Saturday, 16 May 2015

Manavvar rana

एक टूटी हुई कश्ती का मुसाफिर हूॅ मैं.

हाॅ निगल जायेगा एक रोज़ समुन्दर मुझको..

इससे बढ़ कर मेरी तौहीने अना क्या होगी.

अब गदागर भी समझते हैं गदागर मुझको..

जख़्म चेहरे पे, लहू आॅखो में, सीना छलनी.

ज़िन्दगी अब तो ओढ़ा दे कोई चादर मुझको..

मेरी आॅखों में वो बीनाई अता कर मौला.

एक आॅसू भी नज़र आये समुन्दर मुझको..

कोई इस बात को माने कि न माने लेकिन.

चाॅद लगता है तेरे माथे का झूमर मुझको..

दुख तो यह है मेरा दुश्मन ही नही है कोई.

ये मेरे भाई हैं कहते हैं जो बाबर मुझको..

मुझसे आॅगन का अंधेरा भी नही मिट पाया.

और दुनियाॅ है कि कहती है "मुनव्वर" मुझको..

                               "मुनव्वर राना"
मुद्दतों पहले जो डूबी थी वो पूँजी मिल गयी,
जो कभी दरया मैं फेंकी थी वो नेकी मिल गयी,,

ख़ुदकुशी करने पर आमादा थी नाकामी मेरी,
फिर मुझे दीवार पर चढ़ती ये चींटी मिल गयी,,

मैं इसे इनाम समझूँ या सज़ा का नाम दूँ,
उंगलियां कटते ही तोहफे मैं अंगूठी मिल गयी,,

मैं इसी मिट्टी से उठा था बबूला की तरह,
और फिर एक दिन मिटटी मैं मिटटी मिल गयी,,

फिर किसी ने लक्ष्मी देवी को ठोकर मार दी,
आज कूड़ेदान से फिर एक बच्ची मिल गयी,,

                               "मुनव्वर राना"
अभी तक कुछ नहीं बिगड़ा अभी बीमार ज़िन्दा है!
अभी इस शहर में उर्दू का इक अख़बार ज़िन्दा है!!

नदी की तरह होती हैं ये सरहद की लकीरें भी!
कोई इस पार ज़िन्दा है कोई उस पार ज़िन्दा है!!

ख़ुदा के वास्ते ऐ बेज़मीरी गाँव मत आना!
यहाँ भी लोग मरते हैँ मगर किरदार ज़िन्दा है!!

⭐⭐⭐मुनव्वर राना⭐⭐⭐
यह एहतराम तो करना ज़रूर पड़ता है!

जो तू ख़रीदे तो बिकना ज़रूर पड़ता है!!

बड़े सलीक़े से यह कह के ज़िन्दगी गुज़री!
हर एक शख़्स को मरना ज़रूर पड़ता है!!

वो दोस्ती हो मुहब्बत हो चाहे सोना हो!
कसौटियों पे परखना ज़रूर पड़ता है!!

कभी जवानी से पहले कभी बुढ़ापे में!
ख़ुदा के सामने झुकना ज़रूर पड़ता है!!

हो चाहे जितनी पुरानी भी दुश्मनी लेकिन!
कोई पुकारे तो रुकना ज़रूर पड़ता है!!

वफ़ा की राह पे चलिए मगर ये ध्यान रहे!
की दरमियान में सहरा ज़रूर पड़ता है.!!

मुनव्वर राना.
जिसे दुश्मन समझता हूँ वही अपना निकलता है
हर एक पत्थर से मेरे सर का कुछ रिश्ता निकलता है
डरा-धमका के तुम हमसे वफ़ा करने को कहते हो
कहीं तलवार से भी पाँव का काँटा निकलता है?
ज़रा-सा झुटपुटा होते ही छुप जाता है सूरज भी
मगर इक चाँद है जो शब में भी तन्हा निकलता है
किसी के पास आते हैं तो दरिया सूख जाते हैं
किसी की एड़ियों से रेत में चश्मा निकलता है
फ़ज़ा में घोल दीं हैं नफ़रतें अहले-सियासत ने
मगर पानी कुएँ से आज तक मीठा निकलता है
जिसे भी जुर्मे-ग़द्दारी में तुम सब क़त्ल करते हो
उसी की जेब से क्यों मुल्क का झण्डा निकलता है
दुआएँ माँ की पहुँचाने को मीलों-मील आती हैं
कि जब परदेस जाने के लिए बेटा निकलता है

मुनव्वर राना
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं,
तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं ।

कहानी का ये हिस्सा आज तक सब से छुपाया है,
कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं ।

नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में,
पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं ।

अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं ।

किसी की आरज़ू के पाँवों में ज़ंजीर डाली थी,
किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं ।

पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से,
निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं ।

जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।

यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद,
हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं ।

हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है,
हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं ।

हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है,
अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं ।

सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे,
दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं ।

हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं,
अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं ।

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं ।

हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की,
किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं ।
 
कई आँखें अभी तक ये शिकायत करती रहती हैं,
के हम बहते हुए काजल का दरिया छोड़ आए हैं ।

शकर इस जिस्म से खिलवाड़ करना कैसे छोड़ेगी,
के हम जामुन के पेड़ों को अकेला छोड़ आए हैं ।

वो बरगद जिसके पेड़ों से महक आती थी फूलों की,
उसी बरगद में एक हरियल का जोड़ा छोड़ आए हैं ।

अभी तक बारिसों में भीगते ही याद आता है,
के छप्पर के नीचे अपना छाता छोड़ आए हैं ।

भतीजी अब सलीके से दुपट्टा ओढ़ती होगी,
वही झूले में हम जिसको हुमड़ता छोड़ आए हैं ।

ये हिजरत तो नहीं थी बुजदिली शायद हमारी थी,
के हम बिस्तर में एक हड्डी का ढाचा छोड़ आए हैं ।

हमारी अहलिया तो आ गयी माँ छुट गए आखिर,
के हम पीतल उठा लाये हैं सोना छोड़ आए हैं ।

महीनो तक तो अम्मी ख्वाब में भी बुदबुदाती थीं,
सुखाने के लिए छत पर पुदीना छोड़ आए हैं ।

वजारत भी हमारे वास्ते कम मर्तबा होगी,
हम अपनी माँ के हाथों में निवाला छोड़ आए हैं ।

यहाँ आते हुए हर कीमती सामान ले आए,
मगर इकबाल का लिखा तराना छोड़ आए हैं ।

हिमालय से निकलती हर नदी आवाज़ देती थी,
मियां आओ वजू कर लो ये जूमला छोड़ आए हैं ।

वजू करने को जब भी बैठते हैं याद आता है,
के हम जल्दी में जमुना का किनारा छोड़ आए हैं ।

उतार आये मुरव्वत और रवादारी का हर चोला,
जो एक साधू ने पहनाई थी माला छोड़ आए हैं ।

जनाबे मीर का दीवान तो हम साथ ले आये,
मगर हम मीर के माथे का कश्का छोड़ आए हैं ।

उधर का कोई मिल जाए इधर तो हम यही पूछें,
हम आँखे छोड़ आये हैं के चश्मा छोड़ आए हैं ।

हमारी रिश्तेदारी तो नहीं थी हाँ ताल्लुक था,
जो लक्ष्मी छोड़ आये हैं जो दुर्गा छोड़ आए हैं ।

गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब,
इलाहाबाद में कैसा नाज़ारा छोड़ आए हैं ।

कल एक अमरुद वाले से ये कहना पड़ गया हमको,
जहां से आये हैं हम इसकी बगिया छोड़ आए हैं ।

वो हैरत से हमे तकता रहा कुछ देर फिर बोला,
वो संगम का इलाका छुट गया या छोड़ आए हैं।

अभी हम सोच में गूम थे के उससे क्या कहा जाए,
हमारे आन्सुयों ने राज खोला छोड़ आए हैं ।

मुहर्रम में हमारा लखनऊ इरान लगता था,
मदद मौला हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं ।

जो एक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है,
वहीँ हसरत के ख्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं ।
 
महल से दूर बरगद के तलए मवान के खातिर,
थके हारे हुए गौतम को बैठा छोड़ आए हैं ।

तसल्ली को कोई कागज़ भी चिपका नहीं पाए,
चरागे दिल का शीशा यूँ ही चटखा छोड़ आए हैं ।

सड़क भी शेरशाही आ गयी तकसीम के जद मैं,
तुझे करके हिन्दुस्तान छोटा छोड़ आए हैं ।

हसीं आती है अपनी अदाकारी पर खुद हमको,
बने फिरते हैं युसूफ और जुलेखा छोड़ आए हैं ।

गुजरते वक़्त बाज़ारों में अब भी याद आता है,
किसी को उसके कमरे में संवरता छोड़ आए हैं ।

हमारा रास्ता तकते हुए पथरा गयी होंगी,
वो आँखे जिनको हम खिड़की पे रखा छोड़ आए हैं ।

तू हमसे चाँद इतनी बेरुखी से बात करता है
हम अपनी झील में एक चाँद उतरा छोड़ आए हैं ।

ये दो कमरों का घर और ये सुलगती जिंदगी अपनी,
वहां इतना बड़ा नौकर का कमरा छोड़ आए हैं ।

हमे मरने से पहले सबको ये ताकीत करना है ,
किसी को मत बता देना की क्या-क्या छोड़ आए हैं ।

मुनव्वर राना

Ghazal-O P YATI

O.p. Yati
Tumhen kal kee koi chinta nahi hai, tumhari aankh me sapna nahi hai.
Kisi ko ghair kehna hee ghalat hai, koi bhi shakhs ab apna nahi hai.
Sabhi ko mil gaya hai sath gham ka, yahan koi bhi ab tanha nahi hai.
Bandhi hain har kisi ke hath ghadiyan, pakad me ek bhi lamha nahi hai.
Meri manzil uthakar door rakh do, abhi to panv me chhala nahi hai.-o.p.yati

Betiyan -poem

POEM Dedicated to cute dolls of parents .................. Bahut chanchal bahut khush-numa si hoti hain BETIYAN,
Nazuk sa dil rakhti hain masoom si hoti hain BETIYA,
Baat baat par roti hain nadan si hoti hai BETIYAN,
Hai khushiyon se bharpoor KHUDA ka tohfa Ye BETIYAN,
Ghar bhi mehak uthta hai jb muskrati hai BETIYAN,
Hoti hai ajeeb si becheni jab chhod ke chali jati hain BETIYAN,
Ghar lagta hai suna suna kitna rula jati hain BETIYAN,
Baabul ki laadli hoti hai BETIYAN,
Yeh hum nahi kehte,Yeh toh"KHUDA" kehta hai ki,
Jab main bahut khush hota hu toh janam letii hai BETIYAN.....!!!

Tuesday, 12 May 2015

सोशल नेटवर्किंग पर झूठ


सोशल नेटवर्किंग पर बढ़ता झूठ और नफ़रत का ज़हर!
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0आखि़र इससे देश और समाज का क्या हश्र हो सकता है ?
      हाल ही में सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर एकाएक एंटी सोशल गतिविधियां अचानक तेज़ी से बढ़ती जा रही हैं। हालांकि हमारे देश के सियासतदां तो पहले से ही जाति धर्म और क्षेत्र की संकीर्ण राजनीति करते रहे हैं लेकिन यह अलग बहस का विषय है कि इसके लिये वोटबैंक की राजनीति करने वाले नेता ज़िम्मेदार हैं या वो समाज जो विकास और उन्नति के वास्तविक मुद्दों की बजाये भावनाओं में बहकर थोक में वोट देता रहा है। अब तक देखने में यह आया है कि नेता भी ऐसी ओछी और नीच राजनीति अधिकतर चुनाव के दौरान करते हैं लेकिन पिं्रट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आज भी एक हद से ज़्यादा इस तरह के आपसी एकता और सौहार्द के लिये ख़तरा बनने वाले बयानों और अभियानों को तवज्जोह नहीं देता या दूसरा पक्ष साथ साथ देकर उनको संतुलित करने का प्रयास करता है।
     इसके साथ ही मीडिया अपना वर्जन भी देता रहा है कि यह बात कानून और नैतिकता के आधार पर देश की एकता अखंडता के लिये ख़तरा है लेकिन अब सोशल नेटवर्किंग के दौर में ऐसे अलगाववादी आतंकवादी कट्टरवादी जातिवादी घृणावादी और झूठे व धोखेबाज़ तत्वों को खुलकर खेलने का अवसर मिल गया है। वे रोज़ ऐसी ऐसी झूठी और मनगढ़ंत पोस्ट नेट पर वायरल कर रहे हैं जिनको पढ़कर सुनकर या देखकर यह डर लगता है कि आखि़र नफ़रत अलगाव और असामाजिकता की यह कैंसर जैसी नेट की बीमारी हमें कहां ले जाकर छोड़ेगी? कभी धर्म तो कभी किसी नेता व दल और कभी एक खास वर्ग के बारे में बाकायदा सोच समझकर ऐसी बेतुकी और बेबुनियाद नफ़रत व डरावनी फ़र्जी व नकली बातें फैलाई जा रही हैं जिनको पढ़कर बिना जांच किये सच मानने पर अच्छे खासे सीधे सादे इंसान का बदले की भावना से दिमाग़ घूम सकता है।
    आज के दौर में न केवल कुछ शरारती और देशद्रोही तत्वों ने ऐसी घृणास्पद और मक्कारी की फेक साइट्स और पेज बना डाले हैं बल्कि वे फेसबुक ट्विटर और वाट्सएप पर लगातार झूठा और घिनौना अभियान सुनियोजित साज़िश के तहत एक वर्ग विशेष के खिलाफ चला रहे हैं। पिछले दिनों वाट्सएप पर एक के बाद एक फ़र्जी पोस्ट इस दावे के साथ वायरल की गयीं कि ये बयान अमुक टीवी चैनल पर भी आ चुका है जबकि उस आरोपी नेता ने न तो वास्तव में वह बयान कभी दिया और न ही वह उस कथित चैनल पर आया लेकिन फेक पोस्ट है कि रूकने का नाम ही नहीं ले रही। ऐसे ही एक अल्पसंख्यक नेता का बेहद विवादित और मानवता विरोधी नकली बयान नेपाल के भूकंप को लेकर एक समुदाय को ईश्वर की तरफ से सज़ा दिये जाने को लेकर दिया गया।
    एक बेबुनियाद और झूठा बयान हैदराबाद के एक मुस्लिम नेता की तरफ से जारी बताया गया है जबकि वह इसका मीडिया में खंडन करते करते परेशान है लेकिन खंडन जारी करने पर मीडिया को बिकाउू और कथित सेकुलरिज़्म की घटिया सियासत करने वाला बताकर नेट पर फिर से यही बयान दोहराया जा रहा है। इसके पीछे वजह यह भी मानी जा सकती है कि ये नेता ऐसे विवादित और एक समुदाय को भड़काने वाले बयान पहले भी दे चुके हैं। ऐसे ही अपना एक धार्मिक चैनल चलाने वाले एक इस्लामिक स्कॉलर के नाम पर एक फ़र्जी पोस्ट नेट पर खूब घूूम रही है जिसमें बहुसंख्यकों के खिलाफ़ जमकर ज़हर उगला गया है। इतना ही नहीं पिछले दिनों यूपी के कांधला कस्बे में जब कुछ शरारती तत्वों ने जमात के कुछ मौलानाओं की रेल में विवाद के बाद अपमान कर बुरी तरह पिटाई कर दी तो पुलिस के फौरन कार्यवाही न करने पर मुस्लिम समाज के लोगों ने रेल रोक कर जाम लगा दिया।
    इस दौरान कुछ उग्र प्रदर्शनकारियों ने रेल के कुछ डिब्बों को नुकसान पहुंचाया और बेकसूर यात्रियों से अभद्रता की जिसकी सभी वर्गो ने निंदा की लेकिन अफवाह ये फैला दी गयी कि गुजरात के गोधरा की तरह कांधला में भी रेल को जलाये जाने की बाकायदा साज़िश रची गयी थी? जबकि जांच में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया और पुलिस प्रशासन ने समय पर पहुंचकर भीड़ को लाठीचार्ज कर रेल का जाम तत्काल खुलवा दिया था। ऐसा नहीं है यह दुष्प्रचार और अफवाहें एकतरफा हों बल्कि बहुसंख्यक समुदाय पीएम मोदी भाजपा संघ परिवार सोनिया गांधी राहुल गांधी लालू प्रसाद मुलायम सिंह ममता बनर्जी बाबा रामदेव अरविंद केजरीवाल आदि भी इनका शिकार हैं।
    अब सवाल यह है कि अगर सरकार सोशल मीडिया की निगरानी करने की बात करती है तो इससे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को ख़तरा खड़ा होता है इसलिये चर्चा करते ही पूरे देश में शोर मचने लगता है और सरकार चुप हो जाती है और अगर सरकार इस तरह के दुष्प्रचार और अफवाहों को फैलने देती है तो कई बार कई बार कई कस्बों और नगरों में दंगा हो चुका है। एक साल पहले मुज़फ्फरनगर में इसी तरह की पाकिस्तान की फ़र्जी वीडियो नेट पर डालकर यह झूठ फैलाया गया था कि यह जुल्म हमारे देश में एक वर्ग विशेष कर रहा है। ऐसे ही फ़र्जी पोस्ट मुस्लिमों के पवित्र धार्मिक चिन्हों को लेकर कई बार सोशल नेटवर्किंग पर वायरल हो चुके हैं जिनसे दो समुदायों के बीच लगातार दूरी और घृणा बारूद की तरह बढ़ रही है और फिर किसी दिन एक मामूली सी चिंगारी से यह दंगे की शक्ल में जल उठती है।
    60 लाख यहूदियों को तानाशाह हिटलर ने गैस चैम्बरों में ठूंसकर पूरी दुनिया से उस कौम और नस्ल के सफाये की नाकाम कोशिश करके देखी थी लेकिन वह भी कामयाब नहीं हो सका था और हिटलर आत्महत्या के करके मर गया जबकि यहूदी पूरी दुनिया पर आज भी हावी हैं। सवाल यह है कि सोशल मीडिया पर इस तरह की एंटी सोशल हरकतों को कैसे रोका जाये जबकि इसकी लगाम विदेश से चलाने वाले इसके आकाओं के पास है। सवाल यह भी है कि जो लोग इस तरह की घटिया नीच और देशद्रोही हरकतें सोशल मीडिया पर करते हैं क्या वे नहीं जानते कि इस तरह से देश का कभी भला नहीं हो सकता क्योंकि अलगाव और नफ़रत बढ़ते बढ़ते अगर देश में दंगों हिंसा आतंकवाद गृहयुध््द अराजकता का दौर शुरू होता है तो वह देश के बंटवारे की हद तक जाकर भी समस्या का समाधान कभी नहीं कर सकता।
    इसका ज़िंदा उदाहरण पाकिस्तान है जो अलग होकर भी हमारे लिये आज तक सिरदर्द बना हुआ है नहीं तो कम से मोदी की सरकार पूरे बहुमत से बनने के एक साल में पाकिस्तान को हमला कर ऐसा सबक सिखा दिया गया होता जिसका दावा संघ परिवार सदा करता रहता था।  
0नज़र बचाके निकल सकते हो तो निकल जाओ,
मैं एक आइना हूं मेरी अपनी ज़िम्मेदारी है।।




































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Monday, 4 May 2015

किसानों की मौत पर राजनीति

इसका मतलब सब कर रहे हैं किसानों की मौत पर राजनीति!
          -इक़बाल हिंदुस्तानी
0‘‘आप** भी सत्ता में आने के बाद उसी ढर्रे पर चलेगी \
       दिल्ली में आम आदमी पार्टी की रैली में राजस्थान के एक किसान गजेंद्र ने चाहे इरादतन और चाहे अचानक आत्महत्या की हो लेकिन जिस तरह से इस घटना की चर्चा नेशनल मीडिया से लेकर संसद तक में कई दिन तक चली उससे राजस्थान के दौसा से आकर देश के दिल यानी राजधानी में उसके खुदकशी करने का मतलब और अंतर साफ़ समझा जा सकता है। घटना के इतने दिन बाद भी सभी राजनीतिक दल किसानों की मौत पर घटिया राजनीति से बाज़ नहीं आ रहे हैं बल्कि भाजपा की एक राज्य सरकार के मंत्री ने तो आत्महत्या करने वाले किसानों को कायर तक की उपाधि से नवाज़ दिया है। इन श्रीमान को यह नहीं पता कि जब चुनाव आयेगा तो ये ‘‘कायर’’ ही उनको सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा सकते हैं ।
       आपको याद होगा दिल्ली में जब निर्भया से दिसंबर की एक सर्द रात में बस में बलात्कार करके उसे मरने के लिये  बस से नीचे फैंक दिया गया था तब भी यह मामला दिल्ली में होने की वजह से बहुत अधिक तूल पकड़ गया था वर्ना कोई दिन ऐसा नहीं जाता जब देश के विभिन्न हिस्सों में इस से भी वीभत्स और भयानक बलात्कार और नारी उत्पीड़न की घटनायें न होती हों। ये बात कई बार कई हादसों और वाकयों से साबित हो चुकी है कि हमारा मीडिया ही नहीं सरकार और समाज अलग अलग लोगों और अलग अलग जगहों पर होने वाली एक सी या उससे भी घटिया व ख़राब घटनाओं पर अलग अलग तरह से रिएक्शन करता है। कहने को लोकतंत्र में सब बराबर हैं लेकिन व्यवहारिकता में ऐसा होता नहीं है।
     शायद यही सोचकर दौसा निवासी किसान गजेंद्र ने दिल्ली आकर वह भी आम आदमी पार्टी जैसी विशेष पार्टी की रैली में जान देने का फैसला किया हो कि इससे किसानों के मुद्दे पर बहस होगी और चर्चा के बाद किसानों की समस्या का कोई बेहतर हल निकल सकेगा लेकिन यह क्या खुद को दूसरी परंपरागत पार्टियों से बेहतर और अलग बताने वाली आप ने ही सबसे पहले गजेंद्र की मौत पर यह बयान दिया कि उसकी आत्महत्या के लिये आम आदमी पार्टी नहीं बल्कि मीडिया और पुलिस ज़िम्मेदार है। केजरीवाल ने इसके लिये मीडिया में भी ज्यादा ज़िम्मेदार इलैक्ट्रॉनिक चैनल वालों को ठहराया क्योंकि उनके पास कवरेज के लिये कैमरा होता है और वे कैमरे को जूम करके यह देख सकते थे कि गजेंद्र पेड़ पर चढ़कर वास्तव में जान देने की तैयारी कर रहा है या वह सिर्फ पेड़ पर चढ़कर अपने प्रिय नेताओं का भाषण सुन रहा है जैसा कि अकसर लोग ऐसी रैलियों में पेड़ पर चढ़कर करते हैं।
      अच्छा हुआ केजरीवाल ने यह आरोप नहीं लगाया कि मीडिया वालों के पास ऐसे कैमरे भी होते हैं जिससे वे पेड़ पर चढ़े आदमी का दिमाग़ स्कैन कर यह पता लगा सकते हैं कि वह आदमी आत्महत्या करने का मात्र स्वांग रच रहा है या वास्तव में घर से मरने का इरादा करके ही आया है। इसके साथ ही केजरीवाल ने दूसरा निशाना दिल्ली पुलिस पर साधा कि उसने बार बार अपील करने बाद भी गजेंद्र को जान देने से नहीं रोका। सवाल यह है कि मीडिया और पुलिस ने गजेंद्र को बचाने का काम नहीं किया तो खुद आप के वर्कर्स ने यह नेक काम क्यों नहीं किया जबकि गजेेंद्र आप का सदस्य और समर्थक भी था और उसकी ही रैली में पार्टी का चुनाव चिन्ह झाड़ू साथ लेकर आया था।
    जब केजरीवाल मीडिया और पुलिस पर गजेंद्र को आत्महत्या करने से न रोकने का आरोप लगाते हैं तो इससे एक बात और निकल कर आती है कि केजरीवाल और आप को पहले से ही पता था कि किसान दिल्ली उनकी रैली में जान देने ही आया है। केजरीवाल यह भी जानते हैं कि दिल्ली पुलिस उनके नहीं केंद्र सरकार के अधीन काम करती है। केंद्र में उनकी घोर विरोधी भाजपा की सरकार है तो वह कैसे ये मासूम आस लगा रहे थे कि मोदी की पुलिस केजरीवाल के समर्थक किसान को बचाने के लिये आगे आयेगी? राजनीति तो ऐसा करने की इजाज़त नहीं देती।
     क्या केजरीवाल भूल गये जब निर्भया बलात्कार कांड दिल्ली में हुआ था तो तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने यह सफाई दी थी कि चूंकि दिल्ली पुलिस उनकी सरकार की नहीं सुनती इसलिये इस कांड के लिये वे ज़िम्मेदार नहीं हैं लेकिन केजरीवाल ने पलट कर ये बयान दिया था कि दिल्ली की सीएम वहां होने वाले किसी भी जुर्म की नैतिक ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकती लिहाज़ा वे अगर जुर्म नहीं रोक सकती तो इस्तीफ़ा दें। क्या यही तर्क किसान गजेंद्र की आत्महत्या पर केजरीवाल की आप पर लागू नहीं होता? आज जिस मीडिया ने केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी को ज़मीन से उठाकर आसमान पर पहुंचाया उसी मीडिया में उनको कीड़े नज़र आने लगे? आज केजरीवाल दिल्ली पुलिस से बाकायदा मांग करते हैं कि उनके क़रीब किसी भी पत्रकार को नहीं आने दिया जाये।
    मीठा मीठा गड़प और कड़वा कड़वा थू यह तो वही कहावत लागू हो गयी। एक किसान आप की रैली में जान दे देता है और रैली चलती रहती है? कहां गयी आप की संवेदनशीलता और आम आदमी की पीड़ा दूसरे दलों से ज़्यादा समझने का आप का दावा? अगले दिन आप डेमेज कंट्रोल करने के लिये किसान की मौत होने के बाद भी रैली चालू रहने के लिये माफी मांगते हैं लेकिन पश्चाताप फिर भी नहीं करते? ऐसी घटना होने पर आप की रैली के चालू रहने की तुलना पटना की मोदी की चुनावी रैली से करते हैं जिस में बम विस्फोट होने के बाद कई लोगों के मरने पर भी मोदी भाषण देते रहे थे। यहां हम फिलहाल मोदी के ऐसा करने के पीछे औचित्य पर चर्चा नहीं करेंगे बल्कि केजरीवाल से यह जानना चाहते हैं कि इसका मतलब आपके आदर्श मोदी ही हैं?
     सवाल यह है कि कांग्रेस भाजपा वामपंथी सपा और बसपा की तरह अगर आम आदमी पार्टी भी किसान की आत्महत्या पर राजनीति करेगी तो फिर किसानों की समस्या का समाधान निकालने की आशा किस से की जा सकती है? 
0आस्था का जिस्म घायल रूह तक बेज़ार है,
क्या करे कोई दुआ जब देवता बीमार है ।।






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