Thursday, 21 December 2023

लोकतंत्र को खतरा?

*सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज क्यों उठा रहे हैं अदालत पर उंगली ?* 
0 सर्वोच्च अदालत के रिटायर्ड जज जस्टिस नारिमन ने सेवानिवृत्त होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। आपको याद होगा जस्टिस नारिमन उन चार जजों में शामिल रहे हैं। जिन्होंने 2014 के बाद प्रैस वार्ता कर सुप्रीम कोर्ट की आज़ादी और लोकतंत्र को ख़तरा बताया था। हाल ही में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कश्मीर की धारा 370 हटाने राज्य का विशेष दर्जा खत्म कर उसके दो टुकड़े कर केंद्र शासित प्रदेश बनाने के सरकार के फैसले पर, महाराष्ट्र में शिंदे सरकार बनाने के स्पीकर के निर्णय पर और केरल के राज्यपाल के विवादित व्यवहार पर तथा बीबीसी की डाक्यमेंट्री के बाद उस पर पड़े आयकर के छापे पर सुप्रीम कोर्ट के सो मोटो ना लेने पर उंगली उठाई है।    
                  -इक़बाल हिंदुस्तानी
     हमने सोचा था जाकर उससे पफ़रियाद करेंगे,
     कम्बख़्त वो भी उसका चाहने वाला निकला।।
  सुप्रीम कोर्ट को एक संस्था के तौर पर कमज़ोर बताने और लोकतंत्र को देश में ख़तरा समझने वाले जस्टिस नारिमन अकेेले नहीं हैं। हाल ही में  सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस संजय कौल और उनसे पूर्व रिटायर्ड जज जस्टिस मदन लोकुर जाने माने वकील प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट बार एसोसियेशन के पूर्व मुखिया दुष्यंत दवे सहित दर्जनों रिटायर्ड अधिकारी वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार लेखक मानव अधिकार कार्यकर्ता स्वतंत्र चिंतक और संविधान के जानकार लगातार समय समय पर आगाह कर रहे हैं कि कौन कौन सी बातें हमारे लोकतंत्र के लिये ख़तरा बन सकती हैं। जस्टिस नारिमन सहित अन्य कई जानकार कहते हैं कि जिस तरह से चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में सरकार ने कानून बनाकर तीन सदस्यों की कमैटी से चीफ जस्टिस को अलग कर उनकी जगह केंद्र के एक वरिष्ठ मंत्री पीएम और विपक्ष के नेता को रखा है। उससे चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठता है। उनका यह भी कहना है कि जिस तरह से चार साल बाद कश्मीर की धारा 370 के केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया वह सवाल खड़े करता है। उनको लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को यह संज्ञान लेना चाहिये था कि क्या केंद्र सरकार इसको खत्म करने के संवैधानिक तरीके अपनाने के साथ ही किसी राज्य को केंद्र शासित बना सकती है? क्या संविधान इसकी इजाज़त देता है? उनका यह भी कहना है कि कोर्ट ने कैसे साॅलिसीटर जनरल के केवल मौखिक आश्वासन को मानकर यह फैसला दे दिया कि भविष्य में कश्मीर को फिर से पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया जायेगा। क्या कोर्ट ने यह तय मान लिया कि 2024 के चुनाव के बाद मोदी सरकार ही फिर से जीतकर आयेगी और उसके साॅलिसीटर जनरल वही रहेंगे जो आज हैं और वही केंद्र सरकार की तरफ से कोर्ट में यह वादा कर अमल भी करायेंगे? दूसरा मुद्दा नारिमन ने यह उठाया है कि जिस तरह से केरल के गवर्नर 23 महीने से राज्य सरकार के तमाम बिलों को दबाये बैठे रहे और मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद उन बिलों को विचार के लिये राष्ट्रपति के पास भेज देते हैं। उस पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कोई निर्णायक एक्शन नहीं लिया। जस्टिस नारिमन यह भी कहते हैं कि जिस तरह से मीडिया को सेंसर किया जाता है। उस पर कोर्ट ने लोकतंत्र का चैथा स्तंभ माने वाले मीडिया को खुलकर संरक्षण नहीं दिया। मिसाल के तौर पर बीबीसी की चर्चित डाक्यूमेंट्री के बाद जब उसके कार्यालय पर आयकर का छापा पड़ा तो कोर्ट ने सो मोटो लेकर उसका बचाव नहीं किया। इलैक्ट्राॅरल बांड का मामला भी कोर्ट में लंबे समय से लटका हुआ है। लेकिन कुल चंदे का लगभग 90 प्रतिशत सत्ताधारी दल को जाने से चुनाव में लेवल प्लेयिंग फील्ड नज़र नहीं आता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट लोकतंत्र का महत्वपूर्ण अंग है। उस पर लोकतंत्र की रक्षा का दायित्व है। अगर वह सरकार के दबाव में या उसके समर्थन में निर्णय करने या उसके खिलाफ मामलों को टालने में लगा नज़र आयेगा तो जस्टिस नारिमन जैसे निष्पक्ष जज बेशक उंगली उठा सकते हैं। सिविल सोसायटी के लोग भी कोर्ट के निर्णयों की स्वस्थ आलोचना कर सकते हैं। लेकिन सवाल यह भी है कि जब जस्टिस नारिमन जैसे जज सेवा में थे तब उन्होेंने वो निर्णय क्यों नहीं किये जो आज वो सुप्रीम कोर्ट की दूसरी बैंचो द्वारा ना दिये जाने पर नाराज़गी दर्ज कर रहे हैं। इससे पहले जब स्वीडन के गोटेनबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़ी संस्था वी डेम इंस्टीट्यूट ने अपनी 2020 की लोकतंत्र रिपोर्ट में भारत में लोकतंत्र दिन ब दिन कमज़ोर होने का दावा किया था तो उसको विदेशी संस्था की रिपोर्ट में पूर्वाग्रह होने का आरोप लगाकर सरकार ने खारिज कर दिया था। उस रिपोर्ट में उदार लोकतंत्र सूचकांक में भारत का स्थान 179 देशों में 90 वां बताया गया था। जबकि हमारे पड़ौसी देश श्रीलंका का 70 और नेपाल का 72 था। लेकिन संतोष की बात यह थी कि पाकिस्तान का 126 और बंगलादेश का 154 वां  स्थान था। यह रिपोर्ट डेटा चार्ट डेटा एनालिटिक्स ग्राफिक्स और मैप पर आधारित होने के साथ ही 3000 से अधिक विशेषज्ञों की सेवा 400 संकेतकों की कसौटी पर भारत के भी बड़ी संख्या में जानकारों को शामिल करके बनाने का दावा किया गया था। जिनको समाज सियासत और मीडिया की अच्छी समझ होती है। वी डेम का कहना था कि भारत में मोदी सरकार बनने से दो साल पहले ही मीडिया की स्वतंत्रता विचारों की विभिन्नता अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिविल सोसायटी की आज़ादी चुनावों की गुणवत्ता और शिक्षा का खुलापन कम होने लगा था। लेकिन केंद्र में 2014 में भाजपा के सत्ता में आने के बाद इन मामलों में बहुत तेज़ी से गिरावट आने लगी। संस्था का यह भी दावा था कि भारत अब लोकतंत्र न कहलाये जाने वाले देशों की श्रेणी में आने के बिल्कुल करीब पहंुच चुका है। यह बात पता नहीं कितनी सही है? लेकिन जिस तरह से विरोध व आलोचना करने वाले मीडिया सिविल सोसायटी स्वतंत्र विचारकों और विपक्ष को सरकार निशाने पर ले रही है और सुप्रीम कोर्ट उन मामलों पर या तो चुप्पी साध लेता है या फिर सरकार के पक्ष में फैसला देता नज़र आता है। उससे जस्टिस नारिमन जैसे जजों व अन्य लोगों को लोकतंत्र पर ख़तरा नज़र आ रहा है तो चिंता की बात है।    
 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 14 December 2023

आकाश की बीएसपी

*बसपा: आकाश करंेगे अब ज़मीन से जुड़ी राजनीति ?
0 2008 में मायावती ने अपनी आत्मकथा ‘मेरे संघर्षमय जीवन का सफ़रनामा’ जारी करते हुए कहा था कि वह जब कभी भी अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित करेंगी वह उनके परिवार यानी रिश्तेदार नहीं होगा। लेकिन अब उन्होंने अपने सगे भतीजे आकाश आनंद को अपना सियासी वारिस बनाया है। बहनजी दूसरे दलों के परिवारवाद का भी विरोध करती रही हैं। लेकिन सब जानते हैं कि आज के नेताओं की कथनी करनी में अंतर होना कोई खास बात नहीं है। देखने वाली बात यह भी है कि बहनजी ने तेज़ी से रसातल में जा रही पार्टी की कमान अपने भतीजे को वरिष्ठ व अनुभवी बसपा नेताओं को किनारे करके सौंपने में तनिक भी संकोच नहीं किया।    
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी
     तुम आसमां की बुलंदी से जल्द लौट आना,
     मुझे ज़मीं के मसाइल पर बात करनी है।।
            बहनजी जिस राज्य में तीन बार भाजपा के सहयोग से व एक बार बसपा के बहुमत के बल पर यानी चार चार बार सीएम बनी उस यूपी में आज बसपा का मात्र एक एमएलए है। राजस्थान में उसके विधायकांे की संख्या 6 से घटकर 4 हो गयी जबकि एमपी और छत्तीसगढ़ में दो से शून्य हो गयी। तेलंगाना में उसका खाता तक नहीं खुला है। पूरे देश में आज बसपा की हालत खराब है। उसका ग्राफ दिन ब दिन गिरता जा रहा है। मान्यवर कांशीराम के समय के संस्थापक बसपा नेताओं आर के चैधरी सोनेलाल पटेल ओमप्रकाश राजभर व स्वामी प्रसाद मौर्य आदि की लंबी सूची है जिनको या तो मायावती ने पार्टी से निकाल दिया या वे अपनी उपेक्षा और अपमान से आहत होकर खुद ही पार्टी से अलग हो गये। जिन आकाश आनंद को माया ने अपना उत्तराधिकारी बनाया है। वह सबसे पहले 2017 में बसपा की एक रैली में सामने आये थे। उसके बाद उनको 2019 के आम चुनाव में चुनाव प्रबंधन और प्रचार की महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी दी गयी। 2022 में आकाश ने माया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर यूपी के विधानसभा चुनाव में काम किया। लेकिन नतीजा अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन रहा। आकाश ने डा. अंबेडकर के जन्म की वर्षगांठ पर राजस्थान में 13 कि.मी. लंबी स्वाभिमान संकल्प यात्रा भी निकाली। कुछ ही माह पूर्व माया ने आकाश को पार्टी का राष्ट्रीय समन्यक बनाया था। यह सही है कि आकाश ने लंदन से एमबीए की डिग्री हासिल की है। लेकिन उनको राजनीति का कोई विशेष ज्ञान व अनुभव नहीं है। उनको ऐसे दौर में बसपा की कमान मिलने जा रही है। जबकि बसपा तमाम उतार चढ़ाव देखने के बाद अब लगातार रसातल में जाती नज़र आ रही है। आकाश से आशा की जा रही है कि वह बसपा को अगर सीध्ेा आकाश की उूंचाई तक न भी ले जा सकें तो कम से रसातल में और नीचे जाने से रोककर उसे ज़मीन पर ला सकें। एक समय था जब बसपा यूपी में ही नहीं पूरी हिंदी पट्टी में दलितों की आवाज़ बन गयी थी। उसको कुछ सीट और सम्मानजनक वोट भी देश के कई राज्यों में मिलते थे। हालांकि वह आज भी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा रखती है। लेकिन उसके जनाधार मंे बहुत तेज़ी से गिरावट आ रही है। बसपा की विचारधारा उसी दिन सवालों के घेरे में आ गयी थी जिस दिन उसने जिन वर्ग और जााति के खिलाफ दलितों के उत्पीड़न अन्याय और शोषण का आरोप लगाकर मोर्चा खोला। उनके साथ ही सत्ता की खातिर हाथ मिला लिया था। यह उसका वैचारिक दिवालियापन था। यही उसका शिखर काल था। वह बहुजन से सर्वजन की पार्टी बनने चली थी। लेकिन अल्पजन का दल बन गयी। यह एक शाॅर्ट टर्म गेम था। उसी दिन से बसपा की उल्टी गिनती शुरू हो गयी थी। बसपा ने अपने दूसरे नंबर के मज़बूत समर्थक मुस्लिम समुदाय को भी समय समय पर उपेक्षित अपमानित और आरोपित करके खो दिया। पिछली बार आम चुनाव में जब बसपा ने यूपी में सपा रालोद के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा तो उसका दलित वोट सपा को नहीं गया। लेकिन सपा का मुस्लिम वोट उसको थोक में मिलने से बसपा की ज़ीरो सीट बढ़कर दस हो गयीं। उसके बावजूद बहनजी ने मुसलमानों और सपा का अहसान मानने की बजाये बयान दिया कि बसपा को गठबंधन का कोई लाभ नहीं हुआ। जबकि सच यह है कि सपा को पहले की तरह पांच ही संसदीय सीट मिली थी। जिससे यह बात सपा कह सकती थी। लेकिन बसपा ने गठबंधन गलतबयानी कर तोड़ दिया। बहनजी के इस आत्मघाती एकतरफा और मनमाने फैसले की वजह राजनीतिक जानकार भाजपा का उनसे गोपनीय राजनीतिक गठबंधन मानते हैं। कांग्रेस ने तो कई बार खुलेआम कहा भी कि बसपा नेत्री करप्शन के आरोपों की चल रही जांच से जेल जाने के डर से भाजपा के दबाव में विपक्ष को नुकसान पहंुचाने के लिये काम कर रही हैं। इतना ही नहीं कई बार बहनजी ने मुसलमानों को लेकर उल्टे सीधे बयान दिये। उन्होंने हाल ही में हुए चार राज्यों के चुनाव में यहां तक कह दिया कि चाहे बीजेपी जीत जाये लेकिन कांग्रेस को नहीं जीतने देना है। बाद में उस विवादित व चर्चित बयान वाले वीडियो को बसपा ने कांग्रेस की चाल बताते हुए फर्जी बता दिया। हाल ही में बसपा ने अपने मुस्लिम सांसद दानिश अली को भाजपा की पूंजीपति समर्थक नीतियों का खुलकर विरोध करने पर पार्टी से निकाल दिया। इससे एक बार फिर बहनजी पर भाजपा को चोरी छिपे सपोर्ट करने का आरोप लगा। बसपा पर सड़क पर उतरकर आंदोलन न करने का भी आरोप लगता रहा है। सीएए से लेकर दलितों के खिलाफ हिंसा तक पर वह आंदोलन का हिस्सा बनने को तैयार नहीं होती है। यहां तक कि बसपा जनहित के किसी मुद्दे पर धरना प्रदर्शन या ज्ञापन तक नहीं देती। जिससे आज जनता से उसका सरोकार खत्म होता जा रहा हैै। ज़ाहिर है कि बसपा केवल सत्ता की सियासत करती है। इसका मतलब वह अगर दस बीस साल तक सत्ता में नहीं आयेगी तो जनता का कोई काम भला या विकास नहीं कर सकती। अकसर यही देखने में आया है कि बसपा केवल तभी सड़क पर उतरती है। जब उसकी सुप्रीमो पर व्यक्तिगत हमला होता है। अपनी हार के कारणों का गंभीरता से पता लगाकर उनको दूर करने की बजाये बसपा कभी मतदाताओं तो कभी ईवीएम पर दोष मढ़ देती है। बसपा में कभी भी दूसरी रैंक के नेताओं को  पनपने नहीं दिया गया। जिसका नतीजा यह हुआ कि उसका कैडर भी धीरे धीरे उसका साथ छोड़ता गया। एक दौर था जब बसपा से अति पिछड़ा वर्ग भी जुड़ा था लेकिन जब बहनजी ने अपने कोर वोट दलित उसमें भी जाटव पर अधिक फोकस किया तो भाजपा ने गैर यादव ओबीसी की तरह गैर जाटव दलित को अपने पाले में खींचने में सफलता हासिल कर ली। ऐसा लगता है कि आकाश का बसपा में कोई विरोध नहीं करेगा क्योंकि अब बसपा में लोकतंत्र अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विचारों की विभिन्नता नहीं रह गयी है। अगर अपवाद के तौर पर कोई बसपा नेता आकाश का विरोध करेगा भी तो बहनजी उसको अपना पक्ष रखने का मौका देने की बजाये सीध्ेा बाहर का रास्ता दिखा देंगी। देखना यह है कि आकाश दलितों के कांग्रेस भाजपा या आज़ाद समाज पार्टी की ओर जाने से रोकने को क्या नया करते हैं?      
 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ़ एडिटर हैं।*

Thursday, 7 December 2023

कांग्रेस की सोच?

*कांग्रेस भाजपा का हिंदुत्व का एजेंडा खुद आगे बढ़ाती रही है ?* 
0हिंदुत्व भाजपा का कोर एजेंडा है। लेकिन कांग्रेस बार बार नरम हिंदुत्व अपनाकर भाजपा की पिच पर खेलकर भगवा दल के हाथ मज़बूत करके यह भूल करती है कि इससे भाजपा का कट्टर साम्प्रदायिक मुस्लिम विरोधी कुछ हिंदू वोट उसके साथ आ जायेगा। अगर पूर्व पीएम राजीव गांधी द्वारा बाबरी मस्जिद के ताले खुलवाने से लेकर अयोध्या से चुनाव प्रचार शुरू करने की भूल को फिलहाल छोड़ भी दिया जाये तो हाल ही में तीन राज्यों के चुनाव में कांग्रेस के नेता कमलनाथ के इस बयान को कैसे अनदेखा किया जाये कि राममंदिर बनाने के लिये कांग्रेस ने ही शुरूआत की थी। छत्तीसगढ़ और एमपी की कांग्रेस सरकारें रामगमनपथ कौशल्या माता मंदिर निर्माण और अल्पसंख्यकों के मुद्दों पर लगातार चुप्पी साध रही थीं।    
   *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
     न इधर उधर की बात कर यह बता काफ़िला क्यों लुटा,
     मुझे रहज़नों से गिला नहीं तेरी रहबरी का सवाल है।।
  पीएम मोदी ने तीन राज्यों में भाजपा के चुनाव जीतते ही सबसे पहले भाषण में जो तीन अहम बातें कहीं वे ये हैं कि जनता ने तुष्टिकरण वंशवाद और करप्शन के खिलाफ जनादेश दिया है। सबका साथ सबका विकास भाजपा का केवल नारा है। भाजपा किस तरह की राजनीति करती है। यह किसी से छिपा नहीं है। तुष्टिकरण से उनका मतलब कांग्रेस व अन्य सेकुलर दलों द्वारा मुसलमानों को उनके हिस्से से अधिक सरकारी सुविधायें उपलब्ध् कराना है। जोकि केवल चुनावी जुमला और दुष्प्रचार है। वंशवाद से उनका मतलब कांग्रेस पर गांधी परिवार का खानदानी कब्ज़ा है। भ्रष्टाचार को लेकर मोदी सरकार जिस तरह से चुनचुनकर जानबूझकर विपक्षी नेताओं को ही निशाना बनाती रही है। उसका मतलब यही निकलता है कि भाजपा और उसके घटक तो दूध के ध्ुाले हैं। काफी समय पहले ही कांग्रेसमुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा का मकसद रहा है कि कांग्रेस को हिंदू विरोधी देश विरोधी और विकास विरोधी मुस्लिम समर्थक बेईमान पार्टी बनाकर पेश किया जाये। इस अभियान में भाजपा काफी हद तक सफल भी रही है। इसका अंजाम ये हुआ है कि कांग्रेस बार बार हिंदुओं को यह अहसास दिलाने का प्रयास करती रहती है कि वह भी भाजपा की तरह हिंदू समर्थक दल ही है। राहुल गांधी भाजपा के इस जाल में फंसकर खुद को पक्का सच्चा हिंदू साबित करने के लिये गुजरात चुनाव के दौरान मंदिर मंदिर दर्शन करने गये। उन्होंने अपनी जाति और गौत्र भी मीडिया के सामने बार बार सार्वजनिक किया। भगवा वस्त्र भी धारण किये। पूजा पाठ और तिलक भी ज़ाहिर किया। लेकिन इस सब से ना तो कांग्रेस का कोई राजनीतिक लाभ हुआ और ना ही भाजपा को कोई नुकसान हुआ। उल्टा भाजपा ने यह व्यंग्य ज़रूर किया कि भाजपा ने हिंदुत्व को राजनीति का ऐसा केंद्र बना दिया है कि जिसकी उपेक्षा वो दल भी नहीं कर सकते जो पहले केवल टोपियां लगाकर रोज़ा अफ़तार ईदगाह और मस्जिद व मज़ारों पर जाकर खुद को सेकुलर दिखाया करते थे। यह बात सच भी थी। इसका सियासी फायदा भी भाजपा को मिला। इतिहास गवाह है कि कांग्रेस की सरकारों ने कभी भाजपा संघ या उसके हिंदुत्व अभियान से सख्ती से निबटने को ठोस कार्यवाही करने की हिम्मत या इरादा ज़ाहिर नहीं किया बल्कि वह उसके साथ नूरा कुश्ती लड़कर अपने दो मज़बूत वोटबैंक मुसलमानों और दलितों को डराकर वोट लेकर राज करती रही। इसके बाद कांग्रेस शासित राज्यों में नरम हिंदुत्व अपनाकर हिंदुओं को यह संदेश देने की कोशिश की गयी कि कांग्रेस भी भाजपा से कुछ कम हिंदूवादी नहीं है। साथ ही कांग्रेस सरकारों ने मुसलमानों के मामलों में दूरी बनानी शुरू कर दी। हद यह हो गयी कि जब राजस्थान के एक मुस्लिम युवक की हरियाणा में दर्दनाक माॅब लिंचिंग हुयी तो राजस्थान सरकार ने हत्यारों के हिंूद संगठनों से जुड़े होने की वजह से अधिक सख्ती नहीं दिखाई। उधर छत्तीसगढ़ में हिंदू मुस्लिम दंगे में साहू जाति के एक युवक की हत्या होने पर उसके परिवार को 50 लाख मुआवज़ा और सरकारी नौकरी तत्काल दी गयी। लेकिन इस हत्या के खिलापफ बंद के दौरान दो मुस्लिम लोगों को भीड़ द्वारा पीट पीटकर मार देने पर कांग्रेस सरकार ने ना तो सख़्त कानूनी कार्यवाही की ना ही उनके परिवार को नौकरी या मुआवज़ा दिया। पीड़ित परिवार बाद में जब हाईकोर्ट गया तब मजबूरी में सरकार ने कुछ मुआवज़ा दिया। ऐसे ही हिंदूवादी संगठन समय समय पर ईसाई आदिवासियों के खिलाफ सामूहिक बहिष्कार उनके मुर्दे दफन करने का विरोध और उनसे किसी भी प्रकार का लेनदेन करने वालों का विरोध खुलेआम करते रहे लेकिन हिंदू वोट के मोह में कांग्रेस सरकार चुपचाप तमाशा देखती रही। जब कभी मुसलमानों पर अत्याचार अन्याय या पक्षपात हुआ कांग्रेस सरकार चुप्पी साधकर ना केवल उनके मामलों में दूरी बनाती नज़र आई बल्कि उनके लिये सहायता सहयोग या विशेष योजनाओं से भी परहेज़ किया जाता रहा। हद यह हो गयी कि कांग्रेस सरकार के मंत्री विधायक और अधिकारी तक अल्पसंख्यकों के यहां उदघाटन शिलन्यास और विवाह समारोह में कम से कम जाने लगे। जिससे उन पर मुस्लिम तुष्किरण और हिंदू विरोधी होने का आरोप ना लगे। ऐसा करते हुए उनको यह भी भरोसा बना रहा कि मुसलमान नाराज़ होकर भी उनको ही वोट करेगा। उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है लेकिन अगर हिंदू नाराज़ हुआ तो वह न केवल भाजपा के साथ बना रहेगा बल्कि जो आज कांग्रेस के साथ है वह भी धीरे धीरे भाजपा के पाले में जा सकता है। सच यह है कि आंकड़े बता रहे हैं कि बहुत थोड़े से ही सही हर सीट पर कई हज़ार मुसलमान कांग्रेस के अहंकार और अन्य सेकुलर दलों से तालमेल ना करने से खफा होकर सपा बसपा आप या अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गये हैं। यह अजीब बात है कि एक तरफ कांग्रेस नेता राहुल गांधी पूरे देश में घूम घूमकर भारत जोड़ो यात्रा के दौरान मुहब्बत की दुकान खोलते रहे और दूसरी तरफ उनकी पार्टी कांग्रेस के राज में उसकी सरकारें मुसलमानों के साथ उनके जायज़ मामलों पर भी दूरी बनाकर इसलिये चुप्पी साधे रहीं जिससे हिंदू वोट उनसे नाराज़ होकर भाजपा के साथ ना चला जाये। उनको यह बात समझ नहीं आई कि हिंदुत्व भाजपा का मिशन है। इस मिशन को चाहे जो आगे बढ़ाये वह भाजपा की सफलता और उसी की उपलब्धि माना जायेगा और ज़ाहिर सी बात है। इसका श्रेय लाभ और चुनाव में वोट भी भाजपा को ही मिलेगा। कांग्रेस आज तक यह तय नहीं कर पा रही कि उसकी मूल विचारधारा सोच और मकसद है क्या? वह संघ परिवार के प्रोपेगंडे का विरोध खंडन और काट किस तरह से करे?    
 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Monday, 4 December 2023

3 बीजेपी एक कांग्रेस

*कांग्रेस भाजपा का मुक़ाबला लोकसभा चुनाव में भी नहीं कर पायेगी !*  

0 पांच नहीं चार नहीं बल्कि हमारा कहना है कि भाजपा का मुकाबला तीन राज्यों में सीधे कांग्रेस से था। इन सबमें वह जीतकर अपना मकसद सौ प्रतिशत हासिल कर चुकी है। हालांकि 2018 के इन राज्यों के चुनाव नतीजों को देखें तो पता चलता है कि इन तीनों में कांग्रेस जीती थी। लेकिन 6 माह बाद ही हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इन राज्यों की कुल 65 संसदीय सीटों में से 62 जीत ली थीं। कहने का मतलब यह है कि राज्यों और केंद्र के चुनाव में मुद्दे अलग अलग हो सकते हैं। हालांकि आगे बदलाव भी हो सकता है लेकिन इसके आसार नज़र नहीं आ रहे हैं। अब तो भाजपा का मनोबल पहले से अधिक बढ़ गया है। कांग्रेस के साथ ही इंडिया गठबंधन भी कमज़ोर हुआ है।    

      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 

     ‘‘भाजपा ने तलाश ली विपक्षी ओबीसी सियासत की काट’’ कुछ दिन पहले जब हमने यह लेख लिखा और यह शक जताया कि तीन दिसंबर को 5 राज्यों के चुनाव नतीजों से यह साफ हो जायेगा कि इन राज्यों के चुनाव में इंडिया गठबंधन नाकाम हो गया है। इसकी वजह सपा का एमपी में 70 सीटों पर कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ना था। साथ ही यह भी आगाह किया था कि कांग्रेस की जिन समाज कल्याण की योजनाआंे को भाजपा चुनावी रेवड़ी बताकर पहले आलोचना करती आ रही है। अब उनको खुद भाजपा न केवल अपना रही है बल्कि चुनाव जीतने को उससे भी आगे बढ़कर लागू करने का दावा कर रही है। हमने यह भी जता दिया था कि इन राज्यों में चुनाव भाजपा अपने स्थानीय नेतृत्व की बजाये पीएम मोदी की छवि के सहारे लड़ रही है। जिससे भाजपा का मुकाबला कांग्रेस या समूचा विपक्ष भाजपा के संगठन मीडिया चुनावी चंदे सीबीआई ईडी इनकम टैैक्स काॅरपोरेट सरकारी मशीनरी चुनाव आयोग पुलिस और किसी हद तक न्यायपालिका का दुरूपयोग करने से रोकने में नाकाम रहेगा। हमने इस आर्टिकिल में यह भी बताया था कि विपक्ष चाहे कुछ कर ले वह पीएम मोदी की छवि महामानव, हिंदू राजा और लोकप्रिय हिंदूवादी नेता की बन जाने का किसी भी तरह से मुकाबला नहीं कर सकता। इस लेख से हमारे कुछ सेकुलर साथी नाराज़ भी हुए। उनका कहना था कि आप भाजपा आरएसएस और पीएम मोदी को कुछ अधिक ही बढ़ा चढ़ाकर पेश करते हैं। उनको लगता था कि अब हिंदुत्व का जादू उतार पर है। जबकि हमें पता है कि अभी तो मुसलमानों के ही एक वर्ग के सर से पूरी दुनिया में इस्लामी राज कायम करने का भूत नहीं उतरा तो हिंदुओं के एक वर्ग के दिमाग से हिंदुत्व विश्वगुरू और हिंदूराज का भूत मात्र 9 साल में कैसे उतर सकता है? अमित शाह तो दावा करते हैं कि भाजपा 50 साल तक राज करेगी लेकिन हमें भी इतना तो लगता ही है कि भाजपा कम से 25 साल आराम से पूरे कर लेगी? आगे क्या होगा यह कांग्रेस कम्युनिस्ट और क्षेत्रीय दलों की राजनीति के साथ जनता के मूड पर निर्भर करेगा कि वह धार्मिक मुद्दों को आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर कब तक नुकसान उठाकर भी प्राथमिकता देगी? उसको परउत्पीड़न में कब तक परम आनंद आता रहेगा? वह पड़ौसी मुल्कों की धार्मिक कट्टरता से तबाही का कब सबक सीखेगी? लिखने के लिये भाजपा की जीत और कांग्रेस की हार के अनेक कारण कई दिनों तक चुनाव विशेषज्ञ खोज खोज कर आपको बताते रहेंगे। उनमें से कुछ सही भी होंगे। लेकिन सबसे बड़ी बात जो इस समय दीवार पर लिखी इबारत की तरह साफ पढ़ी जा सकती है वह यह है कि भाजपा ने हिंदुत्व के साथ ही विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस की जनहित की योजनाओं को अपनाकर हिमाचल और कर्नाटक की हार का न केवल कांग्रेस से बदला ले लिया है बल्कि उसने अपना कुछ कुछ कांग्रेसीकरण करके सियासत में लंबी पारी खेलने का मन भी बना लिया है। अप्रत्यक्ष रूप से देखा जाये तो यह विपक्ष यानी कांग्रेस के एजेंडे की जीत भी मानी जा सकती है। लेकिन कांग्रेस और विपक्ष की अधिकांश पार्टियों पर भाजपा ने जो मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदू विरोधी होने का आरोप बार बार लगाया है। वह हिंदुओं के एक वर्ग के दिमाग में घर कर गया है। उनको यह प्रचार भी सही लगने लगा है कि भाजपा के अलावा कोई भी विपक्षी दल आतंकवाद पर इतना कड़ा स्टैंड नहीं ले सकता जैसाकि भाजपा ने इस्राइल और हमास के मामले में खुलकर लिया है। हम जानबूझकर यहां उन योजनाओं की विस्तार से चर्चा नहीं करना चाहते जिनको आधार बनाकर भाजपा ने कांग्रेस को छत्तीसगढ़ जैसे उन राज्यों में भी धूल चटा दी है। जहां कांग्रेस न केवल बहुत आराम से चुनाव जीतती नज़र आ रही थी बल्कि भाजपा समर्थक गोदी मीडिया के एक्ज़िट पोल भी सरकार को नाराज़ करने का जोखिम मोल लेकर यह बता रहे थे कि वहां कांगे्रस बहुत आगे है। जिस तरह से पिछली बार मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद पार्टी में सिंधिया की बगावत का सियासी लाभ उठाकर भाजपा ने कांग्रेस की सरकार पूरी बेशर्मी और सत्ता का दुरूपयोग कर गिरा दी थी। उसकी या लगभग दो दशक से चल रही भाजपा सरकार की एंटी इनकम्बैंसी का कोई लाभ या जनता की सहानुभूति भी कांग्रेस को नहीं मिली। कांग्रेस यह भी नहीं समझ पाई कि एमपी में सिंधिया और राजस्थान में पायलट जैसे युवा नेतृत्व को दरकिनार कर कमलनाथ व अशोक गहलौत जैसे बूढे़ और चुके हुए नेताओं को आगे कर सीएम बनाकर और मोदी के मुकाबले चुनाव मैदान में उतारकर उसने भारी भूल की है। हालांकि आंकड़े गवाह हैं कि 2018 के मुकाबले कांग्रेस का वोट शेयर ना के बराबर ही घटा है लेकिन भाजपा ने बेहतर चुनाव मैनेजमेंट के द्वारा अपना वोटबैंक कांग्रेस से कहीं अधिक बढ़ा लिया। जिससे कांग्रेस को इस अनपेक्षित और करारी हार का सामना करना पड़ा है। मिसाल के तौर पर राजस्थान में पिछले चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 41 था जो इस बार मामूली घटकर 39.53 हुआ। जबकि भाजपा का 41.1 से बढ़कर 41.69 हुआ है लेकिन दोनों की सीट में भारी अंतर आ गया है। ऐसे ही एमपी के चुनाव में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 41 से घटकर 40.43 हुआ लेकिन भाजपा का 41.1 से बढ़कर सीधे 48.61 तक पहुंच गया जिससे सीटों की संख्या मंे भारी उलटफेर हो गया है। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का वोट प्रतिशत 43.1 से घटकर 42.19 हुआ जबकि भाजपा का 33 से बढ़कर 46.28 हो गया। जिससे उसकी सीट 15 से बढ़कर 54 और कांग्रेस की 68 से घटकर 35 रह गयीं। दिलचस्प बात यह है कि भाजपा ने अपना वोट अन्य गैर कांग्रेस दलों से छीनकर बढ़ाया है। कांग्रेस के लिये यही संतोष की बात हो सकती है कि उसने दक्षिण के एक ऐसे राज्य में सत्ता हासिल कर ली है। जिसमंे कुछ माह पहले तक भाजपा उससे आगे लग रही थी। अंत में एक बात और कि जिन उत्तर भारत के राज्यों में भाजपा का पहले ही दबदबा रहा है। उनमें एक बार फिर से उसने ज़बरदस्त वापसी करके यह साबित कर दिया है कि उसको अब आज़ादी के बाद के दौर की कांग्रेस जैसा लंबी पारी खेलने का मौका मिल गया है।   
*नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Sunday, 26 November 2023

जातीय जनगणना और भाजपा

*भाजपा ने तलाश ली विपक्षी ओबीसी सियासत की काट ?* 

0 तीन दिसंबर को जब 5 राज्यों के चुनाव के नतीजे आयेंगे तो कुछ बातें साफ हो जायेंगी। इंडिया नामक विपक्षी गठबंधन ने भाजपा के खिलाफ जो साझा उम्मीदवार खड़ा करने का दावा किया था। वह इन राज्यों में नाकाम हो गया है। लोकसभा चुनाव में भी सफल होगा यह कोई दावे से नहीं कह सकता। इसके साथ ही भाजपा ने विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस के पांच गारंटी के जवाब में उससे भी आगे बढ़कर लोकलुभावन चुनावी घोषणायें करने में बाज़ी मारने का दांव चला है। विपक्ष का अंतिम हथियार जातीय जनगणना का पहले विरोध करने वाली भाजपा ने वक़्त की नज़ाकत को देखते हुए कहना शुरू कर दिया है कि वह इसके खिलाफ़ नहीं रही है। साथ ही उसने पिछड़ों में अति व अत्यंत पिछड़ों का मुद्दा उठाकर इसकी काट तलाश ली है।    

  *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 

      2024 के संसदीय चुनाव में भाजपा नीत राजग और कांग्रेस नीत इंडिया गठबंधन में निर्णायक जंग होना तय माना जा रहा है। लेकिन 5 राज्यों के चुनाव में जिस तरह इंडिया के विपक्षी घटक दलों में आपस में जूतों में दाल बंटती नज़र आई है। उससे साफ है कि लोकसभा चुनाव में भी इंडिया के घटक दलों की एकता रेगिस्तान में पानी तलाशने की कवायद से अधिक साबित होना मुश्किल है। खासतौर पर जिस तरह से सपा और कांग्रेस के बीच एमपी के विधानसभा चुनाव को लेकर तलवारें खिंची है। उससे यह भी पता लग गया है कि विपक्षी गठबंधन के दलों के हित देश और जनता से कहीं उूपर हैं। शायद यह कम था कि इंडिया गठबंधन से बसपा बीआरएस वाईएसआर कांग्रेस बीजेडी अन्नाद्रमुक एमआईएम टीडीपी जनतादल सेकुलर आदि कई भाजपा विरोधी दल पहले ही अलग हैं। इसके साथ ही सपा टीएमसी आम आदमी पार्टी और कम्युनिस्ट उसमें शामिल होते हुए भी जिस तरह से एक एक सीट के लिये अभी से संघर्ष करते नज़र आ रहे हैं। उससे ज़ाहिर है कि उनकी लड़ाई भाजपा से अधिक खुद आपस में ही होनी है। हो रही है। और आगे भी होगी। इसकी सबसे बड़ी वजह यह लगती है कि विपक्ष के लगभग सभी दलों का टारगेट अब पिछड़ी जातियां दलित और अल्पसंख्यक काॅमन हो चुके हैं। जिन जनहित की सुविधाओं को कल तक भाजपा रेवड़ी बांटना कहती थी। उनको उसने विपक्ष से भी दो हाथ आगे बढ़कर अपनाना शुरू कर दिया है। यह अलग सवाल है कि उसके दावों पर जनता कितना भरोसा करती है? मतदाताओं का यह शक अपनी जगह वाजिब लगता है कि भाजपा ने ये गारंटी सस्ती व निशुल्क सुविधायें या खातों में सीधे धन भेजने की कवायद विपक्ष के ऐसे वादों से पहले उन राज्यों में क्यों अंजाम नहीं दीं, जहां उसकी राज्य सरकारें पहले से चल रही हैं। साथ ही पुरानी पेंशन स्कीम विपक्ष ने भाजपा के गले की फांस बना दी है। हिमाचल और कर्नाटक में तो उसके कांगे्रस से हारने की बड़ी वजहों में से एक यही मानी जा रही है। इसके लिये बीच का रास्ता निकालने को भाजपा सरकार ने एक उच्च स्तरीय कमैटी भी बना दी है। लेकिन लगता नहीं है कि सरकारी मशीनरी और टीचर्स बिना शर्त पुरानी पेंशन बहाली से कम पर मान सकते हैं। कोई माने या ना माने यह तो लगता ही है कि भाजपा का हिंदुत्व का मुद्दा अब उतना कारगर नहीं रहा जितना वह 2014 तक चुनाव में हुआ करता था। हालांकि इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि हिंदुत्व और राममंदिर अभी भी भाजपा को एक सीमित ही सही लेकिन एक वर्ग का वोट दिलाने में सहायक बन रहे हैं। इसके साथ ही भाजपा ने सत्ता मीडिया और काॅरपोरेट के द्वारा पीएम मोदी की छवि महामानव, लोकप्रिय हिंदूवादी नेता और हिंदूराज का सूत्रपात करने वाले राजा की बना दी है। जिसका उसको काफी बड़ा लाभ वोटबैंक के तौर पर मिल रहा है। साथ ही लाभार्थी वर्ग की एक नई फौज भी केंद्र और राज्य की भाजपा सरकारों ने अपने पक्ष में खड़ी कर दी हैं। लेकिन करप्शन महंगाई और बेराज़गारी का उसके पास कोई ठोस जवाब आज भी नहीं है। साथ ही इनकम टैक्स सीबीआई और ईडी को जिस तरह से चुनचुनकर विपक्षी नेताओं के पीछे लगाया जा रहा है। साथ ही करप्ट विपक्षी नेताओं के भाजपा में शामिल होने पर उनके खिलाफ पहले से चल रहे मामले खत्म कर देना या उनको ठंडे बस्ते में डाल देना जनता के एक वर्ग को बुरा लग रहा है। लेकिन भाजपा के लिये सबसे बड़ी समस्या बनने जा रहे पिछड़ों की जनगणना का मामला अब उल्टा विपक्ष के लिये मुसीबत बन सकता है। इसकी वजह यह है कि भाजपा ने जिस तरह से पहले यादव माइनस ओबीसी और जाटव मानइस दलित का नारा देकर सपा बसपा को यूपी के चुनाव में और आरजेडी को बिहार में निशाने पर लिया था। ठीक उसी तरह अब भाजपा ने यह समझ लिया है कि वह न तो पिछड़ों की जनगणना की मांग को लंबे समय तक टाल सकती है और ना ही ओबीसी की गिनती होने पर उनके बढ़े हुए आरक्षण की मांग की उपेक्षा कर पायेगी। इसलिये भाजपा सरकार ने बहुत पहले जो पिछड़ों के आरक्षण की समीक्षा करने को रोहिणी कमीशन बनाया था। उसकी रिपोर्ट वह सार्वजनिक कर यह दांव चलने जा रही है कि पिछड़ों के नाम पर जो 27 प्रतिशत आरक्षण मिला उसका बड़ा हिस्सा बहुत छोटी पिछड़ी यादव जैसी जाति हड़प कर गयी। कमीशन ने बड़ी बारीकी से जांच कर यह सिफारिश की है कि पिछड़ों की तीन कैटेगिरी पिछड़ा अति पिछड़ा और अत्यंत पिछड़ा बनाकर उन तीनों को मिलने वाले आरक्षण का प्रतिशत अलग अलग तय किया जाये। इस तरह से भाजपा पिछड़ों मेें ही आरक्षण को लेकर सियासत तेज़ करने जा रही है। भाजपा ऐसा करके यह बताना चाहेगी कि पिछड़ों की गिनती या उनका आरक्षण बढ़ाने से अधिक उनको पहले से मिल रहे आरक्षण को न्यायसंगत तरीके से उन तक उनकी आबादी के अनुपात में ठीक से पहुंचाने की ज़रूरत है। इस मामले में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से अधिक ना करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भी हथियार बनायेगी। साथ ही जिस तरह से भाजपा सरकार चुनाव आयोग मीडिया चुनावी बांड प्रशासनिक मशीनरी पुलिस और न्यायपालिका कारपोरेट का अपने पक्ष में खुलकर राजनीतिक लाभ लेने के लिये दुरूपयोग कर रही है। उससे इंडिया की लड़ाई उसके खिलाफ एक के सामने एक उम्मीदवार ओबीसी की गिनती और जनहित की गारंटी भी अब फीकी पड़ती नज़र आने लगी है। 

 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

सुब्रत राय सहारा

*सुब्रत राय सहारा : हम थे जिनके सहारे, वो हुए ना हमारे!* 

0 जिस इंसान ने अपने बेटे की 500 करोड़ से अधिक की एतिहासिक शादी की। जिस शादी में तत्कालीन पीएम वाजपेयी जैसे कई बड़े नेता अनेक केंद्रीय मंत्री लगभग सभी मुख्यमंत्री दर्जनों विपक्षी नेता काॅरपोरेट जगत फिल्म जगत और लगभग हर क्षेत्र की प्रमुख हस्तियां शामिल हुयीं। वीवीआईपी बारातियांे को लाने ले जाने के लिये थोक में चार्टर्ड प्लेन उपलब्ध कराये गये। अमिताभ बच्चन जैसे सदी के महान कलाकार जिस शादी को यादगार बनाने के लिये अपने परिवार और दूसरे जाने माने अभिनेताओं के साथ मुलायम सिंह और अमर सिंह की मौजूदगी में नाच रहे हों। उसके बारे में और क्या लिखा जाये। जब मुश्किल हालात के चलते वही बेटा अपने पिता के अंतिम संस्कार में शामिल होने विदेश से नहीं आ सका। इसे दुखद विडंबना ही कहेंगे।     

    _-इक़बाल हिंदुस्तानी_ 

     1948 में बंगलादेश के ढाका में पैदा हुए सहारा ग्रुप के मुखिया सुब्रत राय सहारा का पिछले दिनों निधन हो गया। उन्होंने अपने पिता के निधन के बाद परिवार की ज़िम्मेदारी अपने सर पर आने के बाद स्कूटर से दुकान दुकान नमकीन बेचने का काम 2000 रूपये की पूंजी से शुरू किया था। उन्होंने नमकीन सप्लाई करते करते सोचा क्यों ना दुकानदारों की बचत को जमा करने के लिये कोई चिटफंड कंपनी शुरू की जाये। 1978 में उन्होंने जब यह कंपनी शुरू की तो दुकानदारों को उसमें कम से कम एक रूपया तक जमा करने की सुविधा दी। कुछ समय में ही उनका ध्ंाधा इतना अच्छा चला कि उन्होंने सहारा नाम की कंपनी का टेकओवर कर लिया। फिर सुब्रत राय ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। देखते देखते ही उनकी कंपनी में 11 लाख से अधिक कर्मचारी अधिकारी और एजेंट जुड़ गये। एक समय ऐसा आया जब सहारा ग्रुप की विभिन्न कंपनी में 13 करोड़ से अधिक लोगों का धन जमा हो गया। इस दौरान सहारा ने समाजसेवा देशभक्ति पर्यावरण बचाओ गरीब कन्याओं की शादी और राजनीतिक हस्तियों से अपने रिश्ते मज़बूत बनाकर देश में सहारा समूह की धाक जमा दी। उन्होंने सहारा स्पाॅन्सर्ड क्रिकेट हाॅकी टीम एयरलाइन मीडिया चैनल अखबार फाॅर्मूला वन की टीम सहारा सिटी सहारा फिल्म सिटी झीलें यानी तरह तरह के सहारा प्रोडक्ट और 10 शहरों में 764 एकड़ ज़मीनें खरीदकर सहारा गु्रप को आसमान पर पहुंचा दिया। सहारा में निवेश करने वालों को 30 से 40 प्रतिशत का रिटर्न देने के लिये उन्होंने अधिक से अधिक लोगों का निवेश हासिल करने का अभियान चला रखा था। जब जमा धन की मयाद पूरी हो जाती तो उसको लौटाने की बजाये आगे सहारा परिवार सिल्वर और गोल्डन नाम की और आकर्षक व अधिक रिटर्न देने वाली स्कीमों में फिर से निवेश कराने पर जोर देता था। अधिकांश परिचित निवेशक इससे सहमत होकर आगे फिर से पुरानी रकम को और बढ़ाकर निवेश को तैयार भी हो जाते थे। यह वह दौर था जब सहारा का सिक्का चल रहा था। उनकी साख आसमान छू रही थी। फिर एक दिन आया जब सहारा का कारोबार अपने उत्कर्ष यानी सेचुरेशन पर पहंुच गया। यहां से और आगे जाने का रास्ता नहीं था। उस दौर में सहारा आज के अंबानी अडानी से भी आगे नज़र आते थे। उधर जैसा कि होता है। उनके प्रशंसकों की तादाद बढ़ने के साथ ही उनके विरोधी प्रतिद्वन्द्वी और उनकी दिन दूनी रात चैगुनी प्रगति से खार खाये चंद राजनेता व अधिकारी की सूची भी दिन ब दिन लंबी होती जा रही थी। 2009 में सहारा ने अपनी रियल स्टेट कंपनियों के नाम से 24000 करोड़ के बाॅन्ड जारी किये। 3 करोड़ से अधिक लोगों ने इनके लिये आवेदन किया। बस यहीं से सहारा के बुरे दिन की शुरूआत हो गयी। हुआ यह कि सत्ता और तमाम बड़े लोगों की नज़दीकी के चलते सहारा ग्रुप ने बाॅन्ड जारी करने में सेबी के नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं किया। इंदौर के एक निवेशक रोशनलाल ने सहारा की शिकायत नेशनल हाउसिंग बैंक काॅरपोरेशन को कर दी। सहारा को एनएचबीसी का नोटिस आया। लेकिन सहारा ने उसको यह कहकर कोई भाव नहीं दिया कि यह काम आपका नहीं सेबी का है। बैंक ने वह नोटिस सहारा का अहंकारी जवाब और अपनी जांच की सिफारिश सेबी को भेज दी। सेबी ने जब सहारा से इस बाबत जानकारी मांगी तो सहारा ग्रुप अपनी अकड़ में एक बड़ी भूल कर गया। उसने 127 ट्रक में 31669 कार्टन रखकर कागजात सेबी के पास भेजकर चुनौती दी कि पढ़ सकते हो तो इन डाक्यूमंेट को चैक कर के देख लो किस किस ने क्या जमा किया है? इतने ट्रक एक साथ सेबी के आॅफिस के सामने लग जाने से पूरे मुंबई में जाम लग गया। मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज चली तो मामला तूल पकड़ गया। उधर सेबी के पास सहारा ग्रुप की दो कंपनी की पहले ही शिकायत पहंुच चुकी थी। सहारा पर निवेशकों का भुगतान समय पर करने का दबाव बढ़ रहा था। ऐसे में सहारा ने 24000 करोड़ का पब्लिक इश्यू लाने का फैसला किया। लेकिन सेबी ने इसकी अनुमति ना देकर उल्टा निवेशकों का धन 15 प्रतिशत ब्याज के साथ तत्काल वापस करने का सहारा को अल्टीमेटम दे दिया। सहारा इसके खिलाफ कोर्ट पहुंच गया। लेकिन उसने कोई राहत ना देते हुए यह और पूछ लिया कि बताओ आपके पास पैसा किस किस का है? सेबी को जांच में पता लग चुका था कि असली निवेशक बहुत कम थे। 4600 निवेशक ही पैसा वापस लेने आये। जिससे यह शक और बढ़ता गया। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि सहारा आगे लोगों का धन जमा नहीं करेगा। जो अब तक जमा किया है। वह धन सेबी को देगा। सेबी निवेशकों को वापस देगा। 2014 में जब आदेश का पालन नहीं हुआ तो सहारा प्रमुख को कोर्ट ने जेल भेज दिया। सहारा के सारे खाते सीज़ कर हर तरह का लेनदेन प्रोपर्टी की खरीद फरोख्त बंद हो गयी। दरअसल 1996 में भी आयकर के एक असिस्टेंट कमिश्नर ने सहारा को एक नोटिस भेजकर यह पूछने की हिमाकत की थी कि वह बताये कि उसके पास किसका कितना धन लगा हुआ है? सहारा ने उसका जवाब अगले दिन देश के लगभग सभी बड़े अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन छापकर लिखा था कि हमारे यहां अटल बिहारी वाजपेयी नरसिम्हा राव चन्द्रशेखर मुलायम सिंह पीए संगमा कांशीराम मनमोहन सिंह बेनी प्रसाद जनेश्वर मिश्र कलराज मिश्र कमलनाथ राजेश पायलट जैसे लोगों का पैसा जमा है। किसी भी नेता ने इसका खंडन भी नहीं किया। इस एड के छपने से देश में हंगामा मचा। सरकार भी हिल गयी। उसके बाद उस असिस्टेंट कमिश्नर के साथ ही उसके बोस को भी दो माह की जबरन छुट्टी पर सज़ा के तौर पर भेज दिया गया। नये आईटी कमिश्नर ने उस मामले की आगे जांच करने की बजाये लीपापोती कर उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया। हालांकि मामला एक बार फिर से तूल पकड़ने पर वीवीआईपी डिपोज़िट की जांच की खानापूरी कर उसी साल सब कुछ ओके होने की क्लीनचिट दे दी गयी। लेकिन एक के बाद एक झटका लगने से सहारा समूह जैसे फर्श से अर्श तक पहुंचा था वैसे ही अर्श से फर्श पर वापस आ गया। इसीलिये कहते हैं कि मंज़िल सही होने के साथ ही उस तक पहुंचने के रास्ते भी सही होने चाहिये वर्ना आप कितने ही बड़े कितने ही ताकतवर और कितने ही धनी क्यों ना हों एक समय ऐसा भी आता है। जब आप जिनका सहारा बनते हैं वही आपको बुरे समय में सहारा देने तक नहीं आते हैं।

 *0 बुलंदी पर पहंुचना कोई कमाल नहीं,

  बुलंदी पर ठहरना कमाल होता है।* 

 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 9 November 2023

मराठा आरक्षण

मराठा आंदोलन: रिज़र्वेशन नहीं मार्गदर्शन की ज़रूरत !

0 महाराष्ट्र में मराठा समुदाय की 33 प्रतिशत आबादी है। प्रदेश के अब तक बने कुल 16 में से 11 मुख्यमंत्री मराठा ही बने हैं। वर्तमान सीएम और डिप्टी सीएम भी मराठा ही हैं। साथ ही मंत्रिमंडल के 29 में से आध्ेा मंत्री भी मराठा हैं। इतना ही नहीं राज्य की अधिकांश डीम्ड यूनिवर्सिटी और निजी काॅलेज भी मराठा ही चला रहे हैं। सवाल उठता है कि राजनीतिक और सामाजिक रूप से आगे माने वाले मराठा फिर भी आरक्षण क्यों मांग रहे हैं? 2018 में राज्य की भाजपा सरकार ने मराठा आरक्षण का बिल पास किया था लेकिन यह लागू होने से पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने रोक दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने ना तो मराठा जाति को पिछड़ा माना और ना ही कोई असमान्य परिस्थिति मानकर 50 प्रतिशत की इंदिरा साहनी केस में लगाई आरक्षण की सीमा तोड़ने की राज्य सरकार को अनुमति ही दी गयी।      

    _-इक़बाल हिंदुस्तानी_ 

      मनोज जारंग पाटिल के एक नये व अंजान नाम से आमरण अनशन से शुरू हुआ मराठा आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन फिलहाल तो दो माह के लिये राज्य सरकार को दी गयी मोहलत के साथ थम गया है। लेकिन आरक्षण की मांग को लेकर अब तक आधा दर्जन से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। हालांकि मराठा आरक्षण की मांग कई दशक पुरानी है लेकिन राज्य की पहली सरकारें इसको लगातार टालती रही हैं। 15 साल तक चली कांग्रेस एनसीपी की साझा सरकार अपने अंतिम दौर में इसको लागू करने का मन बना भी रही थी। लेकिन कांग्रेस ने अंतिम समय में ऐसा करने से यह सोचकर हाथ खींच लिये थे कि कहीं इससे उसके शासित अन्य राज्यों में अगर अगड़ी जातियों की इस तरह की मांगों ने सर उठाना शुरू कर दिया तो वह राजनीतिक रूप से लाभ कम नुकसान अधिक उठा सकती है। कुछ साल पहले महाराष्ट्र सरकार ने मराठा समाज की हालत जानने के लिये हाईकोर्ट के तीन रिटायर्ड जजों का आयोग बनाया था। इस आयोग की सिफारिश पर राज्य सरकार ने 16 प्रतिशत मराठा आरक्षण देने का फैसला लिया। लेकिन हाईकोर्ट ने इसे शिक्षा के क्षेत्र में 12 और सरकारी सेवा के लिये 13 प्रतिशत तक सीमित कर दिया। यही प्रस्ताव महाराष्ट्र बैकवर्ड क्लास कमीशन ने भी दिया था। मराठा आयोग ने राज्य के कुल 355 में से प्रत्येक ताल्लुका के दो दो गांव के 45000 परिवारों की गहन जांच की। जिनमें आधी से अधिक मराठा आबादी थी। 76 प्रतिशत मराठा कृषि से जुड़े पाये गये। इनमें से 70 प्रतिशत कच्छ में रहते हैं। 13 प्रतिशत मराठी अशिक्षित हैं। 35 प्रतिशत प्राइमरी 43 प्रतिशत हाईस्कूल 67 प्रतिशत इंटर पास हैं। तकनीकी और पेशेवर रूप से एक प्रतिशत से भी कम मराठा दक्ष पाये गये। नवंबर 2015 की रिपोर्ट में आयोग ने मराठा समाज को सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़ा बताया था। सर्वे में पाया गया कि मराठा पूरे राज्य में बिखरे हुए हैं। शांतिकाल में वे खेती से जुड़े हुए थे। लेकिन जब जब जंगे हुयीं उनका एक हिस्सा सेना में जाकर लड़ा। जिससे उनकी पूरी जाति की छवि ही वारियर क्लास की बन गयी। जबकि सच यह था कि उनका बड़ा हिस्सा ना केवल खेती कर रहा था बल्कि खेती में भी मज़दूरी अधिक कर रहा था। सारा पेंच इस बात पर फंसा कि मराठा का एक वर्ग पहले से ही कुनबी माना जाता है। जिसकी गिनती पिछड़ों में होती रही है। उसको आरक्षण का लाभ भी मिलता रहा है। लेकिन जब सभी मराठाओं को आरक्षण देने का सवाल आया तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि कोई असमान्य स्थिति नहीं है और साथ ही मराठा समुदाय का राज्य मंे वर्चस्व है और वह अग्रणी भागीदारी के साथ राष्ट्र की मुख्य धारा में शामिल है। सबसे बड़ी अदालत ने राज्य की इस मामले में पुनर्विचार याचिका भी निरस्त कर दी। केंद्र सरकार और कोर्ट शायद यह भी सावधानी बरत रहे हैं कि अगर आज सम्पन्न और समृध्द समझे जाने वाले मराठाओं को परंपरा तोड़कर आरक्षण दे दिया गया तो कल गुजरात के पाटीदार हरियाणा के जाट और अहीर रेजिमंेट की अलग से मांग कर रहे यादव सड़कों पर उतर सकते हैं। यादवों का यह भी तर्क है कि जब सरकार 28 नई रेजिमेंट बना ही रही है तो उसको अहीर के नाम से एक और नई रेजिमेंट बनाने में क्या समस्या है? महाराष्ट्र सरकार ने एक बार फिर से 7 सितंबर को रिटायर्ड जस्टिस संदीप शिंदे के नेतृत्व में पांच लोगों की नई समिति बना दी है जो इस बात पर विचार करेगी कि कैसे कुनबी मराठाओं की तरह शेष मराठाओं को ओबीसी आरक्षण दिया जा सकता है? इसके लिये निज़ाम के राज के समय के दस्तावेज़ों को आधार बनाकर ऐसा तरीका तलाशा जायेगा। जिससे आगे सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव याचिका लगाकर मराठा आरक्षण का रास्ता साफ किया जा सके। समिति ने अब तक 1.73 करोड़ दस्तावेज़ की छानबीन कर 11,530 काग़ज कुनबी के पक्ष में हासिल कर लिये हैं। हालांकि सरकार कुछ भी कर ले मराठा आरक्षण की राह इसलिये भी मुश्किल है कि इससे एक बार फिर आरक्षण का जिन्न बोतल से बाहर आया तो मंडल आयोग लागू होने के दौर की तरह उसको वापस बोतल में बंद करना नामुमकिन हो जायेगा। सरकार जो नहीं बताना चाहती है। वो यह है कि मंडल आयोग के दौर मंे ही जब मराठाओं ने देखा कि दलितों की तरह ही अब उनसे पिछड़ी और कम योग्य जातियां ओबीसी आरक्षण मिलने से जहां उनसे आगे जा रही हैं और वे खुद कृषि घाटे का सौदा बनने, पीढ़ी दर पीढ़ी खेती की ज़मीन घटते जाने और महाराष्ट्र का सीएम देवेंद्र फड़नवीस के रूप में एक बृहम्ण के बनने से राज्य की सियासत से मराठा वर्चस्व कम होने से पिछड़ रहे हैं तो उन्होंने आरक्षण की मांग तेज़ कर दी। उधर भाजपा सरकार ने कोआॅपरेटिव में बुनियादी बदलाव करते हुए जब भ्रष्टाचार के आरोपों की व्यापाक जांच करनी शुरू की तो उन पर से अधिकांश मराठा का कब्ज़ा भी खत्म या कम होने लगा। उधर राजनीतिक तौर पर भी कई मराठा क्षत्रप भाजपा सरकार के निशाने पर आये तो मराठा समाज में नाराज़गी और उपेक्षा की भावना और बढ़ने लगी। जब मराठा समाज को राजनीतिक आर्थिक और अन्य क्षेत्रों में नुकसान महसूस हुआ तो उन्होंने हर साल 50 से अधिक मार्च निकालने शुरू कर दिये। भाजपा सरकार ने उनको आरक्षण देकर साधना चाहा लेकिन सुप्रीम कोर्ट के स्टे से मामला फिर से बिगड़ गया। अन्य पिछड़ा वर्ग में भी मराठा आरक्षण का विरोध शुरू हो गया है। उनको लगता है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने एक बार मराठा आरक्षण निरस्त कर दिया तो कहीं ऐसा ना हो कि उनके कोटे में मराठा को भी शामिल कर उनका हिस्सा कम कर दिया जाये। जबकि सीएम शिंदे राजनीतिक नुकसान की आशंका और विपक्षी दलों द्वारा ऐसे सवाल उठाने पर पहले ही साफ कर चुके हैं कि ओबीसी के वर्तमान कोटे में कटौती कर मराठा आरक्षण देने का कोई प्रस्ताव नहीं है। अब दो ही रास्ते बचे हैं। जिससे केंद्र सरकार संविधान में संशोधन कर मराठा आरक्षण को कोर्ट की सुनवाई से बाहर कर सकती है या फिर सुप्रीम कोर्ट में नये सिरे से अपील कर उसको मराठा आरक्षण के लिये सहमत किया जा सकता है। लेकिन चुनावी साल में ये दोनों ही विकल्प कठिन नज़र आते हैं। एक काम जो किया जा सकता है वह कोई सरकार करने को तैयार नज़र आती। वह यह है कि बजाये नये वर्गों या जातियों को आरक्षण देने के ऐसी समाजवादी समानतावादी और सर्वसमावेशी आर्थिक नीतियां बनाई जायें। जिससे अधिक से अधिक नये रोज़गार और स्कूल काॅलेज बने। जिसमें सभी को उनकी आबादी आवश्यकता और आज के दौर के हिसाब से उनका अधिक से अधिक उचित हिस्सा मिल सके। इसलिये हम कह सकते हैं कि मराठा जाट या पाटीदारों को रिज़र्वेशन नहीं बल्कि सही मार्गदर्शन की ज़रूरत है। जिससे वे ऐसी सरकारें बना सकें जो यह न्यायसंगत काम कर सकें।  

 *0 क़तरा गर एहतजाज करे भी तो क्या करे,*
*दरिया तो सब के सब समंदर से जा मिले।*
*हर कोई दौड़ता है यहां भीड़ की तरफ़,*
*फिर यह भी चाहता है मुझे रास्ता मिले।।*

*नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*