Monday, 9 August 2021

चिंगारी अखबार बधाई का पात्र

प्रेरक हैं डाॅ. दाऊद के विचार,बधाई का पात्र है चिंगारी अख़बार!

0 6 अगस्त को चिंगारी में नगीना के डाॅ. दाऊद का आईना शीर्षक से लेख ग़रीबों से प्रेम करो और उनके पास बैठो’ वास्तव में पूरे समाज के लिये दर्पण है। डा. साहब ने जिस तरह से आत्मसाक्षात्कार करने की हिम्मत दिखाई है। वैसी मिसाल कम ही देखने को मिलती है। साथ ही जिस तरह से चिंगारी ने उनके नसीहत आमेज़ विचारों को संपादकीय पृष्ठ पर प्रमुखता से जगह दी है। उससे एक बार फिर साबित हो गया है कि एडिटर भाई सूर्यमणि रघुवंशी बाबूजी की जलाई समाजिक नैतिक और मानवीय मूल्यों की मशाल को आगे बढ़ा रहे हैं। आम आदमी हो या खास आदमी सबको अपनी बात कहने का मौका चिंगारी जैसा जन माध्यम बराबर दे रहा है।

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

  0 ग़मों की आंच पर आंसू उबाल कर देखो,

    बनेंगे रंग जो किसी पर भी डाल कर देखो।

    तुम्हारे दिल की चुभन भी ज़रूर कम होगी,

    किसी के पांव से कांटा निकाल कर देखो ।।

                       डा. साहब ने अपने बेबाक विचारों का जो दर्पण पूरी ईमानदारी और साफ़गोई से हम सबको दिखाया है। वह घर घर की कहानी है। अगर आप ग़ौर से देखेंगे तो आपको लगेगा अरे यह तो मेरे साथ भी हो रहा है। लेकिन सच यह है कि डा. साहब की तरह सबमें इसे क़बूल करने और खुद को आईना दिखाने की हिम्मत नहीं होती। सबसे अच्छी बात यह है कि डा. साहब ने खुद इसका एतराफ़ करने का साहस किया है। डा. साहब को इस बात का अहसास होना कि उनका सब मान सम्मान करते हैं। उनको सब जानते पहचानते हैं। वह बहुत मशहूर इंसान हो चुके हैं। बड़े बड़े लोगोें से उनके रिश्ते हैं। उनका हर ज़रूरी काम बहुत जल्दी हो जाता है। यह भी सही है कि दौलत के साथ शौहरत का नशा भी सर चढ़कर बोलता है। यानी दुख ही नहीं सुख में भी इंसान की नींद उड़ जाती है। अचानक डा. साहब के साथ भी जब यही हुआ तो उन्होंने रात के दो बजे नींद ना आने पर एक किताब खोली और उसमें लिखा था कि ग़रीबों से मुहब्बत करो उनके पास बैठो...। ‘‘लेकिन मैं तो ग़रीबों को जानता ही नहीं... न दूर के  न पास केमेरे हालात क्या बदले मैंने सब ही से नाता तोड़ लिया।’’ इतना ही नहीं इसके बाद डा. साहब ने एक एक करके जिन घटनाओं अपने खून के रिश्तों और पड़ौस के ग़रीबों के बारे में अपनी कोताही को सिलसिलेवार गिनवाया है। लेख की यही लाइनें हमारे दिल को छू जाती हैं। डा. साहब अकसर अख़बार मंे लेख लिखते रहे हैं। लेकिन इस लेख के बाद उनकी इज़्ज़त अहमियत और क़द्र हमारे दिल में बेहद बढ़ गयी है। ऐसा हम इसलिये भी कह रहे हैं। हम जितने भी लेख आजकल पढ़ते हैं। वे अकसर दूसरों की शिकायतों कमियों और बुराइयों पर ही केंद्रित होते हैं। लेकिन सच यह है कि हम चाहे जिस वर्ग पर क़लम चलायें। कहीं ना कहीं हम खुद भी उस वर्ग की कमी और ग़ल्ती का हिस्सा बने होते हैं। मिसाल के तौर पर सब दहेज़ देना बुरा समझते हैं। लेकिन उनको दहेज़ लेना बुरा नहीं लगता। सब रिश्वतखोरी को एक बड़ी बुराई मानते हैं। लेकिन जब उनका अपना कोई किसी ऐसी पोस्ट पर तैनात हो जाता है। जहां रोज़ अनगिनत नोट बरसते हैं तो वे उसको अपनी खुशकिस्मती बताकर पेश करते हैं। हमें दूसरों की साम्प्रदायिकता और जातिवाद बुरा लगता है। लेकिन हम खुद उसमें जब बढ़चढ़कर हिस्सा लेते हैं। उसका राजनीतिक सामाजिक और व्यक्तिगत लाभ उठाते हैं तो उसका नकारात्मक पक्ष भुला देते हैं। ऐसी और भी अनेक मिसालें हम यहां पेश कर सकते हैं। लेकिन फिलहाल अपनी बात उस मुद्दे पर केंद्रित करना चाहते हैं। जिसमें हम सबने अच्छा और सच्चा होने का लबादा ओढ़ रखा है। समाज व्यक्तियों से ही बनता है। अगर आदमी सही होगा तभी देश समाज और सरकार भी सही हो सकती है। आज सब दूसरों को सुधारना चाहते हैं। वैसे तो अच्छा होने के लिये किसी खास धर्म को मानना भी ज़रूरी नहीं है। अगर इंसान मानवता समानता नैतिकता न्याय अमनचैन और भाईचारे को भी अपनाता हो तो एक अच्छा और बेहतर समाज बन सकता है। लेकिन अगर धर्म की बात करें तो जाने माने मुफ़ती तारिक़ जमील का एक चर्चित वीडियो सोशल मीडिया पर काफी लंबे समय से वायरल हो रहा है। उसमें सबसे खास बात जो हमें अपील टू माइंड लगी वो यहां डा. साहब के विचारों में भी झलकती है। वह यह है कि मज़हब दो तरह के हक़ूक़ बताता है। एक अल्लाह के लिये यानी कलमा नमाज़ रोज़ा ज़कात और हज। दूसरे बंदों के लिये जो केवल मुसलमानों के लिये नहीं बल्कि हमवतनों पूरी दुनियां के इंसानांे यहां तक कि जानवरों पक्षियों और पेड़ पौधें यानी पूर ब्रहमांड के लिये हैं। साथ ही यह भी कहा है कि अगर ईश्वर के कामों में कोई कमी या ग़ल्ती रह गयी तो वह चाहे तो माफ भी कर सकता है। लेकिन अगर किसी बंदे का दिल दुखाया बेईमानी की धोखा दिया जु़ल्म किया नाइंसाफी की पक्षपात किया कम तोला कम नापा झूठ बोला तल्ख़ बोला मिलावट की रिश्वत ली या नाजायज़ लाभ को घूस दी हत्या की किसी भी तरह से सताया धमकाया उसका रास्ता रोका बहनों का हिस्सा नहीं दिया मांबाप का सहारा नहीं बने बिजली और सरकारी टैक्स चुराया यहां तक कि सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण किया तो अल्लाह इन मामलों में माफ नहीं करेगा। वह कहेगा कि पहले उस बंदे से माफ़ कराकर आओ जिसके साथ यह सब अनर्थ किया है। ऐसे में वो बंदा माफ नहीं करता है तो आपके सवाब जो नमाज़ रोज़ा हज ज़कात या सदके वगैरा से आपने किये थे। उसके खाते में चले जायेंगे और हिसाब अगर तब भी पूरा नहीं होता तो उसके गुनाह आपके खाते में डाल दिये जायेंगे। कहने का मतलब यह है कि जो लोग इस ग़लतफ़हमी में हैं कि वे अल्लाह के हक़ अदा कर रहे हैंइसलिये उनकी जन्नत पक्की है। वे जब तक बंदों के साथ अच्छा और सच्चा सलूक नहीं करेंगे। उनको अल्लाह के लिये किये उन कामों का भी कोई फ़ायदा नहीं होगा जो वे खुद के पाक साफ और अल्लाह का नेक बंदा होने की गारंटी मानकर कर रहे हैं। वैसे यह अलग बात है कि अल्लाह जिसको चाहे जिस बात पर सज़ा और इनाम दे सकता है। लेकिन हमने तो डा. साहब की बात पर बहुत पहले अमल करते हुए अपने रिश्तेदारों दोस्तों और ज़रूरतमंद ग़रीब लोगों की एक लिस्ट बनाई हुयी है। जिनसे हर इतवार को बारी बारी से मिलते रहते हैं। साथ ही जो शहर से बाहर रहते हैं। उनसे ए टू जै़ड सीरियल में एक एक कर फोन पर खैरियत लेते रहते हैं। पिछले साल और इस साल लाॅकडाउन में भी जिनको जो भी ज़रूरत थी। जो हम खुद मदद कर सकते थे। वो खुद की। बाक़ी जो अपने ही सक्षम लोग हैं। जिनमें मेरे लगभग सभी भाई बहन और बेटियां शामिल हैं। साथ ही विधायक भाई तसलीम अहमद उनके भाई हाजी दिलशाद पूर्व चेयरमैन मुअज़्ज़म खां साहनपुर के पूर्व चेयरमैन खुर्शीद मंसूरी और मेरे दोस्त मुअज़्ज़म इंजीनियर क़ाज़ी आसिफ़ मुत्तकी वगैरा से कई ज़रूरतमंदों की राशन किट आॅक्सीजन गैस और नक़द मदद कराई है। अभी भी अपनी कुल वार्षिक आय का दस प्रतिशत हम मदद में देते हैं।

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Sunday, 1 August 2021

भागवत की सकारात्मक पहल

भागवत के बयानोें पर विवाद नहीं सकारात्मक संवाद की ज़रूरत!

0हाल ही में संघ प्रमुख मोहन भागवत के कुछ नयेचर्चित और सकारात्मक बयान आये हैं। उनका स्वागत किया जाना चाहिये। भागवत की गिनती आजकल देश के प्रमुख शक्तिशाली लोगों में होती है। उनका दर्जा पीएम मोदी और भाजपा मुखिया से भी बड़ा माना जाता है। आरएसएस मुखिया ने मुसलमानों की माॅब लिंचिंग करने वालों को हिंदू विरोधी बताया है। उन्होंने मुसलमानों को एनआरसी से ना डरने और भारत में सबके अधिकार बराबर होने व सब धर्मों के सुरक्षित होने की बात भी कही है। ये एक अच्छी शुरूआत है।

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

  0 आ जाओ कि इस फ़र्क ए नज़र को भी मिटा दें,

   दुनिया ये समझती है कि तुम और हो हम और ।।

        मोहन भागवत ने कहा है कि सभी भारतीयों का डीएनए एक है। इस बार उन्होंने सब भारतवासियों को हिंदू बताने की जि़द छोड़ दी है। कुछ समय पहले उन्होंने देश में माॅब लिंचिंग की घटनायें होने से इनकार किया था। लेकिन इस बार ना केवल ऐसी घटनाओं को दुर्भाग्यपूर्ण माना है बल्कि ऐसे लोगों को हिंदू विरोधी करार दिया हैजो माॅब लिंचिंग करते हैं। उन्होंने हरियाणा के भाजपा प्रवक्ता सूरजपाल अम्मू जैसे उन मुट्ठीभर कट्टर फायरब्रांड हिंदू नेताओं को भी जमकर लताड़ा है जो आयेदिन देश से मुसलमानों को निकालने की बेतुकी बातें करते हैं। इससे पहले भागवत यह भी कह चुके हैं कि मुसलमानों के बिना भारत अध्ूारा है। उनका कहना है कि हिंदुत्व में मुसलमान भी समाहित हैं। उनका दो टूक कहना है कि देश में एकता के बिना विकास संभव नहीं है। उनका यह कहना भी सही है कि हिंदू मुस्लिम संघर्ष का एकमात्र समाधन संवाद है। संघ प्रमुख का यह कहना कि हम एक लोकतंत्र में हैं। यहां हिंदुओं या मुसलमानों का प्रभुत्व नहीं हो सकताकेवल भारतीयों का वर्चस्व हो सकता है। ज़ाहिर बात है कि भारत के 20 करोड़ मुसलमानों को ना तो देश से निकाला जा सकता है न ही बंगाल की खाड़ी में डाला जा सकता है और न ही घर वापसी के नाम पर हिंदू बनाया जा सकता है। जो कट्टरपंथी नेता मुसलमानों के बारे में आयेदिन उल्टे सीध्ेा बयान जारी कर खुद को हिंदुओं का मसीहा साबित करना चाहते हैं। वे खुद भी जानते हैं कि ऐसा करके अपनी साम्प्रदायिक राजनीति तो चमकाई जा सकती है। लेकिन मुसलमानों को तमाम बुरा भला कहने के बावजूद अपनी नफरतभरी और अतिवादी किसी भी योजना पर वे किसी कीमत पर भी अमल नहीं कर सकते। ये कठिन नहीं असंभव है। भागवत ने यह कहकर स्थिति और साफ कर दी कि उनके इस वक्तव्य का मतलब छवि बनाना या वोटबैंक की राजनीति करना नहीं है। हालांकि इसके बावजूद विपक्षी नेता एमआईएम मुखिया ओवैसी ने माॅब लिंचिंग की घटनाओं को हिंदुत्व की देन और बसपा प्रमुख मायावती ने भागवत के बयान पर मुंह में राम बगल में छुरी की कहावत याद दिलाते हुए तीखी प्रतिक्रिया देने में देर नहीं लगाई। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि अगर भागवत को मुसलमानों की इतनी ही चिंता है तो माॅब लिंचिंग करने वालों को केंद्रीय मंत्री फूल माला क्यों पहनाते हैंसाथ ही ऐसे मामलों में भाजपा की राज्य सरकारें आरोपियोें के साथ खड़ी क्यों नज़र आती हैंआरोपियों के पक्ष में महापंचायत बुलाकर भाजपा प्रवक्ता आपत्तिजनक बयान क्यों देते हैंक्या यह संभव है कि संघ भाजपा और उनकी सरकारें ना चाहें तब भी माॅब लिंचिंग की घटनायें लगातार होती रहेंकहीं ऐसा तो नहीं कि संघ प्रमुख एक सोची समझी रण्नीति के तहत केवल हिंदू मुस्लिम एकता के बयान देते रहें और भाजपा व उनके अन्य हिंदू संगठन व उनकी सरकारें एक सुनियोजित एजेंडे के तहत अपना काम बदस्तूर अंजाम दे रही होंये अलग बात है कि ओवैसी और मायावती खुद मुसलमानों के हित में कोई ठोस काम ना करके अंदरखाने भाजपा को लाभ पहंुचाने वाले बयान और अलग चुनाव लड़कर संघ की विचारधारा को ही मज़बूत बनाने के आरोप झेल रहे हैं। सवाल यह है कि क्या संघ को ऐसा बयान देने से कोई राजनीतिक लाभ होगासंघ जानता है कि मुसलमान इसके बावजूद भाजपा को वोट नहीं देने लगेगालेकिन यह हो सकता है कि भाजपा को समर्थन देने वाले हिंदुओं का एक उदार वर्ग माॅब लिंचिंग जैसी हिंसक घटनाओं से नाराज़ होकर भाजपा का साथ छोड़ जाये। यह भी हो सकता है कि दुनिया की नज़र में भाजपा और संघ की खराब होती छवि को सुधारने के लिये संघ अपनी मुस्लिम विरोधी रण्नीति पर पुनर्विचार कर रहा हो। संघ और मुसलमान दोनों को यह भी पता है कि देश में मुस्लिम विरोधी माहौल बनाकर एक दो चुनाव तो जीते जा सकते हैं। लेकिन कांग्रेस की तरह अगर लंबे समय तक राज करना है तो दलितों सेकुलर हिंदुओं और मुसलमानों को भी भाजपा के साथ जोड़कर कट्टर हिंदू वोटबैंक का विस्तार कर उसे उदार हिंदू वोटबैंक में बदलना मजबूरी होगी। इसकी वजह यह हो सकती है कि भाजपा अपने चरम उत्कर्ष पर पहंुच चुकी है। उसको कट्टर हिंदुओं का जितना समर्थन मिलना था। मिल चुका है। अब वह सत्ता में है तो आज नहीं तो कल उसको अपने राजकाज का हिसाब देना ही होगा। कांग्रेस नेहरू परिवार और विपक्ष पर आरोपों से आगे काम चलने वाला नहीं। सिवाय हिंदू मुस्लिम के उसकी अब तक कानून व्यवस्था रोज़गार शिक्षा चिकित्सा अर्थव्यवस्था और विदेश नीति पर कोई विशेष उपलब्धि नहीं है। अलबत्ता जनकल्याण की कुछ योजनाओं सड़क निर्माण बिजली शौचालय जलनल योजना पीएम रसोई गैस योजना पीएम आवास योजना आदि कुछ काम जो हर सरकार में चलते ही रहते हैंउनमें भाजपा सरकार ने बढ़त हासिल की है। इससे उसके वोटबैंक में असफल नोटबंदी देशबंदी और जीएसटी से जो कमी आती वो रूक सकती है। आगे इसमें बढ़ोत्तरी होने की संभावना बहुत कम है। उधर मुसलमानों की उपेक्षा पक्षपात आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार माॅब लिंचिंग और उनके खिलाफ बढत़ी सामूहिक हिंसा उस पर पुलिस प्रशासन व शासन का एकतरफा रूख़  उनके लिये भी भागवत के बदले अंदाज़ उदार रूख़ और बदलते माहौल में हिंदू मुस्लिम एकता भाईचारे और उनकी सुरक्षा व उन्नति के लिये बातचीत का एक दरवाज़ा खोलता है। जहां तक सेकुलर दलों और मुसलमानों के अपने राजनीतिक व धार्मिक नेताओें का सवाल है। वे उनकी समस्याओं पक्षपात और हमलोें का कोई हल न तो आज तक तलाश पाये हैं न ही इसकी कोई ठोस पहल और संभावना नज़र आती है। इसलिये बेहतर यही होगा कि मुसलमान संघ प्रमुख के इस बयान पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए संघ और भाजपा सरकारों के साथ सकारात्मक संवाद का सिलसिला शुरू करे और अपनी रोज़गार शिक्षा स्वास्थ्य सुरक्षा व समानता की मांगे उनके सामने रखंे साथ ही हिंदू समाज को उनसे कोई समस्या या वाजिब शिकायत हो तो उसका समाधान भी आपसी बातचीत से करने की कोशिश करे। फिलहाल इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता उनके पास नहीं है।

 0लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Friday, 16 July 2021

यूपी की नई जनसंख्या नीति

नई जनसंख्या नीति का मुसलमान न तो विरोध करें ना ही डरें!

0यूपी की दो बच्चो की सरकारी नीति मुसलमानों के लिये नहीं सबके लिये बनाई गयी है। विरोधी दलों का आरोप है कि नई जनसंख्या नीति एन चुनाव से पहले मुसलमानों को टारगेट करने के लिये बनाई गयी है। इस आरोप से खुद ऐसा लगता है। जैसे केवल मुसलमानों के ही अधिक बच्चे पैदा हो रहे हों। सच यह है कि बढ़ती आबादी का रिश्ता मज़हब नहीं बल्कि शिक्षा और सम्पन्नता से है। सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि मुसलमान केरल और कश्मीर में हिंदुओं के बराबर परिवार नियोजन अपना रहे हैं। अगर वे यूपी में भी 2 बच्चो की पाॅलिसी स्वीकार कर लेंगे तो उनका भला ही होगा।   

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   भारत सरकार के आंकड़े गवाह हैं कि देश के 29 में से 24 राज्यों में आबादी की प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल यानी 2.1 तक आ चुकी है। यह वो दर है जिसमें आबादी स्थिर हो जाती है। जिन बीमारू’ यानी बिहार मध्यप्रदेश राजस्थान उत्तर प्रदेश कहे जाने वाले राज्यों में यह दर अभी भी सबसे अधिक है। उनमें यूपी और बिहार सबसे उूपर हैं। यूपी में टोटल फर्टिलिटी रेट 2.71 बताया जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं बढ़ती आबादी एक बड़ी समस्या है। लेकिन यह भी सच है कि देश में मुसलमानों के खिलाफ ऐसा माहौल बना दिया गया है। जिससे आम आदमी का बड़ा वर्ग बिना किसी सबूत प्रमाणिक आंकड़े और ठोस तथ्य के यह मानकर चलता है कि मुसलमान चार चार शादी और 40 बच्चे पैदा करता है। हम चुनौती देते हैं कि इस लेख को पढ़ने वाला कोई भी पाठक ऐसा एक भी मुसलमान तलाश करके बताये जिसके चार पत्नी और 40 बच्चे होंसवाल यह है कि क्या मुसलमानों में हर एक हज़ार पुरूष के पीछे चार हज़ार महिलायें पैदा होती हैंक्या मुसलमानों ने एक से अधिक शादी करने को करोड़ों गैर मुस्लिम महिलाओं का धर्म परिवर्तन कराकर यह कमी पूरी की हैक्या मुसलमान मुस्लिम मुल्कों से इतनी बड़ी तादाद मेें महिलायें लाकर शादी रचा रहे हैंनहीं तो यह कैसे संभव है कि सारे मुस्लिम मर्दों को चार चार दुल्हन शादी करने को मिल जायेंदूसरी बात क्या हर मुसलमान एक से अधिक शादी करता हैजी नहीं। यह कोरा झूठ है। अफवाह है। मिथक है। सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि मुसलमान सबसे कम यानी 5.7 प्रतिशत हिंदू 5.8 प्रतिशत एक से अधिक शादी करते हैं। जैन 6.72 तो बौध्द 7.92 और सबसे अधिक आदिवासी 15.25 प्रतिशत बहुविवाह करते हैं। सरकारी आंकड़े ही यह भी बताते हैं कि सबसे तेज़ी से आज मुसलमानों की आबादी की बढ़त नीचे आ रही है। हालांकि यह सही है कि उनकी टीएफआर अभी भी कई राज्यों में हिंदुओं से थोड़ी अधिक है। लेकिन यह भी दुष्प्रचार है कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो देश में एक दिन हिंदू अल्पसंख्यक हो जायेंगे। कई हिंदू संत और संगठन लंबे समय से यह मांग करते रहे हैं कि हिंदुओं को दो नहीं चार आठ या दस से अधिक बच्चे पैदा करने चाहिये। लेकिन आज जब यूपी की हिंदूवादी सरकार कानून लाई है तो वह केवल मुसलमानों के लिये नहीं बल्कि सबके लिये दो बच्चो का काूनन लाई है। इससे होगा यह कि मुसलमानों के साथ ही गरीब और अशिक्षित हिंदू भी दो बच्चो का नियम ना मानने पर सरकारी सेवाओं और सुविधाओं से वंचित होगा। लोकल बाॅडी के चुनाव नहीं लड़ सकेगा लेकिन एमएलए और एमपी बन सकता है। राजनेताओं ने अपना घर बचा लिया है। साथ ही महिलाओं पर पुत्र ना होने पर गर्भपात अत्याचार और तलाक का अन्याय पहले से और अधिक बढ़ेगा। अगर सरकार गरीब कमज़ोर अनपढ़ और कट्टर लोगों को निशुल्क शिक्षा स्वास्थ्य व रोज़गार के साथ अनेक जनहितैषी योजनायें चलाकर जागरूक करती तो वे खुद ब खुद परिवार नियोजन अपनाने लगते। लेकिन अब उल्टा असर यह होगा कि जो लोग पहले से सम्पन्न शिक्षित और प्रभावशाली हैं। वे अधिकांश परिवार नियोजन अपना ही रहे हैं। उनको ही सरकार और अधिक सुविधायें देंगी। उधर वो गरीब कमज़ोर नासमझ नादान कम पढ़े लिखे या जाहिल लोग चाहे हिंदू हों या मुसलमानपहले की तरह नहीं सरकारी सुविधायें नौकरी उच्च शिक्षा या राशन ना मिलने से बच्चे अधिक पैदा करते रहेंगे। यानी विकास की दौड़ से पहले से भी अधिक तेज़ी से बाहर होते जायेेंगे। यह आत्मघाती विकल्प उन मुसलमानों के लिये भी खुला है जो अपने कट्टरपंथी मौलाना या वोटबैंक समझने वाले नेताओें के भड़काने पर दो बच्चो की नीति का बाॅयकाट करेंगे। हमारा कहना है कि मुसलमानों को ठंडे दिमाग से सोचना चाहिये कि वे पक्षपातपूर्ण सीएए कानून तक नहीं रोक पाये। वे तीन तलाक का कानून भी नहीं बदलवा सके थे। वे नई जनसंख्या नीति भी नहीं रोक पायेंगे। विरोध करने पर उनका क्या हश्र होगा इसका अंदाज़ उनको हो गया है। उल्टा उनके विरोध करने पर भाजपा सरकार को अपना आरोप साबित करने को चुनाव में राजनीतिक लाभ मिलेगा। छोटा परिवार सुखी परिवार होता है। मुसलमान परिवार नियोजन अपनायेंगे तो उनके बच्चे खुशहाल होंगे। लड़कियां शिक्षित होंगी तो उनका पूरा परिवार तरक्की करेगा। उनको अच्छे रोज़गार मिलेंगे। वे अपनी आमदनी अधिक बच्चे होने पर कई गुना नहीं बढ़ा सकते। वे क्या कोई गैर मुस्लिम भी कमाने की एक सीमा रखता है। लेकिन उतनी ही आय में कम बच्चे होने से उनका पालन पोषण पढ़ाई दवाई और शादी मकान बनाना आसान हो जाता है। इसलिये उनको ना तो इस कानून का विरोध करना चाहिये और ना ही इससे डरना चाहिये। हालांकि यह सच है कि जब सभी धर्मों के लोगों के बीच पहले के मुकाबले तेज़ी से गिरावट देखी जा रही है। ऐसे में ऐसा कानून लाना किसी हद तक इस आशंका को सही साबित करता है कि जिन लोगों ने यह झूठ फैलाया है कि केवल मुसलमान तेज़ी आबादी से बढ़ा रहे हैं। उनको ऐसा करने से रोकने को ऐसा कानून लाकर अन्य लोगों को यह काल्पनिक और चुनावी डर दिखाना ज़रूरी है। इसमें भी कोई दो राय नहीं इस तरह के डर हथकंडे और झूठ से एक दो बार चुनाव जीता जा सकता हैै। एक दिन जनता यह खेल ज़रूर समझेगी।                       

Sunday, 4 July 2021

धर्म और नफ़रत...

जब सब धर्म अच्छे हैं तो आपस में इतनी नफ़रत क्यों?

0अमेरिका के वाशिंगटन डीसी स्थित विश्व विख्यात नाॅन प्रोफि़ट इंस्टिट्यूट प्यू रिसर्च सेंटर के हाल ही में भारतीयों के सर्वे में कई दिलचस्प मगर अजीबो गरीब सच सामने आये हैं। सर्वे के मुताबिक देश के अधिकांश लोग यह तो मानते हैं कि सभी को धार्मिक आज़ादी और समान सम्मान व महत्व मिलना चाहिये । लेकिन अलग अलग मज़हब को मानने वालोें के बीच शादी उनका पड़ौसी होना दोस्ती होना और आपसी मेलजोल से वे खुलकर मना करते हैं। कुछ समय से देश के लोगोें के बीच सियासी अलगाव नफ़रत और दूरियां बढ़ने का जो अंदेशा था उस पर प्यू रिसर्च सेंटर के सर्वे ने मानो मुहर लगा दी है।   

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   मशहूर शायर अल्लामा इक़बाल ने कहा था-‘‘मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना,हिंदी हैं हम वतन हैं हिंदोस्तां हमारा।’’ सभी धर्मों के मुखिया पंडित मौलवी पादरी ग्रंथी धार्मिक जानकार आम आदमी यहां तक कि एक पार्टी विशेष के चंद कट्टर नेताओं को अपवाद मानकर छोड़ दें तो लगभग सभी दलों के नेता जनप्रतिनिधि और समाज का हर वर्ग सार्वजनिक रूप से यह दावा करता रहा है कि सभी धर्म अच्छे हैं। ईश्वर एक है। सत्य एक है। धर्म ईश्वर तक पहुंचने के अलग अलग रास्ते हैं। प्यू रिसर्च सेंटर एक विख्यात विश्वसनीय विश्व स्तरीय सर्वे एजेंसी है। जो पूरी दुनिया में अपनी निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिये  खास  साख बना चुकी है। प्यू ने भारत के 30 हज़ार से अधिक लोगों से 2019 के आखिरी और 2020के शुरू के महीनों में विस्तार से बातचीत की। इस बातचीत में ना केवल 17 भाषाओं के लोगों को शामिल किया गया बल्कि धर्म क्षेत्र संस्कृति राज्य और भारत की विभिन्न विविधताओं का ख़याल रखते हुए लगभग सभी लोगों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की गयी। 91प्रतिशत हिंदुओं जबकि 89 प्रतिशत मुसलमानों व ईसाइयों ने कहा कि उनको मज़हबी आज़ादी है। जबकि 85 प्रतिशत हिंदुओं का कहना था कि सभी धर्मों का सम्मान करना सच्चे भारतीय की पहचान है। अधिकांश हिंदुओं के लिये धार्मिक उदारता ना केवल नागरिक बल्कि धार्मिक गुण भी है। 80 प्रतिशत ने कहा कि अन्य धर्मों का सम्मान करना सच्चे हिंदू का ज़रूरी पहलू है। 82 प्रतिशत सिख 93 प्रतिशत बौध््द और 85 प्रतिशत जैनियों ने भी देश में धार्मिक स्वतंत्रता की बात स्वीकार की। 77प्रतिशत हिंदुओं और मुसलमानों ने दो टूक कहा कि वे कर्म में विश्वास करते हैं। 47 प्रतिशत हिंदुओं ने कहा कि उनके दोस्तों में सभी धर्मों के दोस्त शामिल हैं। मुस्लिम और अन्य धर्मों में भी ऐसे लोगों की काफी बड़ी संख्या मौजूद है।36 प्रतिशत हिंदुओं का कहना था कि उनको मुस्लिम पड़ौसी स्वीकार नहीं है। मुसलमानों में यह फीसद जहां सबसे कम 16 है तो जैन समाज में 54 प्रतिशत लोग मुस्लिम पड़ौसी से परहेज़ रखना चाहते हैं। उधर 92 प्रतिशत जैनियों को हिंदू पड़ौसी से कोई समस्या नहीं है। 66 प्रतिशत हिंदू तो 64 प्रतिशत मुसलमान अपने धर्म को अन्य धर्म से बिल्कुल अलग मानते हैं। 67 प्रतिशत हिंदू 80 प्रतिशत मुसलमान 66 प्रतिशत जैन 59 प्रतिशत सिख और 37 प्रतिशत ईसाई अपने समाज की औरतों की दूसरे धर्म में शादी के खिलाफ हैं। हालत यह है कि 76 प्रतिशत मुसलमान और65 प्रतिशत हिंदू दूसरे धर्म में अपने पुरूषों को भी शादी करने से रोकना चाहते हैं। यह अजीब बात है कि कुल 49 में से 43 देशों में धार्मिकता घटी है जबकि भारत उन गिने चुने देशों में शामिल है। जहां हाल ही के सालों में धार्मिकता बढ़ी हैै। देश की दो तिहाई आबादी मना होने पर बीफ और पोर्क खाने वाले आदमी को अपने समाज से बाहर का रास्ता दिखाना चाहती है। हैरत की बात यह है कि 63 प्रतिशत हिंदू तो 70प्रतिशत मुसलमान जाति से बाहर विवाह करने को भी तैयार नहीं हैं। मजे़दार बात यह है कि इसके बावजूद 20 प्रतिशत भारतीय ही जातीय भेदभाव होना स्वीकार करते हैं। हिंदू 16प्रतिशत तो मुस्लिम 24 प्रतिशत समाज में धार्मिक भेदभाव की बात कबूल करते हैं। राष्ट्रवाद पर 80 प्रतिशत मुसलमान सहमत हैं लेकिन वंदे मातरम पर वे हिंदुओं से 11 प्रतिशत पीछे हैं। एक और रोचक तथ्य यह सामने आया कि हिंदुओं से कहीं अधिक मुसलमान देश के बंटवारे को बुरा मानते हंै। 66 प्रतिशत सिख भी पाकिस्तान बनने को गलत मानते हैं। अधिकांश मुस्लिम तीन तलाक के तो खिलाफ हैं लेकिन वे अपने पारिवारिक और इस्लामिक मामलों के केस शरीयत अदालत में सुलझाना चाहते हैं। दुखद और आश्चर्यजनक बात यह भी सामने आई कि आध्ेा से अधिक भारतीय खुले लोकतंत्र की जगह अधिनायकवाद को पसंद करने लगे हैं। हिंदू राष्ट्र के लिये भी हिंदू समाज में बड़े पैमाने पर समर्थन देखा गया लेकिन ऐसे लोग उत्तर भारत में अधिक हैं। सवाल यह है कि जब सभी धर्म एकता भाईचारे और आपसी मेल मुहब्बत की बात करते हैं। कोई पूरी दुनिया को एक कुटंुब बताता है तो कोई एक मासूम इंसान के कत्ल को पूरी इंसानियत का कत्ल बताता है। कोई समाजसेवा और मानवसेवा को ही असली धर्म बताता है तो कोई अहिंसा को परम धर्म बताता है। कोई एक ही नूर से जग उपजा कुदरत के सब बंदे बताता है तो कोई नर सेवा को ही नारायण सेवा बताता है। कोई दीन के मामले मंे ज़ोर ज़बरदस्ती से साफ मना करता है तो इनके मानने वालों में इतनी नफरत अलगाव टकराव खूनखराबा परायापन पक्षपात दंगे जबरन धर्म परिवर्तन माॅब लिंचिंग एक वर्ग विशेष का आर्थिक बहिष्कार सामाजिक दोगलापन इंसान का इंसान से छुआछूत अंतरजातीय या अंतरधार्मिक विवाह का विरोध आॅनर किलिंग साम्प्रदायिकता क्षेत्रवाद भाषावाद बहुसंख्यक राष्ट्रवाद राजनीतिक दरार और एक दूसरे के साथ इतनी बेईमानी बेरहमी और खुला सौतेलापन कहां से आयाक्या ये वास्तव में हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और वाला मामला हैया फिर हम सबने मुखौटे लगा रखे हैंऔर हम वास्तव में ऐसे ही हैंया फिर धर्म के ठेकेदारों ने धर्म की अपनी मनमानी स्वार्थी व पक्षपातपूर्ण व्याख्या करके समाज में ज़हर घोल दिया हैया सत्ता के लिये हमारे राजनेताओं ने एक सोची समझी योजना के तहत समाज के विभिन्न वर्गों जातियों और धर्मों के मानने वालों के बीच यह अलगव की दीवार बड़े लंबे जतन और मशक्कत से खड़ी की है?जिसकी  समझ और दूरगामी नुकसान की जानकारी आम हिंदू मुसलमान और अन्य धर्म के मानने वालों को नहीं है और वो उन ध्ूार्त मुट्ठीभर कट्टरपंथियों के बहकावे कच्चे लालच और भावनाओं के चक्रव्यूह में आकर लंबे समय से मूर्ख बनकर अपने जैसे ही गरीब कमज़ोर बेरोज़गार परेशान दलित पिछड़े किसान मज़दूर अल्पसंख्यक बहुसंख्यक के नाम पर एक दूसरे से लड़ रहा हैै। जबकि उनका काॅमन दुश्मन उनके ही समाज धर्म जाति और यानी उनके ही घर में बैठा हुआ कठपुतलियों की डोर हिला कर तमाशा देख रहा है।                      

0 लेखक ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।।         

 

Saturday, 26 June 2021

2 बच्चे

असम सरकार सुविधायें छीनकर करायेगी परिवार नियोजन?

0इसमें कोई दो राय नहीं कि किसी भी देश प्रदेश की उन्नति के लिये बढ़ती जनसंख्या पर रोक लगनी चाहिये। यह भी सही है कि छोटा परिवार सुखी परिवार होता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या असम सरकार के पास जनता को 2 से अधिक बच्चे होने पर शासकीय योजनाओं के लाभ से वंचित कर एक तरह से सज़ा देने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है?आदर्ष जन्मदर का लक्ष्य 2.1 की बजाये 1.9होने के बावजूद असम सरकार ने 2 से अधिक बच्चो वालों को सरकारी सेवा व पंचायत चुनाव लड़ने से पहले ही वंचित कर रखा है। केरल सरकार ने इस तरह के फै़सलों के बिना ही आबादी पर लगाम लगाकर पूरे देश के सामने एक मिसाल पेश की है।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की निगरानी में काम करने वाली सरकारी संस्था नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे की दिसंबर 2020 में जारी पांचवी रिपोर्ट के अनुसार असम की कुल जन्म दर 1.9तक नीचे आ चुकी है। आदर्श रूप से किसी भी देश प्रदेश की आबादी की वर्तमान जनसंख्या स्थिर बनाये रखने के लिये यह टीएफआर यानी टोटल फर्टिलिटी रेट 2.1 होनी चाहिये। इसका मतलब असम न केवल आदर्श जन्म दर का लक्ष्य पहले ही हासिल कर चुका है। बल्कि वह उससे भी नीचे जाकर अब अपनी मौजूदा आबादी से कम जनसंख्या की ओर जा रहा है। सवाल यह है कि इसके बावजूद आबादी घटते जाने का जोखिम उठाकर भी किस राजनीतिक एजेंडे के तहत असम के सीएम हेमंत विस्व सरमा ऐसे सरकारी उपाय अपनाना चाहते हैं।

       जिससे कुछ खास वर्ग के लोगों को सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने से रोका जा सकेहालांकि उन्होंने यह भी स्पश्ट किया है कि यह प्रस्ताव धीरे धीरे लागू किया जायेगा और फिलहाल सभी सरकारी योजनाओं से दो बच्चो से अधिक वाले परिवारों को एक साथ वंचित नहीं किया जायेगा। उनका कहना है कि प्रधनमंत्री आवास योजना और राज्यों के स्कूल काॅलेजों में पढ़ने से किसी भी परिवार को फिलहाल नहीं रोका जायेगा। लेकिन भविष्य में अगर मीडियम क्लास के लिये मुख्यमंत्री आवास योजना शुरू की जाती है तो उससे दो बच्चो से बड़े परिवार को बाहर रखा जायेगा। हालांकि विपक्षी दलों ने सीएम सरमा को अपने पिता के 5 पुत्रों के बड़े परिवार का हिस्सा होने पर निशाने पर लिया है। लेकिन हमारा कहना है कि सरमा को इसके लिये जि़म्मेदार ठहराना सही नहीं है।

      यह भी सच है कि आज से चार पांच दशक पहले सरमा ही नहीं लगभग सभी के परिवार बड़े ही होते थे। बहरहाल सीएम सरमा का यह कहना कि असम की तमाम सामाजिक बुराइयों पर लगाम लगाने लिये ज़रूरी है कि प्रवासी मुसलमान परिवार नियोजन को अपनायेंअपने आप में सियासी बिल्ली थैले से बाहर आ जाना है। यह उनका एक तरह से राजनीतिक बयान माना जा रहा है। इससे वे अपने हिंदू वोट बैंक को खुश करना चाहते हैं। इसकी वजह यह है कि सरमा ने इस कानून से अनुसूचित जाति जनजाति और विकीपीडिया के अनुसार असम की सबसे बड़े यानी 65 लाख की जनसंख्या वाले चायबागान वर्ग को बाहर रखा है। यही कारण है कि अगर विपक्षी दलों के आरोप के अनुसार यह कानून पक्षपातपूर्ण और एक वर्ग विशेष को नुकसान पहंुचाने की नीयत से लागू करने की संविधान विरोधी कोशिश की गयी तो इसको सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जायेगी।

      ज़ाहिर है वहां मराठा और पटेल आरक्षण की तरह यह टिक नहीं पायेगा। सरमा ने हालांकि अपने बयान को बैलंेस करने के लिये यह भी कहा कि प्रवासी मुसलमानों की गरीबी दूर करने के लिये मुस्लिम महिलाओं को शिक्षित किया जाना चाहिये। उनका कहना है कि ऐसा करने से ना केवल मुस्लिम परिवारों में बच्चे कम होंगे बल्कि उनकी गरीबी भी दूर होने लगेगी। सरमा का दावा है कि असम के जाने माने मुस्लिम दल एआईयूडीएफ के मुखिया बदरूद्दीन अजमल ने उनसे मिलकर मुस्लिम महिलाओं को शिक्षित किये जाने का समर्थन किया है। ज़ाहिर बात है कि अजमल ही नहीं कोई भी समझदार और दूरदर्शी प्रगतिशील नेता अपने समाज की महिलाओं को शिक्षित किये जाने का विरोध नहीं कर सकता। दरअसल यही वह पेंच है जिसको सरमा वोट बैंक की राजनीति की वजह से छिपा लेना चाहते हैं।

      सच तो यह है कि अगर जनता के सब वर्गों में शिक्षा और सम्पन्नता बढ़ेगी तो खुद ब खुद लोग परिवार नियोजन अपनाने लगेंगे। लेकिन सरकार बड़े परिवारों को शिक्षा रोज़गार और अन्य सरकारी सुविधाओें से वंचित करके उल्टा काम कर रही है। जिस तरह से केरल सरकार ने राज्य में लगभग शत प्रतिशत शिक्षा का लक्ष्य हासिल करके गरीबी और बड़े परिवारों की समस्या से छुटकारा पाया है। वही माॅडल असम ही नहीं पूरे देश में अपनाया जाना चाहिये। वहां हिंदू मुस्लिम सभी में शिक्षा और परिवार नियोजन बिना किसी सरकारी दंड के खुद ब खुद लोगों ने अपनाया है। अगर बड़े परिवारों की वजह धर्म होता तो कश्मीर की टीएफआर1.6 नहीं हो गयी होती। असम में 2017 में जनसंख्या एवं महिला सशक्तिकरण नीति बनाई गयी थी। इसी नीति पर अमल करते हुए2019 में तय किया गया था कि वो लोग जिनकेे दो से अधिक बच्चे होंगे वे असम सरकार में जनवरी 2021 से नौकरी हासिल नहीं कर सकेंगे।

      राजस्थान एमपी महाराष्ट्र में ऐसे कानून पहले से ही लागू हैं। इसके बाद असम सरकार ने असम पंचायत एक्ट को 2018 में संशोधित कर यह नियम जोड़ दिया कि जिनके दो से अधिक बच्चे होंगे वो लोग पंचायत चुनाव नहीं लड़ सकेंगे। ऐसा ही कानून देश के आधा दर्जन से अधिक राज्यों तेलंगाना उड़ीसा उत्तराखंड आंध्रा गुजरात महाराष्ट्र और राजस्थान में मौजूद है। सवाल यह है कि नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे के अनुसार पूरे देश में शिशु जन्म दर जब 1992-93 की 3.4 से घटकर 2015-16 में2.2 तक आ गयी है। जबकि आबादी को बढ़ने से रोकने के लिये सरकार का आदर्श लक्ष्य इसको सब राज्यों में 2.1 बनाये रखना है। साथ ही सरकारी आंकड़े गवाह है कि यह टीएफआर असम में 1.9 तक नीचे आ चुकी है तो फिर असम सरकार की वास्तविक चिंता और छिपा हुए एजेंडा क्या हैनेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-3 की 2005-06 की रिपोर्ट बताती है कि वहां हिंदू आबादी की जन्म दर 1.95 थी तो मुस्लिम आबादी 3.64 की दर से बढ़ रही थी। यह अंतर वास्तव में चिंताजनक था।

      लेकिन एनएफएचएस -5 का सर्वे बताता है कि मुस्लिम प्रजनन दर एतिहासिक रूप से1.24 घटकर 2.4 तक आ गयी है। जबकि इस दौरान हिंदू जन्म दर मात्र 0.35 ही घटी है। इसका मतलब यह है कि ऐसा लोगों खासतौर पर महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढ़ने गरीबी घटने और जागरूकता आने से हुआ है। परिवार नियोजन करने के लिये असम या किसी भी सरकार को जनता चाहे किसी भी धर्म जाति भाषा या क्षेत्र की हो डराने ललचाने या सरकारी सुविधाऐं छीन लेने के लिये धमकाने की ज़रूरत नहीं है। अगर अधिक बच्चे होने का कारण धर्म को माना जाये तो केरल में ईसाई मुसलमान और हिंदू लगभग बराबर होने के बावजूद सबका परिवार शिक्षित और छोटा होना और यूपी में 3.5 बिहार मेें 3.7 जन्मदर हिंदू बहुसंख्यक होने के बावजूद पूरे देश में सब से अधिक होना विरोधाभासी तथ्य है। केंद्र सरकार और सभी राज्य सरकारों को चाहिये कि वे बिना भेदभाव बिना सियासी लाभ और अपने अपने वोटबैंक की परवाह किये सबके लिये समान परिवार नियोजन की नीति बनायें।                                             

0 लेखक नवभारतटाइम्सडाॅटकाम के ब्लाॅगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।।         

Friday, 25 June 2021

राहुल कैसे बनेंगे पीएम?

2024 में राहुल गांधी पीएम कैसे बन सकते हैं?

0चुनावी रण्नीतिज्ञ प्रशांत किशोर ने कहा है कि2024 में राहुल गांधी सबको आश्चर्यचकित करते हुए देश के बड़े राजनेता बनकर उभरेंगे और देखते देखते ही शीर्ष पद तक पहुंच जायेंगे। हालांकि अभी यह बात अतिश्योक्ति लग सकती है। लेकिन यह भी सच है कि जिस तरह से संघ परिवार भाजपा उसका आईटी सेल मोदी सरकार और मेनस्ट्रीम मीडिया हाथ धोकर एकमात्र विपक्षी नेता राहुल गांधी के पीछे पड़े रहता है। उससे यह ज़रूर लगता है कि उनको सबसे बड़ा खतरा राहुल से ही नज़र आता है। कांग्रेसमुक्त भारत का नारा भी इसीलिये दिया गया था। लेकिन उनको रोकने बदनाम करने की तमाम कोशिशों के बावजूद कांग्रेस और राहुल आज भाजपा के लिये सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं।     

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   राहुल गांधी को पप्पू’ साबित करने के लिये लंबे समय से एक सोचा समझा अभियान खासतौर पर सोशल मीडिया में चलता रहा है। नेहरू से लेकर राजीव गांधी सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी तक को इस मकसद को पूरा करने के लिये समय समय पर निशाने पर लिया जाता है। यहां तक कि उनका चरित्र हनन करने से भी परहेज़ नहीं किया जाता क्योंकि ऐसा करने वाले जानते हैं कि वर्तमान सत्ता के रहते उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही होने का कोई जोखिम भी नहीं है। आज करोड़ों रूपये का खर्च राहुल गांधी की छवि बिगाड़ने के एजेंडे पर ही किया जा रहा है। हैरत और मज़ाक की बात यह है कि राहुल गांधी न तो किसी राज्य के सीएम हैं और न ही पीएम यहां तक कि वे कांग्रेस के प्रेसीडेंट या विरोधी दल के नेतामंत्री या किसी सरकारी आयोग के मुखिया तक नहीं हैं। सबको पता है कि राहुल गांधी ने छोटी सी उम्र में अपनी दादी प्रधनमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या देखी। इसके कुछ साल बाद ही उनके पिता पीएम राजीव गांधी की भी हत्या हो गयी। इसके बाद जब उनकी मां सोनिया गांधी ने दो टूक ऐलान कर दिया था कि वे अपने बच्चों की सुरक्षा के लिये कभी भी राजनीति में नहीं आयेंगी। शायद देश के हालात जनता की बेहाली और अन्य नेताओं की मनमानी ने सोनिया को मजबूर किया कि वे सियासत में आयें। सोनिया को बहुमत होने के बावजूद पीएम बनने से रोका गया। राहुल गांधी ने तमाम दबाव पड़ने के बावजूद खुद कोई लाभ का पद नहीं लिया। लेकिन जब भी देश में कुछ गलत होता है। मोदी सरकार से सवाल करने की बजाये गोदी मीडिया और सत्ताधारी दल द्वारा उल्टा राहुल गांधी से जवाब तलब किया जाता है। अजीब बात यह है कि कांग्रेस 2014 के बाद2019 का लोकसभा ही नहीं एक के बाद राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हारती जा रही है। यहां तक कि बड़ी मुश्किल से कांग्रेस राजस्थान एमपी और 36 गढ़ के चुनाव जीती थी। वहां भी एमपी में उसकी सरकार समय पूरा होने से पहले ही गिरा दी गयी। राजस्थान में कांग्रेस सरकार गिरते गिरते बची। जबकि कर्नाटक में उसकी गठबंधन सरकार और पुडुचेरी में पूर्ण बहुमत की सरकार साम दाम दंड भेद से चुनाव आने से पहले ही तख्तापलट का शिकार हो गयी। इतना ही नहीं जहां जहां कांग्रेस की सरकार बची हुयी है। वे कब उसके विधायकों के दल बदल या त्यागपत्र देने से हिल जायेंगी। यह भी कोई पक्का दावा नहीं कर सकता। सवाल यह है कि जब कांग्रेस और राहुल गांधी की सियासी हालत इतनी खराब और कमज़ोर हो चुकी है तो भाजपा को उनसे सबसे ज़्यादा डर क्यों लगता हैसंघ परिवार उनके बारे में बात करना उनकी हर बात पर वार करना और उनको गलत साबित करने करने को ज़मीन आसमान एक करने में क्यों लगा रहता हैइसकी वजह यह भी है कि राहुल गांधी अपने खिलाफ लगातार चलने वाले दुष्प्रचार के बावजूद दिन ब दिन मज़बूत परिपक्व और संस्कारी नेता की छवि बनाने मेें सफल होते नज़र आ रहे हैं। इस देश के लोगों की एक खूबी संघ परिवार को और डरा रही है कि आप जिसको लगातार टार्गेट करोगे। उससे जनता की सहानुभूति बढ़ने लगती है। ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल इसके जीते जागते सबूत हैं। लाख जतन करके भी भाजपा इनसे पार नहीं पा सकी है। आज हालत यह है कि मोदी सरकार लगभग हर मोर्चे पर मात खाती जा रही है। जबकि राहुल गांधी अर्थव्यवस्था से लेकर किसान मज़दूर गरीब महंगाई शिक्षा रोज़गार चिकित्सा कालाधन कश्मीर और कोरोना से निबटने को जो कुछ कहते हैं। उसकी हाथो हाथ मोदी सरकार के कई मंत्री और भाजपा नेता व प्रवक्ता प्रैस वार्ता कर खिंचाई करने के बाद कुछ समय बाद ठीक वही फैसले करने को मजबूर हो जाते हैं। जो राहुल कहते हैं। तमाम आरोपों के बावजूद कांग्रेस सरकारें मोदी सरकार से कई मामलों में बेहतर भी थीं। इससे देश की जनता को धीरे धीरे यह अहसास होने लगा है कि भाजपा और मोदी भले ही चुनाव जीतने या उनका दिल जीतने में बार बार सफल और कांग्रेस और राहुल ऐसा करने में उनकी चालबाज़ी लफ्फाजी तिगड़म झूठ मीडिया सेटिंग लंबे चैड़े वायदों और दावों की सफल मार्केटिंग विपक्षी नेताओं विधायकों और सांसदों का दलबदल या इस्तीफा और पूंजीपतियों से सांठगांठ करके सूटबूट की सरकार चलाने को सत्ता में ना आ पा रहे हों,लेकिन राहुल जो कुछ कह रहे हैं। वह मोदी सरकार और भाजपा की राज्य सरकारों के मुकाबले अधिक बेहतर जनहित सत्यता वास्तविकता व्यवहारिकता सबके विकास अहिंसा धर्मनिर्पेक्षता और निष्पक्षता पर आधारित है। दरअसल यही वो असली डर है जो भाजपा और संघ को राहुल से खौफज़दा रखता है। हम चुनावी विशेषज्ञ प्रशांत किशोर की 2024 में राहुल के अचानक पीएम बन जाने की भविष्यवाणी का आधार तो नहीं जानते लेकिन इतना तय है कि खुद मोदी सरकार और भाजपा की राज्यों की सरकारें जिस तरह से साम्प्रदायिकता कट्टरपंथ अंधविश्वास पंूजीवाद महंगाई बेरोज़गारी कानून व्यवस्था भ्रष्टाचार कालाधन विकास पर लगातार असफल होती नज़र आ रही हैं। उससे वे लंबे समय तक जनता को बहुसंख्यक भावनाओं हिंदुत्व हिंदूराष्ट्र का सपना मुसलमान विरोध विपक्ष को विलेन बनाना पाकिस्तान कश्मीर समान नागरिक संहिता सीएए एनआरसी पर उत्तेजित करके जीतने लायक वोट नहीं पा सकती। कांगे्रस और राहुल की तमाम कमियों नालायकी नाकामियों और गल्तियों के बावजूद जिस दिन जनता ने बढ़ती समस्याओं से तंग आ कर मोदी और भाजपा की सरकार से मुक्ति पाने का मन बना लिया वह उस दिन सारे हथकंडे फेल कर किसी क्षेत्रीय दल या राज्य स्तर केे नेता की बजाये कांग्रेस और राहुल गांधी को ही सरकार बनाने का अवसर देगी।

Tuesday, 15 June 2021

सोशल मीडिया पर लगाम...


सोशल मीडिया पर लगाम लगा सकेगी सरकार?

0प्रिंट और इलेक्ट्राॅनिक मीडिया पर काफी हद तक अपना कंट्रोल बना लेने के बाद अब केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया पर नकेल कसनी शुरू कर दी है। हालांकि इसकी वजह सरकार ने कानून व्यवस्था देशहित और राष्ट्रविरोधी व फेक कंटेन्ट को डिजिटल प्लेटफाॅर्म से हटाने की ज़रूरत बताया है। लेकिन जानकार सूत्रों का दावा है कि सरकार अपने खिलाफ कहीं भी कुछ भी सामाग्री जनता तक नहीं पहुंचने देना चाहती। इसीलिये ये सब कवायद चल रही है।     

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   पहले फेसबुक फिर ट्विटर और बाद में व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्म को सरकार के सामने घुटने टेकने को मजबूर होना पड़ा है। हालांकि शुरू में ये विश्व स्तरीय मीडिया कोर्ट की शरण में गया। लेकिन वहां से सरकार के आदेश के खिलाफ कोई स्टे आॅर्डर ना मिलने से ना चाहते हुए भी इनको केंद्र सरकार का आदेश तत्काल प्रभाव से मानते हुए भारत में इस मीडिया एप से जुड़े मामलों की शिकायत सुनने वाले उस पर फैसला करने वाले और उस निर्णय का अनुपालन निर्धारित समय अवधि में कराने वाले अधिकारी नियुक्त करने पड़े हैं। हालांकि यह सवाल अभी तक अपनी जगह मौजूद है कि जब व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया एप का दावा यह  है कि उनके ज़रिये होने वाली चैट एंड टू एंड एंक्रिप्ट है तो वे सरकार विरोधी संदेश पढ़ेंगे कैसेऔर अगर वे ये सब मैसेज पढ़ेंगे नहीं तो फिर आपत्तिजनक पोस्ट पकड़ेंगे कैसेयानी सरकार को रिपोर्ट कैसे करेंगेसाथ ही व्हाट्सएप पर रोज़ आने वाले अरबों मैसेज आॅडियो वीडियो को क्या चैक करनाउनमें से भारत सरकार द्वारा बताये गये संदेशों को एप से हटाना और उस पोस्ट को पहली बार भेजने वाले की सारी जानकारी कानूनी कार्यवाही के लिये सरकार को सौंपना और सरकार का इन सबके खिलाफ लगातार कार्यवाही करना व्यावहारिक और संभव होगा?क्या ऐसा करने से व्हाट्सएप की गोपनीयता लोकप्रियता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुरक्षित रह जायेगीइस मामले में ट्विटर का मामला कुछ अलग है क्योंकि उसके मैसेज तो ओपन टू आॅल होते हैं। उनको कोई भी पढ़ सकता है। चैक कर सकता है। ज़ाहिर है कि जब उनको पढ़ा देखा और सुना जा सकता है तो उनपर पुलिस प्रशासन या शासन यहां तक कि शिकायत करने पर खुद ट्विटर भी एक्शन ले सकता है। और अभी भी ऐसे मामलों में कार्यवाही होती ही रही है। जहां तक फेसबुक का सवाल है तो उसने तो बहुत पहले ही भारत सरकार की शर्तें मानकर सरकार को पंसद ना आने वाली सामाग्री अपनी साइट से हटाने ब्लाॅक करने या उस एकाउंट की जानकारी देने का समझौता कर लिया था। उसने भारत मेें अपना एक प्रमुख अधिकारी भी नियुक्त कर दिया था। जो बहुत पहले ही ऐसी सभी जानाकरी पोस्ट और कमेंट हटाने रोकने और ब्लाॅक करने का काम अंजाक दे रहा है। जो सरकार को नापसंद होती है। इसके अलावा जो अन्य एप या ओटीटी प्लेटफाॅर्म हैं। उनकी तो सरकार से इस मुद्दे पर भिड़ने की हैसियत ही नहीं थी। सो उन्होंने बिना ना नुकुर के सरकार के सामने पहली बार में चेतावनी मिलते ही हथियार डाल दिये थे। सरकार ने जब देखा कि सोशल मीडिया के बड़े बड़े विशालकाय खिलाड़ी उसके सामने अपने व्यवसायिक हितों की खातिर एक ही धमकी में झुक चुके हैं तो उसने अन्य सभी डिजिटल न्यूज ओटीटी और सोशल मीडिया को नये आई टी नियमों का पालन 15 दिन के भीतर सुनिश्चित करने की डैडलाइन जारी कर दी। सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावडे़कर ने इस आश्य का आदेश विगत दिनों जारी किया है। मजे़दार बात यह है कि सरकार ने ऐसा करने की वजह सोशल मीडिया पर फर्जी पोस्ट रोकना मुख्य बताया है। जबकि सबसे अधिक फर्जी पोस्ट कौन करता हैउनको किसका संरक्षण मिला हुआ है? 250सदस्य वाले 10 लाख व्हाट्सएप गु्रप किसने बना रखे हैंकौन किसके किसके खिलाफ पूरे देश में झूठ और नफरत फैला रहा हैकौन जनता के दिमाग पर सोशल मीडिया के द्वारा कब्ज़ा करके राजनीतिक लाभ उठा रहा है?कौन एक रूपया दो रूपया और पांच रूपया खर्च कर ट्विटर पर अपने फाॅलोवर खरीदता हैकौन रोज़ एक पोस्ट को पैसे देकर ट्रेंड कराता हैकौन रोज़ कोई ना कोई हैशटैग चलाकर अपने विरोधियों को बदनाम करता है?कौन फर्जी टूलकिट चलाता हैकौन कुछ दल कुछ नेताओं और कुछ धर्म विशेष के लोगों को देश की हर समस्या के लिये जि़म्मेदार ठहराकर उनके खिलाफ जंग का सा माहौल बनाता है?किसने अपनी छवि सोशल मीडिया पर फर्जी करोड़ों फाॅलोवर खरीदकर सबसे अधिक चमकाई हैऐसे और भी अनेक सवाल यहां उठाये जा सकते हैं। लेकिन देखने में यह आ रहा है कि अख़बार मैग्जीन और टीवी चैनलों को अपने हिसाब से चलने को मजबूर करने के बाद अब जो थोड़ा बहुत सच वास्तविकता और अन्याय शोषण व धोखा सोशल मीडिया की वजह से जनता की नज़र में आ रहा था। अब उस पर भी रोक लगाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। कहने को सोशल मीडिया को नोडल अफसर कंपलेंट अफसर और कंप्लाएंस अफसर रखकर शासन प्रशासन पुलिस द्वारा आपत्तिजनक बताये गये कंटेट और पोस्ट को24 से 36 घंटे में हर हाल में हटाना होगा। राष्ट्रहित राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून व्यवस्था के नाम पर अब तक 7 साल में किस तरह की सोच के लोगों को सराकर ने निशाना बनाया है। सोशल मीडिया पर भी इसी बहाने किन लोगों को सरकार सबक सिखायेगी यह किसी से छिपा नहीं है। शायद यही वजह है कि आज हमारे देश के लोकतंत्र सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया को लेकर विदेशी मीडिया में ज़बरदस्त चर्चा हो रही है। यह देखना दिलचस्प होगा कि सोशल मीडिया पर लगाम लगने के बाद क्या जनता का वो वर्ग जो सरकार की गलत नीतियों जनविरोधी कदमों और पंूजीपरस्त फैसलों का हर हाल में विरोध जारी रखना चाहता हैवो सोशल मीडिया का क्या विकल्प तलाश करता है?