Tuesday, 20 September 2022

भारत जोड़ो

*भारत जोड़ो यात्रा: कांग्रेस का सपोर्ट बढ़ेगा वोट नहीं ?*

0 कांग्रेस 2014 के बाद से लगातार संकट में है। 2009 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 206 सीट व 11.90 करोड़ वोट जबकि भाजपा को 116 सीट व 7.84 करोड़ वोट मिले थे। लेकिन एक दशक में ही हालत बिल्कुल बदल गयी। 2019 के चुनाव में भाजपा को 22.9 करोड़ तो कांग्रेस को 11.94 करोड़ वोट मिले। इस दौरान कांग्रेस के वोट तो लगभग उतने ही रहे लेकिन सीट एक चैथाई रह गयी। उधर भाजपा के वोट तीन गुना और सीट ढाई गुना हो गयी। 2014 के आम चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस से 189 सीटों पर सीधी लड़ाई में 166 तो 2019 के संसदीय चुनाव में 190 सीट पर डायरेक्ट टक्कर देते हुए 175 सीट जीत लीं। जबकि भाजपा राज्य के क्षेत्रीय दलों से उस अनुपात में सीटें नहीं जीत सकी है।           

       *-इक़बाल हिंदुस्तानी*

      कांग्रेस ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक लगभग साढ़े तीन हज़ार किमी. की लगभग चार माह से अधिक की भारत जोड़ो यात्रा ऐसे समय में शुरू की है जबकि देश को वास्तव में इस तरह के संदेश की ज़रूरत है। जनता का एक बड़ा वर्ग इस विचार को पसंद भी कर रहा है। वह इस यात्रा को आगे बढ़कर सपोर्ट भी कर रहा है। लेकिन यह सपोर्ट वोट मंे भी बदले यह ज़रूरी नहीं है। इसकी वजह एक सर्वे के अनुसार कांग्रेस को सपोर्ट करने वाले 18 फीसदी लोगों में से राहुल को पीएम चाहने वाले मात्र 10 फीसदी ही लोग हैं। यही कारण है कि भाजपा कांग्रेस से मुद्दों पर चुनाव ना लड़कार राहुल के मुकाबले मोदी को आगे कर देती हैै। 2014 में कांग्रेस के पूरे देश के विभिन्न राज्यों मंे कुल 1207 विधायक थे। जो आज घटकर 690 रह गये हैं। उसकी सरकार भी आज मात्र दो राज्यों तक सीमित हो गयी है। 2014 के चुनाव में कांगे्रेस के 64 लोग दूसरे दलों में जाकर चुनाव लड़े। ऐसे ही अब तक कांगेे्रस के कुल 553 पूर्व या वर्तमान एमएलए पार्टी छोड़कर दूसरे दलों के टिकट पर चुनाव लड़े हैं। जिनमें से सबसे अधिक भाजपा के टिकट पर 107 कांग्रेसी चुनाव लड़े हैं। आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रही है। पहले कांगे्रेस को लगा कि वह 1979 और 1989 की तरह एक बार फिर से विपक्षी दलों की आपसी कलह से सरकार गिर जाने से खुद ब खुद सत्ता में वापस आ जायेगी। लेकिन 1999 से 2004 तक वाजपेयी की एनडीए सरकार पहली बार विपक्ष की गठबंधन सरकार होकर भी अपना कार्यकाल पूरा करने में सफल रही।  कांग्रेस 2004 से 2014 तक फिर एक दशक लगातार सत्ता में रहकर यह भूल गयी कि उसके लिये भाजपा एक बार फिर बड़ी चुनौती बनकर सामने आने वाली है। मोदी के नेतृत्व में काॅरपोरेट व आरएसएस के हिंदूवादी ज़बरदस्त समर्थन व अन्ना हज़ारे के करप्शन विरोधी आंदोलन से कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार जिस बुरी तरह बदनाम होकर सत्ता से बाहर हुयी उसकी दूसरी मिसाल इतिहास में मुश्किल से ही मिलेगी। इतना ही नहीं मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही जिस तरह से मुख्य धारा के मीडिया चुनाव आयोग सीएजी सीवीसी जैसी स्वायत्त संस्थाओं पुलिस व दूसरी जांच एजंसियों का खुलकर और एक सीमा तक न्यायपालिका और सोशल मीडिया का दुरूपयोग करके कांग्रेस विरोधी दलों एनजीओ सेकुलर व निष्पक्ष सिविल सोसायटी को निशाने पर लिया। उससे लोकतंत्र धर्मनिर्पेक्षता और समानता के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों का दायरा संकुचित होता चला गया। कांग्रेस की छवि लगातार हिंदू विरोधी और मुस्लिम समर्थक बनती रही लेकिन कांग्रेस इस अभियान की कोई ठोस काट आजतक तलाश नहीं कर पाई। अन्य विपक्षी दलों के साथ ही कांग्रेस को चुनावी चंदा देने वाले लोगों को भी तरह तरह से परेशान किया जाना लगा। इसका नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस ना केवल सियासत में अलग थलग पड़ती गयी बल्कि लेवल प्लेयिंग फील्ड ना होने से उसको संगठन चलाना राजनीति करना और भाजपा व अन्य विरोधियों कोे चुनाव में कड़ी टक्कर देना भी लगभग असंभव हो गया। इस दौरान आंदोलन अनशन और रैली की तो बात ही छोड़ दो। कांग्रेस का जनाधार सिमटने लगा। उधर 2019 का चुनाव हारने के बाद राहुल गांधी के कांग्रेस मुखिया के पद से हटने और सोनिया गांधी के लगातार बढ़ती उम्र और बीमार रहने से कोई तीसरा विकल्प सामने ना होने से संगठन स्तर पर भी कांग्रेस को नुकसान पहुंचने लगा। कांग्रेस मुख्य विरोधी दल होकर भी यह नहीं समझ पाई कि वह इस संकट का सामना कैसे करे? उसने राज्यों में अपनी जगह छीनने वाले क्षेत्रीय दलों से भी तालमेल बनाना ज़रूरी नहीं समझा। 2019 के चुनाव में वह इस गलतफहमी का शिकार हो गयी कि वह पहले की तरह एक बार फिर आसानी से सत्ता में वापसी कर लेगी। वह यह भी भूल गयी कि इस बार उसका पाला जनता पार्टी जनता दल या राजग से नहीं मोदी के नेतृत्व में ऐसी आक्रामक हिंदूवादी पंूजीवादी व विपक्ष को विलेन बनाने देने वाले मीडिया के सहयोग से चुनौती देने वाली भाजपा से पड़ा है। जिससे वह आसानी से पार नहीं पा सकती है। कांग्रेस ने यह भी नहीं सोचा कि वह तमिलनाडु बंगाल उड़ीसा गुजरात दिल्ली असम आंध्रा महाराष्ट्र उत्तराखंड और यूपी बिहार सहित जिन राज्यों से एक बार सत्ता से बाहर हो गयी वहां फिर उसकी कभी भी वापस सरकार क्यों नहीं बनी? उसका संगठन भी धीरे धीरे खत्म हो गया। उसके पास पार्टी फंड का अभाव होने लगा। उसका वोटबैंक बृहम्ण दलित और मुसलमान भी उससे छिटने लगा। कांग्रेस की तबाही के लिये शायद यह कुछ कम था कि उसकी जगह विभिन्न राज्यों में सत्ता मेें आये क्षेत्रीय दलों सपा बसपा राजद जदयू बीजद टीएमसी डीएमके एआईएडीएमके वाईएसआर कांग्रेस टीआरसी शिवसेना टीडीपी एनसीपी आम आदमी पार्टी पीडीपी असम गण परिषद और पूर्वोत्तर के अनेक राज्य स्तरीय दलों ने राज्यों के विधानसभा के साथ लोकसभा का चुनाव लड़ना भी शुरू कर दिया। इनका मुकाबला करके कांग्रेस कभी कभी कहीं कहीं तो इनमें से कुछ को कुछ बार हरा पाई। लेकिन अंत में वह इन क्षेत्रीय और भाषाई अस्मिता वाले दलों के सामने कमज़ोर पड़ गयी। इस दौरान इस मौके का लाभ उठाकर भाजपा संघ व कारपोरेट के कंध्ेा पर सवार होकर हिंदुत्व व उग्र राष्ट्रवाद के सहारे क्षेत्रीय दलों व कांग्रेस से दो दो हाथ कर आगे निकलने मंे सफल होने लगी। कांग्रेस आज तक यह सीधी सी बात नहीं समझ पा रही है कि वह जितनी पुरानी पार्टी हो चुकी है उसकी एंटी इन्कम्बंैसी भी उतनी ही अधिक हो चुकी है। आज बढ़ती महंगाई और बेरोज़गारी के बावजूद जनता का एक बड़ा वर्ग मोदी और भाजपा के साथ क्यों खड़ा है इसका कोई जवाब जब तक कांग्रेस नहीं तलाश करती उसको सपोर्ट तो मिल सकता है लेकिन वोट नहीं। कांग्रेस को जनता के सामने भाजपा से इतर वैकल्पिक नई आर्थिक नीति नया विकास माॅडल नये भारत का रोडमैप और हिंदुत्व व उग्र राष्ट्रवाद का नुकसान तथा समानता निष्पक्षता व पंूजीवाद की जगह समाजवाद लाना होगा।

0 लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक और नवभारत टाइम्स डाॅटकाॅम के ब्लाॅगर हैं।

स्थानीय निकाय

नगर निगम हो नगरपालिका हो या नगरपंचायत हर स्थानीय निकाय से जनता की आशायें लगभग एक सी होती हैं। उनको लगता है कि इन निकायों का मुख्य काम सड़क बनवाना सफाई कराना पानी सप्लाई और स्ट्रीट लाइटें जलवाना होता है। अगर थोड़ा और विस्तार में जायें तो जनता इन लोक संस्थाओं ने यह भी आशा करती हैं कि ये गृहकर और जलकर कम से कम लगायें और उसको भी जल्दी जल्दी ना बढ़ायें। इसके साथ ही इन निकायों के कार्यालयों में बनने वाले जन्म मृत्यु और नो ड्यूज़ प्रमाण पत्रों आदि को बनाने में आसानी हो और सुविधा शुल्क ना वसूला जाये यह भी आम आदमी की इच्छा रहती हैै। लेकिन कम लोगों को पता है कि स्थानीय निकायों का कार्यक्षेत्र कितना बड़ा है। उनके अधिकार क्षेत्र में कितने जनहित के कार्य आते हैं। वे जनता के जीवन से जुड़ी कौन सी ऐसी सुविधा है जो नहीं दे सकते? मिसाल के तौर पर चुंगी के स्कूलों का नाम आपने सुना होगा। जो अब नाम के ही रह गये हैं। मतलब कहने का यह है कि शिक्षा भी स्थानीय निकायों के अधिकार में है। स्थानीय निकाय प्राथमिक शिक्षा ही नहीं हाईस्कूल इंटर काॅलेज और डिग्री काॅलेज भी हिंदी या अंग्रेज़ी मीडियम में लड़के और लड़कियों के लिये खोल सकते हैं। वे उनको आवश्यकतानुसार दो शिफ़्ट में भी चला सकते हैं। इसके साथ ही वे इलाज के लिये अस्पताल भी चला सकते हैं। जिनमें गरीब यानी बीपीएल परिवारों को लगभग निशुल्क या मात्र लागत पर व रियायती दरों पर सभी को इलाज भर्ती सुविधा आॅप्रेशन ब्लड यूरीन स्टूल टैस्ट अल्ट्रा साउंड एक्सरे एमआरआई ईसीजी टीएमटी सीटी स्कैन एंडो स्कोपी प्लाॅस्टर फीज़ियो थैरेपी ईएनटी यानी नाक कान गला का उपचार आरसीटी यानी दांातों का हर तरह का इलाज आईसीयू सुविधा आंखों का चैकअप आॅप्रेशन चश्मा लैंस नाॅर्मल या सीजे़रियन डिलीवरी और डायलिसिस की सुविधा भी उपलब्ध कराई जा सकती है। इसके साथ ही स्थानीय निकाय ये महंगी और अत्याध्ुनिक चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराने में समय लगने पर तत्काल प्रभाव और संसाधनों की कम उपलब्धता तक अपने स्तर पर होम्योपैथी आयुर्वेदिक और यूनानी चिकित्सा की सुविधायें एक रूपये की रजिस्ट्रेशन फीस पर आसानी से उपलब्ध करा सकती है। लेकिन उसको महंगी चिकित्सा सुविधायें उपलब्ध कराने के लिये शासन प्रशासन की औपचारिकतायें पूरी करने और धन की व्यवस्था होने तक अपने प्रयास लगातार जारी रखने होंगे। इसके साथ ही स्थानीय निकाय हर मुहल्ले या वार्ड में छोटे और मुख्य स्थानों पर निकाय की ज़मीन उपलब्ध होने पर बैंक्वट हाॅल खोल सकती हैं। इससे ना केवल गरीब कमज़ोर और दलित वर्ग को आसानी से अपने प्रोग्राम करने को जगह मिलने लगेंगी बल्कि मीडियम क्लास को भी उचित खर्च देकर विवाह सांस्कृतिक प्रोग्राम और अन्य कामों के लिये बड़े हाॅल आराम से मिलने लगेंगे। स्थानीय नगर निगम नगर पालिका और नगर पंचायतें अपने स्तर पर लोगों के मनोरंजन के लिये आबादी के बाहर जगह तलाश कर या खरीदकर पार्क भी बना सकती हैं। इनमें बच्चो के लिये झूले बड़ों के लिये जिम वाॅकिंग ट्रेक और झील बनाकर बोटिंग की सुविधा भी दी जा सकती है। ऐसे ही पालिकायें नगर को साफ और स्वस्थ रखने के लिये लगातार अभियान चलाकर आबादी क्षेत्र से मच्छर भगा सकती हैं। कम स्थानीय निकायों को जानकारी है कि उनके अधिकार क्षेत्र में स्थानीय सांस्कृतिक गातिविधियों को बढ़ावा देना भी है। इसके लिये वे समय पर विभिन्न प्रदर्शनी लगा सकती हैं। उनमें उस क्षेत्र के विशेष कामों जैसे काष्ठकला कांवड़ या अन्य विशेष रोज़गार को वित्तीय सहायता प्रशासनिक कामों में सहायता और दूसरी औपचारिकतायें पूरी करने मंे मदद कर सकती हैं। इन नुमाइशों के द्वारा ही खाने पीने के स्टाल चाट बच्चो के लिये चाउमिन डोसा बर्गर पिज़्ज़ा आइसक्रीम कुल्फी हलवा परांठा खिलौने आदि उपलब्ध कराये जा सकते हैं। इतना ही नहीं इन प्रदर्शनियों में शिक्षा भारतीय सभ्यता उदारता एकता भाईचारा परस्पर प्यार मुहब्बत साहित्य संस्कृति को बढ़ावा देने के लिये कवि सम्मेलन मुशायरा गीत संगीत डांस नाटक समूहगान वाद विवाद प्रतियोगिता भाषण बाॅडी शो मिमिक्री हास परिहास कराओके आदि से प्रतिभाओं को निखारा जा सकता है। यहां तक कि उनको इनाम और वित्तीय सहायता देकर हौंसला भी बढ़ाया जा सकता है। नगर में लाईब्रेरी बनाई जा सकती है। जहां खासतौर पर गरीब लेकिन काबिल बच्चो को स्कूल की निशुल्क पुस्तकें दी जा सकती है। पत्रकरों के लिये प्रैस भवन बनाया जा सकता है। जिसमें वे प्रैस वार्ता अपनी मीटिंग या बाहर से आने वाले पत्रकार साथियों को निशुल्क ठहरा सकते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिये पालिकायें वृध्दा आश्रम बना सकती हैं। साथ ही एक ऐसा प्रोजैक्ट भी शुरू हो सकता है। जिसमें बच्चो को यह समझाया जायेगा कि उनको बुढ़ापे में अपने माता पिता को अपने साथ ही रखना क्यों ज़रूरी है? एक ऐसा आश्रम भी बनना चाहिये जिसमें मानसिक व शारिरिक रूप से विकलांग बच्चो को रखकर उनकी सेवा की जा  सके। उनको रोज़गार का प्रशिक्षण भी वहां दिया जायेगा। ऐसे ही जो बच्चे अपने परिवार के नियंत्रण से नशाखोरी या गलत संगत की वजह से बाहर हो जाते हैं। उनके सुधार उपचार और मानसिक परिष्कार के लिये एक सेंटर खोला जाये जिसमें निशुल्क या बहुत कम फीस पर ऐसे बच्चो को नाॅर्मल किया जा सकेगा। जेनरिक दवाइयोें के साथ ही ऐसे अनेक जनहित के काम हैं जो जनता के सुझाव पर हो सकेंगे।

लूलू ग्रुप के बॉस

*सबके काम आते हैं लुलु ग्रुप के बाॅस अब्दुल क़ादर यूसुफ अली!*

0यूपी की राजधानी लखनउू के बाद लुलु माॅल के स्वामी और केरल निवासी यूसुफ़ अली ने राज्य के चार और शहरों नोएडा बनारस प्रयागराज और कानपुर में लुलु माॅल खोलने का ऐलान किया है। लुलु ग्रुप ने लखनउू में 2000 करोड़ निवेश सहित भारत में पांच माॅल पर अब तक 7000 करोड़  लगाकर देश में 12 और माॅल खोलकर कुल 19000 करोड़ का निवेश करने की योजना बनाई है। लुलु ग्रुप इंटरनेशनल एक मल्टी नेशनल कंपनी है। इसका मुख्यालय दुबई की राजधानी आबू धाबी में है। लुलु अरबी का शब्द है। जिसका मतलब मोती होता है। लुलु ग्रुप का वार्षिक कारोबार 8 अरब डाॅलर का है। लुलु का बिज़नेस अमेरिका यूरूप एशिया अरब देशों सहित 22 मुल्कों में है। इसमें 57000 से अधिक लोग काम कर रहे हैं।       

     *-इक़बाल हिंदुस्तानी*

      लुलु ग्रुप के मालिक यूसुफ अली न केवल केरल के लोगों की पार्टी धर्म व जाति देखे बिना रोज़गार व अन्य ज़रूरतोें को पूरा करके मदद करते हैं बल्कि अरब मुल्कों में भी भारतीयों के बिना पक्षपात मानवता के आधार पर काम आते हैं। जून 2021 में दुबई में अली ने एक सूडानी नागरिक की 2012 में सड़क दुर्घटना में हत्या के आरोप मंे उम्रकैद की सज़ा होने पर केरल निवासी कृष्णन को 5 लाख दिरहम यानी भारतीय एक करोड़ रूपेय की ब्लड मनी देकर जेल जाने से बचाया था। पिछले महीने अली तिरूअनंतपुरम में लोक केरल सभा की एक मीटिंग में बोल रहे थे। वहां एक नौजवान अचानक खड़ा होकर उनसे अपने मृत पिता की डैड बाॅडी सउूदी अरब से केरल लाने को सहायता मांगता है। अली ने अपना संबोधन बीच में ही रोककर अपनी टीम को तत्काल अरब में फोन पर आदेश दिया कि उस युवक के पिता को भारत भेजने की व्यवस्था उनकी कंपनी के खर्च पर की जाये। इतना ही नहीं अगस्त 2019 में भाजपा के सहयोगी संगठन और भारत धर्म जनसेना के राज्य प्रमुख तुषार वेलापल्ली को जब दुबई में एक चैक बाउंस होने पर जेल जाना पड़ा तो अली ने उनकी ज़मानत राशि भरकर उनको रिहा कराया। लुलु स्वामी की इस तरह की समाजसेवा इंसानियत और हर किसी की मदद की कहानियां एक दो नहीं ढेर सारी हैं। नट्टिका बीच पर मछली पकड़कर अपना रोज़गार चलाने वाले पीवी राजू की नज़र में अली किसी फरिश्ते से कम नहीं हैं। राजू का कहना है कि 6 साल पहले वह अली के पास उस दौर में गये थे जब वे सब जगह से निराश हो चुके थे। उनको अपनी बेटी को एक व्यवसायिक कोर्स कराने के लिये कुछ आर्थिक सहायता की ज़रूरत थी। अली ने न केवल उसकी बेटी की पढ़ाई का पूरा ख़र्च उठाया बल्कि बातों ही बातों में ये पता चलने पर कि उसके पास सर छिपाने को अपना मकान तक नहीं है। अली ने उसे अपने खर्च पर एक बेहतरीन मकान भी बनाकर उपहार में दिया। पिछले साल जब राजू अपनी इसी बेटी की शादी का कार्ड देने अली के पास गया तो अली ने शादी के लिये सोने की एक चैन उसकी बेटी को तोहफे के तौर पर देते हुए हर हाल में शादी में आकर बेटी को आशीर्वाद देने का वादा किया। अली के जीवन का धनी भारतीय के तौर पर बिज़नेस सफर केरल के इसी नट्टिका गांव से 1970 में शुरू हुआ था। अली उन दिनों बिज़नेस एडमिनिस्टेªशन का डिप्लोमा करने अहमदाबाद गये थे। जहां उनके पिता एम के अब्दुल कादर एक बिज़नेस चलाते थे। उनके वहां पहले से ही रेस्टोरेंट जनरल स्टोर और होम एप्लायंसेज़ आउटलेट सहित पांच स्टोर चल रहे थे। अहमदाबाद में रहकर पढ़ाई करते हुए अली ने अपने पिता के कारोबार के व्यवसाय के प्रशासनिक कामों को संभालना शुरू कर दिया था। इसके कुछ समय बाद अली के अंकल एम के अब्दुल्ला ने उनको यूएई में चल रहे अपने डिपार्टमेंटल स्टोर को चलाने में मदद करने को कहा। अली आबूधाबी के ईएमकेई स्टोर को संभालने दिसंबर 1973 में मुंबई से दुबई चले गये। दुबई ने अली ने फ्रोज़न फूड प्रोडक्ट्स के आयात पर फोकस करते हुए कोल्ड स्टोर चेन और फूड प्रोसेसिंग यूनिट पर खास जोर दिया। जिसका नतीजा यह हुआ कि वह एक दशक में ही दुबई के मुख्य कारोबारियों में अपने ग्रुप को शामिल करने में सफल रहे। 1990 में गल्फ वार के बाद अली ने दुबई में पहला सुपर मार्केट लुलु ब्रांड के नाम से आबूधाबी में शुरू किया। इस दौरान दुबई की सरकार ने भी अली को देश के बुरे वक्त में साथ देते देख हर तरह का सहयोग देना शुरू कर दिया। जिससे अली के कारोबार को मानो पर लग गये। इसके बाद अली ने 2000 में वहां अपना हाइपरमार्केट खोला। इसके बाद लुलु ग्रुप ने अपना विस्तार पूरे मिडिल ईस्ट में करना शुरू कर दिया। 2020 में दुबई की सरकारी कंपनी एडीक्यू ने लुलु के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करते हुए उसे इजिप्ट में विस्तार के लिये एक अरब डाॅलर का निवेश दिया। इतना होना था कि लुलु के सहयोग करने वालों की लंबी लाइन लग गयी। लुलु ग्रुप ने अन्य देशों की सरकार व कंपनियों से भी हाथ मिलाना शुरू कर दिया। सउूदी अरब के पब्लिक इंवेस्टमेंट फंड ने लुलु को हाथो हाथ लिया। अली के केरल स्थित गांव में उनके घर के बाहर नौजवानों व अन्य लोगों की लंबी लाइनें काम की तलाश में लगने लगीं। अली ने भी अपने गांव और आसपास के लोगों को नौकरी देने में कमी नहीं की। यहां तक कि उन्होंने इस काम पर खास जोर देने के लिये अरब देशों में भी अपने राज्य केरल से आने वालों के लिये अपने गांव के नाम पर नट्टिका काउंटर अलग से खोल दिये। जिसकी निगरानी खुद वह पर्सनली करते हैं। अली ने गांव के हर परिवार से योग्यता के हिसाब से एक आदमी को अपने लुलु ग्रुप में ज़रूर काम देने का अघोषित नियम ही बना दिया। कई परिवारों के एक से अधिक लोग भी लुलु में काम कर रहे हैं। जिनका वेतन भी अन्य कंपनी से कहीं अधिक है। रोज़गार देने का लुलु गांव में सबसे बड़ा ज़रिया बन गया। इतना ही आगे चलकर अली अरब देशों के शासकों के इतने चहेते हो गये कि वह भारत सरकार और अरब शासकों के बीच संवाद सहयोग और आपसी कारोबार के पुल बन गये। अली बिना इजाज़त अरब शासकों के घर जाने वाले चंद लोगों में शुमार किये जाते हैं। अली ने दुबई सरकार से बात करके हिंदुओं के लिये अंतिम संस्कार व ईसाइयों के लिये चर्च बनाने को सरकारी ज़मीन भी दिलाई है। अली ने दुबई जाने पर पीएम मोदी को कश्मीर से फल व सब्जी आयात कर 800 कश्मीरियों को रोज़गार देने का सफल प्रोजेक्ट भी पेश किया। अली ने लुलु ग्रुप के ज़रिये कामयाब कारोबारी के साथ ही भारतपे्रमी व अच्छे इंसान की भी पहचान बनाई है।

*नोट- लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक व नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

नीतीश कुमार अवसरवादी

*अवसरवादी हैं नीतीश कुमार, मोदी को चुनौती के नहीं हैं आसार!*

0‘देश का नेता कैसा हो, नीतीश कुमार जैसा हो’ बिहार के सीएम और जनता दल यू के मुखिया नीतीश कुमार के भाजपा का साथ छोड़ने के बाद भले ही उनकी पार्टी के अति उत्साही कार्यकर्ताओं ने ये नारे लगाये हों लेकिन जिन विपक्षी दलों को भी यह भ्रम है कि नीतीश 2024 में विरोधी दलों के किसी गठबंधन का नेतृत्व कर सकते हैं। वे एक तरह से खुशफहमी का ही शिकार माने जा सकते हैं। इसकी वजह यह है कि नीतीश सत्ता में रहने के लिये अब तक जितनी बार और जितने समय तक भाजपा के साथ रह चुके हैं। उससे उनकी छवि अवसरवादी उसूलविहीन और पलटूराम की बन चुकी है। दूसरी तरफ सबसे बड़ी विरोधी पार्टी कांग्रेस नीतीश को पीएम पद के लिये राहुल की जगह किसी कीमत पर स्वीकार नहीं करेगी। अन्य विपक्षी दल भी अलग सोचते हैं।           

       -इक़बाल हिंदुस्तानी

      शिवसेना अकाली दल के बाद भाजपा का साथ छोड़ने वाला जदयू तीसरा बड़ा दल है। अगर यह कहा जाये तो गलत नहीं होगा कि अब एनडीए में कोई बड़ा सहयोगी राजनीतिक घटक नहीं बचा है। यह ठीक है कि एनडीए छोड़ने से पहले नीतीश की सोनिया गांधी से कई बार फोन पर बात हुयी थी। लेकिन यह जानकारी किसी को नहीं है कि इसमें क्या क्या बात हुयी है? पत्रकारों के इस बारे में पूछने पर भी नीतीश कुछ बोलने को तैयार नहीं हुए। नीतीश के भाजपा से अलग होने के कई कारण गिनाये जा रहे हैं। उनमें से एक बड़ा कारण जदयू के कोटे से केंद्रीय मंत्री बने आरसीपी सिंह की मदद से जदयू को शिवसेना की तरह तोड़न की साजिश रचने का भाजपा पर जदयू ने आरोप लगाया है। हालांकि आरसीपी एक तरह से जदयू के छिटकने का आखिरी बहाना बने लेकिन जदयू और भाजपा में 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव के बाद ही तनाव और टकराव की स्थिति बन गयी थी। नीतीश का आरोप था कि उनको 43 सीटों तक सीमित कर कमज़ोर करने के लिये भाजपा ने एलजेपी के चिराग पासवान से सीटों का गुप्त समझौता किया था। पिछले दिनों भाजपा की पटना में हुयी बैठक में पार्टी मुखिया जे पी नड्डा ने कहा कि बीजेपी अगर इसी तरह काम करती रही तो क्षेत्रीय दल ख़त्म होने से कोई रोक नहीं पायेगा। नीतीश ने नड्डा के इस बयान को चुनौती के रूप में लिया और जदयू में टूट होने से पहले ही पाला बदल लिया। सुविख्यात पत्रकार राजदीप सरदेसाई का कहना है कि भाजपा के सहयोगी आजकल यह रहस्य समझने में व्यस्त हैं कि भाजपा से गठबंधन करने के बाद कश्मीर की नेशनल कांफ्रेंस व पीडीपी बिहार की एलजीपी व जदयू तमिलनाडू की एआईएडीएमके पंजाब का अकाली दल और महाराष्ट्र की शिवसेना की हालत लगातार ख़राब क्यों होती चली गयी? इनमें से कुछ दल तो आज अंतिम सांसे गिन रहे हैं। जानकार यह भी कहते हैं कि जिस तरह से बीजेपी ने यूपी में मंडल की काट कर कमंडल को आगे किया वह बिहार में ऐसा आज तक नहीं कर पायी। इसकी वजह बीजेपी का बिहार में अपना नेतृत्व पैदा ना कर शुरू से ही नीतीश के कंधे पर सवार होना माना जाता रहा है। बीजेपी ने वहां यादवों में जगह बनाने के लिये नंद किशोर यादव व नित्यानंद राय को आगे किया लेकिन ये दोनों ही लालू यादव के यादव मुस्लिम तिलिस्म को तोड़ने में नाकाम रहे। बीजेपी के कोटे से डिप्टी सीएम रहे सुशील मोदी भी वहां कोई बड़ा चमत्कार नहीं कर सके। उल्टे उन्होंने नीतीश को पीएम बनने की क्षमता वाला नेता बताकर खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली। भला जब तक मोदी मौजूद हैं। तब तक भाजपा का कोई दूसरा नेता पीएम बनने के बारे में सोच नहीं सकता। ऐसे में नीतीश को पीएम मैटिरियल बताने वाला बिहार में भाजपा नेतृत्व कैसे कर सकता है? बिहार में राजनीति के तीन बड़े केंद्र राजद जदयू और भाजपा हैं। जब तक इनमें से दो साथ नहीं आते तब तक सरकार नहीं बन पाती। ऐसे में नीतीश ने अवसर का लाभ उठाकर खुद को संतुलन का केंद्र बना लिया है। वे जब भाजपा से नाराज़ हो जाते हैं तो राजद के साथ आ जाते हैं। जब राजद से खफा होते हैं तो फिर से भाजपा के साथ चले जाते हैं। लेकिन आगे ये सिलसिला चलने वाला नहीं लगता क्योंकि अब भाजपा अपने दम पर बिहार में आगे बढ़ेगी? सियासत के जानकारों का कहना है कि जदयू ही नहीं भाजपा अनेक क्षेत्रीय दलों को पहले वोट और सत्ता हासिल करने के लिये सीढ़ी की तरह उनसे गठबंधन कर इस्तेमाल करती है। उसके बाद धीरे धीरे अपने सहयोगियोें को ही अंदर अंदर कमज़ोर करने की रण्नीति पर काम शुरू कर देती है। कई बार भाजपा अपने सहयोगियों को ऐसे समय पर झटका देती है कि वे राजनीतिक रूप से बेअसर हो जाते हैं। इसकी सबसे बड़ी मिसाल बसपा मानी जाती है। जिसको भाजपा ने कई बार झुककर सपोर्ट कर सरकार बनवाई लेकिन आज उसको मरणासन्न अवस्था में ले जाकर छोड़ दिया है। भाजपा का मकसद बसपा के दलित मुस्लिम गठजोड़ को सदा के लिये तोड़ना था। यह काम उसने बखूबी कर लिया है। इतिहास देखें तो 1998 में कर्नाटक में बीजेपी ने रामकृष्ण हेगड़े की लोक शक्ति पार्टी से गठबंधन कर लिंगायत वोट पर कब्ज़ा कर खुद 13 सीट जीत ली थी। जबकि हेगड़े मात्र 3 सीट ही जीत सके थे। नोट करने वाली बात यह है कि चुनाव से पहले ही भाजपा नेता अनंत कुमार ने दावा कर दिया था कि इस चुनाव के बाद कर्नाटक में हेगड़े ज़ीरो हो जायेंगे। यही हुआ भी। दरअसल ये वही लिंगायत वोट बैंक था जिसे अनंत कुमार और येदियुरप्पा ने आगे चलकर अपना बड़ा आधार बनाया और 2008 में इसी बल पर वहां भाजपा सत्ता में भी आ गयी। बीजेपी को जब यह विश्वास हो जाता है कि उसको अब अपने पुराने सहयोगी की ज़रूरत नहीं है तो वह अपने बल पर सत्ता पाने के लिये अपने सहयोगी दल को ठिकाने लगाने में देर नहीं करती। सीएसडीएस के निदेशक संजय कुमार इसी बात को दूसरी तरह से कहते हैं कि भाजपा ही नहीं किसी भी दल को अपने विस्तार का अधिकार है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इसके लिये नैतिक ईमानदार और स्वस्थ तरीके अपनाये जा रहे हैं या फिर सरकारी मशीनरी जैसे सीबीआई ईडी जैसी शासकीय शक्तियों का दुरूपयोग कर क्षेत्राय छोटे और कम संसाधन और आधार वाले दलों को खत्म किया जा रहा है? यह किसी से छिपा नहीं है कि किस तरह देश में केंद्रीय सत्ता लोकतंत्र कोर्ट मीडिया चुनाव आयोग आदि आज सवालों के घेरे में हैं।         

*(लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक और नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।)*

Saturday, 30 July 2022

पसमांदा मुसलमान

*अब भाजपा पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने में कामयाब होगी ?*

0पीएम मोदी ने हैदराबाद में भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में कहा है कि भाजपा कार्यकर्ता स्नेहयात्रा शुरू करके अब पार्टी से पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने का काम शुरू करें। इससे पहले भाजपा सबका साथ सबका विकास का नारा देकर पार्टी से बृहम्ण बनियों की पार्टी का टैग हटाने को पहले गैर यादव पिछड़ों फिर गैर जाटव दलितों और अब आदिवासियों को जोड़ने के लिये सफलता काफी हद तक पा चुकी है। जहां तक मुसलमानों का सवाल है। उनका प्रतिनिधित्व भाजपा शासित राज्यों व लोकसभा में पार्टी में लगभग आज शून्य है। इसका दोष भाजपा और मुसलमान एक दूसरे को देते रहे हैं। लेकिन पसमांदा मुसलमानों को जोड़ने का भाजपा का इरादा एक रण्नीति के तहत आगे सफल हो सकता हैै।        

      -इक़बाल हिंदुस्तानी

      पसमांदा दरअसल फारसी का शब्द है। जिसका मतलब पीछे रह जाने वाले से होता है। हालांकि इस्लाम मंे जातिवाद का कोई अस्तित्व नहीं है लेकिन यह भी सच है कि भारतीय मुस्लिम समाज में जातिवाद है। पसमांदा शब्द मुस्लिम समाज में उन मुसलमानों के लिये इस्तेमाल होता है। जिनको जानबूझकर पिछड़ों दलितों और आदिवासियों से भी अधिक जातीय पक्षपात का शिकार बनाकर अलग थलग रखा गया है। अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के समाज विज्ञान के प्रोफेसर खालिद अंसारी का कहना है कि पसमांदा शब्द पहली बार 1998 में पूर्व राज्यसभा सदस्य अली अनवर अंसारी द्वारा उस समय सार्वजनिक रूप से पहली बार प्रकाश में आया जब अली अनवर ने आॅल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज़ नामक संस्था का गठन किया था। अली अनवर का कहना रहा है कि मुसलमानों में पिछड़ों में पिछड़े और दलित दोनों एक साथ शामिल हैं। जबकि वे दलित मुसलमानों को पसमांदा की अलग श्रेणी में रखना चाहते हैं। दरअसल हिंदुओं की तरह ही मुसलमानों मंे कुछ लोग अशरफ यानी उच्च जाति अजलाफ यानी पिछड़े और अरज़ाल यानी दलित मुस्लिम जाति के हिसाब से विभाजन मानते रहे हैं। अशरफ उन मुसलमानों को कहा जाता है जो अरब तुर्की परसिया या अफगानिस्तान से सैयद शेख़ पठान और मुग़ल की शक्ल में आये या फिर राजपूत गौड़ त्यागी जैसी उच्च हिंदू जाति से मतान्तरण करके ईमान लाये। अजलाफ वो मुसलमान कहलाते हैं जो कि मोमिन अंसार दरर्ज़ी रायीन मीडियम जातियों से आते हैं। अरज़ाल 1901 की जनगणना के अनुसार सबसे निचली श्रेणी मंे वो जातियां आती हैं जिनमें अछूत यानी हलालखोर, हेलास, लालबेगीस धोबी नाई चिक्स और फ़क़ीर शामिल हैं। सच्चर कमैटी की 2005 की रिपोर्ट में भी कहा गया है कि जिनके साथ सामाजिक स्तर पर कोई पक्षपात नहीं हुआ वे अशरफ, हिंदू पिछड़ों की तरह अजलाफ और हिंदू दलितों की तरह अरज़ाल हैं। जस्टिस रंगनाथ मिश्रा की मई 2007 की रिपोर्ट में भी यह दोहराया गया है कि भारतीय मुसलमानों में भी अन्य धर्मों की तरह जाति व्यवस्था मौजूद है। देश में 1931के बाद से जाति के आधार पर आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। लेकिन सच्चर कमीशन जहां मुसलमानों में पिछड़ों और दलितों आदिवासियों की संख्या 40 प्रतिशत के आसपास मानकर चलता है वहीं पसमांदा मुस्लिम एक्टिविस्ट इनकी तादाद दोगुनी यानी 80 से 85 प्रतिशत होने का दावा करते हैं। यह आंकड़ा 1871 की जनगणना से मेल खाता है जिसमें कहा गया था कि अविभाजित भारत में केवल 19 प्रतिशत उच्च जाति के मुसलमान रहते हैं। इसी वजह से यह भी कहा जाता है कि देश के बंटवारे मंे जो लोग पाकिस्तान गये उनमें भी अधिक तादाद अशरफ मुसलमानों की ही थी। जिससे पसमांदा मुसलमानों का यह आंकड़ा 80 से बढ़कर 85 फीसदी तक पहंुच चुका है। पसमांदा जातियों का आरोप है कि मुसलमानों के नाम पर आज सब जगह अशरफ जातियों का कब्ज़ा है। उनका यह भी कहना है कि उनको धर्म यानी मुसलमानों के नाम पर आरक्षण नहीं चाहिये बल्कि पसमांदा जाति के नाम पर अलग से आरक्षण दिया जाना चाहिये जिससे मुट्ठीभर अशरफ मुसलमान उनके हिस्से के जनप्रतिनिधि सरकारी नौकरी व संस्थाओं पर कब्ज़ा जमाकर पहले की तरह उनके हक़ ना मार सकें। अब सौ टके का सवाल यह उठता है कि क्या भाजपा वास्तव में पसमांदा मुसलमानों को पार्टी में जोड़ना चाहती है? इसका जवाब है हां। यूपी की सियासत में देखें तो आज़म खां जो अशरफ जाति से आते हैं। पिछले काफी समय से जेल में रहे और आज भी कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। दूसरी तरफ पसमांदा जाति से दानिश आज़ाद अंसारी को बिना चुनाव लड़े योगी सरकार ने मंत्री बनाकर पसमांदा मुसलमानों को भाजपा से जोड़ने का बड़ा संकेत दिया है। इससे पहले शिया सुन्नी के बीच की खाई को देखते हुए शिया समाज को भाजपा से मुख्तार अब्बास नक़वी को मंत्री बनाये रखकर जोड़ा ही जा चुका है। लेकिन उनकी तादाद बहुत कम होने से कोई खास लाभ नहीं हुआ। सवाल यह है कि जिस भाजपा की सारी सियासत मुसलमान विरोधी मानी जाती है। उसको पसमांदा के नाम पर पार्टी से अगर जोड़ा भी जाता है तो क्या भाजपा समर्थक कट्टर हिंदू फिर भी कमल पर वोट देता रहेगा? सवाल यह भी है कि विपक्ष के आरोपानुसार जिस मुसलमान का मात्र धर्म देखकर अशरफ अजलाफ या अरज़ाल पता किये बिना कदम कदम पर शोषण अन्याय पक्षपात उत्पीड़न माॅब लिंचिंग सार्वजनिक जगह पर नमाज़ पर पाबंदी तीन तलाक़ पर रोक लवजेहाद नकाब मांस एंटी रोमियो अभियान एनआसी काॅमन सिविल कोड का डर अन्याय का विरोध प्रदर्शन करने पर सबक सिखाने को उनके घरों पर बुल्डोज़र तक चलाया जा रहा है वो भाजपा को वोट कैसे दे सकते हैं? तो जवाब यह है कि जिस तरह से पिछले यूपी सहित चार राज्यों के चुनाव में मुसलमानों ने भाजपा को 8 प्रतिशत वोट दिये हैं। वे भविष्य में सेकुलर दलों से निराश हताश और नाराज़ होकर भविष्य में भाजपा का दोस्ती का हाथ थाम भी सकते हैं। यह इसलिये भी मुमकिन है कि आज सरकारी संस्थानों का निजीकरण कर आरक्षण खत्म करने के बावजूद भाजपा सबसे अधिक पिछड़ों, दलित राष्ट्रपति बनाकर दलितों और अब आदिवासी प्रेसीडेंट बनाकर आदिवासियों का जिस तरह से वोट लेने मंे सफल है। उसी तरह मुसलमानों को विभिन्न योजनाओं का लाभ और बुल्डोज़र का डर दिखाकर उनका वोट भी पसमांदा के नाम पर पहले से अधिक ले ही सकती है। भाजपा को 2024 में एंटी इन्कम्बैंसी से घटने वाले हिंदू वोटों की क्षतिपूर्ति भी तो करनी है।     

 *(लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक और नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।)*

Sunday, 24 July 2022

रेवड़ी बांटना

*रेवड़ी बांटना या बैंको का कर्ज़ माफ़ करना जनहित की राजनीति ?* 

0पीएम मोदी ने बिना केजरीवाल व अन्य विपक्षी नेताओं का नाम लिये कुछ राज्यों द्वारा जनहित में चलाई जा रही निशुल्क योजनाओं को रेवड़ी बांटने की संज्ञा दी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर ऐसी योजनायें चलाने से राज्यों का बजट घाटे में जा रहा है तो यह चिंता की बात है। लेकिन विपक्ष का सवाल यह है कि क्या केंद्र सरकार द्वारा विगत 8 साल में अपने चहेते पूंजीपतियों के 11 लाख करोड़ से अधिक के एनपीए यानी बुरे कर्ज़ माफ कर देना जनहित में है? केजरीवाल का आरोप यह भी है कि मोदी सरकार जनहित की बजाये ‘धनहित’  में अधिक काम कर रही है। यह भी सच है कि जनहित में राज्यों की चल रही योजनाओं का कुल बजट डेढ़ लाख करोड़ के आसपास हैै।       

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      2014 में केंद्र की सत्ता में मोदी सरकार के आने के बाद से देश में कुछ चीजे़ पूरी तरह बदल गयी हैं। मिसाल के तौर पर 1991 से पहले हमारे देश में मिश्रित अर्थव्यवस्था चलती थी। सरकार का झुकाव समाजवाद की तरफ रहता था। एल पी जी यानी लिबरल प्राईवेट और ग्लोबल यानी आर्थिक उदारीकरण के बाद भी सरकारें गरीब कमज़ोर दलितों पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का काफी ख़याल रखती थीं। देश संविधान के हिसाब से काफी हद तक चलता था। राज्यों को कुछ अपवाद छोड़कर स्वायत्ता मिली हुयी थी। जांच एजेंसियों का खुला दुरूपयोग और वह भी पूरी निर्लजता से केवल विपक्ष के खिलाफ नहीं होता था। मीडिया आज की तरह पूरी तरह सरकार के तलुवे नहीं चाटता था। कोर्ट सरकार के गलत फैसलों के खिलाफ पूर सख़्ती से खड़े होेते थे। सेकुलर होना सिकुलर या शेखुलर यानी बीमार या मुसलमान समर्थक होना नहीं माना जाता था। सोशल मीडिया पर इतनी बेशर्मी से खुलेआम ज़हर साम्प्रदायिकता कट्टरता झूठ और नफरत नहीं परोसी जाती थी। सरकार की नीतियों उसके संचालन और योजनाओं पर एक बाहरी कथित सांस्कृतिक संगठन इतना हावी पहले कभी नहीं था। लेकिन आज बहुत कुछ बदल चुका है। आज की सरकार का पूंजीपतियों के पक्ष में खुलेआम नीतियां बनाना बुरा नहीं समझा नहीं जाता है। यही वजह है कि कुछ उद्योगपति जानबूझकर यानी विलफुल डिफाल्टर बन रहे हैं। आरबीआई और नेशनल बैंक इस सच को जानते हैं। लेकिन वे सत्ता के दबाव में ना केवल ऐसे धोखेबाज़ चालाक और मक्कार धनवानों को ना केवल लगातार लोन देने को मजबूर किये जा रहे हैं बल्कि उनका पुराना लाखों करोड़ का कर्ज़ पहले राइट आॅफ और बाद में औने पौने में बैंकरप्सी एक्ट में समझौता करके चंद रूपये वसूल करके माफ किया जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि ऐसे अधिकांश पंूजीपतियों से सत्ताधारी दल मोटी रकम चुनावी चंदे में लेकर ऐसा कर रहा है। इस मामले में इसलिये भी कुछ दावे से नहीं कहा जा सकता है क्योंकि मोदी सरकार ने इलैक्टोरल बांड जिस गोपनीय तरीके से सियासी दलों को देने का रहस्यमयी और विवादित तरीका ईजाद किया है। वह अपने आप में शक को और अधिक बढ़ाता ही है। आंकड़े बताते हैं कि इन बांड की 90 प्रतिशत रकम भाजपा के खाते में जा रही है। सवाल यह है कि जब सरकार ही पंूजीपतियों के साथ खुलकर खड़ी है। वह उनका काॅरपोरेट टैक्स लगातार कम कर रही है। उनको कोरोना के दौरान 20 लाख करोड़ का विशाल आर्थिक पैकेज भी दिया गया है। जिसका कोई विशेष लाभ आम जनता को नहीं मिला है। सरकार उनका कैपिटल गैन का टैक्स भी कम कर रही है। उनको उद्योग धंधे लगाने के लिये निशुल्क या ना के बराबर कीमत या एक रूपये एकड़ के पट्टे पर करोड़ों की सरकारी यानी आम जनता की ज़मीन भी दे रही है। उनको कर्मचारियों को निविदा पर अस्थायी तौर पर रखने और चाहे जब निकालने की सुविधा भी दे रही है। उनको मज़दूरों से 8 की बजाये 12 घंटे काम की छूट भी दे रही है। यह सूची बहुत ही लंबी है। दूसरी तरफ सरकार जीएसटी के नाम पर आम जनता पर करों का बोझ बढ़ाती जा रही है। महंगाई रोक नहीं पा रही है। बेेरोज़गारी दर आज़ादी के बाद सबसे अधिक हो चुकी है। रूपया डाॅलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट दिखा रहा है। निर्यात बढ़ नहीं रहा है। बढ़ते आयात से विदेशी मुद्रा कम होती जा रही है। रेलवे में वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली किराये की छूट सरकार ने खत्म कर दी है। सिलेंडर की सब्सिडी खत्म करने से उसकी कीमत पर 8 साल में ढाई गुना से अधिक हो चुकी है। नये रोज़गार निकल नहीं रहे हैं। मंदी आने से पुरानी नौकरी भी जा रही हैं। मनरेगा में 100 दिन की बजाये 27 दिन ही गांवों में काम मिल रहा है। तमाम सर्वे बता रहे हैं कि पूंजीपतियों उद्योगपतियों और काॅरपोरेट को दी गयी तमाम सरकारी छूट सहायता पैकेज का कोई विशेष लाभ आम जनता को नहीं मिल रहा है। आर्थिक असमानता बढ़ती जा रही है। देश के 10 प्रतिशत अमीर लोगों के पास देश के 60 प्रतिशत आम लोगों से अधिक सम्पत्ति है। ऐसे में अगर कुछ राज्य सरकारें आम आदमी को कुछ यूनिट बिजली और चंद लीटर पानी निशुल्क दे रही हैं तो केंद्र सरकार को परेशानी क्यों हो रही है? अगर कुछ राज्य सरकारें जनहित में सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सस्ता और अच्छा उपलब्ध करा रही हैं तो यह निशुल्क रेवड़ी बांटना हो गया? यह ठीक है कि केंद्र सरकार भी गरीबों को सस्ता अनाज पीएम आवास योजना जलनल योजना जनधन योजना पीएम किसान सम्मान निधि कारोबार के लिये मुद्रा योजना पीएम रसोई गैस योजना आयुष्मान स्वास्थय बीमा आदि अनेक जनहित की योजनायें चला रही है। लेकिन राज्यों को ऐसी योजनायें चलाने पर निशुल्क रेवड़ी बांटना बताना उचित नहीं कहा जा सकता। साथ ही राज्य पहले ही परेशान जनता पर कोई नया बोझ नहीं डालना चाहते या पुरानी सुविधा नहीं छीनना चाहते तो यह अच्छी बात मानी जानी चाहिये। हालांकि जीएसटी में जो कर बढ़ रहे हैं। उनका लाभ भी राज्यों को मिलना है। लेकिन मोदी सरकार को यह बात समझनी चाहिये कि वह अगर पूंजीपतियों के साथ खुलकर खड़ा होने में कोई लज्जा या बुराई नहीं समझती तो यह आम जनता के हित के खिलाफ ही जाता है। दुनिया के तमाम अर्थ विशेषज्ञ बार बार बता चुके हैं कि पंूजीवाद पहले अपने लाभ देखता है। उसके लिये जनहित का कोई मतलब नहीं है। यह काम सरकार का होता है। लेकिन मोदी सरकार खुद जनहित ना देखकर पूंजीपति समर्थक है। जो खुद मेें राज्यों के मुकाबले दुखद है।

 *(लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक और नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।)*

Friday, 15 July 2022

भाजपा और विपक्ष

*भाजपा अब कांग्रेस ही नहीं क्षेत्रीय दलों को भी ख़त्म कर देगी ?*

0जब अमित शाह यह दावा करते हैं कि भाजपा देश पर 40 से 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को यह अतिश्योक्ति लगता है। लेकिन जिस तरह से भाजपा ने एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को धीरे धीरे ऐसे हालात में पहुंचा दिया है। जहां वह पहले से कमज़ोर नज़र आती है। वहीं अब भाजपा सपा बसपा और राजद के बाद अन्य क्षेत्रीय दलों को निबटाने में लग गयी है। इसकी ताज़ा मिसाल महाराष्ट्र की शिवसेना है। जिससे न केवल राज्य की सत्ता छिन गयी है बल्कि अब पार्टी पर कब्जे़ की लड़ाई मंे भी ठाकरे को कड़ी चुनौती मिलने जा रही है। इसके बाद भाजपा के निशाने पर दक्षिण के राज्य आंध्रा तेलंगाना और तमिलनाडू के क्षेत्रीय दल हैं।

       *-इक़बाल हिंदुस्तानी*

      रामपुर और आज़मगढ़ के लोकसभा उपचुनाव जीतकर भाजपा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसने यूपी के क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी को पूरी तरह मरणासन्न कर दिया है। यहां एक और क्षेत्रीय दल बसपा तो पहले ही आईसीयू में भर्ती होकर अंतिम सांसे गिन रही है। कांग्रेस का इस राज्य में कोई जनाधार तो दूर संगठन तक नहीं बचा है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगा लेकिन हालात अगर ऐसे ही रहे और कोई बड़ी घटना नहीं घटी तो यूपी में भाजपा 2024 के आमचुनाव में अपना मिशन 75 सीट आराम से पूरा कर लेगी। इसकी वजह यह है कि जिस सपा का मुख्य आधार वोटबैंक यादव और मुस्लिम रहा है। वह भी उसे उसके गढ़ आज़मगढ़ और रामपुर में जिताने में नाकाम रहा है। जबकि ये दोनों सीटें पहले उसके पास ही थीं। ये अखिलेश यादव और आज़म खां ने भारी अंतर से जीती थीं। हालांकि प्रतिष्ठा का प्रश्न बनीं इन दोनों सीटों पर हार के सपा कई कारण गिना रही है। लेकिन अगर इनमंे कुछ हद तक सच्चाई हो तो भी सपा अपनी नाकामी को छिपा नहीं सकती है। साम दाम दंड भेद से ही सही लेकिन यह यूपी के सीएम और भावी पीएम योगी की सफलता ही है। जहां तक बसपा सुप्रीमो बहनजी का सवाल है। वे बार बार अपनी नालायकी नासमझी और नाकामी का ठीकरा मुसलमानों के सर फोड़कर अपनी पार्टी की कब्र अपने हाथों खोदती रहती हैं। उन्होंने यूपी के विधानसभा चुनाव के बाद दो संसदीय उपचुनाव के नतीजे आने पर एक बार फिर कहा है कि मुसलमानों ने अगर हमें वोट दिया होता तो हम भाजपा को हरा सकते थे। लेकिन वे यह सच मानने से बार बार इन्कार कर रही हैं कि उनको लोग भाजपा की ही बी टीम मानते हैं। ऐसे में बसपा को जिताना भाजपा को ही जिताना है। रामपुर में बहनजी ने बसपा का प्रत्याशी ही खड़ा नहीं किया। जिससे उनका परंपरागत दलित वोट भाजपा को जाने से कमल खिलने में आसानी हो गयी। उधर आज़मगढ़ में बहनजी ने जानबूझकर मुस्लिम वोट बांटने को गुड्डू जमाली को चुनाव में उतारा। साथ ही वहां भाजपा का प्रत्याशी यादव होने से यादव वोट भी बंट गया। यहां भी बताया जाता है कि काफी बड़ी संख्या में दलित वोट भाजपा उम्मीदवार के साथ गया है। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले आम चुनाव में विधानसभा चुनाव से भी अधिक दलित वोट भाजपा के साथ जायेगा। लेकिन बहनजी से मुसलमानों का बचा खुचा भरोसा भी उठ जाने से 2019 की तरह उनकी दलित मुस्लिम यानी सपा बसपा गठजोड़ से मिली 10 सीट भी वापस आनी असंभव है। अब तक यह देखने में आया है कि जो लोग राज्य विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों को अलग अलग कारणों से वोट दे भी देते हैं। वे भी लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ मोदी और हिंदुत्व की वजह से चले जाते हैं। जिस तरह से महाराष्ट्र में शिवसेना के हिंदुत्व से हटने और मोदी का साथ छोड़ने से विद्रोह हुआ है। उसका असर दूरगामी होने के आसार बन रहे हैं। यह ठीक है कि शिवसेना पर ठाकरे परिवार का प्रभाव ही अधिक माना जाता रहा है। यही वजह है कि राज ठाकरे छगन भुजबल व नारायण राणे के मूल शिवसेना से अलग होने पर भी ठाकरे की शिवसेना के संगठन पर आज तक कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। लेकिन शिवसेना के बागी एकनाथ शिंदे के अलग होकर सीएम बन जाने से भी ऐसा ना हो पक्का कहा नहीं जा सकता है। मोदी और शाह संघ की योजना से जिस रास्ते पर चल रहे हैं। उससे ऐसा लगता है कि वे बिहार में भी जनता दल यू से जल्दी ही पीछा छुड़ाकर वहां भाजपा का सीएम देखना चाहते हैं। वहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले ही राजनीतिक रूप से इतने कमज़ोर हो चुके हैं कि किसी भी सियासी झटके को झेल नहीं पायेंगे। उधर तमिलनाडू में जयललिता की मृत्यु के बाद एआई डीएमके में पनीरसेल्वम और पलानी स्वामी गुट में आपसी टकराव इतना बढ़ चुका है कि कभी भी ख़बर आ सकती है कि उसका एक गुट महाराष्ट्र की तरह अलग होकर भाजपा में शामिल होने जा रहा है। इसके साथ ही तेलंगाना में भी भाजपा ने नज़रें गड़ा रखी हैं। पिछले दिनों वहां भाजपा के सम्मेलन में मोदी और शाह ने टीएसआर सरकार पर एमआईएम से मिलकर मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत करने का आरोप लगाया है। साथ ही भाजपा ने हैदराबाद को भाग्यनगर बनाने का शिगूफा सोच समझकर छोड़ा है। ऐसे ही भाजपा की आंखें आंध्रा प्रदेश की वाईएसआर सरकार पर लगी हुयी हैं। भाजपा का आरोप है कि तेलंगाना और आंध्रा में वंशवादी दलों की सरकारें जनता का भला ना करके अपने परिवारों के निजी हितों को आगे बढ़ा रही हैं। यही आरोप भाजपा उड़ीसा की नवीन पटनायक सरकार पर लगा चुकी है। लेकिन नवीन पांचवी बार मुख्यमंत्री बनकर एंटी इनकंबैसी को लगातार धता बता रहे हैं। भाजपा के निशाने पर बंगाल की टीएमसी भी है। लेकिन पिछले चुनाव में भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद ममता बनर्जी का इतने बड़े बहुमत से जीत जाना फिलहाल भाजपा की चाल को हल्का रखने के लिये मजबूर कर रहा है। हालांकि पंजाब में भी वंशवादी और करप्शन के आरोपों से घिरा अकाली दल भाजपा का सहयोगी रहा है। लेकिन वह पिछले दिनों किसानोें के मुद्दे पर भाजपा से अलग हो गया था। अब फिर से भाजपा अकाली दल को साधने का प्रयास कर रही है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल आम आदमी पार्टी बनी हुयी है। जो दिल्ली के बाद पंजाब जैसे बड़े राज्य में भी बंपर बहुमत से सत्ता में आ गयी है। उधर केरल में भी भाजपा वामपंथियों से लड़कर धीरे धीरे अपनी जगह बना रही है। लगता यही है कि आज नहीं तो कल भाजपा किसी कीमत पर भी सब राज्य जीतेगी।  

( *लेखक पब्लिक आॅब्ज़वर के संपादक एवं नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*)