Sunday, 5 July 2015

SHAYRI

आ कहीं मिलते हैं हम,कि बहारें आ जाएं,
इससे पहले कि ताल्लुक में दरारें आ जाएं;

ये जो ख़ुद्दारी का मैला-सा अंगौछा है मेरा,
मैं अगर बेंच दूं तो इससे कई कारें आ जाएं;

दुश्मनी हो तो फिर ऐसी कि कोई एक ही रहे,
या ताल्लुक हो तो ऐसा कि पुकारें आ जाएं;

ये भी मुमकिन है कि इन ही में कही हम लेटे हों,
तुम ठहर जाना रस्ते में अगर मज़ारें आ जाए!!!

रफ़ीक शादानी

तू जेतना समझत हौ ओतना महान थोड़े है
ख़ान तो लिखत हैं लेकिन पठान थोड़े है

मार-मार के हमसे बयान करवाईस
ईमानदारी से हमरा बयान थोड़े है

देखो आबादी मा तो चीन का पिछाड़ दिहिस
हमरे देस का मरियल किसान थोड़े है

हम ई मानित है मोहब्बत में चोट खाईस है
जितना चिल्लात है ओतना चोटान थोड़े है

ऊ छत पे खेल रही फुलझड़ी पटाखा से
हमरे छप्पर के ओर उनका ध्यान थोड़े है

चुनाव आवा तब देख परे नेताजी
तोहरे वादे का जनता भुलान थोड़े है

"रफ़ीक" मेकप औ' मेंहदी के ई कमाल है सब
तू जेतना समझत हौ ओतनी जवान थोड़े है.

जिसे लिखता है तू वो ही तेरा किस्सा नहीं होता
जो अपना है वही अक्सर यहाँ अपना नहीं होता

कहीं चेहरा तो मिलता है मगर शीशा नहीं होता
कहीं आइना होता है मगर  चेहरा नहीं होता

मुहब्बत की न हो बुनियाद  तो रिश्ते  बनाएं क्यूँ
फ़क़त बरगद उगा लेने ही से साया नहीं होता

फ़क़त इंसान ही इन्सां  नहीं बनता ज़माने में
वगरना आज की दुनिया में देखो क्या नहीं होता

करे तश्हीर वो जितनी  मचाले शोरो गुल जितना
कोई क़तरा कभी फैलाव में दरिया नहीं होता

कई आंसू यहाँ चुपचाप  बह  जाते हैं  अनदेखे
हरिक आंसू की ख़ातिर  दोस्त  का कन्धा नहीं होता

वो सब कुछ देख कर और सोचकर कुछ फैसला करता
अगर मज़हब न होता तो बशर  अँधा नहीं होता

बिस्मिल अज़ीमाबादी का कलाम

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजूए कातिल में है 

ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत में तेरे ऊपर निसार
ले तेरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल मैं है

आज फिर मक़तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार
आयें वह, शौक़े-शहादत जिनके-जिनके दिल में है

वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्यों बताएँ क्या हमारे दिल में है  

अब न अगले वलवले हैं और न वह अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिले-बिस्मिल में है

[11:11AM, 1/3/2015] iqbalhindustani: ग़लतियों से जुदा तू भी नही, मैं भी नही,
दोनो इंसान हैं, खुदा तू भी नही, मैं भी नही!
"तू मुझे ओर मैं तुझे इल्ज़ाम देते हैं मगर,
अपने अंदर झाँकता तू भी नही, मैं भी नही "!!
"ग़लत फ़हमियों ने कर दी दोनो मैं पैदा दूरियाँ,
वरना फितरत का बुरा तू भी नही, मैं भी नही...!!
[9:30PM, 2/22/2015] iqbalhindustani: "प्‍यास की कैसे लाए ताब कोई,
नहीं दरिया तो हो सराब कोई।

रात बजती थी दूर शहनाई,
रोया पीकर बहुत शराब कोई।

कौन सा ज़ख्‍म किसने बख्‍शा है,
उसका रखे कहाँ हिसाब कोई।

फिर मैं सुनने लगा हूँ इस दिल की,
आने वाला है फिर अज़ाब कोई।"

जावेद अख्तर
[11:57AM, 4/22/2015] iqbalhindustani: Benaam sa ye ded thrhr q nhi jata
Jo beet gya h wo guzr q nhi jata
Sb kuch to h q dhoondti rhti h nigahe
Kya baat h m ab b ghr q nhi jata
Wo ek he chehra to nhi sare jahaan me
Jo door h wo dil se utr q nhi jata
M hu apni he uljhi hui rahon ka tmasa
Jate h jidhr sb m udhr q nhi jata
Wo khwab jo brso se na chehra na bdn h
Wo khwab hwaon me bikhar q nhi jata.......
[3:36PM, 4/23/2015] iqbalhindustani: यहाँ हर शख़्स, हर पल
हादसा होने से डरता है।
खिलौना है जो मिट्टी का
फ़ना होने से डरता है।।

मेरे दिल के किसीे कोने में
एक मासूम सा बच्चा।
बड़ों की देख कर दुनिया,
बड़ा होने से डरता है ।।

ना बस में ज़िंदगी इसके
ना काबू मौत पर इसका।
मगर इंसान फिर भी कब
ख़ुदा होने से डरता है।।

अजब ये ज़िदगी की क़ैद है
दुनिया का हर इन्सां।
रिहाई मांगता है और
रिहा होने से डरता है।।
[3:36PM, 4/23/2015] iqbalhindustani: कभी खमोश बैठोगे कभी कुछ गुनगुनाओगे
मैं उतना याद आऊंगा मुझे जितना भुलाओगे
कभी दुनिया मुकम्मल बन के आएगी निगाहों में
कभी मेरी कमी दुनियां की हर एक शह में पाओगे
कहीं पर भी रहें हम तुम मोहब्बत फिर मोहब्बत है
तुम्हें हैम याद आएंगे हमें तुम याद आओगे
कोई जब पूछ बैठेगा ख़ामोशी का सबब तुमसे
बहुत समझाना चाहोगे मगर समझ ना पाओगे।❤️
[5:55PM, 4/28/2015] iqbalhindustani: Na Bujha chiragh-e-dayaar-e-dil,
Na Bichdne Ka Tu Malal Kar,
Tujhe Degi Jeene Ka Hosla,
Meri Yaad Rakh Le Sambhal Kar,

Yay Bhi Kya K Ek Hi Shakhs Ko
Kabhi Sochna,Kabhi Bholna,
Jo Na Bujh Sake Wo Diya Jala,
Jo Na Ho Sake Wo Kamal Kar,

Gham-e-Aarzu Meri Justju,
Mein Simat Ke Aa Gaya Ru-Baru,
Ye Sukoot-e-Marg Hai Kis Liye?
Mein Jawab Du Tu Sawal Kar,

Tu Bichad Raha Hai To Soch Le,
Tere Hath Hai Meri Zindage,
Tera Routhna Meri Mout Hai,
Meri Be,basi Ka Khayal Kar…
[5:55PM, 4/28/2015] iqbalhindustani: Kabhi unka naam lena
kabhi unki baat krna
mera zoq unki chahat
mera shoq unpe mrna
kabhi chalte-2 thamna
aur tham k beth jana
kabhi ladkhda k girna
aur gir k phir sambhalna
Kabhi raat raat rona
kabhi din chade sisakna
kabi darya darya rehna…
kabi boond ko tarasna…
raha ishq se hamesha…
koi wasta hai apna…
yehi zindagi hai apni…
yehi rasta hai apna
[9:58AM, 4/29/2015] iqbalhindustani: बस एक वक्त का खंजर मेरी तलाश में है
जो रोज़ भेस बदल कर मेरी तलाश में हैं

मैं कतरा हूँ मेरा अलग वजूद तो है
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है

मैं देवता की तरह क़ैद अपने मंदिर में
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है

मैं जिसके हाथ में एक फूल दे के आया था
उसी के हाथ का पत्थर मेरी तलाश में है
[9:58AM, 4/29/2015] iqbalhindustani: मिल मिल के बिछड़ने का मज़ा क्यों नहीं देते?
हर बार कोई ज़ख़्म नया क्यों नहीं देते?

ये रात, ये तनहाई, ये सुनसान दरीचे
चुपके से मुझे आके सदा क्यों नहीं देते।

है जान से प्यारा मुझे ये दर्द-ए-मोहब्बत
कब मैंने कहा तुमसे दवा क्यों नहीं देते।

गर अपना समझते हो तो फिर दिल में जगह दो
हूँ ग़ैर तो महफ़िल से उठा क्यों नहीं देते।
[9:58AM, 4/29/2015] iqbalhindustani: Mere hm nafas mere hm nawa, mujhe dost bn k dga n de....!
Mai hoon drde ishq se jan-b-lab, mujhe zindagi ki duaa n de....!!
Mere daage, dil se roshni, isi roshni se h zindagi...!
Mujhe dr h ai mere charagar, ye chirag tu hi bujha n de....!!
Mera azm itna buland h, k paraye sholo ka dr nhi....!
Mujhe khauf aatishe-gul se h, ye kahin chaman ko jala n de....!!
Mujhe chod de mere hal pr, tera kya bharosa ai charagar....!
Ye teri nwazishe-mukhtsar, mera drd or badha n de.....!!
Wo uthe h leke khumo-subu, are o "shakeel" kahan h tu....!
Tera jaam lene ko bzm me koi or haath badha n de....!!
[9:24PM, 4/29/2015] iqbalhindustani: आस्था का जिस्म घायल रूह तक बेज़ार है
क्या करे कोई दुआ जब देवता बीमार है
भूख से बेहाल बच्चों को सुना कर चुटकुले
जो हंसा दे, आज का सबसे बड़ा फनकार है
खूबसूरत जिस्म हो या सौ टका ईमान हो
बेचने की ठान लो तो हर तरफ बाज़ार है
[10:40AM, 4/30/2015] iqbalhindustani: Khuvab me gul hampe barse is qadar, chain se kanto pe soye rat bhar.
Katkar jangal basaee bastiyan, bastiyon me a basa jangal ka dar.
Kya batayen ham unhain apna pata, chitthiyan milti nahin futpath par.
Mar gayi sanvedna is daur ki, dil pe ab hota nahin koi asar.
-S.makkad
[11:18AM, 5/26/2015] iqbalhindustani: छुपाए से कहीं छुपते हैं दाग़ चेहरे के,
नज़र है आईना-बरदार आओ सच बोलें

खुला है झूट का बाज़ार आओ सच बोलें
न हो बला से ख़रीदार आओ सच बोलें

सुकूत छाया है इंसानियत की क़द्रों पर
यही है मौक़ा-ए-इज़हार आओ सच बोलें
[4:10PM, 5/28/2015] iqbalhindustani: Na Paane Ki Khushi Hai Kuch
Na Khone Ka Hi Kuch Gam Hai

Ye Daulat Aur Shohrat Sirf
Kuch Zakhmo Ka Marham Hai

Ajab Si Kashmakash Hai
Roz Jeene,Roz Marne Me

Mukkammal Zindagi To Hai
Magar Poori Se Kuch Kam Hai.
[3:37PM, 6/4/2015] iqbalhindustani: ग़रीब बच्चों की ज़िद भी न कर सका पूरी

तमाम उम्र खिलौनों के भाव करता रहा

****

वो मेरे बच्चों का नंगे पैर फिरना शहर भर में

और मेरा महसूस ये करना कि सड़कें जल रहीं हैं

****

ये ख़्वाब था मेरे बच्चों के ख़्वाब पूरे हों

सो अपने आपको मैंने अधूरा छोड़ दिया
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: न कोई ख्वाब हमारे है, न ताबीरे है
हम तो पानी पे बनाई हुई तस्वीरे है

कोई अफवाह गला काट न डाले अपना
ये जुबाने है कि चलती हुई शमशीरे है

हो न हो यह कोई सच बोलने वाला है क़तील
जिसके हाथो में कलम, पाँव में जंजीरे है
                                    - क़तील शिफाई
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: कोई हसीन सा नुक्ता निकल देता है
अजीब शख्स है बातो में टाल देता है

हजार फासले होने के बावजूद हमें
बड़ा सुकून किसी का ख्याल देता है

जो मछलियों को सिखाता है तैरना निकहत
वही तो है, जो मछेरो को जाल देता है -
नसीम निकहत
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: मिट्टी में मिला दे के जुदा हो नहीं सकता
अब इससे ज़्यादा मैं तेरा हो नहीं सकता
दहलीज़ पे रख दी हैं किसी
शख़्स ने आँख़ें
रोशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता
बस तू मेरी आवाज़ से आवाज़ मिलादे
फिर देख के इस शहर में क्या हो नहीं सकता
ऎ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला
सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता
इस ख़ाक बदन को कभी पहुँचा दे वहाँ
भी
क्या इतना करम बादे सबा हो नहीं सकता
पेशानी को सजदे भी अता कर मेरे मौला
आँखों से तो ये क़र्ज़ अदा हो नहीं सकता
दरबार में जाना मरा दुश्वार बहुत है
जो शख़्स क़लन्दर हो गदा हो नहीं सकता।
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: है ग़लत गर गुमान में कुछ है
तुझ सिवा भी जहान में कुछ है
दिल भी तेरे ही ढंग सीखा
है
आन में कुछ है, आन में कुछ है
बेखबर तेग़-ए-यार कहती है
बाक़ी इस नीम जान में कुछ है
इन दिनों कुछ अजब है मेरा हाल
देखता कुछ हूँ ध्यान में कुछ है
और भी चाहिए सो कहिए अगर
दिल ए नामेहरबान में कुछ है
दर्द तू जो करे है जी का ज़ियाँ
फ़ायदा इस ज़ियान में कुछ ह
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: यहाँ हर शख्स हर पल , हादसा होने से डरता है
खिलौना है जो मिटटी का फ़ना होने से डरता है

मेरे दिल के किसी कोने में, एक मासूम सा बच्चा
बड़ो कि देख कर दुनिया, बड़ा होने से डरता है

अजब यह जिन्दगी कि कैद है, दुनिया का हर इंसा
रिहाई मांगता है और, रिहा होने से डरता है
                                                        -राजेश रेड्डी
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: बेटी बहन बीबी के रिश्ते के समाजिक पहलू  पर एक शायर का नज़रिया

आने वाले दिन मसाइल ले के आएंगे ‘बशीर’
घर के आंगन में कई चेह्रे जवां हो जाएंगे

एक शायरा ने इस दर्द का इज़हार यूं किया-

दहेज़ की बदौलत मियां-बीवी के माबैन तलाक़ तक बात पहुंची तो एक शेर ने जन्म ले ही लिया-

तलाक़ दे तो रहे हो ग़ुरूरो-क़ह्र के साथ! !
मेरा शबाब भी लौटा दो मेरे मेह्र के साथ! !

जाने माने शायर जनाब मुनव्वर राना ने रिश्तों को लेकर हमेशा अतभुत काव्य रचा है. उनकी ग़ज़लों में रिश्तों की महक का रंग कुछ ख़ास ही रहा है.

घरों में यूँ सयानी लड़कियाँ बेचैन रहती है
कि जैसे साहिलों पर कश्तियाँ बेचैन रहती हैं

ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती जुलती है
कहीं भी शाख़े-गुल देखे तो झूला डाल देती है

रो रहे थे सब तो मै भी फ़ूटकर रोने लगा
वरना मुझको बेटियों की रूख़सती अच्छी लगी
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: अगली कड़ी
घर में रहते हुए ग़ैरों की तरह होती हैं
बेटियाँ धान के पौधों की तरह होती हैं

उड़के एक रोज़ बड़ी दूर चली जाती हैं
घर की शाख़ों पे ये चिड़ियों की तरह होती हैं

सहमी-सहमी हुई रहती हैं मकाने दिल में
आरज़ूएँ भी ग़रीबों की तरह होती हैं

टूटकर ये भी बिखर जाती हैं एक लम्हे में
कुछ उम्मीदें भी घरौंदों की तरह होती हैं

बाप का रुत्बा भी कुछ कम नहीं होता लेकिन
जितनी माँएँ हैं फ़रिश्तों की तरह होती हैं

मुनव्वर राना
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: हर एक चेहरे को ज़ख़्मों का आईना न कहो
ये ज़िन्दगी तो है रहमत इसे सज़ा न कहो
न जाने कौन सी मजबुरियों का क़ैदी हो
वो साथ छोड़ गया है तो बेवफ़ा न कहो
तमाम शहर ने नेज़ों पे क्यूँ उछाला मुझे
ये इत्तेफ़ाक़ था तुम इस को हादसा न कहो
ये और बात के दुश्मन हुआ है आज मगर
वो मेरा दोस्त था कल तक उसे बुरा न कहो
हमारे ऐब हमें उन्गलियों पे गिन्वाओ
हमारी पीठ के पीछे हमें बुरा न कहो
मैं वक़ियात की ज़न्जीर का नहीं क़ायल
मुझे भी अपने गुनाहों का सिल्सिला न कहो
ये शहर वो है जहाँ राक्शस भी है "ड़हत"
हर एक तराशे हुये बुत को देवता न कह
[1:01PM, 6/6/2015] iqbalhindustani: कितनी पी कैसे कटी रात मुझे होश नहीं
रात के साथ गई बात मुझे होश नहीं
मुझ को ये भी नहीं मालूम कि जाना है कहाँ
थाम ले कोई मेरा हाथ मुझे होश नहीं
आँसुओं और शराबों में गुज़र है अब तो
मैं ने कब देखी थी बरसात मुझे होश नहीं
जाने क्या टूटा है पैमाना कि दिल है मेरा
बिखरे बिखरे हैं ख़यालात मुझे होश नही
[12:07PM, 6/8/2015] iqbalhindustani: मंजिले भी उसकी थीं रास्ता भी उसका था।
एक मैं अकेला था काफ़िला भी उसका था।
साथ साथ चलने की सोच भी उसकी थी, फिर रास्ता बदलने का फैसला भी उसका था।
आज क्यों अकेला हूँ, दिल सवाल करता है,
लोग तो उसके थे क्या खुदा भी उसका था।
[12:07PM, 6/8/2015] iqbalhindustani: जुगाड़

जुगाड़ इक नई तेहज़ीब की अलामत है
बिना जुगाड़ के जीना यहाँ क़यामत है
जुगाड़ है तो चमन का निज़ाम अपना है
जुगाड़ ही को हमेशा सलाम अपना है
जुगाड़ दिन का उजाला है रात रानी भी
जुगाड़ ही से हुकूमत है राजधानी भी
जुगाड़ ही से मोहब्बत के मेले ठेले हैं
बिना जुगाड़ के हम सब यहाँ अकेले हैं
जुगाड़ चाय की प्याली में जब समाती है
पहाड़ काट के ये रास्ते बनाती है

जुगाड़ बन्द लिफाफे की इक कशिश बन कर
किसी अफसर किसी लीडर को जब लुभाती है
नियम उसूल भी जो काम कर नहीं पाते
ये बैक डोर से वो काम भी कराती है
जुगाड़ ही ने तो रिश्वत पे दिल उछाला है
जुगाड़ ही से कमीशन का बोल बाला है
जुगाड़ एक ज़ुरूरत है आदमी के लिये
जुगाड़ रीढ़ की हड्‍डी है ज़िन्दगी के लिये
मैं दूसरों की नहीं अपनी तुम्हें सुनाता हूँ
जुगाड़ ही की बदौलत यहाँ पे आया हूँ

जुगाड़ क्या है जो पूछोगे हुक्मरानों से
यही कहेंगे वो अपनी दबी जबानों से
जुगाड़ से हमें दिल जान से मोहब्बत है
जुगाड़ ही की बदौलत मियां हकूमत है
जहाँ जुगाड़ ने अपना मिजाज़ बदला है
नसीब कौम का फूटा समाज बदला है
जुगाड़ ही ने बिछाए हैं ढेर लाशों के
जुगाड़ ही ने तो छीने हैं लाल माओं के
हमें जुगाड़ से जुल्मों सितम मिटाना है
खुलूस प्यार मोहब्बत के गुल खिलाना है

करो जुगाड़ खुलुसो वफ़ा के दीप जलें
करो जुगाड़ कि फिर अमन की हवाएँ चलें
करो जुगाड़ के सिर से कोई चादर न हटे
करो जुगाड़ के औरत की आबरू न लुटे
करो जुगाड़ के हाथों को रोज़गार मिले
मेहक उठे ये चमन इक नई बहार मिले
करो जुगाड़ नया आसमाँ बनाएँ हम
कबूतर अमन के फिर से यहाँ उड़ाएँ हम
तो आओ मिले इसी को सलाम करते है
जुगाड़ की यही तेहज़ीब आम करते हैं।
[12:07PM, 6/8/2015] iqbalhindustani: मसखरा मशहूर है, आँसू छिपाने के लिए
बाँटता है वो हँसी, सारे ज़माने के लिए
ज़ख्म सबको मत दिखाओ, लोग छिड़केंगे नमक
आएगा कोई नहीं मरहम लगाने के लिए
देखकर तेरी तरक्की, खुश नहीं होगा कोई
लोग मौका ढूँढ़ते हैं काट खाने के लिए
फलसफा कोई नहीं है और न मकसद कोई
लोग कुछ आते जहाँ में, हिनहिनाने के लिए
मिल रहा था भीख में सिक्का मुझे सम्मान का
मैं नहीं तैयार था झुककर उठाने के लिए
ज़िन्दगी में गम बहुत हैं, हर कदम पर हादसे
रोज़ कुछ टाइम निकालो मुस्कराने के लिए
[11:21AM, 6/9/2015] iqbalhindustani: ज़मीन पे चल न सका आसमान से भी गया
कटा के पर ये परिंदा उडान से भी गया

तबाह कर गयी पक्के मकान की ख्वाहिश
मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया

परायी आग में कूदा तो क्या मिला तुझ को
उसे बचा न सका अपनी जान से भी गया

किसी के हाथ का निकला हुआ वह तीर हूँ मैं
हद्फ़ को छू न सका और कमान से भी गया
[11:21AM, 6/9/2015] iqbalhindustani: महफ़िल की खवातन
महिला शक्ति की नज़र

अनन्त कौर

तिरे ख़्याल के साँचे में ढलने वाली नहीं
मैं ख़ुशबुओं की तरह अब बिखरने वाली नहीं

तू मुझको मोम समझता है पर ये ध्यान रहे
मैं एक शमा हूँ लेकिन पिघलने वाली नहीं

तिरे लिये मैं ज़माने से लड़ तो सकती हूँ
तिरी तलाश में घर से निकलने वाली नहीं

मैं अपने वास्ते भी ज़िंदा रहना चाहती हूँ
सती हूँ पर मैं तेरे साथ जलने वाली नहीं

हरेक ग़म को मैं हँस कर ग़ुज़ार देती हूँ अब
कि ज़िंदगी की सज़ाओं से डरने वाली नहीं
[11:09AM, 6/12/2015] iqbalhindustani: बारिश
बारिश को छुआ है मैंने
छुआ है उसके अहसास को

हथेली पर गिरती हुई
बूंदो की कंपन को
महसूस किया है मैंने
ठीक उसी तरह.....
जब छू लेते हो तुम मुझे
और एक सिहरन सी
दौड़ जाती है मुझमे !

हथेली पर गिरते ही
बूंदो को अस्त व्यस्त
फैलते गिरते अपना वजूद
खोते देखा है मैंने
ठीक उसी तरह.....
जिस तरह बिखर बिखर सी
जाती हूँ मै तुममे
अपना वजूद खोते हुए
ठीक बूंदो की तरह.....!
  सुमीता प्रवीण केशवा
[11:09AM, 6/12/2015] iqbalhindustani: ज़मीन पे चल न सका आसमान से भी गया
कटा के पर ये परिंदा उडान से भी गया

तबाह कर गयी पक्के मकान की ख्वाहिश
मैं अपने गाँव के कच्चे मकान से भी गया

परायी आग में कूदा तो क्या मिला तुझ को
उसे बचा न सका अपनी जान से भी गया

भुलाना चाहा तो भुलाने की इंतहा कर दी
वह शख्स अब मेरे वहम ओ गुमान से भी गया

किसी के हाथ का निकला हुआ वह तीर हूँ मैं
हद्फ़ को छू न सका और कमान से भी गया
[10:03AM, 6/15/2015] iqbalhindustani: जिधर जाते हैं सब जाना उधर अच्छा नहीं लगता
मुझे पामाल* रस्तों का सफ़र अच्छा नहीं लगता

ग़लत बातों को ख़ामोशी से सुनना, हामी भर लेना
बहुत हैं फ़ायदे इसमें मगर अच्छा नहीं लगता

मुझे दुश्मन से भी ख़ुद्दारी की उम्मीद रहती है
किसी का भी हो सर, क़दमों में सर अच्छा नहीं लगता
जावेद अख्तर
[10:03AM, 6/15/2015] iqbalhindustani: पैसा तो ख़ुशामद में, मेरे यार बहुत है
पर क्या करूँ ये दिल मिरा खुद्दार बहुत है

इस खेल में हाँ की भी ज़रूरत नहीं होती
लहजे में लचक हो तो फिर इंकार बहुत है

बेताज हुकूमत का मज़ा और है वरना
मसनद** के लिए लोगों का इसरार बहुत है
[10:03AM, 6/15/2015] iqbalhindustani: यार से ऐसी यारी रख
                दुःख में भागीदारी रख,
चाहे लोग कहे कुछ भी
                 तू तो जिम्मेदारी रख,
वक्त पड़े काम आने का
                 पहले अपनी बारी रख,
मुसीबते तो आएगी
                 पूरी अब तैयारी रख,
कामयाबी मिले ना मिले
                जंग हौंसलों की जारी रख,
बोझ लगेंगे सब हल्के
                मन को मत भारी रख,
मन जीता तो जग जीता
               कायम अपनी खुद्दारी रख......
सुप्रभात
[10:03AM, 6/15/2015] iqbalhindustani: तू जब राह से भटकेगा, मैं बोलूंगा
मुझको कुछ भी खटकेगा, मैं बोलूंगा
सच का लहजा थोड़ा टेढ़ा होता है,
तू कहने में अटकेगा, मैं बोलूंगा
अवसरवादी साथी-सा व्यवहार न कर,
हाथ अगर तू झटकेगा, मैं बोलूंगा
विश्वासों का शीशा नाज़ुक होता है,
ये शीशा जब चटकेगा, मैं बोलूंगा
मीठे-मीठे वादों के सब बाग़ दिखा,
वादों से जब भटकेगा, मैं बोलूंगा
[12:12PM, 6/16/2015] iqbalhindustani: रोज़ बढती जा रही इन खाइयों का क्या करें
भीड़ में उगती हुई तन्हाइयों का क्या करें

हुक्मरानी हर तरफ बौनों की, उनका ही हजूम
हम ये अपने कद की इन ऊचाइयों का क्या करें

नाज़ तैराकी पे अपनी कम न था हमको मगर
नरगिसी आँखों की उन गहराइयों का क्या करें :: अखिलेश तिवारी
[10:03AM, 6/18/2015] iqbalhindustani: वाली आसी:

लोग प्यास अपनी बुझाते हैं चले जाते हैं
और दरिया है कि चुपचाप रवाँ रहता है

देर तक रहे रहे दाता तेरी ऊँची सराय
सब मुसाफ़िर हैं यहाँ कोई नहीं रह जाएगा.

मुज़फ़्फ़र हनफ़ी:

अब कह दिया तो साथ निभाएंगे उम्र भर
हालाँकि दोस्ती का ज़माना तो है नहीं
[10:03AM, 6/18/2015] iqbalhindustani: मरहूम साग़र खय्यामी का लिखा "आम का सेहरा"

जो आम मैं है वो लब ए शीरीं मैं नहीं रस,
रेशों मैं हैं जो शेख की दाढ़ी से मुक़द्दस,
आते हैं नज़र आम, तो जाते हैं बदन कस,
लंगड़े भी चले जाते हैं, खाने को बनारस,
होटों मैं हसीनों के जो, अमरस का मज़ा है,
ये फल किसी आशिक की, मोहब्बत का सिला है
आमद से दसहरी की है, मंडी में दस्हेरा,
हर आम नज़र आता है, माशूक़ का चेहरा,
एक रंग में हल्का है, तो एक रंग में गहरा,
कह डाला क़सीदे के एवज़, आम का सेहरा,
खालिक को है मक़सूद, के मख्लूक़ मज़ा ले,
वो चीज़ बना दी है के बुड्ढा भी चबा ले,
फल कोई ज़माने में नहीं, आम से बेहतर,
करता है सना आम की, ग़ालिब सा सुखनवर,
इकबाल का एक शेर, कसीदे के बराबर,
छिलकों पा भिनक लेते हैं , साग़र से फटीचर,
वो लोग जो आमों का मज़ा, पाए हुए हैं,
बौर आने से पहले ही, वो बौराए हुए हैं,
नफरत है जिसे आम से वो शख्स है बीमार,
लेते है शकर आम से अक्सर लब ओ रुखसार,
आमों की बनावट में है, मुज़मर तेरा दीदार,
बाजू वो दसहरी से, वो केरी से लब ए यार,
हैं जाम ओ सुबू खुम कहाँ आँखों से मुशाबे,
आँखें तो हैं बस आम की फांकों से मुशाबे,
क्या बात है आमों की हों देसी या विदेसी,
सुर्खे हों सरौली हों की तुख्मी हों की कलमी,
चौसे हों सफैदे हों की खजरी हों की फ़ज़ली,
एक तरफ़ा क़यामत है मगर आम दसहरी !
फिरदौस में गंदुम के एवज़ आम जो खाते,
आदम कभी जन्नत से निकाले नहीं जाते
[10:03AM, 6/18/2015] iqbalhindustani: सब्र को दरिया कर देते हैं,
आंसू रुस्वा कर देते हैं
ज़ख्म पे मरहम रखने वाले,
ज़ख्म को गहरा कर देते हैं
हम जिस जंगल से भी गुज़रें,
उसको रस्ता कर देते हैं
रोटी महंगी करने वाले,
ज़हर को सस्ता कर देते हैं।'
डॉ नवाज़ देवबंदी
[10:03AM, 6/18/2015] iqbalhindustani: कभी ऐसा नहीं लगता कभी वैसा नहीं लगता
ग़रज़ के कोई भी पूरी तरह पूरा नहीं लगता

किसी के लब पे गाली है न ग़ुस्सा है निगाहों में
ये कैसा शह्र है इसमें कोई अपना नहीं लगता

न रोशनदान चिड़ियों के, न कमरा है किताबों का
इमारतसाज़ ये नक़्शा मिरे घर का नहीं लगता

-निदा फ़ाज़ली
[10:59AM, 6/18/2015] iqbalhindustani: खुशी का चाँद यहां कम जवान होता है।हमेशा फिक्र जदा आसमान होता है।।
खडा हूँ इस तरह खामोश इस तरह तनहा।कि जैसे शहर का अंतिम मकान होता है।।
तुम्हारे वास्ते बारिश की बात सही।
हमारी छत के लिए इम्तहान होता है।।
लपेटिये, इसे रखिये या काटते रहिये।
गरीब आदमी कपडे का थान होता है।।
[10:59AM, 6/18/2015] iqbalhindustani: अब फर्श हैं हमारे , छतें दूसरों की हैं
ऐसा अज़ाब पहले कहाँ था घरों के साथ

कैसा लिहाज़ -पास , कहाँ की मुरव्वतें
जीना बहुत कठिन है , अब इन आदतों के साथ

बिस्तर हैं पास-पास मगर क़ुर्बतें(२) नहीं
हम घर में रह रहे हैं ,अजब फ़ासलों के साथ

मैयत(३)को अब उठाके ठिकाने लगाइये
मौक़े के सब गवाह हुए क़ातिलों के साथ

शब्दार्थ
१–तट
२- निकटता

मेरे सब पसंदीदा लेखक
परसाई जी की एक कविता

क्या किया आज तक क्या पाया?
मैं सोच रहा, सिर पर अपार
दिन, मास, वर्ष का धरे भार
पल, प्रतिपल का अंबार लगा
आखिर पाया तो क्या पाया?
जब तान छिड़ी, मैं बोल उठा
जब थाप पड़ी, पग डोल उठा
औरों के स्वर में स्वर भर कर
अब तक गाया तो क्या गाया?
सब लुटा विश्व को रंक हुआ
रीता तब मेरा अंक हुआ
दाता से फिर याचक बनकर
कण-कण पाया तो क्या पाया?
जिस ओर उठी अंगुली जग की
उस ओर मुड़ी गति भी पग की
जग के अंचल से बंधा हुआ
खिंचता आया तो क्या आया?
जो वर्तमान ने उगल दिया
उसको भविष्य ने निगल लिया
है ज्ञान, सत्य ही श्रेष्ठ किंतु
जूठन खाया तो क्या खाया?
हरी शंकर परसाई

मैं ही सबब था अबके भी अपनी शिकस्त का
इल्ज़ाम अबकी बार भी क़िस्मत के सर गया
अर्से से दिल ने की नहीं सच बोलने की ज़िद
हैरान हूँ मैं कैसे ये बच्चा सुधर गया
उनसे सुहानी शाम का चर्चा न कीजिए
जिनके सरों पे धूप का मौसम ठहर गया
जीने की कोशिशों के नतीज़े में बारहा
महसूस ये हुआ कि मैं कुछ और मर गया
राजेश रेडडी

'सर्वत जमाल साहब' की एक ग़ज़ल आप सबके लिए

हमारा सब्र तोला जा रहा है
मुसल्सल झूठ बोला जा रहा है।

अभी कब्जा नहीं है उसके तन पर
अभी तो मन टटोला जा रहा है।

यकीनन हो चुकी है डील पक्की
बड़े साहब का झोला जा रहा है।

मुझे पैसा मिला तो लोग बदले
ज़ुबां में शहद घोला जा रहा है।

सुना है शांति है सरहद पे, तो फिर

घर जलेंगे उनसे इक दिन तीलियों को क्या पता
है नज़र उन पर किसी की बस्तियों को क्या पता

ढूँढ़ती हैं आज भी पहली सी रंगत फूल में
ज़हर कितना है हवा में तितलियों को क्या पता

हाल क्या है ? ठीक है, जब भी मिले इतना हुआ
किसके अन्दर दर्द क्या है, साथियों को क्या पता

धूप ने, जल ने, हवा ने किस तरह पाला इन्हें
इन दरख्तों की कहानी आँधियों को क्या पता

जाएगा उनके सहारे ही शिखर तक आदमी
फिर गिरा देगा उन्हें ही सीढ़ियों को क्या पता

हसीं भी है मोहब्बत की अदाकारी भी रखता है।
मगर उससे कोई पूछे वफ़ादारी भी रखता है ।

इलाजे-जख़्मे-दिल की वो तलबगारी भी रखता है,
नये जख़्मों की लेकिन पूरी तैयारी भी रखता है।

इक ऐसा शख्स मेरी ज़िन्दगी में हो गया दाख़िल,
जो मुझको चाहता है मुझसे बेज़ारी भी रखता है।

वो मत्था टेकता है गिड़गिड़ाता है कि कुछ दे दो,
फ़िर उसके बाद ये दावा कि खुद्दारी भी रखता है।

वही है आजकल का बागबाँ जो हाथ में अपने,
दरख़्तों की कटाई के लिये आरी भी रखता है।

ख़ुदा के नाम पर भी तुम उसे बहका नहीं सकते,
वो दीवाना सही लेकिन समझदारी भी रखता है।

तुम उसके नर्म लहजे पर न जाओ ऐ जहाँ वालों,
वो है ’मेयार’ जो लफ़्जों में चिनगारी भी रखता है।

कोई सूरत निकालिये साहिब
ख़ुद को दुनिया में ढालिये साहिब

अस्ल चेहरा छिपा रहे जिसमें
इक नक़ाब ऐसा डालिये साहिब

'वाह' कह कर निभाइए  सबसे
यूँ न कमियाँ निकालिये साहिब

ख़्वाब कोई तो फल ही जाएगा
ख़्वाहिशें ख़ूब पालिए साहिब

मैकदे में भी आपसी झगड़े
छोड़िये, ख़ाक डालिये साहिब

ये ज़बां कौन अब समझता है
आँसुओं को सँभालिए साहिब

जो हक़ीक़त बयां न कर पाए
वो क़लम तोड़ डालिये साहिब

वो तो टुल्लू की मदद से आस्माँ धोते रहे।
और जमीं की प्यास को पानी के लाले पड़ गये।

जाने क्या जादू किया उस मजहबी तकरीर ने,
सुनने वाले लोगों के जहनों पे ताले पड़ गये।

भूख से मतलब नहीं उनको मगर ये फिक्र है,
कब कहाँ किस पेट में कितने निवाले पड़ गये।

जब हमारे कहकहों की गूँज सुनते होंगे गम।
सोचते होंगे कि हम भी किसके पाले पड़ गए।

मोहब्बत कम नहीं होती

हम अक्सर ये समझते हैं
जिसे हम प्यार करते हैं
उसे हम छोड़ सकते हैं
मगर ऐसा नहीं होता
मोहब्बत दयामी सच है
मोहब्बत ठहर जाती है
हमारी बात के अन्दर
हमारी जात के अन्दर
मगर ये कम नहीं होती
किसी भी दुःख की सूरत में
कभी कोई जरूरत में
कभी अनजान से गम में
हमारी आँख के अन्दर
कभी आबे-रवां बनकर
कभी कतरे की सूरत में
मोहब्बत ठहर जाती है

ये हरगिज़ कम नहीं होती

इक रात में सौ बार जला और बुझा हूँ
मुफ़लिस का दिया हूँ मगर आँधी से लड़ा हूँ

कंदील समझ कर कोई सर काट न ले जाए
ताजिर हूँ उजाले का अँधेरे में खड़ा हूँ

सब एक नज़र फेंक के बढ़ जाते हैं आगे
मैं वक़्त के शोकेस में चुपचाप खड़ा हूँ

वो आईना हूँ जो कभी कमरे में सजा था
अब गिर के जो टूटा हूँ तो रस्ते में पड़ा हूँ

दुनिया का कोई हादसा ख़ाली नहीं मुझसे
मैं ख़ाक हूँ, मैं आग हूँ, पानी हूँ, हवा हूँ

मिल जाऊँगा दरिया में तो हो जाऊँगा दरिया
सिर्फ़ इसलिए क़तरा हूँ ,मैं दरिया से जुदा हूँ

हर दौर ने बख़्शी मुझे मेराजे मौहब्बत
नेज़े पे चढ़ा हूँ कभी सूली पे चढ़ा हूँ

दुनिया से निराली है 'नज़ीर' अपनी कहानी
अंगारों से बच निकला हूँ फूलों से जला हूँ

हर एक बात पे कहते हो तुम की तू क्या है,
तुम्ही कहो की ये अंदाज-ए-गुफ्तगुं क्या है!
जला है जिस्म जहाँ , दिल भी जल गया होगा ,
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजूं क्या है!
रंगों में दोड़ने फिरने के, हम नहीं कायल ,
जब आँख ही से ना टपका तो लहू क्या है !
वो चीज़ जिसके लिए हो हमको हो बहिश्त ( स्वर्ग) अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुल्फामें(सुन्दर) मुश्कबू (कस्तूरी या सुगंध ) क्या है !!

बच्चों की गुल्लकों की खनक भी समेट ली
हम मुफलिसों का हाथ बुहारी की तरह है
बुहारी: झाडू
हमको नचा रहा है इशारों पे हर घड़ी
शायद हमारा पेट मदारी की तरह है
ये रात और दिन तो सरोते की तरह हैं
अपना वजूद सिर्फ सुपारी की तरह है

कुँअर बेचैन
[5:06PM, 7/2/2015] iqbalhindustani: इस खौफ़ से उठने नहीं देता वो कोई सर
हम ख्वाइशें अपनी कहीं मीनार न कर दें

मुश्किल से बचाई है जो एहसास की दुनिया
इस दौर के रिश्ते उसे बाज़ार न कर दें

ये सोच के नज़रें वो मिलाता ही नहीं है
आँखें कहीं ज़ज्बात का इज़हार न कर दें
[5:06PM, 7/2/2015] iqbalhindustani: खुली कपास को शोलों के पास मत रखना।
कोई बचायेगा तुमको।यह आस मत रखना।
अगर है डर तो  अंगारे समेट लो अपने।
हवा को बांधने का इलतमास मत रखना।
छिलेगा हाथ तुम्हारा जरा सी गफलत पर।
कि घर में काच का टूटा गिलास मत रखना।
[4:54PM, 7/4/2015] iqbalhindustani: आ कहीं मिलते हैं हम,कि बहारें आ जाएं,
इससे पहले कि ताल्लुक में दरारें आ जाएं;

ये जो ख़ुद्दारी का मैला-सा अंगौछा है मेरा,
मैं अगर बेंच दूं तो इससे कई कारें आ जाएं;

दुश्मनी हो तो फिर ऐसी कि कोई एक ही रहे,
या ताल्लुक हो तो ऐसा कि पुकारें आ जाएं;

ये भी मुमकिन है कि इन ही में कही हम लेटे हों,
तुम ठहर जाना रस्ते में अगर मज़ारें आ जाए!!!
ठहरी ठहरी तबियत में रवानी आई,
आज फिर याद मोहब्बत की कहानी आई।

आज फिर नीँद को आँखो से बिछड़ते देखा,
आज फिर याद कोई चोट पुरानी आई।

मुद्दतों बाद चला है मेरा जादू उन पर,
मुद्दतों बाद हमे बात बनानी आई।

मुद्दतों बाद पशेमां हुआ दरिया हमसे,
मुद्दतों बाद हमें प्यास छुपानी आई।

मुद्दतों बाद मय्यसर हुआ माँ का आँचल,
मुद्दतों बाद हमे नीँद सुहानी आई।

इतनी आसानी से मिलती नही फ़न की दौलत,
ढल गयी उम्र तो गज़लो पे जवानी आई।

-इक़बाल अशहर
[12:59PM, 7/23/2015] iqbalhindustani: जब तेरी धुन में जिया करते थे!
हम भी चुप चाप फिरा करते थे!!

आँख में प्यास हुवा करती थी!
दिल में तूफ़ान उठा करते थे!!

लोग आते थे ग़ज़ल सुनने को!
हम तेरी बात किया करते थे!!

सच समझते थे तेरे वादों को!
रात दिन घर में रहा करते थे!!

किसी वीराने में तुझसे मिलकर!
दिल में क्या फूल खिला करते थे!!

घर की दीवार सजाने के लिए!
हम तेरा नाम लिखा करते थे!!

वोह भी क्या दिन थे भुला कर! तुझको!
हम तुझे याद किया करते थे!!

जब तेरे दर्द में दिल दुखता था!
हम तेरे हक में दुआ करते थे!!

बुझने लगता जो चेहरा तेरा!
दाग सीने में जला करते थे!!

अपने जज्बों की कमंदों से तुझे!
हम भी तस्खीर किया करते थे!!

अपने आंसू भी सितारों की तरह!
तेरे होंटों पे सजा करते थे!!

छेड़ता था गम-ए-दुनिया जब भी!
हम तेरे गम से गिला करते थे!!

कल तुझे देख के याद आया है!
हम सुख्नूर भी हुआ करते थे!!

⭐⭐⭐मोहसिन नक़वी⭐⭐⭐
[12:59PM, 7/23/2015] iqbalhindustani: मोहब्बत क्या है?

मुहब्बत ऐसा नगमा है
ज़रा भी झोल हो लय में
तो सुर कायम नहीं होता

मुहब्बत ऐसा शोला है
हवा जैसी भी चलती हो
कभी मद्धम नहीं होता

मुहब्बत ऐसा रिश्ता है
के जिसमे बंधने वालों के
दिलों में गम नहीं होता

मुहब्बत ऐसा पौधा है
जो तब भी सब्ज़ रहता है
के जब मौसम नहीं होता

मुहब्बत ऐसा रास्ता  है
अगर पैरों में लर्जिश हो
तो ये महरम नहीं होता

मुहब्बत ऐसा दरिया है
के बारिश रूठ भी जाये
तो पानी कम नहीं होता
अमजद इस्लाम अमजद
[1:01PM, 7/23/2015] iqbalhindustani: साया बनकर साथ चलेंगे इसके भरोसे मत रहना

अपने हमेशा अपने रहेंगे इसके भरोसे मत रहना

बहती नदी में कच्चे घड़े हैं रिश्ते, नाते, हुस्न, वफ़ा

दूर तलक ये बहते रहेंगे इसके भरोसे मत रहना

सूरज की मानिंद सफ़र पे रोज़ निकलना पड़ता है

बैठे-बैठे दिन बदलेंगे इसके भरोसे मत रहना

हस्ती जी

FIR

एफआईआर में क्या क्या होता है ?

अभियुक्त का नाम और पता हो
अपराध होने का दिन,स्थान तथा समय हो
अपराध करने का तरीका तथा उसके पीछे नीयत आदि हो
साक्षी का परिचय हो
अपराध से सम्बद्ध सभी विशेषताएं हों
परिवाद क्या है?

किन्ही व्यक्ति या व्यक्तियों (जानकार या अनजान) के विरुद्ध मौखिक या लिखित रुप में मजिस्ट्रेट को किया गया आरोप है ताकि मजिस्ट्रेट उनके विरुद्ध  विधिक कार्यवाही कर सकें।
जब पुलिस अधिकारी एफआईआर के आधार पर कार्यवाही नहीं करता है, तब व्यथित व्यक्ति उस मजिस्ट्रेट को परिवाद कर सकता है , जिसे उस अपराध पर संज्ञान लेने की अधिकारिता है ।
परिवाद के विषय वस्तु

कथित अपराध का विवरण हो
अभियुक्त तथा परिवादी का नाम तथा पता हो
साक्षियों के नाम तथा पते हों
आत्मरक्षा का अधिकार क्या है ?

हर व्यक्ति को आईपीसी की धारा 96 से लेकर धारा 106 द्वारा दिए गए अधिकार हैं कि वह अपने अथवा अन्य व्यक्ति के शरीर या संपत्ति की अन्य व्यक्ति अथवा व्यक्ति समूह के हमले से रक्षा करे।
गिरफ्तारी के कानून

पुलिस किसी भी व्यक्ति पर अपराध का आरोप होने पर ही उसे गिरफ्तार कर सकती है । केवल शिकायत अथवा शक के आधार पर किसी को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है ।

वारंट क्या है ?

वारंट न्यायालय द्वारा जारी किया गया तथा न्यायालय के पीठासीन अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित एक लिखित आदेश है।
हर वारंट तब तक प्रवर्तन में रहेगा जब तक वह उसे जारी करने वाले न्यायालय द्वारा रद्द नहीं कर दिया जाता या जब तक वह निष्पादित नहीं कर दिया जाता है ।
जमानती वारंट क्या है?

जमानती वारंट न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए जारी किया गया वारंट है, जिसमें यह पृष्ठांकित है कि जमानत की शर्तें पूरी करने के बाद उसे जमानत दी जा सकती है । इस मामले में पुलिस जमानत देने की हकदार है , अगर गिरफ्तार व्यक्ति शर्तें पूरी करे।
गैरजमानती वारंट क्या है ?

गैरजमानती वारंट किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए न्यायालय द्वारा जारी वारंट है । इस मामले में पुलिस अधिकारी जमानत देने के लिए प्राधिकृत नहीं है । जमानत प्राप्त करने के लिए गिरफ्तार व्यक्ति को सम्बद्ध न्यायालय में आवेदन करना होगा।
बिना वारंट के गिरफ्तारी

अभियुक्त पर संज्ञेय अभियोग हो या उसके खिलाफ ठोस शिकायत की गयी या ठोस जानकारी मिली हो या अपराध में उसके शामिल होने का ठोस शक हो,
अभियुक्त के पास सेंध लगाने का कोई औजार पकड़ा जाए और वह ऐसे औजार के अपने पास होने का समुचित कारण नहीं बता सके,
अभियुक्त के पास ऐसा सामान हो जिसे चोरी का समझा जाने के कारण हो अथवा जिस व्यक्ति पर चोरी करने या चोरी के माल खरीद-फरोख्त करने का शक करना वाजिब लगे।
अभियुक्त घोषित अपराधी हो ,
अभियुक्त किसी पुलिस अधिकारी के कर्तव्य पालन में बाधा पहुंचाए,
अभियुक्त पुलिस/कानूनी हिरासत से फरार हो जाए,
अभियुक्त के खिलाफ पक्का संदेह हो कि वह सेना का भगोड़ा है,
अभियुक्त छोड़ा गया अपराधी हो, लेकिन उसने फिर कानून तोड़ा हो,
अभियुक्त संदेहास्पद चाल-चलन का हो या आदतन अपराध करने वाला हो,
अभियुक्त पर असंज्ञेय अभियोग हो और वह अपना नाम-पता नहीं बता रहा हो।
 

गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट का वारंट

व्यक्ति को किसी भी मामले में गिरफ्तार करने के दौरान उसका अपराध तथा गिरफ्तारी का आधार बताया जाना चाहिए।
उसे यह भी बताया जाना चाहिए कि उस अभियोग पर उसे जमानत पर छोड़ा जा सकता है या नहीं ।
गिरफ्तारी के समय व्यक्ति पुलिस से वकील की मदद लेने की इजाजत मांग सकता है । उसके मित्र, संबंधी भी उसके साथ थाने तक जा सकते हैं ।
अगर व्यक्ति गिरफ्तारी का प्रतिरोध नहीं कर रहा हो तो गिरफ्तारी के समय पुलिस उससे दुर्व्यवहार नहीं कर सकती है, ना ही मारपीट कर सकती है ।
अगर वह पुराना अपराधी नहीं है या उसके हथकड़ी नहीं लगाने पर भाग जाने का खतरा नहीं है , तो गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति को हथकड़ी नहीं पहनाई जा सकती है ।
अगर किसी महिला को गिरफ्तार किया जाना है , तो पुलिस का सिपाही उसे छू तक नहीं सकता है ।
गिरफ्तारी के तुरंत बाद व्यक्ति को थाने के प्रभारी अथवा मजिस्ट्रेट के पास लाया जाना चाहिए।
किसी भी स्थिति में , गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए।( इसमें गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के पास लाए जाने का समय शामिल नहीं है)
किसी भी व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना, 24 घंटे से ज्यादा समय तक पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता है।
गिरफ्तार व्यक्ति डॉक्टर द्वारा अपने शरीर की चिकित्सा परीक्षण की मांग कर सकता है ।
पुलिस हिरासत

अगर कोई पुलिसकर्मी हिरासत में किसी व्यक्ति को सताता है या यातना देता है तो उस व्यक्ति को पुलिसकर्मी की पहचान कर उसके खिलाफ आपराधिक आरोप दर्ज करने चाहिए
अगर हिरासत मे महिला के साथ बलात्कार तथा यौन संबंधी अन्य दुर्व्यवहार होता है तो उसे तुरंत डॉक्टरी जांच की मांग करनी चाहिए तथा मजिस्ट्रेट से शिकायत करनी चाहिए।
किसी महिला को केवल महिलाओं वाले लॉक अप में रखा जाना चाहिए।
अगर किसी थाने में ऐसी व्यवस्था नहीं है तो हिरासत में ली गयी महिला को मांग करनी चाहिए कि उसे ऐसे थाने में भेजा जाए जहां महिलाओं के लिए लॉक अप हो।
उच्चतम न्यायालय के निर्देश

गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी गिरफ्तारी औऱ हिरासत में लिए जाने की सूचना अपने मित्र, संबंधी या किसी अन्य व्यक्ति को देने का अधिकार है ।
गिरफ्तार करने वाले अधिकारी को किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर थाने ले जाते समय उसे सूचना देने के अधिकार की अवश्य जानकारी देनी चाहिए
जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति ने अपनी गिरफ्तारी की जानकारी दी है , उसका नाम पुलिस डायरी में दर्ज किया जाना चाहिए।
जमानत का अधिकार

जमानत क्या है?

जमानत गिरफ्तार व्यक्ति को कुछ शर्तों पर पुलिस या न्यायिक अभिरक्षा से मुक्त करने की अनुमति है ।

अगर अपराध गैर-जमानती नहीं है तो पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को जमानत पर छोड़ना ही होगा। 
अगर पुलिस अधिकारी या मजिस्ट्रेट पर्याप्त समझे तो व्यक्ति को निजी मुचलके या बंध-पत्र पर भी छोड़ा जा सकता है ।
जमानत और मुचलके पर रिहा व्यक्ति को जब भी अफसर या अदालत तलब करे, हाजिर होना होगा।
प्रतिभु (जमानतदार) क्या होते हैं?

प्रतिभु वे व्यक्ति होते हैं जो मुक्त किए गए व्यक्ति की आवश्यकतानुसार थाने या न्यायालय में उपस्थित प्रत्याभूत करते हैं । अगर मुक्त किया गया व्यक्ति पुलिस थाने या न्यायालय में उपस्थित नहीं होता है तो उसे वह रकम अदा करने के लिए समर्थ होना चाहिए, जिसके लिए वह प्रतिभु है।

पुलिस की जांच

अपराध की जांच के दौरान पुलिस आपसे पूछताछ करे तो आपको अपनी जानकारी की बातें सही-सही बताते हुए पुलिस के साथ सहयोग करना चाहिए।
संभव हो तो आपको अपराध का सुराग भी पुलिस को देना चाहिए और जुबानी पूछताछ का उचित जवाब देना चाहिए।
आपके लिए न तो किसी लिखित बयान पर दस्तखत करना जरुरी है, न ही आपको वे सब बातें लिखकर देनी होती हैं जो आपने जुबानी बताई हैं ।
पुलिस पूछताछ

अभियुक्त को पूछताछ के दौरान पुलिस से सहयोग करना चाहिए।
अभियुक्त को सावधान भी रहना चाहिए कि पुलिस उसे झूठे मामले में न फंसाए।
अभियुक्त को किसी कागज पर बिना पढ़े अथवा उसमें लिखी बातों से सहमत हुए बिना हस्ताक्षर नहीं करने चाहिए।
किसी महिला और 15 साल से छोटे पुरुष को पूछताछ के लिए घर से बाहर नहीं ले जाया जा सकता है । उनसे घर पर ही पूछताछ की जा सकती है ।
व्यक्ति मजिस्ट्रेट से अनुरोध कर सकता है कि उससे पूछताछ का उचित वक्त दिया जाए।
पूछताछ के दौरान व्यक्ति ऐसे किसी सवाल का जवाब देने से मना कर सकता है , जिससे उसे लगे कि उसके खिलाफ आपराधिक मामला बनाया जा सकता है ।
व्यक्ति पूछताछ के दौरान कानूनी या अपने किसी मित्र की सहायता की मांग कर सकता है और आम तौर पर ऐसी सहायता की मांग पुलिस मान लेती है।
तलाशी के लिए वारंट

अदालत या मजिस्ट्रेट के तलाशी वारंट के बिना पुलिस किसी के घर की तलाशी नहीं ले सकती है ।
आमतौर पर चोरी के सामान, फर्जी दस्तावेज, जाली मुहर, जाली करेंसी नोट, अश्लील सामग्री तथा जब्तशुदा साहित्य की बरामदगी के लिए तलाशी ली जाती है ।
पुलिस अधिकारी को तलाशी के स्थान पर मौजूद संदिग्ध व्यक्तियों और वस्तुओं की तलाशी लेने देनी चाहिए।
तलाशी और माल की बरामदगी इलाके के दो निष्पक्ष तथा प्रतिष्ठित व्यक्तियों की उपस्थिति में की जानी चाहिए।
पुलिस को जब्त सामान की ब्योरा देते हुए पंचनामा तैयार करना चाहिए। इस पर दो स्वतंत्र गवाहों के भी हस्ताक्षर होने चाहिए और इसकी एक प्रति उस व्यक्ति को भी दी जानी चाहिए जिसके घर/इमारत की तलाशी ली गयी हो।
तलाशी लेने वाले अधिकारी की भी , तलाशी शुरु करने से पहले , तलाशी ली जा सकती है ।
कोई पुरुष किसी महिला की शारीरिक तलाशी नहीं ले सकता है, लेकिन वह महिला के घऱ या कारोबार के स्थान की तलाशी ले सकता है

Monday, 29 June 2015

Net nutarlity....

नेट न्यूट्रैलिटी क्या है ?
------------------------
नेट न्यूट्रैलिटी पर मेरे जेहन में कुछ सवाल हैं. अगर कोई
जानकार साथी मेरे सवालों पर रोशनी डाल सके तो
मैं इस पूरी बहस को कुछ बेहतर तरीके से समझ सकूंगा.
मुझे उम्मीद है कि आप मेरी मदद जरूर करेंगे.
1. व्हॉट्स अप का रेवेन्यू मॉडल क्या है? और कितने
लोग हैं जो ऐसी किसी सुविधा के लिए पैसे का
भुगतान करने को तैयार हैं. डेटा चार्ज के अलावा.
क्योंकि डेटा चार्ज तो टेलीकॉम कंपनी के खाते में
जा रहा है. व्हॉट्स अप, स्काइप या फिर इनके जैसे
तमाम ऐप बनाने और चलाने वालों की कमाई कैसे
होगी?
2. रिलायंस का रिटेल भी है. ऑनलाइन कारोबार में
भी उसका दखल होगा. एटरटेल का भी रिटेल है.
ऑनलाइन कारोबार में उसका भी दखल होगा. जब
टेलीकॉम सेवा देने वाली कंपनियां अगर ऑनलाइन
रिटेल शुरू करेंगी तो इसकी क्या गारंटी है कि वो
अपने विरोधियों के बिजनेस को खराब करने के लिए
नेट न्यूट्रैलिटी को ताक पर नहीं रखेंगी?
3. व्हॉट्स ऐप की वजह से टेलीकॉम कंपनियों की
एसएमएस के जरिये होने वाली आमदनी घट रही है.
अगर व्हॉट्स ऐप कॉलिंग भी सही तरीके से चलने लगी
तो उसकी वजह से टेलीकॉम कंपनियों की आदमी और
घटेगी. डेटा रेवेन्यू जरूर मिलेगा. लेकिन डेटा रेवेन्यू और
कॉल रेवेन्यू में अंतर होता है. कॉल अगर आईएसडी हो
तो अंतर और भी ज्यादा होता है. तो उस घाटे की
भरपाई कैसे होगी?
4. व्हॉट्स अप और स्काइप जैसी कंपनियां टेलीकॉम
कंपनियों के साथ स्ट्रैटेजिक अलायंस में नहीं आएंगी
तो उनका लंबे समय तक रेस में बने रहना मुमकिन नहीं.
और स्ट्रैटेजिक अलायंस के लिए कुछ खास सुविधाओं
का लेन-देन तो करना ही होता है. रेवेन्यू शेयरिंग
करनी होती है. वह नेट न्यूट्रैलिटी के दौर में कैसे
मुमकिन है?
5. यहां यह भी ध्यान रखिये कि व्हॉट्स कॉलिंग या
फिर वीडियों कॉलिंग फ्यूचर है. इस तरह के ऐप बनाने
वाले भविष्य में कुछ कमाने की लालसा से काम करते
हैं. वह भी स्टॉर्टअप होते हैं. सर्विस ऐप्स का
इस्तेमाल ज्यादातर लोग मुफ्त में करते हैं. गूगल और
फेसबुक जैसे प्लेटफॉर्म्स में विज्ञापन की सुविधा है.
इंस्टाग्राम में भी विज्ञापन की गुंजाइश है. लेकिन
व्हॉट्स ऐप में यह सुविधा नहीं है. दूसरी तरफ लोग
डेटा का भी पैसा दें और फिर सर्विस का भी ऐसा
मानना बेबुनियाद है. इसलिए ऐप बनाने वाले
टेलीकॉम कंपनियों के साथ करार करते हैं. ताकि
टेलीकॉम कंपनियां उन ऐप्स को बेचें और अपने रेवेन्यू में
से उन्हें हिस्सा दें. ऐसे में क्या यह मुमकिन है कि कोई
कंपनी रेवेन्यू दे और उसका लाभ दूसरी कंपनी के ग्राहक
भी बराबर उठा सकें?
6. सर्च इंजन गूगल और यू-ट्यूब जैसे सोशल नेटवर्क को
छोड़ दिया जाए तो कोई भी कंपनी कंटेंट क्रिएट
करने वालों को अपनी कमाई में हिस्सेदारी नहीं
देती. टेलीकॉम कंपनियां जो कंटेंट की बुनियाद पर
डेटा के जरिये कमाई करती हैं और फेसबुक जैसे सोशल
नेटवर्क भी नहीं जिनके मुनाफे की बुनियाद ही हमारे
और आपके जैसे लोग हैं जो घंटों समय लगा कर मुफ्त का
कंटेंट तैयार करते हैं. टेलीकॉम कंपनियों तो मीडिया
संस्थानों से बेहतर स्पीड देने के नाम पर मोटी रकम
वसूलते हैं. ऐसे में कंटेंट का कारोबार करने वाले बड़ी
संस्थाएं भी विज्ञापनों की मोहताज बन कर रह
जाती हैं और ज्यादातर घाटे में चल रही हैं. अगर वो
टेलीकॉम कंपनियों के साथ एक्सक्लूसिव टाई-अप के
जरिए कमाना चाहती हैं तो उसमें बुराई क्या है? हममें
से कितने लोग इकॉनोमिस्ट को अच्छे कंटेंट के लिए
पैसा देते हैं? या फिर टाइम्स ऑप इंडिया को
ऑनलाइन पढ़ने के लिए पैसा देते हैं. या फिर
एनडीटीवी को उसके वीडियो न्यूज के लिए पैसा देते
हैं?

Tuesday, 2 June 2015

Muslim role in freedom ?

What is truth of DR. Khan's post ?

��It was Emperor Aurangzeb who first asked the East India Company to quit India in 1686 Surat!

��The first war against the British was fought almost 200 years before independence The Battle of Plassey, wherein Nawab Sirajuddawla of Bengal was treacherously defeated by the British in 1757!

��The first signs of victory against the British were seen in Mysore where Nawab Hyder Ali first waged war against the British in 1782. He was succeeded by his son,
��Tipu Sultan who again fought them in 1791 and was eventually treacherously defeated and martyred in 1799. Tipu Sultan was the first General to use missiles in warfare!

��The Mujahid Movement was active during 1824 and 1831 under the leadership of Syed Ahmad Shaheed and his two disciples and they were successful in liberating the North-west province from British authority. Syed Ahmad Shaheed was nominated Khalifa, but the freedom was short lived and he was martyred in 1831!

��The last Mughal Emperor, Bahadur Shah Zafar was to lead the War of Independence in 1857. A country-wide war was to begin simultaneously on the 31st of May 1857, but the Indians among the British army revolted before that on the 10th of May 1857!

��A startling 5,00,000 Muslims were martyred following the events of 1857, of which 5000 were Ulema (religious scholars). It is said that there was not a single tree on the Grand Trunk Road from Delhi to Calcutta but that an alims body was not found hanging on it for days together!

��Indian Ulema called for Jihad against the British and declared India as Darul Harb (Territory under Enemy control). This call found resonance all over the country with Muslims rising up against the British!

��To liberate the countrymen from the Cultural and Educational bondages of the colonial empire, towering centres of learning like the Darul Uloom Deoband, Darul Uloom Nadwa and the Aligarh Muslim University were established in the late 19th Century, which are still counted amongst the leading Indian seminaries!

��The Reshmi Rumaal Tehreeq was launched in 1905 by Shaikhul Islam Maulana Mehmood Hasan and Maulana Ubaidullah Sindhi to unite all the Indian states against the British. Maulana Mehmood was imprisoned in Malta and Kalapani for the same where he breathed his last!

��The Indian National Congress, from the time of its inception to independence has seen 9 Presidents who were Muslims!

��Barrister M. K. Gandhi served in a law firm in South Africa owned by a Muslim, who on his own expenses brought Gandhiji to India in 1916. Here, he started his agitation under the Ali Biradran (Ali Brothers)!

��The Mopla movement saw 3000 Muslims being martyred in a single battle!

��The Non-cooperation Movement and the Swadeshi Movement saw overwhelming Muslim participation. Janab Sabusiddiq who was the Sugar-king of that time gave up his business as a form of boycott. The Khoja and Memon communities owned the biggest business houses of that time and they parted with their treasured industries to support the boycott!

��The 1942 Quit India movement was actually planned by Maulana Abul Kalam Azad. He was imprisoned on the 8th of August and sent to Ahmadnagar, because of which Gandhiji had to lead the movement on the 9th of August!

��Jyotiba Phule was sponsored by his neighbour, Usman Bagban in his educational activities, so much so that the school in which he taught was owned by Mr. Usman. His daughter, Fatima was the first girl student there and joined as a teacher thereafter!

��Muslim leaders always supported the Dalit cause.
▪In the Round Table Conference held in London, Maulana Muhammad Ali Johar was lured into abandoning the Dalit cause in lieu of accepting all the other demands of the Muslims. But Maulana Johar refused to forsake the Dalits!

��When Dr. B.R. Ambedkar could not win the 1946 Central Elections, the Bengal Muslim League vacated one of its own seats and offered it to Dr. Ambedkar, who won it in the bypoll.
▪This gesture by the Muslim League paved the way for his entry into the Constituent Assembly and the rest as they say, is history!

��Muslims freedom fighters were active in the field of journalism as well.
▪Maulana Azad used his pen against the British despite being prevented by the colonial powers a number of times.
▪ In fact, the first journalist to be martyred in the cause of Indias Freedom Struggle was also a Muslim- Maulana Baqar Ali.

��So why have these points, and many many such similar ones, been relegated to the dustbin by our Historians?
��Why are these events of History not taught in our History classes?
��Why are our childrens text books bereft of these historical facts?
��Why this prejudice?
This is a deliberate attempt to discredit the Muslim leadership and indeed the Muslim masses, in order to spread in the Muslim community a sense of inferiority complex and to push them on a defensive stand.
�� What have you done for this nation to deserve the benefits of its independence?
we are asked!
��The Muslim community has played a pivotal role in Indias Freedom Struggle and it is high time we Indians are made aware of this untold and hidden aspect of History.
-Dr Siraj khan