Monday, 14 December 2020

किसान और पक्ष विपक्ष

किसान के लिये क्या सत्तापक्ष क्या विपक्ष!

0किसान आंदोलन चलते हुए दो सप्ताह से अधिक बीत चुके हैं। लेकिन सरकार उनकी भलाई के नाम पर बनाये गये तीनों नये कानून बिना शर्त वापस लेने को किसी कीमत पर तैयार नहीं है। विडंबना यह है कि जो विपक्ष यानी कांग्रेस और क्षेत्रीय दल आज किसानों की हमदर्दी में मगरमच्छ वाले आंसू बहा रहे हैं। वे कल तक सत्ता में रहते वही सब कुछ कर रहे थे। जो कि आज भाजपा कर रही है। जबकि भाजपा विपक्ष में रहते किसानों के लिये बड़े बड़े दावे और वादे करती थी।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   आज देश में कॉरपोरेट सैक्टर इतना मज़बूत हो चुका है कि सरकार चाहे कांग्रेस की हो भाजपा की हो या सेकुलर क्षेत्रीय दलों की लेकिन वे सब सत्ता में तो गरीब कमज़ोर और पिछड़े व किसानों का वोट लेकर आती हैं। मगर सरकार बनते ही वे काम अधिकांश पूंजीपति उद्योगपति और व्यापारियों के पक्ष में करने लगती हैं। मिसाल के तौर पर कर्नाटक में हाल ही में एक कानून पास हुआ है। जिसमेें कृषि भूमि खरीदने के लिये किसी का कृषक होने की शर्त हटा दी गयी है। कर्नाटक में भाजपा सरकार है। उसने यह भी नहीं परवाह की कि आजकल किसान पहले ही अपनी मांगों को लेकर बड़ा विरोध आंदोलन चला रहा है। भाजपा का रूख़ किसानों को लेकर किसी से छिपा हुआ नहीं है। लेकिन हैरत और दुख की बात यह है कि वहां की क्षेत्रीय पार्टी जनता दल सेकुलर ने कानून में इस संशोधन का खुलकर समर्थन किया है। हालांकि इसके लिये उसकी पूर्व सहयोगी कांग्रेस और दूसरी विरोधी पार्टियोें के साथ ही किसान संगठन भी जमकर आलोचना कर रहे हैं। लेकिन जद सेकुलर के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री कुमार स्वामी को इसमें कुछ गलत नहीं लगता। उनको एक बार फिर पहले की तरह कांग्रेस की बजाये भाजपा के साथ दिखना अच्छा लग रहा है। हालत यह है कि सत्ता का सुख पाने को कुमार स्वामी किसानों के खिलाफ जाने में भी शर्म महसूस नहीं कर रहे। इतना ही नहीं पंजाब के अकाली दल ने किसानों के पक्ष में हालांकि मोदी सरकार से समर्थन वापस ले लिया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन तीन कानूनों को लाने के बाद ही केंद्र सरकार अचानक किसान विरोधी हो गयीनहीं सबको पता है कि 2014से ही मोदी सरकार हिंदुत्व के नाम पर खुलकर कॉरपोरेट के साथ खड़ी है। ऐसे में जब सरकार आवारा पंूजी यानी कॉरपोरेट के साथ है तो वह किसानों के हित में लाख दावे करे लेकिन उनका भला कर ही नहीं सकती। लेकिन अकाली दल केंद्र की सत्ता में तब तक भाजपा के साथ बना रहा जब तक कि खुद किसान खुलकर अकाली भाजपा गठबंधन के खिलाफ मैदान में नहीं उतर आये। अकाली दल को किसानों के कांग्रेस के साथ जाने का डर था। ऐसे ही आप बिहार में भाजपा के गठबंधन सहयोगी जनता दल यूनाइटेड का नाटक देख सकते हैं। एक तरफ नीतीश कुमार किसानों के साथ होने का दावा करते हैं। दूसरी तरफ किसान विरोधी बिलों को पास कराने में संसद में उनको कोई दिक्कत नहीं होती है। इतना ही नहीं आंकड़े बताते हैं कि पांच प्रतिशत से भी कम किसानों को बिहार में अपनी फसल एमएसपी पर बेचने का अवसर मिलता है। साथ ही एक दशक पहले ही नीतीश सरकार एपीएमसी और मंडी समिति में न्यूनतम समर्थन मूल्य के खिलाफ किसानों की फसल मंडी से बाहर खरीदने को निजी क्षेत्र को अनुमति दे चुकी है। हरियाणा में दुष्यंत चौटाला की क्षेत्रीय पार्टी भाजपा के साथ सरकार में बने रहने के लिये लगातार दोहरा खेल खेल रही है। वह भाजपा को किसानों से बात करने उनका आंदोलन ख़त्म करने को उनकी मांगे मानने और किसानों पर बल प्रयोग ना करने की बार बार नेक सलाह तो दे रही है। लेकिन मोदी सरकार द्वारा कानून किसी हाल में वापस ना लेेने के दो टूक ऐलान और किसानों को दिल्ली में घुसने से रोकने को अवरोध लगाने पानी की बौछार करने और किसानों पर तरह तरह आरोप लगाने पर वह चुप्पी साधे बैठी है। इतना ही नहीं वामपंथियों व लोकदल को छोड़कर सपा बसपा शिवसेना टीएमसी टीआरएस एनसीपी द्रमुक अन्नाद्रमुक एजीपी एआईएमआईएम वाईएसआर कांग्रेस आम आदमी पार्टी जैसी क्षेत्रीय और धर्मनिर्पेक्ष पार्टियां मात्र किसानों के पक्ष में बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करती दिखाई दे रही हैं। वजह यह है कि इनका झुकाव भी बड़े पूंजीपतियों की तरफ हो रहा है। यह बड़े अफसोस और चिंता की बात है कि जिस किसान को देश का अन्नदाता माना जाता है। उसको आज सरकार ही नहीं लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपनी लड़ाई खुद लड़ने के लिये अकेला छोड़ दिया है। कहने को देश में लोकतंत्र है। विपक्ष है। न्यायालय हैं। मीडिया है। लेकिन किसानों की पीड़ा सरकार ही नहीं बाकी सब भी समझने को तैयार नहीं हैं। इतना ही नहीं हर सरकार और सियासी पार्टी किसानों से वोट लेकर सत्ता का सुख तो भोगना चाहती है। लेकिन जिस पंूजीपति से नोट लेती है। जब कानून बनाने की बात आती है तो उस कॉरपोरेट के पक्ष में पूरी बशर्मी और अनैतिकता के साथ खड़ी नज़र आती है। इसकी वजह हालांकि हमारे किसानों में भी अन्य वर्गों व समुदायों की तरह ही धर्म और जाति के नाम पर भावुक होकर वोट देने की पुरानी बीमारी भी है। लेकिन इसका नुकसान आज यह हो रहा है कि भाजपा और मीडिया मिलकर एक सुर में किसानों के जायज़ आंदोलन को तरह तरह के गंभीर आरोप लगाकर ना केवल बदनाम कर रहे हैं। बल्कि यह अहंकारी दावा भी कर रहे हैं कि ये मुट्ठीभर किसान विपक्ष खालिस्तानियों माओवादियों पाकिस्तानियों चीनियों और देशविरोधी शक्तियों के हाथों में खेलकर गुमराह हो गये हैं। जबकि अधिकंाश किसान उनके साथ है। इसका प्रमाण वे यह कहकर देते हैं कि देश में लोकसभा से लेकर तमाम विधानसभाओं पंचायतों स्थानीय निकाय और अन्य उपचुनाव भाजपा लगातार किसानों के वोट और सपोर्ट के बिना नहीं जीत सकती थी। भाजपा की इस बात में काफी दम भी नज़र आता है। लेकिन सवाल तो यह है कि किसानों की समझ में यह बात जाने कैसे और कब तक आयेगी???                            

Saturday, 5 December 2020

किसान आंदोलन

सरकारकिसान और कॉरपोरेट!

0मोदी सरकार का वादा था कि वह 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देगी। लेकिन जब से सरकार ने खेती को लेकर तीन नये कानून बनाये हैं। तब से पूरे देश का किसान इनके खिलाफ आंदोलन कर रहा है। कृषि विशेषज्ञों का दावा है कि सरकार के इन कानूनों से केवल उद्योग जगत को ही लाभ होगा। सवाल यह है कि सरकार किसान और कॉरपोरेट के परस्पर विरोधी हितों को एक साथ कैसे साध सकती है?    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   अगर आप किसानों से जुड़े विवादित तीनों नये कानूनों को विस्तार से पढ़ेंगे तो आपको पता चलेगा कि ये यूपीए की मनमोहन सरकार के ड्रॉफ्ट का ही एक हिस्सा हैं। दरअसल 1991में जब कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ने देश को मिश्रित अर्थव्यवस्था यानी समाजवादी प्लस पूंजीवादी से निकालकर एल पी जी मतलब लिबरल प्राइवेट और ग्लोबल की तरफ ले जाने का एकतरफा निर्णय किया था। तब से ही ऐसे कानूनों की नींव पड़ गयी थी। यहां तक कि जीएसटी आधार सब्सिडी रिटेल एफडीआई और मज़दूर विरोधी श्रम कानून तक का मसौदा कांग्रेस नीतिगत रूप से पहले ही तैयार कर गयी थी। लेकिन जनविरोध बढ़ता देख उसकी हिम्मत इनको इस तरह से लागू करने की नहीं हो सकी जिस तरह से आज मोदी सरकार कर रही है। सच तो यह है कि मोदी सरकार का नोटबंदी का ही एकमात्र नया विचार था। जो बुरी तरह ना केवल नाकाम हो गया बल्कि इसने अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया। किसान नये कानूनों को ठीक से जानते भी नहीं। ना ही इनको बनाते समय किसान नेताओं उनकी यूनियनों या कृषि विशेषज्ञों से ठीक से व्यापक विचार विमर्श ही किया गया। किसानों का सबसे बड़ा विरोध इन कानूनों केे ज़रिये एमएसपी यानी फसलों का मिनिमम सपोर्ट प्राइस ख़त्म करना है। अब तक किसानों को अन्याय और शोषण से बचाने का सबसे बड़ा सुरक्षा कवच एमएसपी ही था। इतना ही नहीं इन नये कानूनों के अनुसार किसान के साथ अब अगर प्राइवेट पार्टी पक्षपात और बेईमानी करेगी तो वह कोर्ट भी नहीं जा सकेगा। स्वामीनाथन कमैटी की सिफारिश के मुताबिक एमएसपी तय करना और अनुबंध की शर्तों को तोड़ने के खिलाफ किसान को अदालत जाने का सबसे बड़ा अधिकार दिया जाना था। सबको पता है कि सरकार खुलकर कॉरपोरेट के हाथों में खेल रही है। इसकी वजह2014 से मोटे चुनावी चंदे से चुनाव लड़वाने और हर सरकारी मामले में दख़ल देने की कॉरपोरेट की बढ़ती दिलचस्पी को साफ देखा जा सकता है। यह भी किसी से छिपा नहीं रह गया है कि कॉरपोरेट सबसे अधिक किस पार्टी और किस नेता का चहेता बना हुआ है। यह भी आईने की तरह साफ है कि आज़ादी के बाद से कौन सी सरकार खुलेआम पूरी बेशर्मी और ढीटता के साथ जनविरोधी निर्णय कॉरपोरेट के पक्ष में एक के बाद एक करती रही है। लेकिन यहां यह भी सोचना चाहिये कि जब यही जनता और किसान चुनाव के समय मतदान करते हुए हिंदू मुसलमान बनकर भावनात्मक मुद्दों पर अपने हितों के खिलाफ ही वोट देते हुए ज़रा भी नहीं हिचकता तो क्यों नहीं सरकार उन पूंजीपतियों के हित में झुके जो अपनी पाई पाई का चंदा देते हुए सरकार बनने के बनने के बाद उसको करोड़ों अरबों के लाभ में वसूलने की समझ और ताकत कहीं अधिक रखता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि कांग्रेस शासित पंजाब के किसान ही आंदोलन में आगे क्यों हैं?सच यह है  कि पंजाब का किसान बहुत मज़बूत और जागरूक है। वह अकेला ही हरित क्रांति के तहत देश की ज़रूरत का 80 प्रतिशत गेंहू उगाता है। इतना ही नहीं भाजपा शासित हरियाणा का किसान भी कंध्ेा से कंधा मिलाकर सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरा है। कुल 40 किसान मज़दूर यूनियनों की अपील पर यूपी उड़ीसा कर्नाटक बंगाल और केरल राज्य का किसान भी सरकार के इन तीनों कानूनों का तीखा विरोध कर रहा है। यह बात आंशिक रूप से सही हो सकती है कि अधिकांश भाजपा शासित राज्यों के कुछ किसान अभी भी मोदी सरकार पर यह विश्वास करके चुप्पी साधे हों कि मोदी उनका नुकसान कर ही नहीं सकते। हालांकि कृषि संविधान के हिसाब से राज्यों का विषय है। लेकिन मोदी सरकार ने इस पर खुद तीन कानून बनाकर इसके खिलाफ बनाये गये पंजाब सरकार के कानून को भी ओवरटेक कर दिया है। फिर सवाल यह भी है कि क्या भाजपा के राज्यपाल और राष्ट्रपति पंजाब सरकार के इस केंद्र विरोधी कानून को हस्ताक्षर कर मान्यता देंगेअगर यह मामला कोर्ट जायेगा तो वहां के हालात देखते हुए लगता नहीं कि कोर्ट इस मामले में केंद्र के खिलाफ कोई स्टे करेगाएक सवाल यह उठ रहा है कि किसानों ने आंदोलन करने से पहले सरकार से बात क्यों नहीं कीविरोध प्रदर्शन करने से पहले किसान प्रतिनिधि तीन बार सरकार से बात करने दिल्ली आये लेकिन कृषि मंत्री ने उनको मिलने का टाइम तक नहीं दिया। सरकार की नीयत में खोट इससे भी पता चलता है कि वह एमएसपी नहीं हटाने का दावा तो कर रही है। लेकिन इसको कानूनी रूप देने को तैयार नहीं है क्योंकि इससे उसका चहेता कॉरपोरेट मनमाने दामों पर फ़सलें खरीदकर किसानों का शोषण नहीं कर सकेगाकिसानों का डर और नाराज़गी बिल्कुल वाजिब और जायज़ है कि सरकार जब किसानों को कॉरपोरेट के हवाले करके खुद बीच में से निकल जायेगी तो बड़े बड़े व्यापारी पंूजीपति उद्योगपति और विदेशी कंपनियां उनसे एग्रीमंेट के नाम पर ना केवल औने पौने दामों में बेशकीमती उपज एक तरह से लूट लेंगी बल्कि उनको बंधक बनाकर धीरे धीरे उनकी ज़मीनें भी एक दिन कब्ज़ा लेंगी जिससे वे या तो अपने ही खेतों में दिहाड़ी मज़दूर बन जायेंगे या फिर शहरों में आकर पेट भरने को रोज़गार तलाश करने को मजबूर हो जायेंगे। किसानों की यह मांग बिल्कुल सही और संवैधानिक है कि सरकार देश की आबादी के आधे से अधिक यानी किसानों को कॉरपोरेट के रहमो करम पर छोड़कर अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। अगर वह कॉरपोरेट सैक्टर को खेती किसानी में लाना चाहती है तो पहले किसान और खेतीहर मज़दूरों के लिये वैकल्पिक रोज़गार की व्यवस्था करना उसका कर्तव्य बनता है।                                       

लव जेहाद क्या है?

लव जेहाद है बहानाथोड़ी हक़ीक़तबाक़ी फ़साना!

0गृह राज्यमंत्री किशन रेड्डी ने केरल के चर्चित हादिया मामले में इसी साल 4 फ़रवरी को संसद में स्पश्ट किया था कि किसी भी केंद्रीय एजेंसी द्वारा लव जेहाद का कोई भी मामला आज तक रिकॉर्ड नहीं किया गया है। हालांकि हाल ही में यूपी सरकार ने इस आश्य का एक कानून बनाया है। लेकिन उसने भी इसमें लव जेहाद का कहीं उल्लेख नहीं किया है। भाजपा शासित एमपी सहित कई अन्य राज्य ऐसा ही कानून बनाने जा रहे हैं। लेकिन वे भी लव जेहाद शब्द से परहेज़ कर रहे हैं। कई प्रदेशों में धर्म परिवर्तन को लेकर पहले ही ऐसे कानून मौजूद हैं।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   आज़ादी के बाद ही जबरन धर्म परिवर्तन रोकने के लिये संसद मंे पहली बार 1954 में भारतीय विनियमन एवं पंजीकरण विधेयक लाया गया था। इसके बाद 1960 और 1979 में एक बार फिर से ऐसे ही विधेयक लाये गये लेकिन ये तीनों बार पास नहीं हो सके। अलबत्ता अलग अलग धर्मों और जातियों के लोगांे की शादी के लिये 1954 में स्पेशल मैरिज एक्ट ज़रूर बन गया था। इतना ही नहीं ऐसे अंतरधार्मिक और अंतरजातीय  विवाह करने वालों को सरकार की तरफ से कुछ प्रोत्साहन रााशि भी दी जाती रही है। लेकिन सवाल यह है कि अचानक लव जेहाद शब्द कहां से चर्चा में आ गयादरअसल देश की राजनीति धर्म जाति भाषा दंगों नफ़रत हिंसा क्षेत्र तरह तरह की भावनाओं और कोरे झूठ के नाम पर बहुत लंबे समय से सफलतापूर्वक चल रही है। ऐसे में यह स्वाभाविक ही है कि लव जेहाद जैसा फ़र्ज़ी और बनावटी शब्द घड़कर भी बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यकों के वोटों का ध्रुवीकरण आसानी से किया जा सकता है। आज संघ परिवार ने ऐसा माहौल बना दिया है। जिसमें मुसलमान होना दलित होना अल्पसंख्यक होना सेकुलर हिंदू होना निष्पक्ष नागरिक होना वामपंथी होना बुध््िदजीवी होना और मानवाधिकार समर्थक होना समानतावादी होना न्यायवादी और संविधानवादी होना आपको शक के दायरे में या हिंदू व राष्ट्र विरोधी मानकर अर्बन नक्सल आतंकवादी माओवादी पाकिस्तानी जेहादी ना जाने क्या क्या तमग़ों से नवाज़ा जा सकता है। सबको पता है कि एक देश में जब विभिन्न धर्मों के लोग साथ साथ रहते हैं तो उनमें हर तरह के रिश्ते बनना स्वाभाविक ही है। इसी तरह से हिंदू मुस्लिम लड़के लड़कियों के बीच प्रेम सम्बंध और शादी होना भी आम बात रही है। सवाल तब खड़ा होता है जब शादी के लिये लड़की का धर्म परिवर्तन कराया जाता है। सच यह भी है कि हिंदू समाज की लड़कियों की मुस्लिम लड़कों से ऐसी इंटरफेथ मैरिज ही अधिक होती रही हैं। साथ ही हिंदू लड़कियों का धर्म परिवर्तन ऐसे मामलों में हर हाल में किया जाता है। नहीं तो कोई मुस्लिम लड़का मज़हबी तौर पर ऐसी शादी कर नहीं सकता है। इसके उलट मुस्लिम लड़कियां अव्वल तो हिंदू लड़कों से इस तरह की शादियां कम ही करती हैं। लेकिन अब उनके केस भी काफी बड़ी तादाद में देखने में आ रहे हैं। साथ ही उन पर हिंदू बनने का आमतौर पर कोई दबाव भी नहीं होता है। इसकी वजह कोई सोचा समझा इस्लामी मिशन लव जेहाद या साज़िश नहीं बल्कि हिंदू आबादी80 प्रतिशत होना महिलाओं का बिना पर्दा रहना अधिक शिक्षित आध्ुानिकता प्रगतिशीलता उदारता व वैचारिक खुलापन है। जबकि मुस्लिम आबादी 15 फीसदी होना लड़कियों का पर्दे में रहना घर से अकेले बाहर ना निकलना कट्टरता दकियानूसी परंपरवादी तंगनज़र अशिक्षित या कम शिक्षित होना साथ ही प्रेम सम्बंध पकड़े जाने पर मौके पर ही जान से मार देने का ख़तरा अधिक होना आदि अनेक कारण हैं। जहां तक धर्म परिवर्तन का सवाल है। आज़ादी से पहले देश की चार रियासतों राजगढ़ में 1936 में पटना में 1942 में सरगुजा में 1945 में और उदयपुर में 1946 में हिंदुओं के ईसाई बनने से रोकने को ऐसे कानून बने थे। इसके बाद आज़ाद भारत में 10 मई 1995 को सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू पुरूषों के दूसरी शादी करने को इस्लाम अपनाने के बढ़ते मामले देखते हुए सरला मुदगल बनाम यूनियन आफ इंडिया केस में धर्म परिवर्तन के खिलाफ कानून बनाने की संभावना तलाशने को एक कमैटी बनाने का सुझाव दिया था। आज भी धर्म परिवर्तन रोकने को कोई कानून ना तो बना है और ना ही बनने की संभावना है। इसकी वजह यह है कि संविधान धर्म परिवर्तन करने और अपनी मर्जी के साथी से विवाह करने की इजाज़त देता है। इतना ज़रूर है कि किसी को डरा धमका कर या लालच देकर धर्म परिवर्तन नहीं कराया जा सकता। अब सवाल यह है कि जब संविधान में धर्म बदलने और किसी से भी शादी करने और गलत तरीके से धर्म बदलने पर कानूनी कार्यवाही करने का पहले से ही प्रावधान है तो लव जेहाद के नाम पर यूपी और अन्य भाजपा शासित राज्य इस बारे में नये कानून लाने पर क्यों ज़ोर दे रहे हैंतो इसका जवाब है हिंदू वोटों की राजनीतिइन कानूनों को आज नहीं तो कल कोर्ट में चुनौती मिलेगीजहां इनका संवैधानिक तौर पर टिकना मुश्किल होगा। सुप्रीम कोर्ट और राज्यों के हाईकोर्ट ना केवल ऐसे लगभग सभी मामलों में धर्म परिवर्तन और अंतरधार्मिक व अतंरजातीय विवाहोें को संरक्षण और मान्यता देते रहे हैं बल्कि उनके परिवार सरकार और पुलिस को ऐसे जोड़ों को परेशान करने डराने धमकाने पर जमकर फटकार भी लगाते रहे हैं। एमपी की सरकार भी यूपी की तरह लव जेहाद पर कानून लाने जा रही है। हालांकि वहां 1968 से ही ऐसा कानून मौजूद है। इसके साथ ही कर्नाटक हरियाणा असम में भी धर्म परिवर्तन के खिलापफ कानून लाने की चर्चा तेज़ हो गयी है। पहले तमिलनाडू सहित नौ राज्यों में ऐसे कानून रहे हैं। लेकिन2003 में वहां इस कानून को निरस्त कर दिया गया था। जबकि गुजरात झारखंड ओड़िशा हिमाचल प्रदेश अरूणाचल प्रदेश उत्तराखंड राजस्थान और एमपी में ऐसे कानून पहले से ही मौजूद हैं। पड़ौसी देशों को देखें तो पाकिस्तान नेपाल भूटान श्रीलंका और म्यांमार में भी धर्म परिवर्तन विरोधी कानून हैं। पाकिस्तान में तो जबरन धर्म परिवर्तन कराने पर उम्रकैद की सज़ा का प्रावधान है। लेकिन वहां कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम इसके बावजूद बड़े पैमाने पर अल्पसंख्यकों का बेखौफ धर्म परिवर्तन कराकर उनके समाज की लड़कियों से जबरन अपहरण करके शादी करते रहते हैं। भारत में भी हिंदू समाज में यह डर और नफरत बड़े पैमाने पर फैल चुकी है कि मुसलमान परिवार नियोजन तो अपनाते ही नहीं उल्टा लव जेहाद के बल पर एक दिन बहुसंख्यक बनकर भारत को इस्लामी देश बना सकते हैंइसी लिये लव जेहाद के खिलाफ कानून बनाने की होड़ लगी हुयी है।                                       

Monday, 23 November 2020

बिहार चुनाव

बिहार चुनाव परिणाम एक कारण अनेक!

एक बार फिर सारे एक्ज़िट पोल झूठे साबित हो गये। बिहार ही नहीं कई अन्य राज्यों में पहले भी कई बार ऐसा हो चुका है। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं पहले चरण के चुनाव में महागठबंधन ने दो तिहाई सीटें जीतीं हैं। दूसरे चरण में वह पिछड़ने के बावजूद लगभग बराबर पर आया तो तीसरे चरण में फिसलकर सीध्ेा एक चौथाई पर पहंुच गया। इसका बड़ा कारण महिलाओं का अधिक मतदान, एनडीए का चुनाव में उच्च जातियों का ध्रुवीकरण और एआईएमआईएम का मुस्लिम वोटों में सेंध लगाना माना जा रहा है।

-इक़बाल हिंदुस्तानी

कोरोना महामारी लॉकडाउन और आर्थिक मंदी से जीडीपी माईनस में जाने के बाद बिहार राज्य का पहला चुनाव था। जिस पर पूरे देश की नज़रें यह देखने के लिये लगी हुयी थीं कि क्या देश की राजनीति बदल रही है? लेकिन बिहार ने जवाब दे दिया है कि आज भी अपवादों को छोड़कर पहले की तरह मोदी का जलवा कायम है। यह ठीक है कि जब देश में केंद्र और राज्यों के स्तर पर लगभग सभी विपक्षी दल थके हारे और ढलान पर नज़र आ रहे हैं। ऐसे में आरजेडी के युवा नेता तेजस्वी यादव ने महागठबंधन का सफल नेतृत्व करते हुए बिहार में एनडीए के जनता दल यू व भाजपा को लोहे के चने चबाने पर मजबूर ही नहीं किया बल्कि मतगणना में अंत तक कांटे की टक्कर देकर सीएम से लेकर पीएम तक की सांसे रोक कर रख दी थी। इतना ही नहीं तेजस्वी ने अपने पिता के जेल में होने धन और अन्य संसाधनों की कमी होने और चुनाव से ठीक पहले अपने दल के कई बड़े नेताओं और सहयोगी छोटे दलों के साथ छोड़ने के बावजूद इतना शानदार और जानदार चुनाव लड़ा कि जीतने वाले भी उनका लोहा मानने पर मजबूर हो गये। सबसे बड़ा आकर्षक वादा महागठबंधन का सरकार बनते ही दस लाख सराकारी नौकरी देना था। लेकिन लालू यादव के जंगल राज का जैसे ही तेजस्वी को पीएम ने युवराज बताया, चुनावी समीकरण बदल गये। चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि दो तिहाई से अधिक उच्च जातियों का वोटर एनडीए के पक्ष में इसके बाद लामबंद हो गया। पीएम की छवि उनका विकास का दावा और केंद्र सरकार भाजपा की होना भी एनडीए के पक्ष में गया। हालांकि लोकजनशक्ति पार्टी ने एनडीए से बगावत करके जदयू को 25 से 30 सीट हरा दीं। लेकिन इसकी क्षतिपूर्ति महागठबंधन के मुस्लिम वोट में सेंध लगाकर औवेसी की पार्टी एमआईएम से पूरी कर दी। अंतर बस इतना रहा कि जहां जदयू नुकसान उठाकर भी अपनी सीट काफी कम होने पर भी  सत्ता में वापस आने में कामयाब रहा वहीं महागठबंधन एमआईएम के मात्र 5 सीट जीतने और इससे अधिक पर मुस्लिम वोट बंटने व पूरे राज्य में हिंदू वोटों के भाजपा के पक्ष में प्रतिक्रिया के रूप में ध्ु्रावीकरण होने से सत्ता के पास आकर दूर रह गया। महागठबंधन की हार के कई कारण हैं। कुछ सामने आने लगे हैं। कुछ भविष्य में सामने आयेंगे। फिलहाल कांग्रेस को 70 सीट दिया जाना भी तेजस्वी की नासमझी माना जा रहा है। कांग्रेस इनमें से केवल 19 सीट जीत पाई है। इसका कारण कांग्रेस की 70 साल की सत्ता में रहकर की गयीं ढेर सारी नालायकी भ्रष्टाचार और मनमानी मानी जा रही है। खुद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तारिक अनवर ने इस कमी को स्वीकार भी किया है। उधर तेजस्वी ने वामपंथियों को मात्र 29 सीट लड़ने को दीं थीं लेकिन वे उनमें से 16 जीतकर भाजपा और आरजेडी जैसी सबसे बड़ी पार्टियों से भी अधिक जीत का स्ट्राइक रेट का रिकॉर्ड बनाने में कामयाब रहे। बताया जाता है कि वामपंथियों ने ही महागठबंधन की चुनाव रणनीति घोषणापत्र और चुनावी मुद्दे तय करने में मदद की थी। कामरेडों ने उन सीटों पर भी महागठबंधन के प्रत्याशियों के लिये जीजान से दिन रात काम किया। जहां वे खुद चुनाव नहीं लड़ रहे थे। अगर कांग्रेस को 70 की जगह 50 सीट देकर कम्युनिस्टों को 29 की बजाये 50 सीट दी जाती तो निश्चित रूप से आज तेजस्वी बिहार के इतिहास के सबसे युवा सीएम की शपथ ले रहे होते। लेकिन आप नोट कर लीजिये आज नहीं तो कल तेजस्वी को एक दिन बिहार की सत्ता में आना ही है। इस मामले में भाजपा के पूर्व एमपी और जाने माने दलित नेता व कांग्रेसी उदित राज ने इवीएम मंे गड़बड़ी का राग एक बार फिर छेड़ा है लेकिन वीवीपेट मॉक वोटिंग और राजस्थान एमपी छत्तीसगढ़ पंजाब और दिल्ली में विधानसभा जीतने वाले गैर भाजपा दलों को बिना ठोस सबूत अपनी हार का ठीकरा इवीएम पर फोड़ने का कोई हक नहीं है। हम यह नहीं कह सकते कि ईवीएम में गड़बड़ी नहीं हो सकती लेकिन जब तक यह साबित ना हो जाये तब तक ईवीएम भी उस आरोपी की तरह निरपराध है। जिसको कोर्ट में दोषी साबित नहीं किया जा सकता है। सबसे बड़ा आरोप महागठबंधन ने उन एक दर्जन से अधिक सीटों को हराने को लेकर लगाया था। जिनपर हार जीत का मार्जिन एक हज़ार वोट से कम था। चुनाव आयोग ने इस आरोप को गंभीरता से लेते हुए यह साबित कर दिया है कि जिन सीटों पर डाक मतपत्र बड़ी संख्या में निरस्त किये गये थे। उनमें एकमात्र हिल्सा सीट है। जिसपर आरजेडी का उम्मीदवार उतने यानी 12 वोट से हारा है। जबकि कैंसिल हुए बैलेट पेपर की तादाद यहां 182 थी। इसके अलावा बाकी 10 सीट पर अगर रद्द डाक मतपत्र जोड़े भी जायें तो हार जीत का अंतर इतना अधिक है कि जीतने वाले दल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही इन 10 में से 3 सीट खुद आरजेडी और एक एक सीपीआई एलजेपी और निर्दलीय ने जीती है। इसके साथ ही हिल्सा सीट पर आयोग ने आरजेडी प्रत्याशी की मांग पर तत्काल फिर वोटों की गिनती भी करा दी थी। इस चुनाव मेें एलजेपी ने जहां खुद एक सीट जीतकर जदयू को काफी नुकसान और भाजपा को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुंचाया है। वहीं यही काम औवेसी की एमआईएम ने जाने अनजाने में महागठबंधन को नुकसान पहंुचाकर 5 सीट जीतीं हैं लेकिन उसके ऐसा करने से भापजा के साथ हिंदू वोटों का जबरदस्त ध््राुवीकरण हुआ है। एक सबसे बड़ा कारण महिला वोटों का 10 प्रतिशत से अधिक मतदान एनडीए के पक्ष में गया है। इससे हार जीत की 15 सीटों का अंतर पट गया है। हालांकि महिला मतदाता नीतीश सरकार के शराब पर रोक लगाने और छात्राओं को लंबे समय से साइकिल दिये जाने से खुश होकर उनके दल के पक्ष में वोट दे रही थीं लेकिन इसका अधिक लाभ भाजपा को मिल गया। पीएम उज्जवला योजना गरीबों को मकान कई माह से निशुल्क राशन किसान सम्मान योजना विधवा पेंशन और अन्य कल्याणकारी केंद्र की योजनाओं का भी एनडीए को चुनावी जीत में लाभ मिला है। लेकिन सौ टके का सवाल यही है कि आखिर कब तक एनडीए और भाजपा भावनाओं सम्प्रदाय और जातियों की राजनीति से सत्ता पाकर सरकार बना और चला सकती है?

ओवैसी की सियासत...

औवेसी: उभरती सियासतकिसकी आफ़त,किसको राहत?

0तेलंगाना से निकलकर पहले महाराष्ट्र और अब बिहार में पांव जमा रही औवेसी की पार्टी एआईएमआईएम पर आजकल पूरे देश और खासतौर पर मुसलमानों में चर्चा गर्म है। जहां कुछ लोग उनको सेकुलर दलों के वोट काटकर भाजपा को लाभ पहुंचाने वाला बता रहे हैं। वहीं मुसलमानोें का एक वर्ग जिनमें नौजवानों की बड़ी तादाद हैका मानना है कि लोकतंत्र मेें जब सबको अपनी पार्टी बनाने चुनाव लड़ने और सरकार में भागीदारी का अधिकार है तो मुसलमानों को भी ऐसा ही हक क्यों नहीं होना चाहिये।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   बिहार चुनाव के बाद जाने माने शायर मनव्वर राणा औवेसी से बहुत नाराज़ हैं। उनका आरोप है कि औवेसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहाद उल मुस्लिमीन भाजपा की बी टीम है। वे यह भी कहते हैं कि औवेसी भाजपा के हिंदूराष्ट्र के मिशन को आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं। उनका दावा है कि एमआईएम ने भले ही5 विधायक जिताकर मुसलमानों को खुश किया हो लेकिन वे यह नहीं देख पा रहे कि इन ही औवेसी ने बिहार के सीमांचल में 21 सीटों पर चुनाव लड़कर पांच के साथ 11 दूसरी मुस्लिम बहुल सीटें भी महागठबंधन को हराकर एनडीए के सत्ता में आने का रास्ता साफ कर दिया है। उनका कहना है कि मुसलमान चंद मुस्लिम विधायक जिताकर तेजस्वी के नेतृत्व में बनने वाली एक सेकुलर गरीब और पिछड़े व कमज़ोर वर्ग की समर्थक सरकार बनने से रोककर क्या हासिल कर सकते हैंउधर औवेसी ने दावा किया है कि उन्होंने चुनाव से पहले महागठबंधन के नेताओं से मिलकर चुनाव लड़ने की पेशकश की थी। लेकिन किसी ने उनको संजीदगी से नहीं लिया। इसलिये उनका यह ठेका नहीं है कि उनके अलग चुनाव लड़ने से कौन जीतता है और कौन हारता है?इसके साथ ही औवेसी ने आने वाले यूपी और बंगाल के चुनाव मंे भी अपने प्रत्याशी उतारने का ऐलान कर दिया है। उन्होंने अपने आलोचकों का मंुह बंद करने को ममता बनर्जी को साथ मिलकर लड़ने और भाजपा को सरकार बनाने से रोकने का प्रस्ताव भी दे दिया है। यह ठीक है कि भारत में लोकतंत्र है। यहां किसी को भी अपनी पार्टी बनाकर चुनाव लड़ने और सरकार बनाने का अधिकार है। जहां तक औवेसी का सवाल है। बेशक उनकी पार्टी धर्म के नाम पर बनाई गयी है। साथ ही वे अधिकांश मुस्लिम मुद्दों और मुस्लिम बहुल सीटों पर चुनाव लड़कर इसकी पुष्टि भी करते रहे हैं। उनकी सभाओं में धार्मिक नारे भी लगते हैं। लेकिन अगर यह सब गैर कानूनी या असंवैधानिक होता तो उनकी पार्टी को चुनाव आयोग से पंजीकरण और मान्यता नही मिलती। यह मिल भी गयी थी तो निरस्त हो सकती थी। मगर शिवसेना और अकाली दल भी ऐसी ही धर्म आधारित पार्टी रही हैं। खुद भाजपा भले ही खुद को हिंदू पार्टी के नाम से पहचान कराने से बचती हो। लेकिन सब जानते हैं कि वह खुलेआम हिंदुत्व की राजनीति करती है। लेकिन जब कोई भी व्यक्ति या दल दूसरे धर्म के लोगों का विरोध नुकसान और उनके खिलाफ घृणा व हिंसा तक फैलाने लगता है तो वह साम्प्रदायिक और कट्टर कहलाता है। कौन कौन से सियासी दल धार्मिक की बजाये कट्टर साम्प्रदायिकता की सियासत कर रहे हैंयह किसी से छिपा नहीं है। सवाल यह उठता है कि जो भाजपा सरकार पूरे विपक्ष के पीछे हाथ धेकर पड़ी है। वह लगभग 15000 करोड़ की सम्पत्ति वाले मुस्लिम मुद्दों की सियासत करने वाले और अकसर विवादित बयान देने वाले औवेसी को लालू और मायावती की तरह जांच के नाम पर परेशान क्यों नहीं करतीउनके पास पूरे देश में सियासत करने को करोड़ों अरबों के संसाधन कहां से आ रहे हैंउनको मुख्यधारा का मीडिया इतना सयम और अहमियत किसके इशारे पर देता है कि मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस सपा बसपा राजद या वामपंथियों को भी इसके मुकाबले आधा या चौथाई वेट भी नहीं मिलता हैसाथ ही अकसर देखा गया है कि टीवी चैनल औवेसी को ना केवल अपनी बात पूरी कहने का खुला मौका देते हैं बल्कि उनसे तीखे या चुभते हुए वैसे सवाल भी नहीं करते जैसे वे अन्य विपक्षी दलों से करके उनको देशद्रोही देशविरोधी और हिंदू विरोधी साबित करने पर तुले रहते हैं। सवाल यह भी है कि जो भाजपा और संघ के नेता आयेदिन कांग्रेस और कम्युनिस्टों से उल्टे सीधे सवाल पूछकर उनको पाकिस्तान आतंकवाद और मुसलमानों का एजेंट बताते रहते हैं। वे भी किसी गुप्त समझौते या छिपी हुयी योजना के तहत कभी भी औवेसी से ऐसे असुविधाजनक और मुसीबत मेें डालने वाले सवाल नहीं पूछते। इतना ही नहीं खुद औवेसी जितने हमलावर भाजपा या संघ पर नज़र आते हैं। चुनाव लड़ते समय सेकुलर दलों का अधिक नुकसान करते दिखते हैं। यानी उनकी कथनी और करनी में ज़मीन आसमान का अंतर हैै। असल खेल यह है कि भाजपा ने बड़े जतन से कांग्रेस को मुस्लिम परस्त पार्टी साबित करने का अभियान शुरू किया था। लेकिन राहुल गांधी ने गुजरात चुनाव में दर्जनों मंदिर जाकर अपना जनेउू दिखाकर खुद को शिवभक्त साबित किया तो वहां कांग्रेस बिहार की तरह भाजपा को कांटे की टक्कर देने मंे सफल हो गयी। इसके बाद कांग्रेस ने तीन तलाक कश्मीर की धारा 370दिल्ली दंगा एनआरसी सीएए और मुस्लिम मुद्दों पर चुप्पी या नपा तुला औपचारिक बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर हिंदुओं को राम मंदिर का ताला खुलवाने शिलान्यास कराने और भाजपा को सत्ता तक पहंुचने देने का अहसास कराया तो वह राजस्थान छत्तीसगढ़ और एमपी में नरम हिंदुत्व के बल पर भाजपा से सत्ता छीनकर अपनी सरकार बनाने में सफल हो गयी। इसके बाद भाजपा ने अपनी रण्नीति बदलकर कांग्रेस सहित तमाम क्षेत्रीय सेकुलर दलों पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगाना तो जारी रखा। लेकिन पहले से बनी बनाई कट्टर साम्प्रदायिक और संकीर्ण औवेसी की मुस्लिम पार्टी एआईएमआईएम को आगे रखकर हिंदू बनाम मुस्लिम सियासत की बिसात बिछानी शुरू कर दी। आज इसी का नतीजा है कि सेकुलर दल अपना परंपरागत मुस्लिम वोटबैंक औवेसी की तरफ जाने से जहां उसको अपने सियासी वजूद के लिये नई आफ़त मान रहे हैं। वहीं सेकुलर दलों की बार बार हार से निराश बचा खुचा हिंदू वोट भी धीरे धीरे औवेेसी की मुस्लिम सियासत को बड़ा ख़तरा मानकर भाजपा की तरफ जाने को मजबूर हो सकता है। इसके कुछ नमूने हम महाराष्ट्र और बिहार में हाल ही में देख चुके हैं। यह मानना पड़ेगा कि यह संघ परिवार की कूटनीति की बड़ी सफलता है कि जिन औवेसी को आज मुसलमान अपना मसीहा समझ रहे हैं। वे जाने अंजाने मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देकर उल्टा उसी हिंदू साम्प्रदायिकता को मज़बूत करेंगे जिससे लड़ने हराने और देश को बचाने का वह दावा करते हैं।                                    

Sunday, 25 October 2020

बेशर्म चैनल

बेशर्म चैनल: कोर्ट की फटकारफिर भी नहीं शर्मसार?

0फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के मामले को टीवी चैनलों ने जिस बेशर्मी और गैर कानूनी तरीके से सनसनीखेज ख़बरों और खोजी पत्रकारिता के नाम पर मीडिया ट्रॉयल किया। वह अब हाईकोर्ट की नज़र मंे आ गया है। अब टीआरपी विवाद के बाद चंद चैनल अपनी ओछी और नापाक हरकतों की वजह से कोर्ट के शिकंजे में फंसते नज़र आ रहे हैं। उधर बॉलीवुड के 30 बड़े प्रोडक्शन हाउस बॉलीवुड की जानी मानी फिल्मी हस्तियों को बदनाम करने के लिये चैनलों के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटा चुके हैं।      

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुशांत सिंह राजपूत के सुसाइड केस के मीडिया ट्रॉयल पर ज़बरदस्त नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा है कि मीडिया आज ध््रुावीकृत हो चुका है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले मीडिया निष्पक्ष और पत्रकार ज़िम्मेदार हुआ करते थे। कोर्ट ने कहा कि यह रेग्युलेशन का नहीं चैक एंड बैलेंस का मामला है। मीडिया को पता होना चाहिये कि उसकी सीमा कहां तक है। अदालत का कहना था कि हमारे देश में कानून का राज है। ऐसे में आप मीडिया ट्रॉयल कैसे कर सकते हैंन्यायालय ने यहां तक कह दिया कि अगर आप यानी मीडिया खुद ही जांचकर्ता अभियोजक और न्यायधीश बन जायेगा तो हम यानी जज यहां क्या करेंगेहाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के नेतृत्व में इस केस की सुनवाई कर रही बैंच ने पूछा कि जिस केस की सरकारी एजंसी जांच कर रही है। उसमें मीडिया जांच पूरी हुए बिना कोई निष्कर्ष सामने आये बिना खोजी पत्रकारिता के नाम पर किसी की गिरफतारी की मांग कैसे कर सकता हैआपको याद दिला दें कि रिपब्लिक टीवी ने ट्वििटर पर अरैस्ट रिया हैशटैग चलाया था। सवाल यह है कि किसी चैनल को यह अधिकार किसने दिया कि वह बिना किसी पुख्ता सबूत ठोस बुनियाद और अंतिम जांच पूरी हुए जनता से इस मुद्दे पर राय जाने कि किस मामले में किसको जेल भेजा जाना चाहियेकोर्ट ने इस बात पर सख़्त नाराज़गी दर्ज की कि कैसे एक चैनल सुशांत केस में यह तय हुए बिना कि उसने आत्महत्या की या उसकी वास्तव में हत्या ही हुयी हैउसको हत्या बताकर किसी को जेल भेजने की मांग कर सकता हैजांच की शक्ति भारतीय दंड आचार संहिता के तहत चैनल को नहीं पुलिस को मिली हुयी है। बैंच का यह भी कहना था कि वह मीडिया की सुशांत केस की रिपोर्टिंग को बिल्कुल भी सही नहीं मानता। पत्रकारों को ऐसे मामलों में ख़बर या चर्चा करते हुए खासतौर पर आत्महत्या के संवेदनात्मक मामलों में कानूनन तय की गयीं बारीकियों और नियमों का पालन हर हाल में करना चाहिये। मीडिया भी संविधान नियम कानून से बाहर जा कर कुछ भी बोलने दिखाने और करने के लिये स्वतंत्र नहीं है। किसी की मौत पर मीडिया अपनी टीआरपी बढ़ाने को सनसनीखेज़ या किसी को बिना ठोस सबूत व जांच के सज़ा दिलाने की मांग भी नहीं कर सकता। मीडिया को मरने वाले का सम्मान मर्यादा और संयम रखना ही होगा। कोर्ट ने नेशनल ब्रॉडकास्टर फेडरेशन को भी कटघरे में खड़ा करते हुए उससे सवाल किया कि उसने ऐसे मीडिया ट्रॉयल पर बिना किसी के शिकायत किये खुद ही नोटिस क्यों नहीं लियाइसके बाद न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड ऑथोरिटी ने आजतक ज़ी न्यूज़ इंडिया टीवी और न्यूज़-24 को इस मुद्दे पर गैर ज़िम्मेदार रिपोर्टिंग का दोषी मानते हुए अपने दर्शकों से बिना शर्त माफी मांगने का आदेश जारी कर दिया है। लेकिन ये टीवी चैनल इतने ढीट और निर्लज हो चुके हैं कि इसके खिलाफ भी स्टे को कोर्ट ज़रूर जायेंगे। उधर दिल्ली हाईकोर्ट ने एक मामले में जमकर ज़ी टीवी की क्लास लगाई है। कोर्ट ने चैनल से पूछा कि वह जामिया के एक छात्र पर लगाये गये अपने गंभीर आरोपों का श्रोत बताये। उधर पुलिस ने कोर्ट में अपनी जान बचाने को साफ कह दिया कि उसने चैनल को छात्र से पूछताछ में मिली सनसनीखेज गोपनीय जानकारी लीक नहीं की है। इसका मतलब चैनल ने मनगढ़ंत आरोप लगाये हैं। इस मामले में या तो पुलिस फंसेगी या फिर चैनल पर झूठी ख़बर चलाने का केस चलेगा। बॉलीवुड के 30 बड़े प्रोडक्शन हाउस ऐसे ही चैनलों पर लगाम लगाने उनकी जवाबदेही तय करने और दोषी पाये जाने पर उनको सज़ा और फिल्मी हस्तियों को करोड़ों का मानहानि का मुआवज़ा दिलाये जाने की मांग को लेकर हाईकोर्ट पहंुच गये हैं। उनका कहना है कि सुशांत सिंह राजपूत के मामले में सीबीआई और एम्स की जांच में यह साबित हो चुका है कि उसकी हत्या नहीं बल्कि उसने निजी कारणों से आत्महत्या की थी। लेकिन सुशांत केस के बहाने ना केवल अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती का चैनलों ने खुला चरित्र हनन किया बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री को नशेड़ी और शराबी बताकर बदनाम किया। इस मामले में भी चैनल फंसते नज़र आ रहे हैं। ऐसी ही कई अन्य जनहित याचिकायें चैनलों के खिलाफ देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में पहुंच चुकी हैं। एक कहावत है कि शेर को इंसान का खून मुंह लग जाये तो वह फिर आदमखोर हो जाता है। ऐसा ही कुछ मामला आजलक टीवी चैनलों का लग रहा है कि पहले उन्होंने सत्ता के इशारे पर एक वर्ग विशेष को निशाने पर लिया। वह अल्पसंख्यक वर्ग चैनलों का कुछ नहीं बिगाड़ पाया तो इन चैनलों ने फिर सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस को विलेन बनाना शुरू किया। इसके बाद इन्होंने सारे विपक्ष को देश का दुश्मन साबित करना चालू कर दिया। इसके बाद एक के बाद दूसरी जाति विशेष को तमाम अपराधों के लिये कसूरवार ठहराने का अभियान छेड़ दिया। इतना ही नहीं अपने पूंजीपति मालिकों के इशारे पर सत्ता के एजेंडे को लगातार आगे बढ़ाते हुए ये चैनल हर दिन नया शिकार तलाश कर सभी निष्पक्ष हिंदुओं व जनवादी समाजवादी सेकुलर मानवतावादी और योग्य विद्वानों को देशद्रोही राष्ट्रविरोधी और अर्बन नक्सली बताने में ज़रा भी शर्म और संकोच नहीं करते हैं। लेकिन अब हाईकोर्ट के सख़्त और गंभीर रूख़ को देखकर लगता है कि सरकार के ना चाहने या इनके पंूजीपति मालिकों के खुले सपोर्ट के बावजूद इन चैनलों की मनमानी आगे चलनी मुश्किल है।

Saturday, 17 October 2020

टीआरपी घोटाला

टी आर पी का खेलपूंजी-सत्ता का घालमेल!

0बीएआरसी यानी ब्रॉडकास्ट ऑडियेंस रिसर्च कौंसिल ने कुछ टीवी चैनलोें की टीआरपी यानी टेलीविज़न रेटिंग प्वाइंट पर उठे विवाद के बाद आगामी 12 सप्ताह तक अपने आंकडे़ जारी करने पर रोक लगा दी है। 80 करोड़ टीवी दर्शकों के देश में मात्र 41000 व्यूवर मीटर लगाकर बिना पारदर्शिता के चैनलों की लोकप्रियता परखना वैसे भी अपने आप मेें मज़ाक ही था। अब देखना यह है कि बीएआरसी टीआरपी को लेकर आगे क्या लीपापोती करता है?     

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   दरअसल टीआपी घोटाला सर्वे कंपनी हंसा रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड के एक कर्मचारी ने ही खोला है। कंपनी के कर्मचारी महेश कुशवाह ने पूर्व कर्मचारी विनोद कुलश्रेष्ठ को यह जानकारी लीक कर दी कि एमपी के ग्वालियर के माधोगंज स्थित गुढ़ा क्षेत्र के किन घरों में बीएआरसी के बैरोमीटर लगे हैं। इसके बाद कंपनी के डिप्टी जनरल मैनेजर नितिन देवकर की शिकायत पर पुलिस ने धोखाधड़ी का मामला दर्ज कर सात लोगों को हिरासत में लिया है। बैरोमीटर जिन घरों मंे लगाया जाता है। गोपनीयता की वजह से उनको भी यह जानकारी नहीं दी जाती कि उनके घर में जो संयंत्र लगाया गया है। वह क्या हैउसका क्या मकसद हैऔर वह कैसे काम करता हैऐसा इसलिये किया जाता है। जिससे उनको कोई चैनल वाला लालच देकर अपना चैनल अधिक देखने को बहला फुसला ना सके। लेकिन इस बार जब पोल खुली तो पता लगा कि जिन घरों में बैरोमीटर लगाया जा रहा था। उनको 500रू. माह इस बात के लिये दिये जा रहे थे कि वह इंडिया न्यूज़ चैनल ही देखें। इसके लिये उनको यह भी समझाया गया कि वह अपने घर में इस चैनल को चाहे देखें या ना देखें लेकिन अपना टीवी दिन रात यह चैनल ऑन करके चालू रखें। ज़ाहिर बात है कि यही फार्मूला अन्य अनेक ऐसे घरों मंे भी अपनाया जा रहा होगा। जहां ये बैरोमीटर लगे होंगे। सभी टीवी चैनल विज्ञापन अधिक से अधिक लेने के लिये टीआरपी पर निर्भर करते हैं। जिसकी जितनी अधिक टीआरपी होगी। उसको ना केवल उतने ही अधिक एड मिलते हैं बल्कि उसकी विज्ञापन दर भी उतनी अधिक हो जाती हैै। सराकर चाहे भाजपा की हो या कांग्रेस की वह हर हाल में मीडिया और खासतौर पर इलैक्ट्रॉनिक टीवी चैनलों को अपने काबू में रखना चाहती है। इसके लिये बीएआरसी से सैटिंग करके टीआरपी का नकली और फर्जी खेल किया जाता है। आज जो गड़बड़ी अनैतिकता और तिगड़म भाजपा सरकार कर रही है। कल तक वही काम पूरी बेशर्मी और नंगेपन से कांग्रेस भी करती थी। हद तो यह थी कि जनवरी 2014 में यूपीए की मनमोहन सरकार को ऐसा लगा कि वह तीसरी बार चुनाव जीतने की हालत में नहीं है तो उसने टीआरपी आंकने वाली एजंसी बीएआरसी को 70 हज़ार करोड़ का वार्षिक कारोबार नियम कायदे ताक पर रखकर अपने पक्ष में करने को दे दिया था। लेकिन वह अपने मकसद में नाकाम रही। ब्रॉडकास्टिंग ऑडिएंस रिसर्च काउंसिल देश के ब्रॉडकास्टर्सविज्ञापन एजंसियों और विज्ञापनदाताओं का सामूहिक संगठन है। मुंबई स्थित ग्लोबल मार्केट कंपनी हंसा बीएआरसी के लिये लोगों के घरों में बैरो मीटर लगाने का काम करती है। हमारे यहां गोपनीयता के नाम पर बहुत से घोटाले सरकार भी करती रही है। सो बीएआरसी ने भी पूंजीपतियों के पक्ष में मोटी रकम के बल पर कुछ टीवी चैनलों से मिलीभगत करके यह घोटाला लंबे समय से चला रखा था। मुंबई पुलिस ने बीएआरसी हंसा और कुछ टीवी चैनलों का जो टीआरपी का खेल पकड़ा है। वह नया या पहली बार नहीं हैै। अगर आप गहराई से देखेंगे तो टीवी चैनल समाचार तथ्यों व सत्य आंकड़ों व प्रमाणों पर जोर ना देकर अपने एंकरों को मदारी की तरह रोज़ शाम को टीवी रूक्रीन पर बैठाकर ऐसे चंद मुद्दों पर फालतू घटिया और ओछी बहस कराते नज़र आते हैं। जिनमें टीआरपी बढ़ाने को गाली गलौच झूठ फर्जी जानकारी सनसनीखेल मसाला और मारपीट तक की नौबत आ जाती है। यह ठीक है कि अर्णव गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी ने टीआरपी ही नहीं मर्यादा संयम और नियम कानूनों के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिये हैं। लेकिन कम लोगों को पता है कि आज जो चैनल रिपब्लिक और इंडिया न्यूज़ जैसे दो चार चैनलों को टीआरपी घोटाले के लिये खूब जोरशोर से कोस रहे हैं। वे कमोबेश खुद भी इस तरह की सैटिंग में गाहे बा गाहे शामिल रहे हैं। लेकिन हमारा समाज ऐसा मानता है कि जो पकड़ा जाये वही चोर है। हम यह भी नहीं कह रहे कि केवल और केवल देश में टीआरपी घोटाला हो रहा था। अख़बारों के प्रसार को आंकने वाली संस्था एबीसी यानी ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन भी कई आरोपों के घेरे में रही है। लेकिन हम यह भी नहीं कह सकते कि अगर और जगह ऐसी गड़बड़ी हो रही है तो टीआरपी में भी जायज़ है। सही बात तो यह है कि इस तरह की धोखाधड़ी जनता के विश्वास के साथ किसी भी क्षेत्र में होनी ही नहीं चाहिये। टीआरपी घोटाला इतना सीधा सरल नहीं है। जो साधारण आदमी को आराम से समझ आ जाये। देखने वाली बात यह भी है कि आप बैरोमीटर किन इलाकों में लगा रह हैंकिन घरों में लगा रहे हैंकहीं ऐसा तो नहीं कुछ धर्म जाति और क्षेत्र विशेष में ही ये पैनल होम जानबूझकर सत्ता के इशारे पर लगाये जाते हों। मिसाल के तौर पर आप किसी दल विशेष के गढ़ में या चुनचुनकर किसी लोकप्रिय नेता के अंधभक्तों के घरों में अगर बैरोमीटर लगायेंगे तो वह तो बिना रिश्वत लिये भी वही चैनल देखेगा जो उसको साम्प्रदायिक अंधविश्वासी और एक सोचे समझे सियासी एजंडे के तहत किसी वर्ग विशेष से दुश्मनी करना और निष्पक्ष सेकुलर हिंदुओं से घृणा करना दिन रात सिखा रहा है। इतना ही नहीं जिनकी रेटिंग घटानी होती है। उन निष्पक्ष चैनलों को रिमोट सैटिंग में अचानक ही दूसरे नंबर पर डाल दिया जाता है। तकनीकी कमी के नाम पर उनकी आवाज़ गायब कर दी जाती है। कभी पिक्चर साफ नहीं आती। जिससे दर्शक झुंझलाकर उस चैनल को देखना ही छोड़ देते हैं। पुलिस प्रशासन के ज़रिये कैबिल नेटवर्क चलाने वालों पर सरकार के खिलाफ खुलकर बोलने वाले चैनलों को ना दिखाने का दबाव लगातार चलता है। बड़े होटल अस्पताल रेलवे स्टेशन बस स्टैंड और अन्य सरकारी सार्वजनिक स्थानों पर बाकायदा मौखिक आदेश आते हैं कि कौन सा चैनल जनता को लगातार दिखाने को फिक्स करना है। ऐसे और भी कई खेल टीआरपी घटाने बढ़ाने को गोपनीयता के नाम पर सरकार पूंजीपति यानी चैनल स्वामी और उनकी गुलाम बीएआरसी पर्दे के पीछे करती रही है। सवाल यह है कि जब सारा समाज सरकार प्रशासन पुलिस न्यायपालिका और मीडिया सवालोें के घेरे में है तो अकेले टीआरपी ईमानदार और निष्पक्ष कैसे बची रह सकती है?