Monday, 4 September 2017

Muslim aabaadi reality

*मुस्लिम आबादी बढ़ने का मिथक*
-----------------------------------------------------------------
नितेश शुक्ला
ऑनलाइन लिंक - http://www.mazdoorbigul.net/archives/11134
--------------------------------------------------------------------

हमें अक़सर ऐसा सुनने को मिलता है कि भारत में मुस्लिम तेज़ी से आबादी बढ़ा रहे हैं जिससे हिन्दुओं को ख़तरा है। सोशल मीडिया पर ये “तथ्य” बहुत ज़ोर-शोर से फैलाया जाता है। *वाट्सअप पर मैसेज फैलाये जाते हैं कि भारत में मुस्लिम बहुत तेज़ी से अपनी जनसंख्या बढ़ा रहे हैं और ऐसा ही रहा तो भारत 2050 तक मुस्लिम बहुल राष्ट्र बन जायेगा। (हालाँकि कुछ समय पहले तक ये 2040 तक होने वाला था।)।*

फिर कुछ लोग डर जाते हैं। उनका ख़ून अपने धर्म और मातृभूमि की रक्षा करने के लिए उबाल मारने लगता है। फिर वो उस मैसेज को शेयर कर के अपने सच्चे हिन्दू होने का सुबूत दे देते हैं। बिना ये जाने कि पोस्ट में कही गयी बात कितनी हद तक सही है। इस प्रकार *आम जन की भावनाओं का इस्तेमाल कर धार्मिक संगठन लोगों का धर्म के नाम पर ध्रुवीकरण करके राजनीतिक फ़ायदा उठाते हैं। इन पार्टियों या संगठनों के आईटी सेल द्वारा ये मैसेज बनाये जाते हैं और फिर उनके कार्यकर्ता इनको सैकड़ों ग्रुपों में फैला देते हैं। ज़्यादातर मामलों में फैलाया गया मैसेज या तो पूर्णतः झूठ होता है या उसमें सच सिर्फ़ एक अंश होता है।* जब कोई झूठ लम्बे समय तक समाज में प्रचारित किया जाता है तो लोगों को वो एक प्रचलित सत्य लगने लगता है। इस लेख में हम मुस्लिम जनसंख्या के बारे में आरएसएस द्वारा फैलाये गये कई झूठों की जाँच-पड़ताल करेंगे।

*पहला मिथक : मुस्लिम 4 शादियाँ करते हैं और काफ़ी ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं।*
-------------------------------------------------------------

आपको बार-बार ये सुनने और पढ़ने को मिल सकता है कि मुस्लिम कई शादियाँ करते हैं और ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं। लोग इस तथ्य की प्रमाणिकता की जाँच किये बिना इसको सच मानने लगते हैं। कई लोग ये उदाहरण भी देने लगते हैं कि उनके फलाँ गाँव में फलाँ मुस्लिम व्यक्ति ने 3 शादियाँ की हैं। आइए हिन्दुओं के बीच इस प्रचलित मान्यता की पड़ताल करें।

एक छोटे-से आँकड़े से ये प्रचलित “सत्य” भरभराकर बिखर जाता है कि भारत में 1000 मुस्लिम पुरुषों पर कितनी मुस्लिम महिलाएँ हैं। 2011 की जनगणना के हिसाब से *भारत में 1000 मुस्लिम पुरुषों पर 951 मुस्लिम महिलाएँ हैं। यानी अगर हर व्यक्ति एक ही शादी करे तो भी 1000 मुस्लिम पुरुषों में से 49 अविवाहित रह जाते हैं।* ऐसे में ये सोचने-मात्र से दिमाग़ बिदक उठता है कि हर मुस्लिम कई शादियाँ करता है। अगर यह मान भी लें कि कुछ मुस्लिमों ने एक से ज़्यादा शादियाँ कीं तो यह भी तय है कि उसी अनुपात में अविवाहित मुस्लिम पुरुषों की संख्या भी बढ़ जायेगी।

पर *संघी अब भी हार नहीं मानता है।* वो तर्क करता है कि दरअसल मुस्लिम लव जिहाद कर रहे हैं यानी मुस्लिम हिन्दू लड़कियों को फुसलाकर उनसे शादी कर रहे हैं, इसलिए एक मुस्लिम कई-कई शादियाँ कर पाता है। इस झूठ का कोई आँकड़ा संघियों के पास नहीं है। अन्तरधार्मिक शादियों में दो तरह की शादियाँ होती हैं। एक तो जो हम आमतौर पर जानते हैं, जिसमें दो अलग-अलग धर्मों के लोग अपनी मर्ज़ी से शादी करते हैं। दूसरे प्रकार की शादी वो होती है जिसमें मुस्लिम लड़के एक साज़िश के तहत हिन्दू लड़कियों को फाँसकर शादी कर लेते हैं और उनका धर्म-परिवर्तन करा देते हैं। दुर्भाग्य से दूसरे प्रकार की शादी या तो वाट्सअप फे़सबुक पर या तो संघियों के दिमाग़ में पायी जाती है। 2014 में जब चुनावों के पहले लव जिहाद का मुद्दा उठाया गया तो संघी पूरे देश में इसका एक ही उदाहरण यूपी के मेरठ में दिखा पाये थे। *बाद में पता चला कि वो मामला भी झूठा था और स्थानीय विधायक और लड़की के पिता ने लड़की पर दबाव बनाकर उससे ऐसा बुलवाया था।* (इस ख़बर के लिए यह लिंक देखा जा सकता है – http://www.thehindu.com/…/for-meeruts-lo…/article7953238.ece )

इस प्रकार संघ और बीजेपी का लव जिहाद का एकमात्र मामला फुस्स हो गया। अब तो भक्त इतने व्याकुल हो गये हैं कि उन्होंने मशहूर क्रिकेटर ज़हीर ख़ान और अभिनेत्री सागरिका घटगे की शादी को भी लव जिहाद क़रार दिया है।
इस बारे में अगर हम तथ्यों की बात करें तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के 2005-06 के आँकड़ोंं पर आधारित एक रिसर्च के अनुसार भारत में केवल 2.1% शादियाँ ही अन्तरधार्मिक होती हैं। इसके अतिरिक्त अगर आँकड़ोंं की बात करें तो इसी रिपोर्ट के अनुसार 2005-06 में भारत में 2% लोग एक से ज़्यादा वैवाहिक सम्बन्धों में थे। धार्मिक आबादी के हिसाब से हिन्दुओं में 1.77% और मुस्लिमों में 2.55% लोग ऐसे थे। यहाँ ग़ौर करने वाली बात यह भी है कि ये आँकड़े तब हैं, जब हिन्दू कोड बिल एक से अधिक शादियों को वैधता नहीं देता, जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड एक से अधिक शादियों को सशर्त मान्यता देता है। इस प्रकार ये बिल्कुल साफ़ है कि 1000 मुस्लिमों पर 951 मुस्लिम महिलाओं का होना, अन्तरधार्मिक विवाह का मात्र 2.1% होना और मुस्लिमों में बस 2.55% का एक से ज़्यादा शादी करना ये ऐसे तीन आँकड़े हैं, जो संघ के द्वारा फैलाये जाने वाले झूठ की हवा निकालने के लिए काफ़ी हैं।

*दूसरा मिथक : मुस्लिम इतनी तेज़ी से आबादी बढ़ा रहे कि सन 2050 तक भारत मुस्लिम बहुल देश बन जायेगा।*
-----------------------------------------------------------------

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा फैलाये गये सबसे प्रचलित झूठों में से यह भी एक है। लोगों के दिमाग़ में असुरक्षा भरके ही इनकी राजनीति फल-फूल सकती है। आइए देखते हैं कि संघ की इस प्रचलित उद्घोषणा में कितना दम है।

आरएसएस काफ़ी पहले से ये बात फैलाता रहा है कि भारत में मुस्लिम बहुत ज़्यादा बच्चे पैदा कर अपनी आबादी बढ़ा कर भारत को इस्लामिक मुल्क़ बनाना चाहते हैं। इस मामले में एक मजे़ की बात यह है कि *आरएसएस की प्रचार मशीनरी भारत के इस्लामिक मुल्क़ बनने की तारीख़ आगे सरकाती रहती है। कुछ साल पहले तक ये बोलते थे कि भारत 2035 तक इस्लामिक देश बन जायेगा, फिर बाद में इसको 2040 कहना शुरू कर दिया और अब कहा जा रहा कि भारत 2050 तक मुस्लिम बहुल राष्ट्र हो जायेगा।* अब चूँकि अमेरिकी संस्था पिउ रिसर्च सेण्टर ने यह बता दिया है कि 2050 तक भारत में क़रीब 31 करोड़ मुस्लिम और 130 करोड़ हिन्दू होंगे, तो हो सकता है कि अब आरएसएस फिर भारत के इस्लामिक मुल्क़ बनने की तारीख़ को सरकाकर 2060 या 2070 कर दे। फिर भी ठीक-ठाक आबादी संघ की प्रचार मशीनरी द्वारा फैलाये इस भविष्य के हौव्वे पर यक़ीन कर लेती है और ख़ुद को असुरक्षित महसूस करने लगती है। इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि भविष्य के इस हौव्वे का क्या वाक़ई में अस्तित्व है? क्या इस बात की सम्भावना है कि भारत आगे कभी 2070 में या 2100 में या 2150 में इस्लामिक राष्ट्र बन जायेगा?

इसके लिए हम थोड़ा जनसंख्या विज्ञान को संक्षेप में समझने की कोशिश करेंगे।
*किसी भी देश की जनसंख्या वृद्धि दर कई कारकों पर निर्भर करती है, जैसे कि जन्म दर, मृत्यु दर, प्रवास, युवा आबादी इत्यादि। ये कारक ख़ुद देश की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं।*

सामान्यतः जनसंख्या एकरेखीय क्रम (1, 2, 3, 4, 5…) या गुणात्मक क्रम (1, 2, 4, 8, 16…) में नहीं बढ़ती है। जापान व इंग्लैण्ड जैसे कई विकसित देशों की जनसंख्या वृद्धि दर ऋणात्मक है। कुछ की बढ़ने की दर ज़्यादा है तो कुछ ऐसे देश हैं जिनकी जनसंख्या तो बढ़ रही है पर वृद्धि दर लगातार कम हो रही है। किसी देश की जनसंख्या कैसे बढ़ेगी, यह वहाँ की सामाजिक, आर्थिक परिस्थितियाँ तय करती हैं। अगर एक लम्बे समय के जनसंख्या विकास को देखें तो पूँजीवाद के आने के बाद पिछले 200 सालों में औद्योगिक क्रान्तियाँ हुईं जिसके बाद विकसित देशों में पहले जनसंख्या तेज़ी से बढ़ी। जनसंख्या वृद्धि की यह दर बाद में कम होती गयी और अब वो स्पेन, जापान जैसे कई देशों में ऋणात्मक भी हो चुकी है। इंग्लैण्ड की जनसंख्या के उदाहरण से इसको समझा जा सकता है :
1801 – 83 लाख
1851 – 1.8 करोड़ (वृद्धि – 117%)
1901 – 3.1 करोड़ (वृद्धि – 72%)
1951 – 4.2 करोड़ (वृद्धि – 36%)
2001 – 4.9 करोड़ (वृद्धि – 17%)

हम देख सकते हैं कि हर 50 सालों में जनसंख्या के बढ़ने की दर कम होती गयी है। शुरू में जो आबादी 50 सालों में 117% बढ़ गयी, वही बाद में 50 सालों में मात्र 17% बढ़ी। जनसंख्या अभी भी बढ़ रही है, पर वृद्धि दर घटती जा रही है। फि़लहाल हम आगे बढ़ते हैं।

जिन देशों में औद्योगिकीकरण और नयी उत्पादक शक्तियों का विकास बाद में हुआ, वहाँ बाद में जनसंख्या बढ़नी शुरू हुई। और भारत और चीन उनमें से एक हैं। भारत में 1900 से 1950 तक जनसंख्या 65% बढ़ी जबकि 1950 से 2000 तक के 50 सालों में 183% बढ़ी। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि किसी देश या राज्य की जनसंख्या वृद्धि दर एक स्थिर मान न होकर वहाँ की आर्थिक व सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। जब देश में नयी उत्पादन पद्धति विकसित हो जाती है और उत्पादन तेज़ी से बढ़ने लगता है तो जनसंख्या तेज़ी से बढ़ती है। लेकिन एक समय के बाद चिकित्सा और शिक्षा के विकास के बाद लोगों की जीवन प्रत्याशा बढ़ने से लोग छोटे परिवार की तरफ़ मुड़ते जाते हैं। आज की नयी उत्पादन पद्धति और बाज़ार व्यवस्था में एकल परिवार (छोटे परिवार) पुराने बड़े व संयुक्त परिवारों की जगह लेते जा रहे हैं। साथ ही इस पूँजीवादी व्यवस्था में सामाजिक और आर्थिक विकास में एक स्थिरता या जड़ता आ जाती है जिसका प्रभाव जनसंख्या पर भी पड़ता है।

जनसंख्या की यह बढ़त एक सन्तृप्त स्तर तक पहुचने के बाद या तो स्थिर हो जाती है या उसके बाद बहुत धीरे-धीरे घटती या बढ़ती है। भारत ऐसे देशों में आता है, जहाँ जनसंख्या अभी अपने सन्तृप्तता के स्तर तक नहीं पहुँची है। भारत की जनसंख्या अभी भी बढ़ रही है लेकिन उसके बढ़ने की दर तेज़ी से कम हो रही है। 1961 से अभी तक के वृद्धि दर के आँकड़ेे देखते हैं –
1961 से 71 के बीच 24.8%
1971 से 81 के बीच 25%
1981 से 91 के बीच 24.9%
1991 से 2001 के बीच 20%
2001 से 2011 के बीच 16.7%

हम देख सकते हैं कि शुरू के तीन दशकों तक जनसंख्या एक समान दर से बढ़ी और 1980 के बाद से ये दर तेज़ी से कम होने लगी और अभी 24% से घटकर 16.7% रह गयी है। इस पुरे दौर में हिन्दू और मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर अलग-अलग देखते हैं :

हिन्दूओं की वृद्धि दर
1961 से 1971 के बीच 23.76%
1971 से 1981 के बीच 25.01%
1981 से 1991 के बीच 23.92%
1991 से 2001 के बीच 17.89%
2001 से 2011 के बीच 15.43%
मुस्लिमों की वृद्धि दर
1961 से 1971 के बीच 33.19%
1971 से 1981 के बीच 30.45%
1981 से 1991 के बीच 30.33%
1991 से 2001 के बीच 29.5%
2001 से 2011 के बीच 23.47%

साथ ही प्रति महिला जनन दर (TFR) (यह एक पैमाना है, जिससे यह पता चलता है कि एक औरत अपने पूरे जीवन में कितने बच्चों को जन्म देती है) देखते हैं :
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005-06 के अनुसार प्रति महिला जनन दर इस प्रकार है :
1991-92
हिन्दू महिलाएँ – 3.3
मुस्लिम महिलाएँ – 4.4
1998-99
हिन्दू महिलाएँ – 2.78
मुस्लिम महिलाएँ – 3.59
2005-06
हिन्दू महिलाएँ – 2.59
मुस्लिम महिलाएँ – 3.40

प्रति महिला जनन दर समझने के लिए : अगर 100 हिन्दू और 100 मुस्लिम महिलाओं का उदाहरण लें तो 1991 में 100 हिन्दू महिलाएँ अपने पूरे जीवनकाल में 330 बच्चे पैदा कर रही थीं जो 2005 में घटकर 259 बच्चे रह गये। इसी प्रकार 1991 में 100 मुस्लिम महिलाएँ 440 बच्चे पैदा कर रही थीं जो 2005 में घटकर 340 रह गये। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि किसी जनसंख्या को स्थिर रखने के लिए कुल जनन दर 2.1 होना चाहिए।

इन दोनों आँकड़ोंं को देख के बताया जा सकता है कि भारत की आबादी तो बढ़ रही है पर इसके बढ़ने की दर लगातार कम होती जा रही है।

2050 में क्या होगा?

जनसंख्या का पूर्वानुमान लगाने के लिए हम पुराने आँकड़ोंं का ट्रेण्ड (चलन) देखते हैं। पिछले 5 दशकों के आँकड़ोंं के आधार पर भविष्य का एक पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। आइए हम 2050 में भारत की जनसंख्या और भारत में हिन्दू और मुस्लिम की जनसंख्या निकालते हैं और देखते हैं कि आरएसएस द्वारा फैलायी गयी बात कितनी सही है।

जनसंख्या के पूर्वानुमान के लिए कई पद्धतियाँ इस्तेमाल की जाती हैं। हम उनमें से एक उपयुक्त पद्धति Decreamental increase method का इस्तेमाल करेंगे। जब कोई जनसंख्या बढ़ती है पर उसके बढ़ने की दर घटती है तो यह पद्धति सन्तोषजनक अनुमान देती है। जनसंख्या परिवर्तन के लिए कुछ आकस्मिक घटनाओं (युद्ध, प्राकृतिक आपदा, महामारी इत्यादि) के प्रभाव को अनदेखा करते हुए हम आगे गणना करेंगे। हमारे पास पिछले 5 दशकों की जनसंख्या और वृद्धि दर के आँकड़े हैं। यह मानते हुए कि बिना किसी हस्तक्षेप के यह जनसंख्या इसी चलन से बढ़ेगी, तो इन आँकड़ोंं के आधार पर निम्न निष्कर्ष निकलेंगे –
अगले 4 दशकों के बाद 2050 में भारत की जनसंख्या क़रीब 175 करोड़ होगी।
भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या अगले 4 दशकों तक निम्न दर से बढ़ेगी:
2011-21 12.43%
2021-31 9.40%
2031-41 6.40%
2041-51 4.00%
2051 में भारत में हिन्दुओं की जनसंख्या क़रीब 129.26 करोड़ हो जायेगी जो पिऊ रिसर्च सेण्टर के दिये गये आँकड़े (130 करोड़) के काफ़ी क़रीब है।
अगर मुस्लिमों की जनसंख्या देखें तो वो अगले 4 दशकों तक निम्न दर से बढ़ेगी :
2011-21 20.22%
2021-31 16.72%
2031-41 13.72%
2041-51 10.22%

2051 में भारत में मुसलमानों की जनसंख्या क़रीब 31.52 करोड़ हो जायेगी जो पिऊ रिसर्च सेण्टर के दिये गये आँकड़े (31 करोड़) के काफ़ी क़रीब है।
इसके बाद हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि दर क़रीब स्थिर हो जायेगी, जबकि मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर आगे के एक-दो दशकों तक घटती रहेगी। इस आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि 2071 आते-आते मुस्लिमों की जनसंख्या वृद्धि दर हिन्दुओं की जनसंख्या वृद्धि दर के लगभग बराबर हो जायेगी जो कि 4% से 5% के बीच होगी। 2071 में भारत की जनसंख्या क़रीब 192 करोड़ होगी, जिसमें हिन्दुओं की जनसंख्या 140 करोड़ व मुसलमानों की जनसंख्या 35 करोड़ के क़रीब रहेगी। साथ ही भारत की जनसंख्या वृद्धि में भी स्थिरता आयेगी और जनसंख्या या तो स्थिर हो जायेगी या बहुत धीरे-धीरे बढ़ेगी।
फिर भी अगर इसके बाद 2071 तक की वृद्धि दर को आगे अगर स्थिर मानकर गणना करें तो 2100 में भारत की जनसंख्या क़रीब 216 करोड़ हो जायेगी जिसमें हिन्दुओं की जनसंख्या 157 करोड़ व मुस्लिमों की जनसंख्या 39 करोड़ के क़रीब होगी। सदी के अन्तिम दो दशकों से जनसंख्या घटनी भी शुरू हो सकती है।

ऊपर की इन गणनाओं से यह बिल्कुल साफ़ हो जाता है कि 2050, 2070 या 2100 में भारत एक हिन्दू बाहुल्य वाला देश ही रहेगा, जहाँ मुस्लिमों की अधिकतम आबादी 39 करोड़ (कुल आबादी का 18%) से आगे नहीं जायेगी, जबकि हिन्दुओं की जनसंख्या 157 करोड़ (कुल आबादी का 72%) के क़रीब रहेगी।

आरएसएस को एक बार फिर अपनी तारीख़ अब और खिसकानी चाहिए, क्योंकि अब उनकी बात सफे़द झूठ लगने लगी है।

दरअसल किसी भी आबादी की वृद्धि दर उसकी आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है, न कि उसके धर्म पर। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण द्वारा किये गये सर्वे में यह बात अच्छे से सामने आती है। हाईस्कूल से कम पढ़े हिन्दू हाईस्कूल से ज़्यादा पढ़े हिन्दुओं से ज़्यादा बच्चे पैदा करते हैं। ऐसी ही बात मुस्लिमों के लिए भी सही है। शिक्षा का स्तर, आर्थिक हालत, युवा आबादी का प्रतिशत आदि कारक हैं जो जनसंख्या वृद्धि दर को प्रभावित करते हैं। इसके लिए कुछ तथ्य नीचे दिये जा रहे हैं, जो इसको सही से समझाते हैं :
केरल भारत में सबसे कम जनसंख्या वृद्धि दर वाला राज्य है। 2011 की जनगणना के अनुसार केरल की जनसंख्या 4.4% की दर से बढ़ी जबकि बिहार की जनसंख्या 25% की दर से बढ़ी।

कुछ लोग मानते हैं कि मुस्लिम परिवार नियोजन नहीं अपनाते। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2005-06 के आँकड़ोंं के हिसाब से देखें तो :
1991-92 में 37.7% हिन्दू महिलाएँ परिवार नियोजन अपना रही थीं, जो 2005-06 में बढ़कर 50.2% हो गयीं। वहीं 1991-92 में 22% मुस्लिम महिलाएँ परिवार नियोजन अपना रही थीं, जो 2005-06 में बढ़कर 36.4% हो गयीं। ज़ाहिर है कि मुस्लिम महिलाओं में परिवार नियोजन के प्रति जागरूकता हिन्दू महिलाओं के मुक़ाबले अभी भी काफ़ी कम है, पर उनमें वृद्धि ज़्यादा है। हिन्दू महिलाओं में जहाँ 15 सालों में 12.5% ज़्यादा महिलाओं ने परिवार नियोजन अपनाया, वहीं मुस्लिम महिलाओं में यह वृद्धि 14.4% रही।

इसके अतिरिक्त और भी कई छोटे कारण हैं, जो मुस्लिम आबादी की अधिक वृद्धि दर के लिए जि़म्मेदार हैं :

हिन्दुओं के मुक़ाबले मुस्लिमों में स्त्री-पुरुष अनुपात ज़्यादा है। हिन्दुओं में 1000 पुरुषों पर जहाँ 939 महिलाएँ हैं, वहीं मुस्लिमों में 1000 पुरुषों पर 951 महिलाएँ हैं।

एनएफ़एचएस 2005-06 के हिसाब से एक हिन्दू की जीवन प्रत्याशा 65 साल है, जबकि मुस्लिम की जीवन प्रत्याशा उनसे 3 साल ज़्यादा 68 साल है।
हिन्दुओं में 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर मुस्लिमों से ज़्यादा है। हिन्दुओं में प्रति 1000 बच्चों पर 5 वर्ष से कम उम्र की मृत्यु दर जहाँ 76 है, वहीं मुस्लिमों में यह संख्या 70 है।

सच्चर कमेटी की रिपोर्ट और जनसंख्या वृद्धि के आँकड़े एक साथ रखे जायें तो मुस्लिम जनसंख्या वृद्धि दर के ज़्यादा होने का वास्तविक कारण पता चलता है। सच्चर कमेटी की रिपोर्ट (2006) के हिसाब से 2004-05 में भारत में जहाँ औसत 22.7% आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे थी, वहीं मुस्लिमों में 31% आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे थी। शहरों में यह आँकड़ा और भयानक है, जहाँ 38.4% मुस्लिम आबादी ग़रीबी रेखा के नीचे थी।

इसी रिपोर्ट के अनुसार भारत में राष्ट्रीय साक्षरता जहाँ 2001 में 65% थी, जिसमें हिन्दुओं की साक्षरता 70.8% थी, वहीं मुस्लिमों की साक्षरता मात्र 59.1% थी। शहरों में जहाँ हिन्दुओं में साक्षरता 85% थी, वहीं शहरों में ही मुस्लिमों की साक्षरता 70.1% थी। 6 से 14 साल के 25% मुस्लिम बच्चों ने या तो कभी विद्यालय का मुँह नहीं देखा था या पढ़ाई छोड़ दी थी। जबकि हिन्दुओं में यह 9% था।

जनसंख्या और एनएफ़एचएस के आँकड़े यह दिखाते हैं कि भारत में खराब आर्थिक हालत और कम पढ़ाई स्तर वाली आबादी ज़्यादा बच्चे पैदा करती है। इसके पीछे कई कारण होते हैं। ग़रीब परिवार होने से जितने बच्चे होंगे, उतने ज़्यादा काम करने वाले लोग होंगे, ऐसी मानसिकता होती है जो अधिक बच्चे पैदा करने के लिए एक वजह बनती है। इसके अतिरिक्त ग़रीब आबादी के बच्चे कुपोषण व अन्य छोटी-छोटी बीमारियों से सही इलाज न मिल पाने के कारण कई बार मर जाते हैं। साथ ही ग़रीब इलाक़ों से बच्चों के ग़ायब होने की घटनाएँ भी आम होती हैं, जिनको भीख माँगने और अमीरों के लिए किडनी निकालने के इस्तेमाल में लाया जाता है। इसलिए यह आबादी थोड़ी असुरक्षा की भावना में भी अधिक बच्चे पैदा करती है। परिवार नियोजन के प्रति गै़र जागरूकता भी ज़्यादा बच्चे होने के पीछे एक कारण है।

ऊपर की गणनाओं से हम देख चुके हैं कि भारत आगे कभी भी इस्लामिक राष्ट्र नहीं बन सकता, पर अगर संघ के फासीवाद का तीव्र प्रतिरोध नहीं किया गया तो एक दिन यह इस्लामिक राष्ट्र जैसा ज़रूर बन जायेगा। जहाँ,

– गै़र-हिन्दुओं के हर त्यौहार-उत्सव पर रोक होगी,
– गै़र-हिन्दुओं को दोयम दर्जे का नागरिक समझ जायेगा,
– लड़कियों का जीन्स-टीशर्ट पहनना गै़र-क़ानूनी होगा,
– लड़कियों का रात 8 बजे घर से बाहर निकलना प्रतिबन्धित होगा,
– शादी से पहले प्यार प्रतिबन्धित होगा, पार्क में प्रेमी युगलों के बैठने पर पुलिस दोनों को पीटेगी और राखी बँधवायेगी,
– मनुस्मृति की आलोचना करने वालों की गर्दन काटी जायेगी,
– अपने हक़ के लिए आवाज़ उठाना ग़ैर-क़ानूनी होगा।

*तब भारत एक इस्लामिक मुल्क़ नहीं होगा, जबकि एक इस्लामिक मुल्क़ जैसा हिन्दू राष्ट्र होगा।*

*मिथक 3 : पाकिस्तान में आज़ादी के समय 15% हिन्दू थे जो आज बस 1.5% रह गये हैं। इसका कारण उनका क़त्लेआम और धर्मान्तरण है।*
-------------------------------------------------------------------------

अक़सर संघ वाले पाकिस्तान में हिन्दुओं की कम हो रही जनसंख्या के बारे में बताते हैं कि कैसे पाकिस्तान में मुस्लिमों ने वहाँ हिन्दू जनसंख्या को, जो आज़ादी के वक़्त 1947 में 15% थी, को घटाकर अब 1.5% कर दिया है। यह झूठ भी आरएसएस द्वारा फैलाये गये उन सैकड़ो झूठों में से एक है, जिसका इस्तेमाल वे मुस्लिमों के ख़िलाफ़ हिन्दू लोगों को भड़काने में करते हैं। फे़सबुक, वाट्सअप व अन्य नेटवर्किंग साइटों पर ये ऐसा मुस्लिम विरोधी प्रचार करते हैं और ज़्यादातर लोग इनकी साजि़शों में फँस भी जाते हैं।

पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या के बारे में अगर आँकड़ों की बात करें तो यह सही है कि 1947 में पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या 15% थी और यह भी सही है कि आज उनकी जनसंख्या 1.6% है, पर बीच की कहानी ग़ायब कर देने पर इससे यही निष्कर्ष निकल सकता है कि इस बीच बड़े पैमाने पर पाकिस्तान में हिन्दुओं का क़त्लेआम किया गया। इसीलिए ये अधुरा तथ्य एक साजि़शपूर्ण झूठ बन जाता है।

पाकिस्तान में हिन्दुओं का प्रतिशत
1931 15%
1941 14%
1951 1.3%
1961 1.4%
1981 1.5%
1998 1.6%
2011 2 %
वहीं भारतीय पंजाब में मुस्लिमों की जनसंख्या का प्रतिशत
1931- 52.4%
1941- 32.3%
1951- 0.8%
1961- 1.94%
1971- 0.84%
1981- 1.0%
1991- 1.2%
2001- 1.56%

ऊपर 1931 और 1941 के आँकड़े उन इलाक़ों के हैं जो 1947 के बाद पाकिस्तान में चले गये। आँकड़ोंं से साफ़ देखा जा सकता है कि 1951 आते-आते दोनों ही हिस्सों में जनसंख्या के प्रतिशत में बड़ा बदलाव आ चुका था।
इसका कारण यह है कि 1947 के बाद जो दोनों देशों में दंगे हुए जिसके फलस्वरूप दोनों देशों से बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ व साथ ही बहुत सारे लोग मारे भी गये। इस कारण से 1951 आते-आते पाकिस्तान में हिन्दुओं की जनसंख्या केवल 1.3% रह गयी। ठीक ऐसा ही भारतीय पंजाब में भी हुआ, जहाँ 1947 में मुस्लिमों की संख्या 33% थी, वो 1951 में 0.8% रह गयी जो अब 1.6% है।

अगर इस तथ्य को भी ग़लत तरीक़े से दिखाया जाये तो यह लग सकता है कि पंजाब में मुस्लिमों का बड़े पैमाने पर नरसंहार हुआ है, पर ऐसा नहीं है। जनसंख्या के आँकड़े इस बात को साबित कर देते हैं कि पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी का घटना और भारतीय पंजाब में मुस्लिमों की आबादी का घटना दोनों ही आज़ादी के बाद बड़े पैमाने पर हुए विस्थापनों के फलस्वरूप हुए थे और यह प्रक्रिया 1951 तक की जनगणना में पूरी हो चुकी थी। 1951 के बाद पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी थोड़ी ही सही पर बढ़ी है।

संघ और उसके तमाम अनुषंगी संगठन ऐसे झूठ फैलाकर हिन्दू जनता में मुस्लिमों के प्रति विद्वेष पैदा करने की कोशिश करते हैं। इसके अलावा ऐसे हज़ारों झूठ होते हैं जो रोज़ सोशल मीडिया पर फैलाये जाते हैं। इतने कि सबका जवाब देना सम्भव भी नहीं है। उनकी एक नीति यही है कि हम झूठ बोलते जायेंगे, तुम कितनों का पर्दाफ़ाश करोगे। तुम जब तक एक का पर्दाफ़ाश करोगे, हम 256 और झूठ बोल चुके होंगे। और हमारा झूठ करोड़ों लोगों तक पहुँच चुका होगा।

आज हज़ारों की संख्या में ऐसी फे़क न्यूज़ वेबसाइटें भी कुकुरमुत्तों की तरह उग आयी हैं। इनका काम ही यही है कि फ़ोटोशॉप करो, अफ़्रीका की वीडियो को भारत का बनाकर दिखाओ या अख़बार की ख़बर का शीर्षक बदल दो, कुछ भी करो। पर लोगों की आँख में लगातार धूल झोंककर अपनी साम्प्रदायिक राजनीति चमकाते जाओ। हज़ारों लोग इनके साइबर सेल में काम कर रहे हैं, जिन्हें बाक़ायदा वेतन मिलता है।

आज हम हर झूठ का पर्दाफ़ाश तो नहीं कर सकते पर आरएसएस की विचारधारा को पकड़ना ज़रूरी है। उसकी फासीवादी विचारधारा के लिए यह ज़रूरी है कि वो एक आबादी को दूसरे की नज़र में दुश्मन साबित कर दे। जर्मनी के हिटलर ने भी यहूदियों के खि़लाफ़ ऐसा झूठा प्रचार बड़े स्तर पर किया था। उसके प्रचार मन्त्री गोएबल्स का कहना था कि एक झूठ को सौ बार बोलो तो वो सच बन जाता है।

हिन्दू संस्कृति की रक्षा, भारत माता की जय, हिन्दू धर्म ख़तरे में है आदि नारों के पीछे ये दरअसल अम्बानी-अडानी जैसे मालिकों की सेवा में लीन हैं और जनता की जेब से आखि़री पैसा भी छीन लेने को आतुर हैं। साथ ही मन्दी के दौर में सरकार की लुटेरी नीतियों से पैदा हुए असन्तोष को मुस्लिमों की तरफ़ मोड़ देना चाहते हैं। आज हर इंसाफ़पसन्द नागरिक का यह कर्तव्य है कि वो इनका विरोध करे। क्योंकि अगर हम आज चुप बैठ गये तो कल हमारी बारी आयेगी। जैसा कि जर्मनी के कवि पास्टर निमोलर ने कहा था –

पहले वे आये कम्युनिस्टों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं कम्युनिस्ट नहीं था।
फिर वे आये ट्रेड यूनियन वालों
के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं ट्रेड यूनियन में नहीं था।
फिर वे आये यहूदियों के लिए
और मैं कुछ नहीं बोला
क्योंकि मैं यहूदी नहीं था।
फिर वे मेरे लिए आये
और तब तक कोई नहीं बचा था
जो मेरे लिए बोलता।

-----------------------------------------------------------------
मज़दूर बिगुल, जुलाई 2017 अंक में प्रकाशित
via - Satya Narayan

Sunday, 3 September 2017

E filing not taxpayer

"इस सरकार को एक बहुत खराब बीमारी हो गयी है ओर वह बीमारी यह है कि यदि इनकी योजनाएं फेल हो जाये और झूठ पकड़ा जाने लगे तो कुछ तो भी आंकड़े पेश कर दो यानी खेत की बात पूछी जाए तो खलिहान की बाते बताना शुरू कर दो ऐसे तथ्य बताने लगो जिसके सिर पैर का कोई ठिकाना न हो और यह बीमारी संक्रामक बीमारी है यह तुरंत अपने भक्तों में ट्रांसफर हो जाती हैं

15 अगस्त को मोदी जी लाल किले से ही साफ झूठ बोल गए कि 3 लाख करोड़ का काला धन पकड़ा गया, नए करदाताओं की संख्या के बारे में तो इतना झूठ बोला हैं कि ठीक ठीक खुद को भी याद नही होगा कि किस मंत्री ने क्या बोला है, फिर आखिरी में आकर सुई 56 लाख पर अटकी है

वैसे सरकार ने अगस्त में ही पहली बार अर्धवार्षिक आर्थिक समीक्षा संसद में पेश की थी इसमें इकोनॉमी की हालत चिंताजनक बताई गई थी और इस रिपोर्ट में यह कहा गया कि “नए कर दाताओँ की संख्या में वृद्धि तथा विमुद्रीकरण के बाद 5.4 लाख नए करदाता उभर कर आए हैं’ ( लिंक कॉमेंट बॉक्स में है )
लेकिन इस दावे को भी झुठला कर वित्त मंत्रालय की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया कि पिछले साल के मुकाबले इस साल 56 लाख ज्यादा टैक्सपेयर्स ने ई-रिटर्न फाइल की इसका अर्थ सिर्फ ये है कि जैसा दि वायर के एम के वेणु ने कहा कि , 56 लाख नए करदाता नहीं बढ़े हैं बल्कि इतने लोग ई-फाइलिंग में शिफ्ट हुए हैं, जो कि पहले से चली आ रही है

यानी सिर्फ इ रिटर्न फाइल करने वालो की संख्या बढ़ी है पिछले साल की तुलना में इस वित्त वर्ष में 25 प्रतिशत करदाता बढ़े हैं.श्रीनिवासन जैन ने अपने अध्ययन से बताया कि अगर पुराने आंकड़े देखें तो 25 प्रतिशत की वृद्धि कोई बड़ी बात नहीं है. 2014-15 में 76 लाख करदाता जुड़े थे और 2016-17 में 80.7 लाख जुड़े. बस इतनी सी बात थी

वेसे इस आंकड़े की असली बारीकी भी जान लीजिये की वास्तव में करदाताओ की संख्या बढ़ने का क्या अर्थ है ओर इसका सरकारी खजाने पर कोई असर होता हैं या नही

केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने आंकड़ा जारी किया था कि देश की 129.5 करोड़ की आबादी में से मात्र 3.65 करोड़ यानी 2.8 प्रतिशत लोग इनकम टैक्स रिटर्न दाखिल करते हैं और रिटर्न दाखिल करनेवालों का 52.3 प्रतिशत हिस्सा ही टैक्स देता है. यानी सिर्फ आधा ही कुछ रकम जमा करता है ,

जेसे 2016 का आंकड़ा है कि इंदौर रीजन में 70 फीसदी करदाता केवल नाममात्र के लिए रिटर्न भरते हैं। टैक्स में उनका कोई योगदान नहीं है कुल 5.20 लाख करदाताइंदौर रीजन में पंजीकृत हैं।-2.5 लाख से कम आय सालाना बताने वाले करदाताकी 3.5 लाख संक्या सबसे अधिक है।2.5 लाख से 5.5 लाख की सालाना आय वाले करदाता- 1 लाख से कुछ ज्यादाहै और 5.50 से 9.50 लाख रुपए सालाना आय वाले करदाता मात्र 35 हजार है यह एक बानगी है पुरे देश की आयकर व्यवस्था की

अब एक और आंकड़ा देखिए , देश की आबादी का 1.33 प्रतिशत हिस्सा 23 प्रतिशत इनकम टैक्स दे रहा है, जबकि 0.15 प्रतिशत लोग 77 प्रतिशत इनकम टैक्स दे रहे हैं भारत में टैक्स व जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का अनुपात 16.7 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका में यह 25.4 प्रतिशत और जापान ने 30.3 प्रतिशत चल रहा है.मुश्किल यह भी है कि अपने यहां व्यक्ति ही नहीं, कंपनियां भी टैक्स देने में कोताही करती हैं. आकलन वर्ष 2014-15 में रिटर्न दाखिल करनेवाली 7.01 लाख कंपनियों में से 3.66 लाख कंपनियों ने कोई टैक्स नहीं दिया था. लेकिन उसे वसूलना तो दूर रहा बल्कि कार्पोरेट को टेक्स में और छूट दे दी गयी

यानी सीधी बात यह है की आयकर दाताओ की संख्या बढ़ने का अर्थ यह बिलकुल भी नही है कि इसी अनुपात से सरकार का खजाना भी बढ़ रहा है

अब एक ओर कमाल का फिगर आपको बताता हूँ जो इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट में दिया गया है आयकर विभाग के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, एक शख्स पर 21, 870 करोड़ रुपये का टैक्स बकाया है. इसकी मात्रा देश को मिले कुल टैक्स की तुलना में 11% है..."
----------------------------------------------------------------
@ Girish Malviya

Friday, 1 September 2017

क़ुरबानी

*जानवर काटने से ही हो जाती है कुरबानी?*

0मुसलमानों का मानना है कि हज़रत इब्राहीमसे जब अल्लाह ने अपनी राह में सबसे प्यारीचीज़ कुरबान करने को सपने में कहा तो उन्होंनेअपने बेटे हज़रत इस्माईल के गले पर छुरीचलाकर उनकी कुरबानी देनी चाही लेकिनएनटाइम पर अल्लाह ने उनके बेटे की जगह एकदुम्बा यानी एक जानवर ज़िबह होने के भेजदिया।

इस्लाम सहित सभी धर्म ईमान यानी आस्थासे चलते हैं। उनमें कुछ बातेें बहुत अच्छी हैं।कुछ सामान्य शिष्टाचार और भाईचारे को बढ़ावादेने वाली है। लेकिन आज के दौर के हिसाब सेदेखा जाये तो उनमें कुछ बातें ऐसी भी लगती हैंजिनका आज कोई सीधा सरोकार समाज कीभलाई से नहीं रह गया है। वे रस्में आज केवलएक रीति रिवाज और परंपरा बनकर बेमतलबहो चुकी हैं। खासतौर पर जो लोग तर्कशीलन्यायशील और मानवीय नज़रिये से निष्पक्षताके साथ सोचते समझते हैं। उनको सभी धर्मों केलोग विद्रोही समझते हैं। उनके खिलाफ अकसरफतवे और धर्मद्रोही होने के फरमान भी जारीहोते हैं।

लेकिन इस सवाल का जवाब कोई आस्थावानदेने को तैयार नहीं होता कि समय के साथबदलकर आध्ुानिक प्रगतिशील और वैज्ञानिकदृष्टिकोण न अपनाने से कोई भी देश औरसमाज कैसे उन्नति कर सकता है? *मिसाल केतौर पर हम भी धर्म जाति और क्षेत्र से ऊपरउठकर तार्किक बात करते हैं तो हमारे समाज केकट्टरपंथी अकसर हमसे खफ़ा रहते हैं। हमप्रयास करते हैं कि साल के 364 दिन अपनेपरिवार पड़ौस मुहल्ला और समाज के दूसरेलोगों से तालमेल बनाकर आपसी भाईचारे केसाथ रहें। लेकिन ईद उल जुहा को लेेकरआजतक हम यह नहीं समझ पाये कि क्याकेवल जानवर काट देने से हमारे अंदर कुरबानीका जज़्बा आ जाता है?*

हमने समाज में देखा है कि जो लोग कई दशकसे महंगा बकरा लेकर ईद पर काटते चले आ रहेहैं। वो विवाद होने पर अल्लाह का वास्ता देने परउसकी राह में अपने ही भाई दोस्त या पड़ौसी याहमवतन के लिये छोटी सी चीज़ की कुरबानी देनेको तैयार नहीं होते। आखि़र क्यों? फिर ऐसेलोगों की जानवर की कुरबानी का क्या मकसदरह जाता है? ऐसे ही लोग समाज की भलाईभाईचारा अमन चैन के लिये भी कोई कुरबानीदेने को तैयार नहीं होते हैं। ऐसे ही लोग देश केलिये भी कोई कुरबानी देने को तैयार नहीं होतेहैं। शिया नेता कल्ब ए सादिक ने कोर्ट मेंमुक़दमा हारने या जीतने दोनों पोज़िशन मेंबाबरी मस्जिद से मुसलमानों को दावा छोड़करअपने हिंदू भाइयों की भावना का सम्मान करतेहुए एक छोटी सी कुरबानी की अपील की थी।

हमारी जानकारी में किसी भी बड़े उलेमा नेउनकी अपील का समर्थन नहीं किया है। साल मेंअकेला कुरबानी का दिन ऐसा आता है। जबहमारा परिवार हम से नाराज़ रहता है। हम अपनेपरिवार की खुशी के लिये एक दिन की हीपिकनिक या और किसी खुशी के लिये 10 से20 हज़ार भी खर्च कर देते हैं। लेकिन 5 हज़ारकी कुरबानी का भी खर्च करने में हमें इस लियेपरेशानी होती है क्योेंकि हमें आज तक इससवाल का जवाब नहीं मिला कि जब हम में एकदूसरे के लिये समाज और देश के लिये कुरबानीका जज़्बा ही मौजूद नहीं है तो सिर्फ जानवरकाटने की रस्म अदा करने से क्या फायदा होगा?हो सकता है इस्लामी आलिमों की नज़र में हमगुनाहगार हों।

उनका दावा है मुसलमान होने के लिये उनकीबताई सभी बातें बिना दिमाग का इस्तेमाल कियेमाननी होती हैं। लेकिन हमारा सोचना तो यह हैकि बिना कुरबानी के भी अगर एक मुसलमान मेंकुरबानी का जज़्बा मौजूद है तो वह उसमुसलमान से ज़्यादा बेहतर इंसान है जो महंगेजानवर की कुरबानी दिखावे के लिये कर रहा है।कम से कम जो लोग इस मौके पर अपने गैरमुस्लिम हमवतनों की भावनाओं का सफाईएकांत और सार्वजनिक स्थानों का गलतइस्तेमाल न करने का भी ख़याल नहीं रखतेउनकी कुरबानी से क्या हासिल होने वाला है?

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोईदरार,

घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तेहार।

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं,

बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार।