Sunday, 11 October 2020

शाहीन बाग़ और सुप्रीम कोर्ट

शाहीन बाग़ पर सुप्रीम कोर्ट और क्या करता?

0सीएए के खिलाफ दिल्ली के शाहीन बाग़ में चले धरने के खिलाफ दायर एक याचिका पर फैसला देते हुए सबसे बड़ी अदालत ने कहा है कि सार्वजनिक जगहों पर लंबे टाइम तक कब्ज़ा करके आंदोलन नहीं किया जाना चाहिये। कानून के हिसाब से ये बात ठीक ही लगती है। लेकिन अगर कोई ऐसा करता है तो हमारी सरकार और पुलिस उससे निबटते समय अलग अलग पैमाने क्यों अपनाती हैइस अहम और असली मुद्दे पर सर्वाेच्च न्यायालय पता नहीं क्यों चुप रहा है।      

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   संविधान विशेषज्ञ और नलसार यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर फैज़ान मुस्तफा का कहना है कि जब शाहीन बाग़ का धरना कोरोना महामारी की रोकथाम के लिये देशभर में लगाये जाने वाले लॉकडाउन की वजह से 24 मार्च को खुद ही खत्म हो गया था तो सुप्रीम कोर्ट को वैसे तो इस याचिका पर पूर्व के ऐसे मामलों की तरह कोई फैसला देने की ज़रूरत ही नहीं थी। लेकिन उसने अगर कोई निर्णय देना ही था तो यह भी स्पश्ट करना चाहिये था कि लंबे टाइम से उसका आश्य कितने दिन या घंटे हैंयह भी साफ किया जाना चाहिये था कि यह अवधि अदालत सरकार या पुलिस में से कौन तय करेगासवाल यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय लागू कैसे और कौन करायेगाक्या ऐसा कोई कानून पहले से मौजूद है जिसमें यह तय हो कि अब आगे कोई धरना प्रदर्शन अमुक जनउपयोगी स्थान पर और अधिक दिनों तक नहीं चलाया जा सकताक्या कोर्ट के आदेश के बाद भविष्य में सरकार ऐसा कानून बनायेगीक्या कानून होने या बन जाने के बाद भी सरकारों और पुलिस का रूख़ ऐसे मामलों में निष्पक्ष और समानता वाला होगाक्या पुलिस कोर्ट के इस फैसले का भविष्य में उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख़्त रूख़ अपनाकर उनसे धरना स्थल खाली कराने को वहां पहले चेतावनी फिर वाटर कैनन फिर हवाई फायरिंग फिर लाठी चार्ज और बड़े पैमाने पर गिरफ़तारी के बाद भी लोगों के वहां डटे रहने पर गोली चलाने की हिम्मत करेगीक्या पुलिस और सरकार ऐसा करते समय सत्ताधारी दल और विपक्ष के अलावा अलग अलग वर्गों जातियों और धर्मों के लोगों के आंदोलन के लिये एक से नियम कानून और एक्शन लेने का संवैधानिक कर्तव्य ईमानदारी और समानता के आधार पर निष्पक्ष तरीके से अपनायेगीऐसा ना करने और पहले की तरह खुला पक्षपात करने से आंदोलनकारी कई बार सरकार और पुलिस के खिलाफ और उग्र होकर हिंसक हो जाते हैं। इससे विरोध करने वालों को सरकार और पुलिस के खिलाफ आंदोलन कुचलने को दमनकारी और अन्यायपूर्ण तौर तरीके अपनाने का आरोप लगाकर आंदोलन पहले से भी अधिक जोरशोर से चलाने का नया आधार मिल जाता है। सुप्रीम कोर्ट को शाहीन बाग़ जैसे अत्यधिक संवेदनशील विवादित और चर्चित मामले पर फैसला देते समय यह भी विचार करना चाहिये था कि क्या सरकार ने आंदोलनकारियों से उनकी मांग पर इस दौरान संवाद करने का कोई प्रयास कियासाथ ही यह भी देखा जाना चाहिये था कि क्या सरकार शाहीन बाग़ की जगह ऐसे धरने प्रदर्शन के लिये शहरी आबादी से बहुत दूर तयशुदा जगहों पर आंदोलन करने वालों से कभी अपने प्रतिनिधि भेजकर बातचीत से ऐसे मामले सुलझाने का कोई गंभीर प्रयास करती हैसरकार और प्रशासन तो अकसर आमरण अनशन करने वालों से भी उनके मरने तक बात करना पसंद नहीं करता है। इस मामले में गांगा बचाओ अभियान के जाने माने एक प्रोफेसर की आमरण अनशन के दौरान जान तक जा चुकी है। दरअसल कहने को हमारे देश में संविधान लागू है। लोकतंत्र का राज है। सरकार जनता के प्रति जवाबदेह कहलाती है। पीएम खुद को प्रधानसेवक बताते रहे हैं। लेकिन वास्तविकता यह है कि सरकार प्रशासन पुलिस विरोध करने वालों या अपनी असहमति दर्ज करने वालों को देशद्रोही और अपना दुश्मन मानकर चलती नज़र आती है। क्या भविष्य में सार्वजनिक स्थानों पर आंदोलन करने वालों को पुलिस तत्काल वहां से बलपूर्वक हटा देगाीया नहीं हटायेगी तो उनको कोर्ट की अवमानना का दोषी मानकर उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही शुरू करेगीआपको याद होगा कि खुद सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग वाले मामले में यााचिका दायर होने के बाद सरकार या पुलिस को सीध्ेा शाहीन बाग बलपूर्वक खाली कराने के आदेश ना देकर आंदोलनकारियों से बातचीत करने को तीन लोगोें की एक कमैटी बनाई थी। हालांकि जाने माने वकील संजय हेगडे़ के नेतृत्व में बनी साधना रामचंद्रन और वज़ाहत हबीबुल्लाह की इस समिति से वार्ता के बाद अगर शाहीन बाग के आंदोलनकारी अपना धरना वापस ले लेते तो उनकी कोर्ट की नज़र में अहमियत बढ़ जाती और साथ ही उनको अपना आंदोलन सम्मानपूर्वक वापस लेने का एक अच्छा रास्ता भी मिल जाता। कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस और सरकार कोर्ट के कंधे पर रखकर बंदूक चलाना बंद करंे और सार्वजनिक स्थानों को पहले से मौजूद कानून के अनुसार खाली कराकर जनता का आवागमन सुगम बनायें। दरअसल सरकारें आंदोलनकारियों को थकाकर आंदोलन अपनी मौत अपने आप मरने का इंतज़ार करती हैं। कभी कभी वे आंदोलनकारियोें की गल्तियों और कमियों को तलाश कर उनको वहां से भगाने का बहाना तलाश करती हैं। अगर कुछ बड़े आंदोलनों का इतिहास देखें तो 1987 में भारतीय किसान यूनियन ने महेंद्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में मेरठ की कमिश्नरी का एक माह से अधिक समय तक घेराव किया था। तब के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह झुके और किसानों की मांगे मानकर आंदोलन खत्म कराया था। ऐसे ही 1988 में कानपुर में कपड़ा मिल मज़दूरों ने लंबे समय तक रेल पटरी पर कब्ज़ा कर लिया था। तब के सीएम एन डी तिवारी ने जब स्थानीय पुलिस प्रशासन से तत्काल कड़ी कार्यवाही कर रेल ट्रेक खाली कराने को कहा तो वहां के डीएम एसपी ने हाथ खड़े कर दिये। उनका कहना था कि रेल पटरी पर लोग इतने अधिक और इतने जोश में हैं कि अगर बल प्रयोग किया गया तो हालात काबू से बाहर हो जायेंगे। इसके बाद भारत सरकार ने कपड़ा मज़दूरों से बात की और उनकी अधिकांश मांगों को मानकर आंदोलन बातचीत से खत्म कराया। सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बावजूद यूपी की भाजपा सरकार ने अदालत में हलफनामा देकर भी बाबरी मस्जिद ना बचाकर कारसेवकों को बल प्रयोग से बचाया था। पाटीदारों का गुजरात में गूर्जरों का राजस्थान में और जाटों का हरियाणा में लंबा हिंसक और उग्र आंदोलन चला था जिसमें हज़ारों करोड़ की सम्पत्ति का भारी नुकसान हुआ थाअभी कुछ साल पहले की ही बात है। ना तो उनसे आज तक यूपी की तरह सार्वजनिक सम्पत्ति की क्षतिपूर्ति कराई गयी और ना ही सख़्त कानूनी कार्यवाही करके सार्वजनिक स्थानों को कभी खाली कराया गया। अब देखना यह है कि शाहीन बाग़ के आंदोलन पर सुप्रीम कोर्ट के इस सख़्त फैसले के बाद क्या बदलता है?                                       

0 लेखक पब्लिक ऑब्ज़र्वर के प्रधान संपादक व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Monday, 5 October 2020

भिखारी

भीख रोकना चाहे सरकारतो भिखारियों को दे रोज़गार!

0भारतीय रेलवे ने एक प्रस्ताव तैयार किया है। जिसमें रेलवे अधिनियम में संशोधन करके भीख मांगने को दंडनीय अपराध की श्रेणी से हटाया जा सकता है। उधर केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट में कहा था कि वह भीख मांगने को अपराध के दायरे से बाहर कर भिखारियों के पुनर्वास के लिये एक कानून बनायेगी। लेकिन अब केंद्र सरकार अपने ऐसे ही अनेक जनकल्याण के वादोें की तरह इस आश्वासन से भी पीछे हट गयी है। उसने कहा है कि उसके एजेंडे में फिलहाल ऐसा कोई प्रस्ताव विचाराधीन नहीं है।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   हमारे देश में भीख मांगने पर रोक लगाने वाला कोई केंद्रीय कानून तो नहीं है। लेकिन रेलवे सहित देश के लगभग दो दर्जन राज्यों ने अपने अपने स्तर पर ऐसे कानून बना रखे हैं। जिनमें भीख मांगने को दंडनीय अपराध घोषित किया गया है। मिसाल के तौर पर रेलवे के अधिनियम के अनुसार अगर कोई व्यक्ति रेलवे परिसर या रेल में भीख मांगता पाया जाता है तो उसपर 2000जुर्माना और उसको एक साल की सज़ा हो सकती है। दिल्ली मेें भी भीख मांगने पर प्रतिबंध है। यहां और अन्य ऐसे ही कुछ और राज्यों में पुलिस भिखारियों को न केवल अकसर पकड़ती रहती है बल्कि उनको राज्य से बाहर खदेड़ने के साथ ही उनसे अकसर राज्य की सीमा में रहने के लिये अवैध वसूली भी करती रहती है। यहां तक शिकायतंे मिली हैं कि पुलिस इन भिखारियों को पकड़कर जेल या डिटेंशन सेंटर भेजने की बजाये इस कानून का दुरूपयोग करते हुए या तो इनसे सप्ताह या मासिक रिश्वत तय कर लेती है या फिर इनको जबरन निर्माण स्थलों पर ले जाकर ठेकेदार से मिलीभगत करके बिना भुगतान के इनसे श्रम कराया जाता है। इसके एवज़ में मिलने वाली मज़दूरी ठेकेदार और पुलिस ईमानदारी’ से आधा आधा बांट लेते हैं। राज्य सरकारों और रेलवे ने भिखारियों पर रोक लगाने वाले कानून तो बना दिये लेकिन कभी यह देखने की ज़हमत नहीं की गयी कि इस कानून से भिखारियों ने भीख मांगना बंद कर दिया या पुलिस को अपनी नंबर दो की कमाई का एक और रास्ता मिल गया हैमिसाल के तौर पर बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ बैगिंग एक्ट 1959 में भीख मांगने वालों के खिलाफ रेलवे से भी सख़्त प्रावधान करते हुए उनको पकड़े जाने पर तीन से दस साल हिरासत में रखने का फर्मान सुना रखा है। इसका परिणाम यह है कि पुलिस को ऐसे कानूनों के बल पर अपनी निर्दयता और वसूली करने का एक और औज़ार हाथ लग गया है। भीख मांगना रोकने के नाम पर पुलिस प्रवासी कामगारों तमाशा दिखाने वालों नाच गाकर अपनी कला के बल पर पेट पालने वालों जादूगरों बेघरों बेसहारा और खानाबदोश लोगों को लगातार उत्पीड़न व अत्याचार कर अपनी जेब भरती रहती हैै। ऐसे में ये लोग एक तरफ कानून का उल्लंघन कर निरंतर भीख भी मांगते रहते हैं। दूसरी तरफ इनको अपनी कमाई से पुलिस को मोटी रकम देनी होती है। उल्लेखनीय है कि जब से भीख मांगने के खिलाफ एक के बाद एक राज्य सरकारों ने कानून बनाये तब से ही मानव अधिकारवादियों समाजसेवी संस्थाओं और कई एनजीओ ने इस कानून के खिलाफ मोर्चा भी खोलना शुरू कर दिया था। उनका कहना है कि कोई खुशी से भीख नहीं मांगता है। वे कहते हैं कि मजबूरी और पेट की आग इंसान को भीख मांगने पर मजबूर कर देते हैं। उनका यह भी कहना है कि भीख मांगने को गैर कानूनी घोषित करने के बजाये भीख मांगने वालों का पुनर्वास किया जाना चाहिये। उनको कानून बनाकर सज़ा देने के तुगलकी और तानाशाही वाले अमानवीय और गैर संवैाधनिक तौर तरीके अपनाने की बजाये रोज़गार और घर देकर जनकल्याणकारी राज्य का कर्तव्य निभाया जाना चाहिये। सबको पता है कि सभी दल विपक्ष में रहते हुए तो बड़ी बड़ी मानव सेवा और समाजसेवा की बातें करते हैं। लेकिन सत्ता में आने के बाद उनके सुर बदल जाते हैं। दिल्ली सरकार ने भी ठीक ऐसा ही किया था। इसके बाद जब सरकार के कान पर जूं नहीं रेंगी तो मानव अधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर के नेतृत्व में भीख मांगने के खिलाफ़ बने कानून के खिलाफ जाने माने वकील व समाजसेवी कॉलिन गांेजाल्वेज़ के सहयोग से 2017 में दिल्ली हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गयी। भीख मांगने के कानून के पक्ष में राज्य सरकार द्वारा दिये गये तर्कों को सिरे से खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने सरकार को कड़ी फटकार लगाई। अदालत ने भीख मांगने से रोकने वाले कानून को अमानवीय बताते हुए उसको अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया। न्यायालय ने सरकार के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘‘लोग सड़कों पर भीख इसलिये नहीं मांगते हैं कि वे ऐसा करना चाहते हैंबल्कि इसलिये मांगते हैं कि उनके पास कोई और विकल्प नहीं होता।’’ कोर्ट ने अपनी नाराज़गी दर्ज कराते हुए यहां तक कह दिया कि‘‘राज्य अपने नागरिकों को एक सभ्य जीवन देने के अपने दायित्व से पीछे नहीं हट सकते और ज़िंदा रहने के लिये ज़रूरी चीजों के लिये भीख मांग रहे लोगों को गिरफ़तार करहिरासत में लेकर और उन्हें जेल में डालकर ऐसे लोगों की तकलीफ को और बढ़ा नहीं सकते।’’ आईएएस से इस्तीफा देकर गरीब कमजोर और बेसहारा वर्ग के वंचित लोगों की लड़ाई लड़ने वाले हर्ष मंदर का दो टूक कहना रहा है कि भीख मांगने पर रोक लगाने वाला कानून देश के निर्धन और निराश्रित मजबूर लोगों के खिलाफ बना सबसे जालिम और दमनकारी कानून है। यह कानून ऐसे जनविरोधी कानूनों में से एक है। जिनमें गरीब और परेशान लोगों के पास पहले ही कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। हालांकि कई राज्यों मंे अभी भी यह भीख विरोधी कानून लागू है। लेकिन विडंबना यह है कि जिस देश में एक विवादित और बड़बोली फिल्म अभिनेत्री के ऑफिस का अवैध छज्जा नगर निगम द्वारा गिराये जाने पर मंुबई में केंद्र सरकार उसको वाई श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराती हो राज्यपाल इस राष्ट्रीय हित के मुद्दे’ पर केंद्र को तत्काल रपट भेजते होंकई दलों के बड़े नेता और बिकाउू मीडिया आसमान सर पर उठा लेता हो वहां भिखारियों जैसे सबसे कमज़ोर और मजबूर वर्ग के हित में कौन बोल सकता है?                                         

0फ़कीर ले गया ताशे में गालियां भरकर,

 अमीर बाप का बेटा था और क्या देता।।         

Thursday, 1 October 2020

यूपीएससी

बेलगाम मीडिया को काबू कर पायेगा सुप्रीम कोर्ट ?

0‘‘सुप्रीम कोर्ट का किसी चीज़ पर स्टे लगाना न्यू क्लियर मिसाइल जैसा हैलेकिन कोई भी इस पर कार्यवाही नहीं कर रहा था इसलिये हमें दख़ल देना पड़ा’’ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली सबसे बड़ी अदालत की एक बैंच ने जब एक चर्चित चैनल के विवादित सीरियल यूपीएससी जेहाद पर सुनवाई करने के बाद रोक लगाते हुए 16 सितंबर को यह बात कही तो केंद्र सरकार और न्यूज चैनल ब्रॉडकास्टिंग एसोशियेसन को तो शर्म नहीं आई लेकिन समाज के निष्पक्ष और सेकुलर लोगों ने ज़रूर राहत की सांस ली होगी। सवाल यह भी है कि क्या कोर्ट बेलगाम मीडिया को ऐसे काबू कर पायेगा?    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   एक साम्प्रदायिक चैनल ने 11 सितंबर को लोकसेवा आयोग में मुसलमानों की कथित घुसपैठ की कपोल कल्पित साज़िश का आरोप लगाते हुए अपने विवादित सीरियल के पहले एपिसोड का प्रसारण किया था। इससे पहले जब इस प्रोग्राम का प्रोमो जारी किया गया था। तभी यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट में गया था। जहां इसके प्रसारण पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी गयी थी। लेकिन जब यही मामला सर्वाेच्च न्यायालय में पहुंचा तो कोर्ट ने प्री ब्रॉडकास्ट स्टे से मना कर दिया। इसके साथ ही कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह यह सुनिश्चित करे कि इस चैनल के इस प्रोग्राम के प्रसारण से समाज पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ेगा। केंद्र सरकार ने इस चैनल को क्लीनचिट दे दी। इसके बाद जब इस प्रोग्राम का पहला एपिसोड प्रसारित हुआ तो मामला एक बार फिर से सबसे बड़ी अदालत में पहुंच गया। मजे़दार बात यह है कि इस चैनल के इस विवादित एक घंटे के सीरियल में केंद्र सरकार पर ही यूपीएससी की परीक्षा में मुस्लिम उम्मीदवारों को ही बेजा लाभ पहंुचाने का आरोप लगाया गया था। लेकिन केंद्र की हिंदूवादी सरकार को इस आरोप पर भी कोई आपत्ति नहीं थी। चैनल ने यूपीएससी जेहाद के नाम पर मुसलमानों पर पूर्वाग्रह के आधार पर जितने भी आरोप लगाये। सब मनगढ़ंत फर्जी और बेबुनियाद नज़र आते हैं। जैसाकि चैनल का दावा है कि मुसलमान एक षड्यंत्र के तहत यूपीएससी की परीक्षा में अधिक से अधिक आवेदन करने लगे हैं। इस आरोप पर हंसा ही जा सकता है कि एक ओर तो मुसलमानों पर आरोप है कि वे अपने बच्चो को पढ़ने के लिये मदरसों में भेजते हैं। उनको आधुनिक और अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में पढ़कर देश की मुख्य धारा में आना चाहिये। जब मुसलमान सचमुच ऐसा करने लगा तो साम्प्रदायिक दलों और इस चैनल की हालत खराब होने लगी है। फेक पोस्ट उजागर करने वाली जानी मानी विश्वसनीय एजंसी ऑल्ट न्यूज़ के अनुसार यूपीएससी के 4अगस्त को जारी नतीजों के अनुसार कुल पास829 उम्मीदवारों में से 42 मुस्लिम थे। ये मात्र 5प्रतिशत है। जबकि मुसलमानों की आबादी देश मंे लगभग 15 प्रतिशत है। अगर लोकसेवा आयोग के पिछले 5 साल के आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि मुसलमानों का प्रतिशत लगभग हर साल 3 से 5 प्रतिशत के बीच रहा है। मिसाल के तौर पर 2015 में पास कुल 1078 के 42, 2016 के 1099 में 50, 2017 के 990 में 52, 2018 के 759 में 28मुस्लिम उम्मीदवार सफल रहे थे। यह ठीक है कि 2017 में यह आंकड़ा कुछ बढ़ा था। लेकिन उस साल कुल पास प्रत्याशी भी अधिक थे। जबकि 2018 में उनका आंकड़ा काफी नीचे चला गया था। जिसको एक सुनियोजित योजना के तहत चैनल ने दिखाया ही नहीं। चैनल ने झूठा आरोप लगाया कि मुसलमानों को आयु सीमा में हिंदुओं के मुक़ाबले 3 साल की छूट दी जा रही है। जबकि यूपीएससी के 12फरवरी के नोटिफिकेशन के अनुसार सभी उम्मीदवारों की न्यूनतम आयु 21 साल जबकि अनुसूचित जाति व जनजाति को 5 साल तो पिछड़ी जाति के लिये 3 साल की छूट यानी 32की जगह 35 तक की छूट हिंदू मुसलमान सभी प्रत्याशियों के लिये दी गयी है। इतना ही नहीं रक्षा सेवाओं कमीशंड ऑफिसर और विकलांगों के लिये भी आयु में छूट दी गयी है। आयोग ने यह भी स्पश्ट किया है कि किसी भी रिज़र्व कैटेगिरी के किसी भी भाग मेें आने वाले वर्गों को दोनों कैटेगिरी में आयु सीमा में छूट मिलेगी। चैनल ने भी यह भी दुष्प्रचार किया कि मुसलमानों को परीक्षा में शामिल होने के लिये आयोग 9 अवसर दे रहा है। जबकि हिंदुओं को ये मात्र 6 मौके ही उपलब्ध कराता है। जबकि यह सुविधा भी केवल रिज़र्व कैटेगिरी के लिये उपलब्ध होती है। ना कि केवल मुसलमानों के लिये। ज़ाहिर बात है कि रिज़र्व वर्ग मंे धर्म के आधार पर नहीं जाति के आधार पर अवसर दिये जाते हैं। जिनमें हिंदू जाति के प्रत्याशी भी शामिल रहते हैं। मुस्लिमों को कम कट ऑफ माकर््स पर पास करने को लेकर भी इस चैनल ने कोरा झूठ बोला है। यहां भी जाति की जगह धर्म का झूठा आधार बताया गया है। जबकि 2009 के माकर््स को इसके लिये क्यों चुना गया है। इसका कोई ठोस आधार चैनल ने नहीं बताया है। आयोग अपनी पारदर्शिता की नीति के तहत प्रिलिम्स और मुख्य परीक्षा दोनों के कट ऑफ माकर््स जारी करता रहा है। चैनल ने अंत में यूपीएससी जेहाद का सबसे बड़ा कारण मुसलमानों के लिये र्फ्री कोचिंग की सुविधा को बताया है। जबकि यह भी सही नहीं है। मनमोहन सरकार ने मुसलमानों के लिये नहीं बल्कि वंचित वर्ग के प्रत्याशियों के लिये 5कोचिंग सेंटर शुरू किये थे। यह सच है कि इनमंे से 4 अल्पसंख्यक यूनिवर्सिटियों में खोले गये थे। लेकिन इनमें मुसलमानों के साथ ही अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति पिछड़ी जाति और महिलाओं को भी शामिल किया गया था। इनमें से एक सेंटर जामिया मिलिया में भी खुला था। जामिया के जो 30 कैंडीडेट यूपीएससी में चुने गये हैं। उनमें से 14 हिंदू भी हैं। ऐसे ही कई कोचिंग सेंटर खुद सरकारी सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय भी चला रहा है। इतना ही नहीं दिल्ली एमपी आंध्र प्रदेश और केरल सहित कई राज्य सरकारें भी अल्पसंख्यकों गरीबों पिछड़ों दलितों व महिलाओं की यूपीएससी में भागीदारी बढ़ाने के लिये इसी तरह के निशुल्क कोचिंग सेंटर बड़ी संख्या मंे चला रहे हैं। जहां तक इस तरह के संेटर ज़कात फाउंडेशन द्वारा चलाने पर हंगामा और उसके तथाकथित गैर कानूनी चंदा लेने का आरोप है। उसकी जांच करना सरकार का काम है। लेकिन साथ ही यह भी देखा जाना चाहिये कि खुद संघ परिवार का एनजीओ संकल्प भी इस तरह के कोचिंग सेंटर चला रहा है। जिसके इस बार 61 प्रतिशत प्रत्याशियों को यूपीएससी परीक्षा में सफलता मिली है। ऐसे मंे क्या यह नहीं कहा जा सकता कि संकल्प यूपीएससी का हिंदूकरण कर रहा है सुप्रीम कोर्ट ही यह तय करेगा।                                       

Tuesday, 15 September 2020

एक्ट ऑफ गॉड

एक्ट ऑफ़ गॉड: अबकि बार बिना ज़िम्मेदारी की सरकार ?

0अप्रैल-मई की तिमाही जीडीपी 24 प्रतिशत नीचे जाने पर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने इसे एक्ट ऑफ़ गॉड का नाम देकर अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया है। इतिहास में हम पहली बार देख रहे हैं। जबकि एक सरकार अपनी हर असफलता और गल्ती के लिये किसी ना किसी को ज़िम्मेदार ठहरा देती है। उधर रिज़र्व बैंक का कहना है कि इस वित्तीय वर्ष में2 लाख करोड़ का लोन फ्रॉड हुआ है। यानी बैंक संकट में हैं। इसके लिये किसे दोष दिया जायेगा?    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   2014 के चुनाव में यूपीए-2 की सरकार पर ढेर सारे आरोप लगे थे। सीएजी ने मनमोहन सरकार पर दो लाख करोड़ के टू जी घोटाले का आरोप लगाया था। अन्ना ने उस सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया था। बाबा रामदेव भी कांग्रेस सरकार के खिलाफ हमलावर थे। विपक्ष में भाजपा ने उस सराकर पर ऐसे ऐसे आरोप लगाये थे। जिनसे उसका कोई सरोकार तक नहीं था। इस बीच न्यायपालिका और मीडिया ने उस सरकार की बखिया उधेड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रखी थी। नतीजा यह हुआ कि बिना सफल गुजरात मॉडल और योग्य शासक के मोदी उस सत्ता विरोधी माहौल का सियासी लाभ लेकर पीएम बन गये। इतना ही नहीं पहली बार पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार बनने के बाद मोदी सरकार ने लोकतंत्र की बुनियादें धीरे धीरे इतनी कमज़ोर कर दीं कि आज असहमति सरकार का विरोध और सवाल करना देशद्रोह जैसा बना दिया गया है। उधर सरकारी नाकामी करप्शन मनमानी तानाशाही और नालायकी की हालत यह है कि खुद सत्ताधारी दल के कई सांसद विधायक और बड़े नेता तक सोशल मीडिया पर अपनी ही सरकार की खिंचाई करते मिल जायेंगे। लेकिन यह सरकार अपनी हर नाकामी का ठीकरा उल्टे अपने विरोधियों के सर पर फोड़ने से बाज़ नहीं आ रही है। इस सरकार ने शुरू से अल्पसंख्यकों का राक्षसीकरण किया है। कोरोना जब शुरू हुआ तो इसके लिये तब्लीगी जमात वालों को ज़िम्मेदार बताया गया। लेकिन पिछले दिनों मुंबई हाईकोर्ट ने इसके लिये सरकार की खिंचाई करते हुए दो टूक कहा कि सरकार ने मीडिया के ज़रिये एक वर्ग विशेष को कोरोना के लिये बलि का बकरा बनाया। ऐसे ही अब जब कोरोना रोकने को सरकार ने देर से गलत तरीके से और अमानवीय तरीके से पूरे देश को दो माह के लिये लॉकडाउन लगाकर पूरी तरह ठप्प कर दिया। जिससे हमारी अर्थव्यवस्था बुरी तरह चरमरा गयी। ऐसे में सरकार ने इस बार सीध्ेा भगवान को ही इसके लिये कसूरवार ठहरा दिया है। अगर आंकड़ों पर नज़र डालें तो साफ पता लगता है कि हमारी अर्थव्यवस्था 2016 से ही नोटबंदी के बाद से लगातार गिरती चली जा रही थी। इसके बाद जीएसटी गलत तरीके से लगाने से इसमें गिरावट और तेज़ होती चली गयी। बेशक कोरोना महामारी ने इसको पर लगा दिये। लेकिन एक्ट ऑफ सरकार को एक्ट ऑफ भगवान बताकर जनता को गुमराह नहीं किया जा सकता। मोदी सरकार ने जीएसटी लागू करते हुए राज्यों को जो क्षतिपूर्ति हर साल 14फीसदी बढ़ोत्तरी और पर्याप्त कर का हिस्सा देने का वादा किया था। अब वह एक्ट ऑफ गॉड की आड़ में वह देने की हालत में भी नहीं है। केंद्र का कहना है कि राज्य सरकारें रिज़र्व बैंक से कर्ज़ ले सकती हैं। सवाल यह है कि केंद्र की गलत नीतियों का खामियाज़ा राज्य सरकारें क्यों भुगतेंज़ाहिर बात है कि इसके लिये राज्य खासतौर पर विपक्षी सरकारें किसी कीमत पर तैयार नहीं हैं। उधर केंद्र सरकार एक के बाद एक सरकारी उपक्रम अपने चहेते पूंजीपतियों को बेचकर अपने पास हो रही पैसे की कमी को दूर करने को आत्मघाती कदम उठाने में भी संकोच नहीं कर रही है। लेकिन राज्य की सरकारों के पास ऐसा भी कोई विकल्प उपलब्ध नहीं है। उनके सामने अपने कर्मचारियोें को वेतन तक देने का संकट खड़ा हो रहा है। हैरत और दुख की बात यह है कि जिन धार्मिक स्थलों के पुजारी और मौलाना कोरोना का शिकार हो गये उन्होंने भी इसके लिये भगवान को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया। भगवान राम के मंदिर विवाद के बहाने बनी सरकार से ज़्यादा धार्मिक तो भगवान के वो भक्त निकले जो कोरोना से मरने से पहले तक भी यही कहते रहे कि हमारे कर्म ही इसके लिये दोषी हैं। एक्ट ऑफ गॉड बताने से एक और ख़तरा लोगों के सर पर मंडरा रहा है। कहीं ऐसा ना हो कि पहले ही एक दूसरे की जान के दुश्मन बना दिये गये अलग अलग धर्मोे के लोग एक दूसरे के भगवान को इसके लिये ज़िम्मेदार ठहराकर आपस में भिड़ जायें। इसमें भी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की आशंका अधिक बनी रहती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कभी भी किसी देश को तालाबंदी का सुझाव नहीं दिया। पूरी दुनिया में चंद देशों ने ही कोरोना रोकने को लॉकडाउन का सहारा लिया। यहां तक कि जिस चीन से कोरोना पूरी दुनिया में फैला उसने भी अपने एक सीमित क्षेत्र वुहान में ही चंद दिनों के लिये तालाबंदी की। इस दौरान चीन सहित बंगलादेश आदि कई देशों की जीडीपी हमारी तरह गिरी भी नहीं। इसका मतलब है कि कोरोना और लॉकडाउन को जीडीपी गिरने का बहाना बनाना ही सिरे से गलत है। इस दौरान आर्थिक संकट से निपटने को सरकार ने एक और गल्ती की। उसने 20 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज जो घाषित किया उसमें कर्ज बांटकर उत्पादन बढ़ाने का उल्टा फैसला किया। जबकि बड़े अर्थशास्त्री लगातार उसको सुझाव दे रहे थे कि इस समय कर्ज या प्रोडक्शन की नहीं मांग यानी कंजम्पशन बढ़ाने की ज़रूरत है। जिसके लिये सरकार को ना केवल अपना खर्च बढ़ाना चाहिये था बल्कि ज़रूरतमंद गरीब या जिनकी नौकरी और कारोबार बंद हो गये उनके हाथ में एकमुश्त सहायत राशि देनी चाहिये थी। इससे बाज़ार में मांग पैदा होती। मांग बढ़ती तो माल का उत्पादन बढ़ता। उत्पादन बढ़ता तो रोज़गार फिर से बढ़ने लगते। साथ ही प्रोडक्शन और आर्थिक गतिविध्यिां एक बार फिर बढ़ने से सरकार का टैक्स भी बढ़ने लगता। ऐसा होने से बैंकों के पास उसका पुराना कर्ज़ भी वापस आता और नया कर्ज़ लेने भी और अधिक लोग आते। इससे सरकार और जनता के सामने आर्थिक संकट इस तरह से इस हद तक ना बढ़ता। जैसा आज बढ़ता जा रहा है। भले ही सरकार ना माने लेकिन जनता धीरे धीरे यह समझने लगी है कि मोदी सरकार के पास अपने अर्थ या किसी भी क्षेत्र के विशेषज्ञ खुद तो हैं नहीं। साथ ही अपनी साम्प्रदायिकता तानाशाही वनमैन शो मनमानी अहंकार व्यक्तिपूजा और नालायकी की वजह से वह बाहरी या विरोधी खेमे के निष्पक्ष वरिष्ठ जानेमाने विशेषज्ञों की बात भी नहीं मानती। ऐसे में एक के बाद एक बाद गलत फैसलों से उसके बड़े बड़े दावों की पोल खुलती जा रही है। लेकिन देखना यह है कि मुसलमानों या विपक्ष के इंसानों के बाद अब भगवानों को वह अपनी किस किस नाकामी नालायकी और अयोग्यता के लिये दोषी बताकर जनता को खुद से खफा होने से कब तक रोक सकती है?                                       

0 न इधर उधर की बात कर ये बता क़ाफ़िला क्यों लुटा,

  मुझे रहज़नों से गिला नहीं तेरी रहबरी का सवाल है।।         

Monday, 17 August 2020

सबकी कट्टरता का विरोध हो...

सब धर्मों की कट्टरता का विरोध होना चाहिये !

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस मार्कन्डेय काटजू और वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का यह कहना बिल्कुल वाजिब लगता है कि कट्टरता और साम्प्रदायिकता बहुसंख्यकांे की हो या अल्पसंख्यकों कीवह ख़राब ही होती है। वरिष्ठ समाज विज्ञानी और सेफोलोजिस्ट योगेंद्र यादव भी कई बार यही बात दोहरा चुके हैं कि तथाकथित सेकुलर दलों की अल्पसंख्यक धार्मिक तुष्टिकरण की घटिया सियासत से संघ परिवार को बहुसंख्यकों की साम्प्रदायिकता व कट्टरता बढ़ाने में भारी मदद मिली है।            

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

      हाल ही में कर्नाटक की राजधानी बंगलुरू में अल्पसंख्यक समुदाय की भीड़ ने सोशल मीडिया पर अपने धर्म के खिलाफ वायरल हुयी एक बेहद आपत्तिजनक पोस्ट के बाद हिंसक प्रदर्शन किया। विवादित पोस्ट और हिंसक प्रदर्शन दोनों की तमाम निष्पक्ष लोगों व संगठनों ने निंदा की है। आरोप है कि पोस्ट करने वाला सत्तारूढ़ राजनीतिक दल से जुड़ा हुआ होने के कारण पुलिस उसके खिलाफ रपट दर्ज करने को तैयार नहीं थी। जिससे लोगों में गुस्सा बढ़ा और वे तोड़फोड़ आगज़नी और अराजकता पर उतर आये। हिंसक भीड़ पर पुलिस की ओर से गोली चलाये जाने से तीन लोगों की मौत भी हो गयी।

करोड़ों रू0 की सम्पत्ति आग की भेंट चढ़ गयी। पूरा सच जांच के बाद सामने आयेगा। लेकिन अब तक इस मामले में तमाम तरह के आरोप प्रत्याआरोप लग रहे हैं। हमारा कहना है कि विवादित पोस्ट चाहे जितनी भी आपत्तिजनक रही हो लेकिन लोगों को कानून अपने हाथ में नहीं लेना चाहिये था। अगर पुलिस रपट दर्ज नहीं कर रही थी तो लोगों को कोर्ट जाना चाहिये था। इससे पहले भी देश के विभिन्न राज्यों में समय समय पर ऐसी हिंसक घटनायें होती रही हैं। इससे पहले गोरक्षा के नाम पर मॉब लिंचिंग की अनेक घटनायें हमारे देश में होती रही हैं।

इन मामलों में भी कानून हाथ में लेने उल्टा पीड़ित के खिलाफ केस दर्ज करने और आरोपियों को बचाने हल्की धाराओं में चालान करने थाने से ही ज़मानत दे देने उनको संघ परिवार द्वारा कानूनी व आर्थिक सहायता देकर सम्मानित और पुरस्कृत करने की खुद बहुसंख्यक समाज के बड़े वर्ग ने निंदा और आलोचना की है। इससे पहले शाहबानो मामले सलमान रूशदी और तस्लीमा नसरीन को लेकर कट्टरपंथी अल्पसंख्यकों का जो आक्रामक व हिंसक रूख रहा है। उसको भी सेकुलर वर्ग ने कभी पसंद नहीं किया है।

लेकिन पूर्व जज काटजू और वरिष्ठ पत्रकार आशुतोष का यही कहना है कि अल्पसंख्यकों की साम्प्रदायिकता कट्टरता और भावनायें भड़कने पर बात बात पर हिंसक हो जाना बहुसंख्यक समाज को साम्प्रदायिक कट्टर व संकीर्ण बनाकर उनको संघ और भाजपा के बैनर के नीचे वोटबैंक के रूप में लाने में बहुत ही सहायक रहा है। जानकार तो यहां तक कहते हैं कि बहुसंख्यक तो कभी कभी अपनी संख्या व सत्ता की ताकत में आपे से बाहर हो सकते हैं। लेकिन अल्पसंख्यक तो हर देश में हिंसा की पहल तो दूर जायज़ और कानूनी मामले मंे भी डरे व सहमे हुए ही रहते आये हैं। लेकिन 2014से पहले भारत इसका अपवाद था।

मिसाल के तौर पर अगर हम अपने पड़ौस मंे देखें तो आजकल पाकिस्तान में वहां का 15साल का फ़ैसल खान वहां के मीडिया में छाया हुआ है। सोशल मीडिया में वकीलों और पुलिस के साथ उसकी सैल्फी वायरल हो रही है। वहां के कट्टरपंथी भी उसको पवित्र योध्दा का खिताब देकर जनता में उसको हीरो की तरह पेश कर रहे हैं। फै़सल का कारनामा यह है कि उसने ईशनिंदा के 57 साल के एक अमेरिकी आरोपी  ताहिर नसीम को भरी अदालत मंे गोलियों से भून दिया है। वजह चाहे जो हो लेकिन यह साफ है कि फैसल एक हत्यारा है।

लेकिन पाकिस्तान में उसकी इस घटिया हरकत के प्रति इतनी दीवानगी और पागलपन सवार है कि उसका बचाव करने को वकीलों की एक बड़ी फौज लाइन मंे लगी है। फैसल ने पेशावर की जिस अदालत में यह खूनी खेल खेला है। वहां तीन स्तर पर सुरक्षा जांच होती है। उसके रिवॉल्वर लेकर कोर्टरूम मेें पहंुच जाने में पुलिस और कोर्ट प्रशासन मिला हुआ था। यह शक इससे भी पुख़्ता होता है। जब फैसल मर्डर के बाद पकड़े जाने पर पुलिस वैन में बैठा आराम से फोटो और वीडियो बना रहा था तो उसके साथ मौजूद पुलिस अफसर और सरकारी अधिकारी न केवल उसको यह सब करने दे रहे थेबल्कि ऐसे मुस्कुरा रहे थे और वी व थम्पसअप का निशान बना रहे थे जैसे फैसल ने बड़ा बहादुरी और हिम्मत का नेक काम किया हो।

ब्लैसफेमी सन्दिग्ध नसीम की गोली लगने के बाद मौके पर ही मौत हो गयी थी। नसीम के अमेरिका मूल का नागरिक होने से यह घटना पूरी दुनिया में चर्चा और निंदा का विषय बन गयी है। इस घटना के बाद हत्यारा फैसल जहां कट्टरपंथियों का लाडला बन गया है। वहीं यू एन ओ मानव अधिकार संगठनों सहित पूरी विश्व बिरादरी में पाकिस्तान के इस  पुराने काले कानून को ख़त्म करने की मांग एक बार फिर से तेज़ हो गयी है। उधर फैसल के घर पर उसके परिवार के पक्ष में कट्टरपंथी मूर्ख और धूर्त लोगों का मजमा बढ़ता जा रहा है। जो उसके समर्थन में अब तक अनेक रैली प्रदर्शन और आंदोलन चला चुके हैं।

फैसल के पक्ष मंे आम मुसलमान ही नहीं कई जाने माने नागरिक संगठन वकील राजनेता और मौलाना तक खुलकर सरकार के खिलाफ खड़े हो गये हैं। यहां तक कि कुख्यात आतंकी संगठन पाकिस्तान तालिबान का बधाई संदेश भी फैसल के घर हर तरह की कानूनी आर्थिक मदद के लिये पहुंच चुका है। कट्टरपंथी उसके परिवार को इस हत्या के लिये बाकायदा मुबारकबाद दे रहे हैं। इस मामले में अमेरिका के सख़्त तेवर दिखाने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने यह कहकर कि कानून अपना काम करेगा औपचारिक बयान देकर मामले से अपना पल्ला झाड़ लिया है।

आपको याद होगा कि इससे कई साल पहले पाक के पंजाब राज्य के गवर्नर सलमान तासीर को भी उनके अपने ही अंगरक्षक मुमताज़ कादरी ने इस विवादित कानून की समीक्षा करने की मात्र मांग करने के बयान पर गोली मारकर हत्या कर दी थी। मतलब कट्टरपंथी सब एक जैसे ही होते हैं।                                                                

 लेखक नवभारत टाइम्स डॉटकॉम के ब्लॉगर व स्वतंत्र पत्रकार हैं ।।           

Sunday, 9 August 2020

कब ख़त्म होगा कोरोना?

अधिकांश को है होनातब ख़त्म होगा कोरोना?

0आज हर किसी के दिमाग मंे एक ही सवाल है कि आखि़र कोरोना कब ख़त्म होगाहमने दो माह का सख़्त लॉकडाउन लगाकर देख लियालेकिन कोरोना की चैन नहीं टूटी।62,538 प्रतिदिन कोरोना पॉज़िटिव का आंकड़ा हम छू चुके हैं। अगर सरकार अब हो रहे कुल टैस्ट 5 लाख से बढ़ाकर 10 लाख तक रोज़ करने लगती है तो दो माह बाद इस स्पीड से यह आंकड़ा डेली 1,60,000 तक पहंुच सकता है। ऐसा 3 प्रतिशत रोगी रोज़ बढ़ने से लग रहा है। अंत मंे 2 लाख मरीज़ रोज़ और कुल कोरोना पॉज़िटिव 2 करोड़ से अधिक तक हो सकते हैं। अंग्रेजी दैनिक इंडियन एक्सप्रैस का यह अनुमान है।           

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   डब्ल्यू एच ओ यानी विश्व स्वास्थ्य संगठन का सर्वे तो यह कहता है कि कोरोना जब तक आधे से अधिक आबादी को संक्रमित नहीं करेगा। तब तक इससे दो ही तरीकों से छुटकारा मिल सकता है। उन दो उपायों में कोरोना की वैक्सीन या इसकी दवाई शामिल है। हालांकि पूरी दुनिया में इन दोनों कामों पर वैज्ञानिक और डाक्टर पूरी तत्परता से अनुसंधान कर रहे हैं। उनको इस मिशन में कुछ प्राथमिक सफलतायें मिली भी हैं। लेकिन इसके आविष्कार में मेडिसिन तलाश करने से लेकर क्लिनिकल ट्रायल मानवीय परीक्षण पेटेंट सरकारी औपचारिकतायें और साइड इफैक्ट से बचने को अन्य सुरक्षा उपाय करने में 6 से 18 महीने लगने ही हैं।

इसके साथ ही दवा या टीका मिल जाने पर इसका इतना पर्याप्त उत्पादन करना कि यह पूरे विश्व की जनसंख्या को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो जाये। वह भी अपने आप में एक बड़ी चुनौती होगा। साथ ही इसमें चाहे जितनी जल्दी और बड़े पैमाने पर प्रोडक्शन निर्यात और वैक्सीनेशन किया जाये। कुछ माह नहीं बल्कि कुछ साल लग सकते हैं। एक समस्या इसके खर्च को लेकर भी आने वाली है। विकसित देश तो इसको किसी कीमत पर भी आयात कर सकते हैं। लेकिन भारत जैसे विकासशील और बड़ी आबादी के देश को यह दवा विदेश से मंगाने या अपने यहां बनाने से लेकर अपनी बड़ी गरीब आबादी को उपलब्ध कराने तक में कई बाधाओं को पार करना होगा।

    ऐसे में सवाल यह है कि जब लॉकडाउन से कोरोना को नहीं हराया जा सका तो अब सरकार और जनता क्या करेजनता अर्थव्यवस्था बंद होने से लॉकडाउन भी आखि़र कितने दिन झेल सकती थीसरकार ने मास्क शारिरिक दूरी और बार बार हाथ धोने की शर्तों के साथ लॉकडाउन खोला तो लोग इन नियम कानूनों का भी पालन नहीं कर रहे हैं। ऐसे में एक ही रास्ता बचता है कि हम कोरोना को अपना संक्रमण फैलाने को खुला छोड़ दें। इससे जब देश की आध्ेा से अधिक आबादी धीरे धीरे करके संक्रमित हो चुकी होगी तो उसमें हर्ड इम्युनिटी आ जायेगी।

यानी उसमें कोरोना के प्रति रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने से वे ठीक इस तरह से कोरोना से संक्रमित होने से सुरक्षित हो जायेंगे। जैसे किसी को एन्टी कोरोना वैक्सीन दिया जा चुका हो। अब सवाल यह है कि इस सारे अभियान और योजना में कुल कितना समय कितना धन और कितने संसाधनों की आवश्ययकता होगीजब तक कोरोना संक्रमण अपने पीक यानी चरम पर नहीं आ जाता है। तब तक हम चैन की संास नहीं ले पायेंगे। आपको याद होगा कि हमने काफी पहले कोरोना से निबटने का ख़तरनाक विकल्प हर्ड इम्युनिटी पर भी एक लेख लॉकडाउन के दौरान लिखा था।

लेकिन उस समय सरकार से लेकर समाज तक इतना डरा हुआ था कि कोई उस विकल्प पर गंभीर चर्चा तक करने को तैयार नहीं था। समय बदलता रहता है। कल तक जो हर्ड इम्युनिटी का विकल्प असंभव और अव्यवहारिक लग रहा था। वो आज सरकार और जनता दोनों को अपरिहार्य लग रहा है। जहां सरकार लॉकडाउन सही समय पर नहीं लगा सकी वहीं जनता भी लॉकडाउन आगे सहन करने की स्थिति में नहीं थी। साथ ही जनता अपनी रोज़ी रोटी के सवाल को कोरोना से अहम सवाल मानकर संक्रमित होने का जोखिम लेने को तैयार लग रही है।

वह मास्क फिज़िकल डिस्टेंसिंग और बार बार साबुन से हाथ तक धोने को तैयार नहीं है। अलबत्ता जान से हाथ धोने को अपनी लापरवाही मनमानी और नादानी के चलते लोग रोज़ सड़कों पर आपको दिखाई दे रहे होंगे। मिसाल के तौर पर आंकड़े बताते हैं कि एक करोड़ के लगभग आबादी वाले देशों को कोराना संक्रमण के पीक पर पहुंचने मेें लगभग दो सप्ताह का औसत समय लगा है। जहां तक यूरूप आदि के 4 से 5 करोड़ जनसंख्या के मुल्कों का मामला है। उनको कोरोना इन्फैक्शन में चरम पर पहुंचने में लगभग एक माह तक का समय लगा है।

आंकड़े हमें कई मामलों में भ्रमित भी करते हैं। उदाहरण के रूप में इंडोनेशिया को देखें जिसकी पॉपुलेशन लगभग 28 करोड़ के आसपास है। उसको संक्रमण के चरम बिंदु पर पहुंचने में 140 दिन से अधिक लग गये। तज़ाकिस्तान की आबादी एक करोड़ होते हुए उसको 15 दिन में ही कोरोना का चरम हासिल हो गया। जबकि अन्य देशों से मुकाबला करें तो उसको पीक पर पहुंचने में 60 दिन लगने चाहिये थे। जहां तक भारत का सवाल है। यहां कोरोना केस 3 से 4 प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रहे हैं।

अगर सरकार प्रतिदिन होने वाली टैस्टिंग 5लाख से बढ़ाकर 10 लाख तक ले जाती है तो हमारे यहां आज मिल रहे लगभग 50 से 60हज़ार कोरोना मरीज़ की तादाद दो माह बाद 2लाख रोज़ तक पहंुच सकती है। इस तरह आज का कुल कोरोना पॉज़िटिव का आंकड़ा भी 20 लाख से बढ़कर 80 लाख तक पहंुच सकता है। लेकिन हैरत और दुख की बात यह होगी कि यह आंकड़ा भी पीक यानी कोरोना का दि एंड नहीं होगा। बस इतना होगा कि इसके बाद रोज़ मिलने वाले कोरोना पॉज़िटिव केस कम होने लगेंगे। इसके बाद भी कोरोना चार माह के बाद यानी जनवरी 2021 तक चलता रहेगा। इंडियन एक्सप्रैस के अनुसार कोरोना के कुल केस 2 करोड़ 75 लाख तक पहुुंुच सकते हैं।                                                               

।लेखक पब्लिक ऑब्ज़र्वर के चीफ़ एडिटर व स्वतंत्र पत्रकार हैं।         

Tuesday, 4 August 2020

राजस्थान का महाभारत

राजस्थान का महाभारत: भाजपा बना ही देगी कांग्रेसमुक्त भारत?

0पहले 2014 और फिर 2019 में भाजपा ने केंद्र से कांग्रेस का सूपड़ा पूरी तरह साफ़ करके अमित शाह की 50 साल राज करने की बात को किसी हद तक सही साबित किया। अब वह एक के बाद एक कांग्रेस शासित राज्यों में चुनाव हारकर भी कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने का जैसा साम दाम दंड भेद वाला आक्रामक अभियान छेड़े हुए है। उससे ऐसा लगता है कि वह बहुत जल्दी ही कांग्रेसमुक्त भारत का सपना पूरी कर लेगी। राजस्थान का महाभारत भी भाजपा जीतेगी।          

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   पहले कर्नाटक फिर मध््यप्रदेश और अब राजस्थान में जिस तरह से भाजपा ने कांग्रेस को एक एक कर राज्यों की सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाना शुरू किया है। उससे यह साफ लग रहा है कि आज नहीं तो कल किसी भी राज्य में कम से कम कांग्रेस की सरकार नहीं बचेगी। जबकि यूपी में सपा त्रिपुरा में माकपा को उसने जिस तरह से पटखी दी उससे क्षेत्रीय या अन्य राष्ट्रीय दलों को भी यह खुशफहमी नहीं पालनी चाहिये कि कांग्रेस के बाद भाजपा उनको पहले की तरह आराम से सरकार चलाने देगी। भाजपा का अगला निशाना बंगाल की तृणमूल कांग्रेस है। यानी भाजपा पहले विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को निबटाना चाहती है।

ज़ाहिर है इसके बाद क्षेत्रीय और छोटे दलों को ठिकाने लगाना भाजपा के लिये आसान होगा। दिल्ली मेें ज़बरदस्त और भरपूर विकास कराने के बावजूद जिस तरह भाजपा ने आम आदमी पार्टी को राज्य के चुनाव में नाको चने चबवाये। उससे वह यह संदेश देने में सफल रही है कि इस बार ना सही लेकिन अगले चुनाव तक वह दिल्ली की सत्ता हर हाल हर कीमत पर छीनकर ही दम लेगी। सवाल यह है कि बिना किसी ठोस उपलब्धि विकास शिक्षा स्वास्थ्य रोज़गार कानून व्यवस्था ठीक किये बिना भ्रष्टाचार महंगाई और काला धन रोके बिना भाजपा केंद्र के साथ साथ राज्यों में क्यों सरकार बनाती जा रही है?

सवाल यह भी है कि तमाम अराजकता कमियांे शिकायतों तबाही बरबादी और मनमानी के बावजूद वह बार बार चुनाव में विभिन्न राज्यों में जीतकर या तो खुद ही आ जाती है या फिर चुनाव के कुछ माह बाद ही विपक्षी विधायकों को तोड़कर जोड़तोड़ से अपनी सरकार चोर दरवाजे़ से बनाने में सफल हो जाती हैसच यह है कि किसी भी राज्य में भाजपा की रूचि जनहित में सरकार बनाना या चलाना नहीं है।

उसको पता है कि अधिक पैसा राज्यों की सरकार के हाथ में होता है। इसलिये 200 से400 करोड़ तक में एक दो दर्जन विधायक खरीदकर जैसे तैसे पूंजीपतियों के बल पर किसी राज्य में सरकार बना लेना भाजपा के लिये बायें हाथ का खेल बन गया है। जनादेश अपने खिलाफ होने के बावजूद पूरी बेशर्मी और ढीटता से भाजपा एक के बाद एक राज्य में सत्ता बदल का खुला खेल फर्रूखाबादी एक मिशन के तौर पर चला रही है। हिंदू राष्ट्र का सपना दिखाकर वह पूंजीपतियों के हित में खुलेआम काम कर रही है। मीडिया न्यायपालिका चुनाव आयोग और अन्य स्वायत्त संस्थायें उसने अपने अनुकूल बना ली हैं।

एक समय था। जब कांग्रेस भी पूरी बेहयाई और तानाशाही के साथ इसी तरह से लोकतंत्र की हत्या करती थी। लेकिन भाजपा का चाल चरित्र और चेहरे का दावा विपक्ष में रहते खूब ढिंढोरा पीटा जाता था। इसलिये तब हम जैसे पत्रकारों व निष्पक्ष नागरिकों ने कांग्रेस से भी ऐसे ही सवाल पूछे थे और आज भाजपा से भी पूछ रहे हैं। यह सवाल बार बार उठता रहा है कि इस हद तक नीचे जाकर भाजपा कांग्रेस की सरकार क्यों गिरा रही हैइसका एक जवाब तो यह है कि ऐसा करने से भाजपा की पकड़ पुलिस प्रशासन पर मज़बूत बनती है।

इसके बल पर वह अगला विधानसभा और लोकसभा चुनाव आराम से जीत सकती है। इससे भाजपा मतदाताओं को लुभाने अपने मनपसंद अधिकारी तैनात करने सरकारी योजनाआंे में कमीशन बनाकर अपना आधार मज़बूत करने नये वोटबैंक जोड़ने उद्योगपतियों को जायज़ नाजायज़ लाभ पहुुुंचाकर उनसे चुनाव मंे मोटा चंदा वसूलने अपना हिंदूवादी एजेंडा लागू कर लोगों को धर्म के नाम पर भावुक कर असली मुद्दों से भटकाकर उनका थोक में वोट लेने में काफी हद तक सफल हो जाती है।

भाजपा को केंद्र की सत्ता में रहकर अनुभव हो गया है कि केंद्र से कहीं अधिक और आसानी से बहुत सा काला धन चुनाव में और विधायक खरीदने को राज्यों की सरकार के बल पर पैदा किया जा सकता है। दूसरा लाभ यह होता है कि ऐसा करके कांग्रेस सहित सारे विपक्ष को पैसा बनाने और सरकारी मशीनरी के इस्तेमाल से रोककर कमज़ोर किया जा सकता है। विपक्ष को केंद्र सरकार के द्वारा कंेद्रीय एजेंसी जैसे इनकम टैक्स एन्फोर्समेंट डायरेक्ट्रेट बैंक व सीबीआई के ज़रिये भी कमज़ोर और बदनाम किया जाता है।

यहां तक कि अगर कोई पूंजीपति या कंपनी विपक्ष की चंदा देकर मदद करता है तो केंद्र सरकार उस पर छापे डालकर ऐसा ना करने को भी मजबूर करती है। ऐसे मेें ले देकर राज्य सरकार अगर विपक्षी दल की है तो वह पूरी पार्टी के लिये एक तरह से लाइफ लाइन का काम करने लगती है। आंकड़े बताते हैं कि केंद्र अपने कुल 27 लाख करोड़ के बजट से जहां मात्र 7 लाख करोड़ अपने विवेक यानी मनमर्जी से खर्च कर पाता है। वहीं राज्य सरकारें अपने बजटों के 34 लाख करोड़ में से 60 प्रतिशत अपने हिसाब से खर्च करने को आज़ाद हैं।

सिंचाई सड़क शराब खनन डिस्कॉम की बिजली कोयला विभिन्न संयंत्र पशु चारा तेंदू पत्ता खरीद यानी राज्यों की क्रय सूची बहुत लंबी है। ज़ाहिर सी बात है कि खरीद अधिक तो कमीशन भी अधिक ही मिलता होगा। कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि राजस्थान जैसे राज्यों में सत्ता की महाभारत कांग्रेसमुक्त भारत बनाने की भाजपा की एक सोची समझी बड़ी और दूरगामी योजना का छोटा सा हिस्सा है। लेकिन याद रखिये तानाशाही मनमानी और वनमैन शो चाहे इंदिरा गांधी का रहा हो या चाहे मोदी का हो वह लोकतंत्र को कमज़ोर और धीरे धीरे ख़त्म करके अघोषित आपातकाल जनविरोधी अराजकता कर रास्ता ही खोलता है।