Sunday, 17 May 2020

कोरोना और काँग्रेस

मोदी के हर फै़सले का अंध विरोध ना करे कांग्र्रेस!

0पहले कांग्रेस ने कोरोना को काबू रखने के लिये लगाये गये लॉकडाउन का विरोध किया। उसके बाद मीडिया को जारी होने वाले सरकारी विज्ञापनों का विरोध करते हुए उनको रोकने की मांग की। और अब कांग्रेस सरकारी कर्मचारियों को मिलने वाले महंगाई भत्ते की चंद किश्तों को रोकने पर मोदी सरकार को कोस रही है। इसके बावजूद जनता में मोदी की लोकप्रियता और कांग्रेस का विरोध दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। कांग्रेस को सोचना चाहिये कि ऐसा क्यों है?    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   लोकतंत्र में बेशक विपक्ष का काम सत्तापक्ष की गलत नीतियों फैसलों और मनमानी का विरोध करना होता है। लेकिन विरोध के लिये विरोध करने से जिसका विरोध किया जाता है। वह पहले से और अधिक मज़बूत होता जाता है। साथ ही जो सहानुभूति और समर्थन विरोध करने वाले विपक्ष को जनता का मिलना चाहिये था। वह भी उल्टे कम होता जाता है। आजकल कांग्रेस जो मुख्य विपक्षी दल है, उसके साथ कुछ ऐसा ही मामला हो रहा है। 2014 में जब से कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बाहर हुयी है। उसने इस मुद्दे पर कभी गंभीरता से चिंतन मनन नहीं किया कि क्या वजह है कि 2019 आते आते वह और भी कमज़ोर और पीएम मोदी लगातार मज़बूत होते जा रहे हैं। कोरोना से निबटने को लेकर यह ठीक है कि मोदी सरकार से कुछ भूल कमियां और विशेषज्ञों से विचार विमर्श की कमी रही है। लेकिन इस मुद्दे पर कोई दो राय नहीं है कि इसका असर कम करने को फिलहाल सरकार के पास लॉकडाउन ही एकमात्र इलाज था। लेकिन कांग्रेस ने इसका विरोध करके खुद अपना राजनीतिक नुकसान किया। इसके बाद जब राहत पैकेज की बात आई तो यह भी ठीक है कि सरकार गरीब कमज़ोर और असहाय वर्ग को उतनी सहायता राशि राशन या पका हुआ भोजन नहीं परोस पाई जितना ज़रूरत थी। लेकिन पैसे की कमी पूरी करने को सरकार को मीडिया के हज़ारों करोड़ के विज्ञापन बंद करने का सुझाव देना कांग्रेस का मानसिक दिवालियापन ही कहा जा सकता है। इससे बचा खुचा मीडिया भी कांग्रेस के खिलाफ हो गया। दूसरे मीडिया जिसका बड़ा हिस्सा पहले ही मोदी सरकार के गीत गा रहा था। पहले से अधिक मोदी सरकार के पक्ष मंे झुक गया। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिये कि मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाता है। आज नहीं तो कल वह ज़िंदा रहेगा तो उसके निष्पक्ष रहने का रास्ता भी निकल सकता है। इसके बाद कांग्रेस ने मोदी सरकार के अब तक के सबसे अच्छे न्यायसंगत और सामाजिक समानता के फैसले सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों के तीन महंगाई भत्ते रोकने के फैसले का विरोध करके अपने हाथों से अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। क्या कांग्रेस को पता नहीं है कि केंद्र सरकार के 48 लाख कर्मचारी और 65 लाख पेंशनभोगी लोगों के जनवरी जुलाई 2020 और जुलाई 2021 के डीए की तीन किश्तें रोकने से सरकार को 37,530करोड़ रू. की बचत होगी। अगर राज्य सरकारें भी ऐसा करें तो 82,566 करोड़ रू. की बचत हो सकती है। अगर ये दोनों रकम जोड़ें तो एक लाख करोड़ से अधिक होगी। ये सब पैसा कोरोना से लड़ने को स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च हो तो हमारा हैल्थ बजट दोगुना हो जायेगा। ज़ाहिर है जिस तेज़ी से कोरोना के केस सामने आ रहे हैं। उसका असली उभार जून जुलाई में पीक पर होगा। ऐसे में हमें कोरोना से लड़ने को पहले से अधिक बजट की ज़रूरत होगी। ऐसे में कोई भी मोदी सरकार के इस फैसले को गलत नहीं बता सकता। अलबत्ता कांग्रेस की मोदी सरकार से बुलैट ट्रेन और सेंटर विस्टा के निर्माण की मांग फिलहाल रोकने को उचित माना जा सकता है। लेकिन जहां तक उसका सरकारी कर्मचारियों के डीए रोकने से कम वेतन वालों को समस्या आने का लचर तर्क का सवाल है, वह पूरी तरह गलत है। मिसाल के तौर पर दिल्ली के एक सरकारी चपरासी का मूल वेतन 18000 है। उसमें डीए और अन्य भत्ते जोड़े जायें तो यह लगभग 30,000 हो जाता है। नेशनल सैंपल ऑर्गनाइजे़शन का कहना है कि पांच लोगों के परिवार के लिये किसी सरकारी कर्मचारी का यह सबसे कम वेतन देश के 85 प्रतिशत लोगों की कुल मासिक आय से अभी भी अधिक है। एन एस ओ के 2017-18 के 75वें दौर के मासिक खर्च के आंकड़े जोड़कर देखा जाये तो उस कर्मचारी को 1500 रू. के डीए का नुकसान होगा। लेकिन दिल्ली के ही निजी क्षेत्र के अकुशल श्रमिक के 14,842 वेतन के सापेक्ष यह अभी भी अधिक है। सरकारी सर्वे बताते हैं कि देश के अधिकांश परिवार 10,000 से कम मासिक आय पर जीवन यापन कर रहे हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि कांग्रेस किस वर्ग के पक्ष में खड़ी है? क्या कांग्रेस नहीं जानती कि कोरोना के बाद लगे लॉकडाउन से 12 करोड़ मज़दूरोें की नौकरी चली गयी है। क्या उसको यह नहीं पता कि स्वरोज़गार वाले करोड़ों लोग मजबूरन घरों में बंद रहकर अपने कारोबार से पूरी तरह हाथ धो बैठे हैं। क्या कांग्रेस यह भी नहीं जानती कि तमाम निजी क्षेत्र की नौकरी जा रही हैं। हालत यह है कि 80 लाख से अधिक प्राइवेट कर्मचारियों ने अपना 3200 करोड़ से अधिक का भविष्य निधि का पैसा भुखमरी से बचने को रिटायर होने से पहले ही निकाल लिया है। जहां तक सरकारी कर्मचारियों के हाथ में अधिक पैसा आने से बाज़ार में मांग बढ़ने का कांग्रेस का दावा है। अगर यह पैसा गांवों और गरीबों के हाथ में आये तो बाज़ार में अधिक मांग निकलती है। अलग अलग राज्यों में फंसे हुए मज़दूरों के लिये रेल चलने पर मोदी सरकार द्वारा किराया वसूलने पर उनका किराया कांग्रेस द्वारा दिये जाने का मास्टर स्ट्रॉक सोनिया गांधी का अब तक का सबसे सही और बड़ा सराहनीय फैसला था। मगर बाकी मामलों में अनेक गल्ती मनमानी और देरी करने के बावजूद मोदी सरकार को कांग्रेस और विपक्ष अब तक ठीक से घेर नहीं पाया है। अलबत्ता केरल दिल्ली और राजस्थान की कई विपक्षी राज्य सरकारों ने कोरोना से सफलतापूर्वक निबटकर देश के सामने एक शानदार मिसाल ज़रूर पेश की है।                                                     

Tuesday, 5 May 2020

कोरोना हर्ड इम्युनिटी

कोरोना हर्ड इम्युनिटी: लॉकडाउन का ख़तरनाक विकल्प ?

0सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मारकंडेय काटजू ने लॉकडाउन को कोरोना से बचाव ना मानते हुए इसे तत्काल हटाने की मांग की थी। अब रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने रोज़ एक लाख लोगों के टैस्ट किये बिना लॉकडाउन को निरर्थक बताया है। विपक्षी कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो पहले ही इसे पॉज़ बटन बता चुके हैं। लेकिन अब दुनिया में लॉकडाउन का विकल्प हर्ड इम्युनिटी को लेकर चर्चा तेज़ हो गयी है। रिसर्च क्या कहती हैं?    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   प्रैस कौंसिल ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन और सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज मारकंडेय काटजू ने कहा कि कोरोना बेशक बड़ी घातक महामारी है। लेकिन इससे लॉकडाउन लगाकर नहीं निबटा जा सकता क्योंकि ऐसा करने से देश की40 से 50 करोड़ जनता रोज़गार छिनने और घरों में बंद होने से भूख से मरने का ख़तरा है। उनका यह भी कहना है कि आंकड़े बताते हैं कि हर साल दुनिया ही नहीं भारत में इन्फुलुएंज़ा,मलेरिया, डेंगू, टीबी, कैंसर और डायबिटीज़ से लाखों लोग मरते हैं। उनका मतलब शायद यह था कि कोरोना से इन बीमारियों से अधिक लोग नहीं मरेंगे।

लेकिन यहां काटजू साहब यह भूल गये कि अगर किसी के यहां साल में दो तीन बार चोरी होती है तो क्या चौथी बार चोर को चोरी की इजाज़त केवल इस वजह से ही दे दी जाये कि उसके यहां तो चोरी पहले से ही होती चली आ रही हैै। साथ ही यह भी याद रखना चाहिये कि कोरोना छुआछूत की सी महामारी है। जो संपर्क मंे आने वाले दूसरे लोगों को लगातार संक्रमित करती रहेगी। जबकि हर साल होने वाली अन्य बीमारियों का स्वभाव ऐसा नहीं है। जहां तक रघुराम राजन का सवाल है। उनकी इस बात में दम है कि अमेरिका में रोज़ डेढ़ लाख टैस्ट हो रहे हैं।

जबकि उसकी आबादी 30 करोड़ है। हमारे देश में मात्र 25 से 30 हज़ार टैस्ट हो रहे हैं। जिनको बढ़ाकर कम से कम एक लाख किया जाना चाहिये। अगर अमेरिका के हिसाब से चलें तो यह संख्या पांच लाख तक होनी चाहिये। यह बात भी सही है कि जितने अधिक लोगों का टैस्ट होगा। उतने ही अधिक कोरोना पॉज़िटिव हम तलाश सकेंगे। उनका लॉकडाउन के चलते उपचार करके अन्य लोगों को संक्रमण होने से बचाया जा सकेगा। अमेरिका की पिं्रसटन यूनिवर्सिटी की रिसर्च में पता चला है कि अगर लॉकडाउन का विकल्प हर्ड इम्युनिटी को माना जाये तो इसके लिये देश के 60 प्रतिशत लोगों को संक्रमित होने के लिये 7 माह का समय लगेगा।

इसके बाद कोरोना का वायरस नये शिकार नहीं तलाश कर पायेगा। हालांकि अभी भी कोरोना होकर उबर चुके लोगों के खून से प्लाज़मा लेकर अन्य कोरोना रोगी को चढ़ाने से उसकी इम्युनिटी बढ़ने की बातें सामने आ रही हैं। लेकिन हमारी सरकार का कहना है कि यह अभी अनुसंधान का मामला है। यह बात साफ है कि न तो अभी कोरोना की कोई वैक्सीन बनी है। ना ही कोरोना की कोई दवा सामने आई है। ऐसे मंे सवाल यह है कि कब तक लॉकडाउन के बल पर कोरोना को रोकने का प्रयास सफल हो सकता है।

 दिल्ली की एक स्वास्थ्य संस्था की रिसर्च में पता चला है कि भारत में 93 प्रतिशत लोग 65साल से कम उम्र के हैं। इस संस्था का कहना है कि 50 से कम आयु वाले लोगों पर कोरोना का बहुत कम असर होता है। यानी जवान और अध्ेाड़ रोगी कुछ दिन हल्के फुल्के लक्ष्णों के बाद घर पर रहकर ही कोरोना से जीत सकते हैं। गंभीर रोगियों को अस्पताल में भर्ती किया जा सकता है। जानकारों का कहना है कि इससे पहले ही अर्थव्यवस्था का हो चुका नुकसान लॉकडाउन आगे ना बढ़ने से रूकेगा। साथ ही लोगों की और नौकरी जाने का ख़तरा टलेगा।

घर में बंद गरीब और मज़दूर बाहर निकलकर जैसे तैसे कुछ भी काम धंधा कर अपना परिवार भूख से मरने से बचा सकेगा। जानकारों का यह भी कहना है कि अभी हमने 130 करोड़ जनता को एक तरह से क्वारंटाइन किया हुआ है। जबकि बच्चो और बुज़ुर्गों को ही घर में बंद रखने की ज़रूरत थी। आज किसी को कोरोना हो जाये तो उसके शरीर के अंदर कोरोना वायरस जाकर खुद को लाखों वायरस मंे विकसित कर लेता है। जब उस आदमी के शरीर में एंटी बॉडीज़ यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती जाती है तो कोरोना वायरस खत्म करने लगती है।

ऐसे में उसके शरीर से लाखों कोरोना वायरस बाहर निकलकर अन्य स्वस्थ लोगों को अपना शिकार बनाने लगते हैं। लेकिन एक समय ऐसे आता है कि जब लोगों की बड़ी संख्या वायरस से संक्रमित होकर उससे सफलतापूर्वक लड़ने की क्षमता पा जाती है। इसी को हर्ड इम्युनिटी कहा जाता है। इसे लॉकडाउन का विकल्प भी कहा जा रहा है। एक इस्राईली विशेषज्ञ ने दि जेरूसलम पोस्ट से कहा कि लॉकडाउन में संक्र्रमण दर उतनी सामने नहीं आई। जितना अनुमान हम लोगों ने लगाया था। नॉर्थ ईस्ट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जैफ हॉव ने बोस्टन ग्लोब में लिखा है कि जब कभी भी लोग घर से बाहर निकलेंगे तो कोरोना संक्रमण फिर से बढ़ने लगेगा।

उनका कहना है कि जब तक लॉकडाउन के दौरान पर्याप्त संख्या में लोगों को तीन टी यानी ट्रेस टैस्ट और ट्रीटमेंट ना दे दिया जाये। तब तक लॉकडाउन का कोई खास लाभ होने वाला नहीं है। उनका यह सवाल भी वाजिब है कि आप लॉकडाउन कब तक बढ़ा सकते हैं? विशेष रूप से गरीब और विकासशील देशों की इकॉनोमी का तो लगातार लॉकडाउन से दिवाला ही निकल सकता है। उधर हर्ड इम्युनिटी के विकल्प के विरोधी कहते हैं कि यह प्रयोग बहुत ख़तरनाक है। उनका कहना है कि हर्ड इम्युनिटी के लिये आधी आबादी ही नहीं 60 से 85प्रतिशत जनता को इन्फैक्टेड होने के लिये खुला छोड़ना होगा।

ऐसे मंे यह ठीक ठीक कोई नहीं बता सकता कि इसका कितना कैसा और कब तक असर होगा? अगर यह जोखि़म उठाकर 10 से 20प्रतिशत लोगों को कोरोना का गंभीर शिकार बनना पड़ा तो भारत जैसे देश में यह संख्या 10से 20 करोड़ से अधिक हो सकती है। ऐसे में इतनी बड़ी रोगियोें की फौज को उपचार कैसे दिया जायेगा? किसी भी देश के पास इतने संसाधन अस्पताल आईसीयू वैंटिलेटर और यहां तक कि क्वारंटाइन सेंटर तक नहीं हैं। खुद अमेरिका इस मामले में इतना शक्तिशाली देश होकर गच्चा खा गया हैै। ब्रिटेन ने शुरू शुरू में हर्ड इम्युनिटी का कंसैप्ट अपनाने का साहस दिखाया था।

लेकिन यह देर से लिया गया फैसला था। उसके पीएम बोरिस जॉनसन जब खुद कोरोना के शिकार होकर अस्पताल पहुंच गये तो उसने इस कदम से तौबा कर ली। इसके बाद बाकी देशों को भी यह विकल्प मज़ाक लगने लगा। उधर स्वीडन ने दावा किया है कि उसने अपनी राजधानी स्टॉकहोम में हर्ड इम्युनिटी के विकल्प को कामयाबी से अपनाया है। लेकिन उसकी परिस्थितियां कुछ अलग तरह की हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी हर्ड इम्युनिटी के विकल्प के पक्ष में नहीं है। ऑस्ट्रेलिया के महामारी विशेषज्ञ जाइडियोन मेयेरोविट्ज़ ने गार्जियन अख़बार को बताया कि हर्ड इम्युनिटी वंचित और कमज़ोर वर्ग के गरीब लोगों की बड़ी कुर्बानी लेगा।

वे इसे अर्थव्यवस्था बचाने को बड़ी कीमत चुकाना और अनैतिक व अमानवीय मानते हैं। साथ ही वे हर्ड इम्युनिटी हासिल करने के लिये उच्च जोखिम वालों यानी बच्चो और वरिष्ठ नागरिकों को बचाने की योजना को अव्यवहारिक मानते हैं। उनका कहना है कि जब एक बार कोरोना वायरस को खुलकर अपना खेल करने को आज़ाद छोड़ दिया जायेगा तो यह कम इम्युनिटी वाले नौजवान वर्ग को भी अपना बड़ा श्किार बना सकता है। कैनेडा की मुख्य जन स्वास्थ्य अधिकारी का भी यह मत है कि सवाल कोरोना संक्रमितों की संख्या या उनमें कम दिख रहे लक्ष्णों का नहीं है।

यह भी हो सकता है कि ऐसे रोगियों में परंपरागत बुखार सूखी खांसी और सांस लेने में तकलीफ ना होकर कोरोना वायरस चुपचाप उनकी किडनी लीवर ब्रेन और हार्ट को भारी नुकसान कर दे। ब्लूमबर्ग के एक शोधपत्र में कहा गया है कि हर्ड इम्युनिटी की बजाये हम सबको बाज़ार में इसका वैक्सीन आने का इंतज़ार करना चाहिये। उनका कहना है कि दुनिया मंे ऐसे तीन दर्जन से अधिक प्रयोग खोज और विकल्प तलाश किये जा रहे हैं जिनसे आज नहीं तो कल कोरोना का टीका या दवा मिल ही जायेगी। तब तक हमें लॉकडाउन या हर्ड इम्युनिटी पर शासन व्यवस्था की तानाशाी या लोकतंत्र में क्या बेहतर है? चर्चा और तर्क वितर्क करते रहना चाहिये। फिलहाल तो कोरोना को मुख़ातिब करके यह शेर ही कहा जा सकता है-                                                    

0 मैं अपने ख़ौफ़ की हद पर खड़ा हूं,

  अब इसके बाद घबराना है तुम को।।        

Wednesday, 29 April 2020

लॉकडाउन और कोरोना

लॉकडाउन धीरे धीरे हटेगा, 

कोरोना साथ साथ चलेगा !

0कृषि क्षेत्र सहित कुछ क्षेत्रों से लॉकडाउन पहले चरण के बाद ही हट चुका था। पहले रोज़े से कुछ और दुकानें खुल गयीं हैं। बाक़ी 3 मई के बाद धीरे धीरे अलग अलग राज्यों के हिसाब से लॉकडाउन आज नहीं तो कल किश्तोें में हटना ही है। लेकिन एक चीज़ जो महीनों या सालों तक नहीं जायेगी वह कोरोना है। ज़ाहिर है कि कोरोना अब हमारी ज़िंदगी के साथ साथ चलेगा। इसलिये बचाव को सावधनी लगातार जारी रखनी होगी।     

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   कोरोना एक बीमारी है। यह अजीब तरह की बीमारी है। इसके प्लेग स्पेनिश फ्रलू व ब्लैक फीवर की तरह महामारी बनने का ख़तरा दुनिया पर अब भी मंडरा रहा है। पहले आई महामारियों में करोड़ों लोग मारे गये थे। उस समय आज की तरह आध्ुानिक स्वास्थ्य सुविधायें तेज़ जनसंपर्क और लॉकडाउन जैसी सुविधायें दुनिया में उपलब्ध नहीं थीं। लेकिन यह भी सच है कि एक देश की महामारी इतनी जल्दी और इतनी तेज़ी से दूसरे देशों में भी पहले नहीं फैलती थी। इसकी वजह यह थी कि यातायात के साधन उतने अच्छे नहीं थे। जितने आज हैं।

हालांकि कुछ जानकारों का मानना है कि लॉकडाउन से कोरोना को ख़त्म नहीं किया जा सकता। लेकिन इससे होने वाला नुकसान कम किया जा सकता है। कुछ सूत्रों का दावा है कि लॉकडाउन तो एक तरह से पॉज़ बटन का काम करेगा। जैसे ही लॉकडाउन ख़त्म होगा। लोग घरों से बाहर निकलेंगे। एक दूसरे के संपर्क मेें आयेंगे तो कोरोना का असर फिर से बढ़ने लगेगा। अब यह तो समय ही बतायेगा कि इस आशंका में कितनी सच्चाई है? लेकिन जानकारों की इस बात में दम है कि लॉकडाउन का वास्तविक लाभ तभी मिलता है। जब सरकारें शत प्रतिशत ना सही अपने अधिकतक नागरिकों की देशबंदी के दौरान कोरोना जांच कर लें।

हमारे देश में हालत यह है कि शासन प्रशासन के तमाम प्रयासों के बावजूद कोरोना संक्रमित तक अपने घरों में छिपे बैठे हैं। वे तमाम अपील और कोई कानूनी कार्यवाही या उत्पीड़न ना करने के सरकार के आश्वासन के बावजूद जाने अंजाने में अपने घरों मुहल्लों व पूरे रिहायशी इलाकों के लिये कोरोना प्रसार का ख़तरा बने हुए हैं। इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि कोरोना लगातार अपने रंग बदल रहा है। पहले इसके लक्ष्ण 7 से 14 दिन में दिखने लगते थे। इसके बाद कुछ मामलों में कोरोना संक्रमितों में बुखार खांसी और सांस लेने में तकलीफ की शिकायत 21 से 28 दिन बाद सामने आने लगी।

सरकार ने कोरोना के बारे में विशेषज्ञों की इसी राय को नज़र में रखते हुए ही पहले चरण का लॉकडाउन 14 की बजाये 21 दिन का रखा था। लेकिन जब 28 दिन और उससे भी अधिक दिन की बात सामने आयी तो सरकार ने 19दिन और बढ़ाकर इसको कुल 40 दिन का यह सोचकर किया होगा कि इससे जो भी कोरोना रोगी होंगे। उन सबके लक्ष्ण हर हाल में सामने आ जायेंगे। ऐसे मेें उन हज़ार या लाख दो लाख लोगों का इलाज करके देश के बाकी लोगों को कोरोना के प्रकोप से बचाया जा सकेगा।

लेकिन कोरोना ने 79 फीसदी रोगियों में अपने लक्ष्ण ज़ाहिर ना करके हमारे देश ही नहीं पूरी दुनिया के सामने यह नई चुनौती पेश कर दी कि कोरोना पीड़ितों को कैसे तलाश किया जाये?ज़ाहिर बात है कि जब तक हम एक एक कोरोना पीड़ित को देश में चिन्हित नहीं कर लेते उनका इलाज भी नहीं कर सकते। हालांकि सरकार ने इस दौरान स्वास्थ्य सुविधायें बढ़ाने कोरोना संक्रिमितों की जांच करने को लैब बड़े पैमाने पर स्थापित करने अस्पताल की संख्या बढ़ाने रेलवे के कोचों में अस्थायी कोरोना चिकित्सालय बनाने वैंटिलेटर और कोरोना टैस्ट की त्वरित किटें मंगाने में काफी अच्छा काम किया है।

लेकिन हमारी बड़ी आबादी और उनमें गरीबी व जहालत अधिक होने से कोरोना महामारी फैलने पर सब मरीज़ों का एक ही समय मंे इलाज करना कठिन नहीं लगभग नामुमकिन सा ही होगा। इसलिये लॉकडाउन खुलने के बाद हम सबको पूरी तरह से पहले की तरह सावधानी बरतते हुए नई दुनिया में जीना है।

कोरोना आने के बाद की दुनिया में सबको मास्क लगाना सड़क पर ना थूकना फिज़िकल डिस्टेंसिंग रखना बार बार साबुन से हाथ धोना बिना ज़रूरत घर से नहीं निकलना भीड़ में जाने से बचना शादी जन्मदिन की छोटी से छोटी पार्टी करना चाट मिठाई व चाउूमिन डोसे और बाहर का खुला सामान खाने से बचना डिजिटल पेमेंट करना खांसते छीेंकते समय मुंह ढकना हाथ ना मिलाना गले ना मिलना किस ना करना घर से बाहर जाने पर वापस आते ही नहाना दूसरे जूते चप्पल पहन लेना अवांछित लोगों को घर से बाहर ही रखना फालतू लोगों से ना मिलना फालतू बात ना करना स्कूल जाने वाले बच्चों को अपने साथ के बच्चों से दूरी बनाये रखने को समझाना सफाई का घर पर खास खयाल रखना और अनावश्यक सार्वजनिक स्थानों सिनेमा मीटिंग खरीदारी खेलकूद पिकनिक यात्रा टालना हर किसी से मिलने में 6 फुट से अधिक की दूरी बनाये रखना ही कोरोना से बचाव का एकमात्र रास्ता होगा।

यानी सरकार की भूमिका लॉकडाउन के बाद एक सीमा तक ही काम करेगी। हम सबको खुद ही ऐसे तौर तरीके विकसित करने होेंगे। जिससे कोरोना से समाज को जागरूक कर कोरोना के ख़तरे के साथ एक नई दुनिया में कोरोना से बचाव कर सकें। मतलब कोरोना की मौजूदगी के साथ एहतियात बरतते हुए लंबे समय तक हर पल हर क़दम पर चौकस रहकर नई जीवन शैली अपनानी होगी।                                                  

0 मैं बदले हुए हालात में ढल जाता हूं,

  देखने वाले अदाकार समझते हैं मुझे।।      

Monday, 20 April 2020

डॉक्टर्स पर हमला

जान बचाने वालों पर हमला किसी कीमत पर सहन नहीं होगा !

 

0पहले इंदौर और उसके बाद मुरादाबाद में संदिग्ध लोगों को कोरोना से बचाने गये डाक्टर्स नर्सों और पुलिस पर हमला हुआ। इस हमले को अफ़सोसनाक नहीं शर्मनाक माना जायेगा। यह भूल या मामूली गल्ती नहीं भयंकर व जघन्य अपराध है। तमाम अगर मगर और बहानों के बावजूद हम इस हमले को अक्षम्य और पागलपन मानते हैं। जब शासन प्रशासन पुलिस और स्वास्थ्य विभाग आपकी जान बचाने को अपनी जान दांव पर लगाकर दिन रात सेवा कर रहा है तब ऐसे हमले किसी कीमत पर सहन नहीं किया जा सकते हैं।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   कोरोना से आज पुरी दुनिया परेशान है। दुनिया के अधिकांश देशों में लॉकडाउन है। दुनिया के कई विकसित अमीर और कम आबादी वाले देश भी अपनी अकड़ नालायकी और लापरवाही से कोरोना की चपेट में आकर अब तक भारी नुकसान उठा चुके हैं। हमारा देश दुनिया में दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। हम विकासशील देश हैं। लिहाज़ा हमारे पास अभी पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाओं वाला ढांचा भी उपलब्ध नहीं है। हमारी सरकार ने इलाज से बेहतर बचाव की नीति पर चलते हुए देश में लॉकडाउन किया है। विपक्ष के साथ ही सरकार के आलोचक और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी भारत के इस क़दम का समर्थन किया है।

     ज़रूरत के हिसाब से लॉकडाउन को 21दिन के बाद 19 दिन और बढ़ाया गया है। इस दौरान सरकार ने अपने स्तर पर गरीब मीडियम क्लास और ज़रूरतमंद लोगों की आर्थिक सहायता और राशन देकर यथा संभव सहायता भी की है। हालांकि इसमें कुछ कमियां और भूलचूक भी सामने आ रही हैं। लेकिन इतने बड़े देश इतनी बड़ी आबादी और इतने बड़े सिस्टम में यह सब होना स्वाभाविक है। जब लॉकडाउन शुरू हुआ तो पहले एक सप्ताह सब कुछ काफी ठीक से चला। प्रवासी मज़दूरों के सड़कों पर निकलकर अपने घर जाने के लिये बड़ी तादाद में आने से कुछ समस्यायंे सामने आयीं। लेकिन जल्दी ही इनको संभाल लिया गया।

    इसके बाद दिल्ली में तब्लीगी जमात के मरकज़ में बड़ी संख्या में लोगों के पाये जाने पर हंगामा मचा। उधर तब्लीग के तुर्कमान गेट पर चल रहे दूसरे गुट ने डेढ़ महीने पहले ही अपने सारे प्रोग्राम कोरोना की ख़बर आते ही रद्द कर दिये थे। अरब में मक्का व मदीना की यात्रा भी निरस्त की जा चुकी थी। लेकिन फिर भी नासमझी नादानी और अपराधिक लापरवाही करने वाले जमाती और उनके अंधसमर्थक अपनी भूल ना मानकर सरकार व बहुसंख्यकों पर आरोप लगा रहे हैं। जबकि मीडिया की भूमिका वास्तव में एकतरफा रही है।

    आंकड़े बताते हैं कि देश के कुल कोरोना रोगियों में से एक तिहाई जमात से जुड़े या उनके परिवार के लोग पाये गये हैं। यहां तक सब निभ जाता। लेकिन जब यह बात सामने आई कि जमात का मुखिया यह मानकर चल रहा है कि उनको कोरोना हो ही नहीं सकता। यहां तक कि उनका दावा था कि अगर तब्लीग का नेक काम करते उनको कोरोना हो भी जाये तो उनका मस्जिद में नमाज़ पढ़ते हुए मरना बहुत अच्छी बात होगी। बताया जाता है कि जमात के मुखिया की ये बुतुकी और अंध्विश्वासी बातें यूट्यूब और जमात की अपनी वैबसाइट पर अपलोड हैं।

    इतना ही नहीं जमात के लोग अपने मुखिया की इस तरह की भटकाने वाली बातों से गुमराह होकर ना केवल कोरोना के ख़तरे को नज़रअंदाज़ करके खुद बड़ी तादाद में विदेशी तब्लीगियों के संपर्क में आकर बीमार हो गये। बल्कि वे बिना जांच कराये खुद को क्वारंटाइन किये और सावधानी बरते पूरे देश में आते जाते रहे। खुदा ही जानता होगा कि इन नादान लापरवाह और ज़िद्दी लोगों ने कितने और लोगों को सफर के दौरान या अपने घर परिवार व मुहल्ले में संक्रमित किया होगा। इसके बाद भी शासन प्रशासन ने इनसे अपील की कि वे खुद सामने आयें। अपना कोरोना टैस्ट करायें। लेकिन ये अधिकांश अपने घरों में छिपकर बैठे रहे।

    जब लॉकडाउन के दौरान जमात केे कई लोग कोरोना पॉज़िटिव पाये गये और कई की मौत होने लगी तो स्वास्थ्य विभाग की टीम ने इनके परिवार के अन्य सदस्यों को क्वारंटाइन करने की पहल की। लेकिन इंदौर और मुरादाबाद की घटनाओं ने एक बार फिर जमात से जुड़े समाज का सर शर्म से झुका दिया है। हमारा मानना है कि चाहे जो वजह रही हो हमें इन घटनाओं के लिये बिना मीडिया और सरकार के 6 साल से जारी पक्षपात व अन्याय का बहाना लिये बिना बिना शर्त माफी मांगनी चाहिये और भविष्य में ऐसी घटनायें किसी कीमत पर दोहरानी नहीं चाहिये।                                                   

0 पत्थर के खुदा पत्थर के सनम पत्थर के ही इंसा पाये हैं,

  तुम शहर ए मुहब्बत कहते हो हम जान बचाकर आये हैं ।।         

Monday, 6 April 2020

कोरोना और जहालत

कोरोना को हराना है तो जहालत को भगाना है !

0संडे की शाम तक देश में कोरोना के कुल3819 मामलों में से 1023 केस तब्लीगी जमात के सामने आये हैं। जमात के निज़ामुद्दीन मरकज़ की इस मामले में कमियां ग़ल्तियां और नालायकी रही है। इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन मंदिर गुरूद्वारों से और सरकार के स्तर पर भी ऐसी कई चूक हुयी हैं। इसलिये जमात के बहाने मुसलमानों को टारगेट करना भी ठीक नहीं कहा जा सकता है। इस समय हम सबको आपस में नहीं बल्कि एक साथ मिलकर कोरोना से लड़ना चाहिये।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   कोराना से लड़ने के लिये भारत जैसे बड़ी आबादी और ना के बराबर स्वास्थ्य सुविधाओं वाले देश के पास लॉक डाउन के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीें था। हो सकता है कि लॉक डाउन करने में हमारी सरकार से कोई देरी या इसका ऐलान करने में जल्दबाज़ी और पूरी तरह सभी क्षेत्रों के विशेषज्ञों से सलाह मश्वराह ना किया गया हो। लेकिन यह भी सोचा जाना चाहिये कि कभी कभी हम ऐसे मोड़ पर आकर खड़े हो जाते हैं। जहां से जिस तरफ भी जायेंगे कुछ कमियां भूल और गल्तियां बाद में पता चलती हैं। लेकिन यह ऐसा नाजुक समय होता है। जबकि सरकार और उसके मुखिया के सामने दो ही विकल्प होते हैं।

    उसको किसी एक तरफ जाकर निर्णय लेना होता है। इसमेें असफलता और दूसरा विकल्प चुनने पर पहले से भी अधिक नुकसान की आशंका सदा बनी रहती है। इस तरफ या उस तरफ कोई भी फैसला होने के बाद उसके बुरे नतीजे आने या नाकामी के बाद यह कहना बहुत आसान होता है कि दूसरा रास्ता अपनाया जाना चाहिये था। बहरहाल हमें यह भी सममझना चाहिये कि जिस तरह की जनता होती है। उसके नेता भी उसी तरह के होते हैं। जनता की जो प्रथमिकतायें होती हैं। सरकार भी उसी दिशा में काम करती नज़र आना चाहती है।

    अगर जनता भावुक और अति धार्मिक है तो सरकार भी स्कूल अस्पताल की बजाये मंदिर मस्जिद और विशाल मूर्तियां लगवाने में अधिक रूचि लेगी। साथ ही यह भी देखा जाना चाहिये कि सरकार के पास जो सूचनायें उपलब्ध होती हैं। वह उसी की रोश्नी में कोरोना जैसे बड़े महामारी के संकट से निबटने के फैसले करती है। यह अलग बात है कि सरकार अगर वनमैन शो है। उसका मुखिया अपनी कैबिनेट या लॉक डाउन के प्रभाव के बारे में विपक्ष या अन्य एक्सपर्ट से चर्चा नहीें करता है तो यह एक संयोग नहीं बल्कि एक प्रयोग कहा जा सकता है।

   जहां तक जनता का सवाल है। कोरोना जैसे एतिहासिक अभूतपूर्व और भयावह संकट से दो दो हाथ करने के लिये बिना जनता के सहयोग के सरकार सफल नहीं हो सकती है। ऐसा देखने में आया है कि जनता का बड़ा वर्ग कोरोना की बजाये अपनी रोज़ी रोटी और भूख से अधिक डर गया है। यही वजह थी कि लॉक डाउन के फौरन बाद दो चार दिन लाखों गरीब मज़दूर और कमज़ोर वर्ग के लोग दिल्ली सहित बड़े शहरों की सड़कों पर अपने घर जाने के लिये निकल आये। वे सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही चलकर अपने घर पहुंचने को तत्पर थे।

    हालांकि सरकार ने उनको अपने स्तर पर सीमित ही सही संसाधन उपलब्ध कराकर उनके घर पहुंचाने की आंशिक व्यवस्था उपलब्ध कराने की नाकाम कोशिश की। लेकिन लॉक डाउन के दौरान जो सोशल डिस्टेंसिंग का मकसद था। वह इस महापलायन से एक तरह से अध्ूारा रह गया। इसी तरह दिल्ली में तब्लीग़ी जमात के निज़ामुद्दीन मरकज़ में लॉक डाउन के कई दिन बाद तक भी जिस तरह से हज़ारों जमाती मौजूद थे। उनमें अच्छी खासी तादाद विदेशी जमातियों की भी थी। उनमें कोराना का संक्रमण फैल चुका था। उनमें से काफी बड़ी तादाद में जमाती लॉक डाउन होने से पहले बिना किसी चैक अप के अपने अपने घर भी जा चुके थे।

    जिससे यह ख़तरा और भी बढ़ गया कि उनके संपर्क में आने वाले ना जाने कितने लोगों को कोरोना का इनफैक्शन हुआ होगा। सरकार को समय रहते विदेशी जमातियों को भारत आने से रोकना चाहिये था। साथ ही मरकज़ के बिल्कुल बराबर वाले पुलिस थाने और खुफिया एजंसियों की भी जवाबदेही होनी चाहिये कि वे कहां सो रही थीं। जब जमाती अपने घर जाने को वाहन पास मांग रहे थे तो उनको समय पर पास क्यों नहीं दिये गये?

    सबसे बढ़कर यह कि जब 11 मार्च को वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन ने कोरोना को महामारी घोषित कर दिया और अरब का मुसलमानों का मक्का मदीना भी बंद हो गया तो मरकज़ 13 से15 मार्च को विश्व सम्मेलन क्यों करने पर अड़ा हुआ था? लेकिन यह जमात वालों का अंधविश्वास नादानी और मूर्खता कह सकते हैं कि उनको कोरोना नहीं हो सकता। लेकिन यह कोई साज़िश नहीं थी। जैसा कि हमारे मीडिया के बड़े वर्ग ने दुष्प्रचार किया कि जमाती ‘छिपे’हुए थे जबकि मंदिर और गुरूद्वारे में लोग छिपे हुए नहीं बल्कि ‘फंसे’ हुए थे।                                                 

0 ये जो मिलाते फिरते हो तुम हर किसी से हाथ,

   ऐसा ना हो कि धोना पड़े ज़िंदगी से हाथ ।।

Sunday, 29 March 2020

कोरोना: हाथ धो लो ना...

कोरोनाः हाथ जान से नहीं साबुन से बार बार धो लो ना!

0एन एस ओ यानी नेशनल स्टेटिस्टिक्स ऑफ़िस के एक सर्वे के अनुसार देश के 35.8प्रतिशत लोग ही खाना खाने से पहले हाथ साबुन से धोते हैं। कोरोना से बचने को सबसे ज़रूरी और सबसे आसान तरीक़ा जबकि यही बताया जा रहा है कि आप 21 दिन के लॉकडाउन के दौरान भी अपने हाथ बार बार साबुन से धोते रहें। इसकी वजह यह है कि जब जब आप अपने दरवाजे़ को खोलते हैं। थोड़ी देर को ही बाहर निकलते हैं। किसी अजनबी से सामान अपने घर पर ही खरीदते हैं। आप कोरोना से हर बार बचाव ज़रूर करें।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   21 दिन के लॉडाउन को अभी एक सप्ताह ही बीता है। लेकिन ऐसी ख़बरें थोक में आनी शुरू हो गयी हैं कि लोग इस देशबंदी को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। दिल्ली मुंबई चैन्नई और देश के बड़े औद्योगिक नगरों से लाखों प्रवासी मज़दूर गरीब और कमज़ोर वर्ग के लोग बड़ी तादाद में अपने अपने गृह राज्यों यूपी बिहार और राजस्थान आदि के लिये पलायन कर रहे हैं। हालांकि सरकार ने कहा था कि जो जहां है वहीं रूका रहे। सबको उनके घर पर ही खाना पानी और अन्य आवश्यक सुविधायें पहुंचाई जायेंगी। लेकिन देखने मंे यह आ रहा है कि जो दुकानें कारखानें और उद्योग बंद हो गये हैं।

    उनके स्वामी अपना पीछा छुड़ाने को अपने यहां काम करने वाले मज़दूरों उनके परिवार वालों और अन्य स्टाफ को चंद रूपये पकड़ा कर चलता कर दे रहे हैं। दूसरी तरफ जिन आम लोगों कामगारों और श्रमिकों को कोरोना के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है। या कोरोना के ख़तरे की व्यापकता गंभीरता और भयावहता का अनुमान नहीं हैं। वे कोरोना से अधिक अपनी भूख आजीविका और अपने घर सुरक्षित पहंुचने के लिये अपने कार्यस्थलों से पैदल ही 100 से 1000 कि.मी. के दुर्गम सफर पर निकल चुके हैं।

    हालांकि दिल्ली यूपी सहित कुछ अन्य राज्य सरकारों ने इन प्रवासी मज़दूरों के लिये उनके घर पहुंचाने के लिये चंद बसों की व्यवस्था बंदी के बावजूद की है। लेकिन इनकी विशाल संख्या के सामने ये साधन उूंट के मुंह मेें ज़ीरा साबित हो रहे हैं। बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने तो यहां तक मांग की है कि इन प्रवासी श्रमिकों को पलायन के लिये अंतिम अवसर देकर शेष को उनके कार्यस्थल पर ही रोका जाये। वर्ना 21दिन के लॉकडाउन का उद्देश्य ही नष्ट हो सकता है। दरअसल अचानक लॉकडाउन होने से सारा सिस्टम गड़बड़ा गया है। हालांकि यह कहना आसान नहीं है कि सरकार को ऐसा करना चाहिये था ।

    सरकार को वैसा करना चाहिये था। लेकिन इतना ज़रूर कहा जा सकता है कि पूरा देश एक साथ बंद करने को चार घंटे का नोटिस बहुत कम समय लगता है। दूसरी बात आवश्यक खाने पीने के सामान की पूर्ति अचानक राज्यों की सीमायें सील हो जाने से जहां की तहां रूक गयीं। पुलिस यह तय नहीं कर सकी कि किसको रोकना है और किसको जाने देना है। इसका नतीजा यह हुआ कि जो जहां था। अचानक पीएम के देशबंदी के ऐलान से वहीं फंसकर रह गया। वैसे होना यह चाहिये था कि लोगों को अपने आवश्यक काम निबटाने और अपने कार्यस्थलों से घरों तक पहंुचने को कुछ दिन का समय दिया जाना चाहिये था।

    इसके साथ ही बाज़ार में आवश्यक सामान की पर्याप्त आपूर्ति उसकी लोगों द्वारा खरीदारी और गरीब लोगों को सरकारी सहायता मिलने के बाद उनको यह अहसास दिलाया जाना चाहिये था कि 21 दिन की बंदी के दौरान काम ना करने के बावजूद वे भूखे नहीं मरेंगे। लेकिन सरकार वनमैन शो होने की वजह से शायद न तो कैबिनेट की बैठक में यह चर्चा हुयी और ना ही विशेषज्ञों से नोटबंदी की तरह देशबंदी करते हुए राय ली गयी। इसका नतीजा आज हमारे सामने है। कुछ लोगों ने अपने घरों में 21 दिन की बजाये पूरे साल का खाने पीने का सामान बाज़ार से महंगे दामों में खरीदकर स्टॉक कर लिया है।

    जबकि देश के 74 करोड़ लोग जिनकी रोज़ की आमदनी 44 रू. है। वे अपने हाथ में पैसा ना होने से एक सप्ताह का कोटा भी घर में जमा नहीं कर सकें हैं। आशा की जानी चाहिये कि जो लोग अपने घरों को लौट रहे हैं। वे सब सकुशल अपने परिवारों तक पहुंच जायें। साथ ही जिनको कोरोना के डर से गांव वाले अपने गांवों में घुसने नहीं दे रहे हैं। उनका सरकार अपने स्तर पर स्वास्थ्य चैकअप कराकर उनके सैकड़ों मील पैदल चलकर आने को कारामद करेगी। इसके साथ ही संदिग्ध कोरोना संक्रमितों के लिये गांव कस्बे या नगर से बाहर अलग से रहने की व्यवस्था करके उनको 14दिन क्वारंटाइन में रखा जा सकता है।

    खैर यह समस्या तो एक दो दिन में सुलझ ही जायेगी। असली सवाल यह है कि सरकार ने21 दिन देशबंदी करने का जो अभूतपूर्व और एतिहासिक निर्णय लिया है। कुछ लोग कफर््यू ना लगने से उसका मज़ाक बनाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं। मजबूरन सरकार को कफर््यू भी लगाना पड़ सकता है। इसके लिये हम लोग खुद ही ज़िम्मेदार होंगे। सरकार ने एक लाख 70 हज़ार करोड़ का राहत पैकेज भी दिया है। लेकिन वह लोगों तक कैसे और कब तक पहंुचेगा यह देखने की बात है। साथ ही यह भी समय बतायेगा कि यह कितना असरदार साबित होता है।

     इस दौरान हम सबको जो सबसे ज़रूरी बात समझनी है। वह यह है कि सरकार जो कुछ कर रही है। वह सब हमारी भलाई के लिये ही कर रही है। महामारी फैलने पर सबको अस्पतालों में भर्ती करना लगभग असंभव सा जा जायेगा। हमें यह भी जानना ज़रूरी है कि हम इस समय कोरोना की दूसरी स्टेज में हैं। अगर यह तीसरी यानी बेकाबू स्टेज में पहुंच गया तो फिर यह सरकार और जनता सबकी पकड़ से बाहर होकर महामारी का रूप का धारण कर सकता है। इस भयंकर स्थिति से बचने को हमें कुछ खास बातों का खयाल रखना है।

    एक तो गैर ज़रूरी घर से नहीं निकलना है। अगर घर की ज़रूरत का सामान खरीदने निकलें तो मंुह और नाक को कवर करने वाला एन 95 या थ्री प्लाई मास्क लगाकर निकलना है। साथ ही घर आने पर नोट या किसी दूसरी चीज़ का लेनदेन करने या दरवाज़ा खोलने बंद करने के बाद भी हर बार साबुन से हाथ बार बार धोते रहना है। ऐसा करना जान से हाथ धोने से अच्छा होगा। आपको यह जानकर हैरत होगी कि कोरोना से बचने के लिये ही नहीं खाना खाने से पहले और शौच से आने के बाद भी हमारे देश के एक तिहाई लोग ही साबुन से हाथ धोते रहे हैं।

     एन एस ओ के अनुसार ग्रामीण आबादी मंे25.3 प्रतिशत शहरी जनसंख्या में 56 प्रतिशत यानी कुल 35.8 परसेंट जनता ही भोजन से पहले साबुन से हाथ धोती है। इनमें से 60.4प्रतिशत लोग केवल पानी से हाथ धोते हैं। जबकि 2.7 प्रतिशत तो राख मिट्टी और रेत से हाथ साफ करते हैं। उनको यह तक नहीं पता कि इन चीज़ों से हाथ और गंदे और विषाणुयुक्त हो जाते हैं। जिस तरह से घर घर शौचालय बनने से आज देश के 60 करोड़़ से अधिक लोग खुल मेें शौच से मुक्त हो चुके हैं। यह समय है।

    जब हम कोरोना से लड़ाई जीतने के लिये आज से यह संकल्प लें कि केवल 21 दिन या तीन व छह माह ही नहीं आगे से कोरोना जैसी बीमारियों से जंग जीतने के लिये दिन में कई कई बार साबुन से हाथ धोने की आदत अपने जीवन में लगातार बनाये रखेंगे। हमें यह याद रखना होगा कि केवल सरकार हमारी रक्षा कोरोना से नहीं कर सकती। बल्कि इसके लिये समाज यानी जनता को भी सरकार के साथ हर हाल में कदम से कदम मिलाकर चलना होगा। जिसमें सबसे अधिक ज़रूरी 21 दिन के देशबंदी के दौरान और जब तक कोरोना का ख़तरा हमारे सर पर मंडराता रहेगा, तब तक यानी खासतौर पर मई जून तक और उसके बाद इस पूरे साल और बाद में आजीवन बार बार हाथ धोने की अच्छी आदत पर इसलिये अमल करना है क्योंकि जान से हाथ धोने की बजाये साबुन से हाथ धोना आसान सस्ता और जीवनदायक साबित होगा। ऐसा लगता है कि मशहूर शायर बशीर बद्र ने यह शेर कोरोना पर ही लिखा था-                                                

0 कोई हाथ तक ना मिलायेगा जो गले मिलोगे तपाक से,

  ये नये मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो ।।         

Monday, 23 March 2020

जनता कर्फ़्यू

जनता कफ़्यू सफलः सरकार पब्लिक साथ साथ हैं!


0विश्व की जानी मानी पत्रिका ‘इकोनोमिस्ट’ के अनुसार 1918-19 में स्पैनिश इन्फ्लुएंजा महामारी से अंग्रेज़ों के राज के दौरान भारत में एक करोड़ 80 लाख लोगों की मौत हुयी थी। आज जब हमारी आबादी बहुत बढ़ चुकी है तो यह आशंका थी कि शायद कम स्वास्थ्य सुविधाओं के चलते हमें कोरोना वायरस की भारी कीमत चुकानी पड़े लेकिन संयोग से चीन ईरान और इटली से हमारा आना जाना बहुत कम होने की वजह से काफी कम लोग कोविड19 से ग्रस्त हुए हैं।    

          -इक़बाल हिंदुस्तानी

   22 मार्च को पीएम मोदी की अपील पर जनता कर्फ्यू की लगभग शत प्रतिशत एतिहासिक और इतिहास में अभूतपूर्व सफलता पूरी दुनिया को देखकर सुखद आश्चर्य हुआ होगा कि जिस भारत सरकार और उसकी जनता को अब तक कोरोना वायरस से लड़ने के लिये कमज़ोर और कम जानकार समझा जा रहा था। वह आपदा आने पर कैसे कदम से कदम से मिलाकर पक्ष विपक्ष को छोड़कर और अपने सारे मतभेद भूलकर एक साथ मिलकर चट्टान की तरह खड़ी हो सकती है। हालांकि हमने 30 जनवरी को कोरोना का पहला मामला देश में सामने आने के बावजूद पूरी फ़रवरी कोई ठोस कदम इससे बचाव के लिये नहीं उठाया।

   विदेश से आये यात्रियों का क्वारंटाइन तो दूर हमने उनकी स्क्रीनिंग तक नहीं की। यहां तक कि 25 फरवरी को ट्रम्प के स्वागत के लिये एक लाख से अधिक लोग बिना मास्क लगाये ही स्टेडियम जा पहुंचे। इसके बाद 3 मार्च को कोरोना पर पीएम मोदी का पहला बयान आया। 9 मार्च तक हमने इटली और दक्षिण कोरिया के यात्रियों को बिना रोक टोक भारत आने की इजाज़त दे रखी थी। सही मायने में17 मार्च को राष्ट्र के नाम प्रधानमंत्री का संदेश और जनता का अपने स्तर पर अपनी सुरक्षा और सेहत के लिये स्वैच्छिक भारत बंद का आव्हान हमारी कोरोना को रोकने की सही और ठोस पहल थी।

   इसका असर यह भी हुआ कि गरीब अशिक्षित और कमज़ोर लोग दहशत में ज़रूरत का सामान खरीदने बाज़ार पर टूट पड़े। लेकिन उनकी इतनी क्षमता ही नहीं थी कि वे कुछ लंबे समय के लिये खरीदारी करके रख सकते। हालत यह हो गयी कि टेªन और बसें बंद होने से लोग जहां के तहां फंस गये। उनको यह अनुमान ही नहीं था कि यह लॉकडाउन आगे लंबा भी चल सकता है। सरकार की मजबूरी यह रही होगी कि अगर ऐसा पहले बताया जाता तो लोगों में और अधिक दहशत का माहौल बन सकता है। जबकि अपने घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूरों पर्यटकों और दूसरे लोगों के लिये रेलवे ने कुछ स्पेशल रेलें भी चलाईं।

   लेकिन यात्रियों की तादाद इतनी अधिक थी कि ये उूंट के मुंह में ज़ीरा साबित हो कर रह गयीं। हालांकि इससे पहले ही सरकार ने स्कूल कॉलेज सिनेमा हॉल बैंक्वट हॉल शॉपिंग मॉल पर्यटन स्थल और अन्य भीड़ वाले केंद्र बंद करके देर आयद दुरस्त आयद का परिचय दे दिया था। इस मामले मंे केरल सरकार की पहल सराहनीय रही जिसने केवल घोषणायें और अपील ना करके जनता के लिये एक पूरा पैकेज राहत के तौर पर दिया। उसने स्कूलों का भोजन घर घर पहुंचाना शुरू करके अन्य राज्यों के सामने एक मिसाल पेश की। वहां हालांकि जन स्वास्थ्य सुविधायें पहले ही अन्य राज्यों से बेहतर हैं।

   लेकिन फिर भी सड़कों के किनारे बेसिन लगाकर बार बार और जगह जगह हाथ धोने के व्यापक प्रबंध किये गये। इतना ही नहीं महाराष्ट्र सरकार ने तो लोगों के हाथ पर स्टांप लगाना शुरू कर दिया जिससे लोग घरों में क्वारंटाइन का गंभीरता से पालन करें। सबसे बड़ी समस्या हमारे देश में कोरोना परीक्षण के सही आंकड़े उपलब्ध ना हो पाना है। सरकारी व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। जबकि निजी क्षेत्र में इसकी जांच का शुल्क 5000 काफी अधिक है। यही वजह है कि अभी तक लगभग 15000 लोगों का ही परीक्षण हो सका है। उधर दक्षिण कोरिया जैसे हम से बहुत छोटे देश में 3 लाख लोगों की कोरोना जांच हो चुकी है।

   इसके साथ ही हम यह मानकर चल रहे हैं कि कोरोना केवल विदेश से आये लोगों में ही हो सकता है। जबकि यह पहली स्टेज की बात थी। अब हम स्टेज तीन में पहंुच चुके हैं। जहां स्थानीय लोग भी बाहर से आये लोगों से जाने अनजाने सम्पर्क की वजह से कोरोना की ज़द में बड़ी तादाद में आ चुके होेंगे। पिं्रसटन यूनिवर्सिटी के डा. रमानन लक्ष्मी नारायण का कहना है कि अगर हमने तीन लाख लोगों का परीक्षण किया होता तो निश्चित रूप से कोरोना रोगियों की संख्या अब तक घोषित आंकड़ों के मुकाबले कम से कम तीस गुना पहंुच चुकी होती।

   उनका मानना है कि अब तक भारत में 10हज़ार लोग कोरोना का शिकार हो चुके होंगे। लेकिन पर्याप्त जांच ना कराने या सरकार द्वारा जबरन ना करने से यह आंकड़ा बहुत कम दिखाई दे रहा है। वैसे भी हमारे देश में वास्तविक आंकड़ों को छिपाना आम बात है। लेकिन हम इस मामले में कितने जागरूक हैं। इसका एक नमूना विदेश से लौटी और कोरोना पॉज़िटिव विख्यात गायिका कनिका कपूर और उसकी पार्टी में बड़ी तादाद में बिना जांच पड़ताल किये शरीक होने वाले हमारे बड़े बड़े नेता सेलिब्रिटी मंत्री और सांसद हैं। यह साफ है कि कोरोना भारत में प्रवेश कर चुका है।

    लेकिन इसका असर अमेरिका और इटली की तुलना में हमारे यहां दो से चार सप्ताह बाद पूरा नज़र आ सकता है। बस यही सबसे बड़ी ख़तरे की बात है। हम स्वास्थ्य के क्षेत्र में दुनिया में लगभग सबसे कम यानी अपनी जीडीपी का मात्र 1.3 प्रतिशत खर्च करते हैं। हमारी सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था बहुत छोटी जर्जर और करप्शन का शिकार है। जबकि प्राइवेट इतनी महंगी और लोगों की आर्थिक हालत इतनी पतली है कि ये दोनों मिलकर महामारी व्यापक रूप से फैलने की आशंका पर 137 करोड़ लोगों के लिये नाकाफी ही नहीं बल्कि ना के बराबर है।

   हमारे यहां हालत यह है कि जिस प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेज में 2017 में सामान्य दिनोें में 63 बच्चे ऑक्सीजन की कमी से दम तोड़ देते हैं। उसका सीएम लाखों लोगों को रामनवमी मेला लगाने को एकत्र करने को अधिक सक्रिय है। यह आंकड़ा बहुत डरावना है। लेकिन सच है कि हमारे देश में एक लाख इंटेंसिव केयर बैड एक साल में लगभग 50लाख लोगों के काम आ पाते हैं। लेकिन कोरोना महामारी एक बार अगर फैल गयी तो इतने मरीज़ तो इसके एक सप्ताह में ही अस्पताल पहंुच जायेंगे।

   इकोनोमिस्ट ने यही चिंता जताई है कि भारतवासी इतने जागरूक नहीं हैं कि वे पहले से हालत खराब होने पर कोरोना से फेफड़ों में प्रदूषण को जब तक समझेंगे तब तक देर हो चुकी होगी। लेकिन फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है। हमें यह भरोसा रखना चाहिये कि आज का भारत वह भारत नहीं है जहां चंद मुट्ठीभर अपवाद लोगों को छोड़कर बड़ी संख्या में लोग गौमूत्र झाड़पफूंक या तावीज़ गंडों से कोरोना से मुक्ति का हवा हवाई नुस्खा आज़माने को तैयार हों। ज़रूरत इस बात की भी है कि जो लोग क्वारंटाइन या आईसोलेशन के दौरान अपने घरों मंे खुद को बंद रखकर पूरे समाज और देश की भलाई में कंधे से कंधा मिलाकर चल रहे हैं। उनको खाना दवाई या एमरजेंसी होने पर आवश्यक सुविधा हर हाल में सरकार समाज उपलब्ध कराते रहंे।                                            

0 तुम्हारे घर में दरवाज़ा है लेकिन तुम्हें ख़तरे का अंदाज़ा नहीं है,

  हमें ख़तरे का अंदाज़ा है लेकिन हमारे घर में दरवाज़ा नहीं है।।