Friday, 15 July 2022

भाजपा और विपक्ष

*भाजपा अब कांग्रेस ही नहीं क्षेत्रीय दलों को भी ख़त्म कर देगी ?*

0जब अमित शाह यह दावा करते हैं कि भाजपा देश पर 40 से 50 साल राज करेगी तो कुछ लोगों को यह अतिश्योक्ति लगता है। लेकिन जिस तरह से भाजपा ने एकमात्र राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को धीरे धीरे ऐसे हालात में पहुंचा दिया है। जहां वह पहले से कमज़ोर नज़र आती है। वहीं अब भाजपा सपा बसपा और राजद के बाद अन्य क्षेत्रीय दलों को निबटाने में लग गयी है। इसकी ताज़ा मिसाल महाराष्ट्र की शिवसेना है। जिससे न केवल राज्य की सत्ता छिन गयी है बल्कि अब पार्टी पर कब्जे़ की लड़ाई मंे भी ठाकरे को कड़ी चुनौती मिलने जा रही है। इसके बाद भाजपा के निशाने पर दक्षिण के राज्य आंध्रा तेलंगाना और तमिलनाडू के क्षेत्रीय दल हैं।

       *-इक़बाल हिंदुस्तानी*

      रामपुर और आज़मगढ़ के लोकसभा उपचुनाव जीतकर भाजपा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उसने यूपी के क्षेत्रीय दल समाजवादी पार्टी को पूरी तरह मरणासन्न कर दिया है। यहां एक और क्षेत्रीय दल बसपा तो पहले ही आईसीयू में भर्ती होकर अंतिम सांसे गिन रही है। कांग्रेस का इस राज्य में कोई जनाधार तो दूर संगठन तक नहीं बचा है। हालांकि यह कहना अभी जल्दबाज़ी होगा लेकिन हालात अगर ऐसे ही रहे और कोई बड़ी घटना नहीं घटी तो यूपी में भाजपा 2024 के आमचुनाव में अपना मिशन 75 सीट आराम से पूरा कर लेगी। इसकी वजह यह है कि जिस सपा का मुख्य आधार वोटबैंक यादव और मुस्लिम रहा है। वह भी उसे उसके गढ़ आज़मगढ़ और रामपुर में जिताने में नाकाम रहा है। जबकि ये दोनों सीटें पहले उसके पास ही थीं। ये अखिलेश यादव और आज़म खां ने भारी अंतर से जीती थीं। हालांकि प्रतिष्ठा का प्रश्न बनीं इन दोनों सीटों पर हार के सपा कई कारण गिना रही है। लेकिन अगर इनमंे कुछ हद तक सच्चाई हो तो भी सपा अपनी नाकामी को छिपा नहीं सकती है। साम दाम दंड भेद से ही सही लेकिन यह यूपी के सीएम और भावी पीएम योगी की सफलता ही है। जहां तक बसपा सुप्रीमो बहनजी का सवाल है। वे बार बार अपनी नालायकी नासमझी और नाकामी का ठीकरा मुसलमानों के सर फोड़कर अपनी पार्टी की कब्र अपने हाथों खोदती रहती हैं। उन्होंने यूपी के विधानसभा चुनाव के बाद दो संसदीय उपचुनाव के नतीजे आने पर एक बार फिर कहा है कि मुसलमानों ने अगर हमें वोट दिया होता तो हम भाजपा को हरा सकते थे। लेकिन वे यह सच मानने से बार बार इन्कार कर रही हैं कि उनको लोग भाजपा की ही बी टीम मानते हैं। ऐसे में बसपा को जिताना भाजपा को ही जिताना है। रामपुर में बहनजी ने बसपा का प्रत्याशी ही खड़ा नहीं किया। जिससे उनका परंपरागत दलित वोट भाजपा को जाने से कमल खिलने में आसानी हो गयी। उधर आज़मगढ़ में बहनजी ने जानबूझकर मुस्लिम वोट बांटने को गुड्डू जमाली को चुनाव में उतारा। साथ ही वहां भाजपा का प्रत्याशी यादव होने से यादव वोट भी बंट गया। यहां भी बताया जाता है कि काफी बड़ी संख्या में दलित वोट भाजपा उम्मीदवार के साथ गया है। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले आम चुनाव में विधानसभा चुनाव से भी अधिक दलित वोट भाजपा के साथ जायेगा। लेकिन बहनजी से मुसलमानों का बचा खुचा भरोसा भी उठ जाने से 2019 की तरह उनकी दलित मुस्लिम यानी सपा बसपा गठजोड़ से मिली 10 सीट भी वापस आनी असंभव है। अब तक यह देखने में आया है कि जो लोग राज्य विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों को अलग अलग कारणों से वोट दे भी देते हैं। वे भी लोकसभा चुनाव में भाजपा के साथ मोदी और हिंदुत्व की वजह से चले जाते हैं। जिस तरह से महाराष्ट्र में शिवसेना के हिंदुत्व से हटने और मोदी का साथ छोड़ने से विद्रोह हुआ है। उसका असर दूरगामी होने के आसार बन रहे हैं। यह ठीक है कि शिवसेना पर ठाकरे परिवार का प्रभाव ही अधिक माना जाता रहा है। यही वजह है कि राज ठाकरे छगन भुजबल व नारायण राणे के मूल शिवसेना से अलग होने पर भी ठाकरे की शिवसेना के संगठन पर आज तक कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा था। लेकिन शिवसेना के बागी एकनाथ शिंदे के अलग होकर सीएम बन जाने से भी ऐसा ना हो पक्का कहा नहीं जा सकता है। मोदी और शाह संघ की योजना से जिस रास्ते पर चल रहे हैं। उससे ऐसा लगता है कि वे बिहार में भी जनता दल यू से जल्दी ही पीछा छुड़ाकर वहां भाजपा का सीएम देखना चाहते हैं। वहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पहले ही राजनीतिक रूप से इतने कमज़ोर हो चुके हैं कि किसी भी सियासी झटके को झेल नहीं पायेंगे। उधर तमिलनाडू में जयललिता की मृत्यु के बाद एआई डीएमके में पनीरसेल्वम और पलानी स्वामी गुट में आपसी टकराव इतना बढ़ चुका है कि कभी भी ख़बर आ सकती है कि उसका एक गुट महाराष्ट्र की तरह अलग होकर भाजपा में शामिल होने जा रहा है। इसके साथ ही तेलंगाना में भी भाजपा ने नज़रें गड़ा रखी हैं। पिछले दिनों वहां भाजपा के सम्मेलन में मोदी और शाह ने टीएसआर सरकार पर एमआईएम से मिलकर मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत करने का आरोप लगाया है। साथ ही भाजपा ने हैदराबाद को भाग्यनगर बनाने का शिगूफा सोच समझकर छोड़ा है। ऐसे ही भाजपा की आंखें आंध्रा प्रदेश की वाईएसआर सरकार पर लगी हुयी हैं। भाजपा का आरोप है कि तेलंगाना और आंध्रा में वंशवादी दलों की सरकारें जनता का भला ना करके अपने परिवारों के निजी हितों को आगे बढ़ा रही हैं। यही आरोप भाजपा उड़ीसा की नवीन पटनायक सरकार पर लगा चुकी है। लेकिन नवीन पांचवी बार मुख्यमंत्री बनकर एंटी इनकंबैसी को लगातार धता बता रहे हैं। भाजपा के निशाने पर बंगाल की टीएमसी भी है। लेकिन पिछले चुनाव में भाजपा की तमाम कोशिशों के बावजूद ममता बनर्जी का इतने बड़े बहुमत से जीत जाना फिलहाल भाजपा की चाल को हल्का रखने के लिये मजबूर कर रहा है। हालांकि पंजाब में भी वंशवादी और करप्शन के आरोपों से घिरा अकाली दल भाजपा का सहयोगी रहा है। लेकिन वह पिछले दिनों किसानोें के मुद्दे पर भाजपा से अलग हो गया था। अब फिर से भाजपा अकाली दल को साधने का प्रयास कर रही है। भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती फिलहाल आम आदमी पार्टी बनी हुयी है। जो दिल्ली के बाद पंजाब जैसे बड़े राज्य में भी बंपर बहुमत से सत्ता में आ गयी है। उधर केरल में भी भाजपा वामपंथियों से लड़कर धीरे धीरे अपनी जगह बना रही है। लगता यही है कि आज नहीं तो कल भाजपा किसी कीमत पर भी सब राज्य जीतेगी।  

( *लेखक पब्लिक आॅब्ज़वर के संपादक एवं नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*)

Sunday, 3 July 2022

उदयपुर हत्याकांड

*उदयपुर हत्याकांड: सख़्त सज़ा के साथ ही ब्रेनवाश भी ज़रूरी!*

0पैगं़बर साहब का अपमान करने की आरोपी नूपुर शर्मा का समर्थन करने पर राजस्थान के एक दजऱ्ी कन्हैया लाल की बर्बर हत्या करने वाले ग़ौस मुहम्मद और मुहम्मद रियाज़ को सख़्त और जल्दी सज़ा मिलनी चाहिये। इसमें किसी तरह के बचाव या अगर मगर की ज़रूरत ही नहीं है। कानून द्वारा जुर्म की सज़ा दिये जाने का मक़सद सभ्य समाज में बदला नहीं सुधार भी माना जाता है। इसलिये भविष्य में ऐसे जघन्य व डरावने अपराध रोकने के लिये कन्हैया के हत्या आरोपियों जैसे कट्टरपंथियों की सोच को बदलने के लिये उनका ब्रेनवाश करना भी ज़रूरी है। इसके साथ ही हमें ऐसा समाज बनाने की ज़रूरत है। जिसमें धर्म निजी जीवन तक ही सीमित रहे और सरकार सब धर्मों को न केवल बराबर समझे बल्कि उसका व्यवहार भी समानता का दिखे।      

         *-इक़बाल हिंदुस्तानी*

      संविधान विशेषज्ञ और नलसार यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फ़ैजान मुस्तफ़ा का कहना है कि एक उदार व मज़बूत लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी पहली शर्त है। हालांकि इस अभिव्यक्ति की भी कुछ सीमायें हैं। लेकिन जहां तक किसी की अभिव्यक्ति से किसी दूसरे की भावनायें आहत होने का सवाल है। उसके लिये हमारे यहां कानून मौजूद है। धारा 153 और 295 में ऐसे मामलों से निबटने के लिये पर्याप्त व्यवस्था की गयी है। मुस्तफ़ा का कहना है कि अगर हमारा समाज परिपक्व और तार्किक हो जाये तो इन धाराओं की भी ज़रूरत नहीं रह जायेगी। कहने का मतलब यह है कि एक कंपोजि़ट सोसायटी में इतनी सदियां बीतने के बाद इतनी समझ तो विकसित हो ही जानी चाहिये कि हम एक दूसरे के धर्म जाति भावना सोच परंपरा रीति रिवाज त्यौहार और खानपान व रहनसहन का सम्मान कर सकें। देश सह अस्तित्व और सहनशीलता की भावना से ही चलते हैं। लेकिन यह भी सच है कि समाज में सदा से ऐसे चंद कट्टर साम्प्रदायिक अंधविश्वासी संकीर्ण स्वार्थी लोग भी सभी वर्गों में रहे हैं। जो दूसरे लोगों को समान नहीं मानते। यही वजह है कि वे दूसरे मज़हब के मानने वालों का सम्मान भी नहीं करते। यहां तक कि वे अपने से अलग लोगों को हिंसक कट्टरपंथी दंगाई झूठा समाज विरोधी लड़ाकू और सारी बुराइयों की जड़ बताते हैं। इन हालात में ऐसे सरफिरे मूर्ख भावुक उग्र अंधभक्त और पाखंडी लोगांे का दुरूपयोग राजनीति अपनी सत्ता पाने और उसे बनाये रखने को बखूबी करने लगती है। अगर सरकार पुलिस और कोर्ट निष्पक्ष रहे तो ऐसे कट्टरपंथियों की हिम्मत नहीं होगी कि वे एकता भाईचारे व अमनचैन में आग लगा सकें। यहां यह विचार करना समय की मांग है कि आखि़र कन्हैया के हत्यारों के दिमाग में यह क्रूर और हैवानी विचार कहां से और कैसे आया कि अगर किसी ने पैगं़बर की शान में गुस्ताख़ी की है या उस गुस्ताख़ी करने वाली का मात्र समर्थन कर दिया है तो उसकी जान खुद ले लेनी चाहिये? वह भी इतने ज़ालिम और रूह फ़ना करने वाले बर्बर तरीके से? उसकी शर्मनाक और दर्दनाक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर वायरल कर दूसरे लोगोें को डराकर आप आईएसआईएस के आतंकियों जैसा जंगली काम आखि़र किसके इशारे पर कर रहे हैं? अगर किसी ने आपकी मज़हबी भावनायें आहत की भी हैं तो उसको कानून सज़ा देगा। अगर सज़ा देने का यह काम मुश्किल और देर से होने वाला या ना भी होने वाला हो तो क्या आप अपने धर्म के हिसाब से सज़ा देने को कानून हाथ में ले लेंगे? वो आपके सब्र करने माफ करने और नज़रअंदाज़ करने के बड़े बड़े मज़हबी दावे कहां गये? या हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और हैं? अगर हां तो कल दूसरे लोग भी ऐसा करने लगे तो समाज में अराजकता फैल जायेगी। उस जंगलराज का जि़म्मेदार कौन होगा? जब खुद पैग़ंबर साहब के साथ उनके जीवन में उनके विरोधी उनका अपमान और हमला किया करते थे। तब पैगं़बर साहब तो उनको माफ कर दिया करते थे। वे तो अपने दुश्मनों से बदला नहीं लिया करते थे। उनके मानने वाले उनके रास्ते पर चलने का दावा करते हैं तो फिर उदयपुर जैसा हत्याकांड कैसे हो जाता है? अगर आपका अल्लाह रोज़ ए महशर और जन्नत दोज़ख़ में पूरा भरोसा है तो यह मसला अपने अल्लाह पर ही छोड़ दो न? वह खुद सज़ा देगा। सौ टके का सवाल यह भी है कि जब इस्लाम को मानने वाले ही पैग़ंबर के दिखाये रास्ते पर नहीं चलेंगे तो गैर मुस्लिमों से क्यों आशा करते हैं कि वे इस्लाम के हिसाब से चलें नहीं तो उनको इस्लाम के हिसाब से कानून हाथ में लेकर वे खुद बर्बर सज़ा देकर पूरी दुनिया में इस्लाम और पैगं़बर के संदेश पर उंगली उठाने का अनचाहा मौका देंगे? हमारा मानना है कि सज़ा इंसान को केवल डराती है। इतना तो कन्हैया के हत्यारे भी जानते होंगे कि वे पकड़े जायेंगे और जेल जायेंगे। उनको उम्रकै़द या फांसी होगी। लेकिन सवाल यह है कि जो लोग आत्मघाती बम लगाकर मुस्लिम मुल्कों अपने ही मुस्लिमों को इस्लाम विरोधी बताकर अकसर मौत के घाट उतारते रहते हैं। उनको आप सज़ा के तौर पर जेल या जान जाने से कैसे डरा सकते हैं? हमारा कहना है कि इसका बेहतर इलाज यही है कि ऐसे लोगों का ब्रेनवाश किया जाये कि आज के दौर में मज़हबी राज नहीं चलेगा। देश संविधान कानून और एक दूसरे की भावनाओं का सम्मान करके ही चलेगा। धर्म को सार्वजनिक जीवन में ना लाकर घरों या धार्मिक स्थलों तक सीमित रखा जाये। किसी के पूजा पाठ या नमाज़ जैसी धार्मिक गतिविधियों से किसी दूसरे वर्ग को तकलीफ़ समस्या या नुकसान ना हो। सरकार उसके द्वारा बनाये जाने वाले कानून उनके अनुसार कार्यवाही करने वाली पुलिस उनके हिसाब से सज़ा देने वाली अदालतें और दूसरी प्रशासनिक एजंसियां सब सेकुलर निष्पक्ष और ईमानदार ना केवल होनी चाहिये बल्कि अपने कामों जांच और फैसलों से समानता का व्यवहार करती नज़र भी आनी चाहिये। यह कड़वा सच हम सबको जितनी जल्दी समझ आ जायेगा देश और समाज का उतना ही भला होगा कि आज के दौर में लोकतंत्र धर्मनिर्पेक्षता नैतिकता निष्पक्षता समानता सबको न्याय व सुरक्षा और उदारता का कोई विकल्प नहीं है। अगर हम संविधान के इन बुनियादी मूल्यों पर व्यवहारिक से खरे नहीं उतरते हैं तो समाज में शांति नहीं होगी। दुनिया का इतिहास गवाह है कि जहां शांति नहीं होती वहां आर्थिक उन्नति भी नहीं होती। इसीलिये सभी धर्म के कट्टरपंथियों को यह आज नहीं तो कल समझना और मानना ही होगा कि आप समाज को अपने धर्म के हिसाब से हिंसक तौर तरीकों से नहीं हांक सकते।   

 *नोट-लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक एवं नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

Sunday, 26 June 2022

शिवसेना में विद्रोह

*महाराष्ट्रः सरकार तो नहीं बचेगी, शिवसेना ठाकरे की ही रहेगी?*

0एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना विधायकों में जो बग़ावत हुयी है। उससे आज नहीं तो कल ठाकरे सरकार का जाना तो लगभग तय है। लेकिन कम लोगों को पता है कि यह वास्तव में महाराष्ट्र सरकार से अधिक उस मुंबई महानगर निगम पर कब्जे़ की लड़ाई की बानगी है जिसका बजट देश के लगभग एक दर्जन से अधिक छोटे राज्यों से अधिक यानी 26000 करोड़ का है। कुछ माह बाद इसके चुनाव होने हैं। इसके साथ ही यह 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले की उस कवायद का भी हिस्सा है। जिसमें भाजपा को महाराष्ट्र बंगाल व तमिलनाडू में 2019 के बाद बदले समीरणों को बहुमत पाने में बाधा बनने से हर हाल में रोकना है। दल बदल कानून से बचने में शिंदे गुट कामयाब होता है या नहीं यह देखना रोचक होगा।    

     *-इक़बाल हिंदुस्तानी*

      शिवसेना ने पिछला विधानसभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ा था। दोनों को साझा रूप से बहुमत भी मिल गया था। लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों में विवाद होने के बाद गठबंधन टूट गया था। इसके बाद शरद पवार जैसे वरिष्ठ राजनीतिज्ञ ने उध्दव ठाकरे के नेतृत्व में शिवसेना की एनसीपी और कांग्रेस के सपोर्ट से सरकार बनवा दी थी। दरअसल उसी समय एकनाथ शिंदे को सीएम बनाये जाने का प्रस्ताव था। लेकिन अंतिम क्षणों में पवार ने ठाकरे को सीएम बनने के लिये तैयार किया था। इससे आज के विद्रोह की बुनियाद उसी दिन पड़ गयी थी। इसके बाद ये आरोप लगातार लगते रहे कि ठाकरे पवार के इस एहसान की वजह से शिवसेना से अधिक एनसीपी को वेट देने लगे हैं। उधर भाजपा के पूर्व सीएम देवेंद्र फड़नवीस एनसीपी में नाकाम विद्रोह कराकर शपथ लेकर भी बहुमत साबित ना कर पाने के बाद लगातार तीन दलों की महा विकास अघाड़ी सरकार को तोड़ने का प्रयास करते रहे। उधर केंद्र की मोदी सरकार ने ठाकरे सरकार के कई मंत्री से लेकर विधायकों व एनसीपी के कुछ नेताओं पर केंद्रीय एजेंसियों की जांच की तलवार लटकाकर व कुछ को जेल भेजकर इतना अधिक दबाव बना दिया कि उनके पास शिवसेना से बगावत करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। इस असंतोष और बेचैनी का इशारा ठाकरे सरकार को हाल ही में हुए राज्यसभा और विधान परिषद के चुनावों में महा अघाड़ी के विधायकों का भाजपा के पक्ष में मतदान करने से मिल गया था। ठाकरे ने शक होने पर शिंदे को तलब कर उनसे सफाई मांगी तो वह कोरा झूठ बोलकर अपने आंसुओं की आड़ में बच निकले। इसके बाद शिंदे ने दिल्ली के इशारे पर ईडी की जांच से बचने मोटी रकम का लालच असंतुष्ट विधायकों को मंत्री पद दिलाने व खुद उपमुख्यमंत्री बनने और ठाकरे के हिंदुत्व से हटने व शिवसेना मंत्रियों व विधायकों को सीएम ठाकरे द्वारा भाव ना देने के बहाने भड़काकर विद्रोह को अंजाम तक पहंुचा दिया। इस विद्रोह से पहले तो ठाकरे और पूरी शिवसेना सकते में आ गयी। इसके साथ ही सहयोगी दल एनसीपी और कांगे्रस भी ठगे से रह गये। लेकिन जैसे ही शिंदे ने यह बयान दिया कि उनके साथ एक बहुत बड़ी शक्ति यानी भाजपा है तो पवार ने घाघ राजनेता की तरह ठाकरे सरकार  बनाने की तरह उसे बचाने को एक बार फिर पूरी मज़बूती और परिपक्वता से कमान संभाल ली। ठाकरे ने उनकी सलाह मानते हुए सीएम आवास तो तत्काल छोड़ दिया। लेकिन पद से रिज़ाइन नहीं किया। इसका नतीजा यह हुआ कि जो शिंदे पूरी शिवसेना अपने साथ होने का दावा कर रहे थे। वे बाद में कहने लगे कि उनके साथ दो तिहाई शिवसेना विधायक हैं। एक बार पहले ही आधी रात को शपथ लेकर सरकार ना बना पाने वाले फड़नवीस की भाजपा ने भी फिर से लज्जित होने से बचने को शिंदे से यह बयान पलटवा दिया कि उनके साथ कोई केंद्रीय राजनीतिक दल है। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। इतने समय में ही शिवसेना शुरू के झटकों से उभरकर बचाव की मुद्रा छोड़ अपने परंपरागत आक्रामक रूप में वापस आ गयी। उसने सरकार जाती देख अंतिम समय तक कानूनी लड़ाई के साथ ही अपनी पार्टी बचाने और विद्रोही विधायकों को सड़क पर जनता के बीच धोखेबाज़ डरपोक और मराठी अस्मिता का सौदा करने वाले साबित करने की जंग का एलान कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि विद्रोही शिंदे गुट वहीं अटक गया है। इस दौरान यह प्रस्ताव भी आया कि ठाकरे महा अघाड़ी छोड़कर भाजपा के साथ आयें। लेकिन ठाकरे ने इससे मना कर दिया। अब तक का रिकार्ड देखा जाये तो ठाकरे सरकार कोरोना से लेकर कानून व्यवस्था और राज्य की उन्नति व विकास में देश के कुछ गिने चुने सफल सीएम में गिने जाते हैं। अपवाद के तौर पर पालघर में तीन साधुओं की माॅब लिंचिंग उनकी बड़ी नाकामी रही हैै। लेकिन दिल्ली के साथ उनके रिश्ते कभी भी सामान्य नहीं रहे। जब जब मोदी सरकार सीबीआई व ईडी ने ठाकरे सरकार पर हमला बोला उन्होंने बिना डरे जवाबी धावा बोला है। इसके साथ ही भाजपा के खास रहे रिपब्लिक चैनल के अर्णव गोस्वामी फिल्म कलाकार सुशांत राजपूत कंगना रानौत नवनीत राणा या नूपुर शर्मा ठाकरे ने कानूनी कार्यवाही की पहल करके केंद्र सरकार को सीधी चुनौती दी है। बुल्ली डील एप और सुल्ली सेल जैसे मुस्लिम महिलाओं की बोली लगाने वालों और मस्जिद से अज़ान के समय हनुमान चालीसा का लाउड स्पीकर पर पाठ करने वालों के खिलाफ भी ठाकरे सरकार ने पूरी सख़्ती से कार्यवाही कर भाजपा की हिंदुत्ववादी नहीं मुस्लिम विरोधी हरकतों पर ना झुकने का कड़ा संदेश दिया है। उनका एक मंत्री शाहरूख़ खान के बेटे को ईडी द्वारा फर्जी केस में फंसाये जाने पर ईडी के एक चर्चित अधिकारी से भी भिड़ चुका है। जिसकी कीमत वह आज जेल जाकर चुका रहा है। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि ठाकरे की सरकार भले ही चली जाये लेकिन वह झुककर भाजपा से अब समझौता करने वाले नहीं है। जहां तक संगठन का सवाल है। इसमें कोई दो राय नहीं शिंदे के साथ शिवसैनिक और मराठी जनता का बड़ा वर्ग क्षेत्रीय अस्मिता मराठी मानुस और ठाकरे परिवार के प्रति अटूट वफादारी की वजह से नहीं आयेगा। यह भी तय है कि जब कभी भी शिंदे अपने विद्रोही विधायकों के साथ मुंबई विधानसभा में स्पीकर के चुनाव अविश्वास प्रस्ताव पर मतदान या अपने विद्रोह को कानूनी साबित करने को अपना पक्ष रखने आयेंगे उनका मूल शिवसेना इतना जोरदार विरोध करेगी कि सब बागी एमएलए उनके साथ नहीं रह पायेंगे। वैसे भी उनके आने से पहले ही उनके 12 से 16 विधायक पार्टी से निकालकर उनका पक्ष कमजोर कर दिया जायेगा। जिससे वे विधायकी खो सकते हैं। 

*नोट-लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ एडिटर एवं  नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

           


Monday, 20 June 2022

अग्निवीर

*अग्निवीर: समस्या 4 साल की नहीं 8 साल की है ?* 

0सेना में भर्ती के लिये मोदी सरकार ने अग्निवीर योजना पेश की है। इसका मकसद ना केवल युवाओं को रोज़गार देना है बल्कि उनके मन में देशभक्ति की भावना को बढ़ाना और मां भारती की सेवा का अधिक से अधिक युवाओं को मौका देना है। इसीलिये इसका सेवाकाल 15 की जगह 4 साल रखा गया है। चार साल की सेवा के बाद 75 प्रतिशत को 12 लाख रू. व 25 प्रतिशत को स्थायी सैनिक बनने का गौरव भी मैरिट के आधार पर मिलेगा। लेकिन इस योजना की अवधि 4 साल होना कुछ युवाओं को भा नहीं रहा है। वे इसके विरोध में सड़कों पर उतर आये हैं। कुछ जगह विरोध हिंसक भी हो गया है। जोकि बिल्कुल गलत है। विरोध पेंशन ना मिलने को लेकर भी है। लेकिन यह समस्या केवल पेंशन या अवधि चार साल से अधिक मोदी सरकार के 8 साल के कार्यकाल की आार्थिक नीतियों को लेकर अधिक है।    

      *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 

      1991 में हमारे देश में कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने पूंजीवादी आर्थिक नीतियां खुलकर अपनानी शुरू कर दी थीं। उसके बाद देवगौड़ा गुजराल की संयुक्त मोर्चा वाजपेयी की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और मनमोहन सिंह की संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की वामपंथी दलों के सहयोग से बनी सरकारें भी लगातार समाजवाद का रास्ता छोड़कर एकतरफा पूंजीवाद का पक्ष लेती नज़र आने लगीं। 2014 में बनी भाजपा की मोदी सरकार ने इस मामले में पिछली सरकारों के पंूजीपतियों के पक्ष में साफ नज़र ना आने को बीच बीच में रोज़गार का अधिकार यानी मनरेगा सूचना का अधिकार यानी आरटीआई शिक्षा अधिकार और भोजन का अधिकार जैसे कुछ ऐसे काम करने की भी ज़हमत नहीं की जिससे यह भ्रम हो कि यह सरकार भी कुछ कुछ समाजवादी है। यह सारी भूमिका हमने इसलिये बताई कि अग्निवीर योजना में 75 प्रतिशत सैनिकों को चार साल बाद 12 लाख रू. अन्य सरकारी सेवाओं में 10 प्रतिशत आरक्षण व प्राथमिकता और अन्य तमाम सुविधायें मिलने के बावजूद पेंशन ना मिलना सरकार की पूंजीवादी नीतियों की मजबूरी है। सरकार बहुत तेज़ी से अपने उपक्रमों का निजीकरण कर रही है। इसमें इस बात का भी ख़याल नहीं रखा जा रहा है कि केवल नुकसान में चलने वाली सरकारी कंपनियों को बेचा जाये। मोदी सरकार का मानना है कि व्यापार करना सरकार का काम ही नहीं है। पंूजीपतियों को नवरत्न सरकारी कंपनियां भी औनपौने दाम पर बची जा रही हैं। कारपोरेट का टैक्स लगातार कम किया जा रहा है। उनको सस्ती दर पर बैंक लोन दिया जा रहा है। उनका लाखों करोड़ का एनपीए यानी बुरा कर्ज़ बड़ी तेजी से पहले राइट आॅफ और फिर माफ किया जा रहा है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ऐसा करके इन बड़े पूंजीपतियों से भाजपा के लिये मोटा चुनावी चंदा ले रही है। इलैक्ट्रोरल बांड के ज़रिये सभी दलों को मिलने वाले चंदे को देखा जाये तो इसमें भाजपा सबसे आगे नज़र भी आती है। वैसे भाजपा ही नहीं सभी दलों को इसके अलावा भी चंदा मिलता रहा है। जिसका हिसाब किताब चुनाव आयोग के पास भी नहीं है। सत्ताधरी दल चाहे आज भाजपा हो या कल कांग्रेस या दूसरे दल रहे हों या आज अन्य राज्यों मंे सेकुलर दल हों उनके पास पैसा उगाहने के अन्य नैतिक और अनैतिक तरीके भी रहे हैं। कहने का मतलब यह है कि जिस तरह से 2004 में वाजपेयी सरकार ने केंद्र में सरकारी कर्मचारियों की पेंशन बंद कर दी थी। उसके बाद न केवल भाजपा शासित बल्कि अन्य दलों की अधिकांश राज्य सरकारों ने भी अपने अपने कर्मचारियों की पेंशन बंद कर दी थीं। आज हालत यह है कि केंद्र सरकार हो या राज्य सराकारें सबके पास धन की कमी है। यही वजह है कि वे कई सालों से लाखों पद खाली होने के बाद भी सरकारी भर्ती खोलने को तैयार नहीं हैं। मोदी पीएम बनने से पहले हर साल दो करोड़ रोज़गार देने का वादा करके सत्ता मंे आये थे। लेकिन उनके 8 साल के कुल कार्यकाल में भी इतने रोज़गार शायद पैदा नहीं हुए होंगे। उधर किसान पहले ही पेरशान हैं। महंगाई से आम आदमी का दम घुट रहा है। लेकिन मोदी सरकार ने इन वास्तविक समस्याओं से लोगों का माइंड हटाने केे लिये भावनात्मक मुद्दे ही बार बार उठाये हैं। सवाल यह है कि अग्निवीर योजना से सबको ना सही लेकिन कुछ युवाओं को कुछ समय का तो रोज़गार मिलेगा। बढ़ती आबादी और घटती आमदनी के दौर में सरकार बिना पेंशन व कम समय की नौकरी के अलावा चाहकर भी और क्या कर सकती है? जब 2019 में हमने मोदी सरकार को एक बार फिर से सत्ता में लाने को बहुमत दिया था तो क्या हम इस सच से अंजान थे कि मोदी सरकार की आर्थिक नीतियां क्या हैं? अगर हमने सांस्कृतिक धार्मिक जातीय क्षेत्रीय और एक वर्ग विशेष को मुख्य धारा में लाने के नाम पर कानूनी गैर कानूनी सरकारी बल प्रयोग करने को वोट दिया था तो आज मोदी सरकार की गल्ती कहां है? पंूजीवादी नीतियों का प्रतिफल यही होना था यही हो रहा है। आज निजी शिक्षा और निजी इलाज आम आदमी ही नहीं मीडियम क्लास की पहंुच से भी बाहर होता जा रहा है। सरकारी कार्यालयों में करप्शन किसी से छिपा नहीं है। लेकिन भाजपा की प्राथमिकता में जो राम मंदिर धारा 370 और काॅमन सिविल कोड जैसे मुद्दे थे। वह उन पर पूरी ईमानदारी और लगन से काम कर ही रही है। दो वादे मोदी सरकार ने पूरे कर दिये है। तीसरा भी अगले आम चुनाव से पहले पूरा होने के पूरे आसार हैं। हमें पूरा विश्वास है कि इन और इन जैसे अन्य राष्ट्रवादी मुद्दों पर ही मोदी जी 2024 में न केवल तीसरी बार पीएम बन जायेंगे बल्कि भाजपा के वोट और सीट दोनों पहले से और बढ़ जायेंगे। इसकी वजह यह है कि गोदी मीडिया ने देश के जनमानस को दिन रात एक करके विकास रोटी रोज़ी नौकरी पेंशन शिक्षा चिकित्सा समानता मानवता गरिमा नागरिक अधिकार संविधान न्याय और सुशासन जैसे मुद्दों  को गैर ज़रूरी और नफ़रत हिंसा हिंदू मुस्लिम बैर हिंदू राष्ट्र नकाब हिजाब जनसंख्या बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद मथुरा की ईदगाह समान नागरिक संहिता सड़क पर नमाज़ मस्जिद की अज़ान कपड़ों से पहचान हिंसा आगज़नी का आरोप लगने पर बिना अपराधी साबित हुए किसी के घर चलने वाले बुल्डोज़र का जोशभरा आंखो देखा हाल और स्टूडियो में रोज़ नागरिकों में आपसी दरार बढ़ाने वाली गरमा गरम सड़कछाप बहसों को जनता के सबसे बड़े सवाल मांग और मकसद बना रखा है। सवाल यह है कि ऐसे में चार साल की सेवा और पेंशन की बात कौन सुनेगा?  

नोट-लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।

Sunday, 12 June 2022

सब धर्मों का सम्मान

*सब धर्मों का सम्मान तभी होगा जब कानून का सम्मान होगा!* 
0दो भाजपा प्रवक्ताओं ने इस्लाम के पैगं़बर हज़रत मुहम्मद के बारे में कुछ अपमानजनक बोला तो भाजपा ने उनमें से एक को पार्टी से बाहर कर दिया और दूसरे को 6 साल को सस्पैंड कर दिया। भाजपा ने यह भी सफाई दी कि वह सब धर्मों का बराबर सम्मान करती है। इसके बाद हज़ूर की शान में गुस्ताख़ी करने वाले इन दोनों नेताओं के खिलाफ़ पुलिस ने रिपोर्ट भी दर्ज कर ली। हो सकता है कि कुछ समय जांच के बाद पुलिस इनको गिरफ़तार भी कर ले। लेकिन यह विवाद इसके बाद भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। देश में कई जगह इस मामले में प्रदर्शन आगज़नी और हिंसा हुयी है। कुछ कट्टरपंथी आरोपियों को चैराहे पर फांसी देने की मांग कर रहे हैं। जबकि एक आतंकी संगठन ने दोनों को आत्मघाती बम से उड़ाने की धमकी दी है। जो कि ग़लत है।    
                  -इक़बाल हिंदुस्तानी
      आमतौर पर दुनिया के देश लोकतंत्र और राजशाही दो ही तरीकों से चलते हैं। बताया जाता है कि हमारे देश में लोकतंत्र है। जिसके लिये संविधान यानी नियम कानून बनाये गये हैं। यह भी माना जाता है कि देश के सभी नागरिक समान हैं। हालांकि व्यवहारिक रूप में ऐसा कम ही देखने को मिलता है। उनको अभिव्यक्ति की आज़ादी तो है लेकिन एक दूसरे की यह स्वतंत्रता वहां समाप्त हो जाती है। जहां से दूसरे की शुरू होती है। पैग़ंबर का मामला तो ताज़ा है। अगर आप इतिहास देखें तो सारे फ़साद वहीं से शुरू होते हैं। जहां हम कानून का सम्मान नहीं करते। मिसाल के तौर पर इस्लाम ही नहीं सभी धर्म आस्था यानी ईमान से चलते हैं। मतलब यह है कि आस्था का आप केवल सम्मान कर सकते हैं। उसको प्रमाणिक वैज्ञानिक तर्कसंगत उचित सही सच न्यायसंगत और सार्वभौमिक साबित नहीं कर सकते। इसलिये ऐसे कानून बनाये गये हैं कि कोई किसी के धर्म को उनके अवतार को पवित्र धार्मिक ग्रंथों को उनके ईश्वर देवी देवता मंदिर मस्जिद इमाम पुजारी और धर्म से जुड़ी मान्यताओं को बुरा नहीं कहेगा। यानी किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस नहीं पहुंचायेगा। कोई अगर जानबूझकर ऐसा करेगा तो उसके खिलाफ कानून अपना काम करेगा। लेकिन यह भी देखने में आता है कि कुछ लोग अलग अलग कारणों से लगातार इस तरह के बयान काम और हरकतें करने से बाज़ नहीं आते। जिससे समाज के विभिन्न वर्गों में आपसी तनाव टकराव हिंसा और अशांति पैदा होती है। इससे ना केवल देश का आर्थिक सामाजिक और कानून व्यवस्था का नुकसान होता है बल्कि ये मामले कभी कभी विदेशों तक में देश को बदनाम और अपमानित करा देते हैं। जैसा कि पैगं़बर वाले वर्तमान मामले में इस बार हुआ है। अगर भाजपा प्रवक्ताओं के विवादित बयान देते ही भाजपा व उसकी सरकार तत्काल हरकत में आती और जो कार्यवाही अरब देशों के विरोध दर्ज करने के बाद हुयी है, वह अपने भारतीय नागरिकों के विरोध व नाराज़गी को दूर करने के लिये पहले ही हो जाती तो इससे आज के मुश्किल हालात से बचा जा सकता था। खैर फिर भी देर आयद दुरस्त आयद मानकर हमें यह संतोष करना होगा कि कार्यवाही की गयी है। वैसे ही अगर हम गहराई से देखें तो यह मामला जितना तूल पकड़ गया है। वह एक लक्ष्ण मात्र है। रोग यह है कि हम संविधान में सबको बराबर अधिकार दिये जाने के बावजूद व्यवहार में समान नहीं मान रहे हैं। सच यह भी है कि हम सब एक दूसरे को कानून से चलने को तो कहते हैं। मगर खुद उस पर अमल नहीं करते। इतना ही नहीं आरोपियों के खिलाफ रपट भी दर्ज हो गयी है। आगे सज़ा देने का काम कोर्ट का है। सवाल यह भी है कि जब आरोपियों को सत्ताधारी दल ने अनुशासन की कार्यवाही करके सज़ा दे दी तो भी लोग संतुष्ट क्यों नहीं हो पा रहे हैं? लेकिन कुछ कट्टरपंथी आरोपियों को अपने हिसाब से सज़ा देने की मांग कर रहे हैं। ऐसे ही मस्जिदंे नमाज़ पढ़ने के लिये होती हैं। लेकिन कई बार जुमे की नमाज़ के बाद नमाज़ी बड़ी तादाद में बिना पुलिस प्रशासन से अनुमति लिये वापसी में प्रदर्शन करना शुरू कर देते हैं। प्रदर्शन करो लेकिन अनुमति लेकर। सरकार और मुसलमानों दोनों को यह समझने की ज़रूरत है कि उनके बीच कुछ सालों से आपसी विश्वास कम क्यों हो रहा है? क्या मुसलमानों की इस शिकायत में कुछ दम नहीं है कि सरकार उनके साथ समानता का व्यवहार नहीं कर रही है? साथ ही मुसलमानों को यह समझना ही होगा कि उनको सरकार से अगर अपनी जायज़ बात मनवानी है तो कानून का रास्ता ही अपनाना होगा। अगर कुछ लोग आंदोलन के नाम पर कानून हाथ में लेंगे तो उनकी मांगे तो पूरी होंगी ही नहीं साथ ही सरकार उनसे बेहद सख़्ती से पेश आयेगी। जिससे उनका उल्टा और अधिक नुकसान ही होगा। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि देश में बहुमत की जगह बहुसंख्यकवाद ने ले ली है। इसी वजह से पहले जो सेकुलर दल जाति और अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता की सियासत करते थे। आज उसके विकल्प के रूप में भाजपा हिंदू तुष्टिकरण करके बहुसंख्यकवाद की राजनीति कर रही है। यह अलग बात है कि आज भाजपा के ये दो प्रवक्ता अल्पसंख्यकोें के खिलाफ ज़हर उगलते हुए अचानक लक्ष्मण रेखा पार करके ना केवल भारतीय मुसलमानों बल्कि देश के सेकुलर भारतीयों व दुनिया के दो अरब मुसलमानों के दिल को दुखाकर उनकी नज़र में इस्लाम के दुश्मन बन चुके हैं। लेकिन सच यह है कि कई साल से देश में जिस तरह की राजनीति चल रही है। जिस तरह के बयान कानून और घटनायें चुनचुनकर हो रही हैं। जिस तरह से एक वर्ग विशेष को टारगेट किया जा रहा है। जिस तरह से धर्म के नाम पर एक वर्ग विशेष के नरसंहार का खुला आव्हान किया जाता रहा है। उससे एक ऐसा माहौल बना जिसमें ये दो प्रवक्ता एक दूसरे से आगे निकलकर अपने वरिष्ठ नेताओं पार्टी पदाधिकारियों और कुछ बडे़े सरकारी ओहदों पर बैठे अपने आक़ाओं को खुश करने के लिये कानून और धर्म की मर्यादा व सीमा भूलकर मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहचा बैठे। लेकिन अब खुद भाजपा ने अपने तीन दर्जन से अधिक फायर ब्रांड नेताओं की सूची बनाकर उनमें से दो दर्जन से अधिक को संभल कर बोलने की चेतावनी जारी कर यह भरोस दिलाया है कि देश संविधान से चलेगा और सबका सम्मान होगा।  
 *नोट-लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

Tuesday, 24 May 2022

देशद्रोह क्या है?

*देशद्रोह राजद्रोह दलद्रोह सरकार द्रोह या जनद्रोह सच क्या है?

0सेडिशन यानी देशद्रोह कानून भारतीय दंड संहिता 1860 में बनकर जब लागू हुयी तब बना था। लेकिन आईपीसी की धारा 124 ए सही मायने में राजद्रोह थी देशद्रोह नहीं। वजह यह है कि यह राजा जाॅर्ज पंचम के लिये बनाया गया था। उस समय भारत गुलाम था। अंग्रेज़ों ने बड़ी चालाकी से अपनी राजशाही के विरोध को देशद्रोह के नाम पर कुचलने को इसे आज़ादी की मांग करने वाले भारतीयों को दबाने के लिये बेशर्मी और बेदर्दी से इस्तेमाल किया। 1947 में देश आज़ाद होने के बाद इस जनविरोधी कानूनी की कोई ज़रूरत नहीं थी। लेकिन पहले कांग्रेस फिर जनता पार्टी और आज भाजपा ने इसे अपने विरोधियों से निबटने के लिये बनाये रखने में अपना राजनीतिक लाभ देखा। अब सुप्रीम कोर्ट ने इसपर रोक लगा कर जनता के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला किया है।      
  *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
        सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून के अमल पर तत्काल प्रभाव से अंतिम निर्णय आने तक रोक लगा दी है। जिससे पहले दर्ज ऐसे सभी मामलों पर आगे कार्यवाही नहीं होगी और इन कानून के तहत नये मामले दर्ज नहीं होंगे। आज़ादी का अमृत उत्सव वर्ष मना रही मोदी सरकार इसे जैसा का तैसा बनाये रखने या इसमें संशोधन कर प्रयोग करने पर सुनवाई के दौरान कोई स्पश्ट पक्ष रखने से बचती रही। गृहमंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2014 से 2019 तक देशद्रोह के आरोप में कुल 326 मामले दर्ज किये गये। इनमें से मात्र 6 लोग दोषी साबित हो सके। हैरत की बात यह है कि सबसे अधिक असम में 54 मामले झारखंड में 40 हरियाणा में 31 बिहार केरल व कश्मीर में 25-25 केस दर्ज किये गये। कर्नाटक में 22 यूपी में 7 बंगाल में 8 और दिल्ली में 4 व महाराष्ट्र पंजाब व उत्तराखंड में एक एक मुकदमा देशद्रोह के आरोप में दर्ज किया गया। सबसे पहले यह समझने की ज़रूरत है कि देशद्रोह क्या है? क्या देशद्रोह व राजद्रोह एक ही चीज़ है? क्या किसी सरकार का विरोध करना या सत्ता में बैठे दल का विरोध करना देशद्रोह माना जा सकता है? क्या जनद्रोह देशद्रोह से भी बड़ा अपराध नहीं है? आपको याद होगा कांग्रेस ने कभी भी अपने राज में इस जनविरोध्ी कानून को बदलने या खत्म करने का इरादा या कोशिश नहीं की। वजह सत्ता में रहकर हर दल काफी हद तक बेलगाम होकर अपने विरोधियों को दबाकर डराकर या धमकाकर चुप रखना चाहता है। इसका प्रमाण यह भी है कि देशद्रोह कानून हटाना तो दूर कांग्रेस ने अपने कई दशक के एकछत्र राज में उल्टे मीसा रासुका यूएपीए टाडा और पोटा   जैसे कानून बनाये। इसमें कोई दो राय नहीं आतंकवाद नक्सलवाद माफिया गैंगेस्टर और समाज विरोधी अपराधी प्रवृत्ति के बदमाशों को सज़ा दिलाने को कुछ सख़्त कानूनों की ज़रूरत सभी सरकारों को होती है। लेकिन इन कानूनों की आड़ में अपने राजनीतिक विरोधियों पत्रकारों समाजसेवियों इंटलैक्चुअल एनजीओ और निष्पक्ष व मानव अधिकार संगठनों को निशाने पर लेकर फर्जी मामले दर्ज कर उनको ज़मानत ना देकर लंबे समय तक बिना अपराध साबित किये जेल में रखना संविधान विरोध्ी कानून विरोधी और लोकतंत्र विरोधी माना जाता है। यह बात सही है कि कुछ संगीन मामलों में अपराधियों को जेल में रखना ज़रूरी होता है। उनको ज़मानत इसलिये भी नहीं दी जाती जिससे वे बाहर आकर सबूतों से छेड़छाड़ गवाहों पर हमला या कोई नया अपराध ना कर बैठें। लेकिन हमारी सरकारों की ऐसी मंशा नहीं रहती। अकसर यह देखा जा रहा है कि सरकारें अपने दल के नेताओें व समर्थकों को तो बड़े से बड़ा अपराध करने पर भी बचाती हैं जबकि विरोधी दल के कार्यकर्ताओं व निष्पक्ष व सेकुलर लोगों को सत्ताधरी दल के जनविरोधी कामों का विरोध शांतिपूर्वक लोकतांत्रिक तरीके से करने पर भी फर्जी मुकदमों में फंसाकर उनकी ज़मानत का भी लंबे समय तक विरोध करती रहती हैं। इससे अभिव्यक्ति की आज़ादी से लेकर सच की लड़ाई लड़ने वाले पत्रकार स्पश्टवादी लेखक मानवधिकारवादी और समाज के वे सब लोग सरकार के निशाने पर रहते हैं जो उसके जनविरोधी फैसलों का खुलकर विरोध करते हैं। इसी लिये सबसे बड़ी अदालत ने देशद्रोह कानून पर रोक लगाई है। सबसे बड़ी अदालत में सुनवाई के दौरान पहले सरकार ने कहा कि देशद्रोह कानून सही है। सरकार उसको खत्म करने का विरोध करेगी। दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने जब अपने घोषणापत्र में यह वादा किया कि वह अगर सत्ता में आई तो इस कानून को खत्म कर देगी तो मोदी ने कांग्रेस को इस पर जमकर कोसा था कि वह टुकड़े टुकड़े गैंग के पक्ष में ऐसा करना चाहती है। लेकिन जब मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रूख़ देखकर यह समझ लिया कि वह इस कानून को हर हाल में खत्म करके ही दम लेगा तो उसने यू टर्न लेते हुए इस पर पुनर्विचार को तैयार होने का दावा किया। इसका कारण यह बताया गया कि मोदी नागरिक अधिकारों और अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्ष में हैं। सवाल यह है कि अचानक मोदी सरकार को ऐसा क्यों लगने लगा कि यह कानून हटना चाहिये? सच यह है कि सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या फिर भाजपा व अन्य दलों की। वे विपक्ष में रहकर तो ऐसे कानूनों को जनविरोधी लोकतंत्र विरोधी और अभिव्यक्ति के खिलाफ बताते हैं। लेकिन जब खुद सत्ता में आ जाते हैं तो ना केवल ऐसे कानूनों की पैरवी करते हैं, जमकर अपने विरोधियों के खिलाफ इन कानूनों का गलत इस्तेमाल करते हैं बल्कि पहले से मौजूद ऐसे कानूनों को और अधिक सख़्त डरावना बनाकर मनमाना इस्तेमाल करके बिना अपराध साबित किये विपक्ष निष्पक्ष धर्मनिर्पेक्ष जनवादी संघर्षशील मानव अधिकार संगठन के प्रगतिशील कार्यकर्ताओं आरटीआई एक्टिविस्टों लेखकों पत्रकारों व साहित्यकारों को सरकार के गलत फैसलों का विरोध करने आंदोलन करने या किसी भी प्रकार से जनता को जागरूक करने पर इन कानूनों के तहत जेल भेजकर उनकी ज़मानत कई कई साल तक ना होने देकर अन्य सरकार विरोधियों को एक तरह से संदेश दिया जाता है कि वे भी इसी तरह से जेल भेजे जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसीलिये यह रोक लगाई है। यह तय होना ही चाहिये कि सरकार का विरोध सत्ताधारी दल का विरोध या किसी पद पर बैठे बड़े से बड़े व्यक्ति के संविधान विरोधी फैसलों का लोकतांत्रिक शांतिपूर्ण विरोध देशद्रोह नहीं होता है।

 *नोट-लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

Monday, 16 May 2022

घटेगी अब आबादी....

*अच्छे दिन: अब हमारी आबादी घटनी शुरू हो जायेगी?* 
0राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के पांचवे सर्वे के अनुसार देश की प्रजनन दर 2 पर आ गयी है। किसी देश के वर्तमान जनसंख्या स्तर को जैसा का तैसा बनाये रखने के लिये टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 होना चाहिये। हालांकि यह दर पांच राज्यों बिहार में 2.98 मेघालय में 2.91 यूपी में 2.35 झारखंड में 2.26 और मणिपुर में 2.17 अभी भी प्रतिस्थापन दर से कुछ अधिक बनी हुयी है। लेकिन संतोष की बात यह है कि देश के कुल 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में से मात्र पांच में ही यह स्थिति है। इसका मतलब यह है कि देश का टीएफआर 2 यानी रिप्लेसमेंट लेवल से भी नीचे पहुंच गया है। इस सर्वे से इस झूठ की पोल खुलती है कि देश में एक वर्ग विशेष की आबादी इतनी तेज़ी से बढ़ रही है कि वह बहुसंख्यक हो जायेगा?    
                  -इक़बाल हिंदुस्तानी
      नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय के अंतर्गत किया जाता है। एनएफएचएस-5 में 6 लाख 37000 परिवारों को शामिल किया गया है। इसमें देश के सभी 28 राज्यों एवं 8 केंद्र शासित प्रदेशों के 707 जि़लों को शामिल किया गया है। सर्वे से पता चलता है कि देश के 67 प्रतिशत परिवार गर्भनिरोधक साधन अपना रहे हैं। पहले यह संख्या 54 प्रतिशत थी। हालांकि अभी भी देश के 9 प्रतिशत परिवारों तक गर्भनिरोधक साधन नहीं पहुंच पाये हैं। इनमें 11.4 प्रतिशत परिवार बेहद गरीब तो 8.6 प्रतिशत उच्च श्रेणी के हैं। आधुनिक गर्भनिरोधकों के प्रयोग के लेकर भी यह असमानता सामने आती है। निम्न आय वर्ग में इनका इस्तेमाल करने वाले 50.7 प्रतिशत तो उच्च आय वर्ग में 58.7 प्रतिशत हैं। यही उपयोग का अंतर कामकाजी महिलाओं में जहां 66.3 प्रतिशत है तो बेरोज़गार महिलाओं में 53.4 प्रतिशत है। गर्भनिरोधक प्रयोग करने व अन्य साधन परिवार नियोजन के लिये अपनाने में धर्म से अधिक शिक्षा की भूमिका पहले भी सामने आती रही है। इस बार के एनएफएसएच सर्वे के अनुसार 64.7 प्रतिशत सिख 35.9 प्रतिशत हिंदू और 31.9 प्रतिशत मुस्लिम पुरूष गर्भनिरोधक साधनों का इस्तेमाल करना महिलाओं का काम बताते हैं। इस सर्वे में जो टीएफआर यानी प्रजनन दर 2.0 तक पहंुच गयी है वह 2018 के सर्वे में 2.2 थी। टीएफआर उस दर को कहते हैं जिसमें एक महिला अपने पूरे जीवन में जितने बच्चो को जन्म देती है। हालांकि इस सर्वे के विस्तार से आंकड़े अभी सामने नहीं आये हैं। लेकिन अगर जाति धर्म और क्षेत्र के हिसाब से देखा जाये तो पिछले सर्वे की तरह इस सर्वे में भी यही आभास मिलता है कि परिवार नियोजन अपनाने या आबादी बढ़ाने का रिश्ता सबसे अधिक शिक्षा और सम्पन्नता से है। यह विडंबना ही है कि आज देश में जिस तरह की आर्थिक नीतियां अपनाई जा रही हैं। उनसे चंद अमीर और अधिक अमीर बनते जा रहे हैं। वहीं गरीब और अधिक गरीब होते जा रहे हैं। इतना ही नहीं देश में कोरोना अविवेकपूर्ण लाॅकडाउन नोटबंदी और जीएसटी से इतनी अधिक बेरोज़गारी बढ़ी है कि दो करोड़ से अधिक परिवार गरीबी रेखा से नीचे चले गये हैं। बड़ी संख्या में लोगों की आय घट गयी है। जिनकी आय नहीं भी घटी है। उनको दिन ब दिन बढ़ती महंगाई की वजह से उतनी ही आय में गुज़ारा करना मुश्किल हो रहा है। हालांकि परिवार नियोजन के सस्ते और सरकार के स्तर पर निशुल्क साधन भी उपलब्ध् कराये जाते हैं। लेकिन अगर गुणवत्ता और उपलब्ध्ता के आधार पर देखें तो परिवार नियोजन ही नहीं जीवन के हर मामले में सम्पन्न और विपन्न नागरिक के लिये अलग अलग स्तर है। इतना ही नहीं जो लोग एक वर्ग विशेष का आर्थिक बहिष्कार और सामूहिक नरसंहार का खुलेआम गैर कानूनी आव्हान आयेदिन करते रहते हैं। वे साथ साथ यह झूठ भी फैलाते रहते हैं कि इस वर्ग विशेष की आबादी इतनी तेज़ी से बढ़ रही है कि ये आने वाले कुछ दशक मंे बहुसंख्यक हो जायेंगे। इस मामले में कुछ राज्य सरकारें दो बच्चो का कानून पहले ही बना चुकी हैं। अगर हम राज्य अनुसार देखें तो देश में सबसे कम प्रजनन दर केरल और कश्मीर में है। कश्मीर मुस्लिम बहुल है। साथ ही केरल में हिंदू मुस्लिम और ईसाई लगभग समान संख्या में हैं। इसका मतलब साफ है कि आबादी बढ़ने या परिवार नियोजन का सीधा संबंध धर्म या जाति से नहीं बल्कि शिक्षा और सम्पन्नता से है। लेकिन सच यह है कि यह कटु सत्य उन चंद साम्प्रदायिक राजनीतिक और धर्मांध लोगों को फूटी आंख नहीं सुहाता जो अपने वोटबैंक को गुमराह कर डराकर और झूठ फैलाकर बार बार भावनात्मक मुद्दों पर चुनाव जीतकर सत्ता का सुख लूट रहे हैं। ऐसे ही आबादी की जब भी बात आती है। एक और झूठ बार बार बोला जाता है कि देश का एक वर्ग चार चार शादियां और 25 बच्चे पैदा कर रहा है। लेकिन आज तक किसी भी विश्वस्त सरकारी और अधिकृत सर्वे में इस तथ्य की पुष्टि नहीं हो सकी है। आंकड़े बताते हैं कि सबसे अधिक बहुविवाह आदिवासी जैन और हिंदू पुरूष कर रहे हैं। ऐसे ही इस झूठ को एक और तथ्य से जांचा जा सकता है कि जब सभी वर्गों में ही 1000 पुरूषों की पीछे 954 महिलायें पैदा हो रही हैं तो किसी भी समाज वर्ग धर्म या क्षेत्र का भारतीय अगर एक से अधिक शादी करेगा तो शेष पुरूष उसी समाज की किस महिला से शादी कर पायेंगे? यहां तो एक पुरूष को एक महिला उपलब्ध होना ही संभव नहीं है तो एक से अधिक शादी करने पर अतिरिक्त महिलायें कहां से आयेंगी? क्या वर्ग विशेष का हर पुरूष एक महिला अपने समाज की और तीन दूसरे समाज से लाकर शादी कर रहा है? यदि ऐसा होता तो दूसरे समाज में हर चार में से तीन पुरूष ना सही कम से कम हर दूसरा पुरूष तो बिना शादी के रह जाता? लेकिन ऐसा करना भी एक तरफा तो संभव नहीं हो पाता। दूसरे तथाकथित लवजेहाद के खिलाफ कानून बनने से अब तो यह लगभग नामुमकिन सा ही हो गया है। यह भी सोचने की बात है कि अगर एक वर्ग ऐसा करेगा तो दूसरा वर्ग भी करेगा ही। ऐसे में आप सच और दुष्प्रचार में अंतर देख सकते हैं।
           *0लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ एडिटर और नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*