Friday, 13 October 2023

एक राष्ट्र एक चुनाव...

*आज वन नेशन वन इलैक्शन, कल वन पार्टी वन पोलिटीशियन ?* 

0 1967 तक देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ साथ ही होते थे। लेकिन इसके बाद यूपी बिहार बंगाल पंजाब व उड़ीसा में बनी विपक्षी गठबंधन की सरकारें अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पायीं। इससे पहले केरल में 1957 में बनी पहली वामपंथी सरकार भी केंद्र की कांग्रेस सरकार को हज़म नहीं हुयी और उसको कुछ बहाने बनाकर समय से पहले बर्खास्त कर 1960 में मिडटर्म इलैक्शन कराये गये। ऐसे ही 1972 में होने वाले संसदीय चुनाव राजनीतिक कारणों से कुछ समय पहले 1971 में ही करा दिये गये। विपक्ष को लगता है यह सरकारी पैसा बचाने प्रशासनिक मशीनरी और सुरक्षा बलों पर पड़ने वाले बार बार अतिरिक्त काम के दबाव और आचार संहिता लगने से रूकने वाले विकास के बहाने सियासी लाभ को किया जा रहा है।     

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      1983, 1999 और अंतिम बार 2018 में विधि आयोग ने एक साथ लोकसभा और राज्यों की सभी विधानसभाओं के चुनाव कराने को मसौदा रिपोर्ट जारी की थी। वर्तमान समय में आन्ध्र प्रदेश अरूणाचल प्रदेश ओडिशा और सिक्किम मेें विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ होते हैं। लोकसभा के पूर्व महासचित पीडीटी आचारी कहते हैं कि एक राष्ट्र एक चुनाव वाली बात व्यवहारिक रूप से इसलिये संभव नज़र नहीं आती क्योंकि किसी भी लोकसभा या विधानसभा का कार्यकाल संविधान के सैक्शन 83 भाग दो और 172 में पांच साल निर्धारित है। ऐसे में कोई केंद्र सरकार जबरन एक साथ चुनाव कराने की अपनी ज़िद पूरी करने के लिये कैसे उसको समय से पहले भंग कर सकती है? अगर वह ऐसा करेगी तो मामला सुप्रीम कोर्ट जायेगा जहां वह संविधान की दुहाई देकर संविधान संशोधन को उसके मूल ढांचे में दखल बताकर बहाल करने की गुहार लगायेगी। हो सकता है कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ उसको बहाल भी कर दे। अलबत्ता यह शक्ति और इच्छा उस राज्य की विधानसभा यानी सरकार के पास सुरक्षित है कि वह जब चाहे विधानसभा भंग कर नये चुनाव करा सकती है। लेकिन वह समय से पहले ऐसा क्यों करेगी? अगर कोई सरकार अल्पमत में आ जाती है तो उसको कैसे बनाये रखा जा सकता है? इसके बाद 6 माह के अंदर नये चुनाव कराना ज़रूरी होता है। हालांकि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में वन नेशन वन इलैक्शन पर विचार करने और इसके कानूनी और संवैधनिक पहलू पर गंभीरता से विचार कर कोई ऐसा सर्वमान्य हल निकालने को एक समिति बनाई गयी है। लेकिन मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इसका पहले ही बहिष्कार कर दिया है। सवाल यह भी है कि दल बदल विरोधी कानून के रहते कैसे किसी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने के साथ साथ वैकल्पिक सरकार बनाने के लिये रचनात्मक या सकारात्मक प्रस्ताव लाया जाये जिससे वर्तमान सरकार तो गिर जाये लेकिन विधानसभा का कार्यकाल पूरा करने के लिये उसी समय साथ साथ नई वैकल्पिक सरकार भी बन जाये? अगर चुनाव के बाद त्रिशंकु लोकसभा या विधानसभा आती है तो चुनाव से बचने को कैसे सरकार हर हाल में दल बदल विरोधी कानून रहते बनाई जायेगी? अगर दल बदल विरोधी कानून खत्म किया जाता है तो आयाराम गयाराम की अवसरवादी खरीद फरोख़्त यानी हाॅर्स ट्रेडिंग कैसे रोकी जायेगी? आप नेता आतिशी एक राष्ट्र एक चुनाव को आॅप्रशन लोटस को वैध बनाने की चाल करार देती हैं। उनका कहना है कि यह संविधान की मूल रचना पर हमला होगा। उनको लगता है कि इससे दलबदल कर जनप्रतिधियों की खरीद कानूनी बन जायेगी। पूंजीवाद के इस दौर में क्या कोई भी टाटा बिरला अडानी अंबानी मंुहमांगी रकम देकर अपनी पसंद के सांसद और विधायक खरीकर क्या अपने हित में सरकार बना सकेगा? इस प्रस्ताव के विरोधियों का कहना है कि यह संघवाद की भावना के खिलाफ होगा क्योेंकि भारत को संविधान में राज्यों का संघ माना गया है। उनका यह भी कहना है कि बार बार चुनाव होना लोकतंत्र के मज़बूत होने की पहचान है। इससे मतदाताओं को जल्दी जल्दी और बार बार अपनी पसंद ज़ाहिर करने अपनी मांगों को पूरा कराने और दलों व नेताओं की जवाबदेही का मौका मिलता है। साथ ही विकास की गति तेज़ होने के साथ सरकारें अपने किये वादे पूरे करने रोज़गार बढ़ाने चुनावी खर्च नंबर एक और दो में कालाधन बाज़ार में आने से अर्थव्यवस्था को गति मिलती है। 2015 में आईडीएफसी संस्था के सर्वे में यह तथ्य सामने आया था कि सब चुनाव एक साथ कराने से 77 प्रतिशत लोग एक ही दल एक ही गठबंधन को वोट कर सकते हैं जबकि यही चुनाव अलग अलग 6 माह के अंतराल से होने पर यह प्रतिशत 61 रह गया। यह भी माना जाता है कि एक साथ चुनाव कराने से राष्ट्रीय दलों को लाभ और क्षेत्रीय दलों को राजनीतिक नुकसान होने की संभावना प्रबल है। यह बात जगजाहिर है कि देश और प्रदेश के मुद्दे मांगे और समस्यायें अलग अलग होती हैं। इसलिये वर्तमान व्यवस्था ही अधिक कारगर और सार्थक मानने वालों की कमी नहीं है। विरोधी दलों का तो यहां तक दावा है कि यह सारी कवायद भाजपा वन पार्टी वन पोलिटीशियन राज के लिये कर रही है। उनका कहना है कि हर राज्य में भाजपा वोट खींचने के लिये मोदी जी को पीएम के रूप में सरकारी खर्च पर आगे कर देती है। इससे पांच साल कहीं ना कहीं मोदी जी को चुनाव प्रचार में लगे रहना पड़ता है। इसलिये भाजपा चाहती है कि वह एक बार में ही पूरे देश और सभी प्रदेशों में राष्ट्रीय मुद्दों पर चुनाव जीत ले। विपक्ष यह भी आरोप लगाता है कि भाजपा अनेकता में एकता की बजाये एक धर्म एक जाति एक भाषा एक रंग की संकीर्ण नीति को आगे बढ़ाते हुए एक देश एक चुनाव की डगर पर आगे बढ़ रही है। राजद नेता तेजस्वी यादव ऐसी ही आशंका जताते हुए कहते हैं कि आज एक देश एक चुनाव की बात हो रही है उसके बाद एक नेता एक दल और एक धर्म जैसी बात की जायेगी। और भी आशंकायें हैं।

0 जम्हूरियत वो तर्ज़ ए अमल है कि जिसमें,

  बंदों को गिना करते हैं तोला नहीं करते।     

 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 5 October 2023

ओपीएस बनाम एनपीएस

*ओपीएस बनाम एनपीएसः भाजपा का रूख़ अधिक व्यवहारिक है ?* 

0 पुरानी पेंशन योजना बहाली संयुक्त मंच के राष्ट्रीय संयोजक व आॅल इंडिया रेलवे मेन्स फेडरेशन के महामंत्री शिव गोपाल मिश्रा के अनुसार 1 जनवरी 2004 के बाद सरकारी सेवा में आये कर्मचारियों के लिये एनपीएस यानी न्यू पेंशन स्कीम एक बड़ा धोखा ही साबित हुयी है। पिछले दिनों 20 से अधिक राज्यों के कर्मचारियों के 400 से अधिक संगठनों ने दिल्ली के रामलीला मैदान में एकत्र होकर पुरानी पेंशन को तत्काल लागू करने की सरकार से मांग की। मुख्य विपक्षी दल कांगे्रस और आप जैसी पार्टियां जहां ओपीएस के पक्ष में खुलकर बोल रही हैं, वहीं भाजपा एनडीए की वाजपेयी सरकार द्वारा चालू की गयी नई पेंशन स्कीम का बचाव करने के साथ ही बीच का रास्ता तलाश रही है।      

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      नई पुरानी सरकारी पेंशन का मामला अब पक्ष विपक्ष के बीच चुनावी मुद्दा बनता जा रहा है। उल्लेखनीय है कि भाजपा के नेतृत्व में बनी एनडीए की अटल सरकार ने दिसंबर 2003 में पुरानी पेंशन की सुविधा खत्म कर दी थी। सरकार का कहना था कि यह सुविधा सरकारी कर्मचारियों को बिना उनके योगदान के भविष्य में देते रहना संभव नहीं है। केंद्र के साथ ही राज्यों की अधिकांश सरकारें भी इस बात से सहमत होकर नई पेंशन स्कीम अपनाने को तैयार हो गयी थीं। बाद में जब कर्मचारियों को नई पेंशन स्कीम में अपने वेतन से दस प्रतिशत राशि का सहयोग देने के बावजूद बहुत कम पेंशन मिली तो इस योजना का विरोध होना शुरू हो गया। नई पेंशन में पुरानी पेंशन की तरह अंतिम वेतन की आधी राशि मिलने की गारंटी या समय समय पर सरकार द्वारा दिये जाने वाले महंगाई भत्ते की बढ़ोत्तरी की व्यवस्था भी ना होने से कर्मचारी और अधिक नाराज़ होने लगे। सरकार ने अपनी ओर से दी जाने वाली सहयोग राशि बढ़ाकर 14 प्रतिशत कर इस गुस्से को थामना चाहा लेकिन मर्ज़ बढ़ता गया जैसे जैसे दवा की वाली कहावत लागू हो गयी। रिटायर्ड कर्मचारी इस बात से भी खफ़ा थे कि उनको रिटायरमेंट के समय मिलने वाली राशि पर भी सरकार ने टैक्स वसूलना शुरू कर दिया। शुरू शुरू में तो भाजपा ने कर्मचारियों की पुरानी पेंशन बहाली की मांग की उपेक्षा की लेकिन जब से कांग्रेस और आप ने अपने शासित राज्यों में ओपीएस बहाल की तो भाजपा पर भी पुरानी पेंशन बहाल करने या नई पेंशन में सुधार करने का राजनीतिक दबाव बढ़ता जा रहा है। अभी तक न्यूनतम पेंशन 9000 और अधिकतक 62,500 रूपये ओपीएस मेें मिलती थी। जिसके लिये कर्मचारियों को अपने वेतन से एक रूपया भी नहीं देना होता था। हाल ही में आरबीआई के रिसर्च पेपर में विस्तार से स्टडी करके बताया गया है कि ओपीएस के मुकाबले एनपीएस में सरकार को साढ़े चार गुना कम योगदान देना होता है। साथ रिज़र्व बैंक की इस कमैटी ने चेतावनी दी है कि एनपीएस की जगह फिर से ओपीएस को लाना उल्टी चाल चलना होगा जिससे दीर्घ अवधि में राज्यों की आर्थिक हालत इतनी खराब हो जायेगी कि उनका जीडीपी का जो खर्च आज पेंशन में 0.1 प्रतिशत जा रहा है वह 2050 तक चार से पांच गुना बढ़कर 0.5 तक पहुंच जायेगा। आज जो नई पेंशन में राज्यों का 4 लाख करोड़ खर्च हो रहा है वह बढ़कर 17 लाख करोड़ से अधिक हो सकता है। इससे राज्यों का कुल आय का 38 प्रतिशत हिस्सा जाने से राजकोषीय घाटा इतना बढ़ेगा कि उनके पास विकास के लिये पूरा पैसा तो क्या बचेगा वे दिवालिया होने के कगार पर भी पहुंच सकते हैं। आज 50 लाख से अधिक सरकारी कर्मचारी नई पेंशन में ढाई लाख करोड़ से अधिक का योगदान कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि जिन कर्मचारियों की सेवा अभी मात्र 10 साल से कम रही है उनको ही रिटायर होने पर बहुत कम पेंशन मिल रही है। जिनकी सेवा 25 से 30 साल हो जायेगी उनको आखि़री वेतन का लगभग 30 से 40 प्रतिशत अवश्य ही मिलने लगेगा। केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन ने कर्मचारियों की न्यूनतम पेंशन हर हाल में अंतिम सेलरी की आधी रकम मिलने की मांग पूरी करने के लिये विचार करने के लिये वित्त सचिव टीवी स्वामीनाथन के नेतृत्व में चार सदस्यों की उच्च समिति का गठन कर नई और पुरानी पेंशन की विसंगतियों को दूर बीच का रास्ता निकालने का प्रयास शुरू किया है। सरकार का यह कहना किसी हद तक सही लगता है कि ओपीएस में ना तो कर्मचारियों का कोई योगदान था और ना ही सरकार के पास इसको बढ़ाते जाने का कोई आय का अतिरिक्त साधन था जिससे इसमेें समय समय पर महंगाई भत्ता और जुड़ जाने से सरकार के लिये इसका बढ़ता बोझ सहन करना असंभव होता जा रहा था। आंकड़ों के हिसाब से यह बात सही भी नज़र आती है क्योंकि 1990 में पेंशन देनदारी केंद्र सरकार की जहां 3272 करोड़ थी तो 2020-21 में वही बढ़कर 58 गुना यानी 1,90,886 करोड़ और राज्यों की 3131 करोड़ से 125 गुना बढ़कर 3,86,001 करोड़  हो गयी थी। भाजपा का यह कहना किसी हद तक व्यवहारिक लगता है कि  सरकारी कर्मचारियों को पुरानी पेंशन देने की स्थिति में सरकार नहीं है। हालांकि हमारा मानना भी यही है कि अगर सरकार के पास पर्याप्त संसाधन हो तो सरकारी कर्मचारियों को पुरानी पेंशन बहाल करने में देर नहीं करनी चाहिये लेकिन यह भी कड़वी सच्चाई है कि विपक्ष ने कई राज्यों की खराब आर्थिक हालत के बावजूद केवल चुनावी लाभ के लिये पुरानी पेंशन बहाल कर दी है या राज्यों की सत्ता में आने पर ओपीएस बहाल करने का आत्मघाती एलान कर दिया है। सवाल यह भी है कि जिस देश में 80 प्रतिशत जनता 20 रूपये रोज़ पर गुज़ारा कर रही हो। जहां करोड़ों लोगों को किसी भी तरह का रोज़गार ही उपलब्ध ना हो या जहां बड़ी तादाद में लोग गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे हों वहां आज की न्यूनतम सरकारी सेलरी लगभग 20 से 30  हज़ार लेने वालों को बिना किसी योगदान के पुरानी पेंशन हर हाल में क्यों दी जानी चाहिये? गीतकार जावेद अख़्तर ने शायद इसीलिये कहा है-

0 ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना हामी भर लेना

  बहुत है फ़ायदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता,

  बुलंदी पर उन्हें मिट्टी की खुश्बू तक नहीं आती

  ये वो शाख़ें हैं जिन को अब शजर अच्छा नहीं लगता।    

 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 28 September 2023

बसपा सांसद बनाम भाजपा सांसद

*दानिश बनाम विधूड़ी: दो एमपी नहीं दो विचारधाराओं का विवाद ?* 

0भाजपा सांसद रमेश विधूड़ी ने बसपा सांसद दानिश अली को नई संसद में जिन साम्प्रदायिक घृणास्पद और ज़हरीले विशेषणों से संबोधित किया। वे कोई अचानक या भावावेश में लगाये लांछन नहीं थे बल्कि  एक विचारधारा एक सोचे समझे अभियान और बड़े मिशन का हिस्सा है। यह अजीब बात है कि एक तरफ संघ कहता है कि मुसलमान भी हमारे हैं। दूसरी तरफ भाजपा मुस्लिम मित्र बनाकर उनके वोट लेने की कोशिश कर रही है। तीसरी तरफ हमारे पीएम मोदी जी पसमांदा मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने के लिये भाजपा नेताओं को उनके बीच जाने की सलाह देते हैं। लेकिन इस सब कवायद के साथ अल्पसंख्यकों खासतौर पर मुसलमानों को ज़लील करने की मुहिम भी जारी है।      

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      भाजपा के कई आकर्षक नारों में एक नारा रहा है ‘तुष्टिकरण किसी का नहीं लेकिन न्याय सबको।’ लेकिन व्यवहार में ऐसा होता नज़र नहीं आता। संसद में जब भाजपा के एमपी विध्ूाड़ी बसपा एमपी दानिश अली को अपशब्दों से नवाज़ रहे थे। उस समय उनके पीछे बैठे पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद हर्षवर्धन जैसे सीनियर भाजपा नेता हंस रहे थे। इतना ही नहीं उनका बयान केवल संसद के रिकाॅर्ड से हटाया गया और उनको पार्टी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया लेकिन यह लेख लिखे जाने तक उनके खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही होने की खबर नहीं है। सवाल यह है कि क्या अगर ऐसा ही बयान किसी विपक्षी सांसद ने भाजपा सांसद के खिलाफ दिया होता तो सरकार का रूख़ यही होता? मुसलमानों को निशाने पर लेेने की देश में आज हालत यह है कि केरल में सेना के एक जवान ने चर्चा में आने के लिये अपने ही दोस्त से अपनी पीठ पर ब्लेड से पीएफआई खुदवाकर खुद पर इस प्रतिबंधित संगठन के हमले के आरोप में कई मुसलमानों को फर्जी तरीके से फंसाना चाहा लेकिन पुलिस ने मामला खोल दिया। गोहत्या गोमांस और चोरी जैसे मामूली आरोपों में मुसलमानों की माॅब लिंचिंग आम बात हो चुकी है। जिनमें सरकारें ना तो तत्काल सख़्त कानूनी कार्यवाही करती हैं न ही मृतक के परिवार को अकसर मुआवज़ा या नौकरी देती है। कोर्ट के स्टे के बावजूद चर्चित व विवादित बाबरी मस्जिद शहीद कर दी गयी। लेकिन इसके लिये आज तक किसी को सज़ा नहीं मिली। सपा नेता आज़म खान डाक्टर कफील खान एक्टर शाहरूख खान के बेटे और उमर खालिद व गुजरात दंगों की गैंग रेप पीड़ित बिल्कीस बानो को न्याय मिलता नज़र नहीं आता। बुल्डोज़र की कार्यवाही एकतरफा गैर कानूनी और बदले की भावना से समय समय पर मुसलमानों पर अधिक होती नज़र आती है। एनआरसी  सीएए को मुसलमानों को टारगेट करने के लिये लाया जा रहा था। पहली बार सरकारी सम्पत्ति के नुकसान की वसूली इसके आंदोलनकारियों से उस समय ऐसा कोई कानून मौजूद ना होने के बावजूद की गयी। इसके खिलाफ चलने वाले शाहीन बाग के आंदोलन को कुचलने के लिये पूर्वी दिल्ली में दंगा हुआ और अनेक बेकसूर लोगों को इस दंगे के आरोप में जेल भेज दिया गया। उनमें से कुछ को आज तक ज़मानत नहीं मिली। अनेक कुख्यात अपराधियों को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया जिनमें से अनेक बृहम्ण व अल्पसंख्यक समाज के लोगों के मारे जाने की घटनाओं पर विपक्ष ने फर्जी होने का आरोप लगाया। सोशल मीडिया पर मुस्लिम औरतों को बदनाम करने के लिये सुल्ली डील और बुल्ली सेल, मुसलमानों को कपड़ों से पहचान लेने का दावा, सड़क या सार्वजनिक स्थानों पर पांच मिनट की नमाज़ पर भी रोक, तीन तलाक पर अपराधिक कानून बनाना, लव जेहाद और धर्म परिवर्तन के नाम पर मुसलमानों के अंतरधार्मिक विवाहों को रोकना जबकि मुस्लिम लड़कियों के ऐसा करने व मुसलमानों के हिंदू बनने को घरवापसी बताकर सही ठहराना न्याय नहीं कहा जा सकता है। 80 बनाम 20 की लड़ाई असम में मियां म्यूज़ियम बंद करना, मुसलमानों को सब्ज़ी की महंगाई का कसूरवार बताना हलाल बनाम झटका हिजाब विवाद पैगंबर का अपमान करने वाली नूपुर शर्मा के खिलाफ आज तक ठोस कार्यवाही ना होना अतिक्रमण हटाने के नाम पर उत्तराखंड व गुजरात में कई मज़ार हटा देना, मुजफ्फरनगर के एक स्कूल में एक मुस्लिम बच्चे की दूसरे बच्चो स ेपिटाई कराने के संगीन मामले को समझौता कराकर दबाना, काॅमन सिविल कोड, कश्मीर फाइल और केरल स्टोरी जैसी झूठी और फर्जी फिल्में बनवाकर मुसलमानों को बदनाम करना, हज सब्सिडी खत्म करना, कोरोना जेहाद के नाम पर तब्लीगी जमात के बहाने मुसलमानों को विलेन बनाना, मुस्लिम पहचान से जुड़े शहरों मार्गों और रेलवे स्टेशनों के नाम थोक में बदलते जाना, उत्तराखंड के उत्तरकाशी के पुरूलिया में एक लड़की के अपहरण के आरोप में मुसलमानों को राज्य छोड़ने की धमकी देना, हरिद्वार धर्म संसद में मुसलमानों के नरसंहार की खुली धमकी देना, ट्रेन में आरपीएफ के सिपाही द्वारा हेट स्पीच देकर अपने एक अधिकारी की हत्या के बाद मुसलमानों को चुनचुनकर मारना और मीडिया का दिन रात मुसलमानों के खिलाफ चलने वाला झूठा भड़काने वाला और नफ़रती एजेंडा सुप्रीम कोर्ट के बार बार आदेश के बावजूद नहीं रोकना बताता है कि ये सब खुद या अनजाने में नहीं बल्कि एक संगठन एक पार्टी और उसकी सत्ता के इशारे व सपोर्ट संग बांटो और राज करो की सियासत और चुनाव दर चुनाव इसी बहाने जीतने की सोची समझी योजना के तहत होता आ रहा है। दूसरी तरफ केंद्रीय मंत्री के खिलाफ हेट स्पीच के आरोप होने के बावजूद दिल्ली पुलिस रिपोर्ट तक दर्ज नहीं करती, असम के सीएम पर लंबे समय से करप्शन के आरोप हैं लेकिन भाजपा में आने पर उनको इनाम के तौर पर मुख्यमंत्री बना दिया जाता है। महाराष्ट्र में 70 हज़ार करोड़ के घोटाले के आरोपी को भाजपा डिप्टी सीएम बनाकर उनके खिलाफ जांच की फाइल ठंडे बस्ते में डाल देती है। भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह से लेकर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय कुमार मिश्रा सहित पक्ष और विपक्ष के उन नेताओं की लंबी लिस्ट है जिनको भाजपा में शामिल हो जाने के बाद ना केवल जांच से आज़ादी मिल गयी बल्कि उनको पद देकर पुरस्कार दिया गया है। यही मामला बसपा सांसद दानिश को गाली देने वाले भाजपा सांसद विधूड़ी का लग रहा है जिनका अतीत पहले भी विवादित रहा है लेकिन उनको भाजपा ने ना तो पार्टी से निकाला और ना ही कोई ठोस कानूनी कार्यवाही की गयी जिससे लगता है कि भाजपा सबको समान न्याय नहीं दे रही है। मुसलमानों के साथ इस तरह का सौतेला व्यवहार अपमान और उत्पीड़ने व अन्याय करने के बावजूद उनसे वोट और सपोर्ट की उम्मीद करना दुश्यंत त्यागी के शब्दों में यही कह सकते है।

0 उनकी अपील है कि उन्हें हम मदद करें,

 चाकू की पसलियों से गुज़ारिश तो देखिये।।  

 *0लेखक पब्लिक आॅब्ज़र्वर के संपादक और नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।*

महिला आरक्षण

महिला आरक्षण के लिये संसद की सीटें भी बढ़ेंगी ?
0 लेडीज़ को पार्लियामंेट और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के लिये 128 वें संविधान संशोधन के साथ नारी शक्ति वंदन अधिनियम बिल संसद के दोनों सदनों में लगभग सर्वसम्मति से पास हो गया है। लेकिन यह कानून नई जनगणना और संसदीय सीटों का नया परिसीमन होने के बाद ही लागू होगा। 2021 में होने वाली जनगणना कोरोना महामारी की वजह से सरकार ने टाल दी थी, लेकिन 2022 या इस साल भी यह क्यों नहीं हुयी और आगे कब तक टलती रहेगी यह कोई नहीं कह सकता। मतलब साफ है कि 2024 के आम चुनाव में महिला आरक्षण लागू होने नहीं जा रहा है। लेकिन यह 2029 के चुनाव में भी लागू हो ही जायेगा यह दावा भी कोई नहीं कर सकता। कांग्रेस सहित विपक्ष और भाजपा सरकार दोनों ही लेडीज़ रिज़र्वेशन का श्रेय लेने की होड़ करते नज़र आ रहे हैं।      
   *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
नई लोकसभा में 888 एमपी बैठने की सीट बनाई गयी हैं। यह दूरदर्शिता का फैसला है। जनगणना और नये परिसीमन के बाद लोकसभा की वर्तमना 545 सीट अगर बढ़ती हैं तो उनके लिये पहले ही व्यवस्था कर दी गयी है। इससे महिलाओं के लिये एक तिहाई सीट रिज़र्व होने का पुरूषों के नेतृत्व पर कोई विपरीत प्रभाव भी नहीं पड़ेगा। 1951 में तत्कालीन 489 संसदीय सीटों को बढ़ाकर 494 और 1961 के बाद 522 और अंतिम बार 1971 में 543 नई जनगणना और परिसीमन के बाद किया गया था। इसके बाद यह सवाल उठने लगा कि दक्षिण के जो राज्य देशहित में जनसंख्या नियंत्रण कर परिवार नियोजन कर रहे हैं। अगर उत्तर भारत की तेजी से बढ़ती आबादी के हिसाब से सीटों का परिसीमन कर उनके सांसदों और विधायकों की संख्या बढ़ती है तो इससे एक नया विरोधाभास खड़ा होगा। उत्तर बनाम दक्षिण का विवाद बढ़ता देख तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने संविधान में 42 वां संशोधन कर नये परिसीमन को 2001 तक के लिये रोक दिया। इसका मकसद देश में परिवार नियोजन को बढ़ावा देना था। सन 2000 में 91 वां संविधान संशोधन कर एनडीए की वाजपेयी सरकार ने इस रोक को आगामी 25 साल और बढ़ाकर नये परिसीमन की मयाद 2026 कर दी। नये परिसीमन पर इस 50 साल की रोक का मकसद जनसंख्या का टीएफआर 2.1 यानि जन्म और मृत्यु दर समानता पर लाकर स्थिर करना था। हालांकि आज़ादी से पहले ही लिंग के आधार पर होने वाले पक्षपात को खत्म करने की आवाज़ उठने लगी थी। लेकिन फिर भी संविधान सभा की महिला सदस्यों ने उस समय लोकसभा और विधानसभाओं में महिला आरक्षण का संविधान प्रावधान करने पर जोर नहीं दिया। संविधान सभा की सदस्य रेणुका राय का कहना था कि भविष्य में जब सबको समान अवसर मिलेंगे तो योग्य महिलाएं जनरल सीटों पर ही अपनी भागीदारी खुद बढ़ाती जायेंगी। बदकिस्मती से ऐसा व्यवहारिक रूप से कई दशक तक भी हो नहीं सका। इसके बाद राजीव गांधी सरकार द्वारा 73 और 74 वें संविधान संशोधन के बाद जब महिलाओं को ग्राम सभाओं और स्थानीय निकायों में 33 प्रतिशत आरक्षण दिया गया तो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में भी ऐसा ही करने की मांग तेज़ होने लगी। इसके बाद पहली बार 1996 में संसद में महिला आरक्षण बिल आया लेकिन यह पास नहीं हो सका। इसके बाद 2008 में यूपीए सरकार ने यही बिल राज्यसभा में 186 बनाम एक वोट के अंतर से पास कर दिया। लेकिन लोकसभा में सपा बसपा और राजद जैसे यूपीए के घटकों के इसमें ओबीसी व अल्पसंख्यक महिलाओं के लिये अलग से दलितों व आदिवासियों की तरह आरक्षण की मांग पूरी ना होने पर विरोध के चलते यह वहां पास नहीं हो सका और अंत में लोकसभा भंग होने के साथ ही लैप्स हो गया। विपक्ष का अब भी आरोप है कि मोदी सरकार ने यह बिल केवल 2024 में होने वाले संसदीय चुनाव में महिलाओं के वोट खींचने के लिये संसद के नये भवन में पेश किया है। अन्यथा इसको लागू करने के लिये एक तयशुदा प्रोग्राम पेश किया जाना चाहिये था। इसके साथ ही आरक्षण का विस्तार राज्यसभा और राज्य की विधान परिषदों में भी किये जाने की मांग हो रही है। इसके साथ ही ओबीसी और अल्पसंख्यक महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिये आरक्षण में आरक्षण की मांग अभी भी जारी है। लेकिन वर्तमान सरकार के तौर तरीकों और इरादों को देखकर लगता नहीं वह इस बिल में फिलहाल कोई संशोधन पेश करने को राजी होगी। ऐसा इसलिये भी लग रहा है क्योंकि ओबीसी आरक्षण के लिये जाति की गणना होना ज़रूरी है। जिसके लिये मोदी सरकार किसी कीमत पर तैयार नहीं है। विधानमंडलों में महिला आरक्षण जब लागू होगा तब होगा लेकिन भविष्य में यह भी देखना होगा कि प्रधान और चेयरमैन की तरह उनके पति पिता भाई पुत्र या ससुर उनको कठपुतली बनाकर बैकडोर से अपनी सत्ता ना चलाने लगें। इसके लिये समतावादी नीतियां लागू कर समाज में महिलाओं का लगातार हर क्षेत्र में सशक्तिकरण करने के लिये उनका आर्थिक और शैक्षिक स्तर उठाना होगा। यह आरक्षण हालांकि फिलहाल 15 साल के लिये लागू होना है। लेकिन दलितों व आदिवासियों के लिये 70 साल से लागू आरक्षण भी सिवाय सांकेतिक के उनकी दयनीय स्थिति में कोई आमूल चूल बदलाव नहीं कर पाया है।

0 हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिये

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिये

आज यह दीवार परदों की तरह हिलने लगी

शर्त थी लेकिन कि ये बुनियाद हिलनी चाहिये।

 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीपफ एडिटर हैं।*

Wednesday, 6 September 2023

कोटा में बढ़ते सुसाइड...

*कोटाः कैरियर बनाने के चक्कर में जान दांव पर?* 

0 हर बच्चा पढ़ लिखकर डाॅक्टर इंजीनियर या कोई बड़ा प्रोफेशनल बनना ही चाहे यह ज़रूरी नहीं है। लेकिन उसके माता पिता अकसर यही चाहते हैं कि जो वे खुद नहीं बन पाये या जो वे हैं या फिर वे जो सपने अपने बच्चो के लिये देखते हैं। उनके बच्चे को हर हाल में हर कीमत पर और हर जुगाड़ से वही बनना है। यहीं से बच्चो और अभिभावकों का द्वन्द्व शुरू होता है। यह माना जा सकता है कि मांबाप कभी भी बच्चो का बुरा नहीं चाहते लेकिन यह भी सही है कि वे अंजाने में ही बच्चो का बुरा कर बैठते हैं। मिसाल के तौर पर कोटा में जो आजकल बच्चो की आत्महत्या के मामले बढ़ते जा रहे हैं। उसके पीछे बड़ों की यही ज़िद है कि बच्चो को हर हाल में पढ़ना ही होगा।      

                  -इक़बाल हिंदुस्तानी

      राजस्थान की कोटा पुलिस के अनुसार इस साल अब तक जेईई और नीट क्वालिफाई करने के लिये कोचिंग करने वाले 23 छात्र छात्राओं ने आत्महत्या कर ली है। जबकि 2015 में 17, 2016 में 16, 2017 में 7, 2018 में 20, 2019 में 8, 2020 में 4, 2021 में शून्य और 2022 में 15 बच्चो ने अपनी जान दी थी। उच्च शिक्षा लेकर अपना कैरियर बनाने के लिये हर साल यहां 2 लाख बच्चे 4 हज़ार टीचर से कुल 10 कोचिंग सेंटर में पढ़ने आते हैं। इनमें से 7 बहुत बड़े जाने माने कोचिंग सेंटर हैं। यहां इन बच्चो के लिये लगभग 4 हज़ार होस्टल और 40 हज़ार से अधिक पेयिंग गेस्ट सेंटर भी हैं। राजस्थान सरकार ने इस साल बच्चो की बढ़ती आत्महत्यायें रोकने के लिये कुछ कदम उठाये हैं। जिनमें फिलहाल हर माह होने वाले टेस्ट पर अस्थायी रूप से रोक लगा दी है। प्रशासन का मानना है कि टेस्ट होने के बाद उनमें असफल रहने वाले छात्र ही अकसर अपनी जान दे रहे हैं। इसके साथ ही हाॅस्टल की छत के पंखों में विशेष प्रकार के स्प्रिंग लगाये जा रहे हैं जिससे उनमें लटकने पर दम ना घुटकर बच्चा अपने वज़न से सीधे ज़मीन पर सुरक्षित आ जाये और उसकी जान बच जाये। हाॅस्टल में एंटी सुसाइड नेट भी लगाये जा रहे हैं। जिससे छात्र के हाॅस्टल की किसी स्टोरी से कूदकर जान देने के प्रयास को जाल में फंसने से बचाया जा सके। यह सारी कवायद 27 अगस्त को दो और बच्चो के द्वारा टेस्ट में फेल होने पर आत्मघाती कदम उठाने के बाद की गई है। हालांकि पुलिस प्रशासन सरकार और बच्चो के घरवाले भी जानते हैं कि ये केवल वक्ती तौर पर उठाये जाने वाले एहतियाती कदम हैं। जिनसे कुछ समय के लिये बच्चो का बचाव हो सकता है। लेकिन उनके आत्महत्या से रोकने लिये उनकी काउंसिलिंग और साथ ही माता पिता का उन पर कुछ खास बनने का बेजा दबाव खत्म करना होगा। दरअसल कोटा में बढ़ती छात्र आत्महत्याओं ने सीएम अशोक गहलौत को चिंता में डाल दिया है। उन्होंने 18 अगस्त को कोचिंग सेंटर के संचालकों की एक मीटिंग कर बढ़ती सुसाइड के लिये उनकी ज़िम्मेदारी तय करने की बात कहकर पुलिस प्रशासन को कोचिंग सेंटर पर सख़्ती करने का इशारा दे दिया। मुख्यमंत्री ने खासतौर पर एलन नामक सबसे मशहूर कोचिंग सेंटर को निशाने पर लेते हुए कहा कि कुल 21 में 14 छात्र आपके सेंटर के ही जान देने वालों मेें शामिल हैं। हालांकि इसकी वजह यह भी है कि हर साल जो दो लाख बच्चे यहां कोचिंग लेने आते हैं। उनमें से पिछले साल भी एक लाख 25 हजार केवल इसी जाने माने संेटर पर पढ़ने आये थे। इस सेंटर का दावा है कि उसने बच्चो की काउंसिलिंग करने को 72 काउंसिलर तैनात कर रखे हैं। लेकिन इस सेंटर के बच्चो की बड़ी संख्या देखते हुए ये उूंट के मुंह में ज़ीरा यानी 1700 बच्चो पर एक काउंसिलर ही उपलब्ध है। असली प्राॅब्लम यह है कि बच्चो के मातापिता यह समझने को तैयार नहीं हैं कि हर बच्चा पढ़ना नहीं चाहता हर बच्चा डाॅक्टर इंजीनियर नहीं बनना चाहता हर बच्चा अपने घर परिवार और रिश्तेदार व दोस्तों से अलग रहने की शक्ति नहीं रखता। हर बच्चे में इन मुश्किल और थकाउू व उबाउू कोर्स को करने की प्रतिभा और साहस नहीं होता। हर बच्चा उतनी मेहनत और लगन नहीं रखता जितनी इन कोर्स को करने के लिये चाहिये। हर बच्चे में वो शौक चाहत और सेवा की भावना नहीं होती जो इन कोर्स को करने के बाद डाॅक्टर इंजीनियर बनकर बाद में नौकरी या अपना क्लीनिक व अस्पताल शुरू करने लिये चाहिये। बच्चो को अपनी ज़िद के सामने आत्महत्या कर मर जाने तक के लिये जोखिम लेने वाले मातापिता कभी बच्चे से उसके मन की बात जानने की कोशिश नहीं करते कि वह क्या चाहता है? आजकल बच्चे मोबाइल लिव इन रिलेशन और नशे के भी शिकार होने लगे हैं। उनके मातापिता को अपने बच्चे के बारे मेें कभी पता ही नहीं होता कि वह वहां रहकर जी जान से पढ़ रहा है या मौज मस्ती और टाइम पास कर रहा है? ऐसे में जब वह अचानक टेस्ट या परीक्षा में नाकाम होता है तो मातापिता उस पर खूब गुस्सा नाराज़गी और दुख जताने लगते हैं। ऐेसे में या तो बच्चा कोचिंग और घर छोड़कर हमेशा के लिये कहीं भाग जाता है या फिर अपनी जान देने के अलावा कोई दूसरा रास्ता उसको नज़र ही नहीं आता। हमार कहना है कि बच्चे उनके मातापिता और उनके कोचिंग सेंटर को यह समझना चाहिये कि हर बच्चा ना तो पास हो सकता है और ना ही उसकी रूचि ये सब करने में होती है और साथ ही उनमें से अनेक में इतनी प्रतिभा भी नहीं होती इसलिये बच्चो को उनकी पसंद सामर्थ और प्रतिभा के हिसाब से पढ़ने दें।

 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Thursday, 24 August 2023

नई भारतीय संहिता

*नाम बदलने से संहिताओं में क्या क्या बदल जायेगा ?* 
0भारत सरकार ने 1860 में अंग्रेज़ों द्वारा बनाई गयी आईपीसी यानी भारतीय दंड संहिता 1973 की सीआरपीसी यानी आपराधिक प्रक्रिया संहिता और 1872 के इंडियन एविडेंस एक्ट यानी भारतीय साक्ष्य अधिनियम को बदलकर एतिहासिक क़दम उठाये हैं। लेकिन विपक्ष इसके कई प्रावधानों को जनविरोधी बताकर अभी से विरोध कर रहा है। हालांकि अभी ये तीनों विधेयक संसद से पास नहीं हुए हैं। इन तीनों के ड्राफ्ट पर फिलहाल गहन विचार करने के लिये संसद की स्थायी समिति को भेजा गया है। लेकिन इस पर व्यापक चर्चा होने लगी है कि क्या इससे क्रिमनल जस्टिस सिस्टम पर कोई सार्थक व सकारात्मक अंतर पड़ेगा या केवल इन संहिताओं के नाम व कुछ धाराओं की संख्या व उनमें जोड़ घटाओ तक ही यह कवायद सीमित रहने वाली है?      
   *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 
      संसदीय समिति की रिपोर्ट के बाद अगर कुछ संशोधन कर इन तीनों विधेयकों को संसद से शीतकालीन सत्र में पास किया जाता है तो इंडियन पेनल कोड को भारतीय न्याय संहिता क्रिमनल पेनल कोड को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और इंडियन एविडेंस एक्ट को भारतीय साक्ष्य विधेयक 2023 के नाम से जाना जायेगा। भारतीय दंड संहिता का पहला मसौदा थाॅमस बबिंगटन मैकाले की अध्यक्षता वाले प्रथम विधि आयोग द्वारा तैयार किया गया था। यह मसौदा इंग्लैंड के कानून के सरल संहिताकरण पर आधरित था। इसके साथ ही इसमें नैपोलियन कोड और 1825 के लुइसियाना नागरिक संहिता से भी कुछ प्रावाधन शामिल किये गये थे। आईपीसी का पहला ड्राफ्ट 1837 में काउंसिल में गवर्नर जनरल के सामने पेश किया गया था। संहिता को अंतिम रूप देने में ईस्ट इंडिया कंपनी राज को 20 साल गुजर गये। संहिता का अंतिम मसौदा 1850 में तैयार हुआ। इसको 1856 में विधान परिषद में रखा गया। इसके बाद 1857 के गदर की वजह से इसे कुछ समय को रोक दिया गया। बान्र्स पीकाॅक ने कई संशोधनों और बदलाव के बाद इसे 1 जनवरी 1860 को बाकायदा लागू किया गया। इस संहिता को 23 अध्याय में विभाजित किया गया है। जिसमें कुल 511 धारायें शामिल रही हैं। अब सरकार ने आईपीसी के 22 प्रावधानों को खत्म करने और वर्तमान 175 प्रावधानों में परिवर्तन करने का फैसला किया है। इनमें 8 नई धारायें जोड़ी गयी हैं। कुल 356 प्रावधान हैं। सरकार ने एक ओर कहा है कि यह विध्ेायक राजद्रोह कानून को पूरी तरह समाप्त करता है। जबकि राज्य के विरूध अपराध की नई धारा 150 कहती है कि भारत की संप्रभुता एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कामों लिये कड़ी कानूनी कार्यवाही की जायेगी। साथ ही माॅब लिंचिंग के अपराध के लिये 7 साल या उम्रकैद या सज़ा ए मौत की विचित्र व्यवस्था की गयी है। जबकि हत्या की सज़ा पहले ही आजीवन कारावास या फांसी रही है। ऐसा लगता है कि माॅब लिंचिंग को सरकार साधारण हत्या से कम गंभीर अपराध मानकर चल रही हैै? ऐसे ही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता सीआरपीसी के 9 प्रावधानों को खत्म कर उसके 160 प्रावाधनों में व्यापक बदलाव कर 9 नये प्रावाधन शामिल करती है। प्रस्तावित नये विधेयक में कुल 533 धारायें शामिल हैं। भारतीय साक्ष्य विधेयक में वर्तमान अधिनियम के 5 प्रावधानों को निरस्त कर 23 प्रावधानों में परिवर्तन कर एक नया प्रावधान शामिल किया गया है। इस विध्ेायक में कुल 170 सैक्शन हैं। नये विध्ेायकों में भगौड़े अपराधियों की एक पक्षीय सुनवाई, दंड की व्यवस्था सभी आपराधिक मामलों में जीरो प्रथम सूचना रिपोर्ट के व्यापक प्रावधान, शून्य एपफआईआर को 15 दिन के अंदर संबंधित थाने में भेजना अनिवार्य, आवेदन के 120 दिनों में अनुमति ना देने पर प्राधिकरण के अपराधों के आरोपी सिविल सेवक पुलिस अफसर व अन्य कर्मचारियों पर स्वतः केस चलाने की सराहनीय प्रक्रिया शुरू हो सकेगी। एक और प्रशंसनीय काम रिपोर्ट से लेकर केस डायरी चार्जशीट और निर्णय देने की पूरी कार्यवाही का डिजिटीकरण होगा साथ ही अपील जिरह सुनवाई वीडियो काॅन्फ्रेंिसंग के ज़रिये होगी। यौन अपराधों से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान पीड़ितों के बयान और तलाशी व ज़ब्ती की वीडियो बनाना अनिवार्य होगा। रिपोर्ट के 90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होगी लेकिन कोर्ट इसकी सीमा 90 दिन और बढ़ा सकता है। इसके बाद कोर्ट को 60 दिन के भीतर आरोप तय करने होंगे और सुनवाई पूरी कर एक माह में फैसला देना ज़रूरी होगा। फैसला एक सप्ताह के भीतर आॅनलाइन उपलब्ध कराना होगा। ये सब सरकार के सराहनीय कदम माने जा सकते हैं। नया कानून पुलिस को 15 की बजाये 90 दिन की हिरात की इजाज़त देता है। जो आरोपी को एक तरह से अपराधी मानमकर पहले से 6 गुना समय जेल में रखने की मंशा सरकार के आलोचकों को लगती है। विपक्ष का कहना है कि इन नये कानूनों की जांच के लिये वकीलों रिटायर्ड जजों पूर्व पुलिस अफसरों सिविल सेवकों मानव अधिकार नागरिक अधिकार और महिला अधिकार के लिये आंदोलन व संघर्ष करने वालों की एक कमैटी बनाई जाये। उसका कहना है कि इन विधेयकों से संविधान के सैक्शन 14, 19 और 21 के तहत दिये गये नागरिकों के मूल अधिकारों पर गंभीर ख़तरा मंडरा रहा है। ऐसे ही शादी के झूठे बहाने सैक्स करने को लेकर नया विशेष अपराध बनाना एक नई समस्या खड़ी करेगा। छोटी चोरी आत्महत्या का असफल प्रयास और मानहानि के मामूली मामलों में कम्युनिटी सर्विस का प्रावधान एक सकारात्मक पहल मानी जा सकती है।
 *नोट-लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर अख़बार के चीफ एडिटर हैं।*

Saturday, 5 August 2023

तीसरी अर्थव्यवस्था

अर्थव्यवस्था बड़ी होना नहीं प्रति व्यक्ति आय बढ़ना विकास है ?
0 भाजपा का दावा है कि उसकी सरकार ने देश को दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया है। पीएम मोदी जी का कहना है कि अगर उनको तीसरी बार सरकार बनाने का अवसर दिया गया तो वे देश को विश्व की तीसरी बड़ी इकाॅनोमी बना देंगे। लेकिन सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश की जीडीपी उनके कार्यकाल में कांग्रेस की सरकार के मुकाबले आधी से भी कम स्पीड यानी 2014 से 2023 तक 84 प्रतिशत तो 2004 से 2014 तक दोगुने से भी अधिक यानी 183 प्रतिशत बढ़ी थी। हमारे देश के मुकाबले छटे स्थान पर ब्रिटेन की प्रति व्यक्ति आय हमसे 25 गुना अधिक है। जबकि दुनिया की तालिका में भारत प्रति व्यक्ति आय 2600 डाॅलर के हिसाब से देखा जाये तो हम 128 वें स्थान पर हैं।   

   *-इक़बाल हिंदुस्तानी* 

      इंटरनेशनल माॅनेटरी फंड के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार दुनिया में जीडीपी के हिसाब से अमेरिका 26855 बिलियन डाॅलर नंबर वन तो चीन 19374 बिलियन डाॅलर दूसरे व जापान 4410 बिलियन डाॅलर तीसरे और 4309 बिलियन डाॅलर जर्मनी चैथे और भारत 3737 बिलियन डाॅलर के साथ पांचवे स्थान पर है। 2014 से 2023 तक चीन की जीडीपी 84 तो अमेरिका की 54 प्रतिशत बढ़ी है। इनके अलावा दुनिया के टाॅप टेन देशों में से कई की जीडीपी या तो मामूली बढ़त के साथ स्थिर रही है या फिर मंदी के कारण वर्तमान से भी कुछ नीचे चली गयी है। मिसाल के तौर पर जिस यूके को हमने पांचवे पायेदान से पीछे छोड़ा है। उसकी जीडीपी बढ़त इस दौरान मात्र 3 तो फ्रांस की 2 और रूस की केवल एक प्रतिशत ही रही है। उधर ब्राजील की जीडीपी उल्टा 15 प्रतिशत पीछे चली गयी है। इसकी वजह दुनिया में आई 2008-09 की मंदी भी बनी। हालांकि भारत भी इस मंदी से प्रभावित हुआ लेकिन उसका असर बहुत हल्का सा था। हालांकि पूर्व अनुमान के अनुसार भारत आशा के अनुसार 8 से 9 प्रतिशत की स्पीड से नहीं बढ़ रहा है लेकिन अगर हम 6 प्रतिशत की जीडीपी औसत बढ़त भी बनाये रख सके तो 2027 तक जर्मनी और जापान को पीछे छोड़कर विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकते हैं। इसकी वजह यह होगा कि हमारी इकाॅनोमी तब तक 38 तो जापान और जर्मनी की 15 प्रतिशत ही बढे़गी। 2004-09 में डीडीपी 8.5 प्रतिशत तो 2004 से 2014 तक औसत 7.5 प्रतिशत की दर से बढ़ रही थी। आज भारत की जीडीपी 5.7 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। वह दौर एक तरह से मनमोहन सिंह सरकार का भारत में आार्थिक प्रगति का स्वर्ण काल था लेकिन अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में चले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की आड़ में मीडिया व संघ परिवार ने एक सोची समझी योजना के तहत तिल का ताड़ बनाकर उस सरकार को काल्पनिक टू जी घोटाले के बहाने इतना अधिक बदनाम कर दिया जितना उसका कसूर नहीं था। इन आंकड़ों की सहायता से हम यह समझ सकते हैं कि किसी देश की जीडीपी बढ़ने में उसकी सरकार आबादी और दूसरे देशों की मंदी कम स्पीड और प्रति व्यक्ति आय की क्या भूमिका होती है? हमारे देश में 35 करोड़ लोग पूरा पौष्टिक खाना नहीं खा पा रहे हैं। 80 करोड़ लोगों को सरकार 5 किलो अनाज देकर जीवन जीने में मदद कर रही है। देश की निचली 50 प्रतिशत आबादी सालाना आमदनी 50 हज़ार रूपये कमाकर भी कुल जीएसटी का 64 प्रतिशत चुका रही है। जबकि सबसे अमीर 10 प्रतिशत मात्र 3 प्रतिशत भागीदारी कर रहे हैं। इससे आमदनी ही नहीं खर्च और कर चुकाने के हिसाब से भी आर्थिक असमानता लगातार बढ़ती जा रही है। जबकि चोटी के एक प्रतिशत की वार्षिक आय 42 लाख है। जीएसटी हर साल हर माह पहले से अधिक बढ़ने का दावा भी सरकार अपनी उपलब्धि के तौर पर करती है जबकि जानकार बताते हैं कि इसका बड़ा कारण तेज़ी से बढ़ती बेतहाशा महंगाई भी है। महंगाई बढ़ाने में खुद सरकार पेट्रोलियम पदार्थों रसोई गैस और चुनचुनकर उपभोक्ता पदार्थों को जीएसटी के दायरे में लाना या कर की दरें लगातार बढ़ाते जाना भी हैै। जीडीपी प्रोडक्शन का पैमाना माना जाता है। लेकिन यह उपभोग का माप भी है। जब आप कन्ज्यूमर की एक विशाल गिनती लेकर उसे एक मामूली राशि से गुणा करेंगे तो एक बहुत बड़ी संख्या आती है। अगर क्रय मूल्य समता यानी पीपीपी के आधार पर देखा जाये तो हमारी यह 2100 अमेरिकी डाॅलर है। जबकि यूके की 49,200 डाॅलर और अमेरिका की 70,000 डाॅलर है। अगर देश के लोग गरीब हैं तो दुनिया में जीडीपी पांचवे तीसरे नंबर पर ही नहीं नंबर एक हो जाने पर भी क्या हासिल होगा? यह एक तरह से भोली सीधी सादी जनता को गुमराह करने का एक राजनीतिक झांसा ही है। सच तो यह है कि मोदी सरकार की नोटबंदी देशबंदी और जीएसटी बिना विशेषज्ञों की सलाह लिये और बिना सोचे समझे और जल्दबाज़ी में लागू करने से अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहंुचा है जिससे यह वर्तमान में जहां खुद पहंुचने वाली थी उससे भी पीछे रह गयी है। इसका परिणाम तेज़ी से बढ़ती बेरोज़गारी और महंगाई है। इसके साथ ही यह भी एक बड़ा विचारणीय तथ्य है कि जिस देश में शांति भाईचारा समानता निष्पक्षता धर्मनिर्पेक्षता न्याय नहीं होगा वहां शांति नहीं रह सकती और जब शांति नहीं होगी तो ना विदेशी निवेश आयेगा और ना ही स्थानीय स्वदेशी कारोबार से अर्थव्यवस्था ठीक से फले फूलेगी।                 

 *नोट- लेखक नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर और पब्लिक आॅब्ज़र्वर के चीफ एडिटर हैं।*