर गैर कानूनी रूप से बात बात पर हिंसक होकर हमले करने वाले ढेर सारे संगठन पता नहीं कहां छिपे बैठे हैं?* इतनी बड़ी संख्या में एक गैर कानूनी और देश विरोधी हथियारबंद संगठन के हाथों हमारे इतने अधिक अर्धसैनिक बार बार मारे जाने पर देशभर में वैसा गुस्सा और विरोध अब क्यों नहीं हो रहा है? जैसा कांग्रेस या गैर भाजपा दलों की सरकार के रहते हुआ करता था? उस दौर में अगर सेना के जवान तेजबहादुर ने खराब खाना मिलने का आरोप लगाया होता तो राष्ट्रवादी संगठन उस सेक्युलर सरकार को ही सीधे सीधे देशद्रोही ठहराकर पूरे देश में बड़ा आंदोलन शुरू कर चुके होते?

लेकिन आज क्या हो रहा है। आज हालत यह है कि शिकायत करने वाले जवान की वाजिब शिकायत दूर न कर अनुशासन के नाम पर उसका कोर्ट मार्शल कर उसको नौकरी से निकाला जा चुका है। हैरत की बात यह है कि जो मीडिया 2014 से पहले विपक्ष यानी खासतौर पर भाजपा के सुर में सुर मिलाकर सरकार के खिलाफ आक्रामक अभियान चलाया करता था। आज वो भी चुप्पी साधे हुए है। शर्म की बात तो यह है कि अगर आज का विपक्ष इन मुद्दों को उठाता है तो मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भाजपा और उसकी सरकार से पहले उल्टे विपक्ष को ही आड़े हाथ लेने लगता है। जो मीडिया किसी आतंकी घटना के बाद उसके तार जांच से पहले ही अल्पसंख्यकों से जोड़कर देश तोड़ने की साज़िश तलाश लेता है। वह आज नक्सलियों द्वारा बार बार इतनी बड़ी देश विरोधी संविधन विरोधी और राष्ट्र की संप्रभुता को चुनौती देने वाली हमारे अब तक सौ से अधिक जवानों की जान ले लेने वाली घटनाओं पर उतना ऐक्टिव और उग्र नहीं है।

*यह सवाल भी नहीं उठाये जा रहे कि नक्सलियों के पास इतने आधुनिक और घातक हथियार ट्रेनिंग और नोटबंदी के बावजूद नये नोट कहां से और कैसे आ रहे हैं? नोटबंदी से उनकी कमर टूटने के दावे नाकाम क्यों हुए? हमारी खुफिया सेवा असफल क्यों है? और सबसे बढ़कर भाजपा सरकारें जवाबदेही से बाहर क्यों हैं?*

Wednesday, 26 April 2017

शराबबंदी

*क्या शराब पर कश्मकश में है सरकार?*

 

 

 

*शासकों को मानना चाहिये कि राजस्व से अधिक इंसानी ज़िंदगी को महत्व देने की नीति को अपनाने का समय आ गया है!*

बिहार सरकार ने जब राज्य में पूरी तरह से शराबबंदी की थी। तब नीतीश सरकार की इस नीति पर कई तरह के सवाल उठे थे। एक तरफ तो समाज विज्ञानी इस जनहित की नीति का खुलकर स्वागत कर रहे थे। दूसरी तरफ सरकार के राजस्व को ही सब कुछ मानकर चलने वाले शराबबंदी की इस नीति को बिहार सरकार का आत्मघाती कदम मानकर चल रहे थे। इसमें कोई दो राय भी नहीं कि सरकार को समाज की भलाई के जो भी काम करने होते हैं। उनके लिए काफी पैसे की ज़रूरत होती है। शराब से टैक्स की शक्ल में जो धन सरकार को मिलता है वह काफी भारी—भरकम रकम होती है। यही वजह है कि या तो अधिकांश सरकारें शराब बंद करने का जोखि़म लेना ही नहीं चाहती या फिर जो सरकारें केवल लोकलुभावन आधार पर यह कदम जल्दबाज़ी में उठा भी लेती हैं।

वे कुछ समय बाद राजस्व का घाटा न सह पाने के कारण मजबूर होकर अपना फैसला वापस ले लेती हैं। इसकी एक वजह यह भी होती है कि धीरे धीरे नकली शराब का धंधा भी भूमिगत फलने फूलने लगता है। इसका नतीजा यह होता है कि एक तरफ पीने के आदी लोग नकली शराब पीकर अपनी जान से खेलते हैं तो दूसरी तरफ राजस्व की हानि से सराकर दीवालिया होने के कगार पर जा पहुंचती हैं। लेकिन बिहार में शराबबंदी एक तरह से कामयाब होती नज़र आ रही है। इससे न केवल पारिवारिक विवाद कम हुए हैं बल्कि शराब के नतीजे में होने वाले अन्य अपराध भी कम हुए है। अब केंद्र सरकार और अन्य राज्य सरकारों पर भी बिहार की वजह से नैतिक दबाव बढ़ रहा है।

दूसरी तरफ बीजेपी सरकारें जो भारतीय सभ्यता और संस्कृति की बात बात में दुहाई दिया करती हैं। शराबबंदी को लेकर भारी कश्मकश में आ गई हैं। अक्सर इस मामले में राज्यों के सामने एक और बड़ी समस्या यह आती है कि केंद्र सरकार ऐसा करने पर राज्य सरकार के राजस्व में आने वाली भारी कमी को पूरा करने में कोई सहयोग करने को तैयार नहीं होती। केंद्र का सोचना है कि अगर वह आज किसी एक राज्य सरकार को शराब बंदी से होने वाले घाटे को पूरा करेगी तो उसको अन्य राज्यों को भी यह क्षतिपूर्ति ना चाहते हुए करने होगी। वरना ऐसा न करने पर उस पर सियासी पक्षपात का आरोप लगेगा। संबंधित राज्य के लोग या तो उसके खिलाफ आंदोलन खड़ा कर देंगे या फिर उसको वहां राजनीतिक नुकसान उठाना होगा।

केंद्र सरकार यह भी मानकर चलती है कि अगर राज्य सरकार ने चुनाव के दौरान अपने घोषणापत्र में शराबबंदी जैसा लोकलुभावन कोई वादा किया है तो यह उसकी अपनी ज़िम्मेदारी है कि वह यह देखे कि ऐसा वादा पूरा करने पर जो राजस्व हानि होगी। उसकी पूर्ति कहां से हो पाएगी? किसानों के कर्ज माफ करने को लेकर भी राज्यों और केंद्र के बीच यही रस्साकशी चलती रही है। अब अगर बिहार सरकार के शराबबंदी के फैसले के नतीजों की बात करें तो वहां एक साल में इसके अच्छे परिणाम सामने आने का दावा किया गया है। आंकड़े बताते हैं कि बिहार में 2015 में रोड ऐक्सीडेंट में कुल 867 लोग मारे गए थे। 2016 में यह आंकड़ा घटकर 326 रह गया है।

नीतीश सरकार का कहना है कि शराबबंदी से राज्य में लोगों ने शराब पीकर नशे में वाहन चलाना बंद कर दिया है। इसी का यह सुखद परिणाम सामने आया है। आपको याद होगा यह बात सुप्रीम कोर्ट भी मानता है। यही वजह है कि देश की सबसे बड़ी अदालत ने नैशनल और स्टेट हाईवे से हटाकर 500 मीटर दूर शराब की दुकानें खोलने के आदेश पिछले दिनों दिए थे। हालांकि, कुछ राज्य सरकारों ने चालाकी दिखाते हुए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को फिलहाल शॉर्टकट से निष्प्रभावी करने के लिये इन हाईवे को ज़िला और पालिका स्तर का रोड घोषित कर इनका दर्जा कम कर दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी यही मानना है कि रोड ऐक्सीडेंट का एक बड़ा कारण शराब है।

विकासशील देशों में यह आंकड़ा जहां 69 प्रतिशत है तो विकसित देशों में यह मात्र 20 फीसदी है। बात केवल इतनी ही नहीं है। विकसित देशों ने अपने आधुनिक यातायात सिस्टम और सुरक्षा मानकों को भी मज़बूत किया है। यही वजह है कि भारत में जहां यह आंकड़ा 70 प्रतिशत जा रहा है। वहीं चीन ने तेज़ी से सुधार किया है।

Sunday, 23 April 2017

सोनू निगम की ग़लती?

*सोनू निगमः किससे मांग कर रहे हो?

 जिस देश में तर्क व विज्ञान पर धर्म और आस्था हावी हो वहां*
*सरकार आपकी सुनना तो दूर अमल की सोच भी नहीं सकती।*

सोनू निगम एक गायक हैं। कुछ दिन पहले उन्होंने सुबह सवेरे अज़ान से अपनी नींद खुल जाने पर ट्विटर पर अपनी मन की बात लिख दी। यह उनकी नासमझी मानी जा सकती है कि उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति के लिये जिन शब्दों का चयन किया। वे शब्द उनको शोभा नहीं देते थे। इस बात के लिये उनकी आलोचना और निंदा भी की जा सकती है। सोनू ने एक नादानी और की। वे खुद को किसी पश्चिमी देश का नागरिक मान बैठे। जहां सरकारें इतनी संवेदनशील होती हैं कि लोगों की छोटी छोटी बातों पर कान देती हैं। उनके नागरिक अधिकारों की रक्षा करने के लिये तत्काल आगे आती हैं। भारत जैसे भावना प्रधान और वोटबैंक के सहारे चलने वाले देश में जो होना था। वही हुआ।
सबसे पहली बात तो यह हुयी कि शासन प्रशासन ने सोनू की बात पर ज़रा भी तवज्जो न देनी थी और ना ही दी। वजह साफ है कि इस समय सोनू के गृहराज्य महाराष्ट्र और केंद्र में जो भगवा सरकार है। वह खुद हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं के सहारे सत्ता में आई है। ऐसे में वह सोनू नाम के एक फिल्मी गायक को खुश करने के लिये अपने वोटबैंक को नाराज़ करने का सियासी तौर पर दीवालिया होने जैसा जोखिम कैसे ले सकती थीं? आप सवाल कर सकते हैं कि अज़ान से हिंदू वोटबैंक का क्या रिश्ता है? अरे जनाब अंजान मत बनो। सोनू ने अपने ट्वीट मंे साफ कहा है कि वह केवल मस्जिदों की सुबह की अज़ान के नहीं हिंदुओं और अन्य धर्म वालों के सभी धार्मिक स्थलों से होने वाले लाउडस्पीकर के रातभर के इस्तेमाल पर कानूनी रोक पर अमल चाहते हैं।
आपको पता ही होगा कि सुप्रीम कोर्ट बहुत पहले रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक किसी भी तरह के लाउड स्पीकर के इस्तेमाल के खिलाफ रोक लगा चुका है। लेकिन भाजपा ही नहीं किसी भी दल की सरकार की हिम्मत नहीं कि वह इस रोक पर पुलिस प्रशासन से सख़्ती से अमल करा सके। एक तो इससे सरकार पर यह दबाव आयेगा कि वह मुस्लिम ही नहीं सभी धर्म वालों के लाउड स्पीकर बंद कराने पर मजबूर हो जायेगी। ऐसा नहीं करेगी तो सुप्रीम कोर्ट उसके खिलाफ अवमानना का मामला चलाने के लिये तैयार बैठा है। दूसरी वजह यह है कि हमारी सरकारी मशीनरी इतनी स्वार्थी और अंधविश्वासी है कि उसको ऐसे आदेश देने पर भी वह उन पर अमल करने को यह सोचकर तैयार नहीं होती कि इससे जो बवंडर उठेगा उसको संभालना उसके बूते से बाहर होगा।
तीसरी बात उसको यह डर भी सताता है कि ऐसा करने से उससे भगवान और ईश्वर नाराज़ हो जायेगा। जिसका खामयाज़ा उसको किसी न किसी रूप में आज नहीं तो कल भुगतना होगा। जिस देश में सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर पर बाबरी मस्जिद सरकार और पुलिस प्रशासन हलफनामा देकर भी नहीं बचा सकते। वहां किसी एक मज़हब के मानने वालों के खिलाफ कोई कदम उठाना मुश्किल नहीं लगभग नामुमकिन सा ही है। जिस देश में आज तक यह तय नहीं हो पा रहा है कि तीन तलाक़ का मामला पर्सनल मज़हबी मामला है या संविधान की सर्वोच्चता का सवाल है?
उस देश मंे किसी एक कलाकार की नींद में ख़लल पड़ने से सभी धर्मिक स्थलों के लाउडस्पीकर उतारने या उनको कानून के दायरे में लाने की कोई सरकार हिम्मत तो दूर अमल करने की बात सोच भी नहीं सकती। इसका एक नतीजा यह और हुआ कि एक कट््टरपंथी मौलाना ने सोनू केे खिलाफ फरमान जारी कर दिया। मौलाना का दावा था कि जो आदमी सोनू के अज़ान के खिलाफ बोलने की सज़ा के तौर पर उसको गंजा करेगा और जूतों की माला पहनायेगा उसको दस लाख रू. का इनाम दिया जायेगा। सोनू ने अपने पारिवारिक मुस्लिम नाई को बुलाकर खुद अपनी करनी की सज़ा भुगतने को अपने सर के सारे बाल उखाड़ डाले। मगर मौलाना ने इनाम यह कहकर देने से मना कर दिया कि जूतों की माला तो पहनी ही नहीं।
सोनू को शायद ऐसा करने में शर्म आ रही होगी। लेकिन गंजा होने का पांच लाख मेें समझौता तो किया ही जा सकता था। लेकिन ऐसा लगता है कि सोनू अगर जूतों की माला खुद पहन भी लेंगे तो मौलाना ऐसा करने के लिये चौराहे की सार्वजनिक शर्त जोड़कर एक बार फिर अपने ऐलान से मुकर जायेंगे। वैसे भी मौलाना का मकसद मज़हब की हिफाज़त करना तो रहा नहीं होगा वे तो इस बहाने अपनी पब्लिसिटी चाहते थे। जो मीडिया ने रातो रात उनको सेलिब्रिटी बनाकर फ्री में दे दी है। हो सकता है कोई सिरफिरा मौलाना के फरमान से भी आगे जाकर सोनू को ऐसा अपूर्णीय नुकसान पहंुचा दे जिससे सोनू को लगे न खुदा ही मिला न विसाले सनम।
*लेकिन अफसोस और हैरत की बात यह है कि सरकार ने खाप पंचायत की तरह कानून हाथ में लेने वाले मौलाना के खिलाफ कोई कानूनी कदम नहीं उठाया है। इसकी वजह यह हो सकती है कि करोड़ों लोगों की आस्था लाखों लोगों की सत्ता और हज़ारों लोगों की सरकारी नौकरी सोनू निगम की नींद से अरबों गुना ज़्यादा कीमती है।*